Sunday, July 10, 2011

पाइरेटेड सत्याग्रह के इस दौर में


साल 2011 सत्याग्रह, अनशन और पदयात्रओं के लिए याद किया जायेगा और उससे भी अधिक इस बात के लिए कि इसी साल इन गांधीवादी हथियारों को कुछ अगंभीर सत्याग्रहियों ने इतना नुकसान पहुंचाया कि इनकी धार कुंद पड़ने लगी. इसकी शुरुआत जन लोकपाल बिल के लिए चलाये जा रहे अन्ना हजारे के आंदोलन से हुई और बाबा रामदेव की पदयात्रा और अनशन से गुजरते हुए राहुल गांधी की पदयात्रा पर खत्म हुई. इस त्रिस्तरीय यात्रा में इन हथियारों की विश्वसनीयता कितनी गिरी यह किसी से छुपा नहीं है.

अन्ना हजारे और उनकी टीम का आंदोलन कुछ हद तक गांधीवादी जरूर था, मगर उसमें भी कई झोल थे. इस आंदोलन की सबसे बड़ी विसंगति इसका एनजीओवादी ढर्रा था. देश में कई संस्थाएं और संगठन इस तरह के आंदोलन चलाते रहे हैं, जिनमें गुप्त या प्रकट तौर पर देसी-विदेशी एजेंसियां का पैसा लगा रहता है. ऐसे आंदोलन जनता के बीच से नहीं उभरते टाटा स्कूल ऑफ सोशल सांइस या इरमा जैसी संस्थानों से पास करने वाले सामाजिक प्रबंधकों के प्रोजेक्ट प्रोपोजल के जरिये आकार ग्रहण करते हैं. आम तौर पर इस तरह के आंदोलन का कोई नतीजा नहीं निकलता मगर इनके जरिये एक इमानदार विपक्ष का भ्रम कायम रहता है. कुल मिलाकर ऐसे आंदोलन सत्ता पक्ष को सूट करते हैं. ऐसे आंदोलनों के साथ निश्चित तौर पर उन संस्थाओं के हित जुड़े होते होंगे जो इन्हें फाइनेंस करती है.


बहरहाल अन्ना का आंदोलन इन सबसे कितना फरक था यह कहना मुश्किल है, मगर उनके पीछे खड़ी भीड़ में कई लोग ऐसे थे जो इसी वर्ग से आते हैं. हालांकि गांधी जी के आंदोलनों में भी धन्ना सेठों का पैसा लगा रहता था और उनके स्वदेशी आंदोलनों से इन सेठों के उत्पादों की बिक्री में निश्चित तौर पर उछाल आता होगा. इसके बावजूद उन आंदोलनों की सादगी और इन आंदोलनों की भव्यता में कोई साम्य नहीं. फिर गांधीजी की पूरी आंदेलन प्रक्रिया तार्किक हुआ करती थी. चरणबद्ध तरीके से वे मांग करते थे और जब हर तरह के प्रयास चुक जाते तभी वे अनशन नामक हथियार का प्रयोग करते थे. पता नहीं उनका यह हथियार ब्लैकमेलिंग से कितना पृथक था? बहरहाल वे एक छोटी सी चूक पर आंदोलन वापस ले लेते थे. कई बार उन्होंने कहा कि सत्याग्रह करने वाले इंसान में सत्याग्रह की गहरी समझ आवश्यक है. मगर हमने इसी साल देखा कि नेता कर तो सत्याग्रह रहे हैं मगर बातें शिवाजी की करते हैं. हमारे दोनों सत्याग्रहियों की सबसे बड़ी कमजोरी यही रही कि वे बोलते अधिक हैं और बोलते-बोलते अतार्किक हो जाते हैं. जहां तक मेरी जानकारी है उस दौर में गांधीजी का एक बयान सुनने के लिए देश की जनता और सरकार मुंह बाये खड़ी रहती थी और उनके एक-एक शब्द का मतलब निकाला जाता था. सरकार के साथ वार्ता के टेबुल पर अन्ना की टीम जिस तरह फेल हुई और उनके १६ अगस्त के अनशन को लेकर सरकार जितनी कम गंभीर है, उसके पीछे कहीं न कहीं नेतृत्व क्षमता और आत्मबल की कमी है.


