Tuesday, September 07, 2010

माओवादियों का जातिवाद


बिहार में हुई हाल की घटनाओं ने साबित कर दिया है कि माओवादी अब महज डकैतों और माफिया गुंडों का समूह है जिनसे सिर्फ डरा जा सकता है. विचारधारा और शोषण के खिलाफ लड़ने के उनके जज्बे के कारण लोगों में उनके प्रति जो सम्मान बचा था वह भी अब खत्म होने की कगार पर है. मगर इस क्राइसिस के बाद जो सबसे चौकाने वाली बात उभर कर सामने आयी है वह इन समूहों की वास्तविकता बन चुके जातिवादी झगड़े हैं. यह कोई अनुमान नहीं बल्कि कटु सच्चाई है, बिहार के बंधक विवाद के दौरान जिस तरह ईसाई आदिवासी बीएमपी हवलदार लुकस टेटे की हत्या कर दी गई और अभय चादव, रूपेश सिंहा व एहसान खान को छोड़ दिया गया उसके कारण माओवादियों के बीच जड़ जमा चुका यह विवाद सतह पर आ चुका है. बहुत संभव है कि इस झगड़े के कारण आने वाले दिनों बिहार और झारखंड में माओवादियों के बीच गैंगवार की स्थिति उत्पन्न न हो जाये.



लखीसराय के माओवादियों द्वारा बंधकों में से एक ईसाई आदिवासियों की हत्या किये जाने के कारण झारखंड के आदिवासी माओवादियों में गहरा रोष है. बताया जाता है शीर्ष माओवादी जोनल कमांडर बीरबल मुर्मू ने लखीसराय के जोनल कमांडर अरविंद यादव के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते हुए कहा है कि उसने जहां एक ओर एक आदिवासी पुलिस कर्मी की हत्या करा दी वहीं अपनी जाति के बंधक अभय यादव की जान जानबूझकर बख्श दी. मुर्मू का कहना है कि अगर हत्या ही करना था तो चारो बंधकों की हत्या करते, किसी एक को मारना और तीन को छोड़ देना एक गलत परंपरा को जन्म देता है. यह भी कहा जा रहा कि आदिवासियों को शोषण से मुक्ति दिलाने के नाम पर लड़ाई लड़ने वाले माओवादियों ने जिस तरह एक आदिवासी की हत्या कर ही और गैरआदिवासियों को बख्श दिया उससे समाज में गलत संदेश गया है.



हालांकि माओवादियों को संदेश की परवाह अधिक नहीं. हकीकत यह है कि झारखंड के जिन इलाकों में माओवाद का गढ़ है वे आदिवासी बहुल हैं और स्थानीय लोगों के सहयोग और संरक्षम के कारण ही वे इस इलाके में कायम हैं. उनके लड़ाका कैडर में भी आदिवासियों की संख्या ही अधिक है. माओवादी किसी सूरत में झारखंड के जोन के कमजोर हो जाने का खतरा नहीं उठा सकते क्योंकि अवैध खनन वाले इन्हीं इलाकों से उन्हें सर्वाधिक आय होती है. ऐसे में लुकास टेटे की हत्या उनके लिये आत्मघाती साबित होने वाली है.



झारखंड के आदिवासियों के हाल के दिनों में माओवाद के खिलाफ जंग की लड़े जाने की भावना सामने आने लगी है. पिछले दिनों कई गांवों में आदिवासियों ने जातीय सभा बुलाकर माओवादियों के खिलाफ जंग छेड़ने का ऐलान किया है. ऐसे में निश्चित तौर पर टेटे की हत्या आग में धी का काम करने वाली है. आने वाले दिनों में अगर आदिवासी समुदाय अधिक संगठित होकर माओवादियों के खिलाफ जंग का ऐलान कर दे तो इसमें किसी को अचरज नहीं होना चाहिये.



हालांकि कई लोग ऐसा भी मानते हैं कि टेटे की हत्या को ईसाई वर्सेज गैर ईसाई की जंग के तौर पर भी देखा जा सकता है. क्योंकि ईसाई आदिवासी आर्थिक तौर पर गैर इसाईयों के मुकाबले अधिक समृद्ध है और वह आम तौर पर माओवाद का समर्थक नहीं माना जाता. इसके बावजूद यह मसला इतना महत्वपूर्ण नहीं कि आदिवासियों के बीच आपसी विवाद का कारण बन सके. क्योंकि जब आदिवासी बनाम गैर आदिवासी की बात होती है तो सभी आदिवासी एक होते हैं. लुकस की पत्नी ने भी यह कह कर माओवाद के खिलाफ आदिवासियों के बीच एका स्थापित करने के प्रयासों को बल दिया है कि उसके पति को इस लिये मारा गया क्योंकि वह आदिवासी था.



बहरहाल टेटे का हत्यारा पिंटो दा और उस हत्या का आदेश जारी करने वाला अरविंद यादव बिहार पुलिस की हिरासत में है. बिहार पुलिस ने इसके अलावा सात अन्य शीर्ष माओवादियों को गिरफ्तार किया है. कहा जाता है कि बंधकों की रिहाई के पीछे इन्हीं गिरफ्तारियों का हाथ है. लालू चुप हैं और भद्र मानुषी भाषा बोल रहे हैं. इससे ऐसा लगता है कि नीतीश ने इस प्रकरण में लालू की काट तलाश ली है. नीतीश भी चुप हैं, शायद वे इस प्रकरण पर अपने पत्ते बाद में खोलेंगे. बहरहाल अगर सचमुच माओवादियों के बीच जातीय जंग छिड़ी तो वह बिहार-झारखंड में उसकी बरबादी का कारण बनेगा और इसके लिये हमेशा इस प्रकरण को याद किया जायेगा.

बिहार को बदलनी होगी माओवाद के खिलाफ नीति


कभी-कभी ऐसा लगता है कि माओवादियों को शांति के नाम से ही चिढ़ है. वे हर हालात में सरकार के साथ जंग की स्थिति बरकरार रखना चाहते हैं क्योंकि अगर जंग नहीं होगा तो फिर माओवाद का क्या होगा? और अगर माओवाद मिट गया तो फिर उन माओवादियों का क्या होगा जो बंदूक की नाल से क्रांति की विचारधारा में यकीन करते-करते इस कदर बारूद की गंध के आदी हो गये हैं कि उन्हें इसके बिना जीना नामुमकिन लगता है. शायद यही वजह है कि उन्होंने बिहार में चार पुलिस कर्मियों को अगवा करके एक ऐसी सरकार के खिलाफ जंग छेड़ दी है, जिसका मुखिया हमेशा यही कहता आया है कि माओवादी हमारे समाज के अंग हैं, हम बंदूक के जोर पर इस समस्या का समाधान नहीं कर सकते.

माओवादियों के द्वारा उठाये गये इस कदम के कारण बिहार सरकार पिछले चार दिनों से बंधक है. सरकार की दुविधा यह है कि न तो वह माओवादियों के आगे झुक कर एक गलत परंपरा को जन्म देने का दोषी बनना चाहती है और न हीं माओवादियों के कब्जे में फंसे पुलिस कर्मियों को खोना चाहती, जिससे चुनाव के ऐन पहले जनता की सहानुभूति खो देने का खतरा उत्पन्न हो जाये. ऐसे में केंद्र सरकार और खास तौर पर गृह मंत्रालय पूरे प्रकरण का मजा ले रहा है, चिदंबरम ठहाके लगा रहे हैं क्योंकि माओवादियों को समाज का हिस्सा बता कर उनकी नीतियों की आलोचना करने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सांसें अटकी हैं.

बिहार सरकार का माओवादियों के प्रति नर्म रुख नीतीश सरकार के समय की उपज नहीं है. समाजवादी आंदोलन के प्रभाव के कारण बिहार के आम बुद्धिजीवी हमेशा से इसी तरह सोचते हैं. राबड़ी देवी के शासनकाल में भी तत्कालीन डीजीपी ओझा ने प्रयास किये थे कि सरकार और माओवादियों के बीच बातचीत हो जाये, मगर उस वक्त के सरकार की प्राथमिकताओं में यह मुद्दा नहीं आ सका, लिहाजा उस वक्त वार्ता संभव नहीं हो पाई. इसके बावजूद न सिर्फ सरकार बल्कि बिहार का पुलिस प्रशासन भी कभी इन्हें अपने खिलाफ युद्ध छेड़ने वाली शक्ति या आतंकवादी के रूप में नहीं देख पाया.

बिहार हमेशा से यही सोचता रहा कि माओवाद का कारण विकास की असमानता है और माओवादी समाज के वे युवक हैं जो बदलाव चाहते हैं. हालांकि लोकतांत्रिक व्यवस्था से उनका भरोसा उठ गया है और वे अपने उग्र स्वभाव के कारण बंदूक के बल पर आनन-फानन में समाधान चाहने लगे हैं, मगर इसका अर्थ यह नहीं कि सरकार भी उनके खिलाफ बंदूक उठा ले. यही वजह रही कि नीतीश सरकार ने गृह मंत्री पी.चिदंबरम के नेतृत्व में शुरू किये गये ऑपरेशन ग्रीन हंट में शामिल होने में कभी दिलचस्पी नहीं दिखाई. कोलकाता में जब मंत्रालय ने सभी माओवाद प्रभावित राज्यों के प्रतिनिधियों की बैठक बुलाई तो बिहार के प्रतिनिधि उस बैठक से गैरहाजिर थे. तब चिदंबरम ने कहा था कि लगता है बिहार अलग राह अपनाना चाहता है. इसके बावजूद माओवादियों ने कभी बिहार को नहीं बख्शा. लखीसराय, जमुई और गया के इलाके में उन्होंने अपनी कार्रवाइयां हमेशा जारी रखीं.

दरअलस बिहार द्वारा माओवादियों के प्रति नरम रवैया अपनाने की नीति का आधार ही गलत है. बिहार के नीति नियंता जिस माओवाद की कल्पना अपने मन में संजोये बैठे हैं वह काफी पहले की बात है. दरअसल वह माओवाद है ही नहीं वह तो नक्सलवाद है. अब माओवादियों की लड़ाई में शोषण की खिलाफत को सिर्फ नारे की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है. उनकी असली लड़ाई देश के खनिज संसाधनों पर कब्जे की है. गौरतलब है कि माओवाद उन्हीं इलाकों में पसरा है जहां खनिज प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है. आंध्रप्रदेश, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ से लेकर झारखंड तक. बिहार और बंगाल में भी माओवाद वहीं है जहां खनिज पर्याप्त मात्रा में हैं.

अब माओवादी चीन से सिर्फ विचार नहीं लेते, कहा तो यहां तक जा रहा है कि वे उनसे फंड तक लेने लगे हैं. इसके बदले में वे चीन को भारतीय खदानों से निकला कच्चा माल उपलब्ध कराते हैं. बेल्लारी के रेड्डी बंधुओं से लेकर झारखंड के सिंह मेंशन तक हर खनिज माफिया इस कारोबार में माओवादियों का हिस्सेदार है. माओवादी पूरे इलाके को अपने कब्जे में लेकर उन इलाकों में प्रशासन के पहुंच को असंभव बनाकर इन माफियाओं को खुलेआम अवैध खनन की छूट का मौका देते हैं और इन्हें चीन भिजवाने में सहयोग करते हैं. इनसे कमीशन लेते हैं और आम जनता, सरकारी अधिकारी, ठेकेदार आदि अनके इलाके के हर पैसे वालों से लेवी वसूलते हैं. इन पैसों से हथियार खरीदे जाते हैं और फौजियों की भर्ती होती है. अब तो लेवी की दर बकायदा अखबारों में छपने लगी है. अपने इलाके में माओवादी अब सरकार बनवाने तक की प्रक्रिया में शामिल होने लगे हैं. कहा जाता है कि झारखंड में शिबू की जीत माओवादियों के रहमो-करम पर हुई थी, वे हर हाल में कांग्रेस और बाबूलाल को सरकार से दूर रखना चाहते थे. अब उनका नया एजेंडा ममता को बंगाल की कुर्सी पर काबिज कराना है.

