Friday, March 04, 2011

मैं भागलपुर बोल रहा हूं



मैं भागलपुर बोल रहा हूं. आपका अपना शहर भागलपुर. गंगा मैया के दक्षिणी किनारे पर तकरीबन पिछले तीन हजार साल से मेरा अस्तित्व कायम है. लिहाजा आप यह कह सकते हैं कि आपका शहर दुनिया के सबसे पुराने शहरों में से एक है. एक ऐसा शहर जिसके जलवे समय-सागर के थपेरों से वक्त बे वक्त बेरौनक जरूर हुए पर मिटे नहीं. महलों की रंगीनियां, शासकों की शौर्यगाथाएं और विद्वानों का तेज हमेशा मेरे हिस्से में रहा, पर मेरी असली पहचान हमेशा एक व्‌यावसायिक और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में रही. वस्त्रों में सबसे अनुपम रेशम के उत्पादन के लिये मेरा नाम चांदो सौदागर के जमाने से पूरी दुनिया में फैला है और उसी के साथ फैली है विक्रमशिला विश्वविद्यालय की ख्‌याति, कर्ण की दानवीरता की कहानियां, जदार्लू आम और कतरनी चावल की खुशबू, जैन तीर्थंकर वासुपूज्‌य की ख्‌याति, महर्षि मेहीं का अध्यात्म और ऐसी ही सैकड़ों चीजों. हजारों साल का बूढ़ा मैं भागलपुर आज अपनी कहानी लेकर आपके सामने हाजिर हूं.

पुण्ड­य देश के राजा थे भागदत्त, जिन्होंने मुझे अपना नाम दिया. पहले मुझे भागदत्तपुर पुकारा जाता था. बाद में लोगों के लाड़-प्‌यार से बिगड़कर यह भागलपुर हो गया. पहले मेरा अस्तित्व एक उपनगर के रूप में था जो अंगदेश की राजधानी चंपा से सटा था. समय का फेर देखिये अब चंपा ही उपनगर बनकर चंपानगर हो गयी है और मैं भागलपुर ही नगर का मुख्‌यकेंद्र बन चुका हूं. चंपा का नाम अंग राज चंप के नाम पर उनके पिता ने रखा था, पहले उस नगरी का नाम मालिनी था. फूल से दो नामों वाले उस शहर की भी क्या रौनक थी. जहां राजा बलि के सबसे बड़े पुत्र अंग का राज्‌य चलता था, जिन्हें पृथ्वीपति की उपाधि मिली थी, उसी वंश में आगे चलकर चित्ररथ नामक न्यायप्रिय सम्राट हुए जिनके राज्‌य में लक्ष्मी और सरस्वती अपनी श्रेष्ठता का फैसला कराने पहुंची थीं. राजा रोमपाद जो अयोध्या के राजा दशरथ के समकालीन थे और उनका एक नाम भी दशरथ ही था. अयोध्या नरेश दशरथ की पुत्री शांता रोमपाद के ही महल में उनकी दत्तक पुत्री के रूप में रहती थीं, जिनका विवाह श्रृंगी ऋषि के साथ हुआ और उसी श्रृंगी ऋषि द्वारा कराये गये अनुष्ठान से दशरथ को राम जैसे पुत्र मिले. राजा कर्ण की वीरता और दानशीलता की कहानी जगजाहिर है. वे इसी चंपा शहर में वास करते थे, उनका महल कर्णगढ़ कहलाता था. जहां आजकल पुलिस प्रशिक्षण अकादमी संचालित हो रही है. उनका विवाह भागदत्त की एक पुत्री से हुआ था जबकि दूसरी पुत्री का विवाह उनके मित्र दुर्योधन से हुआ था. फिर इस शहर पर जगतप्रसिद्ध चांदो सौदागर का राज हुआ जिसकी बहू बिहुला ने अपने तप से अपने मृत पति और पांच जेठों को फिर से जिलाने में सफलता प्राप्त की और मनसा पूजा की शुरुआत की. अविश्वसनीय सी लगने वाली ये तमाम कहानियां पुराण के पन्नों में दर्ज हैं. और यह भी कि कंबोडिया कभी भागलपुर का सांस्कृतिक उपनिवेश हुआ करता था और वहां का अंकोरवाट मंदिर वस्तुत: अंगकोरवाट मंदिर है. हालांकि इस तथ्य से देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी सहमत नजर आते हैं और राष्ट्र ­कवि दिनकर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक संस्कृति के चार अध्याय में भी इस तथ्य का उल्‌लेख किया है.