जहां तक बाबा रामदेव के आंदोलन और अनशन का सवाल है, उस पर तो विचार करना भी अपने शब्दों को महत्वहीन करना है. वह आंदोलन या तो किसी राजनीतिक दल के प्रोत्साहन पर खड़ा हुआ था या उनकी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा पर. तीसरा आंदोलन सरकारी आंदोलन है जिसे सत्ता के शीर्ष में बैठी पार्टी के प्रमुख डिसीजनमेकर का पुत्र चला रहा है. यह आंदोलन कम पॉलिटिकल पीआर एजेंसी का कैंपेन है. जिसका टारगेट राहुल गांधी को जननेता की छवि प्रदान करना है. पिछले छह सात साल से इस बात के लिए प्रयास किये जा रहे हैं. मैनेजमेंट गुरुओं की टीम भिड़ी है. यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई सिगरेट कंपनी पर्यावरण की रक्षा के लिए वृक्षारोपण करवाती हो. इन तीन आंदोलनों के हश्र के बाद अगस्त में चौथे आंदोलनों की तैयारी चल रही है. मगर वह आंदोलन भी अपना लक्ष्य हासिल करने में कितना सफल होगा कहना मुश्किल है. गांधीजी हर दो आंदोलन के बीच का समय जनता के बीच में जाकर गुजारते थे और समाज सुधार का काम करते थे. मगर अन्ना ने दो आंदोलनों के बीच का वक्त सरकार से तकरार करने में गुजारा है. अब तकरीबन यह तय है कि अन्ना की टीम और सरकार के बीच की लडाई सिर्फ मेरा लोकपाल तेरा लोकपाल की है. अपने तरीके से सरकार अन्ना के टीम की अस्सी फीसदी मांगें मान चुकी है. मसला बीस फीसदी का है. वस्तुतः आम जनता को लोकपाल के मसले से ज्यादा कुछ लेना देना नहीं है. उसके सामने मसला महंगाई और भ्रष्टाचार का है.

अगर आज गांधीजी होते तो वे जंतर-मंतर पर धरना देने के बदले किसी मुखियाजी के द्वार पर धरना देने बैठ जाते और अपने सभी अनुयाइयों को भी ऐसी ही सलाह देते और मांग करते कि वे बिना कमीशन लिए गरीबों को इंदिरा आवास बांटे और नरेगा की मजदूरी में घपला न करे. वे धान की भूसी से जलने वाले चूल्हे का प्रचार करते ताकि रसोई गैस की बढती कीमतों का मुकाबला किया जा सके. मुंबई स्टॉक एक्सचेंज का बहिष्कार करने का आंदोलन चलाते. मोबाइल फेंको अभियान चलाते. गांव-गांव में गुड तैयार करने वाली भट्ठियां और तेल की पेराई करने वाली कोल्हू खुलवाने का अभियान छेड़ते ताकि चीनी और तेल की महंगाई का मुकाबला किया जा सके. बाइक और कार की जगह साइकिलों को प्रमोट करते ताकि स्वास्थ्य भी ठीक रहे और पेट्रोल का खरचा भी बचे. हर घर में एक गाय का आंदोलन चलाते ताकि दूध की महंगाई कम हो. मगर आज के आंदोलन की क्रियेटिविटी यह है कि नारे फेसबुक पर लग रहे है. एसएमएस पर आमंत्रण दिये जा रहे हैं. इस तरह के आंदोलन तो आंदोलनों की साख पर बट्टा लगाने वाले होते हैं. इससे बेहतर आंदोलन तो गुर्जर समाज वाले और तेलंगाना वाले चलाते हैं जो नतीजा लिए बिना मानते ही नहीं.

