Thursday, December 27, 2012

हारे हुए पुरुष का हथियार है बलात्कार


उम्मीद है कि पल-पल बदलती गैगरेप की खबरों के शोर में आपको मुख्य आरोपी राम सिंह का बयान याद होगा. उसने बताया था कि अपंग होने के कारण वह इंफीरियॉरिटी कॉम्प्लेक्स का शिकार हो गया था. वह अपनी अपंगता का बदला हर किसी से लेना चाहता था. मैंने जीवन में कई रेप के मामले देखे हैं और उनमें से अधिकांश मामलों में इस घृणित कृत्य करने वाले को किसी न किसी रूप में कमजोर या इंफीरियॉरिटी कॉम्प्लेक्स का शिकार ही पाया है. अधिकांश रेप दमित इच्छाओं के कारण होते हैं. पुरुष खुद को प्रेम के काबिल नहीं पाता तो जबरदस्ती प्रेम और अंततः शरीर का सुख भोगना चाहता है. कई दफा वह अपने प्रिय पात्र को मिटा भी देना चाहता है, क्योंकि उससे लगता है कि वह कितनी भी कोशिश क्यों न कर ले, अपने प्रिय पात्र की आंखों में खुद के लिए वह आकांक्षा हासिल नहीं कर सकता. इसी संदर्भ में मुझे उपन्यास मैला आंचल का मशहूर किरदार बावन दास याद आता है. वह एक दफा एक कांग्रेस नेत्री के बदन के कपड़े को चिथड़ा-चिथडा कर देना चाहता था, जबकि वह उस स्त्री को माता के तौर पर देखा करता था. हालांकि तभी एक पल ऐसा गुजरा कि उसे अपनी सोच पर खुद ही घृणा का आभास हुआ, उसका इरादा बदल गया. मगर कितने लोग इरादे के इस चरम पर जाकर लौट पाते हैं, खास तौर पर जब सिर पर शराब सवार हो.
हालांकि हमेशा ऐसा ही नहीं होता है. रेप की घटनाएं दंगों में भी होती हैं, पुलिसिया या फौजी रेड के दौरान भी होती हैं. पुराने जमाने में फौजी आक्रमण के दौरान भी होती होंगी. मगर ऐसे मामलों में भी मुझे लगता है कि बलात्कार का अगुआ वही होता होगा जिसके जीवन में प्यार का अभाव होगा. जो खुद को कमजोर और हीन समझता होगा. ठेठ बोलचाल की भाषा में कहूं तो लड़कों की दो कैटोगरी होती है. अपनी जवानी के दिनों में हमने देखा था कि हम लोग उस कैटोगिरी में आते थे जिन्हें लगता था कि लड़कियों से दोस्ती हमारे किस्मत की बात नहीं है. कुछ लड़के ऐसे होते थे जो बहुत आसानी से लड़कियों से दोस्ती कर लेते थे. हम कभी सोचते और कभी उन्हें इग्नोर करने का नाटक करते. हमारे ही ग्रुप में ऐसे कई लोग थे, जिनमें लड़कियों से दोस्ती नहीं हो पाने की कुंठा गहराती चली जाती. उनकी कल्पनाएं अश्लील होने लगतीं. वे हर दोस्ती को प्रेम और हर प्रेम में सेक्स की संभावना तलाशते और गॉशिप करते. फिर धीरे-धीरे ब्लू फिल्मों की शरण में चले जाते. उनके लिए फिर दोस्ती और प्रेम का अस्तित्व मिट जाता. उनके मन में सिर्फ सेक्स बच जाता. इनमें से कुछ लोगों के साथ अगर कोई कुसंयोग बन जाता तो वे भी जबरन सेक्स कर सकते थे. हो सकता है कि जोर-जबरदस्ती नहीं कर पाते...
यह तो एक पहलू है. रेप का दूसरा सबसे बड़ा पहलू हाल के बरसों तक रहा है स्त्रियों के जरिये उनके पुरुषों को नीचा दिखाना. अपने देश के इतिहास में जौहर होता रहा है. युद्ध में पराजित पक्ष की औरतें खुदकुशी कर लेती थीं कि कहां विजेता पक्ष उन्हें दूषित न कर दे. विजेता पक्ष अपनी जीत की मुनादी के तौर पर सामूहिक बलात्कार का तांडव रचता. हमने हाल-हाल तक ऐसी घटनाएं देखी और सुनी है कि अगर किसी प्रेमी युगल ने भाग कर शादी कर ली तो प्रेमी की मां या बहन के साथ बलात्कार, उसे नंगा घुमाना आदि घटनाएं की जाती थीं. लड़की के बदले लड़की का कॉन्सेप्ट रहा है. जैसे स्त्री संपत्ति हो और उसके साथ संपर्क कर उसके स्वामी पुरुष से बदला लिया जा रहा हो. यह दौर तब चरम पर था जब स्त्रियों की अपनी कोई पहचान नहीं थी. मगर धीरे-धीरे जमाना बदला.
महिलाएं सामने आने लगीं. पुरुषों की जगह पर कब्जा करने लगीं. स्कूल, कॉलेज और दफ्तरों में न सिर्फ दिखने लगीं बल्कि पुरुषों को चुनौती देने लगीं. कक्षाओं में लड़कियां टॉप करतीं तो कहा जाता टीचर लड़कियों को अधिक नंबर दे देते हैं. दफ्तरों में भी लड़कियों के आगे बढ़ने को उसके रूप और बॉस के प्रति उसके झुकाव से देखा जाता. पराजित पुरुष अब उस स्त्री से बदला लेना चाह रहा है जिसने उसे उसकी महानता से च्युत कर दिया है. महज कुछ साल पहले तक स्त्रियां सिर्फ शहरों में मुकाबला कर रही थीं. अब गांवों में भी स्कूलों, अस्पतालों, आंगनबाड़ी केंद्रों और पंचायतों के संचालन में उनसे मौके छीन रही हैं. वह पति भी अपनी पत्नी को मिटा देना चाहता है जो बेरोजगार है और उसकी पत्नी स्कूलों में पढ़ा कर घर चलाने के लिए पैसे कमाती हैं. एक पत्रकार महिला का पति अपंग है और वह कोई कांम नहीं कर पाता. वह हर रोज अपनी पत्नी को शारिरिक तौर पर मिटाने की कोशिश करता है.
पुरुषों के लिए यह एक कठिन दौर है. उसे धीरे-धीरे अपनी सत्ता महिलाओं को सौंपनी है. सत्ता का हस्तांतरण इस तरह होना है कि प्रेम बरकरार रहे, परिवार जीवित रहे. बरसों से अदृश्य होकर दुनिया को संभाल रही औरतें अब अगुआ बनने जा रही हैं, हमें अब पार्श्व में जाना होगा. जैसे टीवी के एंकर और होते हैं और प्रोग्राम प्रोड्यूसर और. सामने दिखता एंकर ही है, प्रोड्यूसर गुमनाम रहकर सारा काम संभालता है. यह अवश्यंभावी है, बदलाव होकर रहेगा, औरतें आगे आकर सबकुछ संभालेंगी, पुरुषों को पार्श्व में रहकर उसकी मदद करनी होगी. मातृसत्तात्मक दौर भी आ सकता है. बदलाव के इस दौर में कई पुरुषों ने खुद को नयी भूमिका के लिए तैयार कर लिया है. वे अब स्त्रियों से तरीके से पेश आते हैं. उनकी बातों का सम्मान करते हैं, उनके गुस्से को जायज मानते हैं. खुद कई अधिकार उनके सामने पेश करते हैं और पार्श्व की भूमिकाएं संभालने के लिए तत्पर नजर आते हैं. चाहे वह किचेन की हो, बच्चे संभालने की हो या दफ्तर में महिला बॉस का कांम संभालने की. हमें बस में औऱतों के लिए सीट भी छोड़ना है और बस चलाने वाली औरतों को सैल्यूट भी करना है. अगर हम चूके तो मिट जायेंगे. हमसे गलतियां होंगी और हमें भरी अदालत में कहना पड़ेगा, हम कसूरवार हैं. हमें फांसी दे दो.

Monday, December 24, 2012

जागो, बढ़ो, दे दो फासी-जयंत सिन्हा


रविवार की शाम दिल्ली पुलिस ने जिन षडयंत्रकारी तरीकों से इस आंदोलन को तात्कालिक तौर पर खत्म करने की कोशिश की उसके मुताबिक आंदोलनकारियों के हुजूम में असामाजिक तत्व घुस आये थे. (हालांकि मीडिया में आयी तसवीर कुछ और ही बयां कर रही है. अगर लाठी पुलिस चला रही है तो पिटने वाले असामाजिक कैसे हो सकते हैं.) खैर जिन्हें लगता है कि यह अस्वभाविक आंदोलन दम तोड़ चुका है, उनका भ्रम आने वाले दिनों में टूटने वाला है. देश भर में फैले ऐसे ही युवाओं के हुजूम बहुत जल्द इस दमन के खिलाफ सड़कों पर उतरने वाला है. इसी मसले पर पढ़ें मित्र जयंत सिन्हा का आलेख -
दिल्ली गरम है तो क्यों न पूरे देश में प्रदर्शन का दौर शुरू किया जाए, अगर आप सरकार के भरोसे है तो कोई जरूरी नहीं कि बलात्कार के केस में सजा के नये तरीको का ईजाद करेगे मंत्री. बात सत्ता पक्ष की हो या विपक्ष की। पिछले दिनों मैने गौर किया कि किसी दल ने खुलकर बलात्कारी को सजा दिलाने की पहल नही की. आखिर क्यों ? ज्यादातर केस में मंत्री के पुत्रों और उनके सरंक्षण प्राप्त लोगों का उजागर होना देखा गया है. मित्रों अगर सरकार पर भरोसा करेगे तो छले जाओगे। जयप्रकाश बाबू को याद करो और अनवरत आन्दोलन को जारी रखो जबतक कि इसमें कोई नया अध्याय नहीं जुड़े। मसलन बलात्कारी को फांसी दिया जाना चाहिए, या उम्र कैद लेकिन सबसे जरूरी है न्यायलय प्रकिया में लेट-लतीफी को दूर करना होगा. लेट-लतीफी कैसे, किन कारणों से होती है यह जग जाहिर है.
अमूमन विरोध की शुरूआत सदैव शांतिपूर्ण आन्दोलन के रूप में जन्म लेती है परन्तु अब बहुत हुआ, आज दोपहर टीवी के लाइव प्रसारण में देखा कि आन्दोलनकारी छात्रों पर पुलिस ने डंडा घुमाना शुरू कर दिया. कुछ मेरे भाईयों ने पलटवार किया और उसी डंडे से पुलिस वालों की पिटाई कर दी. यानि इस घटना से पुलिसिया बर्बता को सामने लाने का प्रयास किया है. एक तरफ शीला दीक्षित चैनल के माध्यम से रोती है और दूसरे तरफ बच्चों पर डंडा चलवाकर सोनिया, राहुल, मनमोहन को आराम देना चाहती है. कहां है कानूनविद सलमान खुर्शीद, दिग्विजय, पाल सहित तथाकथित सरकार के बाडीर्गाड. मेरा मकसद हंगामा खड़ा करना नहीं मगर कोई पूछे की मंत्रियों के घरों में, उनके नातेदारों में क्या लड़कियां नहीं है. अगर है तो सभी को जेड सुरक्षा प्राप्त है. शिंदे साहब तुम्हारे घर अगर ऐसी वारदात हुई होती तो क्या करते?
ठीक दूसरी तरफ सवाल यह उठता है कि क्या केवल सरकारी मशीनरी ऐसे कुकृत्य को रोक पाने में सक्षम है, शायद नहीं. यह कुछ मनचलो का दिमागी फितरत नहीं वरन समूचे पुरूष प्रधान समाज की मानसिकता पर उठ रहा सवाल है. सड़क पर हुई घटना को सबने जाना परन्तु घरों के अन्दर चुप-चाप से किये जा रहे रेप. घरेलु वारदात से लड़की के तन नही उसके मन:स्थिति का भी रेप किया जाता रहा है कारण हमारी सामाजिक मर्यादा. मेरी राय में सामाजिक दोष को खत्म करना होगा. सती प्रथा की तरह इसे भी लेना होगा. यानि जिसने भी यह जघन्य अपराध किया उसका सामाजिक बहिष्कार किया जाए. उसके चेहरे को मीडिया के द्वारा प्रदर्शित किया जाए, ताकि कोई दूसरा ऐसे अपराध को अंजाम देने में संकोच करे.
अब रही बात आन्दोलन की तो भाईयों अपने खून को गरम होने दो, आन्दोलन को उग्र करो ताकि दमनकारी सरकार की नीद खुले, तुम्हारे आन्दोलन से कई बहनों-बेटियों की लाज बचेगी. मुझे पता है मेरी विवशता ही मुझे उग्रता के लिए उकसा रही है. निर्मल भारत के निर्माण के लिए बलात्कारी को फांसी दिया जाए. भारत के सभी राज्यों के स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय के छात्रों से अनुरोध है शैक्षणिक कार्य का बहिष्कार करो, बिना सरकारी सम्पत्ति को हानि पहुचाएं राज्य सरकार से केन्द्र सरकार को विवश कर दो की इस छुई-मुई जैसे कानून में बदलाव करके एक सख्त कानून बनाए.
मेरे आन्दोलन का उद्देश्य अस्मिता स्वाभिमान की लाज के लिए है. जिसमें एकतरफा न्याय किया जाना होगा. सावधान रहना होगा क्योकि बीच में कोई नेता, मंत्री भरोसा का पाठ जरूर पठाएगां जिससे की आन्दोलन को कमजोर किया जा सके या बन्द कर देना पड़े. बात महज एक बलात्कार की नहीं, इस तरह कि तमाम घटनाएं एक मिडिल मैन के घरवालों के साथ आए दिन होती है. किसी नेता, मंत्री के घरवालों के साथ नही. अफसोस होता है जब हर घटना के बाद मामूली-सी खानापूर्ति के बाद आजतक कुछ नहीं हुआ ( कुछ चर्चित घटनाओं को छोड़). जागो, और इस कदर जागो की जम्मू से कन्याकुमारी तक आन्दोलन का रंग दिखे. तुम्हारे अन्दर चली रहीं आत्ममंथन खत्म हो गयी, तो यह तेरा, यह मेरा का प्रश्न छोड़ो। तुम्हारी लड़ाई सरकार और समाज दोनों से है, एक तरफ कमजोर कानून तो दूसरी तरफ दोगला समाज. सोच लेना अगले निशाने पर तुम्हारे घर की बहने होगी़ और तुम़.

Sunday, December 23, 2012

कौन सिखायेगा हमें गुस्से को वोट में बदलना?