इन हालातों में अगर बिहार की सरकार यह सोचती है कि माओवादी हमारे समाज का हिस्सा हैं और शोषण के खिलाफ लड़ने वाले भोले-भाले युवक हैं तो यह उनकी सोच का पिछड़ापन ही दर्शाता है और इसी का नतीजा आज नीतीश भुगत रहे हैं. उन्हें लगता था कि उनकी सदाशयता राज्य को माओवाद की समस्या से बचाकर रखेगी, मगर माओवादी इस तरह से नहीं सोच रहे हैं. वे सोचते हैं कि अगर सरकार से शांतिवार्ता हो गई तो लखीसराय-जमुई और मुंगेर में हो रहे अवैध खनन पर रोक लग जाएगी और उनकी आय का एक बड़ा हिस्सा खत्म हो जायेगा. यह कार्रवाई पूरी तरह बिहार सरकार को भड़काने और अपने खिलाफ करने की कोशिश हैं. उन्हें मित्रों की जरूरत नहीं, वे शत्रु चाहते हैं. क्योंकि शत्रु ही उनके हिंसक कार्रवाइयों को जायज ठहराने का आधार बनेंगे, मित्र तो उन्हें अपना कारोबार बंद कर समाज की मुख्य धारा में शामिल होने की सलाह देंगे.

बिहार में उनकी मौजूदा कार्रवाई इसी बात को पुष्ट करती है. पहले वे पुलिसकर्मियों को मार गिराते हैं, फिर बीडियो और चार पुलिसकर्मियों को बंधक लेते हैं. फिर फिरौती के तौर पर अपने आठ साथियों को रिहा करने की अपील करते हैं. पुलिसकर्मियों के परिजनों को फोन कर मुख्यमंत्री आवास पर धरना देने की तरकीब बताते हैं ताकि पूरा मसला मीडिया का अटेंशन खींच सके और नीतीश को कटघड़े में खड़ा कर सके. फिर एक बंधक को मार गिराने का दावा करते हैं ताकि सरकार घबड़ाकर कोई कदम उठाये.

इस प्रकरण में सरकार की सिर्फ यही गलती है कि वह सदमे में है कि आखिर उसकी नीति गलत कैसे साबित हो गई. कहा जा रहा कि पुलिस प्रशासन आंध्र प्रदेश के विधायक अपहरण कांड के इस्तेमाल की गई नीतियों पर चल रहा है. मगर सच्चाई यह है कि इस मसले पर हर तरफ से सरकार की ही हार है. चाहे वह माओवादियों को वार्ता के टेबुल पर बुला ले या माओवादियों को छोड़ कर बंधकों को बचा ले या फिर ठोस पुलिसिया कार्रवाई कर माओवादियों को मार गिराये. हर हालत में सरकार ही कटघड़े में होगी और माओवादी यह साबित करने में कामयाब होंगे कि उनके साथ हर हाल में जंग की मुद्रा ही अपनानी होगी.

Wednesday, September 01, 2010

विनय प्रकरण-भोलानाथ आलोक की प्रतिक्रिया

हिंदुस्तान' ने पूर्णिया को शर्मसार कर दिया



उम्र-78 साल और ये उम्र मैंने अपने घर के बंद कमरों में नहीं काटी. पूर्णिया की तमाम साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों से हर दिन का साबका रहा है. कचहरी चौक पर धरना-प्रदर्शन से लेकर छोटे-बड़े तमाम मंच पर सक्रिय रहा हूं. जानता हूं कि खबरें कैसे बनती हैं और कैसे छपती हैं. 'हिंदुस्तान', 'दैनिक जागरण', 'प्रभात खबर', 'राष्ट्रीय सहारा' और ऐसे ही तमाम अखबारों में छपता रहा हूं. पत्रकारिता को लेकर खट्टे-मीठे अनुभव रहे हैं. उम्र और अनुभव का तकाजा कुछ ऐसा रहा कि कभी शाबाशी में पत्रकारों की पीठ ठोंकी तो कभी उनकी तीखी आलोचना भी की, लेकिन पिछले दिनों शहर में घटी एक घटना के बाद से बेचैन हूं, दुखी हूं, शर्मिंदा हूं- समझ नहीं आ रहा कि कैसे मन की पीड़ा व्यक्त करूं?



देश के नामी-गिरामी अखबार 'हिंदुस्तान' और उसके भागलपुर संस्करण के उप स्थानीय संपादक विनोद बंधु की एक करतूत ने पूरे पूर्णिया को शर्मसार कर दिया है. यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक है कि विनय तरुण भागलपुर 'हिंदुस्तान' से जुड़े थे, बावजूद इसके उनकी याद में आयोजित शोक सभा में न तो 'हिंदुस्तान' का कोई प्रतिनिधि आया और न ही एक लाइन खबर छपी. भागलपुर से प्रकाशित किसी भी संस्करण में विनय की इस श्रद्धांजलि सभा का जिक्र तक न था. हद तो ये है कि पूर्णिया संस्करण में भी ये खबर सिरे से गायब रही.



विभिन्न शहरों से आए पत्रकारों ने विनय तरूण की याद में एक श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया लेकिन भागलपुर में तैनात उप स्थानीय संपादक विनोद बंधु ने इसमें शामिल होने से इंकार कर दिया. इतना ही नहीं पूर्णिया के तमाम साहित्यिक, सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़े लोगों को शर्मिंदा करते हुए विनोद बंधु पूर्णिया में मौजूद रहे और दफ्तर में 'अनंत काल' की मीटिंग चलती रही. ये मीटिंग आयोजन के छह घंटों तक तो शायद चली ही, उसके बाद भी इसका असर दिखता रहा. विनोद बंधु और उनके साथियों ने इतनी भी संजीदगी नहीं दिखाई कि कार्यक्रम को कवर करवा लिया जाए. दुख होता है कि हिंदुस्तान जैसे प्रतिष्ठित पत्र के किसी संस्करण की जिम्मेदारी संभाल रहा व्यक्ति इस कदर संवेदनशून्य भी हो सकता है.



ये दुख और गहरा तब हो जाता है जब उलाहने के बावजूद खबर नहीं छपती, बल्कि प्रेस रिलीज की डिमांड कर दी जाती है. दैनिक हिंदुस्तान के ब्यूरो चीफ अरुण से मैंने इस बाबत बात की तो उनका कहना था- क्या करते मीटिंग चलती रही. जब मैंने कहा कि भूल सुधार कर अगले दिन ये खबर ले सको तो ले लो, फिर भी उनका जवाब रूखा सा ही रहा. हालांकि प्रभात खबर और राष्ट्रीय सहारा ने एक दिन बाद 30 अगस्त 2010 को श्रद्धांजली सभा की खबर प्रकाशित की. इस सिलसिले में इलेक्ट्रानिक मीडिया के पत्रकारों को जरूर साधुवाद दूंगा कि उन्होंने पूर्णिया की थोड़ी बहुत लाज बचा ली. सहारा, ईटीवी, फर्स्ट न्यूज और कोसी आलोक ने कार्यक्रम का कवरेज कर ये जतला दिया कि संवेदना से रहित नहीं हैं पूर्णिया के पत्रकार.



28 अगस्त 2010 को विनय की याद में तीन सत्रों का कार्यक्रम हुआ और प्रथम सत्र की अध्यक्षता की जिम्मेदारी बिना मेरी सहमति के मुझे सौंप दी गई. उन बच्चों ने मुझ पर अपना अधिकार जमाया, पूर्णिया पर अपना अधिकार जमाया, उन्हें वाकई अपने शहर और अपनी माटी से लगाव है वरना मुझसे सहमति की औपचारिकता जरूर निभाई जाती. ये विनय का भी लगाव रहा होगा कि उसके दोस्तों ने पूर्णिया में ये आयोजन रखा, वरना जो मित्र पूर्णिया में जमा हुए वो भागलपुर, जमशेदपुर, रांची, पटना या दिल्ली में भी जमा हो सकते थे. विनय के साथियों में जो ऊर्जा मैंने देखी, उनके लिए ये नामुमकिन भी नहीं है. मैं विनय के साथियों को उनकी इस भावना के लिए शाबाशी देता हूं, सलाम करता हूं.



विनय तरूण पत्रकारिता की ही नहीं वरन पूर्णिया शहर की भी संभावना था. इस शहर ने मुझे भी बहुत प्यार दिया है और ये मेरे रग-रग में बसा है. ऐसे में युवा पत्रकार विनय तरूण की शोक में हुए इस आयोजन को लेकर 'हिंदुस्तान' की उदासीनता को कतई माफ नहीं कर सकता. अखबार के पन्नों में खबरें कल भी छपती थीं... आज भी छपेंगी और ये सिलसिला बदस्तूर जारी रहेगा. इसके साथ ही ये सवाल भी हर दिन उठता रहेगा कि आखिर खबरों के लाल को खबरी दुनिया ने अखबार (दैनिक हिंदुस्तान) में दो पल का उसका अपना कोना क्यों नहीं दिया?



भोलानाथ आलोक

पूर्णिया के चर्चित कवि और साहित्यसेवक. पूर्णिया बुजुर्ग समाज के अध्यक्ष. पूर्णिया जिला ट्रेड यूनियन समन्वय समिति के अध्यक्ष. पूर्णिया हिन्दी साहित्य सम्मेलन के पूर्व अध्यक्ष.

Tuesday, August 31, 2010

हिंदुस्तान की दलील

विनय स्मरण कार्यक्रम की खबर न छपने की दलील हिंदुस्तान की ओर से यह दी गई है कि उन्हें रिलीज नहीं मिली. क्या यह एक बड़ी विडंबना नहीं है कि हमारे पत्रकार मित्र अपने सहकर्मी को श्रद्धांजलि की खबर के लिये भी रिलीज का इंतजार करते रहे. इस बात से हमसे अधिक पूर्णिया का बुद्धिजीवी वर्ग आहत है. एक बड़े साहित्यकार बच्चा यादव ने अपनी टिप्पणी भेजी है. आपको प्रेषित कर रहा हूं.....


प्रेस रिलीज का करते रहे इंतजार


पूर्णिया में पिछले दिनों 'हिंदुस्तान' के दिवंगत पत्रकार विनय तरूण की याद में एक कार्यक्रम हुआ और 'हिंदुस्तान' के पत्रकारगण एक प्रेस रिलीज का इंतजार करते रहे। पूर्णिया दफ्तर में कार्यरत पत्रकारों की विवशता ये रही कि एन कार्यक्रम के दिन हिंदुस्तान के उप स्थानीय संपादक विनय बंधु ने पूर्णिया में एक मीटिंग रख दी। भागलपुर से जब खुद संपादक महोदय हाजिर हों तो फिर भला कोई क्या कर सकता है? ऐसे में कई सवाल जेहन में कौंधते हैं कि कहीं ये विनोद बंधु का निर्देश ही तो नहीं था कि विनय तरुण की याद में आयोजित कार्यक्रम का कोई कवरेज न किया जाए? कहीं पूर्णिया में रखी गई मीटिंग एक साजिश तो नहीं थी कि व्यक्तिगत तौर पर भी कोई साथी इस आयोजन में शरीक न हो सके?

मेरे मन में ऐसा खयाल आने की कुछ ठोस वजहें हैं। एक तो स्थानीय संस्करणों में छपने वाली खबरों को देख एक सामान्य पाठक के तौर पर भी मुझे ये लगता है कि शहर में हुए इस आयोजन को जानबूझकर नजरअंदाज किया गया। 28 अगस्त 2010 को कार्यक्रम की कोई सूचना दैनिक के पन्नों पर नहीं थी। यहां तक कि 'शहर में आज' के तहत एक लाइन में भी ये जिक्र नहीं किया गया। हिंदुस्तान, पूर्णिया में कार्यरत अरुण कुमार और अखिलेश चंद्रा जैसे पत्रकारों से लंबा संपर्क होने की वजह से मुझे ये पक्का यकीन है कि ये महज गफलत नहीं है। इसकी पुष्टि तब और हो गई जब अगले दिन 29 अगस्त 2010 का अखबार देखा। पूर्णिया में 100 से ज्यादा लोगों ने जिस कार्यक्रम में शिरकत की उसका जिक्र अखबार में कहीं दर्ज तक नहीं था।

कार्यक्रम से सीधे तौर पर जुड़े होने की वजह से मेरे सामने ये दलील भी नहीं रखी जा सकती कि इसकी सूचना हिंदुस्तान के पूर्णिया कार्यालय को नहीं थी। मैं खुद इस आयोजन का आमंत्रण दफ्तर में देकर आया था, इस आग्रह के साथ कि 'क्षेत्रीय पत्रकार-काम का बोझ, न्यूनतम वेतन और बदनामियां' विषय पर बोलना आप को कबूल न हो तो भी अपनी उपस्थिति जरूर दर्ज कराएं। इतना भी मुमकिन नहीं हो पाया तो इसकी कुछ ठोस वजहें जरूर होंगी, जो विनय बंधु और उनके सहकर्मियों से बेहतर भला कौन बता सकता है?