जहां घर नर और सड़कें मादा नहीं हैं!

हाल ही में मैनें एक किताब पढ़कर खत्म की है। किताब का नाम है, जहं-जहं चरन परे गौतम के। यह संभवतः गौतम बुद्ध की सबसे रोचक जीवनी है। मगर मेरे लिए इस किताब का नाम भी कम रोचक नहीं। चरण नहीं चरन, पड़े नहीं परे। शब्दों का यह चयन हम बिहारियों के हिंदी उच्चारण की हीन ग्रंथी पर मरहम लगाने सरीखा है। हम लोग अक्सर इस तरह के उच्चारण के लिए दूसरे प्रदेशों में उपहास के पात्र बनते रहे हैं और आज तक यही समझते रहे कि हमारा यह उच्चारण दोष हमारी अयोग्यता का प्रमाण है। इस पुस्तक का शीर्षक पढ़ कर पहली बार यह समझ आया कि इस तरह का उच्चारण हम बिहारियों के सदियों पहले प्राकृत और पालि भाषी होने के कारण है। इन लोक भाषाओं में उच्चारण इसी तरह किया जाता रहा है और बौद्ध धर्म की प्रतिष्ठा के बाद इन भाषाओं को शासकीय स्वीकृति भी मिली। बहरहाल हमारी जीभ उस वक्त जिस तरह उमेठी गयी, उसका असर अब तक कायम है। बिहार के लोग बमुश्किल सौ-सवा साल से हिंदी बोल रहे होंगे, उससे पहले तो इन्हीं या इनकी अपभ्रंश भाषाओं-बोलियों से हमारा काम चलता रहा। चाहे वह भोजपुरी हो या मैथिली, मगही हो या अंगिका। कहने को आज इन्हें हिंदी की बोलियां कह दिया जाता है, पर हकीकत में यह हिंदी से काफी पुरानी बोलियां हैं और प्राकृत व पालि जैसी भाषाओं का ही अपभ्रंश हैं।

यहां मेरा अभिप्राय हिंदी भाषा को कमतर बताना नहीं है। हिंदी आज उत्तर भारत की सर्वमान्य भाषा है। भले इसकी उम्र छोटी है, मगर प्रभाव व्यापक। सबसे बड़ी बात कि इस भाषा की बदौलत इस नयी सदी में हम जैसे लाखों लोगों की रोजी-रोटी चल रही है। मेरा आशय सिर्फ खुद जैसे बिहारवासियों की उस हीन ग्रंथि पर मलहम लगाना है, जो उच्चारण और लिंगदोष के नाम पर हम चुपचाप झेलते आये हैं।