संचार क्रांति के इस दौर में भी सरकार को दिल्ली की गूंज ही सुनायी पड़ती है, यह निश्चित तौर पर गंभीर सवाल है. मगर सिर्फ इस बिना पर हम किसी आंदोलन को खारिज नहीं कर सकते. अगर सरकार को दिल्ली का उबाल ही समझ में आता है तो हमें दिल्ली जाकर ही उबलना पड़ेगा. अगर सरकार को यही दवा सूट कर रही है तो उसी दवा का डोज देना पड़ेगा. लोग इसे वीकेंड की भीड़ कह सकते हैं. यह है भी. हो सकता है सोमवार से भीड़ छटने लगे और उबाल घट जाये. मगर अगर सरकार ने कुछ सकारात्मक नहीं किया तो यही भीड़ दुबारा शनिवार को ज्यादा जोर-शोर से उमड़ेगी. अगर इतवारी क्रांति से व्यवस्था बदलेगी तो हमें इतवारी क्रांति का ही सहारा लेना पड़ेगा.
ठीक है यह मिडिल क्लास की भीड़ है और इसके पीछे मीडिया का हाइप है. गांव के लोग गांव में लड़ते-लड़ते मर जाते हैं और उनकी आवाज कोई सुनता तक नहीं. पर क्या इस वजह से इस आंदोलन को समर्थन नहीं दिया जाये? लोग यह भी कहेंगे कि यह इंडिया का आंदोलन है भारत का नहीं. सही है. आंदोलन के पीछे जो ताकत काम कर रही है, वह मल्टीनेशनल में काम करने वालों और मल्टीनेशनल के लिए मजदूर पैदा करने वाले संस्थानों से जुड़ी है. मगर यह भी तो सोचिये कि यह सवाल उस व्यवस्था और उस विकल्प पर भी है जो हमारे हुक्मरानों ने देश की परंपरा और गांवों की सोच को खारिज करके चुना है. अगर सरकार का खुद का बनाया हिंदुस्तान, मनमोहन सिंह द्वारा रचा गया इंडिया ही उससे परेशान है तो यह सुखद अहसास है. हर हालत में व्यवस्था ही खारिज हो रही है, लोग नहीं.
यह आंदोलन क्या चाहता है? शायद इसका सही जवाब किसी के पास नहीं. उनके पास भी नहीं जो दो दिनों से इंडिया गेट के पास डटे हैं. क्या वे बलात्कारियों के लिए फांसी की सजा मुकर्रर होने पर संतुष्ट हो जायेंगे? यह सवाल ठीक वैसा ही है जैसा अन्ना और अरविंद के पीछे जुटी भीड़ का सवाल था कि वे क्या जन लोकपाल लेकर संतुष्ट हो जाने वाले थे? नहीं, यह इतनी छोटी बात नहीं है. लोग नाराज हैं, नाखुश हैं और बदलाव चाहते हैं. लोग पूरी शासन प्रक्रिया में बदलाव चाहते हैं, प्रक्रिया से अधिक सोच में बदलाव चाहते हैं. निरंकुशता को खत्म करना चाहते हैं. लूटतंत्र से मुक्ति चाहते हैं. लोग एक साथ सबकुछ चाहते हैं.
लोगों को लग सकता है कि यह नारीवादी आंदोलन का स्वरूप है. कई महिला मित्र इसे इस रूप में देख रही हैं, मगर वे यह भूल जा रही हैं कि इस आंदोलन में निशाना पुरुषवादी सोच और पुरुष नहीं हैं. पुरुष तो इस आंदोलन में नारियों के साथ खड़े हैं और कंधे से कंधा मिलाकर नारे लगा रहे हैं. नुक्कड़ कर रहे हैं और पिट रहे हैं. यह आंदोलन सत्ता के खिलाफ है और सत्ता के खिलाफ चल रहे आंदोलनों की कड़ी है. लोगों में नाराजगी है क्योंकि इस मसले पर भी सरकार अपेक्षित संवेदना का प्रदर्शन नहीं कर पा रही है. क्यों नहीं कर रही यह अपने आप में सौ टके का सवाल है. सरकार ने शुरू से ही संवेदनहीनता का प्रदर्शन किया जिससे आंदोलन को आग मिली. अब कोई फैसला करने के बदले पुलिस को वाटर कैनन और टियर गैस के साथ भेज दिया ताकि आंदोलन और भड़के. कोई ऐसा है जो चाह रहा है कि आंदोलन और भड़के. खैर, यह तो अंदर की बात है.
मगर सरकार ऐसे आंदोलनों को कितना नोटिस करती है? बहुत पहले बिहार में लालू कहते थे कि कौन मीडिया. अखबार में जो छापना है छापो, मेरा भोटर अखबार नहीं पढ़ता. यह सरकार भी वही सोचती है कि उनका वोटर आजतक और जीटीवी नहीं देखता है. अगर देखता होता तो गुजरात में उसका सूपड़ा साफ हो गया होता और हिमाचल में सरकार बनाना नामुमकिन है. यह भी सच है. सड़क पर उतरे ये आंदोलनकारी क्या वोट डालेंगे,यह लाख टके का सवाल है. यह हुजूम जब नाराज होता है तो फेसबुक में स्टेटस बदल देता है. कुछ अधिक नाराज होता है तो इंडिया गेट पर पहुंच जाता है. मगर वोट डालते वक्त सोचता है कि यार एक दिन की तो छुट्टी है. दो घंटा वोट डालने में क्यों बरबाद किया जाये. किसी पुराने दोस्त से मुलाकात कर लिया जाये. कहीं घूम आयें. और नहीं तो थोड़ा सो ही लिया जाये. महानगरों के जीवन में आज कल अच्छी नींद भी तो विलासिता ही हो गयी है.
तो फिर कौन सिखायेगा कि गुस्से को वोट में बदलना चाहिये. क्या अन्ना, अरविंद या रामदेव सिखायेंगे. या कोई और. या फिर यह गुस्सा भी फेसबुकिया उबाल बनकर रह जायेगा?

Sunday, December 16, 2012

कैश सब्सिडी - बड़े धोखे हैं इस राह में

दिल्ली सरकार ने अन्न श्री योजना लागू कर कैश सब्सिडी पर छाये धुंध को साफ़ कर दिया है। अब तक लोग यही कह रहे थे कि सरकार राशन के बदले कैश नहीं देगी। मगर सरकार कैश सब्सिडी के नाम पर क्या और कैसे करेगी यह इस ताजा तरीन उदाहरण से जाहिर है। वह इसी तरह पूरे देश के गरीबों के खाते में 600 रुपये दाल देगी और कहेगी इससे सपरिवार पूरे महीने खा लो। पंचायतनामा का हमारा नया अंक संयोगवश इसी मुद्दे की पड़ताल कर रहा है। इसमें मेरा एक आलेख प्रकाशित हुआ है कि कैसे गरीब कैश सब्सिडी के बदले राशन प्रणाली में सुधार चाहते है। पूरा आलेख पढ़ें -
छोटी-छोटी चोरियों के कारण गांवों में बरसों से गरीबों को राशन और केरोसिन उपलब्ध करा रही जन वितरण प्रणाली की छवि नकारात्मक हो गयी है और इस प्रणाली की ऐसी छवि के कारण सरकार ने इन्हें बंद करवा कर लोगों के खाते में उनकी सब्सिडी एकमुश्त डलवा देने का फैसला कर लिया है. पहली नजर में तो इस भारी भरकम रकम के बारे में जान कर लोगों को लगता है कि इससे बेहतर कोई बात नहीं हो सकती, मगर जब वही लोग इस मसले पर गंभीरता से विचार करते हैं तो उन्हें लगता है कि लाख बुरा सही अपनी राशन दुकान ही बेहतर है, इसी व्यवस्था में सुधार लाया जाये तो उनके लिए बेहतर होगा. खाते में आने वाली रकम को लेकर उनके मन में कई आशंकाएं हैं. इन आशंकाओं ने मनरेगा के लिए काम करते हुए उनके मन में जगह बनायी है. यह सर्वविदित तथ्य है कि मनरेगा का पैसा कभी समय पर नहीं मिलता, राशन तो महीने के महीने मिल ही जाता है. अगर सब्सिडी का पैसा समय पर नहीं मिला तो भूखों मरने की नौबत आ जायेगी. इसके अलावा लोगों को यह भी लगता है कि सब्सिडी के पैसों का दुरुपयोग हो सकता है. लोग इस पैसे का इस्तेमाल उस काम में नहीं करेंगे जिसके लिए यह दिया जा रहा है. विशेष तौर पर महिलाएं मानती हैं कि पैसा मर्दो के नाम पर आयेगा और वे इसे दारू में या जुएं में फूंक डालेंगे. वहीं, बाजार की कीमतों ने हाल के वर्षो में इस कदर बेवफाई की है कि गरीब लोगों का खास तौर पर इस बात से भरोसा उठ गया है कि पैसों से जरूरत का हर सामान समय पर खरीदा जा सकता है. उन्हें लगता है कि जिस केरोसिन पर सब्सिडी उन्हें 30 रुपये की दर पर मिल रही है, वह किसी भी रोज 50 से 60 रुपये की दर पर उपलब्ध हो सकता है. ऐसे में उनका कैश बेकार साबित हो जायेगा. राशन दुकान की कीमतों का भरोसा है, मगर बाजार की कीमतों का कोई भरोसा नहीं है. इन्हीं वजहों से अधिकतर गरीब लोग चाहते हैं कि जन वितरण प्रणाली में ही अपेक्षित सुधार लाया जाये बनिस्पत कि सरकार सब्सिडी का पैसा उनके खाते में डाल दे. लोगों की राय जानने के लिए हाल ही में इससे संबंधित दो अध्ययन सामने आये, पहला जानेमाने अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज और रीतिका खेड़ा द्वारा किया गया अध्ययन है और दूसरा दिल्ली की संस्था रोजी रोजी अभियान का. इन सव्रेक्षणों से उपर बतायी गयी बातें पुख्ता तरीके से प्रमाणित होती हैं. इन दोनों अध्ययनों के मुताबिक गरीब लोग उनके अकाउंट में नकदी के हस्तांतरण के बदले अनाज पाना अधिक पसंद करते हैं. जबकि मुक्त बाजार के कई पैरोकार अर्थशास्त्री मानते हैं कि सरकार को भ्रष्ट जनवितरण प्रणाली से निजात पा लेना जरूरी है और इसका सबसे बेहतर उपाय नकदी हस्तांतरण की पद्धति को लागू करना है. हालांकि उनका यह नजरिया दूसरे मुल्कों के अनुभवों पर आधारित है, जबकि ये दोनों अध्ययन अपने देश के सबसे गरीब लोगों के बीच कराये गये हैं. देश के कई सामाजिक संगठनों और ग्रामीण क्षेत्र में कार्यरत संगठनों का मानना है कि छत्तीसगढ़ और आंध्रप्रदेश की तर्ज पर अगर जनवितरण प्रणाली को विकसित किया जाये तो यह ज्यादा बेहतर साबित हो सकता है.
द्रेज और खेड़ा का अध्ययन- द्रेज और खेड़ा ने आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, ओड़िशा, राजस्थान, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश राज्य के दो जिलों के दो-दो प्रखंडों के बीच यह सव्रेक्षण कराया. यह सव्रेक्षण में हर चयनित प्रखंड के छह गांवों के 12 परिवारों के बीच कराया गया, इस तरह इस अध्ययन में कुल 1227 गरीब और अंत्योदय योजना का लाभ ले रहे परिवार शामिल हुए. इन 106 गांवों में फैले परिवारों में से महज 18 फीसदी परिवार ने ही नकदी हस्तांतरण की योजना को पसंद किया, जबकि 67 फीसदी लोगों ने अपने राशन की दुकान से अनाज हासिल करने के विकल्प को पसंद किया. नकदी हस्तांतरण के विकल्प को पसंद करने वाले लोग ज्यादातर उन इलाकों के थे जहां जनवितरण प्रणाली ठीक से काम नहीं करती है. ये राज्य हैं बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश. जबकि जिन इलाकों में हाल के वर्षों में जनवितरण प्रणाली की प्रक्रिया में सकारात्मक बदलाव आया है वहां के लोग अपनी राशन दुकानों से ही राशन लेना चाहते हैं. आंध्र प्रदेश में ऐसा चाहने वालों की संख्या 91 फीसदी है, छत्तीसगढ़ में 90 फीसदी और ओड़िशा में 88 फीसदी है.द्रेज और खेड़ा के अध्ययन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि जनवितरण प्रणाली उन राज्यों में काफी बेहतर काम कर रही है जहां बाजार में अनाज की कीमत अधिक है और राशन दुकानों में कीमतें कम और राशन दुकानदार के साथ-साथ सरकार की राजनीतिक इच्छा ऐसी है कि अधिक से अधिक लोग राशन दुकान से लाभान्वित हो सकें. कई राज्यों में राशन की गड़बड़ियों को रोकने के लिए जीपीआरएस, जीपीएस, एसएमएस और बायोमीट्रिक प्रणाली का इस्तेमाल किया जा रहा है.
रोजी-रोटी अधिकार अभियान का अध्ययन- रोजी-रोटी अधिकार अभियान, दिल्ली जो 30 के करीब संस्थाओं का संगठन है ने दिल्ली सरकार द्वारा स्मार्ट कार्ड को लागू करते हुए पीडीएस प्रणाली को खत्म करने के सुझाव पर दिल्ली की झुग्गी-झोपड़ियों के 4005 घरों में सव्रेक्षण कराया. अध्ययन से नतीजे निकल कर आये कि कैश ट्रांसफर योजना को लागू करने से बेहतर जन वितरण प्रणाली में सुधार लाना होगा. 90 फीसदी उत्तरदाताओं ने जनवितरण प्रणाली में सुधार के विकल्प को पसंद किया, महज 5 फीसदी वोटरों ने कैश सब्सिडी के विकल्प को बेहतर बताया जबकि 3.6 फीसदी लोगों ने इस पर कोई राय जाहिर नहीं की. अंत्योदय पाने में यह संख्या कहीं और अधिक थी (91.7 फीसदी), बीपीएल परिवार (94.5 फीसदी) और एपीएल परिवार (90.1 फीसदी) ने जन वितरण प्रणाली की बेहतरी की वकालत की. सिर्फ 3.6 फीसदी बीपीएल परिवार, 7 फीसदी एपीएल परिवार और 5.8 फीसदी अंत्योदय का लाभ ले रहे परिवार ने कैश सब्सिडी के विकल्प को पसंद किया.
लाभार्थियों की होगी जेब ढीली!-झारखंड में राशन दुकानों पर मुख्यत: खाद्यान्न(चावल और गेहूं), केरोसिन और आयोडाइज्ड नमक मिलता है. जहां बीपीएल योजना और अंत्योदय अन्न योजना के तहत एक रुपये प्रति किलो की दर से 35 किलो चावल दिया जाता है, वहीं अतिरिक्त बीपीएल योजना के तहत इसी दर से 20 किलो अनाज दिया जाता है. अन्नपूर्णा योजना के तहत 10 किलो चावल मुफ्त वितरित किया जाता है. एपीएल परिवारों को 7.5 किलो चावल और 7.5 किलो गेहूं वितरित किया जाता है, जिसकी कीमत क्रमश: 9.21 रुपये और 6.88 रुपये प्रति किलो होती है. सभी बीपीएल परिवारों को एक किलो रिफाइंड आयोडाइज्ड नमक बांटा जाता है और उसकी कीमत 50 पैसे प्रति किलो की दर से ली जाती है. शहरी क्षेत्रों में 3 लीटर और ग्रामीण क्षेत्रों में 4 लीटर केरोसिन वितरित की जाती है. नयी योजना के तहत इनके बदले नकद राशि सीधे लाभार्थियों के खाते में जायेगी. इसके लिए यह तय किया जाना है या तय होगा कि इन खाद्यान्नों, नमक या केरोसिन को सरकार कितने पैसे में खरीदती है. सरकारी खरीद मूल्य में से लाभार्थियों द्वारा चुकायी गयी कीमत को घटाने के बाद जो कीमत बचती है वही सब्सिडी है, जिसे सरकार सीधे आपके खाते में डालने जा रही है. सरकार आपसे चाह रही है कि इन पैसों से आप अपनी जरूरत की इन तमाम सामग्रियों को खुद खरीद लें. मगर इस व्यवस्था में कुछ ऐसे सवाल हैं जो लाभार्थियों को परेशानी में डाल सकते हैं. पहला सवाल यह है कि सरकार चावल, गेहूं या नमक, केरोसिन का खरीद मूल्य जिसे मानती है वह बाजार मूल्य से काफी कम है. वह केरोसिन, नमक, चावल और गेहूं थोक कीमत पर खरीदती है. मगर उपभोक्ताओं को उसकी खुदरा कीमत चुकानी होगी. हम यह भली भांति जानते हैं कि महानगरों के थोक मूल्य और गांवों की दुकानों में खुदरा मूल्य में कितना अंतर हो सकता है. नमक का कोई पैकेट आज शायद ही दस रुपये प्रति किलो से कम बिकता हो. गांव के बाजार में शायद ही कहीं केरोसिन 30 रुपये प्रति लीटर से कम बिकता हो. इस तरह जितना पैसा आपको मिलेगा उसमें उतना सामान आप शायद ही खरीद पायें जितना आपको राशन की दुकानों में मिल जाता है. दूसरा सवाल यह है कि बाजार की कीमतों पर किसी सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है. बंपर पैदावार के बावजूद चावल और गेहूं की अनियंत्रित कीमतें किसी से छुपी नहीं हैं. केरोसिन किसी पंप पर बिकेगा नहीं जहां उसकी कीमत तय हो. खुले बाजार में यह 50 रुपये लीटर भी बिक सकता है. सरकार को तो केरोसिन थोक में 15 रुपये लीटर ही पड़ता हो सो सरकार आपको सब्सिडी के तौर पर इसके लिए शायद ही कोई पैसा दे. तीसरा सवाल यह है कि सब्सिडी कैश में आने से बाजार में मांग बढ़ेगी और उपलब्धता में कमी आयेगी. ऐसे में कीमतों में उछाल स्वभाविक है. इन तीनों वजहों से यह लगभग तय है कि लोगों को हर हाल में अधिक कीमत चुकानी पड़ेगी.

