Wednesday, May 30, 2012

तीन अध्याय : औरत की जिंदगी के बड़े सवाल


तीन अध्याय मूलत: नेपाली उपन्यास है और इसका असली नाम तीन घुम्ती है. इस उपन्यास का हिंदी में अनुवाद करते वक्त अनुवादक फणीश्वरनाथ रेणु ने इसका नाम इतना सपाट (तीन अध्याय) क्यों रखा यह बताने के लिए आज वे हमारे बीच उपलब्ध नहीं है. हम अनुमान भी नहीं लगा सकते.. इस उपन्यास के लेखक नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री(1959-60) विश्वेश्वर प्रसाद कोइराला रेणुजी के बड़े भाई की तरह थे. उनके छोटे भाई तारिणी कोइराला रेणुजी के हमउम्र और हमसाया था.
भाया फणीश्वरनाथ रेणु: हम सब जनाते हैं कि व्यक्तित्व निर्माण के असली दौर में रेणुजी की फिनिशिंग कोइराला परिवार के संपर्क में हुई. नेपाल के राष्ट्रपिता कृष्ण प्रसाद कोइराला की सरपरस्ती में कोइराला परिवार के दूसरे बच्चों के साथ रेणुजी की पढ़ाई भी विराटनगर के आदर्श विद्यालय से बनारस के काशी हिंदू विश्वविद्यालय तक हुई. रेणुजी इसी वजह से नेपाल को सानो अम्मा(मौसी) कहते रहे हैं. उन्होंने नेपाल की राणाशाही के खिलाफ संघर्ष में अपने मित्रों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर युद्ध लड़ा और उसी दौर में नेपाल के पहले आकाशवाणी केंद्र की स्थापना भी की. इस पर रेणुजी ने बाद में एक लंबा रिपोर्ताज भी लिखा, जो इन दिनों नेपाली क्रांति कथा के नाम से पुस्तकाकार में उपलब्ध है. अपने रिपोर्ताजों में रेणुजी ने वीपी कोइराला(विश्वेश्वर) की साहित्यिक प्रतिभा का कई दफा जिक्र किया है. हालांकि पढ़ते वक्त हमेशा लगता था कि एक बड़ा लेखक कम चर्चित लेखक को स्थापित करने का प्रयास कर रहा है.
तीन अध्याय(तिन घुमती) पढ़ने के बाद लगा कि यह लेखक कई मामलों में हिंदी के अधिकांश बड़े लेखकों(रेणु समेत) से सोच और कथा रचना के मामले में आगे है. लेखक सचमुच रेणु के गुरु बनने की काबिलियत रखता है. इस उपन्यास को पढ़ने के बाद मन हैरत से भर उठता है कि इसे 1968 में लिखा गया है, नारी स्वतंत्रता के विषय पर हिंदी क्या संपूर्ण भारत में इससे सटीक उपन्यास आज तक नजर नहीं आता. इससे भी अधिक हैरत की बात तो यह है कि इस उपन्यास को लिखने से महज आठ साल पहले लेखक अपने देश के प्रधानमंत्री पद का निर्वहन भी कर चुका है. इसके बावजूद उसकी कलम की धार कुंद नहीं होती. खैर, अब बातें तीन अध्याय की.
सौ पन्नों का एक बड़ा उपन्यास : यह उपन्यास मुश्किल से सौ पेज का है. एक अधेड़ महिला अपने जीवन के पन्नों को पलट रही है. उसकी बेटी का प्रेमी उससे मिलने आने वाला है, वह अपनी बेटी की पसंद पर मुहर लगाने के लिए सौ फीसदी तैयार है. मगर मन उद्विग्न है और वह अपने पिछले जीवन की कहानी पर एक नजर डाल रही है. वह सोचती है कि उसने सिर्फ तीन फैसले लिए इसके अलावा उसके जीवन में और महत्वपूर्ण है भी क्या.. मगर असलियत यह है कि उसके द्वारा जीवन के तीन मोड़ पर लिये गये तीन फैसलों ने उसे एक अनूठा व्यक्तित्व प्रदान किया है जो दुनिया भर की दूसरी महिलाओं के लिए रश्क का विषय हो सकता है.