उच्चारण दोष का अभियोग तो आवाज की दुनिया के कई दोस्तों को झेलना और भुगतना पड़ता ही है और इस कारण कई बार उन्हें पर्दे के सामने आने का मौका नहीं मिल पाता। मगर अखबारी दुनिया के बिहारवासी साथी ज्यादातर लिंगदोष के मारे हैं। दूसरे प्रांतों के हमारे वरिष्ठ द्विआर्थी तरीके से इस शब्द का उच्चारण करते हैं और हम चुपचाप झेंपते हुए मुस्कुराते रहते हैं। अब जाकर मैंने गौर किया कि हमारी बोलियों में तो संस्कृत की तरह तीन लिंग होते हैं। पुल्लिंग, स्त्रीलिंग और उभय लिंग। यानि हम लोग लिंग विहीन चीजों को लिंग के खांचे में नहीं बांटते। राम पुल्लिंग है और सीता स्त्रीलिंग, मगर राम और सीता का घर हिंदी में भले ही पुल्लिंग होता है, संस्कृत की तरह हमारी बोलियों में उभय लिंग ही होता है। बड़ा पापुलर मजाक है, न्यूज रूम में अक्सर उल्लेख किया जाता है कि हवा बहता है या बहती है का जब फैसला करना हो तो हवा बsहs है कर देना चाहिए। पर हकीकत में हमारी बोलियों में यह इसी तरह इस्तेमाल होता है। हवा बsहs है या हवा बहै छय। घर पुराना हो गया को मैथिली में कहते हैं घर पुरान भs गेल। यहां घर लिंग विहीन है। सचमुच घर लिंग विहीन ही होता है। घर भी, हवा भी, आम भी और हवाई जहाज भी। क्या किसी ने इनका लिंग देखा है? खैर हिंदी वालों ने इनमें स्त्रीत्व और पुरुषत्व तलाश लिये और अब हम भी घर को नर और सड़क को मादा के रूप में देखने की आदत डाल चुके हैं। आने वाले समय में लेस्बियन, गे और किन्नर दावा करने लगे तो हिंदी में संशोधन की जरूरत होगी, मगर फिलहाल घर और सड़क दावा करने वाले नहीं। लिहाजा हमने अपना नजरिया बदल लिया है और अपनी शर्ट को एक खूबसूरत हसीना मानकर खुश होते हैं कि वह हमारे बदन से लिपटी तो है।

उसी तरह हमारी बोलियों में का के की भी अलग नहीं है। मैथिली और भोजपुरी में इन तीनों के बदले सिर्फ के प्रयुक्त होता है। जैसे राम के मेहरारू, राम के कनिया, अहमदिया के दुआर। वहीं अंगिका में इनकी जगह र इस्तेमाल होता है। राम र दुलहिन और अहमदिया र दरबज्जा। कहीं किसी लिंगात्मक विश्लेषण की जरूरत नहीं। आपकी कसम के बदले भोजपुरी भाई कहते हैं तोहार किरिया। हमार भौजी। हम बिहारवासी कई बार कह देते हैं तुम्हारा पापा, तुम्हारा मम्मी और हंसी के पात्र बन जाते हैं। वह इसलिए कि हम अपनी स्थानीय बोलियों में तोहार, तोरे, तोहर से ही बड़े, छोटे सबका का काम चला लेते हैं। मसलन तोहर बाबू या तोहर माय। अगर किसी बड़े को कहना होता है तभी अहां के बाबूजी या अपने के माताजी कहते हैं। यहां हिंदी में कहना पड़ता है, तुम्हारे पिताजी और आपका बेटा। बिहार में तो बेटा भी अहां के और पिताजी भी अहां के ही होता है।

बिहार में मूलतः चार भाषाएं हैं। भोजपुरी, मैथिली, अंगिका और मगही। इन्हें बोली कहकर इनका महत्व कम नहीं किया जा सकता है। मैथिली और भोजपुरी तो आज भी अंतरराष्ट्रीय सम्मान हासिल कर रही है, जहां तक मगही और अंगिका का सवाल है, ये भी प्राचीन इतिहास के दौर में अंतरराष्ट्रीय भाषाएं रह चुकी हैं। इनका हजारों साल का इतिहास है। अंगिका की अपनी लिपि है। इन भाषाओं का वर्तमान भले ही गर्त में हो मगर इतिहास कई भाषाओं से अधिक समृद्ध रहा है। हमें इन्हीं मातृभाषाओं का सूत्र पकड़ कर हिंदी का दामन थामना पड़ा है। अगर बंगाली, तमिल या कन्नड़ की टूटी-फूटी हिंदी को हम सहिष्णुता दर्शाते हुए झेल लेते हैं तो फिर राजस्थान के मारवाड़ियों, मध्यप्रदेश के बुंदेलियों और बघेलियों और भोजपुरियों, मैथिलों, अंगिका भाषियों और मगहियों को क्यों नहीं। भोपाल में मैं नहीं मे होता है और पत्थर नहीं, फत्तर। पंजाब में स्कूटर नहीं सकूटर होता है और धर्मेंद्र नहीं धरमेंदर। हमारे यहां भी सरक हेमामालिनी का गाल जैसा बनता है जनाब।