Sunday, December 02, 2012

हौसला बढ़ाता सुपर पॉजिटिव फौजी


आनंद (बदला हुआ नाम) से जब आप मिलेंगे तो लगेगा कि इससे अधिक सकारात्मक सोच का इंसान हो ही नहीं सकता. चेहरे पर मुस्कान, आंखों में उम्मीद और बातों में जोश, बहुत कुछ बदल देने की तमन्ना. क्यों न हो, आखिर वे झारखंड के पॉजिटिव लोगों के समूह के सचिव जो हैं. पॉजिटिव समूह के नेता को तो सुपर पॉजिटिव दिखना ही चाहिये. अपने दो अन्य सक्रिय साथियों के साथ आनंद इस नेटवर्क से जुड़े 3000 एचआइवी पीड़ितों के लिए उम्मीद और भरोसे का नाम बन गये हैं. एचआइवी की रिपोर्टिग के दौरान हमारी मुलाकात अनायास ही उनसे हो गयी. डेढ़ घंटे चली इस मुलाकात के बाद हमारा मानना था कि आनंद से अधिक सकारात्मक इंसान आम लोगों की दुनिया में भी गिने-चुने ही नजर आते हैं.
एचआइवी-एड्स रोगों के इतिहास में सबसे भीषण रोग माना जाता है. अगर किसी को पता चल जाये कि वह एचआइवी का शिकार हो चुका है तो वह एक झटके में घनघोर निराशा में डूब जाता है. उसे सामने मौत नजर आती है और अपने परिचितों की नजर में नफरत. किस्मत के मारे और समाज से ठुकराये ऐसे लोगों के लिए सबसे बड़ी चुनौती होती है सकारात्मक सोच के साथ जीवन जीना. मगर अधिकांश लोग इतने सौभाग्यशाली नहीं होते. ऐसे ही एक व्यक्ति हैं सतीश(बदला हुआ नाम). पिछले दिनों जब उन्हें पता चला कि वे एचआइवी से पीड़ित हैं तो सदमे में उन्हें पारालाइसिस का अटैक आ गया. पिछले कुछ दिनों से आनंद उन्हें अपने साथ ही लेकर घूम रहे हैं. आनंद की जिंदादिली और आसपास के लोगों के सकारात्मक बर्ताव को देखकर सतीश में काफी सुधार आया है. अब वे लोगों से बातचीत करते हैं. लकवे का शिकार उनका हाथ भी थोड़ा बहुत काम करने लगा है. आंनद के कारण सतीश जैसे सैकड़ों एचआइवी पीड़ितों के जीवन में सकारात्मक बदलाव आया है. उन लोगों की कहानियां सुनाते-सुनाते आनंद की आंखें नम हो जाती हैं. कहते हैं, अधिकांश एचआइवी पीड़ितों से उनकी पहली मुलाकात किसी अंधेरे कोने में होती है. वह कंबल में या किसी ओढ़ने में अपना शरीर छुपाए बैठा रहता है. अब तो अस्पताल में इस तरह बैठे लोगों को पहली नजर में देख कर ही उन्हें समझ में आ जाता है कि वह व्यक्ति जरूर एचआइवी पॉजिटिव होगा.
एक एचआइवी पीड़ित से इतना कहना कि देखो, मैं भी एचआइवी पीड़ित हूं. एचआइवी पीड़ित होने से दुनिया खत्म नहीं हो जाती. उसका आत्म विश्वास लौटाने के लिए काफी होता है. और आनंद के इस पहले संबोधन और उसके संसर्ग के कारण उन तमाम लोगों के जीवन में फिर से सवेरा आ गया है. मगर जीवन की उम्मीद जगाना ही सब कुछ नहीं है. आनंद कहते हैं कि हमारा समाज आज भी एचआइवी पीड़ितों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होता. अच्छे खासे हैसियत वाले एचआइवी पीड़ितों को भी घर के किसी कोने में, गुहाल में या गैराज में रहने की जगह दी जाती है. उनसे भेद-भाव किया जाता है. अगर एचआइवी पीड़ित विधवा हो तो उसे कई तरह की यंत्रणा भी दी जाती है. इसके अलावा रिश्तेदार उनकी सम्पत्ति हड़पने की भी कोशिश करते हैं. अनाथ बच्चों के मामले तो और भी दुखदायी है. स्कूलों में कोई उनसे बातें नहीं करता. घर में कोई उनकी देखभाल करने वाला नहीं होता. इसके अलावा इंश्योरेंश कंपनियों के एजेंट भी एचआइवी पीड़ितों का पैसा अटका लेते हैं. नेटवर्क की सबसे बड़ी जिम्मेदारी इन लोगों के लिए लड़ाई लड़ना है. एक फौजी होने के नाते आनंद इन लड़ाइयों में हमेशा आगे रहते हैं. वे बताते हैं कि पिछले दिनों गिरिडीह के राजधनवार में एक एचआइवी पीड़ित महिला को जिंदा जलाने की कोशिश की गयी, वहीं बोकारो के नवाडीह में पीड़ित महिला को निर्वस्त्र करने की कोशिश की गयी. इन मौकों पर वे झारखंड एड्स नियंत्रण सोसाइटी की टीम के साथ गये और इन महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित की.
आनंद हमेशा से इतने ऊर्जावान और उत्साही नहीं थे. एचआइवी ग्रस्त होने के बाद 5-6 साल तक उनका जीवन भी निराशा में डूबा हुआ था. वे बताते हैं कि 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान रक्तदान करते वक्त उन्हें पता चला था कि वे पॉजिटिव हैं. फिर उन्हें जबरन वीआरएस देकर घर भेज दिया गया कि उनकी शारीरिक स्थिति फौज में काम करने लायक नहीं रही. घर लौटकर आये तो खुद से ही शर्म आती थी, परिवार का सामना करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे. इस बीच थोड़ा-बहुत इलाज भी चलता रहा. 2005 में उनकी मुलाकात हजारीबाग में एड्स पीड़ितों की सेवा करने वाली सिस्टर ब्रीटो से हुई. इस मुलाकात के बाद उनका जीवन बदल गया. आनंद बताते हैं कि सिस्टर ने उन्हें अपने साथ जोड़ लिया और वे उनके साथ गांव-गांव जाकर लोगों को एड्स के बारे में जागरूक करने और एड्स पीड़ितों को परामर्श देने लगे. उनके सात दो अन्य एचआइवी पॉजिटिव एक पुरुष और एक महिला ने काम करना शुरू किया था. दूसरे रोगियों की हालत देखकर वे अपना गम भूलने लगे. इसी बीच वे झारखंड एड्स नियंत्रण सोसाइटी के संपर्क में आये. सोसाइटी के ही सहयोग से 18 मई 2006 को रांची में पॉजिटिव लोगों के नेटवर्क की स्थापना की गयी. पहली बैठक में 110 एचआइवी पॉजिटिव जमा हुए थे. फिर सात अन्य जिलों में जिला स्तरीय नेटवर्क की स्थापना की गयी.
2008 में आनंद ने एक पॉजिटिव विधवा युवती से विवाह किया और अभी दोनों एक साथ रांची में रहते हैं और दूसरे पीड़ितों की मदद करते हैं. वे राज्य के पहले एचआइवी पीड़ित हैं जिन्होंने विवाह किया है. उनके बाद राज्य में 9 पॉजिटिव जोड़ियों का विवाह हुआ है. आनंद अपनी पत्नी से काफी प्यार करते हैं, इसलिए संतानोत्पत्ति के लिए प्रयास नहीं करते. उन्हें लगता है कि गर्भावस्था के दौरान कहीं उनकी पत्नी की रोग प्रतिरोधक क्षमता घट न जाये.
आज उनकी जिंदगी इतनी व्यस्त हो गयी है कि उन्हें अपने रोग के बारे में भी सोचने का वक्त नहीं मिलता. हमेशा साथियों के दुख, उनकी असुविधाओं, उनके साथ होने वाले अन्याय और उनके जीवन के बारे में सोचते-सोचते ही उनका वक्त गुजरता है. पिछले 13 सालों से एचआइवी के साथ जी रहे आनंद कोई दवा नहीं लेते. वे मानते हैं कि उनकी सक्रियता और सकारात्मकता का ही कमाल है कि उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बिना किसी दवा के बढ़ रही है. वे कहते हैं कि इस रोग का कोई भरोसा नहीं, किसी भी दिन यह उन पर हावी हो सकता है. मगर आज तक वे पूरी तरह स्वस्थ हैं, लगातार सक्रिय हैं और दूसरों के लिए मददगार
(यह खबर पंचायतनामा के 3 दिसंबर के अंक में प्रकाशित हुयी है.)
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Sunday, November 25, 2012

मुस्कान बिखेरता बुजुर्गो का वालमार्ट


पिछले दिनों टीवी पर एक चाकलेट कंपनी का विज्ञापन काफी लोकप्रिय हुआ था. उस विज्ञापन की टैग लाइन थी, इस दीवाली आप किसे खुश करेंगे? भीषण महंगाई के इस जमाने में कितने लोगों ने इस दीवाली में दूसरों को खुश किया यह तो पता नहीं, मगर कोसी और मिथिला के बुजुर्गो ने 55 असहाय बुजुर्गो और महिलाओं के चेहरे पर मुस्कुराहट बिखेर दी. उन्होंने इन लोगों के बीच साड़ी और कंबंल का वितरण किया है. सबसे रोचक बात तो यह है कि ऐसा अनूठा काम करने वाले ये बुजुर्ग पैसे वाले लोग नहीं हैं. ये लोग सामान्यत: गरीब और निम्न मध्यवर्ग से आते हैं. इन्होंने इस कार्य के लिए अपने बजट में कटौती भी नहीं की है. बस त्योहार के मौके पर मिठाई की थोक खरीदारी की और इस वजह से जो पैसे बच गये उससे उन्होंने इस अनूठे काम को अंजाम दिया.
दीवाली के मौके पर इन बुजुर्गो ने जो मिसाल पेश की है यह उनके लिए कोई अनोखी बात नहीं. पिछले कुछ महीनों से इस इलाके के बुजुर्ग सामूहिक खरीदारी के फामरूलों से अपने लिए पैसे बचा रहे हैं और जब भी जरूरत महसूस हुई लोगों की मदद कर रहे हैं. उम्र के इस दौर में जब लोगों को युवा कंधों के सहारे की जरूरत होती है, ये बुजुर्ग पैसे बचाकर अपने परिवार के युवाओं के लिए ही मददगार साबित हो रहे हैं.
कोसी और मिथिला के तकरीबन 300 बुजुर्ग स्वयं सहायता समूह के चार हजार बुजुर्ग हर माह अपने-अपने गांव में बैठक कर घर में इस्तेमाल होने वाले सामान की सामूहिक सूची तैयार करते हैं. इस सूची में आम तौर पर सरसों तेल, आलू, प्याज, चीनी, चाय की पत्ती, साबुन आदि होते हैं. चूंकि हर परिवार इन सामग्रियों पर आम तौर पर दो सौ से एक हजार रुपये हर माह खर्च करता ही है, सो उन्होंने तय किया है कि हर गांव के बुजुर्ग ऐसी खरीदारी सामूहिक तौर पर करेंगे. इससे पैसे भी बचेंगे और वे कोई अच्छा काम भी कर पायेंगे. दरभंगा जिले के तारडीह प्रखंड के राजा खरवार गांव का शिव वृद्ध सहायता समूह भी पिछले महीने से इसी तरह घरेलू सामान की खरीदारी कर रहा है. समूह के अध्यक्ष राधा वल्लभ सिंह(76) बताते हैं कि आमतौर पर सरसों तेल गांव की दुकान में एक सौ दस रुपये किलो बिकता है, मगर जब इसे थोक में खरीदते हैं तो यह सौ रुपये से भी कम पड़ता है. गांव में 44 रुपये किलो बिकने वाली चीनी उनके समूह के लोगों को 38.50 रुपये पड़ती है. इसी तरह प्याज, आलू, साबुन और नमक में भी हम लोगों को अच्छी खासी बचत हो जाती है. समूह के सचिव राजेंद्र यादव(67) बताते हैं कि समूह के सदस्य बचत की पूरी राशि खुद नहीं रखते. बचत की आधी राशि समूह में ही छोड़ देते हैं ताकि जरूरत पड़ने पर समूह के किसी सदस्य की सहायता की जा सके या इच्छानुसार किसी असहाय की मदद की जाये. मधुबनी जिले के झंझारपुर प्रखंड के मदनपुर गांव के 9 बुजुर्ग स्वयं सहायता समूह दो-तीन महीने से इस तरह की खरीदारी कर रहे हैं. इन समूहों से जुड़े 116 बुजुर्गो ने इस तरीके से अब तक 10 हजार रुपयों की बचत कर डाली है. ये लोग हर पंद्रह दिन पर खरीदारी करते हैं और हर खरीदारी में हजार-डेढ़ हजार रुपयों की बचत कर लेते हैं. इस अभियान के पीछे देश भर में बुजुर्गो के लिए काम करने वाली संस्था हेल्प-एज इंडिया के कार्यकर्ताओं की बड़ी भूमिका है.
यह संस्था मधुबनी के झंझारपुर और सुपौल के करजाइन बाजार में पिछले तीन सालों से बुजुर्गो की बेहतरी के लिए काम कर रही है. इसके लिए उन्होंने इस इलाके में बुजुर्गो के स्वयं सहायता समूह बनाये हैं. संस्था के बिहार प्रमुख गिरीश चंद्र मिश्र बताते हैं कि उनकी संस्था ने बुजुर्गो की समस्या के समाधान के लिए स्वयं सहायता समूह की पद्धति को अपनाया है, क्योंकि उनका मानना है कि जब तक बुजुर्ग आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं होंगे उनकी समस्याओं का समाधान नहीं होगा. वे कहते हैं कि 2008 में महज चार साल पहले कोसी का इलाका भीषण बाढ़ की तबाही ङोल रहा था. इस तबाही से उबरना आसान नहीं था. पहले से ही काफी गरीब इस इलाके के लोग बाढ़ के बाद सपरिवार पलायन करने लगे. उनके जाने के बाद यहां बच गये उनके बूढ़े मां-बाप. किस्मत के हाथों मजबूर उनके बच्चों ने उन्हें भगवान भरोसे छोड़ दिया था. मगर अब इस इलाके के चार हजार बुजुर्ग सामूहिकता की भावना को अपनाकर एकमुश्त घर की जरूरत का सामान खरीदते हैं और इस तरह उनके काफी पैसे बच जाते हैं. इस पूरी प्रक्रिया पर प्रकाश डालते हुए हेल्प-एज इंडिया के झंझारपुर कार्यालय के प्रभारी बताते हैं कि बुजुर्ग स्वयं सहायता समूहों ने इस अनूठे उपाय की शुरुआत खुद की. यह योजना उनके द्वारा खुद बनायी गयी थी. शुरुआत चांद बिहार वृद्ध स्वयं सहायता समूह ने रमजान के महीने में की थी. समूह की 11 बुजुर्ग महिलाओं ने झंझारपुर बाजार से महीने के सामान की खरीदारी की और इससे उन्हें 12 फीसदी का मुनाफा हुआ. इसके बाद तो सिलसिला ही निकल पड़ा. अब आसपास के गांव के बुजुर्ग सहायता समूहों ने भी इस पद्धति को अपना लिया है.
यह खबर पंचायतनामा के 26 नवम्बर के अंक में प्रकाशित हुयी है.