पहला फैसला : पहला फैसला उसने किशोरावस्था और जवानी की दहलीज पर लिया. वह वैश्य जाति की कन्या थी, मगर उसे प्रेम एक ब्राह्मण युवक से था. हालांकि जातिगत व्यवधान से बड़ा एक दूसरा व्यवधान था. युवक क्रांतिकारी था और उसका परिवार शासन का करीबी. मगर उसने अपने प्रेम को अपनाने का फैसला किया. शहर के एक छोटे से किराये के मकान में जहां वह युवक अकेले रहता था वह भी एक दिन रहने चली गयी. बिना कोई बखेरा किये, माता-पिता ने उससे संबंध तोड़ लिया. मगर उसके प्रेम ने उसका स्वागत किया. यह उसका पहला फैसला था. नयी गृहस्थी शुरू हुई. घर में उसके प्रेमी के अलावा उसके क्रांतिकारी दोस्त जुटते और बहस-मुहाबिसों का दौर चलता रहता. उसने अपने प्रेमी के दोस्तों को ही अपना परिवार मान लिया और उस समूह की एक सदस्य बन गयी. समूह का एक युवक उससे काफी करीब था. चुहुल भी करता और अपनी बातों से उसके दिल को भी सहलाता. जहां उसका पति व्यवहार में औपचारिक रहता वह युवक उसके जीवन में आराम और उमंग लाने की कोशिश करता रहता.
दूसरे फैसले की उधेड़बुन: इसी बीच पुलिस का छापा पड़ा और सारे युवक गिरफ्तार कर लिये गये. अब वह अकेली पड़ गयी. शहर में ही उसका मायका था मगर वहां जाने का सवाल ही नहीं था. वह अकेली ही उस घर में पड़ी रही. सदमे की हालत में उसके दो-तीन दिन गुजरे. तभी एक दिन उससे सहानुभूति जताने वाला युवक उसके घर आ पहुंचा. उसे जेल से छोड़ दिया गया था. उस युवक को देख कर उसे लगा कि जैसे खोयी हुई जिंदगी दुबारा मिल गयी. कई दिन बाद उसने घर में खाना बनाया, उस युवक को खिलाया और अपने पति के लिए जेल भिजवा दिया. युवक उसके साथ ही रहने लगा. वह उसकी सारी तकलीफों का ख्याल रखता, जरूरी सामान खरीद कर लाता और उसे खुश रखने की कोशिश करता. वह भी जीवन को दुबारा र्ढे पर लाने में जुट गयी. रोज पति के लिए खाना बनाती, उसके कपड़े साफ करती और जेल भिजवाती, शेष समय उस युवक के साथ हंसी-खेल में गुजारती. हालांकि वह युवक उसके पति के लिए खाना पहुंचाने और उस युवती द्वारा अपने पति अधिक ख्याल रखने की बात को पसंद नहीं करता. वह हमेशा अनमनापन दिखता और कई बार संकेत देता कि वह उस युवती के प्रति आशक्त है. युवती को भी वह युवक पसंद था, उससे आकृष्ट भी थी, मगर वह उसका पति नहीं था न ही हो सकता था यह उसे पता था. कुछ दिनों बाद युवक उससे शारिरिक संबंध की अपेक्षा करने लगा. युवती ने उसका विरोध किया. वह पशोपेश में थी. युवक का साथ, उसका व्यवहार उसे भाता था, यह प्रेम जैसा ही कुछ था. एक दिन उसने सोचा कि यह आखिर हो क्या रहा है.. क्या वह अपना शरीर अपने पति के लिए बचा कर रख रही है..? .. और हृदय..? हृदय में सबसे ऊंचे स्थान पर आज भी उसका पति ही है.. मगर यह युवक जो उसके पति का साथी है.. अभ उसका भी घनिष्ट साथी बन चुका है.. वह पूरे दिन अपना आनंद, अपना दुख और अपनी इच्छाएं उससे बांटती है.. नहीं बांटती है तो सिर्फ अपना शरीर.. अपना शरीर नहीं बांटने के पीछे तर्क क्या है..? यह शरीर उस युवक के स्पर्श से जूठा हो जायेगा क्या.? उसने अपने मन को टटोला क्या उसके मन में शरीरिक सामिप्य और संभोग की लालसा नहीं है.. ? अगर यह लालसा है तो क्या सिर्फ इसे इसलिए रोका जाये कि इस पर सिर्फ उसके पति का अधिकार है..? आज उसके मन में प्रेम की दहक है और सामने एक पात्र है जो उससे प्रेम की अपेक्षा रखता है.. मगर उसका अपने शरीर पर इतना अधिकार नहीं है कि खुशी के चार पल अपनी इच्छा से जी ले.. वह अपना हृदय तो बांट सकती है मगर शरीर नहीं.. और शरीरिक भोग का किसी संबंध के अस्तित्व से क्या लेना देना..?