बड़े एहतराम से है बाढ़ का इंतजार


कोसी के कछार बसी लाखों की आबादी बड़े एहतराम से बाढ़ का इंतजार कर रही है. पिछले एक माह से लगभग तय है कि इस साल कोसी फिर तटबंध का पिंजरा तोड़ कर खुले इलाके में सैर करेगी. बिहार की राज्य सरकार भी इस बात को स्वीकार कर रही है. राज्य के आपदा प्रबंधन विभाग की ओर से दस दिन पहले कोसी नदी के इलाके में पड़ने वाले चार जिले के प्रशासन को अलर्ट कर दिया गया और उन्हें बताया गया कि ३० जून तक बाढ़ से बचाव और बाढ़ का सामना करने से संबंधित सारी तैयारियां कर लें, क्योंकि जुलाई के पहले सप्ताह में बाढ़ आने वाली है.

मंत्रालय ने बाढ़ के लिए ४ से ६ जुलाई के बीच की तारीख की भविष्यवाणी की है. लिहाजा अब कोई संशय नहीं बचता कि बाढ़ नहीं आये. ऐसे प्रशासन और स्थानीय लोग अपनी तैयारी पुख्ता करके बाढ़ का इंतजार कर रहे हैं. वैसे हो सकता है जुलाई के पहले हफ्ते बाढ़ न आये, मगर इस बार तटबंध टूटेगा ही और बाढ़ भी आ कर रहेगी. बहुत संभव है कि इस बार की बाढ़ २००८ की प्रलंयकारी बाढ़ से ज्यादा भीषण हो. यह संभव है कि पूर्वानुमान के कारण पहले से सजग समाज और शासन पर इसका असर उतना न हो. मतलब यह कि २००८ की बाढ़ ने कोसीवासियों को हिम्मतवाला बना दिया है. अनुपम मिश्र जी अब निश्चिंत हो सकते हैं कि अब कोसी का तैरने वाला समाज डूबने वाला समाज नहीं रहा. इस बार वह तैर कर इस आपदा को पार करने के लिए तैयार है.

पूरे इलाके में कहीं कोई हलचल नहीं है. रोज अखबारों में छायी आपदा की डराने वाली खबरों के बावजूद कहीं कोई घबराहट नहीं है. कोई भगदड़ नहीं है. सत्तू पिसवाकर, तेल मसाला और गैस सिलेंडरों का इंतजाम करके, फर्श पर रखी चीजों को छज्जे पर चढ़ाकर, चौकियों के नीचे तीन-तीन इंट डालकर बड़ी उत्सुकता से बाढ़ का इंतजार कर रहे हैं. क्योंकि उन्हें समझ आ गया है कि अगर घर या गांव के स्कूल की छत को पकङम्डे रहे तो कोई नुकसान नहीं होगा. पानी आने के बाद अगर इधर-उधर भागने की कोशिश की तो जरूर जान से हाथ धोना पड़ेगा.

