Sunday, May 08, 2011

इंसानियत के लिए सबक है बहल बहनों की कहानी



अनुराधा बहल मंगलवार को चल बसी. हालाँकि उसने दो साल पहले ही अपनी डायरी में माय एंड लिख दिया था. सोनाली अभी जिन्दा है और पूरी कहानी उसके चेहरे पर बड़ी क्रूरता के साथ दर्ज है. अपने माता-पिता की मौत, जान से प्यारे भाई की बेरुखी और अंत में जीने का एक मात्र सहारा दुलारा डॉगी छोटी के गुजर जाने के बाद दोनों ने पूरी दुनिया से खुद को काट लिया और अपनी कहानी पर खुद ही द एंड लिख लिया.यह परिघटना मनोवैज्ञानिक त्रासदी का उदहारण भर नहीं है, यह इक्कीसवीं सदी में महामारी की तरह फ़ैल रहे डिप्रेसन की बानगी है. मौजूदा जीवन शैली में लोग किस तरह जीवन के सौंदर्य से विमुख हो रहे हैं और जीत या मौत के जुनूनी हालत में फँस गए हैं उसका नमूना है.

हालाँकि यह इस तरह की कोई पहली घटना नहीं है. हमने विवेक बाबाजी नमक मॉडल की ख़ुदकुशी की खबर सुनी. एक मॉडल को भिखारियों की तरह दिल्ली की सडकों पर भटकता पाया. रिजल्ट आने के बाद असफल बच्चों द्वारा ख़ुदकुशी करने की घटनाओ में अप्रत्याशित वृद्धि के कारण सरकार को रिजल्ट का पूरा पैटर्न बदलना पड़ा. हमने देखा की आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी की मौत की खबर सुनकर सैकड़ों लोगों ने खुदकुशी कर ली. ऐसे उदहारण रोज सामने आते हैं. लाखों उदहारण सामने आते भी नहीं हैं. अवसाद के डॉक्टर के यहाँ रोगियों की भीड़ उमड़ी रहती है. उनके पास इतना वक़्त नहीं होता के रोगियों को समय दे सकें. सबसे आसन उपाय होता है नशे की गोलियां खिला देना. वैसे भी देश के युवाओं का एक बड़ा वर्ग नशे के गिरफ्त में हैं तो उसके पीछे कहीं न कहीं आधुनिक जीवन शैली के कारण बढ़ रहा विषाद है.

वैसे तो अनुराधा और सोनाली का मामला उपरी तौर पर जीत या मौत की कहानी नहीं हैं. मगर माता पिता की मौत के बाद उन दोनों ने जिस तरह भाई का जीवन बनाने में खुद को होम कर दिया यह भी एक तरह की महत्वाकांक्षा ही है. भाई का जीवन बनाने के दौरान उनके सारे सपने भाई के जीवन के इर्द गिर्द ही घूमने लगे. धूमधाम से भाई की शादी करवाई. अब बे चाहती थीं के उनके जीवन के खालीपन को उसका भाई और भाभी भरे. जाहिर सी बात है की उन अपेक्षाओं का बोझ उनके भाई और भाभी सह नहीं पाए. यही उन दोनों के घर छोड़ने की वजह बनी. और फिर उनके घर छोड़ने का सदमा दोनों बहने सह नहीं पाई, जिसका नतीजा सामने है.

पिछले कुछ सालों में हमने अपने जीवन शैली में कई खतरनाक बदलावों को शामिल किया है. अब मोबाइल, कंप्यूटर, टीवी और कार हमारे पारिवारिक सदस्य हो गए हैं. रिश्तेदारों की गिनती लगातार छोटी हो रही है. समाज का कांसेप्ट लगभग ख़त्म हो चुका है. महानगरों या बड़े शहरों में ही नहीं, कस्बों और बड़े गाँव भी इसी ट्रेंड को अपना चुके हैं. पहले ननदों, देवरानियों, सास और पड़ोसनो के बीच रहते हुए एक विधवा औरत का जीवन आसानी से खप जाता था. अब एक छोटी सी असफलता पूरे जीवन के लिए वैधव्य का कारण बन जाती है. अगर इन दोनों के जीवन में चाचा-चाची, बुआ, मौसी या मौसा होते तो वह नहीं होता जो हुआ. वे उनके पास नहीं रहते मगर बातचीत के जरिये उन्हें इस भीषण अवषाद में जाने से तो बचा ही लेते. उन्हें कभी ऐसा नहीं लगता की भाई भावज के जाने के बाद उनकी जिंदगी का एंड हो गया है.

गांवो में आज भी कई बुजुर्ग समाज के लोगों के भरोसे उनसे रिश्ता निभाते हुए अकेले जीते हैं. मेरे एक चाचा पिछले ४० सालों से अकेले हैं. पत्नी के गुजरने के बाद विक्षिप्त हो गए. कोई संतान नहीं. मगर उनके भाई भतीजों ने उन्हें ढंग से रखा है. एक बुआ बचपन में ही विधवा हो गयी. उसने अपनी जमा पूंजी से एक मंदिर बनवाया और अकेली ५० साल तक रहीं. दबंग स्वभाव की थीं. कभी झुकी नहीं. ये तो २०-२५ साल पहले के माहौल की कथा है. नए ज़माने में कई विसंगतियां उठ खड़ी हुयी हैं. कई औरतें अकेली रहती हैं क्योंकि उनके पति या बेटे रोजगार की तलाश में पलायन कर चुके हैं. कई बुजुर्ग दम्पति शहरों की तरह गाँव में भी अकेले जीवन काटते हैं. इन लोगों के लिए जीवन उतना आसान नहीं है. फिर भी वे रह तलाशते हैं. शहरों में अकेलापन चरम पर है.