शरीर किसका है : उसने फैसला कर लिया.? यह उसका शरीर है.. वह अपने शरीर को कुंठित नहीं करेगी.. उसका पति भी उसकी इस आजादी का सम्मान करेगा.. उसने दूसरा फैसला लिया और अपने इस साथी के साथ शरीर को प्यार करने की आजादी दी और यह प्रेम कई दिनों तक चला. मगर इस प्रेम ने उस प्रेम (अपने पति के साथ) की भावना को मिटाया नहीं. वह रोज उसे संवेदना के साथ अपने पति के कपड़े धोती, उसके लिए खाना बनाती और उसे जेल भिजवाती.. समय गुजरता गया. उसने एक अनूठा प्रेम किया था.. मगर उस अनूठे प्रेम को पाने वाला साधारण मनुष्य था.. वह प्रेम पाकर उससे दूर होता गया.. वह विवाहित भी था.. इसलिए जिम्मेदारी से और दूसरे विवाद से डरता था. उसे लगता कि अगर बात खुली तो उसका अपना जीवन चौपट हो जायेगा.. अब वह सिर्फ जरूरत के सामान भिजवा देता और आने के नाम पर बहाने बना देता.. युवती गर्भवती थी.. उसके बच्चे की मां बनने वाली थी.. मगर उस युवती के लिए यह किसी और का बच्च नहीं था.. उसका अपना बच्च था.. उसके अपने प्रेम की निशानी.. अपने शरीर का टुकड़ा .. इस बीच सारे क्रांतिकारी जेल से छूटने लगी.. मगर उनके बीच इस युवती की बदनामी की कहानी गूंज रही थी. बाद में यह भी पता चला कि उसका प्रेमी गद्दार था.. वह मुखबिर बन गया था.. इसलिए उसे दो-तीन दिन में ही छोड़ दिया गया .. दूसरे क्रांतिकारी साथियों के लिए वह एक गद्दार की प्रेमिका थी.. उसने अपनी छोटी सी खुशी के लिए एक नाजायज संबंध बना लिया.. खैर उसे दूसरों की प्रतिक्रियाओं से कुछ लेना देना नहीं था.. उसका पति उसके लिए ईश्वर स्वरूप था. उसे लगता था कि वह उसकी भावनाओं और विचारों को समझेगा, उसका सम्मान करेगा..
पुरुष कब समझेंगे : उसका पति जिस दिन जेल से छूटा वह अस्पताल में अपनी बेटी को जन्म दे रही थी. जेल तक उसकी कहानी पहुंच चुकी थी. उसका पति तनाव में था. वह अस्पताल में अपने पति का इंतजार करती रही.. मगर उसका पति नहीं आया. वह घर गयी तो पति की आंखों में वही तिरस्कार देखा जो दुनिया भर की आंखों में था. उससे कहीं अधिक ही था. उसे सदमा लगा, मगर उसने सोचा जो बात स्वत: समझी न जा सकी उसे वह बोल कर समझाने का प्रयास करेगी. मगर कई दिनों तक अबोला जारी रहा. पति की आंखों का नफरत मिटा नहीं. एक दिन उसने ही कोशिश की.. तो पति ने कहा तुम उससे प्यार करती हो तो उसके पास जा सकती हो..मुङो कोई परेशानी नहीं. उसने पति को समझाने की कोशिश की .. यह इसके और उसके वाला मामला नहीं है.. और प्यार खांचों में नहीं बंटता.. मगर पति समझने की अवस्था में नहीं था. एक दिन पति ने कहा, अगर तुम मेरे साथ रहना चाहती हो तो इस बच्ची को उसे दे आओ या अनाथालय में रखवा दो.. फिर सब ठीक हो सकता है.. इस पर युवती ने कहा कि मैं तुम्हें प्रेम करती हूं इसी वजह से तुम्हारे साथ रहना चाहती हूं.. मगर तुमसे प्रेम करने का अर्थ यह नहीं कि मैंने जिसे इतने अरमानों से जन्म दिया है उसे प्रेम नहीं करती.. इसे खुद से जुदा नहीं कर सकती. इस बीच दिन गुजरते रहे.. पति उसकी बेटी की तरफ देखता भी तो काफी गुस्से से इससे वह बच्ची उससे डरने लगी.. उसे देखकर चीखने लगती.. उस बीच उसके प्रेमी ने भी संदेश भिजवाया कि वह उसके लिए रहने और खाने की व्यवस्था कर सकता है.. मगर यह संदेश उसके लिए तिरस्कार से कम नहीं था.. वह रहने और खाने के लिए किसी पर आश्रित नहीं थी.. वह अगर किसी के साथ थी या साथ रहने का फैसला किया था तो सिर्फ इसलिए कि वह उससे प्रेम करती थी.. वह न तो आश्रिता थी और न ही बनना चाहती थी.. सहजीवन का आधार उसके लिए सिर्फ प्रेम हो सकता था.. मगर इस बात को उसका पति भी नहीं समझ रहा था.. उसने भी एक दिन कह डाला कि वह कहीं अगल कमरा ले ले.. वह उसे हर माह कुछ पैसे भिजवा देगा..
