Tuesday, September 07, 2010

माओवादियों का जातिवाद


बिहार में हुई हाल की घटनाओं ने साबित कर दिया है कि माओवादी अब महज डकैतों और माफिया गुंडों का समूह है जिनसे सिर्फ डरा जा सकता है. विचारधारा और शोषण के खिलाफ लड़ने के उनके जज्बे के कारण लोगों में उनके प्रति जो सम्मान बचा था वह भी अब खत्म होने की कगार पर है. मगर इस क्राइसिस के बाद जो सबसे चौकाने वाली बात उभर कर सामने आयी है वह इन समूहों की वास्तविकता बन चुके जातिवादी झगड़े हैं. यह कोई अनुमान नहीं बल्कि कटु सच्चाई है, बिहार के बंधक विवाद के दौरान जिस तरह ईसाई आदिवासी बीएमपी हवलदार लुकस टेटे की हत्या कर दी गई और अभय चादव, रूपेश सिंहा व एहसान खान को छोड़ दिया गया उसके कारण माओवादियों के बीच जड़ जमा चुका यह विवाद सतह पर आ चुका है. बहुत संभव है कि इस झगड़े के कारण आने वाले दिनों बिहार और झारखंड में माओवादियों के बीच गैंगवार की स्थिति उत्पन्न न हो जाये.



लखीसराय के माओवादियों द्वारा बंधकों में से एक ईसाई आदिवासियों की हत्या किये जाने के कारण झारखंड के आदिवासी माओवादियों में गहरा रोष है. बताया जाता है शीर्ष माओवादी जोनल कमांडर बीरबल मुर्मू ने लखीसराय के जोनल कमांडर अरविंद यादव के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते हुए कहा है कि उसने जहां एक ओर एक आदिवासी पुलिस कर्मी की हत्या करा दी वहीं अपनी जाति के बंधक अभय यादव की जान जानबूझकर बख्श दी. मुर्मू का कहना है कि अगर हत्या ही करना था तो चारो बंधकों की हत्या करते, किसी एक को मारना और तीन को छोड़ देना एक गलत परंपरा को जन्म देता है. यह भी कहा जा रहा कि आदिवासियों को शोषण से मुक्ति दिलाने के नाम पर लड़ाई लड़ने वाले माओवादियों ने जिस तरह एक आदिवासी की हत्या कर ही और गैरआदिवासियों को बख्श दिया उससे समाज में गलत संदेश गया है.



हालांकि माओवादियों को संदेश की परवाह अधिक नहीं. हकीकत यह है कि झारखंड के जिन इलाकों में माओवाद का गढ़ है वे आदिवासी बहुल हैं और स्थानीय लोगों के सहयोग और संरक्षम के कारण ही वे इस इलाके में कायम हैं. उनके लड़ाका कैडर में भी आदिवासियों की संख्या ही अधिक है. माओवादी किसी सूरत में झारखंड के जोन के कमजोर हो जाने का खतरा नहीं उठा सकते क्योंकि अवैध खनन वाले इन्हीं इलाकों से उन्हें सर्वाधिक आय होती है. ऐसे में लुकास टेटे की हत्या उनके लिये आत्मघाती साबित होने वाली है.



झारखंड के आदिवासियों के हाल के दिनों में माओवाद के खिलाफ जंग की लड़े जाने की भावना सामने आने लगी है. पिछले दिनों कई गांवों में आदिवासियों ने जातीय सभा बुलाकर माओवादियों के खिलाफ जंग छेड़ने का ऐलान किया है. ऐसे में निश्चित तौर पर टेटे की हत्या आग में धी का काम करने वाली है. आने वाले दिनों में अगर आदिवासी समुदाय अधिक संगठित होकर माओवादियों के खिलाफ जंग का ऐलान कर दे तो इसमें किसी को अचरज नहीं होना चाहिये.



हालांकि कई लोग ऐसा भी मानते हैं कि टेटे की हत्या को ईसाई वर्सेज गैर ईसाई की जंग के तौर पर भी देखा जा सकता है. क्योंकि ईसाई आदिवासी आर्थिक तौर पर गैर इसाईयों के मुकाबले अधिक समृद्ध है और वह आम तौर पर माओवाद का समर्थक नहीं माना जाता. इसके बावजूद यह मसला इतना महत्वपूर्ण नहीं कि आदिवासियों के बीच आपसी विवाद का कारण बन सके. क्योंकि जब आदिवासी बनाम गैर आदिवासी की बात होती है तो सभी आदिवासी एक होते हैं. लुकस की पत्नी ने भी यह कह कर माओवाद के खिलाफ आदिवासियों के बीच एका स्थापित करने के प्रयासों को बल दिया है कि उसके पति को इस लिये मारा गया क्योंकि वह आदिवासी था.