Wednesday, October 31, 2012

बगैर विस्थापन सिचित हो गयी 10 लाख हेक्टेयर जमीन


सरकार यह मान कर चल रही है कि बगैर विस्थापन के बड़ी परियोजनाओं को आकार नहीं दिया जा सकता। अब इस योजना के कमाल को क्या कहा जाये जिसके तहत बगैर विस्थापन 10 लाख हेक्टेयर जमीन सिंचित हो गयी। भोपाल में विस्थापन के मुद्दे पर एक सेमिनार में भागीदारी के दौरान अपनी एक पुरानी स्टोरी याद आ गयी जो पंचायतनामा के मई माह के अंक में प्रकाशित हुयी है।
पिछले खरीफ में झारखंड के किसानों ने धान की रिकार्ड पैदावार की. सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस बार लगभग 65 लाख टन खाद्यान्न का उत्पादन हुआ है, इससे पहले खाद्यान्न का अधिकतम उत्पादन 35 लाख टन ही था. अलग राज्य बनने के बाद पहली बार ऐसा हुआ, जब झारखंड ने खाद्यान्न के मामले में न सिर्फ आत्मनिर्भरता हासिल की बल्कि हमारे पास अपने खर्चे के बाद भी इतना अनाज बचा रहेगा कि अगर इस खरीफ में पैदावार कम भी हुई तो हमें बाहर से अनाज मंगाने की जरूरत नहीं रहेगी.
किसानों की इस सफलता के पीछे जहां अच्छी बारिश को क्रेडिट दिया गया, वहीं राज्य सरकार ने समय पर खाद-बीज उपलब्ध कराने की अपनी योजना का जिक्र कर अपनी ही पीठ थपथपा ली थी. किसी का ध्यान इस ओर नहीं गया कि इस दौरान राज्य में मनरेगा के तहत एक लाख से अधिक कुएं और एक लाख दस हजार से अधिक तालाब खुद गये. इसके कारण राज्य की 10 लाख हेक्टेयर से अधिक जमीन को महज दो साल में सिंचाई की सुविधा हासिल हो गयी.
एक ऐसे राज्य में जहां कुल कृषि योग्य भूमि 29.74 लाख हेक्टेयर है और जहां हाल तक सिर्फ 7.4 लाख हेक्टेयर जमीन ही सिंचित है वहां यह कोई साधारण सफलता नहीं. इन आंकड़ों को देखने के बाद यह कहना गलत नहीं होगा कि झारखंड की हालिया हरित क्रांति के पीछे मनरेगा के कारण बनकर तैयार एक लाख से अधिक कुएं और एक लाख दस हजार से अधिक तालाबों का बड़ा योगदान है.
इन तालाबों ने न सिर्फ खाद्यान्न उत्पादन में हमें आत्म निर्भर बनाया बल्कि पूरे राज्य में सब्जी उत्पादन के कई पॉकेट्स बन गये जो सब्जी उत्पादन के नये रिकार्ड कायम कर रहे हैं. अब राज्य सरकार पर दबाव है कि वे इन सब्जी उत्पादकों के लिए कोल्ड स्टोरेज की चेन बनाये और फूड प्रोसेसिंग यूनिटों की स्थापना करे ताकि इनका अतिरिक्त उत्पादन बरबाद न हो और इन्हें पसीने के एक-एक बूंद की कीमत मिले.
एक लाख से अधिक कुएं और एक लाख दस हजार से अधिक तालाबों से जुड़े सवा दो लाख से अधिक सफल किसान खनिज उत्पादन के लिए मशहूर इस राज्य को खेती के मानचित्र पर स्थापित करने में जुटे हैं. मनरेगा के सौ दिन के रोजगार की योजना आज इनके लिए ईश्वरीय वरदान साबित हो रही है. इस सफलता के पीछे 13 लाख मजदूरों के मेहनत का बड़ा योगदान है.
इस बदलाव को केवल किसानों को उपलब्ध होने वाली सुविधा के रूप में और मजदूरों को मिलने वाली मजदूरी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. इसने विकास की बरसों पुरानी सोच को भी खारिज कर दिया है जिसके तहत माना जाता था कि बड़ी परियोजनाओं से ही बदलाव संभव है.
जैसे कि ऊपर बताया जा चुका है कि महज चार-पांच साल में पूरी होने वाली इस परियोजना से न एक घर उजड़ेगा और न ही कोई नदी असमय काल के गाल में समायेगी. पिछले चालीस साल से स्वर्णरेखा समेत कई बड़ी परियोजनाएं झारखंड में चल रही हैं. इसके कारण लाखों लोग विस्थापित होकर बदहाल हो गये हैं. मनरेगा के मसले में जितनी भ्रष्टाचार की चर्चा होती है उससे काफी अधिक भ्रष्टाचार इन परियोजनाओं के जरिये हुआ है. इसके बावजूद आज तक नहरों में पानी के दर्शन नहीं होते. जहां होते भी हैं वहां कुछ ही सालों में नहरें बेकार हो जाती हैं.
पिछले दशक से देश के पर्यावरणविदों ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि नहरों के बदले सिंचाई के परंपरागत साधन जैसे तालाब, आहर और कुएं ज्यादा बेहतर परिणाम दे सकते हैं. मगर इसे हमेशा पुरातनपंथी विचारधारा मान कर खारिज किया जाता रहा. इसके बदले नदी जोड़ो परियोजना जैसी अव्यवहारिक योजना को बढ़ावा दिया जाता रहा. मगर अब मनरेगा के बहाने इन परंपरागत उपायों की बहाली के सकारात्मक उपाय सामने आ रहे हैं.
देश के तमाम पर्यावरणविद अगर चाह भी लेते तो उनकी बातों का समर्थन करने वाले हजारों एनजीओ मिल कर यह काम एक पूरी सदी में नहीं कर पाते. मगर मनरेगा के कारण यह काम आज जमीन पर उतरा है. आज झारखंड ही नहीं पूरा भारत पर्यावरणविद अनुपम मिश्र की इस बात को समझ रहा है कि सचमुच आज भी खरे हैं तालाब. झारखंड के गांव-गांव में नये तालाब खुद रहे हैं और पुराने तालाबों में जान-फूंकने की कोशिश की जा रही है.
पेयजल एवं स्वच्छता विभाग तक पेयजल आपूर्ति के लिए अब पाइप आधारित परियोजना के साथ-साथ पुराने कुओं के जीणोंद्धार की योजना को मदद करने के लिए तैयार है. पंचायतनामा के साथ हुई बातचीत के दौरान विभाग के प्रधान सचिव सुधीर प्रसाद ने कहा कि ताजा जनगणना के आंकड़े बताते हैं, झारखंड के 36 फीसदी लोग आज भी कुएं का पानी पीना पसंद करते हैं. ऐसे में अगर कोई पंचायत अपने पुराने कुएं को पुनर्जीवित करना चाहती है तो योजना बनाकर हमारे पास भेजे. हम उन्हें इसके लिए आवश्यक धनराशि उपलब्ध करायेंगे. जब हर पंचायत में 50-50 कुएं खुद रहे हों तो भला पेयजल का संकट कैसे होगा. गांव की महिलाओं को दो-दो किलोमीटर दूर जाकर पानी लाने की परेशानी से भी मुक्ति मिलेगी.

Tuesday, October 16, 2012

प्रेम की आग और नाबालिग समाज


प्रेम की आग बड़ी भीषण होती है, इस पर जितना पानी डालो आग बुझती नहीं भड़कती ही है. मगर हमारा समाज जो खुद प्रेम के मामलों को हैंडिल करने में इतना नाबालिग है कि वह प्रेम की आग में पानी के बदले केरोसिन उढ़ेल देता है.
महज एक दशक पहले तक जब मैं युवा था, हमारे लिए प्रेम दूसरी दुनिया की चीज हुआ करती थी. हमारा समाज युवाओं के इस लहकते प्रेम से तकरीबन अनजान था. प्रेमी युगल फरार जैसी खबरें कोसी-मिथिला इलाकों में नहीं छपती थीं. यह रांची-पटना और टाटा जैसे शहरों की कहानी होती थी. मगर इक्कीसवीं सदी ने हमारे समाज को प्रेम की लपटों के करीब ला दिया है. समाज झुलसने लगा है.
जाहिर है संदर्भ मधुबनी की वह घटना है जिसमें एक किसान का बेटा एक अफसर की बेटी के साथ प्रेम कर बैठा और इसके बाद जो आग जली उसने न सिर्फ मधुबनी शहर बल्कि पूरे बिहार को झुलसा डाला. मुख्यमंत्री की सालों की मेहनत लगा एक पल में स्वाहा हो जायेगी. इससे पहले एक पत्रकार युवती की कहानी हम देख ही चुके हैं, जिसने खुदकुशी कर ली थी. कहने को ही वह कहानी महानगरीय थी, उसकी जड़ें कोसी और मिथिला के कछार में ही थी. पिता ज्योतिष की दुहाई दे रहे थे कि तुम्हारा राहु प्रबल है वह मस्तिष्क को स्थिर रहने नहीं दे रहा. ऐसे में कोई निर्णय नहीं लेना चाहिये. युवती राहू के क्षणिक आवेग से बचायी नहीं जा सकी.
भागलपुर के नाथनगर शहर की एक घटना भुलाये नहीं भूलती. एक युवती ने अपने मामा पर दुष्कर्म का आरोप लगाता हुआ एक पत्र अपने घर पर छोड़ दिया और लापता हो गयी. पत्र में उसने जान देने की सूचना छोड़ी थी. पूरा शहर इस चिट्ठी से उद्वेलित हो गया. रिश्तों के खत्म हो जाने की दुहाई दी गयी. मामा को तत्काल गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया. 15 दिनों बाद पता चला कि भांजी अपने प्रेमी के साथ दिल्ली में है. यह काम उसने लोगों का ध्यान भटकाने के लिए किया था. मधुबनी से गायब हुए किशोर ने भी कुछ ऐसी ही हरकत की. इन बच्चों का क्या किया जा सकता है?
किसको दोष दिया जाये? टीवी पर सपरिवार बिग बॉस देखने वाले हमारे समाज में आज भी शादी से पहले लड़की देखने का रिवाज नहीं है. जो देखते हैं उन पर नैतिक दबाव रहता है कि देख कर लड़की को न ठुकरायें वरना लड़की की शादी में परेशानी होगी. आप कहेंगे, दकियानूसी बातें कर रहा हूं. मगर कैसे प्रगतिशील हो जाऊं. पूरे समाज को हनुमान कूद लगाने कैसे कह दूं.
एक परिचित हैं, उनके बेटे ने जिद ठान ली कि शादी वह अपनी ममेरी बहन से ही करेगा. वरना जान दे देगा. बेबस होकर उनने बेटे की बात मान ली, अब एक तरह से पूरे समाज का अघोषित बहिष्कार ङोल रहे हैं. एक सज्जन ने बेटे के प्रेम विवाह को औपचारिक रूप दिया और कहा अंतजार्तीय विवाह समय की मांग है, वरना उनका समाज जेनेटिक बीमारियों से अकाल-कलवित हो जायेगा.
मगर इतनी समझ और हिम्मत किसमें है. जिस बेटी का बाप ए-ग्रेड का अधिकारी है, राजनेता है. वह तो पूरी ताकत झोंक देगा.
बच्चे डरते हैं अपने मां-बाप से प्रेम की बात करने में. इसलिए वे एक झटके में फैसला करते हैं. भाग चलें या जान दे दें. आप जब बिग बॉस देख रहे होते हैं तो उसकी घटनाओं पर चर्चा क्यों नहीं करते. बच्चों को समझाते क्यों नहीं, उनसे बातें क्यों नहीं करते, उनसे प्यार क्यों नहीं करते, उन्हें वक्त क्यों नहीं देते. बातें करेंग तब तो बतायेंगे कि पापा मुङो फलानां बाबू की बेटी अच्छी लगती है.
अच्छी लगने का मतलब हमेशा शादी कर लेना थोड़े ही होता है. अच्छी लगती है तो बातें करो, साथ खेलो, पढ़ो, घूमे, देखो-समझो.. फिर बताओ दोस्ती के लिए अच्छी लगती है या शादी के लिए. करीना और सैफ पांच साल साथ रहने के बाद शादी का फैसला करते हैं, मगर हमारे गांव के बच्चे दो बार नजर मिलते ही शादी का फैसला कर बैठते हैं. ये हालात कब बदलेंगे.