तीसरा फैसला : अब तीसरे फैसले की घड़ी थी. उसने फैसला लिया. अपने पति को एक चिट्ठी लिख कर अपनी बातें जाहिर की और घर छोड़कर अनजाने सफर की ओर निकल पड़ी.. उसे शिक्षक की नौकरी मिल गयी और बेटी के साथ उसका जीवन गुजरने लगी. आज उसकी बेटी इतनी बड़ी हो गयी थी कि वह अपने जीवन का पहला फैसला लेने जा रही थी. उसने तय किया था कि यह फैसला सिर्फ उसकी बेटी का होगा. .उसकी राय वही होगी जो बेटी चाहेगी.. यहां आकर उपन्यास खत्म हो जाता है और हमारे सामेन कुछ अनुत्तरित सवाल रह जाते हैं. एक जीवन और उसको लेकर लिये गये तीन स्वतंत्र फैसले किस तरह एक औरत की आजादी को सुनिश्चित करते हैं.. यह इस कहानी में बहुत साफ तरीके से बताया गया है. यह एक आदर्शवादी कथा है. इसमें कई विंदुओं पर कई तरीके से विवाद की स्थिति बन सकती है. मगर वाद-विवाद से परे यह उपन्यास इतने गंभीर सवाल छोड़ जाती है जिसका जवाब देने में पीढ़ियां गुजर जाती हैं..
अंत में मेरी ही एक पुरानी कविता..

Friday, May 25, 2012

पूर्णिया के भादुरी और भादुरी की जागरी


पिछले दिनों संयोग से दो पुरानी किताबें मेरे हाथ लगीं. कहां मिली ये नहीं बताउंगा, जगह भले ही कहने को लाइब्रेरी थी मगर किताबें वहां सालों से डंप थी. मैंने दोनों अमूल्य किताबें चुरा लीं. मैं इस चोरी का पाप अपने ऊपर लेने और अगर कहीं इसकी सजा मिलती है तो भुगतने को तैयार हूं. सच पूछें तो मेरे मन में अब भी यह विलक्षण भाव बैठा है कि मैंने चोरी नहीं की है इन किताबों को जेलखाने से आजाद कराया है. बरसों बाद इन बड़ी किताबों को पाठक मिला, नहीं तो इनका दीमक का शिकार हो जाना तय था. दीमकों ने हमला शुरू कर भी दिया था..
बहरहाल मैं बकवास बंद कर इन किताबों के बारे में बताना शुरू करता हूं. पहली किताब जागोरी(हिंदी में जागरी) तो हिंदी पाठकों के बीच आज भी मशहूर है मगर मैं पिछले दस सालों से इसे तलाश रहा था मुङो कहीं मिली नहीं. सिर्फ सूचना मिली कि एनबीटी (नेशनल बुक ट्रस्ट) ने इसका हिंदी अनुवाद छापा था मगर.. कई बुक फेयर में एनबीटी वालों से पूछताछ की मगर उनके जेहन में यह किताब नहीं थी. मैं इस किताब को इसलिए तलाश रहा था कि इसके लेखक सतीनाथ भादुरी न सिर्फ मेरे गृह जिला पूर्णिया के वाशिंदे थे बल्कि मेरे प्रिय लेखक फणीश्वरनाथ रेणु के गुरु भी रह चुके हैं.