बहरहाल टेटे का हत्यारा पिंटो दा और उस हत्या का आदेश जारी करने वाला अरविंद यादव बिहार पुलिस की हिरासत में है. बिहार पुलिस ने इसके अलावा सात अन्य शीर्ष माओवादियों को गिरफ्तार किया है. कहा जाता है कि बंधकों की रिहाई के पीछे इन्हीं गिरफ्तारियों का हाथ है. लालू चुप हैं और भद्र मानुषी भाषा बोल रहे हैं. इससे ऐसा लगता है कि नीतीश ने इस प्रकरण में लालू की काट तलाश ली है. नीतीश भी चुप हैं, शायद वे इस प्रकरण पर अपने पत्ते बाद में खोलेंगे. बहरहाल अगर सचमुच माओवादियों के बीच जातीय जंग छिड़ी तो वह बिहार-झारखंड में उसकी बरबादी का कारण बनेगा और इसके लिये हमेशा इस प्रकरण को याद किया जायेगा.

बिहार को बदलनी होगी माओवाद के खिलाफ नीति


कभी-कभी ऐसा लगता है कि माओवादियों को शांति के नाम से ही चिढ़ है. वे हर हालात में सरकार के साथ जंग की स्थिति बरकरार रखना चाहते हैं क्योंकि अगर जंग नहीं होगा तो फिर माओवाद का क्या होगा? और अगर माओवाद मिट गया तो फिर उन माओवादियों का क्या होगा जो बंदूक की नाल से क्रांति की विचारधारा में यकीन करते-करते इस कदर बारूद की गंध के आदी हो गये हैं कि उन्हें इसके बिना जीना नामुमकिन लगता है. शायद यही वजह है कि उन्होंने बिहार में चार पुलिस कर्मियों को अगवा करके एक ऐसी सरकार के खिलाफ जंग छेड़ दी है, जिसका मुखिया हमेशा यही कहता आया है कि माओवादी हमारे समाज के अंग हैं, हम बंदूक के जोर पर इस समस्या का समाधान नहीं कर सकते.

माओवादियों के द्वारा उठाये गये इस कदम के कारण बिहार सरकार पिछले चार दिनों से बंधक है. सरकार की दुविधा यह है कि न तो वह माओवादियों के आगे झुक कर एक गलत परंपरा को जन्म देने का दोषी बनना चाहती है और न हीं माओवादियों के कब्जे में फंसे पुलिस कर्मियों को खोना चाहती, जिससे चुनाव के ऐन पहले जनता की सहानुभूति खो देने का खतरा उत्पन्न हो जाये. ऐसे में केंद्र सरकार और खास तौर पर गृह मंत्रालय पूरे प्रकरण का मजा ले रहा है, चिदंबरम ठहाके लगा रहे हैं क्योंकि माओवादियों को समाज का हिस्सा बता कर उनकी नीतियों की आलोचना करने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सांसें अटकी हैं.

बिहार सरकार का माओवादियों के प्रति नर्म रुख नीतीश सरकार के समय की उपज नहीं है. समाजवादी आंदोलन के प्रभाव के कारण बिहार के आम बुद्धिजीवी हमेशा से इसी तरह सोचते हैं. राबड़ी देवी के शासनकाल में भी तत्कालीन डीजीपी ओझा ने प्रयास किये थे कि सरकार और माओवादियों के बीच बातचीत हो जाये, मगर उस वक्त के सरकार की प्राथमिकताओं में यह मुद्दा नहीं आ सका, लिहाजा उस वक्त वार्ता संभव नहीं हो पाई. इसके बावजूद न सिर्फ सरकार बल्कि बिहार का पुलिस प्रशासन भी कभी इन्हें अपने खिलाफ युद्ध छेड़ने वाली शक्ति या आतंकवादी के रूप में नहीं देख पाया.