Saturday, September 29, 2012

दशरथ मांझी के गांव में सरकारी योजनाओं का हाल


दशरथ मांझी कभी गया के आसपास के लोगों के नायक हुआ करते थे, अब बिहार के सरकारी नायक हैं. पहाड़ काट कर रास्ता बना देने के उनके बेमिसाल कारनामे के कारण मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उनसे काफी प्रभावित थे. उनके गांव के लोग बताते हैं कि एक बार नीतीश ने उन्हें अपनी कुरसी पर बिठा दिया था और कहा था कि आज जो चाहे मांग लीजिये. तब भूमिहीन दशरथ मांझी ने शायद उनसे पांच एकड़ जमीन की मांग की थी, जो खुदा-न-खास्ता उनके जीते जी उन्हें सरकार दे नहीं पायी. हुक्मरानों का यही हाल है, वे अपने आप को दुनिया का मालिक मांगते हैं और हर चीज का वादा कर बैठते हैं. मगर वादा पूरा करना अफसरों का काम होता है और अफसर को गांधी जी की सुगंध मिली तो ठीक नहीं तो कानून बघारना शुरू कर देते हैं. खैर, जमीन नहीं मिली, हालांकि नीतीश कुमार ने उनके नाम पर महादलित युवक-युवतियों को रोजगारपरक प्रशिक्षण दिलाने के लिए एक योजना शुरू कर दी है, दशरथ मांझी कौशल विकास योजना. अब यह तथ्य भी सवालों के घेरे में है कि इस योजना के तहत कितने महादलित युवक-युवतियों का कौशल विकसित हुआ है, मगर दशरथ मांझी को सरकारी नायक बना देने से नीतीश अपनी पार्टी को जो राजनीतिक लाभ दिलाना चाहते हैं उसमें कुछ संभावना जरूर बनती है... खैर, मीडिया हस्तक्षेप के एक आयोजन के दौरान कई नये-पुराने साथियों के साथ दशरथ मांझी के गांव जाने और देखने का मौका मिला. वहां कई भ्रम टूटे...
सबसे पहले हमारी टोली गेहलौर के उस स्थान पर पहुंची जहां दशरथ मांझी ने अपने 22 साल के पागलपन(लोग उस वक्त यही कहते थे) की वजह पहाड़ को काट कर वजीरगंज और अतरी प्रखंड के बीच की 75 किमी की दूरी को घटाकर एक किमी कर दिया था. उस रास्ते पर सड़क बन चुकी थी और बगल में एक स्मारक भी. हमलोग दो गाड़ियों से थे, तकरीबन 25-30 लोग... हमारे पास दसेक कैमरे रहे होंगे, बांकी मोबाइल वाले कैमरे... जब इतने कैमरे एक साथ क्लिक-क्लिक का शोर मचाने लगे तो जाहिर सी बात है, आसपास के लोगों ने समझ लिया कि ये साधूजी(दशरथ मांझी) का कमाल देखने आये हैं. एक बुलंद आवाज वाली संभवतः मछुआरन(मछुआरनों के सशक्तिकरण का मैं बचपन से कायल रहा हूं) की आवाज अचानक गूंजने लगी, लोग बाग उसके चारो-ओर जमा हो गये. मैं दूर-दूर से ही उनका आख्यान सुनने लगा. ... साधू बाबा के मेहरारू का गगरी फंस के गिर गया तो उसी दिन ठान लिये कि पहाड़ को उख्खाड़ के फेंकिये देना है... मगर महिला दो दर्जन पत्रकारों के सवालों की बौछार में गड़बड़ाने लगीं. बाद में पता चला कि माताजी इस गांव की नहीं हैं, उन्हें तकरीबन उतनी ही जानकारी है जितनी हमें... आसपास के लोगों ने उनके अधजल गगरी छलक जाये वाले आचरण पर बकायदा मगही में उन्हें दोदना भी शुरू कर दिया... रहती हैं पटना में और कहती हैं गेहलौर की बात... जाइये-जाइये.
खैर हम लोग आगे बढ़ गये... दशरथ मांझी के गांव दशरथ नगर की तरफ. गेहलौर पंचायत है और दशरथ नगर गांव. दोनों के बीच सवा किमी का फासला है. दशरथ नगर नाम से कंफ्युजियाइयेगा नहीं. यह नाम सरकारी नहीं है... दशरथ नगर नाम गांव समाज के लोगों ने दिया था. पहाड़ काट देने के बाद दशरथ मांझी अपने इलाके के लिए कोई साधारण हस्ती नहीं रह गये थे. लिहाजा जहां बसे उस जगह का नाम लोगों ने दशरथ नगर रख दिया.
यहां आज भी तकरीबन 50 मुशहर(सरकारी भाषा में महादलित) परिवार रहते हैं, सभी दशरथ मांझी के सगे-संबंधी ही हैं. उनका इकलौता बेटा भागीरथ पांव जल जाने के कारण जो बचपन से चलने फिरने में संघर्ष करता है(विकलांग शब्द का ठीक विकल्प है न, अब लोग नाराज तो नहीं होंगे) सपरिवार रहता है. पत्नी, बेटी-दामाद और नाती-नातिन.... साधू बाबा अब नहीं रहे. गांव बिल्कुल वैसा ही है जैसी बिहार की कोई और मुशहर बस्ती हो सकती है. साधू बाबा के सरकारी नायक बन जाने के बावजूद इसकी सूरत नहीं बदली है, हालांकि लालू सरकार के टाइम से ही इस गांव के चेहरे पर सरकारी योजनाओं का पावडर लगाने की कोशिश चलती रही है. लालूजी के समय गांव में 35 इंदिरा आवास बंटे, मगर इनमें से अधिकतर आवास पड़ोसी जिला नालंदा के बौद्ध खंडहरों जैसे नजर आते हैं. अधिकांश मकान खाली पड़े हैं और लोग वहां कपड़े सुखाते हैं या पुआल रखते हैं, रहने का काम फूस की झोपड़ियों में करते हैं. दो हैंडपंप लगवा दिये गये हैं, मगर दोनों बिगड़ गये हैं लिहाजा लोग एक गंदे कुएं(तसवीर चस्पा है, देखकर आप अंदाजा लगा सकते हैं) का पानी पीते हैं. पहाड़ तोड़ कर रास्ता बना देने वाले इंसान के गांव में किसी को हैंडपंप सुधारना नहीं आता, अगर दशरथ मांझी कौशल विकास योजना के तहत इस गांव के दो युवकों को हैंडपंप सुधारना ही सिखा दिया जाता तो उस योजना की भी एक उपलब्धि होती. एक एनजीओ ने गांव में चार शौचालय भी बनवाये थे(तसवीर लगी है, देख कर सब समझा जा सकता है) मगर कोई उसके पैन में बने छेद में निशानेबाजी करने के लिए तैयार नहीं हुआ. लिहाजा महिला और पुरुष आज भी समभाव से खेतों को उर्वरक उपलब्ध करा रहे हैं. इन्हीं हालात में गांव के लोग यह बहुमूल्य जानकारी भी दे रहे थे कि साधू बाबा को साफ-सफाई से बहुत प्रेम था, इसी वजह से 25-30 साल पहले वे अपने चचेरे भाइयों को गेहलौर गांव में छोड़कर यहां आ बसे थे. इसी संदर्भ में यह सूचना भी दी गयी कि वे अंधविश्वास और नशाखोरी के खिलाफ भी थे.
अच्छा हुआ साधू बाबा गुजर गये, नहीं तो गांव का यह हाल देखते तो वापस गेहलौर लौट जाते. हो सकता है, उन्होंने अपने जीते-जी यह सब देख भी लिया हो...
गांव के लोग साधू बाबा की याद में बहुत कुछ करना चाहते हैं. उन्हें याद है कि साधू बाबा चाहते थे कि गेहलौर प्रखंड बन जाये, अब लोग उनके इस सपने को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. गेहलौर में साधू बाबा के नाम पर जो स्मारक बना है, वहां का पुजारी भागीरथ मांझी(बाबा के पुत्र) को बनाने की पूरी तैयारी है, कहते हैं, बेचारा चल फिर नहीं पाता है, मेहनत मजूरी कैसे करेगा. सरकार अगर वादा पूरा करते हुए पांच एकड़ जमीन दे देती तो इसका थोड़ा भला हो जाता. मगर कोई बात नहीं समाधि स्थल पर बैठेगा तो कुछ न कुछ चढ़ावा मिल ही जायेगा.
सरकार के खिलाफ लोगों में जबरदस्त गुस्सा है, गनीमत है कि रामविलास पासवान जी को यह सूचना नहीं मिली है. मुख्यमंत्री महोदय को तो सूचना मिलने का तो सवाल ही नहीं उठता, वे आजकल कान में ठेपी लगाकर राज करते हैं. खैर, यहां लोग चप्पल नहीं चलायेंगे इस बात की पूरी गारंटी है. (इस संबंध में एक खबर पंचायतनामा में भी प्रकाशित हुई है)

Friday, September 21, 2012

भूख से मौत की जिम्मेदारी किसकी


दो दिन पहले गया के एक गांव में भूख से हुई मौत के शिकार परिवार से मिलने का मौका मिला. परिवार और समाज के लोग तथा कई स्थानीय पत्रकार और बुद्धिजीवी मिलकर यह साबित नहीं कर पा रहे थे कि मौत भूख से हुई. पूरी सरकार इस सच को झूठ में बदलने के लिए जुटी थी. इससे पहले भी मुझे भूख से हुई मौत से जुड़े तीन-चार मामलों से सीधे जुड़ने का मौका मिला. हर बार यही हुआ. ऐसे में मेरी राय यही बनी है कि इस पूरे मामले में बेवजह मुख्य सचिव और दूसरे अधिकारियों को शामिल किया गया है. अगर सीधी जिम्मेदारी उन पर न हो जो उचित भी नहीं तो इसके समाधान की दिशा में कुछ सार्थक प्रयास हो सकते हैं.
राइट टू फूड अभियान के कारण देश में एक बड़ा फैसला हुआ था, जिसके तहत यह नियम बना था कि अगर देश में कहीं किसी की मौत भूख के कारण हुई तो इस घटना के लिए उक्त राज्य के मुख्य सचिव समेत सभी अधिकारियों को जिम्मेदार माना जायेगा. इसके बाद विभिन्न राज्य सरकारों ने अपने सूबे के गरीबों को सरकारी अनाज उपलब्ध कराने की कई योजनाओं का संचालन शुरू किया, हालांकि उन योजनाओं को लागू करने में कहीं न कहीं चूक रह ही जाती है और गरीब लोग भूख के कारण मारे जाते हैं.
मगर राइट टू फूड अभियान से जुड़े कार्यकर्ता हों, जमीनी पत्रकार हों या अन्य समाजसेवी. हम सभी अब जान चुके हैं कि मौजूदा हालात में भूख से हुई मौत के मामले को साबित कर पाना बहुत मुश्किल है. चुंकि इस मामले में मुख्य सचिव की गरदन फंसी होती है, वह हर तरह के हथकंडे अपनाता है जिससे साबित हो सके कि मौत का कारण भूूख नहीं था.
पहला सवाल तो पोस्टमार्टम का उठता है. आम तौर पर गांव के लोग किसी मौत के बाद पोस्ट मार्टम करवाने के बारे में नहीं सोचते. मरने वाला हिंदु हुआ तो आनन-फानन में फुंक जाता है, बांकी लोग दफना दिये जाते हैं. अगर कोई जानकार इनसान आसपास हो तभी वह मृतक के परिजनों को पोस्टमार्टम के लिए राजी कर पाता है.
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी कई झोल होते हैं. अगर मृतक के पेट में अनाज का एक दाना भी पड़ा मिल गया तो उसे भूख से मौत नहीं माना जाता. सरकार ने अब तक इस बात को नहीं माना है कि अगर चार रोटी खाने वाले को आधी रोटी मिले तो उसे भूखा ही कहना चाहिये. कई भूखे लोग तो खाना खाने के कारण भी मर जाते हैं. चार दिन की भूख के बाद अगर कुछ दिख गया तो उसे ही भकोसने लगते हैं. कमजोर शरीर उस अन्न को पचा पाने में नाकामयाब रहता है और मौत हो जाती है. मगर सरकारी और कानूनी परिभाषा है कि अगर आमाशय में अनाज का एक दाना या घर में एक किलो अनाज भी पाया गया तो मृतक की मौत भूख से हुई नहीं मानी जायेगी.
जब कोई बड़ा अधिकारी खास तौर पर मुख्य सचिव स्तर का अधिकारी फंस रहा हो तो जाहिर है उसे बचाने के लिए कोई उसकी झोपड़ी में या उसके आमाशय में अनाज का दाना डाल सके. खैर..
यह सब कानूनी दांव-पेंच हैं. भूख से हुई मौत के साबित न हो पाने की एक बड़ी वजह यह है कि यह साबित होने पर मुख्य सचिव की गरदन फंसती है. अगर इस मसले पर थोड़ा समझदारी से विचार किया जाये तो क्या यह उचित है कि भूख से हुई हर मौत का जिम्मेदार मुख्य सचिव को माना जाये. पटना-रांची और भोपाल में बैठा अधिकारी सैकड़ों किमी दूर किसी गांव में रह रहे गरीब की मौत का जिम्मेदार तभी हो सकता है जब उसने किसी योजना के लिए फंड या अनाज जारी करने में कोई आनाकानी की हो. उसी तरह जिले का अधिकारी और प्रखंड का अधिकारी भी अपनी तरफ से तभी जिम्मेदार हो सकता है जब उसने गरीबों की मददगार योजनाओं के लागू होने में कोई बाधा खड़ी की हो. मगर उसके गांव का पंचायत सचिव, मुखिया, उसका वार्ड सदस्य, आंगनबाड़ी सेविका, आसा आदि लोग जो उस व्यक्ति को सीधे तौर पर जानते हैं, इस मौत के असली जिम्मेदार होने चाहिये. भूख से होने वाली मौतों को रोकने की जिम्मेदारी जब तक इन पर नहीं दी गयी तब तक मौते होती रहेंगी.
इन लोगों के जिम्मे कई सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन का अधिकार होता है. मुखिया के पास आपात स्थिति में बांटे जाने लायक अनाज भी होता है. उसे अपने वार्ड सदस्यों के माध्यम से यह पता लगाते रहना पड़ेगा कि क्या गांव में कोई ऐसा व्यक्ति है जो भूख से जूझ रहा है और उसे मदद करना उचित होगा. फिर उस वार्ड और आस-पास के लोगों की राय लेकर उसे मदद करना पड़ेगा.
वरना मुखियाजी तो यही सोचते हैं सचिव महोदय का मामला है, वे अपनी गरदन बचायेंगे तो हमारी गरदन भी बच जायेगी.

Tuesday, September 11, 2012

हीरो न बनायें..असीम ने सीमा तोड़ी है..


कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी की बात करते वक्त चाहे-अनचाहे ओम्कारेश्वर के वे सत्याग्रही याद आ जाते हैं जो पिछले एक पखवाड़े से अधिक वक्त से पानी में बैठे अपनी जमीन के लिए संघर्ष कर रहे हैं. बांध की ऊंचाई बढ़ा दिये जाने के कारण इनके गांव के अस्तित्व पर खतरा उत्पन्न हो गया था. राज्य सरकार ने बांध की ऊंचाई कम करने का आश्वासन दिया है, इसके बावजूद लोगों को भरोसा नहीं है कि सरकार इतनी जल्दी उनके पक्ष में हो जायेगी और बिजली उत्पादन कंपनी के खिलाफ फैसले दे देगी. मगर इसके बावजूद वे चुपचाप रोज पानी में बैठ जाते हैं. उनके पांवों में पाको(पानी में ज्यादा देर तक बैठने के कारण होने वाला रोग) लग चुका है. मगर उनके नारों में क्रूर सरकारों के खिलाफ बददुआ तक नहीं निकलती. यह ठेठ गांव वालों का विरोध है, यह गांधीवाद नहीं है. गांधी जी ने जरूर इनसे अहिंसक विद्रोह के ये नायाब तरीके सीखे होंगे.
असीम के पक्ष में दर्जनों पोस्ट लिखे गये होंगे. क्योंकि सरकार अगर एक कार्टूनिस्ट को देशद्रोही करार देती है तो स्वभाविक तौर पर लोगों का गुस्सा भड़केगा. पता नहीं सरकार ने ऐसी बेवकूफी क्यों की, लगता है सरकार के भीतर एक धड़ा काम कर रहा है जो गाहे-बगाहे सरकार को इस तरह की परेशानियों में डालकर चुपचाप मजे लेता है. निश्चित तौर असीम देशद्रोही नहीं हैं, मगर उन्होंने सीमा जरूर पार की है. असीम ने यह सब या तो मानसिक दीवालियापन के तहत किया है या अतिरेक में आकर.
इंडिया अगेंस्ट करप्शन का आंदोलन भी इन्हीं सस्तेपनों के कारण असफल हुआ. आंदोलनकारी मुद्दे पर चोट नहीं कर पाये. खुद गांधीवादी अन्ना हजारे आंदोलन के रचनात्मक और अहिंसात्मक तरीकों की तलाश नहीं कर पाये. आशा है उन्होंने ओंकारेश्वर वाला आंदोलन देखा होगा और उस मौन विरोध की ताकत तो महसूस किया होगा.
असीम की भावनाएं गलत नहीं है, मगर अगर आप आंदोलन का नेतृत्व करना चाहते हैं तो छिछोरापन आपके लिए जहर है.असीम ने अपनी सीमा का अतिक्रमण किस तरह किया है उसके उदाहरण स्वरूप मैं कार्टून अगेंस्ट करप्शन की साइट से उनके बनाये कुछ कार्टून यहां लगा रहा हूं. ये कार्टून सिर्फ इस बात का इशारा करते हैं कि एक योद्धा किस तरह आपा खो बैठता है और ऊल-जुलूल हरकतें करने लगता है.
कई साथियों ने पाश और दूसरे कवियों की कविताओं के उदाहरण पेश करते हुए यह समझाने की कोशिश की है कि जब हालात हद से बाहर हो जाते हैं तो विरोध भी उसी स्तर का हो जाता है. एक तो व्यक्तिगत तौर पर मैं इस बात से सहमत नहीं कि शोषक के विरोध के लिए शोषक की भाषा अपना ली जाये. अगर ऐसा है भी तो धूमिल और राजकमल चौधरी जैसे कवियों ने भी अपनी विरोध की भाषा को इस कदर स्खलित नहीं होने दिया कि उनकी कविता और शराबी के आत्मालाप में फर्क न रहे. ऐसे में एक ही अनुरोध है असीम को हीरो न बनायें..