रेणुजी के लेखन पर भादुरी जी की दूसरी प्रसिद्ध रचना ढोढाई चरितमानस के प्रभाव की चर्चा और उस दौर के विद्वजनों द्वारा मैला आंचल को ढोढाई चरितमानस का अनुवाद करार देने के गरमागरम विवाद अपने जमाने में काफी मशहूर रहे हैं. बहरहाल उस जमाने में हिंदी साहित्यकारों ने ढोढाई चरितमानस का हिंदी अनुवाद कराया, तब जाकर यह विवाद शांत हुआ और कहा जाने लगा कि रेणुजी पर भादुरी जी की शैली का प्रभाव भर है..
हालांकि भादुरीजी हमेशा इस विवाद को नकारते रहे. मगर इसका नतीजा यह हुआ कि ढोढाई चरितमानस का हिंदी अनुवाद तो तड़ाक से हो गया. भादुरी जी के सबसे चर्चित कृति जागोरी का अनुवाद देर से हुआ. ढोढाई चरितमानस (लोकभारती प्रकाशन)आज भी मिल जा रही है मगर जागरी कहीं मिलती नहीं. मैंने ढोढाई चरितमानस पढ़ा है. सचमुच अद्भुत कृति है. एक अनाथ दलित (ततमा) युवक की स्वतंत्रता सेनानी में बदलने की कहानी को भादुरी जी ने रामचरित मानस के विभिन्न कांडों के आधार पर लिखा है. उस उपन्यास में भी बाल कांड से लेकर सुंदर कांड होते हुए लंका कांड तक की कथा है. इसके अलावा भादुरी जी की अन्य चर्चित रचनाएं हैं चित्रगुप्तेर फाइल और ओपरिचित. दोनों हिंदी में नहीं है इसलिए पढ़ नहीं पाया. मगर दोनों रचनाओं का परिवेश पूर्णिया जिला का है, ये कहने भर को बांग्ला उपन्यास हैं. इसमें कई शब्द ऐसे मिल जाते हैं जिन्हें सिर्फ पूर्णिया का वासी ही समझ सकता है. बहरहाल..मुङो जागरी की कहानी बताना है.
जागरी भादुरी जी का पहला उपन्यास है. मगर इसने अपने प्रकाशन के साथ बांग्ला पाठकों के बीच हलचल मचा दी ऐसा कहा जाता है.
कहानी पूर्णिया केंद्रीय कारा की है. जहां एक फांसी का कैदी है, उसे अगले सुबह फांसी लगनी है. वह फांसी सेल में बंद है. समय भारत छोड़ो आंदोलन के अंतिम दौर का है. युवक समाजवादी आंदोलनकारी है, उस पर तोड़फोड़, थाने में आगजनी जैसे आरोप हैं. उस दौरान मेरे गांव धमदाहा के थाने में आग लगाई गयी थी, संदर्भ वही है. उसी जेल में युवक के गांधीवादी कांग्रेसी पिता पॉलिटिकल वार्ड में बंद हैं, महिला वार्ड में उसकी माता हैं और जेल के बाहर युवक का छोटा भाई जो कम्युनिष्ट है, बैठा है. कहने को तो वह फांसी के बाद अपने भाई का शव लेने के बैठा है मगर उसके मन में हलचल मची है. उसी की गवाही पर उसके भाई को फांसी की सजा सुनायी गयी है. वह बार-बार सोच रहा है कि उसका बड़ा भाई समझ पायेगा कि सवाल फांसी का नहीं विचारधारा का है और उसका भाई समझ पायेगा कि उसने जो कुछ किया वह उसकी विचारधारा का तकाजा था. वह अपने विचार से कैसे पलट सकता था?
हलचल तो उस जेल में बंद फांसी की सजा का इंतजार कर रहे युवक और उसके माता-पिता के मन में भी है. सभी विचारधारा को जीवन का आधार मानते हैं और अपने मन में मचे हलचल को उजागर नहीं होने देना चाहते. किताब चार अध्याय में बंटा है. पहले अध्याय में फांसी के बंदी युवक के मन में शाम से लेकर भोरउआ(ब्रह्म महूर्त) तक उमड़ने वाले ख्यालों का खाका है. दूसरे में उसके गांधीवादी पिता का जो चरखा कातते हुए रात गुजारने की कोशिश कर रहे हैं. तीसरे में उद्विग्न माता है जो खुद को ही हत भागिनी मानती है और चौथे में युवक के छोटे भाई की कहानी जो सबसे अधिक परेशान है.