बिहार हमेशा से यही सोचता रहा कि माओवाद का कारण विकास की असमानता है और माओवादी समाज के वे युवक हैं जो बदलाव चाहते हैं. हालांकि लोकतांत्रिक व्यवस्था से उनका भरोसा उठ गया है और वे अपने उग्र स्वभाव के कारण बंदूक के बल पर आनन-फानन में समाधान चाहने लगे हैं, मगर इसका अर्थ यह नहीं कि सरकार भी उनके खिलाफ बंदूक उठा ले. यही वजह रही कि नीतीश सरकार ने गृह मंत्री पी.चिदंबरम के नेतृत्व में शुरू किये गये ऑपरेशन ग्रीन हंट में शामिल होने में कभी दिलचस्पी नहीं दिखाई. कोलकाता में जब मंत्रालय ने सभी माओवाद प्रभावित राज्यों के प्रतिनिधियों की बैठक बुलाई तो बिहार के प्रतिनिधि उस बैठक से गैरहाजिर थे. तब चिदंबरम ने कहा था कि लगता है बिहार अलग राह अपनाना चाहता है. इसके बावजूद माओवादियों ने कभी बिहार को नहीं बख्शा. लखीसराय, जमुई और गया के इलाके में उन्होंने अपनी कार्रवाइयां हमेशा जारी रखीं.

दरअलस बिहार द्वारा माओवादियों के प्रति नरम रवैया अपनाने की नीति का आधार ही गलत है. बिहार के नीति नियंता जिस माओवाद की कल्पना अपने मन में संजोये बैठे हैं वह काफी पहले की बात है. दरअसल वह माओवाद है ही नहीं वह तो नक्सलवाद है. अब माओवादियों की लड़ाई में शोषण की खिलाफत को सिर्फ नारे की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है. उनकी असली लड़ाई देश के खनिज संसाधनों पर कब्जे की है. गौरतलब है कि माओवाद उन्हीं इलाकों में पसरा है जहां खनिज प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है. आंध्रप्रदेश, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ से लेकर झारखंड तक. बिहार और बंगाल में भी माओवाद वहीं है जहां खनिज पर्याप्त मात्रा में हैं.

अब माओवादी चीन से सिर्फ विचार नहीं लेते, कहा तो यहां तक जा रहा है कि वे उनसे फंड तक लेने लगे हैं. इसके बदले में वे चीन को भारतीय खदानों से निकला कच्चा माल उपलब्ध कराते हैं. बेल्लारी के रेड्डी बंधुओं से लेकर झारखंड के सिंह मेंशन तक हर खनिज माफिया इस कारोबार में माओवादियों का हिस्सेदार है. माओवादी पूरे इलाके को अपने कब्जे में लेकर उन इलाकों में प्रशासन के पहुंच को असंभव बनाकर इन माफियाओं को खुलेआम अवैध खनन की छूट का मौका देते हैं और इन्हें चीन भिजवाने में सहयोग करते हैं. इनसे कमीशन लेते हैं और आम जनता, सरकारी अधिकारी, ठेकेदार आदि अनके इलाके के हर पैसे वालों से लेवी वसूलते हैं. इन पैसों से हथियार खरीदे जाते हैं और फौजियों की भर्ती होती है. अब तो लेवी की दर बकायदा अखबारों में छपने लगी है. अपने इलाके में माओवादी अब सरकार बनवाने तक की प्रक्रिया में शामिल होने लगे हैं. कहा जाता है कि झारखंड में शिबू की जीत माओवादियों के रहमो-करम पर हुई थी, वे हर हाल में कांग्रेस और बाबूलाल को सरकार से दूर रखना चाहते थे. अब उनका नया एजेंडा ममता को बंगाल की कुर्सी पर काबिज कराना है.

इन हालातों में अगर बिहार की सरकार यह सोचती है कि माओवादी हमारे समाज का हिस्सा हैं और शोषण के खिलाफ लड़ने वाले भोले-भाले युवक हैं तो यह उनकी सोच का पिछड़ापन ही दर्शाता है और इसी का नतीजा आज नीतीश भुगत रहे हैं. उन्हें लगता था कि उनकी सदाशयता राज्य को माओवाद की समस्या से बचाकर रखेगी, मगर माओवादी इस तरह से नहीं सोच रहे हैं. वे सोचते हैं कि अगर सरकार से शांतिवार्ता हो गई तो लखीसराय-जमुई और मुंगेर में हो रहे अवैध खनन पर रोक लग जाएगी और उनकी आय का एक बड़ा हिस्सा खत्म हो जायेगा. यह कार्रवाई पूरी तरह बिहार सरकार को भड़काने और अपने खिलाफ करने की कोशिश हैं. उन्हें मित्रों की जरूरत नहीं, वे शत्रु चाहते हैं. क्योंकि शत्रु ही उनके हिंसक कार्रवाइयों को जायज ठहराने का आधार बनेंगे, मित्र तो उन्हें अपना कारोबार बंद कर समाज की मुख्य धारा में शामिल होने की सलाह देंगे.