Wednesday, September 05, 2012

ठेट गंवई आन्दोलन है यह जल सत्याग्रह


ओम्कारेश्वर बांध के खिलाफ वहां के लोग १३ दिनों से जल सत्याग्रह कर रहे है... उनका पुनर्वास किये बगैर बांध से पानी छोड़ दिया गया है... बांध की ऊँचाई भी बढ़ायी जा रही है... इस आन्दोलन के समर्थ में भोपाल में भी समाजसेवी टंकियों में खड़े होने की योजना बना रहे है.. मगर इस आन्दोलन को न सरकार नोटिस कर रही है न ही मीडिया ... पेश है इस अनूठे आन्दोलन की तस्वीरें.. इस आन्दोलन की सबसे बड़ी खासियत है कि यह ठेट गंवई आन्दोलन है... यह साफ करता है कि गाँव के लोग परंपरागत तरीके से किसी अन्याय का विरोध कैसे करते हैं...

Monday, September 03, 2012

आज नहीं अज्जो बानों


‘‘साजन मेरा उस पार है मिलने को दिल बेकरार है़.... परदेशी परदेशी जाना नहीं.... मुझे छोड़ क़े़... ज़ैसे कर्णप्रिय गाने अक्सर भारतीय रेल से सफर के दौरान सुने होगे. गाना, गाने का अंदाज, गाने वाले, कभी कौतुहल का विषय हुआ करते थे, आज गाना गायब, अंदाज बदला, बकसीस के जगह जबरन वसूली करके हमें लूटते हिजरे... कुछ इस तरह से मेरी मुलाकात आज ठाकरे नाम के हिजरे से हुई, आइए सुने आज ने कैसे उठाए अपने राज के पर्दे
-मेरा नाम आज ठाकरे उर्फ अज्जो
-उम्र वसूली लायक है यानि जवानी जिन्दाबाद
-आपका घर मतलब की स्थायी ठिकाना तो होगा ?
-है न, अपुन मुम्बई की हूँ
-आप किस तरह से इस धंधे में आयी ?
- देखो साहब अपुन का धंधा ज्यादा इच पुराना नहीं.. वो क्या बोलो़, अभी हमारा चचाजान इस धंधे का शेर हुआ करता था.. आज अपुन लोग उसको आगे ले जाने का क्यो, बराबर बोला ना़...
-चचाजान से मतलब कुछ समझा नही ?
-अरे बाबा बोला ना़... चचाजान अभी बुढ़ा हो गया है उसको अपुन ने बोल दिया इधर इच कुर्सी पे बैठने का़... अपुन के जवानी के दिन है क्या़... दुसरे स्टाइल से धंधा करेग़े़...
-रज्जो तुम्हारी इनकम कितनी हो जाती है ?
-अभी क्या बोलूं पहले अपुन लोग केवल दुसरों की खुशियों में जाते थे, धीरे-धीरे महंगाई बढ़ती गई, आपको मालूम कि अपुन ने सरकारी, प्राइवेट नौकरी तो की नहीं की पगार मिले सो हमने अब पेट को भरने के लिए मौके अपने आप बना लेते है, बस रोटी चलनी चाहिए
-अभी हाल के मुम्बई चुनाव में आपने कैसे जीत हासिल किया ?
-अरे बाबा तुम खाली फोकट की बात करते हो़, हिजरो के आगे कोई चुनाव लड़ने आएगा क्या ? हमारा अपना पार्टी है, पार्टी के प्रति हमारा समाज वफादार है...
-बिहारीयों से मनमुटाव का कोई खास कारण है ?
-बिहारी सा.. होते काफी मेहनती. अपुन लोगों को हफ्ता देने में काफी चिकचिक किया करते हैं.. यही बिहारी अपने गांव जाकर सोहर गवाते है रूप्या पैसा खर्च करते है जब हम लोग मांगते है तो नाक भौ सिकोरते है, आखिर अपुन लोग कहां जायेंगे. आज बिहारी हफ्ता नहीं देगा कल यूपी वाला, परसो बंगाली, नरसो गुजराती फिर अपुन लोग का बंटाधार हो जाएगा. अपुन लोग क्या मांगते कुछ कमाई का हिस्सा हिजरों पर खर्च करो फिर मौज से रहो. -तो बिहारीयों से इतना डरना आखिर क्यों ?
- तुमने सुना नही क्या एक बिहारी सब पऱ.....
- अन्त मे आप कुछ कहना चाहेगे ?
-अन्त, शुरू, धर्म, कुछ भी मायने नही रखता बस हमें किसी हाल में रूप्या चाहिए. हमने स्ट्रगल किया है यानि काफी कठीनाई से इस मुकाम तक पहुंचे है, दरवाजे-दरवाजे नाचना अब अच्छा नहीं लगता, धंधा तो वही पर अंदाज राजनीति का. यही हमारी पावर है... बात अलग है कि दिल्ली अभी दूर है.
जयंत सिन्हा

Thursday, August 30, 2012

अफसोस ! कोयला खदानों में विजन नहीं मिलता


भ्रष्ट होना उतना बुरा नहीं है जितना विजन विहीन होना. कई बार हमारे शासक की सोच चुनाव खर्च जुटाने और जनता को बेवकूफ बनाने तक ही सीमित हो जाती है. जनता के पैसों और देश के संसाधनों के बदले अपनी झोली और पार्टी की थैली भर लेने के चक्कर में ही कोल-गेट जैसे घोटाले हो जाते हैं. फिर पूरा शासन तंत्र थेथरई में जुट जाता है, क्योंकि उन्हें न सिर्फ अपनी इमानदारी साबित करनी होती है बल्कि अगले चुनाव के लिए वोट मांगने लायक इमेज भी बचा कर रखना पड़ता है. हालांकि इन कोशिशों में सरकार इस कदर दंभ में डूब जाती है कि वह दिन को रात और रात को दिन साबित करने में जुट जाती है. उनके पीछे ऐसे लोगों का हुजूम होता है जो दिन को रात कहने के बजाय अमावस की रात कहने तक में नहीं शर्माता. मगर नतीजा आखिरकार जनता को भुगतना पड़ता है, क्योंकि उसने व्यावहारिक लाचारी के कारण ऐसी सरकार को चुन लिया है जिसमें हर कमी से बढ़कर विजन की भारी कमी है.
जहां तक हम सबकी आम समझ है और खुद सरकार का भी दावा है कि कोल ब्लाक के इस हड़बड़-गड़बड़ आवंटन के पीछे ऊर्जा क्षेत्र की कहानी है. देश में ऊर्जा का भारी संकट है और सरकार इस संकट का व्यापार करना चाहती है. इससे पहले सरकार एक बार और परमाणु ऊर्जा की खातिर सरकार को संकट में डाल चुकी है. हालांकि उस संकट से उबरने का आत्म विश्वास ही सरकार के मौजूदा दंभ का कारण है कि वह विपक्ष और जनांदोलनों के साथ-साथ जनता को भी जूते के नीचे रखने से गुरेज नहीं करती. ऊर्जा के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों का अनुचित दोहन और आम लोगों की सुरक्षा को ताक पर रखना हर सरकार के लिए आम बात है और यह एक पुरानी सरकारी परंपरा है. जल- विद्युत और सिंचाई के नाम पर करोड़ों लोगों को विस्थापित करने और नदियों को डस्टबिन में बदल देने के बाद भी सरकारें यह मानने को तैयार नहीं हैं कि वह तरीका गलत है. मध्यप्रदेश के ओम्कारेश्वर में आज भी विस्थापन के शिकार लोग जल सत्याग्रह कर रहे हैं, मीडिया की नींद में खलल डाले बगैर. साथ ही यह भी एक महत्वपूर्ण सूचना है कि झारखंड में एक भी व्यक्ति को विस्थापित किये पिछले दो साल में बगैर 3 लाख हेक्टेयर जमीन की सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो गयी है, यह सब सिर्फ मनरेगा के पैसे से तालाब और कुआं खुदवाकर मुमकिन हुआ है. इसके बावजूद अगर सरकार को पता चल जाये कि सुवर्णरेखा या अजय नदी पर कहीं बांध बनवाने से 20 मेगावाट बिजली का उत्पादन हो जायेगा तो सरकार सबसे पहले उस योजना को लागू कराने में जुट जायेगी.
कोल ब्लाकों के इस आवंटन से सबसे बड़ा नुकसान होना अभी बांकी है. इन 245 कोल ब्लाकों में जब उत्पादन शुरू होगा तो बड़े पैमाने पर गरीब आदिवासियों का विस्थापन होगा. फिर उन खदानों से जो कोयला निकलेगा वह भट्टियों मे जाकर अपने साथ धरती को गर्म करेगा और आसमान में कार्बन फैलायेगा. वे ताप विद्युत संयंत्र जहां यह कोयला जलाया जायेगा अपने आसपास की नदियों में कचड़ा बहायेंगे और उस नदी का तो सत्यानाश होगा ही नजदीकी इलाकों के लोग कैंसर की चपेट में आकर असमय कालकलवित होंगे. इतनी कुरबानियों के बाद हमारे घर में रोशनी आयेगी. हमारे टीवी-फ्रिज-एसी-कंप्यूटर और मोबाइल अनादिकाल तक जीवित रह पायेंगे.
क्या यह विजन की कमी नहीं है? क्या यह ठीक वैसा ही नहीं है जैसा हमने पिछली शताब्दी में अपनी नदियों और उनके किनारे रहने वाले करोड़ों गरीबों के साथ किया और नयी सदी में पता चला कि यह सब कुओं और तालाबों से भी मुमकिन है. क्या हम आज भी इस बात से अवगत नहीं कि अगर हर छत पर सोलर प्लेट और हर शौचालय में बायोगैस प्लांट लगा हो तो इतने बड़े पैमाने पर योजनागत नरसंहार की जरूरत नहीं. धरती को कुछ साल और हरा-भरा रहने और हमें बिना आक्सीजन खरीदे जीवित रहने की इजाजत मिल सकती है.
हाल ही में हमारी इसी जनोन्मुखी सरकार ने बीपीएल परिवारों के लिए 75 हजार का इंदिरा आवास और साथ में 10 हजार के शौचालय के कॉम्बो पैक देने की घोषणा की है. 85 हजार के इस प्रोजेक्ट में अगर 15 हजार और जोड़ दिये जायें तो रूफ-टाप सोलर सिस्टम और बायोगैस प्लांट की सुविधा बड़ी आसानी से उपलब्ध हो जायेगी. इस एक सुधार के कारण देश की लगभग एक तिहायी आबादी ऊर्जा के लिए सरकार, नदियों, कोल-ब्लाक या परमाणु की मोहताज नहीं रहेगी. सरकार भी घपलों, घोटालों, हंगामों और आम जनती की तबाही के पाप से बच जायेगी.
मगर हर हाल में विजन बड़ा फैक्टर है और इसका अभाव किसी और चीज से पूरा नहीं किया जा सकता. जब सरकार यह सोच ले कि जब तक हमारी पार्टी के सिर पर गांधी परिवार का हाथ है तब तक हम सोचने में ऊर्जा व्यय करने से मुक्त हैं तो फिर किसी चीज का कोई इलाज नहीं है. रोशनी के नाम पर घोटाले-घपले होंगे, फिर झूठ को सच और रात को दिन साबित करने की थेथरई होगी. गलत फैसलों के कारण जनता त्रहिमाम करती रहेगी और लाचार हालत में सरकार को और खुद अपने नसीब को कोसती रहेगी.

Wednesday, August 29, 2012

ओम्कारेश्वर में जल सत्याग्रह


साथी प्रशांत दुबे ने यह खबर फेसबुक पर चस्पा की है...
250 महिला पुरुष निरंतर पानी में
ओम्कारेश्वर बांध में पानी बढाने पर बांध प्रभावित लगभग 250 महिला पुरुषों ने पानी में जल सत्याग्रह प्रारंभ कर दिया. उल्लेखनीय है कि वर्तमान में ओम्कारेश्वर बांध का जल स्तर 189 मीटर रहा है. हजारों ओम्कारेश्वर बांध प्रभावितों का पुनर्वास न होने के बावजूद गत दिनों राज्य सरकार द्वारा बांध में 193 मीटर तक पानी भरने कि घोषणा कि गयी थी. इस घोषणा के खिलाफ ओम्कारेश्वर बांध के डूब के गाँव घोगाल्गाँव में प्रभावित गत 16 जुलाई से निरंतर सत्याग्रह इस संकल्प के साथ चला रहे है कि वो पानी बढाने पर पानी में डूबने को तैयार हैं पर पानी नहीं बढने देंगे. कल देर शाम जब बांध में जल स्तर करीब 1.5 मीटर बढ़ा दिया गया तो लगभग 250 महिला पुरुषो ने पानी में उतर कर जल सत्याग्रह प्रारंभ कर दिया.
बिना पुनर्वास डुबो कर भगाने का विरोध
उल्लेखनीय है कि ओम्कारेश्वर बांध प्रभावितों के बारे में पहले उच्च न्यायालय ने और फिर सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेशों में स्पष्ट रूप से कहा है कि प्रभावितों के लिए बनी पुनर्वास नीति का पालन नहीं किया गया है. इन आदेशों के आधार पर प्रभावितों द्वारा शिकायत निवारण प्राधिकरण में जमीन के दावे लगाने पर प्राधिकरण ने भी स्पष्ट आदेश दिए हैं कि पुनर्वास नीति का पालन नहीं हुआ है और सभी प्रभावितों को जमीन के बदले जमीन दी जाये. यह भी उल्लेखनीय है कि सर्वोच्च न्यायालय के ओम्कारेश्वर बांध के आदेश के अनुसार यह पुनर्वास बांध निर्माण के पहले हो जाना चाहिए एवं सर्वोच्च न्यायालय के अन्य अनेक आदेशों के अनुसार प्रभावितों का पुनर्वास डूब लाने के 6 माह पूर्व पूरा होना जरूरी है. अतः सरकार इन सभी आदेशों का खुला उल्लंघन कर प्रभावितों का पुनर्वास करने के स्थान पर उन्हें डुबोकर बिना पुनर्वास भगाना चाहती है. प्रभावितों ने चुनौती दी है कि वो इसे किसी भी हालत में स्वीकार नहीं करेंगे, वो डूबने को तैयार है पर बिना अधिकार लिए नहीं हटेंगे.
बांध में पानी कम कर सभी प्रभावितों का पुनर्वास किया जाये
जल सत्याग्रह कर रहे सैकड़ो महिला पुरुषों एवं उनके साथ बैठे हजारों प्रभावितों कि मांग है कि ओम्कारेश्वर बांध में जल स्तर वापस 189 मीटर लाया जाये और सभी प्रभावितों को जमीन के बदले जमीन एवं अन्य पुनर्वास के अधिकार देकर पुनर्वास किया जाये. जल सत्याग्रह में ग्राम घोघल्गाँव की नीलाबाई, सुरेश पटेल, ग्राम कामनखेडा की सकुबाई, गिरिजाबाई, ग्राम टोकी के अंतरसिंह, संतोषबाई, ग्राम एखंड की नानीबाई, कैलाश राव आदि के साथ नर्मदा आन्दोलन की वरिष्ठ कार्यकर्ता सुश्री चित्तरूपा पालित एवं अन्य लगभग 250 महिला पुरुष पानी में निरंतर सत्याग्रह कर रहे हैं इन सत्याग्रहियों के साथ लगभग 3000 महिला पुरुष धरने पर बैठे है. नर्मदा आन्दोलन सरकार को चेतावनी देता है कि यदि तत्काल पानी कम करके विस्थापितों के पुनर्वास की करवाई नहीं की गयी तो लोग अपना जीवन देने में हिचकेंगे नहीं और पूरी नर्मदा घाटी और देश में इस लड़ाई को ले जाया जायेगा.

