Sunday, August 10, 2008

सिर्फ एक रुपये में रोशन हो रही रातें

बिजली संकट की मार झेलने को अभिशप्त बिहार के शहर जब लैंप की रोशनी से रातें काट रहे हों तब गांवों में बिजली के बल्व जगमगाने की बात सोचना बेमानी है। उसमें भी जब बात बिहार के सबसे पिछड़े माने जाने वाले कोसी अंचल की हो। इस इलाके के आधे गांव तो आजतक बिजली का खंबा भी नहीं देख पाए हैं। जहां बिजली पहुंची भी है वहां भी चार-पांच घंटे में कभी एक बार इसके दर्शन हो जाते हैं वो भी घंटे-आधे घंटे के लिए ही। शाम के वक्त जब बिजली की जरूरत सर्वाधिक होती है, इन इलाकों में बिजली का दर्शन दुर्लभ संयोग ही होता है। इन तमाम विसंगतियों के बीच यहां के ग्रामीणों ने आपनी रातों को रोशन करने का अनोखा तरीका ढ़ूंढ़ लिया है और यह तरीका भी काफी सस्ता है। एक बल्व के लिए सिर्फ एक रुपये रोजाना या एक लीटर कैरोसिन प्रति माह। लिहाजा अमीर हो या गरीब हर कोई इस सुविधा का खुलकर लाभ ले रहा है और बिना बिजली के भी कोसी के गांवों की रातें जगमगा रही हैं।सफलता की यह दास्तां संसाधन विहीन बिहार के सबसे सफल तकनीक ‘जुगाड़’ पर आधारित है। लोगों ने पुराने पड़ चुके जेनरटरों को इस रूप में ढ़ाल लिया है कि वे कैरोसिन से भी चलाई जा सके और 8 वाट के 6 सौ सीएफएल बल्वों को रोशन कर सके। इन जेनरटरों में बमुश्किल आठ से दस लीटर कैरोसिन प्रतिदिन व्यय होता है। लिहाजा एक बल्व के रोशन होने का खर्च 25 पैसे से भी कम आता है। ऐसे में गांव के बेरोजगार युवकों ने इसे स्वरोजगार के रूप में अपना लिया है। उन्होंने केबुल वालों की तरह पूर गांव में तार बिछा दिए हैं और घर-घर में जरूरत के हिसाब से सीएफएल बल्व टांग दिए हैं। वे इन बल्वों का किराया दो तरह से वसूलते हैं। या तो एक रुपये प्रतिदिन के हिसाब से महीने के तीस रुपये, या फिर एक लीटर कैरोसिन। जो लोग तीस रुपये प्रतिमाह देने में भी सक्षम नहीं होते वे रियायती दर पर मिलने वाला एक लीटर कैरोसिन ही दे देते हैं। यही कैरोसिन जेनरटर संचालकों के लिए ईंधन के तौर पर इस्तेमाल होता है। जेनरटर संचालक रोशनी की सुविधा शाम छह बजे से रात 11 बजे तक देते हैं, जिस वक्त रोशनी की जरूरत सर्वाधिक होती है। किसी और को इस योजना से फायदा हो न हो पर उन बच्चों को तो इससे सर्वाधिक लाभ हो रहा है, जो अब तक कम रोशनी वाले कैरोसिन लैंपों में किसी तरह पढ़ाई कर रहे थे।

Tuesday, July 22, 2008

वजह क्या है..

1 परमाणु करार से आने वाले 30 वर्षों में कुल आवश्यकता की अधिकतम 6 प्रतिशत बिजली ही उपलब्ध हो पाएगी
2 भाभा एटामिक रिसर्च सेंटर के पूर्व निदेशक डा. पद्मनाभ कृष्णगोपाल अय्यंगर के मुताबिक हमारे पास तीस साल तक के लिए 11 हजार मेगावाट बिजली पैदा करने लायक यूरेनियम मौजूद
3 डील के बाद मिलने वाले यूरेनियम से पैदा बिजली काफी महंगी होगी
4 हम परमाणु परीक्षण करने का अधिकार खो देंगे
5 करार से हमें परमाणु शक्ति का दर्जा नहीं मिलने वाला
इसके बावजूद सरकार इस करार के लिए इतनी ललायित है कि इसने अपना सबकुछ दाव पर लगा दिया, इसकी वजह क्या है..
आप सबों से राय की अपेक्षा