प्रशासन ने भी नावों, नाविकों, लाइफ जैकेट, महाजाल, बाढ़ की स्थिति में बचने के लिए ऊंचे स्थान, अस्थायी सेल्टर, सूचना केंद्र आदि की व्यवस्था कर रखी है. इस बात के भी इंतेजाम हैं कि बाढ़ आने के महज कुछ ही घंटे के दौरान जवान लोगों की जान बचाने पहुंच जायेंगे. बचाव कार्य के लिए हेलिकाप्टर का भी इंतेजाम है. इसके अलावा राहत कार्य के लिए खाद्यान्न, पशुओं का चारा, आवश्यक दवाइयां भी हैं और राहत और बचाव कार्य चलाने के लिए लोग भी तय कर दिये गये हैं. अगर बाढ़ को आना ही है तो उससे क्या घबराना?यह तो एक बात हुई मगर दूसरे मोरचे पर अब भी समाज भी कमजोर है और सरकार भी. इतने अनुभवों के बावजूद दोनों में से कोई यह समझने मानने के लिए तैयार नहीं है कि तटबंध का फार्मूला बेकार हो चुका, अब इसे बदलने की जरूरत है. खास तौर पर जहां तक कोसी का मामला है अगर इसी राह पर हम चलते रहे तो हर साल तटबंध टूटेगा और हर साल बाढ़ आयेगी. क्योंकि तटबंध के अंदर जमीन की ङम्ढाल पश्चिम में ऊंची और पूरब में नींची हो गयी है. लिहाजा कोसी पूरबी तटबंध से सटती हुई चल रही है. ऐसे में तटबंध के कई बिंदुओं पर नदी हमलावर होती है. जरा सा भी पानी बढे तटबंध का टूटना तय हो जाता है. नदी अगर आजाद हो जाती है तो पानी बढ़ने के साथ-साथ अगल-बगल के गांव में मंथर गति से फैलेगी. जबकि तटबंध टूटने पर वह बेगवती होकर आस-पास के इलाकों में संहार करती है. दिलचस्प बात तो यह है कि तटबंध के भीतर के लोग बाढ़ से नहीं डरते. उनके लिए बाढ़ उपहार है जो उनकी जमीन के लिए उर्वरता का तोहफा लेकर आती है, बगैर खाद के जमीन सोना उगलती है. फिर मंथर गति से फैलता पानी खौफ पैदा नहीं करता. पानी बढे तो ऊंचे स्थान की शरण ले लेते हैं. मगर यह बात तटबंध के बाहर रह रहे आम नागरिकों को समझ नहीं आती. उनके लिए नदी किसी खौफ का नाम है जो उसके इलाके में घुसी तो सबकुछ तहस नहस हो जायेगा. बरसों नदी से दूर रहने के कारण उनमें जलराशि से खेलने की आदत गुम हो चुकी है.अनुपम भाई कहते भी हैं कि कोसी का समाज तैरना भूल गया है.

बहरहाल लोग तो अज्ञानता और भय के कारण तटबंध से निजात पाना नहीं चाहते. मगर प्रशासन तो जानबूझ कर आंखों में पट्टी बांधे बैठा है. क्योंकि तटबंध हीरे की खदान है, हर साल तटबंध के बचाव के नाम पर अरबों खर्च होते हैं जिसका कोई टेंडर कोई हिसाब नहीं होता. और अगर खुदा न खास्ता तटबंध टूट जाये तो राहत और बचाव, फिर पुनर्वास के नाम पर अरबों का वारा-न्यारा होता है. कोसी के विशेषज्ञ दिनेश कुमार मिश्र कहते हैं उत्तर बिहार के लिए बाढ़ चौथी फसल है. मगर वस्तुतः यह सिंचाई और आपदा प्रबंधन विभाग के लिए पहली फसल है. इन दिनों आप बिहार के इंजीनियरों की सरगर्मी देखिये. लाखों का रिश्वत देकर अपना तबादला बाढ़ पीड़ित क्षेत्रों में करवा रहे हैं. एक बाढ़ में तटबंध बचाने के काम में रह गये तो कई सालों का इंतजाम हो जाता है. यही वजह है कि बिहार के इंजीनियर-ठेकेदार और राजनेता साल-दो साल में एक अदद ठीक-ठाक बाढ़ का इंतजाम कर ही लेते हैं. इन सबों के विकास के लिए तटबंध का रहना जरूरी है. अगर तटबंध तोड़ दिये जायें तो यह बिरादरी सड़क पर आ जायेगी.