Wednesday, August 22, 2012

महज १५० साल पहले स्तन ढक नहीं सकती थीं केरल की महिलाएं


केरल के त्रावणकोर इलाके, खास तौर पर वहां की महिलाओं के लिए 26 जुलाई का दिन बहुत महत्वपूर्ण है. इसी दिन 1859 में वहां के महाराजा ने अवर्ण औरतों को शरीर के ऊपरी भाग पर कपड़े पहनने की इजाजत दी. अजीब लग सकता है, पर केरल जैसे प्रगतिशील माने जाने वाले राज्य में भी महिलाओं को अंगवस्त्र या ब्लाउज पहनने का हक पाने के लिए 50 साल से ज्यादा सघन संघर्ष करना पड़ा.
इस कुरूप परंपरा की चर्चा में खास तौर पर निचली जाति नादर की स्त्रियों का जिक्र होता है क्योंकि अपने वस्त्र पहनने के हक के लिए उन्होंने ही सबसे पहले विरोध जताया. नादर की ही एक उपजाति नादन पर ये बंदिशें उतनी नहीं थीं. उस समय न सिर्फ अवर्ण बल्कि नंबूदिरी ब्राहमण और क्षत्रिय नायर जैसी जातियों की औरतों पर भी शरीर का ऊपरी हिस्सा ढकने से रोकने के कई नियम थे. नंबूदिरी औरतों को घर के भीतर ऊपरी शरीर को खुला रखना पड़ता था। वे घर से बाहर निकलते समय ही अपना सीना ढक सकती थीं. लेकिन मंदिर में उन्हें ऊपरी वस्त्र खोलकर ही जाना होता था.
नायर औरतों को ब्राह्मण पुरुषों के सामने अपना वक्ष खुला रखना होता था. सबसे बुरी स्थिति दलित औरतों की थी जिन्हें कहीं भी अंगवस्त्र पहनने की मनाही थी. पहनने पर उन्हें सजा भी हो जाती थी. एक घटना बताई जाती है जिसमें एक निम्न जाति की महिला अपना सीना ढक कर महल में आई तो रानी अत्तिंगल ने उसके स्तन कटवा देने का आदेश दे डाला.
इस अपमानजनक रिवाज के खिलाफ 19 वीं सदी के शुरू में आवाजें उठनी शुरू हुईं. 18 वीं सदी के अंत और 19 वीं सदी के शुरू में केरल से कई मजदूर, खासकर नादन जाति के लोग, चाय बागानों में काम करने के लिए श्रीलंका चले गए. बेहतर आर्थिक स्थिति, धर्म बदल कर ईसाई बन जाने औऱ यूरपीय असर की वजह से इनमें जागरूकता ज्यादा थी और ये औरतें अपने शरीर को पूरा ढकने लगी थीं. धर्म-परिवर्तन करके ईसाई बन जाने वाली नादर महिलाओं ने भी इस प्रगतिशील कदम को अपनाया. इस तरह महिलाएं अक्सर इस सामाजिक प्रतिबंध को अनदेखा कर सम्मानजनक जीवन पाने की कशिश करती रहीं.
यह कुलीन मर्दों को बर्दाश्त नहीं हुआ. ऐसी महिलाओं पर हिंसक हमले होने लगे. जो भी इस नियम की अवहेलना करती उसे सरे बाजार अपने ऊपरी वस्त्र उतारने को मजबूर किया जाता. अवर्ण औरतों को छूना न पड़े इसके लिए सवर्ण पुरुष लंबे डंडे के सिरे पर छुरी बांध लेते और किसी महिला को ब्लाउज या कंचुकी पहना देखते तो उसे दूर से ही छुरी से फाड़ देते. यहां तक कि वे औरतों को इस हाल में रस्सी से बांध कर सरे आम पेड़ पर लटका देते ताकि दूसरी औरतें ऐसा करते डरें.
लेकिन उस समय अंग्रेजों का राजकाज में भी असर बढ़ रहा था. 1814 में त्रावणकोर के दीवान कर्नल मुनरो ने आदेश निकलवाया कि ईसाई नादन और नादर महिलाएं ब्लाउज पहन सकती हैं. लेकिन इसका कोई फायदा न हुआ. उच्च वर्ण के पुरुष इस आदेश के बावजूद लगातार महिलाओं को अपनी ताकत और असर के सहारे इस शर्मनाक अवस्था की ओर धकेलते रहे.
आठ साल बाद फिर ऐसा ही आदेश निकाला गया. एक तरफ शर्मनाक स्थिति से उबरने की चेतना का जागना और दूसरी तरफ समर्थन में अंग्रेजी सरकार का आदेश. और ज्यादा महिलाओं ने शालीन कपड़े पहनने शुरू कर दिए. इधर उच्च वर्ण के पुरुषों का प्रतिरोध भी उतना ही तीखा हो गया. एक घटना बताई जाती है कि नादर ईसाई महिलाओं का एक दल निचली अदालत में ऐसे ही एक मामले में गवाही देने पहुंचा. उन्हें दीवान मुनरो की आंखों के सामने अदालत के दरवाजे पर अपने अंग वस्त्र उतार कर रख देने पड़े. तभी वे भीतर जा पाईं. संघर्ष लगातार बढ़ रहा था और उसका हिंसक प्रतिरोध भी.
सवर्णों के अलावा राजा खुद भी परंपरा निभाने के पक्ष में था. क्यों न होता. आदेश था कि महल से मंदिर तक राजा की सवारी निकले तो रास्ते पर दोनों ओर नीची जातियों की अर्धनग्न कुंवारी महिलाएं फूल बरसाती हुई खड़ी रहें. उस रास्ते के घरों के छज्जों पर भी राजा के स्वागत में औरतों को ख़ड़ा रखा जाता था. राजा और उसके काफिले के सभी पुरुष इन दृष्यों का भरपूर आनंद लेते थे.
आखिर 1829 में इस मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया.
कुलीन पुरुषों की लगातार नाराजगी के कारण राजा ने आदेश निकलवा दिया कि किसी भी अवर्ण जाति की औरत अपने शरीर का ऊपरी हिस्सा ढक नहीं सकती. अब तक ईसाई औरतों को जो थोड़ा समर्थन दीवान के आदेशों से मिल रहा था, वह भी खत्म हो गया. अब हिंदू-ईसाई सभी वंचित महिलाएं एक हो गईं और उनके विरोध की ताकत बढ़ गई. सभी जगह महिलाएं पूरे कपड़ों में बाहर निकलने लगीं.
इस पूरे आंदोलन का सीधा संबंध भारत की आजादी की लड़ाई के इतिहास से भी है. विरोधियों ने ऊंची जातियों के लोगों दुकानों और सामान को लूटना शुरू कर दिया. राज्य में शांति पूरी तरह भंग हो गई. दूसरी तरफ नारायण गुरु और अन्य सामाजिक, धार्मिक गुरुओं ने भी इस सामाजिक रूढ़ि का विरोध किया.
मद्रास के कमिश्नर ने त्रावणकोर के राजा को खबर भिजवाई कि महिलाओं को कपड़े न पहनने देने और राज्य में हिंसा और अशांति को न रोक पाने के कारण उसकी बदनामी हो रही है. अंग्रेजों के और नादर आदि अवर्ण जातियों के दबाव में आखिर त्रावणकोर के राजा को घोषणा करनी पड़ी कि सभी महिलाएं शरीर का ऊपरी हिस्सा वस्त्र से ढंक सकती हैं. 26 जुलाई 1859 को राजा के एक आदेश के जरिए महिलाओं के ऊपरी वस्त्र न पहनने के कानून को बदल दिया गया. कई स्तरों पर विरोध के बावजूद आखिर त्रावणकोर की महिलाओं ने अपने वक्ष ढकने जैसा बुनियादी हक छीन कर लिया.
यह आलेख चोखेर बाली ब्लॉग से लिया गया है... इसे आर. अनुराधा ने लिखा है..

Tuesday, August 21, 2012

आप देवदूत हैं लच्छी मामा - मुरली कार्तिक


कुछ लोग वीवीआईपी नहीं होते वे वीवीएस होते हैं. वीवीएस लक्ष्मण वीवीआईपी नहीं थे इसलिए उन्हें शुरूआती दिनों में लगातार ओपनिंग करना पड़ा, जबकि वे स्वाभाविक रूप से मिडल आर्डर के बल्लेबाज थे. उन्हें लगातार परफोर्म करना पड़ा, क्योंकि दो मैच की असफलता उन्हें टीम से बाहर का रास्ता दिखा देती. इसके बावजूद अगर टीम एक समय टेस्ट में नंबर वन हुयी तो इसका बड़ा श्रेय उनको जाता है. खास कर सेकेण्ड इनिंग की उनकी बल्लेबाजी को. उनके रिटायर होने पर एक साथी खिलाडी मुरली कार्तिक ने बड़े भावुक अंदाज में उन्हें याद किया है. क्रिकेट की दुनिया को समझने के लिए यह आलेख बड़ा महत्वपूर्ण है. मूल सामग्री क्रिकइन्फो.कॉम से साभार.
प्रिय लच्छी मामा, हमने जो वक़्त साझा किया है उसके बारे में कहाँ से लिखना शुरू करूँ? एक घटना से शुरू करता हूँ. जैसा कि आप जानते हैं मैंने आपके लिए कई, कई बार नेट पर बोलिंग की है. 2005 में श्रीलंका के खिलाफ अहमदाबाद टेस्ट मैच की पूर्व संध्या पर आपने मेरी एक गेंद पर अस्वाभाविक ड्राइव किया था. इससे पहले कि मैं अपनी भावना व्यक्त कर पता आपने खुद ही माफ़ी मांग ली. प्यारी सी दकनी में जिसे हम हैदराबादी हिन्दी कहते हैं, आपने कहा:. "जान बूझ के नहीं मारा. होना बोल के मारा. प्रक्टिस करने के लिये होना बोल के मारा.
इतनी प्यारी जुबान. आपको भला कोई कैसे पसंद नहीं करेगा?
अगर आप बुरा न माने तो मैं कहना चाहूँगा कि मैं खुद को लकी समझता हूँ जो आपका करीबी दोस्त बन सका. इस डॉग इट डॉग वर्ल्ड में, आपके पास होने से हमेशा सुकून महसूस होता था. 2000 में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ जब मैंने अंतरराष्ट्रीय कैरियर की शुरुआत की, आपने हमेशा मेरे लिए समय निकला. मैंने पहली बार आपके खिलाफ चेन्नई में पचैयाप्पस के कॉलेज मैदान में एक अभ्यास मैच खेला था और अविश्वसनीय रूप से, उस दिन से आज तक, आप वैसे के वैसे ही हैं.
भारतीय क्रिकेट में आप मेरे सबसे अच्छे दोस्त रहे हैं. मैंने खुद को गौरवान्वित महसूस किया जब 2004 में अपनी शादी के समारोह में आपने क्रिकेटर के रूप में अकेले मुझे ही आमंत्रित किया. अगर आपको याद हो, शादी में एक अनुष्ठान हुआ था जिसमे पुजारी दो लकड़ी की कठपुतलियों एक लड़का और एक लड़की को पकडे हुए थे, वे परिवार के प्रतिरूप थे. शादी के बाद परंपरागत रूप से उन कठपुतलियों को दूल्हे की बहन को दिया जाता है. मगर आपने उसे मेरी पत्नी श्वेता को दे दिया और जब जब आपके बच्चे पैदा हुए तो उन्हें लेकर आप हमारे घर गुड़गांव आये थे.
जब मैं सोचता हूँ कि हम कैसे इतने करीबी दोस्तों बन गए, तो एक घटना याद आती है. यह मुझे वापस 2003 में ले जाती है और मुझे हंसी आ जाती है. मुझे यकीन है कि आपको पता है कि मैं क्या बात कर रहा हूँ. 2003 के विश्व कप से पहले, मैं न्यूजीलैंड के दौरे के लिए चुना गया था, इससे पहले मैं वेस्टइंडीज के खिलाफ एकदिवसीय श्रृंखला में बेहतर प्रदर्शन कर चुका था. मगर मुझे न्यूजीलैंड के साथ वन डे श्रंखला में शामिल नहीं किया गया. यह मेरे लिए बड़े हैरत की बात थी.
उस वक़्त आप ही ने मुझे शान्ति दी थी, कहा था- इस तरह की बातें होती हैं. वैसे भी न्यूजीलैंड में एक स्पिनर के लिए कुछ नहीं रखा. टीम में अनिल कुंबले और हरभजन सिंह जैसे सीनियर खिलाडी थे. मैं एकदिवसीय श्रृंखला के लिए इसलिए उम्मीद कर रहा था, क्योंकि विश्व कप टीम के लिए जल्द ही टीम की घोषणा होने वाली थी.
लेकिन जब विश्व कप टीम की घोषणा हुयी तो आश्चर्यजनक तरीके से आपका नाम उसमे नहीं था. विडंबना यह हुयी कि हम दोनों ने खुद को एक दूसरे के खिलाफ हैदराबाद में रणजी ट्राफी मैच खेलता पाया और एक महीने बाद हम दोनों कैरेबियन दौरे के लिए साथ साथ इंडिया ए टीम का हिस्सा बन कर रवाना हुए. जब भी हम न्यूजीलैंड के बारे में सोचते हैं, हम हँस पड़ते हैं. यह कहना बेकार है, कि हममें से कोई मानसिक रूप से ए टीम का हिस्सा बनना नहीं चाह रहा था, आप तो विशेष रूप से. यह देखते हुए कि आप पहले दो मैचों में लगातार चार बार डक पर आउट हुए थे. आपने उस वक़्त कहा था: "कार्तिक, मैं अब से तुम्हे सलाह नहीं दूंगा क्योंकि मैं जो तुमसे कहता हूँ वह मुझ पर ही लागू हो जाता है." आपके जैसा दोस्त मिलना मेरे लिए क्रिकेट के किसी अवार्ड से बहुत बड़ा इनाम है.
मैं भाग्यशाली हूँ कि आपकी कप्तानी में खेलने का मौका मिला है. आपके समेत मुझे तीन बड़े अच्छे कप्तानो की कप्तानी में खेलने का मौका मिला. अज्जू भाई (मोहम्मद अजहरुद्दीन) के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और वीबी चंद्रशेखर के साथ इंडियन सीमेंट्स में. आप इनमे सबसे बेहतर थे. आपकी शैली अजहरुद्दीन स्कूल से मिलती जुलती है. आप मानते हैं की गेंदबाज एक हद तक अपना कप्तान खुद होता है.
मेरे लिए, यह शानदार था. क्योंकि मुझे मालूम था कि मैं क्या करने की कोशिश कर रहा हूँ. इसपर अगर मेरे कप्तान का मुझे समर्थन मिल गया तो इससे अधिक मैं और क्या उम्मीद कर सकता हूँ? आपने कोई बात मुझ पर थोपने की कोशिश की कभी नहीं की. आप सकारात्मक थे, पर अटैकिंग फील्ड लगते थे और मैं एक चैंपियन की तरह गेंदबाजी करता.
मुझे 2004 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ मुंबई टेस्ट आज भी याद है जब आपने उस खतरनाक पिच पर 69 रनों(दोनों टीम में किसी भी बल्लेबाज द्वारा उच्चतम) की यादगार पारी खेली थी. जबकि मेन ऑफ़ द मैच का पुरस्कार सात विकेट झटकने के लिए मुझे दिया गया. पुरस्कार के तौर पर मिले बड़े से प्लास्टिक चेक पर सबसे पहले आप ही ने लिखा था, "एबसोल्युट मैचविनर, हमेशा उम्मीद करता हूँ कि ऐसी सफलता बार-बार हासिल करो."
लेकिन मामा हम जानते हैं कि सच्चे मैचविनर आप थे. कई अवसरों पर, विशेष रूप से 2003 में एडिलेड में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ दूसरे टेस्ट में. 45 डिग्री की गर्मी में आप और राहुल द्रविड़ ने आश्चर्यजनक बल्लेबाजी कर 303 रन की भागीदारी निभायी, खास तौर पर इन हालातों में जब एक समय भारत 4 विकेट पर 85 रनों के स्कोर पर था. लोग आपके 281 रन वाली पारी के बारे में बात करते हैं, लेकिन मुझे 148 रन की पारी में ज्यादा मज़ा आया. आपकी इस पारी के कारण हमने ऑस्ट्रेलिया पर जीत दर्ज की और भारत नंबर 1 टेस्ट टीम बनने की रह पर निकल पड़ा.
मुझे आश्चर्य होता है कि आपने कैसे किसी के खिलाफ कभी कोई गलत बात नहीं कही यहां तक ​​कि ऐसे लोगों के खिलाफ भी जिन्होंने आपको नुकसान पहुंचाया है. बहुत लोग चुप नहीं रह पाते.
याद है जब आपने आईपीएल के उद्घाटन सत्र में डेक्कन चार्जर्स के आइकन का दर्जा छोड़ने का फैसला किया था? मैं जानता था कि आप के लिए पैसे का कोई आकर्षण नहीं है. आपने ऐसा सिर्फ इसलिए किया था क्योंकि आप हैदराबाद को एक मजबूत टीम बनाने चाहते थे. आप हमेशा अपनी टीम के बेहतर प्रदर्शन के लिए इमानदारी से प्रयासरत रहते थे. जब मैंने भारतीय घरेलू टीम के एक वरिष्ठ खिलाडी का नाम लिया था जिसे पहली आईपीएल के दौरान अनदेखा किया गया था, तो आपने उसे टीम में शामिल कर लिया.
हमने शनिवार को एक बार फिर आपकी निस्वार्थता को देखा, जब आपने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कहा. जब आप भारतीय टीम में आये थे तो शुरूआती कुछ वर्षों में आपको विदेशों में खेलन पड़ा था. उस दौरान भारतीय टीम बाहर अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पा रही थी तो किसी न्यू कमर को पहले होम ग्राउंड पर खेलने का मौका देना चाहिए था. मुझे मालूम है आपने सोचा होगा कि अगर खेलते रहे तो यह अच्छी बात नहीं होगी. कितने लोग भारतीय क्रिकेट के बारे में सोचते हैं, कितने लोग ऐसा सोचते हैं कि नए खिलाडी को ग्रूम करने का मौका मिलना चाहिए. हालाँकि आप बड़ी आसानी से अपने 134 टेस्ट कैप को आगे बढ़ा सकते थे.
मैंने हमेशा सही बात कहने में विश्वास किया है बनिस्पत अच्छी बात कहने के. आप मृदुभाषी हैं और बहुत आदर्शवादी भी. आपके इसी रवैये ने मुझे वैसा बनाया जैसा मैं हूँ. आप हमेशा मानते रहे कि कुछ चीजों को बदला नहीं जा सकता. आपकी इसी बात ने मुझे उत्साह बनाये रखने के लिए प्रेरित किया, क्योंकि मैं कई-कई बार टीम से बाहर रहा हूँ. इसके बावजूद मैं असंतुष्ट नहीं हूँ.
मैं सचमच विश्वास नहीं कर सकता कि अब आप अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट नहीं खेलेंगे. जब मैंने आपके रिटायर्मेंट के बारे में सुना, मैं आंसुओं में डूब गया. मेरे जीवन पर हमेशा आपका शांत प्रभाव रहेगा. यदि सचिन क्रिकेट के भगवान हैं, तो आप वीवीएस किसी देवदूत सरीखे हैं.
सच में आपका, कार्तिक