हिंदुस्तान के इस रवैये पर पूर्णिया के बुद्धिजीवियों में तीखी प्रतिक्रिया हुई तो हिंदुस्तान दफ्तर का रवैया थोड़ा बदला। वहां से प्रतिक्रिया मिली कि प्रेस रिलीज पहुंची ही नहीं, अगर अब भी दो-चार लाइनें लिख कर भेज दी जाएं तो खबर छप जाएगी। ऐसी खबर छपवाना न तो उस दिवंगत साथी की आत्मा को कबूल होता और न ही उनके दोस्तों को, सो ये प्रस्ताव विचार से पहले ही खारिज कर दिया गया। हिंदुस्तान अखबार में वहां काम करने वाले साथी की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम की खबर प्रेस रिलीज पर छपे इससे ज्यादा दुखद बात और क्या हो सकती है?

इस सारे प्रकरण में बार-बार संपादक विनोद बंधु की भूमिका को लेकर संशय पैदा होता है। दरअसल वो इन दिनों तथाकथित 'विस्मृति' के शिकार होते जा रहे हैं। मुझे यकीन तो नहीं होता लेकिन मुमकिन है कि उन्हें याद ही न हो कि विनय तरूण नाम का कोई साथी उनके मातहत काम कर चुका है। दो महीने में ये भूल पाना मुमकिन तो नहीं लेकिन विनय बंधुजी के साथ कुछ कहा नहीं जा सकता। इस आयोजन को लेकर फोनवार्ता में उनकी विस्मृति से मैं दो चार हो चुका हूं। पूर्णिया के नवभारत टाइम्स दफ्तर में कार्यरत रहे विनोद बंधु ने विनय स्मरण कार्यक्रम में शिरकत करने से तो इंकार किया ही, मुझे पहचानने से भी कतराते रहे। कई घटनाओं का जिक्र करने के बावजूद बस इतना ही कहा कि आमना-सामना हो तो शायद यादें ताजा हो जाएं।

विनोद बंधु साहब, मेरा तो आपसे कभी न कभी आमना सामना जरूर होगा लेकिन बेचारा विनय वो कैसे आपकी यादें कुरेदेगा? कैसे आपसे पूछेगा कि ऐसा क्या गुनाह कर दिया था कि मेरी स्मृति के लिए आप दो पल भी न निकाल सके? कैसे वो आपसे पूछेगा कि आप के दिल में उसकी खट्टी या मीठी यादें शेष भी रह गई हैं या नहीं? कैसे पूछेगा कि संपादक महोदय कम से कम इतनी जल्दी इस कड़वी हकीकत से मुंह मत मोड़िए कि मैं दफ्तर के लिए निकला लेकिन कहीं नहीं पहुंचा और अब कभी पहुंच भी न पाऊंगा... न दफ्तर, न घर... न यार दोस्तों की किसी महफिल में।

बच्चा यादव,
पूर्णिया की साहित्यिक सांस्कृतिक संस्था 'साहित्यांचल' के सचिव।

शर्म है कि आती नहीं...

मित्रों चंद्रकिशोर जायसवाल हिंदी के ख्याति लब्ध साहित्यकार हैं. उन्होंने कथा साहित्य को अपनी कई कृतियों से धन्य किया है. आम तौर पर प्रचार से दूर रहने वाले जायसवाल जी को फणीश्रेवरनाथ रेणु का उत्तराधिकारी माना जाता है. हालांकि उनकी शैली रेणुजी की शैली से थोड़ी भिन्न है, मगर उन्होंने भी एक अंचल को केंद्र बनाकर और आम लोगों के जीवन के कष्ट और उनकी हंसी को अपनी रचना का विषय बनाकर कई अनमोल कृतियां लिखी हैं. उनकी रचनाओं में शब्दाडंबर कम और भावों की प्रधानता अधिक हैं. विनय के साथियों के आमंत्रण पर इस कार्यक्रम में उनकी भागीदारी उन्हें जानने वालों के लिये आश्चर्य का विषय है, क्योंकि आम तौर पर वे सार्वजनिक जीवन से खुद को अलग रखने और अपने एकांत में खुद को सृजन प्रक्रिया से जोड़े रखने के हिमायती माने जाते हैं. वे न सिर्फ इस कार्यक्रम में पूरे समय तक बैठे रहे बल्कि कार्यक्रम के बाद एक मसिजीवी संपादक के इस व्यवहार से इतने आहत हुए कि उन्होंने तत्काल यह प्रतिक्रिया लिखकर प्रेषित कर दी.



ट्रक-टैम्पो भिड़े... (तीन कॉलम, पेज-3), युवा कांग्रेस का चक्का जाम (फोटो सहित 2 कॉलम, पेज नंबर-3), इसी हेडिंग के साथ एक और खबर (3 कॉलम, 5 नंबर पेज), जागरुकता से जनसंख्या पर नियंत्रण संभव (फोटो सहित 2 कॉलम, पेज-4), बाबा स्वामी रामदेव के कार्यक्रम को ले बैठक (2 कॉलम), किसानों को दी खाद व कीटनाशक की जानकारी (फोटो सहित 2 कॉलम)... 29 अगस्त 2010 को भागलपुर से प्रकाशित हिंदुस्तान के पूर्णिया संस्करण में ऐसी ही कई खबरें थीं लेकिन वो खबर नहीं थी जिसे देखने के लिए हममें से कई साथियों ने अखबार खरीदा और उसके पन्ने पलटते रहे। पूर्णिया में दिवंगत पत्रकार विनय तरूण को श्रद्धांजलि देने के लिए कार्यक्रम हुआ लेकिन कई पत्रकारों को वहां झांकने तक की फुर्सत नहीं मिली। अफसोस कि दैनिक जागरण समेत दूसरे स्थानीय अखबारों से भी ये खबर नदारद रही।

बाकी की बात छोड़ भी दें लेकिन हिंदुस्तान की इस हरकत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। भले ही हिंदुस्तान के उप स्थानीय संपादक और साथी इसे कोई अपराध न माने लेकिन एक अपराध हो चुका है, भले ही किसी संविधान में उसकी कोई धारा दर्ज नहीं। पत्रकारों की बात छोड़ भी दें लेकिन एक आम पाठक को भी उस वक्त जरूर कोफ्त होगी जब यह पता चलेगा कि वो दिवंगत पत्रकार कोई और नहीं बल्कि दैनिक हिंदुस्तान, भागलपुर में काम करने वाला एक संपादकीय साथी था। उसकी मौत संस्थान की नौकरी छो़ड़ देने या अखबार से हर तरह का नाता तोड़ देने के बाद नहीं हुई थी... वो ऑफिस पहुंचने की आपाधापी में ही 22 जून 2010 को एक ट्रेन हादसे में मारा गया। अफसोस हिंदुस्तान के संपादक विनोद बंधु समेत उनके साथ काम करने वाले तमाम साथियों ने इस युवा पत्रकार को महज दो महीने में ही बिलकुल पराया कर दिया, इतना पराया कि उनके लिए श्रद्धांजलि कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए दो पल भी न मिले। संपादक महोदय की व्यस्तता का आलम ये रहा कि उन्होंने तमाम स्रोतों से इस कार्यक्रम के आयोजन की सूचना मिलने के बावजूद किसी नुमाइंदे को भेजना जरूरी नहीं समझा।

28 अगस्त 2010 को पूर्णिया के बीबीएम हाईस्कूल में 100 से ज्यादा लोगों का जमावड़ा लगा। दिल्ली, पटना, रांची, जमशेदपुर, मुजफ्फरपुर, भागलपुर, सहरसा, सुपौल और फारबिसगंज समेत कई जगहों से पत्रकार साथी विनय तरूण को याद करने पहुंचे। कोई 1300 किलोमीटर की यात्रा कर यहां पहुंचा तो किसी ने 300 किलोमीटर का सफर तय किया... कोई मोटरसाइकिल पर हिचकोले खाते 100-125 किलोमीटर चलकर एक सीधे-सादे सच्चे पत्रकार को श्रद्धांजलि देने पहुंचा लेकिन पता नहीं ऐसी क्या बात थी कि हिंदुस्तान के साथी एक से डेढ़ किलोमीटर का फासला भी तय नहीं कर पाए। विनय की याद में आंसू बहते रहे लेकिन इन पत्रकारों ने कलेजा कुछ ऐसा सख्त कर लिया कि ऑफिस में चुनावी जमा खर्च का हिसाब किताब होता रहा। सबसे ज्यादा दुखद बात तो ये है कि ये सब हिंदुस्तान के भागलपुर संस्करण के उप-स्थानीय संपादक विनोद बंधु की मौजूदगी में हुआ। जी हां जिस वक्त पूर्णिया के वयोवृद्ध साहित्यकार भोलानाथ आलोक, पूर्णिया आकाशवाणी के पूर्व केंद्र निदेशक विजयनंदन प्रसाद समेत तमाम पत्रकार, बुद्धिजीवी और घर परिवार के लोग एक कमरे में युवा पत्रकार विनय तरुण की मौत का मातम मना रहे थे, उसी वक्त अपने मातहत विनय तरूण की मौत का गम भुला चुके संपादक विनोद बंधु पूर्णिया में ही मीटिंग कर रहे थे।

संपादक महोदय की संवेदनशीलता का आलम ये रहा कि सुबह 11 बजे से लेकर शाम के 5 बजे तक चलने वाले श्रद्धांजलि समारोह के तीन सत्रों में से किसी एक सत्र के लिए भी वो दो पल का वक्त नहीं निकाल पाए। जितनी देर कार्यक्रम चला, शायद उतनी देर मीटिंग भी चलती रही। अन्यथा यकीन नहीं होता कि कोई अपने साथी को इस तरह भी भुला सकता है। यकीन नहीं होता कि एक संपादक इतना कठोर हृदय भी हो सकता है। यकीन नहीं होता कि दुनिया का दर्द अखबारों के पन्ने पर उकेरने वाली बिरादरी अपने घर के अंदर बह रहे आंसुओं की धारा से इस कदर आंख मूंद सकती है।

क्षेत्रीय पत्रकार- न्यूनतम वेतन, काम का बोझ और बदनामियां

इस मौके पर एक परिचर्चा भी आयोजित कराई गई जिसका विषय था, क्षेत्रीय पत्रकार- न्यूनतम वेतन, काम का बोझ और बदनामियां. इसका आधार वक्तव्य निम्न है. इसे आप अपने हिसाब से कहीं भी इस्तेमाल कर सकते हैं. विनय के मित्र इस बात के लिये प्रयासरत हैं कि उसकी याद में हर साल एक दो दिवसीय व्याख्यान माला का आयोजन कराया जा सके, जिसमें पत्रकारिता से संबंधित मुद्दों पर विमर्श हो.

आज हम अपने साथी विनय तरुण को याद करने के लिये यहां जमा हुए हैं, हम सब जानते हैं कि वह एक प्रॉमिसिंग जर्नलिस्ट था. एक ऐसा पत्रकार था जिसने कई संवेदनशील मुद्दों पर बेहतरीन रिपोर्टिंग की और जिसकी रिपोर्टों को पूरे देश में सराहना मिली. मगर ऐसे में मैं अगर उसके जीवन का सबसे कड़वा सच बयान करूं तो आप सब हैरत से अवाक रह जायेंगे और वह सच यह है कि उसने अपने पत्रकारिता के कैरियर का लंबा वक्त उन हालातों में गुजारा जब उसे पेशे से पत्रकार माना ही नहीं जाता था. उसके संस्थान ने तकनीकी तौर पर यह घोषित कर रखा था कि वह शौकिया लेखक है और उसका असली पेशा कुछ और है, ताकि उसे उसके मेहनत के लिये निर्धारित वेतन से वंचिंत किया जा सके और थोड़े से पैसे में उसे यह काम करने के लिये मजबूर किया जा सके. यह कहानी सिर्फ विनय की नहीं बल्कि हममें से कई साथियों की रही है, जो सालों इस तरह की नौकरी करने के बाद इस योग्य पाये गये कि खुद को पेशेवर पत्रकार कह सकें. विनय को इस बात का मलाल हमेशा रहता और मौका बेमौका वह कह बैठता कि हम लोग तो पत्रकार ही नहीं है. वह ताउम्र अपने साथ होने वाले अन्याय से पटरी नहीं बिठा पाया. यही वजह रही कि जब हम पहली बार उसे याद करने के लिये एक जुट इसी कड़वे विषय को बहस के लिये चुना. कई वरिष्ठ लोगों को इस विषय पर आपत्ति है और उनमें से कुछ सिर्फ इसी वजह से हमारे साथ नहीं है. मैं उनके लिये यह संदेश संप्रेषित करना चाहता हूं कि यह बिहार के क्षेत्रीय पत्रकारिता जगत की ऐसी त्रासदी से जिससे आंखें चुरा कर बचा नहीं जा सकता. हमें इसे स्वीकार करना पड़ेगा और इसे बदलना पड़ेगा. आखिरकार हम समाज को बदलने का दावा करते हैं, हम अगर अपने अंदर बदलाव नहीं ला सके तो हमारे शब्दों पर कौन भरोसा करेगा.