Saturday, July 02, 2011

चवन्नी छाप इंडिया, चवन्नी छाप सरकार



दो तीन दिन पहले से हर जगह खबरें आने लगी कि चवन्नी की विदाई हो रही है. हालांकि चवन्नी का जाना कोई बहुत बड़ी खबर नहीं थी, क्योंकि चवन्नी बहुत पहले जा चुकी थी. इन दिनों कोई ऐसा सामान नहीं बिक रहा है जिसके लिए चवन्नी अदा करना पड़े. अठन्नी की इज्जत भी अब एलपेनलिबे टाफी के हाथ में ही है. वैसे भी अठन्नी अब जोड़े में ही चलता है अकेले कोई लेना नहीं चाहता. इस लिहाज से चवन्नी को लेकर जो विधवा विलाप चला और चल रहा है वह बहुत बोरिंग है. इस बात का कोई अर्थ नहीं कि चवन्नी हमारी जुबान पर जिंदा रहेगी, बकौल चवन्निया मुस्कान या चवन्नी छाप इंसान. हमारी जबान पर बहुत सारी ऐसी चीजें जिंदा है जो अस्तित्व में नहीं है, उनमें सबसे बड़े तो खुद ईश्वर ही हैं. मगर!
मगर इस बीच मुझे गुजरात के मुख्यमंत्री भाई नरेंद्र मोदी जी का टवीट बड़ा पसंद आया कि बाबा रामदेव तो हजार रुपये का नोट को खत्म करने की बात कर रहे थे. सरकार ने चवन्नी खत्म कर दी. है ना इंटरेस्टिंग. और इसी बात के सहारे मैंने यह निष्कर्ष है कि हमारी सरकार भी चवन्नी छाप है और हमारा नया नवेला इंडिया भी. (इंडिया का भ्रूण १९८४ में राजीव गांधी के साथ अस्तित्व में आया और १९९१ में नरसिंहा राव और मनमोहन सिंह की जोड़ी ने जन्म दिया, इस लिहाज से इसकी उम्र महज २० साल है.)
देशभक्ति की ज्वार पर सफर करने वाले मेरे ऐसे दोस्त जो यह मानते हैं कि इंडिया सुपर पावर बनने की राह में है मुझे माफ करें. अगर यह देश चवन्नी को नहीं बचा पाता है तो इसे चवन्नी छाप कहने में कोई गुरेज नहीं है. क्योंकि आपको शायद यह मालूम होगा कि चवन्नी की बलि इस वजह से दी गयी है क्योंकि चवन्नी में लगने वाले धातु की कीमत चवन्नी से काफी महंगी हो गयी थी. स्टेनलेस स्टील की कीमत बाजार में १९ पैसे से २४ पैसे प्रति ग्राम के बीच है. यानि २.८३ ग्राम की चवन्नी की न्यूनतम कीमत ५० पैसे के आसपास हो जाती है. चवन्नी की मौत की वजह कुछ और नहीं, महंगाई है. और इस महंगाई की वजह कुछ और नहीं सात साल से हमारे कंधे पर सवार मनमोहन सरकार है, जिसके लिए विकास दर मेंटेंन रखना सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है, जनता भूखे मरे या पेस्टीसाइड खाकर मरे. पेस्टिसाइड खाकर मरती है तो और अच्छा कम से कम मरते-मरते उपभोक्ता के धर्म का पालन तो करती ही है. पेस्टिसाइड खरीदती है जिससे इस अर्थव्यवस्था में थोडा उछाल तो आता ही है.