Monday, August 20, 2012

सात हजार में देश की चौहद्दी नापने का जुनून


पर्यटन एक महंगा शौक है. समय खपाऊ और खर्चीला. जबकि घुमक्कड़ी इसके ठीक विपरीत है. यहां पर आप देखेंगे किस तरह कम समय और सस्ते में बेहतरीन घुमक्कड़ी की जा सकती है. घुमक्कड़ी के लिये रु पये-पैसे की जरूरत नहीं है, रुपये -पैसे की जरूरत है टैक्सी वाले को, जरूरत है होटल वाले को. अगर यहीं पर कंजूसी दिखा दी तो समझो घुमक्कड़ी सफल है.
नीरज जाट की ये पंक्तियां उसके ब्लॉग मुसाफिर हूं यारों पर परिचय वाले कॉलम में दर्ज है. इसके अलावा उनके ब्लॉग पर पिछले तीन साल में उनके द्वारा की गयी घुमक्कड़ी की कई कहानियां और तसवीर भी नुमायां हैं. नीरज जितने अच्छे घुमक्कड़ हैं उतने ही अच्छे ब्लॉगर भी. यात्रओं के बारे में उनके वृत्तांत इस बात की गवाही देते हैं. 292 लोग उनके इस ब्लॉग के सदस्य हैं.
पिछले दिनों उनके ब्लॉग पर एक रोचक जानकारी नजर आयी. वे रेल यात्र के जरिये पूरे देश की चौहद्दी नापने की योजना बना चुके हैं और आठ अगस्त को इस 13 दिवसीय यात्र पर निकलने वाले हैं(जब यह आलेख प्रकाशित होगा वे इस अनूठी यात्र के लिए निकल चुके होंगे). ऐसे में हमने पंचायतनामा के लिए उनसे इस यात्र के बारे में विस्तार से बातचीत की.
देल्ही मैट्रो के जूनियर इंजीनियर नीरज जाट को बचपन से ही घुमक्कड़ी का शौक रहा है. खास तौर पर रेल यात्र और हिमालय की सैर उनकी कमजोरियों में शामिल है. उन्हें जब भी मौका मिलता है, छुट्टी लेकर अपना शौक पूरा करने वे निकल पड़ते हैं. नीरज बताते हैं कि शौक तो बचपन से ही था मगर पूरा करने का मौका नौकरी मिलने के बाद मिला. 24 वर्षीय नीरज पिछले साढ़े तीन साल से इस नौकरी में हैं और पिछले साढ़े सात साल में 533 बार रेल यात्र कर 73663 किमी की दूरी नाप चुके हैं. इस बार उन्होंने इस घुमक्कड़ी को एक आकार देने का फैसला किया है, वे देश की चौहद्दी नापने निकल रहे हैं.
घुमक्कड़ी क्यों? जब यह सवाल नीरज से पूछा तो उन्होंने कहा, निरुद्देश्य. घुमक्कड़ी निरुद्देश्य ही हो सकती है. मगर हर बार ऐसा नहीं होता. भारत भ्रमण के इस प्रोग्राम के बारे में खुद नीरज लिखते हैं.
अक्सर मेरी सोच ज्यादा लम्बी नहीं चलती, बस एक महीने आगे की ही सोच सकता हूं. जून का महीना जब चल रहा था, तो मेरी सोच मात्र जुलाई तक ही सीमित थी, अगस्त के बारे में कि कहां जाना है, मैं सोच भी नहीं सकता था. लेकिन अब जमाना बदल गया है. हमने भी लम्बा-लम्बा सोचना शुरू कर दिया है. उसी का नतीजा है यह धाकड़ प्रोग्राम. वे बताते हैं, इस योजना के बारे में पहला ख्याल जून में आया.
जून में जब मैं गौमुख गया था तो हमारे दिमाग ने स्पेशल सोचा. वहीं ट्रेकिंग करते-करते अपने दिमाग में आया कि एक लम्बी ट्रेन यात्र की जाये. वहीं समय भी तय हो गया कि अगस्त में चलेंगे. क्योंकि अगस्त तक प्राय: मानसून पूरे भारत पर कब्जा जमा लेता है और धरती का रंग रूप बदल जाता है. वापस आकर इस दिशा में काम शुरू कर दिया. यह इतना आसान नहीं था. खूब दिमाग की खिचडी बनाई और तब जाकर फाइनल हुआ कि ट्रेन से भारत की परिक्र मा करेंगे.
योजना बनाकर नीरज ने रूटचार्ट तैयार किया और तय किया कि क्लॉकवाइज देश की परिक्रमा करेंगे. हर दो ट्रेन के बीच ऐसा माजिर्न रखा कि एक ट्रेन के लेट होने पर दूसरी ट्रेन मिस न हो. तब जाकर कुल 13 दिनों का प्रोग्राम बना. 14 अलग-अलग ट्रनों के जरिये वे 12 हजार किमी की यात्र करेंगे. शिडय़ूल इतना टाइट है कि इस यात्र के दौरान वे किसी शहर में घूमने नहीं जा सकेंगे. इस बात का उन्हें अफसोस भी है. उनका सारा समय रेलगाड़ियों में यात्र करते हुए और प्लेटफार्म पर दूसरी ट्रेन का इंतजार करते हुए गुजरेगा. हालांकि रेलगाड़ियां और रेलवे स्टेशन से उन्हें इतना प्यार है कि यह समय वे बगैर बोर हुए गुजार लेंगे.
नीरज औसतन हर साल दस हजार किमी की यात्र करते हैं और इसमें उनके 35 हजार रुपये खर्च करते हैं. अब तक यह तमाम खर्च वे खुद वहन करते हैं, अपने वेतन से. अपनी जेब से खर्च कर और नौकरी से छुट्टी लेकर इस तरह यात्र करना हर किसी के लिए मुमकिन नहीं. कई लोग शौक रहने के बावजूद नहीं कर पाते. मगर नीरज ने रास्ते निकाल लिये हैं. वे कहते हैं कि वे घरेलू मसलों के लिए कम से कम छुट्टी लेते हैं, ऐसे में घुमक्कड़ी के लिए उन्हें आसानी से छुट्टी मिल जाती है. अविवाहित होने के कारण वेतन के पैसे से हर माह तीन हजार खर्चना आसानी से मुमकिन हो जाता है.
इस बार उनकी भारत परिक्रमा का बजट छह से सात हजार के बीच का है. जिसमें साढ़े तीन हजार रुपये टिकट में खर्च होने हैं और ढाई से तीन हजार खाने-पीने में. टिकट वे कटा चुके हैं और खाने-पीने का एक खर्च एक कनाडावासी मित्र सुरेंद्र शर्मा उठा रहे हैं.
(पंचायतनामा के अगस्त द्वितीय अंक में प्रकाशित)

Thursday, August 16, 2012

ससुराल गेंदा फूल और तार बिजली


तार बिजली गाने की काफी चर्चा सुनी. आभासी दुनिया में शोर बरपा हुआ है.. शारदा सिन्हा का नाम बरबस खींचता है. डाउनलोड करना ही पड़ा. घर में जब पहली बार बजा..तार बिजली के जैसे हमारे पिया..हाये सासू बता तूने ये क्या किया तो उपमा पूछ बैठी. सोहर है क्या? उपमा धनबाद में पली बढ़ी है.. मगर उसे गैंग्स ऑफ वासेपुर के बारे में ज्यादा नहीं मालूम.. हां, सोहर के बारे में थोड़ा बहुत मालूम है. गाना जब खत्म होने को आया तो फिर से उसकी आवाज आयी.. शारदा सिंहा गा रही है. हां.. इतनी देर बाद समझ आया? मैंने पूछा तो उसने जवाब दिया- अभी भी उसका टोन नहीं लग रहा है..
दिन में तीन या चार बार गाना बजा. बेटी एक-आध बार झूम के नाची भी. उपमा ने कहा, ससुराल गेंदा फूल जैसा नहीं है. तिया भी वैसे नहीं नाची, जैसे ससुराल गेंदा फूल सुनकर आज भी उछल जाती है. उपमा और तिया मेरे कान और आंख हैं. इनके रहने पर मैं बहुत जल्दी किसी से प्रभावित नहीं होता. डर्टी पिक्चर देखकर उपमा ने कहा था, फैशन का कॉपी है.. इससे पहले हम लोग सपरिवार गैंग्स ऑफ वासेपुर पार्ट 1 के गाने भी सुन चुके हैं. वुमनिया से लेकर टैटै-टूटू तक. तिया को टैटै-टूटू और हंटर काफी पसंद आया. उपमा मुंह बनाये रही.
मैं जरूर शुरुआत में गैंग्स ऑफ वासेपुर के संगीत से प्रभावित होता रहा. मुझे लगता था कि इस तमाशे में अगर कोई चीज बहुत अच्छी है तो वह इसका संगीत है. स्नेहा खानवलकर ने पहली दफा बिहार के विभिन्न इलाकों के लोक संगीत को इतने बड़े पैमाने पर बालीवुड की दुनिया में लांच किया है. फिर एक दिन रोटी, कपड़ा और सिनेमा नामक ब्लॉग पर स्नेहा के बारे में बड़ी अच्छी रपट पढ़ी.
कह के लूंगा. पता नहीं.. इस तीसरे दरजे के लेन-देन के बिना अनुराग क्यों नहीं काम चला पाये. अपनी काबिलियत पर भरोसा नहीं था या दर्शकों की समझ-बूझ पर. यह बेवजह का गाना था. इक बगल में चांद होगा.. बड़ा अच्छा लिखा और गाया गया. हंटर के बारे में जैसा पता चला कि मारिशस से मिला था. वुमनिया और मुहझौंसा.. मुहझौंसा तो ठीक है.मगर वुमनिया कहां से आया.. आज तक यह राज मेरे लिए राज ही है. भूस के ढेर में राई जहां बिदेसिया की याद दिलाते हैं वहीं एक गाना हमारे इलाके में होने वाले भगैत जैसा है. बोल याद नहीं आ रहे. जियो हो बिहार के लाला.. भी अनुराग एंड कंपनी की आत्मविश्वास की कमी को ही रेखांकित करता है.
इन गानों को सुनते-सुनते एक महीना गुजरने वाला है. अब इन्हें बजाया नहीं जाता. बजाता हूं तो उपमा मुंह बनाने लगती है और तिया कहती है..दूसला..दूसला. तीसरी कसम का बरसों पुराना एक गाना है..आज भी नया ही है..किसी भदेस पार्टी में बजता है तो हमारे जैसे जवानी को विदा कर रहे देहाती भी उछलने लगते हैं.. वही..पिंजरे वाली मुनिया.. यह भी बिहार का ही लोक गीत है. हमारे जिले के फारबिसगंज मेले में बजता होगा. रेणुजी ने वहां से उड़ाया और शंकर-जयकिशन(शायद) ने पता नहीं कहां से उड़ाया. गैंग्स ऑप वासेपुर के गीतों की चर्चा करते हुए पिंजरे वाली मुनिया की याद आ जाती है. आखिर क्या वजह है कि गैंग्स ऑफ वासेपुर के दो दर्जन से अधिक गानों में से एक भी न ससुराल गेंदा फूल जैसा बना और न ही पिंजरे वाली मुनिया के आसपास पहुंच पाया.
इसकी वजह भी मुझे कहीं न कहीं अनुराग का नेतृत्व ही लगता है. वे इतनी अच्छी फिल्मोग्राफी करने के बावजूद कह के लूंगा के भरोसे फिल्म का भविष्य तलाशते रहे और उसी कहके लूंगा ने उनकी फिल्म की लुटिया डुबो दी(शायद). अच्छी खासी रिसर्च के बावजूद अगर संगीत वैसा(अपेक्षित) जादू नहीं कर पा रहा है(किसी लोकल मेस की दाल जैसा लग रहा है, जिसे गाढ़ा करने के लिए होटल का मालिक उसमें मांड मिला देता है, या तीन बार इस्तेमाल किये गये तेल में छने पकौड़े या चार बार यूज की गयी चाय पत्ती की बनी चाय जैसा) तो इसकी वजह भी कह के लूंगा ही है. वुमनिया से लेकर तार बिजली तक कई गानों में अच्छी शायरी का कौशल डर्टी हो जाने की बहक में खत्म हो रहा है. स्नेहा ने बिहार के लोक संगीत का चेहरा तो पहचान लिया है मगर उसके चेहरे पर वह लाली नहीं है जो पिया को पा जाने या पिया को गंवा देने पर उभरती है. तार बिजली दिल के तार को नहीं छूती क्योंकि संगीत के शोर में शारदा सिंहा की खनक खो जाती है. तमाम गानों के मुखड़े उम्मीद जगाते हैं मगर अंतरा आते-आते जादू टूटने लगता है.