बहरहाल कई ऐसी घटनाएं हैं जो झकझोर देती हैं. एक साथी हमारे साथ बैठे हैं, उनके एक परिजन की अस्पताल में डाक्टरों की लापरवाही से मौत हो गई. जब उन्होंने डाक्टरों के सामने इसका विरोध दर्ज कराने की कोशिश की तो डाक्टरों ने उनकी पिटाई कर दी. उनके अखबार ने यह खबर छापी मगर कहीं इस बात का उल्लेख नहीं किया कि उक्त सज्जन पत्रकार हैं. अगर दलित पिटता है तो छपता है दलित की पिटाई, अफसर पिटता है तो छपता है अफसर की पिटाई पर अगर पत्रकार पिटता है तो अखबार वाले यह नहीं छापते कि पत्रकार पिटा. क्योंकि वे तो उनके हिसाब से कंट्रीब्यूटर हैं, पत्रकार हैं ही नहीं. उस साथी को यह बात बुरी लगी और विनय ने उसका साथ दिया. उसके पिटाई की खबर प्रतिद्वंद्वी अखबारों में पत्रकार विशेषण के साथ छपी. इसका नतीजा यह हुआ कि उक्त साथी की नौकरी ले ली गई. अभी वे एक अन्य अखबार में कार्यरत हैं.



एक और दहलाने वाली घटना है. जमुई का एक पत्रकार प्रमोद कुमार मुन्ना किसी खोजी खबर के चक्कर में देवघर में था. वहां अपराधियों ने बम मार कर उसकी हत्या कर दी. खबर अखबार में छपी मगर यह नहीं छपा कि उक्त पत्रकार फलां अखबार का रिपोर्टर था. यह हम हमारी जिंदगी. हालांकि हममें से कुछ लोग इसके बावजूद कुछ राहत की जिंदगी जीते हैं, क्योंकि संस्थान हमें हर महीने कुछ पैसे दे देता है. मगर बिहार में अधिकांश पत्रकार ऐसे हैं जिन्हें कवरेज के नाम पर संस्थान कोई नियमित वेतन नहीं देता, हालांकि एक खबर छूटने पर ऐसी झाड़ पिलाता है जैसा कोई क्रूर मालिक अपने नौकरों को डांटता होगा. यह उन हजारों कलमकारों की कहानी है जो अपने-अपने इलाकों में वीआईपी का दर्जा रखते हैं.



सबसे बड़ी विडंबना है कि क्षेत्रीय पत्रकारिता के इस दौर में बिहार में खबरों की कीमत सिर्फ दस रुपये है. हमारे कई साथी यहां बैठे हैं, वे बेहतर बता सकते हैं. एक खबर को कवर करने में कितना पेट्रोल जलता है और कितना खून. मगर संस्थान उसके बदले उन्हें सिर्फ दस रुपये देता है. जिला मुख्यालयों और प्रखंडों में बैठे इन पत्रकारों को दस टकिया रिपोर्टर कहा जाता है. इस पत्रकारों की समस्या इतनी विचित्र है कि कोई इसके बारे में सोचना नहीं चाहता. आखिर एक व्यक्ति अपना पूरा समय एक अखबार को देता है. रोज उसकी तीन या चार खबरें छपती हैं और उसकी कुल आमदनी इस महंगाई के दौर में सिर्फ बारह सौ रुपये होती है. इस पत्रकारीय कर्म में औसतन उसका दो हजार रुपये का तेल जल जाता होगा, हजार रुपये मोबाइल में फिक जाते होंगे. मगर संस्थान उसके बारे में कुछ नहीं सोचता. अगर सोचने पर मजबूर किया जाये तो यही कहता है कि अरे दरोगा, वीडियो और एमएलए को ओबलाइज कर वह इतना कमाता होगा कि आप जैसे उसके सामने पानी भरेंगे. कई मामलों में यह सच हो सकता है, मगर क्या एक संस्थान के तौर पर यह जबाव कितना उचित है और इस तरह हम पत्रकारिता को किस दिशा में ले जा रहे हैं. एक युवक जो अपने समाज में बदलाव लाने के लिये इस पेशे को चुनता है वह देर सवेर भ्रष्टाचार के इस दलदल में फंस ही जाता है क्योंकि उसे अपना परिवार भी चलाना है. उसका पेशा उसे इमानदारी भरा जीवन बिताने की इजाजत नहीं देता और अंततः वह सत्ता प्रतिष्ठानों का उपकरण भर बन कर रह जाता है.



संस्थान इन पत्रकारों से उम्मीद रखता है कि उसके इलाके की कोई छोटी-बड़ी खबर न छूटे और मौका-बेमौका विज्ञापन भी मुहैया कराये. अखबार की बिक्री पर भी नजर रखे. इसके बावजूद उसके हिस्से में सिर्फ बदनामी होती है. वह बाहर तो बदनाम हो ही जाता है, वह संस्थान भी उसे उसी नजर से देखता है जो उसके पतन के लिये जिम्मेदार है. आखिर एक ब्ल़ॉक का पत्रकार गलत तरीके से कितना कमा सकता है. वह बहुत नीचे गिर जाये तो भी दस हजार से अधिक नहीं. अगर इन पत्रकारों को संस्थान सिर्फ पांच हजार रुपये प्रति माह देना शुरू कर दें तो इनमें से अधिकांश बेइमानी का रास्ता छोड़ देंगे. क्योंकि कोई इंसान बदनामी भरी जिंदगी नहीं जीना चाहता. पूरे बिहार में 38 जिले हैं और 534 ब्लाक हैं. हर जिले में औसतन पांच लोगों को अखबार नियमित वेतन देता है. ऐसे में तरीकरीबन सात सौ पत्रकार ऐसे होते हैं जिन्हे वेतन नहीं मिलता है. अगर इन्हें पांच हजार रुपये प्रतिमाह की दर से वेतन दिया जाये तो एक अखबार समूह पर प्रति माह 35 लाख का बजट आता है.



हालांकि यह एक बड़ी राशि है, मगर हर समूह अपने अखबार के जरिये जो मुनाफा कमाता है उसके हिसाब से यह राशि कोई बड़ा फर्क पैदा नहीं करती. हिंदुस्तान अखबार बिहार में औसतन हर माह एक करोड़ 50 लाख अखबार बेचता है इसके अलावा विज्ञापनों से इसकी आय भी अच्छी खासी होती है. अगर वह महीने का 30-35 लाख इस मद में खर्च कर दे तो न सिर्फ इन पत्रकारों का भला होगा, बल्कि पत्रकारिता के हालात में भी गुणात्मक सुधार होगा. ये अखबार हर माह इससे बड़ी रकम प्रोमोशन में खर्च कर देते हैं, मगर अपने जमीनी पत्रकारों से मुफ्त में काम करवाना चाहते हैं.



इसके अलावा एक बड़ा मसला इन पत्रकारों के प्रशिक्षण का है. इनमें से अधिकांश पत्रकार अपना प्रशिक्षण अखबार पढ़कर ही प्राप्त करते हैं. ऐसे में इन्हें सही-गलत और अच्छे बुरे की पहचान तक नहीं होती. मगर कोई मीडिया हाउस इस बात की परवाह नहीं करता कि उसे आखिरी छोर पर बैठा साथी जिम्मेदार पत्रकार हो. उसे पत्रकारिता के हुनर और इथिक्स से परिचित कराया जाये. अगर कोई अधिक बुरा निकला तो उसे बदल दिया जाता है. मगर प्रशिक्षण को अनावश्यक खर्च माना जाता है.



जिला स्तर पर और प्रखंड स्तर पर पत्रकारों की नियुक्ति इस भाव के साथ होती है जैसे जागीरदारी बंट रही हो. हमारे अधिकांश साथी भी यही राय रखते हैं, मगर इसमें उनका दोष नहीं, मीडिया हाउसों ने कुल मिलाकर ऐसी परिस्थिति ही बनाकर रखी है. इस व्यवस्था में कोई सकारात्मक सोच ही कैसे सकता है. लिहाजा अगर कोई बदलाव लाना है ते सबसे पहले हालात बदलने होंगे...



सभी पत्रकारों के लिये नियमित वेतन की व्यवस्था करनी होगी...

प्रखंड और जिला स्तर के पत्रकारों के प्रशिक्षम की व्यवस्था करनी होगी...

कार्यालयों में काम करने वाले पत्रकारों को वेज बोर्ड के अंदर लाना होगा...



तभी क्षेत्रीय पत्रकारों के हालात बदलेंगे.

रूलाता तो है लेकिन बल देता है विनय


अपने साथी विनय तरुण को याद करने देश भर से कई पत्रकार 28 अगस्त को उसके पैत्रिक शहर पूर्णिया पहुंचे थे. हिंदुस्तान भागलपुर में कार्यरत अत्यंत मेधावी पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता विनय तरुण की मौत इसी साल जून महीने में एक रेल हादसे के दौरान हो गई थी. इस अवसर पर हुए आयोजन की रिपोर्ट आपको प्रेषित कर रहा हूं. मैं इस बात के लिये प्रयासरत हूं कि बहुत जल्द आपको इस अवसर पर प्रकाशित स्मारिका की प्रति या उसकी पीडीएफ कापी उपलब्ध करा सकूं. इस अवसर पर प्रसिद्ध साहित्यकार चंद्रकिशोर जायसवाल ने भी मीडिया की विसंगतियों पर एक आलेख लिखा है वह भी यथाशीघ्र आपके सामने होगा.

रूलाता तो है लेकिन बल देता है विनय

दिवंगत विनय की याद में पूर्णिया में पत्रकारों का जमघट

पूर्णिया। कोसी मैया जहां-जहां तबाही के घाव छोड़ती वहां-वहां वह नौजवान मरहम लगाता जाता। वह विनय तरूण था, जिसने संसाधनों का रोना नहीं रोया। किसी सरकारी मदद का इंतजार नहीं किया। अपनी नौकरी की तमाम मजबूरियों के बावजूद वह जुटा रहा अपने मिशन में और आपदा की घड़ी में वह विध्वंस के बीच निर्माण के अवसर तलाशता रहा। यह लफ्ज विनय तरूण के साथी रंजीत प्रसाद सिंह के हैं। पूर्णिया में विनय तरूण की याद में आयोजित एक कार्यक्रम में प्रभात खबर, जमशेदपुर के संपादक रंजीत ने बेहद भावुक क्षणों में अपने मित्र की याद में प्रकाशित स्मारिका में ऐसी ही कई बातें रखीं। स्मारिका का विमोचन बीबीएम हाई स्कूल में पूर्णिया के वरिष्ठ साहित्यकार भोलानाथ आलोक, वरिष्ठ कथाकार चंद्रकिशोर जायसवाल और आकाशवाणी पूर्णिया के पूर्व निदेशक विजय नंदन प्रसाद की मौजूदगी में हुआ। स्मारिका में विनय तरूण के तमाम साथियों ने विनय को भावभीनी श्रद्धांजलि दी। अंतर्राष्ट्रीय मिथिला परिषद के अध्यक्ष धनाकर ठाकुर ने इस अवसर पर घोषणा की कि वे विनय की याद में अपनी संस्था की ओर से हर एक उदयीमान समाजसेवी को पुरस्कृत करेंगे.