बहरहाल इसके बाद की ऐतिहासिक कथा भी कम गौरवशाली नहीं. खास तौर पर पाल राजाओं का जमाना जब मेरे शहर के पड़ोस में एक गांव अंतीचक में एक अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय खुला, जिसे विक्रमशिला महाविहार का नाम दिया गया. उस तंत्र शिक्षण केंद्र में दुनिया भर से छात्र आते थे. इसी विश्वविद्यालय का कमाल था कि मेरे इलाके से आर्यभट्ट और अतिश दीपंकर जैसे विद्वान पैदा हुए. आर्यभट्ट की कीर्ति तो दुनिया जानती ही है पर सबौर वासी अतिश दीपंकर का योगदान भी कम नहीं है, जिन्होंने तिब्‌बत में बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार किया और लामा संप्रदाय की शुरुआत की. बहरहाल काल के कपाल में चंपा, मालिनी, कर्णगढ़ तो समा ही गये और विक्रमशिला महाविहार भी जमींदोज हो गया और उसके साथ ही मिटने लगी यहां पैदा हुई तंत्र साधना व सिद्ध और नाथ संप्रदाय की परंपराएं. पहले अंग देश मगध का हिस्सा बना फिर बंगाल का. बंगाल से पाल और सेन वंश मिटे और तुर्क-अफगानों और मुगलों का शासन हुआ. फिर अंग देश से राज्‌य और राज्‌य से क्षेत्र बनकर रह गया. सम्राट मिटे, राजा आये और राजा मिटे तो शासक और फिर महज जमींदार. मगर इसके बावजूद इस क्षेत्र की महत्ता कभी कम नहीं हुई. यह उसी दौर की बात है जब शहर का केंद्र चंपानगर और नाथनगर से हटकर भागलपुर में मेरे आगोश में समाने लगा था.

पाल वंश के बाद सेन वंश के राजाओं ने बंगाल पर शासन करना शुरू किया, मगर उसका एक राजा लक्ष्मण सेन इतना कायर निकला कि वह मोहम्मद गोरी को आता देख गद्दी छोड़ भाग खड़ा हुआ. इस तरह बंग के अधीन अंग के इलाकों तुर्क-अफगानों और फिर मुगलों का आधिपत्य कायम हुआ. इसके बाद मेरे इलाकों में रोशन खयाल और कला प्रेमी मुसलमानों की आबादी ने ठिकाना बनाना शुरू किया. मेरे इन बाशिंदों ने पूरे शहर में जगह-जगह इमारतें, मसजिदें और मकबरे खड़े किये जो आज भी मेरी धरोहरों की श्रृंखला में चार चांद लगाते हैं. उनकी हुनरमंदी इमारतों के कंगूरों से उतर कर रेशम के डिजाइनों तक में जा पहुंची. इसकी जौहर का नमूना था कि लोग मुझे सिल्‌क सिटी या रेशम नगरी कह कर पुकारने लगे हैं. फिर शायरी के तरानों का क्या कहना कि बीड़ी बनाने वाला एक मजदूर कौस भी अपने शेरों से मीर और मोमिन को टक्कर देता रहा. वैसे तो मोहम्मद गोरी के आगमन से लेकर मीर कासिम के पतन तक इस शहर पर मुसलमानों की ही हुकूमत चली पर कई दौर ऐसे आये जब यह दिल्‌ली की सल्‌तनत से आजाद अस्तित्व बनाने में सफल रही. यही वजह है कि दिल्‌ली सल्‌तनत की राजनीतिक उठा पटक में मात खाने वाले कई शहजादे गुप्त रूप से भागलपुर में अपना ठिकाना बनाकर रहने लगे. शहर के लोग कई गुमनाम मकबरों के बारे में बताते हैं कि फलां मुहम्मद शाह का मकबरा है तो फलां अहमद शाह का. इसके अलावा कई पीर-फकीरों ने भी मुझे अपना आशियाना बनाये. इनमें से कइयों के मजार आज भी कायम हैं.

कई लोगों का यह भी मानना है कि मेरा नाम भागलपुर इसलिये पड़ा क्योंकि यहां दूसरे इलाकों से भागकर आये लोगों ने अपना ठिकाना बनाया है. यह भाग कर आये लोगों की नगरी है इसलिये भागलपुर है. पता नहीं भागदत्त वाली कथा सही है या यह मगर इस बात में सच्‌चाई जरूर है कि मेरे शहर के आगोश में कई दूर दराज के वाशिंदों ने पनाह ली है. चाहे वह सरयूपारी ब्राह्मण हों या बंग भाषी या दरभंगा-मधुबनी के मैथिल या राजस्थान से पहुंचे माड़वाड़ी समुदाय के लोग. पता नहीं मेरी आबोहवा में क्या आकर्षण था कि इन सारे लोगों ने रहने के लिये मुझे ही चुना. मगर मेरे मिजाज को तय करने में इन लोगों का बड़ा योगदान है, खास तौर पर बंग भाषियों का जिन्होंने इस शहर के लोगों को कविता-कहानी लिखने और जात्रा-नाटक करने का चस्का लगाया. मेरे शहर में बसे मुहल्‌ले आदमपुर की गलियों में मशहूर कथाकार को देवदास उपन्यास की कथा मिली तो टील्‌हा कोठी के एकांत में गीतांजलि की कड़ियों ने आकार लिया. यह उन्हीं लोगों की रोशन खयाली का नतीजा था कि इस शहर की एक बेटी कादंबिनी गांगुली को ग्रेजुएट होने वाली देश की पहली महिला बनने का सौभाग्य हासिल हुआ और अशोक कुमार और किशोर कुमार जैसे जमींदार खानदान के नवासे फिल्‌मी दुनिया के सतरंगी परदे पर अपनी हुकूमत कायम करने में कामयाब रहे. प्रीतीश नंदी ने साहित्य और मनोरंजन की दुनिया को एक नई पहचान दी.

