Tuesday, July 06, 2010

बंदी से परेशान होने लगा भारत...

महंगाई के खिलाफ विपक्षी दलों के एक दिवसीय बंद की समीक्षा करते हुए देश के एक बड़े अखबार ने आज अपनी लीड खबर छापी है, जिसका शीर्षक है क्या मिला ? आज सवेरे से देश के कई अखबारों की साइट पर भी कमोमेस इसी तेवर की खबरें चल रही हैं कि बंद से देश को 13 हजार करोड़ का नुकसान हो गया. 200 रेलगाड़ियां, सैकड़ों फ्लाइट रद्द रहे. दिन भर लोग हलकान रहे. पूरा इंडिया परेशान रहा. आखिर क्या मिला. क्यों करते हैं लोग बंद. इससे क्या हासिल होता है. बिग बी ने कहा भारत बंद, इंसान बंद, आशा बंद, निराशा बंद... कितनी भयावह है यह शांति. बिपाशा बसु ने कहा सचमुच महंगाई परेशान करने वाली है, मगर क्या बंद कर देने से इसका साल्यूशन निकल आएगा.

यह आवाज सिर्फ मीडिया और सेलिब्रिटी की नहीं है. कई दूसरे लोग भी कह रहे थे. और यह सच्चाई भी है कि देश के कई लोग महंगाई से तो परेशान हैं, मगर बंद से ज्यादा परेशान हो जाते हैं. आखिर क्यों, क्योंकि महंगाई से लड़ने का एक शार्टकट उनके पास है. ज्यादा काम, जिससे वे ज्यादा पैसा कमा सकते हैं. बिगबी या बिपाशा या फिर हमारी गली में सब्जी बेचने वाला. इन तमाम लोगों के लिए एक दिन के बंद का मतलब है एक दिन की कमाई गई. उन्हें लगता है कि एक दिन की कमाई छूटने से महंगाई के खिलाफ उनकी जंग थोड़ी और कमजोर हो जाएगी. उन्हें पार्टियों की जंग पर भरोसा नहीं है, वे अपनी जंग अपने तरीके से लड़ते हैं. इसलिए वे पूछते हैं, आपने हमारे लिये बंद कराया पर आपको क्या मिला, हमें क्या मिला...

तो क्या बंद को बंद करा देना चाहिये. हमें लड़ाई के दूसरे तरीके तलाशने चाहिए. या फिर लड़ना ही छोड़ देना चाहिये. वैसे तो कल की बंद का सफलता से मेरे कलेजे में कुछ ठंडक पहुंची, क्योंकि ऐसा लगा कि इस मनमौजी सरकार को कुछ सबक सिखाना जरूरी था. मगर दुख भी हुआ क्योंकि अधिकांश लोग इस तरीके को बेकार मान रहे थे. वे सब के सब सरकारी एजेंट नहीं हो सकते. हमें ही बदलते जमाने के साथ विरोध का कोई नया तरीका अपनाना होगा जो लोगों को का परेशान करे और इस विरोध प्रदर्शन में उनकी भागीदारी सुनिश्चत कर सके.