दैनिक हिंदुस्तान में कार्यरत रहे विनय तरूण की मौत जून महीने में एक ट्रेन हादसे में हो गई। करीब दो महीने बाद पूर्णिया में साथियों का जमावड़ा लगा तो एक बार फिर आंखें नम हो गई और शब्द ने अपने मायने खो दिये। कार्यक्रम के पहले सत्र में अखलाक अहमद ने माईक पकड़ा ही था कि सिसकियां शुरू हो गई। सत्र के दौरान कई बार आंखें डबडबा आई। धीरज, बासु मित्र, कौशल ने विनय को याद किया। बहन पिंकी ने कहा आज परिवार जहां भी है, जैसा भी है उसमें विनय भैया का बड़ा योगदान है। कुछ मित्रों ने एक वृत्तचित्र के जरिए अपनी भावना का इजहार किया। इस सत्र का संचालन पुष्यमित्र ने किया।

द्वितीय सत्र में आंसुओं की जगह उन विचारों ने ली जिसे विनय तरूण ने अपनी व्यवहारिक जिंद्गी में भोगा, महसूस किया और अपने तरीके से कई बार प्रतिकार भी किया। विषय यूं तो - क्षेत्रीय प्रत्रकार- काम का बोझ, न्यूनतम वेतन और बदनामियां रखा गया था लेकिन इस बहाने पत्रकारिता और समाज के कई अंधेरे कोनों पर बहस हुई। तहलका बिहार के प्रभारी संजय कुमार झा ने जहां एकजुट हो कर इन प्रवृत्तियों का विरोध करने पर जोर दिया वहीं विजय नंदन प्रसाद ने पत्रकारों को आत्मालोचना करने की नसीहत दी। मुख्य वक्ताओं में रंजीत प्रसाद सिंह और शाहीना परवीन ने अपने विचारों से लोगों को उद्वेलित कर दिया। पूर्णिया कॉलेज के प्रोफेसर शंभू कुशाग्र ने एक व्यक्ति के रूप में विकास पर जोर दिया। इस सत्र में वरिष्ठ अधिवक्ता चंद्रानन सीतेश, रांची प्रभात खबर से आए प्रवीण कुमार, दिल्ली न्यूज 24 के साथी पशुपति शर्मा ने भी अपनी बात रखी। दूसरे सत्र का संचालन बच्चा यादव ने संभाला।

तीसरे सत्र में मुजफ्फरपुर से आए लोक कलाकारों ने लोक गायन के माध्यम से युवा पत्रकार विणय तरूण को श्रद्घांजलि दी। इस मौके पर आलोक राय, स्वरूप दास, मोना, राजीव राज, रूपेश, कौशल, पंकज, संजाय, मुकेश ने भी विनय को श्रदंजलि दी।

Friday, August 20, 2010

राजीव की जयंती पर परमाणु विषवृक्षों के सौदे

आज पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का 66वां जन्मदिन है. इस साल उनका नाम भोपाल गैस त्रासदी को लेकर उठे विवाद में जबरदस्त तरीके से घसीटा गया. उन पर यूनियन कारबाइड के सीईओ वारेन एंडरसन को संरक्षण देने और सेफ पैसेज देने का गंभीर आरोप लगा. एक अमेरिकी एजेंसी ने तो यहां तक कह डाला कि वारेन एंडरसन के बदले इंदिरा गांधी के चहेते ड्राइवर के बेटे को छोड़ने की डील हुई थी और इसमें राजीव गांधी की बड़ी भूमिका थी. संयोगवश हमारी केंद्र सरकार ने आज का ही दिन न्यूक्लियर लायेबिलिटी बिल पर संसद में बहस कराने के लिये चुना है. आज तय होना है कि परमाणु हादसे होने की स्थिति में कंपनियों को कितना मुआवजा चुकाना होगा. ऐसे में राजीव गांधी सरकार के उन फैसलों की सहज याद आ जाती है कि किस तरह उन्होंने यूनियन कारबाइड को नाम मात्र के मुआवजे के बाद छोड़ दिया था. इस मौजूदा सरकार की नीयत उस सरकार की नीयत से जुदा होगी ऐसा लगता नहीं खास तौर पर इस तथ्य के मद्देनजर कि इस सरकार की सरपरस्ती उन्हीं की विधवा सोनिया गांधी कर रही है. इतालवी मूल की इस महिला कांग्रेस अध्यक्ष ने अपने पति की जन्मदिन की पूर्व संध्या पर कुछ ऐसी ही घोषणा की है. उन्होंने कहा है कि लोगों को अब भोपाल मसले को भूल जाना चाहिये और गड़े मुर्दे को उखाड़ना बंद कर देना चाहिये. बड़े भोलेपन के साथ वे कहती हैं कि इसमें कोई शक नहीं कि भोपाल मसले पर हर सरकार ने लापरवाही बरती. वे भूल जाती हैं कि वह हर सरकार जिसने लोगों के जख्मों के साथ खिलवाड़ किया था वे कांग्रेस की ही थी. ऐसी घिनौनी हरकत करने वालों की सूची में सबसे उपर उनके स्वर्गीय पति का नाम आता है. उन्हें इस मौके का उपयोग अपने पति की गलतियों की माफी मांगने के लिये करना चाहिये था. मगर वे अमेरिका को खुश करने के लिये डाउ केमिकल को क्लीन चिट देने की प्रकिया की दिशा में सार्थक कदम बढ़ा रही हैं.
शायद वे भूल जाती हैं कि भोपाल के शिकार सिर्फ गड़े और जला दिया गये मुरदे ही नहीं हैं, लाखों ऐसे लोग भी हैं जो जिंदा लाशों की तरह हैं. हिरोशिमा-नागाशाकी के पीड़ितों से बेहतर नहीं है भोपाल पीड़ितों के हालात. पूरी दुनिया 65 साल बाद भी हर साल उसी संवेदनशीलता और आत्मीयता के साथ उस तारीख को मनाती है जब इन शहरों पर परमाणु हमले हुए. इन तारीखों और इन जख्मों को इसलिये भी नहीं भूला जाता ताकि परमाणु हमलों की भीषणता को याद रखा जाये और दुनिया को इससे बचाने की कोशिश की जाये. मगर हमारी सरकार भोपाल को भुला देना चाहती हैं और देश भर में परमाणु रिएक्टरों के विष वृक्षों को जगह-जगह रोप देना चाहती हैं. जी हां, हमारी मौजूदा सरकार जिन परमाणु रिएक्टरों के बूते पर पूरे भारत को जगमगा देने का दावा कर रही हैं वे रोशनी का सोता नहीं आग की लपटें हैं. यह अपना घर जलाकर मुहल्ला रोशन करने जैसी तरकीब है. इसका नमूना पूरे देश ने देखा जब दिल्ली विश्वविद्यालय के एटोमिक स्क्रेप से कई जानें गईं. जिन्हें और बेहतर नमूना देखना है वे झारखंड के जादूगोड़ा की सैर कर लें. यहां यूरेनियम कॉरपोरेशन लिमिटेड की खदान है. इस खदान के आसपास रहने वाले अधिकांश लोग अपंग नजर आते हैं, बच्चे तक अपंग पैदा होते हैं. और अगर कुछ नजर नहीं आता है तो बुढ़ापा. वहां काम करने वाले मेरे एक मित्र ने बताया कि आसपास के इलाके में उसने कोई बूढ़ा देखा ही नहीं. क्योंकि कोई बूढ़ा होता ही नहीं है लोग जवानी में ही गुजर जाते हैं. अगर और उदाहरण देखना चाहते हैं को पंजाब के उस इलाके में जायें जहां पानी में यूरेनियम मिलने लगा है, नतीजन बच्चों पर कितना खतरनाक असर पड़ रहा है.

परमाणु रिएक्टर कितने खतरनाक हैं यह अब पूरी दुनिया जान चुकी है. इसमें काम करने वालों की छोटी से छोटी गलती का खामियाजा हजारों लोगों को भुगतना पड़ता है. इसके अलावा इससे निकलने वाला कचरा कितना नुकसान देह है यह दिल्ली विश्वविद्यालय वाले मामले से स्पष्ट है चुका है. वहीं एक ऐसे देश में जो आतंकवाद और माओवाद से बुरी तरह त्रस्त है परमाणु रिएक्ट किसी परमाणु बम से कम नहीं. विकीपीडिया में अब तक हुए नागरिक परमाणु हादसों की पूरी सूची इस लिंक पर है- http://en.wikipedia.org/wiki/List_of_civilian_nuclear_accidents. इसके बावजूद हमारे हुक्मरान हमें परमाणु रिएक्टरों की सौगात देने पर आमदा हैं. और तो और वे इस बात के लिये कोशिशें कर रहे हैं कि अगर कोई हादसा हो तो इन कंपनियों पर कम से कम मुआवजा लगाया जा सके ताकि हमारे अमेरिकी आका हमसे खुश रहें.

इससे भी दुःखद बात यह है कि भारतीय जनता के साथ किये जा रहे इस विश्वासघात के वक्त एक भी राजनीतिक दल लोगों के साथ नहीं है. जब परमाणु करार पर संसद में बहस हो रही थी तो उन्हीं लोगों ने सरकार का साथ दिया जो आज लायेबिलिटी बिल पर सरकार के खिलाफ हैं. और जो दल परमाणु करार पर बहस के वक्त सरकार के खिलाफ थे वे आज सरकार का समर्थन करने को तैयार हैं. बचा एक वाम दल जो परमाणु करार पर सरकार से समर्थन लेने के बाद इस तरह पतन की दिशा में बढ़ता जा रहा है कि उसका जिक्र ही बेकार है. मगर जिस तरह करार के बाद उस दल के नेताओं ने दावा किया था कि वे जनता को इस मसले पर जागरूक करेंगे उसके लिये उन्होंने क्या किया यह सवालों के घेरे में है.

आज फिर हम लोगों के साथ सरकार ठगी का खेल-खलेने जा रही है, नरेंद्र मोदी के मसले पर भाजपा ने सरकार के आगे घुटने टेक दिये हैं. एक सहाबुद्दीन एनकांउटर की सजा पूरा देश भुगतेगा. बताया जा रहा है कि विपक्ष की आपत्तियों के बाद कैबिनेट ने बिल से एंड नाम का एक शब्द हटा लिया है, जिससे रिएक्टर लगाने वाली कंपनियों को कुछ हद तक जिम्मेदार बनाया जा सके. देश जश्न मनाये क्योंकि आज राजीव गांधी की जयंती है. देश का हर अखबार उनके विज्ञापनों से अंटा पड़ा है. विरोध का कहीं कोई स्वर नहीं है.

Thursday, August 12, 2010

कश्मीर को आखिर इतना भाव क्यों


हमारे प्रधानमंत्री ने कल कश्मीर की स्वायत्ता पर बहस का मुद्दा उछाल दिया है. उनके हिसाब से इस बहस की तपिश में झुलस का कश्मीर का हालिया विवाद ठंडा पड़ जायेगा और जो नौजवान इन दिनों पत्थरबाजी में मशगूल हैं वे इस बात को भूल कर इस बहस में भिड़ जायेंगे कि क्या स्वायत्ता कश्मीर की समस्याओं का हल है, या इसका हल क्या है, भारतीय हुकूमत को इस जलते हुए प्रदेश के जख्मों पर मरहम लगाने के लिये आखिर क्या करना चाहिये, बगैरह-बगैरह. हालांकि देश के तथाकथित प्रगतिशील तबके ने एक स्वर में प्रधानमंत्री जी के इस प्रगतिशील बयान का स्वागत कर डाला, मगर घाटी के विद्रोही और युवा शायद इससे भी बड़ी बारगेनिंग करना चाहते हैं और उन्होंने एक सेंटीमेंटल बयान दे मारा है कि सवाल न तो स्वायत्तता का है और न ही किसी पैकेज का सवाल इस बात का है कि कश्मीर के दर्द को लोग समझें. मगर इस लोकतांत्रिक और प्रगतिशील बयार के बीच मैं पूछना चाहता हूं कि आखिर कश्मीर को इतना भाव क्यों दिया जा रहा है या जाता रहा है..

यहां मैं स्पष्ट कर दूं कि यह आलेख न तो पंडित दीनदयाल जी के विचारों से प्रभावित होकर लिखा जा रहा है न हीं इसके पीछे कश्मीरी हिंन्दुओं से साथ हुए अत्याचार की दुखद स्मृतियां. एक सामान्य भारतीय नागरिक के तौर पर यह सवाल अपने मन में लिये मैं कई सालों से मंथन कर रहा हूं और आज आपके सामने पेश करने की जहमत उठा रहा हूं कि आखिर कश्मीर को इतना भाव क्यों दिया जा रहा है. आखिर कश्मीर या कश्मीरियों की समस्या क्या है ? मुझे कश्मीरवासी इस बात के लिये माफ करेंगे कि इतने हंगामे के बावजूद मैं आज तक समझ नहीं पाया कि उनकी समस्या क्या है और वह हम सामान्य हिंदुस्तानियों से किस तरह भिन्न है ? आखिर वे किस बात का रोना इतने दिनों से रोते आ रहे हैं और किस बात के लिये बरसों से एक दूसरे का खुन बहाते आ रहे हैं ? अपनी समझ के मुताबिक इस बात के जो कारण मुझे लगता हैं, मैं उन पर अपनी बात करने की कोशिश कर रहा हूं.

समस्या - कश्मीर भारत में शामिल नहीं होना चाहता था, उसे जबरन भारत में शामिल कराया गया. कभी उसकी राय नहीं ली गई.