दरअसल, हम लोग अब इस देश के नागरिक नहीं रह गये. हम लोग इन बीस सालों में चुपके-चुपके उपभोक्ता में बदल दिये गये हैं. हमारे पास परचेजिंग पावर है तो सबकुछ है, यही पावर सबसे बड़ा पावर हो गया है. ऐसे में बहुत संभव है कि हमारी सरकार चवन्नी को डिलीट कर ऐसा सोचती हो कि हमने प्रगति कर ली है, अब हमारा देश चवन्नी के लेवल से उपर उठ गया है. फिलहाल रिजर्व बैंक ५ रुपये के नोट को भी खत्म करने वाला है और २० रुपये का सिक्का बाजार में उतारने की योजना बना रहा है. भारत सरकार ने एक और दो रुपये का नोट छापना काफी पहले बंद कर दिया है.
एक अर्थशास्त्री के तौर पर मनमोहन यह जरूर समझते होंगे कि चवन्नी का लेबल गंवा देना सफलता नहीं असफलता है. अमेरिका में दो हजार डालर की सैलरी ठीक-ठाक मानी जाती है और हमारे यहां २० हजार रुपये की कोई गिनती नहीं है. अगर चवन्नी गंवा देना बहादुरी है तो सबसे बहादुर देश तो जिम्बाब्वे है जहां लाख से कम में कोई काम ही नहीं चलता. जहां दस करोड़ रुपये का नोट भी मार्केट में है और जहां ५० बिलियन जिम्बाब्बे डालर खर्च करके एक अंडा खरीदा जाता है. जहां २००५ में ५ हजार और १० हजार का सिक्का जारी किया गया. वहीं अमेरिकन डालर ४४.५ रुपये का है और ब्रिटिश पाउंड ७१ रुपये का. इंगलैंड में आज भी एक पेनी, २ पेंस और पांच पेंस के सिक्के बाजार में चल रहे हैं. १९८४ तक आधा पेनी का भी सिक्का चलता था. हालांकि आज भी एक पेनी का मूल्य जिसे वहीं एक पैसा माना जाता है, हमारे आठ आने से अधिक है. चाइनीज युआन का मूल्य सिर्फ ६ रुपये ९० पैसे ही है, मगर वहां भी एक फेन और दो फेन का सिक्का चलता है. १०० फेन का एक युआन होता है. अमेरिका में भी एक सेंट, पांच सेंट और क्वार्टर डालर का सिक्का चलन में है. सौ सेंट का एक डालर होता है. विकसित देशों की श्रेणी में शायद ही कोई ऐसा देश हो जहां एक पैसे(स्थानीय इकाई ), ५ पैसे का सिक्का नहीं चलता हो. हमने चवन्नी तक गंवा दी और अब तो अठन्नी भी बेमतलब होकर रह गया है. बहरहाल हम अपनी तुलना पाकिस्तान से कर सकते हैं, जहां एक रुपये से कम का सिक्का नहीं चलता और ५ हजार तक के नोट बाजार में हैं.
अफगानिस्तान में सिक्के २ रुपये से शुरू होते हैं और नोट दस हजार तक के होते हैं. इराक में २५, ५० और १०० दीनार के सिक्के बाजार में उतारे गये, मगर चले नहीं, फिलहाल न्यूनतम ५० दीनार और अधिकतम २५ हजार दीनार के नोट बाजार में हैं. यह सब बताने का अर्थ सिर्फ इतना है कि लोग समझ लें हम किस दिशा में जा रहे हैं. अफगानिस्तान और इराक की तरफ या अमेरिका और ब्रिटेन की ओर.
हमारा पैसा लगातार कमजोर हो रहा है इसी कारण हमें चवन्नी को खोना पड़ा. अगर हम चवन्नी को बचा लेते तो बहादुरी की बात होती. मगर क्या करें फिलहाल तो सरकार अपनी कुरसी बचाने में जुटी है. उससे मौका मिलेगा तो विकास दर बचायेगी, डूबते सेन्सेक्स को उबारेगी, जेल में जमा नेताओं की फौज को आजादी दिलायेगी, राहुल गांधी का रिपोर्ट कार्ड ठीक करेगी, वगैरह-वगैरह...ऐसे में चवन्नी की फिक्र किसे हो सकती है.