बिहार में उनकी मौजूदा कार्रवाई इसी बात को पुष्ट करती है. पहले वे पुलिसकर्मियों को मार गिराते हैं, फिर बीडियो और चार पुलिसकर्मियों को बंधक लेते हैं. फिर फिरौती के तौर पर अपने आठ साथियों को रिहा करने की अपील करते हैं. पुलिसकर्मियों के परिजनों को फोन कर मुख्यमंत्री आवास पर धरना देने की तरकीब बताते हैं ताकि पूरा मसला मीडिया का अटेंशन खींच सके और नीतीश को कटघड़े में खड़ा कर सके. फिर एक बंधक को मार गिराने का दावा करते हैं ताकि सरकार घबड़ाकर कोई कदम उठाये.

इस प्रकरण में सरकार की सिर्फ यही गलती है कि वह सदमे में है कि आखिर उसकी नीति गलत कैसे साबित हो गई. कहा जा रहा कि पुलिस प्रशासन आंध्र प्रदेश के विधायक अपहरण कांड के इस्तेमाल की गई नीतियों पर चल रहा है. मगर सच्चाई यह है कि इस मसले पर हर तरफ से सरकार की ही हार है. चाहे वह माओवादियों को वार्ता के टेबुल पर बुला ले या माओवादियों को छोड़ कर बंधकों को बचा ले या फिर ठोस पुलिसिया कार्रवाई कर माओवादियों को मार गिराये. हर हालत में सरकार ही कटघड़े में होगी और माओवादी यह साबित करने में कामयाब होंगे कि उनके साथ हर हाल में जंग की मुद्रा ही अपनानी होगी.

Wednesday, September 01, 2010

विनय प्रकरण-भोलानाथ आलोक की प्रतिक्रिया

हिंदुस्तान' ने पूर्णिया को शर्मसार कर दिया



उम्र-78 साल और ये उम्र मैंने अपने घर के बंद कमरों में नहीं काटी. पूर्णिया की तमाम साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों से हर दिन का साबका रहा है. कचहरी चौक पर धरना-प्रदर्शन से लेकर छोटे-बड़े तमाम मंच पर सक्रिय रहा हूं. जानता हूं कि खबरें कैसे बनती हैं और कैसे छपती हैं. 'हिंदुस्तान', 'दैनिक जागरण', 'प्रभात खबर', 'राष्ट्रीय सहारा' और ऐसे ही तमाम अखबारों में छपता रहा हूं. पत्रकारिता को लेकर खट्टे-मीठे अनुभव रहे हैं. उम्र और अनुभव का तकाजा कुछ ऐसा रहा कि कभी शाबाशी में पत्रकारों की पीठ ठोंकी तो कभी उनकी तीखी आलोचना भी की, लेकिन पिछले दिनों शहर में घटी एक घटना के बाद से बेचैन हूं, दुखी हूं, शर्मिंदा हूं- समझ नहीं आ रहा कि कैसे मन की पीड़ा व्यक्त करूं?



देश के नामी-गिरामी अखबार 'हिंदुस्तान' और उसके भागलपुर संस्करण के उप स्थानीय संपादक विनोद बंधु की एक करतूत ने पूरे पूर्णिया को शर्मसार कर दिया है. यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक है कि विनय तरुण भागलपुर 'हिंदुस्तान' से जुड़े थे, बावजूद इसके उनकी याद में आयोजित शोक सभा में न तो 'हिंदुस्तान' का कोई प्रतिनिधि आया और न ही एक लाइन खबर छपी. भागलपुर से प्रकाशित किसी भी संस्करण में विनय की इस श्रद्धांजलि सभा का जिक्र तक न था. हद तो ये है कि पूर्णिया संस्करण में भी ये खबर सिरे से गायब रही.