जवाब- क्या बिहार, यूपी, मध्यप्रदेश, कर्नाटक आदि राज्य भारत में शामिल होना चाहते थे ? उन्हें किस आधार पर भारत में शामिल कराया गया ? क्या इस बात के लिये कोई जनमत सर्वेक्षण हुआ ? क्या जूनागढ़, हैदराबाद और दूसरे कई रियासतों ने भारत में शामिल होने से इनकार नहीं किया था ? क्या इसके बावजूद उन्हें हिंदुस्तान में शामिल नहीं कराया गया ? क्या नगालैंड भारत में शामिल होने के खिलाफ नहीं रहा है ? क्या उसका दोष सिर्फ इतना है कि वह मुस्लिम नहीं है ?

कहा जा सकता है कि जम्मू-कश्मीर की मुस्लिम आबादी के कारण वह स्वभाविक रूप से पाकिस्तान में शामिल हो सकता है. मगर आजादी के वक्त कश्मीर की जनता ने कभी पाकिस्तान में मिलने के वैसी उत्कंठा का प्रदर्शन नहीं किया जैसा हैदराबाद की जनता ने पाकिस्तान में नहीं मिलने के लिये किया था.

दरअसल बंटवारे के वक्त अधिकांश राज्यों के अस्तित्व का फैसला इसी तरह बिना किसी जगह की जनता की राय पूछे अपनी मरजी से कर लिया. अधिकांश फैसले तो माउंटबेटेन के डायनिंग टेबुल पर हुए और जो फैसले वहां नहीं हुए उसे सरदार पटेल ने तोपों के निशाने पर करा लिया. और आज इनमें से अधिकांश राज्य अमन चैन की जिंदगी जी रहे हैं और प्रगति के पथ पर अग्रसर हैं.

कश्मीरवासी जिस ऐतिहासिक संदर्भ का जिक्र कर करके इतने सालों से बारूद के साये में अपने जीवन को तबाह कर रहे हैं. वह एक कंफ्यूजन है, जिसके मुताबिक कश्मीर को लगता है कि वह पाक मुल्क पाकिस्तान का हिस्सा हो सकता था. वह एक आजाद मुल्क भी हो सकता था. यह कंफ्यूजन उन्हें अपने ही प्रांत के कश्मीरी हिंदू पंडित नेहरू की ढुलमुल नीति से सौगात में मिली है. वे अपनी तुलना न तो हैदराबाद से करते हैं जहां इस भ्रम के खत्म होने के कारण दुनिया कहां से कहां पहुंच गई है और न ही लाइन आफ कंट्रोल के उस पर बसे कश्मीर के अपने लोगों से जो एक तथाकथित पाक मुल्क में कई दशक पिछड़ी जिंदगी जी रहे हैं.

दरअसल नेहरू जी ने कश्मीर से संदर्भ में जो जटिलता पैदा की है वह न देश के लिये हितकर साबित हुआ और न ही कश्मीर के लिये. हैरत की बात यह है कि देश के किसी दूसरे नेता ने इसमें सुधार लाने की कोशिश भी नहीं की और न ही यह समझने की कोशिश की कि धारा 370 और स्वायत्तता का कोई अर्थ नहीं है.

अगर कश्मीरी हिंदुस्तान में नहीं रहना चाहते तो उन्हें यह अनुभव कर लेने दिया जाना चाहिये कि वे जंगी और आर्थिक समस्याओं से घिरे अस्थिर पाकिस्तान में रह लें या फिर नेपाल या बांग्लादेश की तरह आजाद रहकर तय तक लें कि प्रगति के दौर में वह कहां तक जा पाते हैं. हालांकि इस देश ने अपने किसी वासी को यह तय करने का मौका नहीं दिया कि वह देश में रहना चाहता है या नहीं मगर अगर कश्मीर खुद को थोड़ा अलग महसूस कर रहा है तो उसे मौका दिया जाना चाहिये. बनिस्पत उसे हर साल दसियों हजार करोड़ के स्पेशल पैकेज दिये जायें और उसमें अपनी हजारों फौजों को मौत से मुकाबला करने के लिये ढकेल दिया जाय.

धारा 370 और स्वायत्तता निश्चित तौर पर कश्मीर को दिये जाने वाले लालच के फंदे हैं. जैसे कोई मर्द अपनी खूबसूरत बेगम को तोहफे देता है कि वह उस पर मेहरबान रहे और उसकी दूसरी औरतें जो उतनी खूबसूरत नहीं होती वह दाने-दाने के लिये मोहताज रहती हैं जैसे कि बिहार... बिहार से अलगाववाद की मांग नहीं उठती इसलिये सरकार उसे उसका हक तक नहीं देना चाहती और कश्मीर पर अरबों-खरबों लुटाती है कि वह उससे अलग न हो जाये. कश्मीर आखिर हिंदुस्तान की मजबूरी क्यों है ? साथ रहना है रहे न रहना है न रहे. क्या अब हिंदुस्तान उस स्थित में नहीं पहुंच गया है कि लोग खुद तय करें कि वे साथ रहना चाहते हैं या अलग? मुझे लगता है कि अगर कश्मीर की जनता को यह तय करने दिया जाएगा तो वह खुद ही पाकिस्तान के बदले हिंदुस्तान को चुनेगी. मगर जनमत सर्वेक्षण के खौफ में भारत बार-बार कश्मीर को राजनीतिक और आर्थिक प्रलोभनों की सौगात देता रहा है जो देश के दूसरे हिस्से के लोगों के लिये खतरनाक ट्रेंड है.

Tuesday, August 10, 2010

विभूति से बड़े विभूति बनने लगे हैं लोग


मोहल्ला पर विभूति प्रकरण हंगामेदार होते जा रहा है, इस हंगामे के कारण इस मुद्दे पर किसी सार्थक बहस की गुंजाइश लगभग खत्म हो चुकी है. इसी संदर्भ में मैंने मुहल्ले पर एक टिप्पणी के जरिये बहस को मोड़ने की कोशिश की मगर असफल रहा...

मोहल्ला में प्रकाशित....

मैत्रेयी ने नया ज्ञानोदय से अपनी रचना मंगवाई


किसी पुष्‍यमित्र ने मोहल्‍ला लाइव की कुछ पोस्‍ट पर टिप्‍पणी की है कि नया ज्ञानोदय के अगले “सुपर बेवफा विशेषांक” में मैत्रेयी पुष्‍पा की रचना छप रही है। उन सज्‍जन ने मौजूद प्रसंग में अपना गुस्‍सा जाहिर कर रहे लोगों से थोड़ा इंतजार करने की बात की। इस किसी और ने प्रतिक्रिया दी कि शायद मैत्रेयी पुष्‍पा नया ज्ञानोदय से अपनी रचना वापस ले चुकी हैं। यह सच है – क्‍योंकि मै‍त्रेयी पुष्‍पा ने मोहल्‍ला लाइव को फोन करके बताया कि यह जो दुष्‍प्रचार चल रहा है, उसके पीछे कालिया एंड कंपनी का हाथ है। मैंने एक अगस्‍त को ही उन्‍हें ईमेल करके अपनी रचना वापस मांग ली है। मैत्रेयी जी ने यह भी कहा कि नया ज्ञानोदय अब इस लायक नहीं है कि वहां हम जैसे लेखक अपनी रचना छपने के लिए दें।
दरअसल बेवफा विशेषांक में स्‍त्री लेख‍िकाओं को टार्गेट करने के मसले पर मै‍त्रेयी लगभग जंग की मुद्रा में हैं। विभूति नारायण राय के एक गर्हित बयान और उस बयान को बेबाक कहने की कालिया की संपादकीय दृष्टि के खिलाफ उनके नेतृत्‍व में देश भर के युवा रचनाकार जुट रहे हैं। इस बारे में अगले कार्यक्रम की सूचना के लिए इस लिंक पर जाएं : लेखकों ने “लंपट” वीसी के खिलाफ मुहिम तेज की

मेरी टिप्पणी....


रवींद्र कालिया जी से मेरा कोई व्यक्तिगत परिचय नहीं, उनकी शराबी की डायरी को भी मैनें नहीं छुआ है. क्योंकि इस तरह के साहित्य को समझ पाने लायक बुद्धि मुझे ईश्वर ने नहीं प्रदान की है. ज्ञानोदय के सुपर वेबफाई अंक में छपे विज्ञापन में देखा कि मैत्रेयीजी की रचना वहां प्रकाशित हो रही है, उन्होंने भी सुपर बेवफाई अंक के लिये ज्ञानोदय को कुछ भेज रखा है. आप सभी पाठकों को इसी खातिर मैंने यह सूचना दी. अब पता चला कि उन्होंने अपनी रचना मंगवा ली है.
वैसे मैं भी आप लोगों की तरह विभूति बाबू के शब्दाभिचार का विरोधी हूं. मोहल्ला के सिग्नेचर अभियान में जिन गिने चुने लोगों के हस्ताक्षर थे उनमें इस नाचीज का भी नाम है.
मगर इसका यह अर्थ कतई नहीं कि मैं मैत्रेयीजी की रचनाओं और उनकी रचनाशीलता का आदर करता हूं. अगर विभूति बाबू मैत्रेयीजी के लिए कोई सभ्य विशेषण प्रयोग करते तो मैं भी उसका समर्थन करता. विभूति बाबू के शब्द घृणित हैं मगर उनकी राय बुरी नहीं है, ऐसा मैं मानता हूं. मेरी राय में विभूति बाबू, कालियाजी और मैत्रेयीजी एक ही पर्स के डॉलर हैं. इन्हें साहित्य के प्रसिद्ध होने का स्टंट मालूम है. मैं स्टंट के जरिये पाने वाली अल्प कालीन प्रसिद्धि का विरोधी हूं.
मेरे ख्याल से साहित्य में शब्दों की जिम्मेदारी तय करने की यह लडाई किसी सम्मानित लेखक या लेखिका के नेतृत्व में लड़ी जानी चाहिये थी. जैसे महाश्वेता या कृष्णा सोबती होतीं तो लड़ाई सार्थक होती. विभूतिजी और मैत्रेयीजी में फर्क ही क्या है, उन्होंने भी तो प्रतिकार स्वरुप लफंगा शब्द इस्तेमाल कर ही दिया है. मोहल्ला में कई लोग और भी घृणित शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं.
हम क्या हमेशा दूसरों को जिम्मेदार बनाते रहेंगे, खुद कब जिम्मेदार बनेंगे.
पुनश्चः मैं इस लडाई को डायल्यूट करने की कोशिश या साजिश नहीं कर रहा, लेकिन यह तरीका मुझे रास नहीं आ रहा. विभूतिजी को पद से हटाने की मांग की जानी चाहिये. उन पर पहले भी कई गंभीर आरोप हैं. मगर खुद विभूति बन जाने में क्या तुक है…

संतोष राय की टिप्पणी..


पुष्य मित्र जी आपने सही कहा। मैं भी आपके विचारों से पूरी तरह सहमत हूं। ये लोग खुद बहस को एक मुकाम तक पहुंचाने की बजाय गड्ढे में डाल रहे हैं। अंतत: ऐसा होगा कि इनकी गाली विभूति नारायण राय की गाली से बड़ी हो जाएगी और मामला खत्म। मुझे लगता ही नहीं कि यहां कोई पढ़ा लिखा व्यक्ति लिख रहा है। इसे बचाइये कहीं ये मुर्खों का मोहल्ला ना बन जाए।

Sunday, August 08, 2010

क्रिकेट के भगवान और अंधभक्त मीडिया


मीडिया सचिन तेंदुलकर को क्रिकेट का भगवान मानता है और उसकी पूजा के लिये बहाने ढूंढता है. और अपनी इस कोशिश में कई बार मीडिया इतना अतार्किक हो जाता है कि उसपर हंसने की भी इच्छा नहीं होती.

संदर्भ, कोलंबो में कल भारत की जीत पर मीडिया की प्रतिक्रिया से संबंधित है. मैच के बाद देश के दो प्रमुख चैनलों ने इस जीत पर विशेष कार्यक्रम चलाया जिनका नाम उन्होंने रखा था, जीत के त्रिदेव और त्रिदेव का कमाल या ऐसा ही कुछ. दोनों कार्यक्रमों का मानना था कि यह जीत हमें तीन खिलाड़ियों की बदौलत मिली है, सचिन, सहवाग और लक्षमण. देख कर बड़ा अश्चर्य हुआ कि लक्षमण जिन्होंने शतक लगाकर टीम को जीत दिलाई उनका योगदान समझ आता है, सहवाग जिन्होंने पहली पारी में शतक लगाया और दूसरी पारी में तीन विकेट झटके उनका योगदान भी समझ आता है, मगर सचिन ? उन्होंने तो आखिर पारी में महज फिफ्टी लगाई थी, उन्हें क्यों त्रिदेव में शामिल किया जा रहा है.