Friday, July 04, 2008

राष्ट्रहित की धूम

इन दिनों पूरे देश में राष्ट्रहित की धूम मची है. यह सब कुछ.कुछ वैसा ही है, जैसा कारगिल युद्ध और उससे पहले परमाणु परीक्षणा के दिनों में हुआ करता था. आजकल देश की हर बङी राजनीतिक पार्टी, राजनीति के बदले राष्ट्रहित करने का दावा करने लगी है और राष्ट्रहित के नाम पर एक दूसरे को गलत साबित करने में जुट गई है. अब जैसे लोहियाजी के आदर्शों पर चलने का दावा करने वाली समाजवादी पार्टी के मुताबिक परमाणु करार के लिए यूपीए के साथा हो जाना राष्ट्रहित है, अपने पक्ष में उसने पूर्व राष्ट्रपति कलाम तक से सहमति ले ली है।गुरुवार की शाम से इस पार्टी के प्रवक्ता ऐसा बयान तक जारी करने लगे हैं. हालांकि जैसा माननीय मुलायमजी ने अपना रेपुटेशन बना रखा है, लोग किसी भी सूरत में उन्हें और उनके महासचिव अमर सिंह के राष्ट्रहित पर भरोसा नहीं करते, यह बात दोनों महाशयों को भी मालूम था, इसलिए दोनों ने इसमें कलामजी का एंगिल भी फिट करवा लिए. ऐसे में देश की बहुसंख्यक उत्साही जनता ने भी मानना शुरू कर दिया कि राष्ट्रहित एशिया कप जीतने में नहीं बल्कि परमाणु करार में ही है.
मगर आज दोपहर वामपंथियों ने फिर से पूरे देश को कंन्फयूज कर दिया. लंम्बी चौङी बैठक के बाद उनके नेता प्रकाश करात ने घोषणा कर दी कि इस राष्टविरोधी सरकार से समर्थन तो वापस लिया ही जाएगा, 14 अप्रैल से पूरे देश में अभियान चलाकर लोगों को बताया जाएगा कि परमाणु करार किस तरह राष्टहित के खिलाफ है. वैसे तो अपने देश की आबादी का बङा हिस्सा मानता है कि वामपंथी जो कहते हैं सच अक्सर उसके उलट होता है, यानी अगर वे करार को राष्ट्रहित के खिलाफ बता रहे हैं, तो मुलायम की बातों में कुछ न कुछ सच्चाई जरूर होगी. कुछ प्रगतिशील जनता के लिए आज भी वाम का स्टैंड ही अंतिम सत्य होता है. लिहाजा राष्ट्रहित के सवाल पर वे कुछ कन्फूज हो गए. अगर कन्फ्यूजन सिर्फ इतना ही होता तो चल जाता, मगर इन सब के पैरलल देश की एक और बङी राजनीतिक शक्ति ने अलग कन्फ्यूजन फैला रखा है कि राष्ट्रहित का परमाणु करार से कोई लेना देना नहीं, न इसके समर्थन से न ही इसके विरोध से. राष्ट्रहित का संबंधा अगर किसी बात से है तो वह श्राइन बोर्ड की जमीन पर उठे विवाद से है. हम सबों को श्राइन बोर्ड की जमीन छीने जाने की साजिश का मुकाबला करना चाहिए, वह भी राष्ट्रहित में-

Monday, June 30, 2008

कुसुम : मेरी बेटी

आजकल सभी बङी खबरें मेरे लिए निरर्थक होने लगी हैं, क्योंकि मैं जिस बङी खबर का इंतजार करता रहता हूं, वह यह है कि आज मेरी बेटी ने अपनी मां को कितना हंसाया या कितना तंग किया. मेरी बेटी कुसुम अभी मेरे साथ नहीं है, वह इन दिनों अपने ननिहाल में है. उसका जन्म भी 29 मई को वहीं हुआ. हर रोज मैं दिन में चार बार फोन करके पूछता हूं कि वह अभी क्या कर रही है और उस वक्त उसने क्या किया जब मैं उसके साथ नहीं था.मुझे बहुत अफसोस है कि उसकी तस्वीर मैं आप सबों को दिखा नहीं सकता. हालांकि उसकी तस्वीर मेरे मोबाइल में है पर उसे कंप्यूटर पर डाउनलोड करने वाला डिवाइस मेरे पास नहीं है. वह बिल्कुल अपनी मां पर गई है. इन दिनों उसने कुछ ज्यादा ही रोना सीख लिया है, जिससे उसकी मां परेशान रहती है. वैसे वह कभी कभी मुस्कुराती भी है. मगर अब तक उसने हमें पहचाना नहीं है, बेबी सेंटर डाट काम पर बताते हैं कि अब कभी भी वह हमें पहचान कर मुस्कुरा सकती है. हालांकि यह तोहफा मुझे नहीं मेरी बीवी को मिलेगा, फिर भी बङी बेताबी से मैं उस दिन का इंतजार कर रहा हूं. मुझे इस बात का भी अफसोस है कि मुझे उसकी पहली पहचान देख पाने के लिए छुट्टी नहीं मिल पाएगी.हमारा सिस्टम ऐसी चीजों के लिए छुट्टी नहीं देता. जबकि ये बातें कितनी महत्वपूर्ण हैं, यह सिर्फ महसूस किया जा सकता है.