विभिन्न शहरों से आए पत्रकारों ने विनय तरूण की याद में एक श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया लेकिन भागलपुर में तैनात उप स्थानीय संपादक विनोद बंधु ने इसमें शामिल होने से इंकार कर दिया. इतना ही नहीं पूर्णिया के तमाम साहित्यिक, सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़े लोगों को शर्मिंदा करते हुए विनोद बंधु पूर्णिया में मौजूद रहे और दफ्तर में 'अनंत काल' की मीटिंग चलती रही. ये मीटिंग आयोजन के छह घंटों तक तो शायद चली ही, उसके बाद भी इसका असर दिखता रहा. विनोद बंधु और उनके साथियों ने इतनी भी संजीदगी नहीं दिखाई कि कार्यक्रम को कवर करवा लिया जाए. दुख होता है कि हिंदुस्तान जैसे प्रतिष्ठित पत्र के किसी संस्करण की जिम्मेदारी संभाल रहा व्यक्ति इस कदर संवेदनशून्य भी हो सकता है.



ये दुख और गहरा तब हो जाता है जब उलाहने के बावजूद खबर नहीं छपती, बल्कि प्रेस रिलीज की डिमांड कर दी जाती है. दैनिक हिंदुस्तान के ब्यूरो चीफ अरुण से मैंने इस बाबत बात की तो उनका कहना था- क्या करते मीटिंग चलती रही. जब मैंने कहा कि भूल सुधार कर अगले दिन ये खबर ले सको तो ले लो, फिर भी उनका जवाब रूखा सा ही रहा. हालांकि प्रभात खबर और राष्ट्रीय सहारा ने एक दिन बाद 30 अगस्त 2010 को श्रद्धांजली सभा की खबर प्रकाशित की. इस सिलसिले में इलेक्ट्रानिक मीडिया के पत्रकारों को जरूर साधुवाद दूंगा कि उन्होंने पूर्णिया की थोड़ी बहुत लाज बचा ली. सहारा, ईटीवी, फर्स्ट न्यूज और कोसी आलोक ने कार्यक्रम का कवरेज कर ये जतला दिया कि संवेदना से रहित नहीं हैं पूर्णिया के पत्रकार.



28 अगस्त 2010 को विनय की याद में तीन सत्रों का कार्यक्रम हुआ और प्रथम सत्र की अध्यक्षता की जिम्मेदारी बिना मेरी सहमति के मुझे सौंप दी गई. उन बच्चों ने मुझ पर अपना अधिकार जमाया, पूर्णिया पर अपना अधिकार जमाया, उन्हें वाकई अपने शहर और अपनी माटी से लगाव है वरना मुझसे सहमति की औपचारिकता जरूर निभाई जाती. ये विनय का भी लगाव रहा होगा कि उसके दोस्तों ने पूर्णिया में ये आयोजन रखा, वरना जो मित्र पूर्णिया में जमा हुए वो भागलपुर, जमशेदपुर, रांची, पटना या दिल्ली में भी जमा हो सकते थे. विनय के साथियों में जो ऊर्जा मैंने देखी, उनके लिए ये नामुमकिन भी नहीं है. मैं विनय के साथियों को उनकी इस भावना के लिए शाबाशी देता हूं, सलाम करता हूं.



विनय तरूण पत्रकारिता की ही नहीं वरन पूर्णिया शहर की भी संभावना था. इस शहर ने मुझे भी बहुत प्यार दिया है और ये मेरे रग-रग में बसा है. ऐसे में युवा पत्रकार विनय तरूण की शोक में हुए इस आयोजन को लेकर 'हिंदुस्तान' की उदासीनता को कतई माफ नहीं कर सकता. अखबार के पन्नों में खबरें कल भी छपती थीं... आज भी छपेंगी और ये सिलसिला बदस्तूर जारी रहेगा. इसके साथ ही ये सवाल भी हर दिन उठता रहेगा कि आखिर खबरों के लाल को खबरी दुनिया ने अखबार (दैनिक हिंदुस्तान) में दो पल का उसका अपना कोना क्यों नहीं दिया?



भोलानाथ आलोक

पूर्णिया के चर्चित कवि और साहित्यसेवक. पूर्णिया बुजुर्ग समाज के अध्यक्ष. पूर्णिया जिला ट्रेड यूनियन समन्वय समिति के अध्यक्ष. पूर्णिया हिन्दी साहित्य सम्मेलन के पूर्व अध्यक्ष.