इसी आजाद ख्‌याली का नतीजा था कि यह शहर अंग्रेजी हुकूमत की खिलाफत में भी अगुआ साबित हुआ. पहाड़िया विद्रोही तिलकामांझी ने जब विद्रोह की लौ सुलगाई थी तब दुनिया अंग्रेजी जुल्‌म की हकीकत का आकलन भी नहीं कर पाये थे. गांधी जी के सत्याग्रह के मौके पर शहर में आंदोलनकारियों का हुजूम उमड़ता था. 1934 में जब मुंगेर में भीषण भूकंप आया और जबरदस्त तबाही मची तो इन्हीं सेनानियों ने बाना बदला और रिलीफ के काम में जुट गये. भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान कई जगह प्रदर्शन हुए और प्रदर्शनकारियों ने अंग्रेजी फौज की गोलियों का सामना बहादुरी के साथ किया. देश आजाद हुआ तो नेहरूजी प्रधानमंत्री बने. इसके बाद वे जब पहली बार भागलपुर आये तो लोगों ने सैंडिस कंपाउंड में चांदी कुर्सी उन्हें बैठने के लिये दी. मगर उस जननायक ने चांदी की कुर्सी यह कहते हुए फेंक दी कि जनता जमीन पर और नेता सिंहासन पर यह नहीं चलेगा.

आजादी की लड़ाई में इस शहर ने जितनी कुर्बानियां दीं आजादी के बाद उसका हासिल हमारे हिस्से में बहुत कम आया. शहर धीरे-धीरे ढ़हता रहा और लोगों में निराशा बढ़ती रही. उस निराशा का विस्फोट तब हुआ जब जेपी ने संपूर्ण क्रांति का नारा दिया. एक बार फिर मैं व्‌यवस्था की तानाशाही के खिलाफ लड़ने वालों का केंद्र बन गया. भागलपुर जेल में ही उस दौरान इमरजेंसी की खिलाफत करने वाले बंदियों को रखा गया था और जेल की चाहरदीवारी के अंदर से विरोध के स्वर फूटते रहे. कुछ ही सालों बाद शहर में ऐसी वारदातें हुईं जो आज भी मेरे चरित्र पर बदनुमा दाग बनकर कायम है. अपराध नियंत्रण में नाकामयाब होकर पुलिस कर्मियों ने 33 युवकों की आंखों में तेजाब डाल दिया. खुद फैसला करने की इस पुलिसिया मनोवृत्ति ने एक गलत काम के कारण पूरी दुनिया में मुझे चर्चा का केंद्र बना दिया. दस साल बाद फिर पुलिसिया करतूत के कारण शहर की फिजा बिगड़ी और हजारों लोग सांप्रदायिक हिंसा की बलि चढ़ गये. पहली घटना ने तो शहर के चरित्र का हनन किया था दूसरी ने शहर की आबोहवा में जहर घोल दिया. इस कारोबारी शहर के कारोबारी रिश्ते तक गड़बड़ाने लगे. खैर यह बुनकर-व्‌यवसायी का ही रिश्ता था कि शहर के अमन-चैन को पटरी पर आ गया.

खैर उसके बाद से शहर का अमन-चैन बरकरार है. लोग जात-धर्म के बदले कारोबार की बातें करते हैं. सन 2001 में विक्रमशिला सेतु बना तो उत्तर बिहार के कई जिले भागलपुर के संपर्क में आ गये. इसके बाद यहां के कारोबार ने तो जैसे उड़ान पकड़ लिया. डल चादर के लिये मशहूर यह शहर को पहले डल स्वभाव का था अब महानगरों की तेज रफ्‌तार जिंदगी से कदम मिलाने की कोशिश कर रहा है. धड़ाधड़ अपार्टमेंट बन रहे हैं, शोरूम खुल रहे हैं. लक्ज़री कारों से शहर की सड़के अटी रहती हैं. लड़के-लड़कियां बाहों में बाहें डाले ऐसे घूमते हैं जैसे कि हम दिल्‌ली-कोलकाता आ गये हों. रेस्तरां की सीटें फुल रहती हैं, बच्‌चे फटाफटा अंग्रेजी बोलते हैं और जवान होते-होते किसी कंपनी के बड़े अधिकारी में तब्‌दील हो जाते हैं. इसके बावजूद शहर के शोर में अंगिका की खनक कायम है. बिहुला विषहरी के बोल अब भी गूंजते हैं, गंगा घाटों पर अब भी स्नानार्थियों का मेला लगता है. कतरनी की खुशबू और जरदालू आम की गमक अब भी सैलानियों को मेरे पास खींच लाती है. मैं आज भी आपका ही शहर हूं, वही भागलपुर.


(यह आलेख प्रभातखबर भागलपुर के प्रवेशांक में प्रकाशित हो चुका है)