उनसे बड़ा योगदान तो प्रज्ञान ओझा का था जिन्होंने शानदार गेंदबाजी करते हुए मैच में सात विकेट झटके. अगर त्रिदेव बनाना ही था तो प्रज्ञान हकदार थे, मगर हमारी मीडिया ने शामिल किया सचिन को, जबकि मैच में उनसे ज्यादा रन तो सुरेश रैना ने बनाये हैं. पहली पारी में 62 और दूसरी में 41. रैना का यह जीवन का दूसरा मैच है जबकि इस मैच के साथ वे दुनिया में सबसे अधिक टेस्ट खेलने वाले खिलाड़ी बन गये हैं. सचिन ने तो पहली पारी में 41 और दूसरी पारी में 54 रन बनाये हैं. क्या अमित मिश्रा का योगदान सचिन से अधिक नहीं है जिन्होंने चार विकेट भी झटके और 40 रनों की अविस्मरणीय पारी भी खेली जिसकी बदौलत भारत श्रीलंका से लीड ले सका. क्या अभिमन्यू मिथुन का योगदान अधिक नहीं जिन्होंने गेंदबाजी तो शानदार की ही जरूरत पड़ने पर शानदार 46 रनों की पारी भी खेली.

मगर नहीं, हमारी मीडिया की नजरों में इन पारियों का कोई योगदान नहीं. उसे तो बस अपने देवता को खुश करना था इसलिये चोर दरवाजे से उसकी एंट्री करवा दी और लक्षमण व सहवाग के साथ फेंट कर उसे भी त्रिदेवों में शामिल करा दिया. दरअसल मीडिया एक दिन पहले से अपने इस भगवान के गुणगान की तैयारी में जुटा था. चौथे दिन जब भारत का स्कोर 3 विकेट पर 53 रन ही था तो मीडिया ने घोषणा कर दी थी कि अब टीम इंडिया की लाज भगवान भरोसे है, यानि सचिन के भरोसे. भगवान चले तो ठीक वरना भारत की हार तय है. मगर भगवान नहीं चले, चले वीवीएस लक्षमण. इस पर कुछ टीवी वालों ने इस तरह पैकेजिंग की कि राम का काम लक्षमण ने किया, मगर कइयों का इससे जी नहीं भरा तो उन्होंने भगवान को घुसा कर त्रिदेव बना डाला.

सोचने वाली बात है कि अगर कल के मैच में सचिन ने शतक और लक्षमण ने अर्धशतक जड़े होते तो क्या हमारी मीडिया लक्षमण को याद करती? ऐसे में तो शायद मीडिया सहवाग तक को भूल जाता और घंटे-दो घंटे सचिन के ईश्वरत्व पर प्रवचन होता व्याख्या होती. अभी इसी मैच में सहवाग ने अपने टेस्ट केरियर के सात हजार रन पूरे किये. मैचों के मामले में यह सबसे तेज था और पारियों के मामले में यह दूसरे नंबर पर था मगर मीडिया में इसकी ठीक से चर्चा तक नहीं हुई, मगर पिछले मैच में जब सचिन ने दोहरा शतक जड़ा तो पूरी मीडिया उसकी दीवानी हो गई.

यहां गौरतलब है कि सचिन से आधे मैच खेलकर सहवाग ने सचिन से ज्यादा दोहरे शतक जड़े हैं और जब तिहरे शतक का जिक्र होता है तो पूरे भारत में इसे इंज्वाय करने वाले अकेले सहवाग ही नजर आते हैं. उन्होंने यह कारनामा दो बार किया है जबकि सचिन इसे एक बार करने के लिये भी तरसते रहते हैं. इसके बावजूद मीडिया सहवाग को सचिन के क्लोन के रूप में याद करती है. यह सचमुच हिप्पोक्रेसी की हद है.

Sunday, August 01, 2010

तटबंधों के पिंजरे में लाखों जिंदगानियां


यह उन लाखों कोसी वासियों के दुख की कहानी नहीं है जिन्होंने 2008 में कुछ महीनें कोसी की बलखाती लहरों के थपेड़ों के बीच गुजारे बल्कि यह उन दूसरे लाखों लोगों की दास्तान है जो चालीस साल से इस नदी के थपेड़ों से जूझ रहे हैं. बाढ़ से मुक्ति के नाम पर हुए प्रयोग में सरकार ने इस नदी को जब तटबंधों के बीच कैद किया तो उस पिंजरे से वह इन लाखों लोगों को बाहर निकालना भूल गई. पिछले पचास से अधिक सालों से पिंजरा बंद है और सामने भूखी बाघिन. लोग बार-बार पिंजरे के उस कोने में दुबकते की कोशिश करते हुए जी रहे हैं जहां बाघिन का झपट्टा या उसकी निगाह न पहुंचे. यह दास्तान उन्हीं लाखों कोसी पीड़ितों की है.

17 अगस्त 2008. पचास से अधिक सालों से तटबंधों के बीच कैद कोसी नदी ने खुद को इस कैद से पूरी तरह आजाद कर लिया और बिल्कुल नए इलाके में बहने लगी. पूरी की पूरी 1 लाख 71 हजार क्यूसेक जल प्रवाह वाली इस नदी ने सिल्ट से भर चुके अपने पुराने रास्ते और 16 फीट ऊंचे तटबंध को तोडक़र नया रास्ता बना लिया यह सोचे बगैर कि उस राह में खेत है या मकान है या कस्बा है या गांव. यह सोचना उसका काम था भी नहीं, यह तो सरकारों, नीति नियंताओं और उन्हें लागू करने और उनकी देखभाल करने वाले अभियंताओं का काम था. मगर उन लोगों ने पिंजरे में बंद बाघिन को वैसी सुविधाएं नहीं दी जिससे उसका मन पिंजरे में लगा रहे(वैसे किसका मन पिंजरे में लगता है, आजादी किसको प्यारी नहीं होती), तो उस बाघिन का बाहर निकल आना तो इसी बात पर निर्भर था कि वह कब पिंजरे को तोड़ पाती है. बहरहाल ऐतिहासिक आपदा आई और छह सात महीने तक उत्तर-पूर्वी बिहार के तकरीबन साढ़े पांच सौ गांवों में ठहरी रही. आपदा बड़ी खबर बनी और उस खबर ने करोड़ों की राहत सामग्री और हजारों मददगारों को आमंत्रित किया. वैसे तो जब लोग मुसीबत में हों तो ऐसी बातें करना उचित नहीं होता, मगर कोसी नदी के सबसे बड़े विशेषज्ञ दिनेश कुमार मिश्र ने उस वक्त ही यह सवाल उठा दिया कि क्या यह मदद उन साढ़े तीन सौ गांव के लोगों को मिल पाएगी जहां अगले साल ऐसी ही बाढ़ आएगी औैर हर साल बाढ़ आती ही है. बाढ़ जिनके जीवन में एक आपदा या एक घटना न होकर स्थायी उपस्थिति के रूप में एक रूटीन के रूप में दर्ज हो गई है. जैसे मार्च में होली आती है, अप्रैल में गर्मियां शुरू होती है, जून-जुलाई में मानसून शुरू होता है, अक्तूबर-नवंबर में विजयादशमी, दीपावली और छठ वैसे ही अगस्त में बाढ़. उनके लिए अगस्त का महीना बाढ़ का महीना होता है और इससे लडऩे के लिए वे जून-जुलाई से ही तैयारियां शुरू कर देते हैं बाढ का पानी जब तक उतरता नहीं वे टापुओं की तरह अपने-अपने घरों में दुबके रहते हैं, सारा काम नाव से करते हैं. बाहरी दुनिया से बस जरूरत भर का संपर्क होता है. अक्तूबर में जब पानी उतरने लगता है तो दुर्गा मां के स्वागत की तैयारियों के साथ उनके जीवन का सवेरा शुरू होने लगता है. यह कहानी एक-दो गांव की नहीं पूरे साढ़े तीन सौ गांव की है औैर यहां आपका ध्यान खीचना चाहूंगा कि साढ़े तीन सौ और साढ़े पांच सौ की संख्या में ज्यादा फर्क नहीं होता. इन्हीं साढ़े पांच सौ गांवों को बाढ़ की आपदा से बचाने के लिए कोसी नदी के दोनो किनारों को ऊंचे तटबंधों से बांधा गया है और उन तटबंधों के बीच साढ़े तीन सौ गांव भी कैद हो गए हैं जिन्हें हर साल उसी बाढ़ की आपदा को झेलता पड़ता है. आप सोचते होंगे कि सरकार ने कम से कम दो सौ गांवों को तो बचा लिया. जी नहीं, आप गलत सोचते हैं, तटबंध बनने के बाद जो नदियां कोसी में मिलती थीं वह अब इस नदी में मिल नहीं पाती, लिहाजा तटबंधों के दोनों किनारों में पूरे साल जलजमाव का नजारा होता है और इस जल जमाव में 4.26 लाख हेक्टेयर जमीन डूबी रहती है. यहां उल्लेखनीय तथ्य यह है कि कोसी तटबंध परियोजना का लक्ष्य कुल 2.14 लाख हेक्टेयर जमीन को बाढ़ से बचाना था.

इतना सबकुछ जानने के बाद यह सवाल सहज ही मन में उठता है कि आखिर ऐसी विषम परिस्थितियों में ये लोग रहते ही क्यों हैं? क्या इनका पुनर्वास नहीं हुआ? इसका जवाब है कि इन लोगों के साथ पुनर्वास के नाम पर जो कुछ हुआ वह एक धोखा साबित हुआ. सरकार ने बहुजन हिताय के नाम पर इनसे जो कुर्बानी ली उसने इन लाखों लोगों की जिंदगी तबाह कर दी. आज जो कुछ नर्मदा घाटी में हो रहा है, उससे कहीं बड़ी त्रासदी है कोसी पीड़ितों की कहानी. कोसी के लाखों लोगों के साथ हुआ यह अभियांत्रिकी प्रयोग कहीं अधिक हृदय विदारक है. मगर आज भी यह कहानी सात पर्दों के पीछे छुपी है.

देश की दूसरी नदियों की तरह कोसी का स्वभाव शांत और निर्मल नहीं है. इसके स्वभाव में अल्हड़पन औैर मतवालापन अधिक है.वर्तमान में यह नदी जहां बहती है, महज 150 साल पहले वह यहां से 100 मिलोमीटर पूर्व में बहा करती थी. इसके बाद से वह हर 20-25 साल पर अपना रास्ता बदलकर पश्चिम की ओर खिलकती रही और इस दौरान इस इलाके में भारी तबाही मचाती रही. कोसी नदी के इस व्यवहार के पीछे इस नदी द्वारा लाए गए सिल्ट की अत्यधिक बताई जाती है. इस नदी में मौजूद सिल्ट की मात्रा के बारे में एक ब्रिटिश वैज्ञानिक एफसी हस्र्ट ने 1908 में कहा था कोसी नदी हर साल लगभग 5 करोड़ 50 लाख टन गाद लाती है और मेरा अनुमान है कि इसमें से 3.7 करोड़ टन गाद वह अपने आसपास के इलाके में डाल देती है. 3.7 करोड़ टन गाद का मतलब लगभग 1.96 लाख घनमीटर होता है.हर वर्ष इतनी मात्रा में गाद लाने के कारण नदी की पेटी बहुत जल्द ऊंची हो जाती थी और मजबूरन उसे अपना रास्ता बदलकर निचले इलाके में बहने के लिए मजबूर होना पड़ता था. बहरहाल नदी के इस स्वभाव के कारण स्थानीय लोगों को भारी तबाही का सामना करना पड़ता था. इसके अलावा सालों-साल आने वाली बाढ़ और इसके कारण फैलने वाली हैजा, मलेरिया और कालाजार जैसी बीमारियां अलग थीं. त्रस्त जनता अपने नेताओं से इसकी गुहार लगाती और नेता इस गुहार को केंद्रीय प्रशासन तक पहुंचाते. ब्रिटिश सरकार तो इस समस्या के समाधान के प्रति जरा भी इच्छुक नहीं थी, उन्हें जनता के दुख दूर करने के लिए करोड़ों खर्च करने की क्या पड़ी थी. ऐसे में जब भारत आजाद हुआ और देश की कमान पं. जवाहर लाल नेहरू जैसे संवेदनशील और वैज्ञानिक दृष्टिïकोण वाले नेता ने संभाली तो कोसी वासियों में उम्मीदें जगीं कि पंडितजी उनकी इस समस्या का कोई न कोई हल जरूर निकालेंगे.

जब समस्या उनकी निगाह में लाई गई तो इसके बेहतर समाधान के रास्ते तलाशे जाने लगे. उस समय कई विकल्पों पर विचार किया गया और अंतत: इस समाधान पर सहमति बनी कि भारत-नेपाल सीमा पर भीमनगर कस्बे के पास कोसी नदी पर एक बराज बनाया जाए और इस अल्हड़ नदी को दो तटबंधों के बीच गिरफ्तार कर लिया जाए. फिर जैसा कि आम तौर पर ऐसी खर्चीली इंजीनियरिंग आधारित समाधानों के साथ होता है, इस परियोजना से कुछ अन्य फायदों की गुंजाइश निकाली गई. यानि पूर्वी और पश्चिमी कोसी नहर परियोजनाएं जिससे तकरीबन 10 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई का लक्ष्य रखा गया था और इसके अलावा सुपौल जिले के कटैया में 16 मेगावाट क्षमता वाली जल विद्युत परियोजनाएं.

कागज पर यह परियोजना इतनी सम्मोहक थी कि अभियंताओं और देश के नीति नियंताओं ने इसके नफा-नुकसान का बारीकी से आकलन किए बगैर इसे मंजूरी दे दी. पहले तो स्थानीय लोगों को लगा कि इस परियोजना से उनके दिन फिर जाएंगे, पूरा इलाका पंजाब-हरियाणा की तरह हरा-भरा होगा और खेंतें सोना उगलेंगी. मगर उनकी यह आस छलावा साबित हुई. आज की तारीख में परियोजना शुरू होने के 57 साल बाद भी पश्चिमी कोसी नहर परियोजना का एक चौथाई काम भी पूरा नहीं हुआ है, इसकी लागत जरूर हर साल बढ़ती गई है. यह परियोजना अपने लक्ष्य के 7 फीसदी से भी कम जमीन की सिंचाई कर पाती है. पूर्वी कोसी नहर परियोजना भी कुछ हद तक ही सफल हो पाई है. इस परियोजना का काम पूरा हो चुका है, मगर इसके बावजूद यह अपनी क्षमता के 20 फीसदी भूभाग की ही सिंचाई कर पाती रही है, मगर हाल के दिनों में नहरों में इतना बालू भर गया है कि पिछले एक दशक से इन नहरों से सिर्फ बाढ़ का पानी आता है, सिंचाई नहीं हो पाती. हां हर साल नहर से सिंचाई की लागत वसूलने वाली सरकारी पर्ची जरूर आ जाती है और इसका भुगतान न करने पर जमीन के मालिकाना हक से महरूम करने का खतरा बना रहता है. कटैया विद्युत परियोजना भी बालू भर जाने के कारण बंद ही रहती है.

अब कुछ बातें बाढ़ नियंत्रण की, जो इस परियोजना का प्रमुख लक्ष्य रहा है. नदी को बांधने वाला तटबंध अपने निर्माण के बाद के 47 सालों में 7 बार टूृट चुका है, जिसके कारण सैकड़ों गांव तबाह होते रहे हैं. इसके अलावा इन तटबंधों के कारण होने वाले जलजमाव से 4.26 लाख हेक्टेयर जमीन लगभग पूरे साल डूबी रहती है, जबकि इस परियोजना का लक्ष्य 2.14 लाख हेक्टेयर जमीन को बाढ़ से सुरक्षा देना रहा है. लगभग पचास साल पहले पूरी हुई इस परियोजना का हिसाब-किताब आज की तारीख में कौन ले? मगर हद तो इस बात की है कि इस उदाहरण से आज की तारीख में सबक सीखने के लिए भी कोई तैयार नहीं.

यह तो कोसी परियोजना की विडंबना की कहानी है जिसके बारे में श्री दिनेश कुमार मिश्र ने अपनी किताब दुई पाटन के बीच मेंमें विस्तार से लिखा है. यह किताब मूलत: उन्हीं लाखों लोगों के कष्टïमय जीवन के बारे में है जो कोसी नदी के दो पाटों यानि तटबंधों के बीच में फंसे हैं. तटबंध निर्माण के वक्त जैसा कि राजनेता किया करते हैं, उन्होंने लोगों को गोल-मटोल लहजे में आश्वासन दिया कि इस परियोजना से जो भी लोग प्रभावित होंगे सरकार उन्हें बेहतर जमीन और बेहतर पुनर्वास उपलब्ध कराएगी. पचास साल पहले के लोगों के लिए पुनर्वास की तिकड़में अनजानी थी, उन्होंने सहज विश्वास कर लिया. जब पुनर्वास की बारी आई तो सरकार ने बड़ा ही रोचक समाधान तैयार किया. इसके मुताबिक तटबंध के अंदर जो जमीन है वहां बाढ़ की समस्या साल में सिर्फ तीन महीने रहेगी, यानि वहां की जमीन पर खेती करने में कोई परेशानी नहीं. ऐसे में लोगों को न तो वहां की जमीन का मुआवजा मिलेगा और न ही उसके बदले में जमीन. हां उनके घरों के बदले कुछ लोगों को जमीन उपलब्ध कराई गई और कुछ लोगों को घर के बदले दो किस्तों में नकद मुआवजा देने की बात कही गई. जिन लोगों को जमीन दी गई उनकी जमीन तटबंध के कारण देरसबेर जलजमाव का शिकार हो गई और जिनसे मुआवजा का वादा किया गया उनमें से अधिकांश को मुआवजे की एक किस्त से ही संतोष करना पड़ा. इसके बाद आने वाले समय में लोगों की समझ में आया कि अगर खेत घर से पांच किलामीटर की दूरी पर भी हो तो खेती करना और फसल की रक्षा कर पाना बहुत कठिन व्यवसाय साबित होता है. ऐसे में कुछ लोगों ने अपने पैत्रिक जमीन को औने-पौने दाम में बेचकर दिल्ली-पंजाब की राह पकड़ ली और बांकी बचे लोग पुनर्वास में मिली जमीन का मोह त्याग कर वापस उसी नर्क में पहुंच गए जहां उनकी आजीविका का साधन उनके खेत थे.

ऐसे लोगों के लिए अब सामने नदी थी और माथे पर सवार उनकी किस्मत. सरकार तो इतनी दूर थी कि उनसे भेट-मुलाकात छठे-छमाही ही हो पाती. लिहाजा एक अजीब सी स्थिति पैदा हुई. तटबंधों के बीच जहां लाखों लाचार लोग रह रहे हैं, वहां न तो स्कूल हैं, न बिजली, न डाकघर, न फोन-मोबाइल और अस्पताल व थाना-पुलिस भी नहीं. यानि इक्कसवीं सदी के शुरुआत में वहां सोलहवीं सदी का नजारा देखा जा सकता है. सवारी के नाम पर घोड़ा, बैलगाडिय़ां और नाव. हर चार-पांच साल में या तो बाढ़ उनके आशियाने को उजाड़ देती है या फिर नदी से आने वाला बालू उनके घरों को भर कर रहने लायक नहीं छोड़ता. लिहाजा विस्थापन दर विस्थापन. तटबंधों के अंदर कई ऐसे परिवार हैं जो सत्रह बार विस्थापित हो चुके हैं. वहां रात के वक्त अगर कोई गंभीर रूप से बीमार पड़ जाए तो उसका भगवान ही मालिक होता है, क्योंकि सुबह होने से पहले उस पिंजरे से निकल पाने का ना तो रास्ता होता है और न ही लोगों में उस अंधेरे बियाबान में निकलने की हिम्मत. आपस के झगड़े लोग खुद सुलझाते हैं, चुकि वहां पुलिस नहीं है ऐसे में ताकतवर ही अक्सर सही साबित होता है. बार-बार आने वाली बाढ़ के कारण खेतों का सीमांकण मिट जाता है, फिर फैसला ताकत के जोर पर होता है. फिर भी लोग रहते हैं, क्योंकि दूसरा कोई बेहतर विकल्प नहीं है. सरकार उन्हें अक्सर भूल जाती है, जब याद आता है तो उनका तर्क यही होता है कि इन लोगों ने अपनी मर्जी से वहां रहने का फैसला किया है, हमने तो उनका बेहतर पुनर्वास किया था. अब अगर वे वहां रहने के बदले यहां रह रहे हैं तो जरूर उन्हें यहां फायदा नजर आ रहा होगा.

अगस्त 2008 में जब नदी ने अपना रास्ता बदल लिया तो इस इलाके के लोग काफी खुश हुए कि नदी ने उन्हें बख्श दिया है, अब दुबारा लौटकर उनके गांव नहीं आएगी. मगर एक बार फिर समाधान के मसले पर इन लोगों के बदले इंजीनियरों की चली और नदी को फिर से सफलतापूवर्क इन्हीं तटबंधों के बीच बहने को मजबूर कर दिया गया. अब नीतीश सरकार इन तटबंधों पर पक्की सडक़ें बनवा रही है, ताकि आवागमन की सुविधा हो और तटबंधों की बेहतर निगरानी की जा सके. मगर इस अभियान में उन हजारों लोगों के घर उजड़ रहे हैं, जो बार-बार के विस्थापन से परेशान होकर अपने इलाके से सबसे सुरक्षित स्थान माने-जाने वाले इन तटबंधों पर ही झोपडिय़ां बनाकर बस गए थे. खैर उनका क्या? उन्हें तो उजड़-उजडक़र बसने की आदत हो चुकी है. सरकार इसी तरह लोगों की भलाई के नाम पर ठेका कंपनियों और इंजीनियरों का घर बसाती रहे.

यह आलेख नागरिक विकल्प नामक पत्रिका में प्रकाशित हो चुका है.

Tuesday, July 06, 2010

बंदी से परेशान होने लगा भारत...

महंगाई के खिलाफ विपक्षी दलों के एक दिवसीय बंद की समीक्षा करते हुए देश के एक बड़े अखबार ने आज अपनी लीड खबर छापी है, जिसका शीर्षक है क्या मिला ? आज सवेरे से देश के कई अखबारों की साइट पर भी कमोमेस इसी तेवर की खबरें चल रही हैं कि बंद से देश को 13 हजार करोड़ का नुकसान हो गया. 200 रेलगाड़ियां, सैकड़ों फ्लाइट रद्द रहे. दिन भर लोग हलकान रहे. पूरा इंडिया परेशान रहा. आखिर क्या मिला. क्यों करते हैं लोग बंद. इससे क्या हासिल होता है. बिग बी ने कहा भारत बंद, इंसान बंद, आशा बंद, निराशा बंद... कितनी भयावह है यह शांति. बिपाशा बसु ने कहा सचमुच महंगाई परेशान करने वाली है, मगर क्या बंद कर देने से इसका साल्यूशन निकल आएगा.

यह आवाज सिर्फ मीडिया और सेलिब्रिटी की नहीं है. कई दूसरे लोग भी कह रहे थे. और यह सच्चाई भी है कि देश के कई लोग महंगाई से तो परेशान हैं, मगर बंद से ज्यादा परेशान हो जाते हैं. आखिर क्यों, क्योंकि महंगाई से लड़ने का एक शार्टकट उनके पास है. ज्यादा काम, जिससे वे ज्यादा पैसा कमा सकते हैं. बिगबी या बिपाशा या फिर हमारी गली में सब्जी बेचने वाला. इन तमाम लोगों के लिए एक दिन के बंद का मतलब है एक दिन की कमाई गई. उन्हें लगता है कि एक दिन की कमाई छूटने से महंगाई के खिलाफ उनकी जंग थोड़ी और कमजोर हो जाएगी. उन्हें पार्टियों की जंग पर भरोसा नहीं है, वे अपनी जंग अपने तरीके से लड़ते हैं. इसलिए वे पूछते हैं, आपने हमारे लिये बंद कराया पर आपको क्या मिला, हमें क्या मिला...

तो क्या बंद को बंद करा देना चाहिये. हमें लड़ाई के दूसरे तरीके तलाशने चाहिए. या फिर लड़ना ही छोड़ देना चाहिये. वैसे तो कल की बंद का सफलता से मेरे कलेजे में कुछ ठंडक पहुंची, क्योंकि ऐसा लगा कि इस मनमौजी सरकार को कुछ सबक सिखाना जरूरी था. मगर दुख भी हुआ क्योंकि अधिकांश लोग इस तरीके को बेकार मान रहे थे. वे सब के सब सरकारी एजेंट नहीं हो सकते. हमें ही बदलते जमाने के साथ विरोध का कोई नया तरीका अपनाना होगा जो लोगों को का परेशान करे और इस विरोध प्रदर्शन में उनकी भागीदारी सुनिश्चत कर सके.