चारो अध्याय में विचारों से होते हुए भावनाओं तक की यात्र है. हर चरित्र खुद को जस्टिफाइ करता है, होनी को दिल से और असहजता का परिचय दिये बगैर स्वीकार करने की कोशिश करता है, मगर अंत में जब फांसी की घड़ी आने वाली होती है सभी पिघल कर मोम हो जाते हैं.
कसी हुई कथा और जीवन के विविध रंगों से भरपूर यह उपन्यास भारतीय साहित्य का एक क्लासिक है. मुझ जैसे साहित्य के छात्र के लिए एक पाठय़क्रम की तरह. (दूसरे उपन्यास तीन अध्याय की कहानी भी कुछ ऐसी ही है, इंतजार करें..)

Tuesday, May 22, 2012

खुश होइये कि आप झारखंड में हैं


यह जो मेरे आलेख का शीर्षक है यह पहली नजर में किसी ट्रैवल स्पॉट के विज्ञापन का पंचलाइन लग सकता है. आप थोड़ा और दिमाग लगायेंगे और झारखंड से ठीक-ठाक जुड़ाव रखते होंगे तो कहेंगे कि इस लेख में मैं झारखंड की अजब और गजब कहानियों पर कोई व्यंग्य लिखने जा रहा हूं. मगर जब मैं यह कहूंगा कि यह कशीदा जो मैंने शीर्षक के रूप में लिखा है वह मेरे दिल से निकली हुई सच्ची आवाज है तो आप हैरत में पड़ जायेंगे. बहुत दिमाग लगायेंगे कि आखिर क्या कोई ऐसी वजह है जिससे झारखंड में रहने वालों को खुशी हो सकती है?
झारखंड जो संसाधनों की कॉरपोरेट लूट और उसके विरोध के नाम पर जारी नक्सली गतिविधियों, राजनेताओं के भ्रष्टाचार की नंगई, हर महीने चार दिन होने वाली बंदी और माफिया राज के कारण मशहूर है, वहां होने की वजह से भला मैं क्यों इतना खुश हो गया हूं कि आपसे भी कह रहा हूं कि खुश होइये कि आप झारखंड में हैं?
मैं पिछले छह माह से झारखंड में हूं और अब तक मेरे मन में भी झारखंड के प्रति करीब-करीब वही भाव रहा है जो मैंने इससे पहले वाली पंक्ति में जिक्र किया है. मगर पिछले दिनों मैंने दो समारोह में हिस्सा लिया और वहां का माहौल देख कर मेरे विचार बदल गये. पहला सेमिनार प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश जी की पुस्तकों के विमोचन का था. उस समारोह में मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा, पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी, विधानसभा अध्यक्ष सीपी सिंह के साथ हरिवंशजी तो मंचासीन थे ही, रांची एक्सप्रेस के संपादक बलवीर दत्त भी मौजूद थे.
समारोह के दौरान झारखंड के हालात पर हरिवंश जी ने स्वाभाविक तौर से कई टिप्पणियां कीं. उन्होंने सरकार, राजनेता, उद्योगपति और अफसरों की कुछ इस तरह खिचाई की जैसे कोई अभिभावक अपने बच्चों की करता है. मैंने देखा कि तीनो राजनेता जिनमें एक सीएम, दूसरा पूर्व मुख्यमंत्री और तीसरा विधानसभा अध्यक्ष था, बड़े शिष्ट भाव से उनकी बातों को सुन रहा था.
यह अपने-आप में एक रोचक अनुभव था, खास तौर पर समय के उस दौर में जब एक पड़ोसी राज्य में हमने सुना कि एक व्यंग्यकार को मुख्यमंत्री पर व्यंग्य लिखने की बड़ी भीषण टाइप सजा भुगतनी पड़ी थी. यह वही समय है जब केंद्र सरकार सोशल मीडिया की नकेल कसने का विचार कर रही है और सत्ताधारी दल का एक सांसद मीडिया को औकात में लाने के लिए एक विधेयक पेश करने जा रहा है. मैं आपको बताऊं कि हैरत तो मुङो तब हुआ जब रांची एक्सप्रेस के संपादक बलवीर दत्त जी ने बोलना शुरू किया. उन्होंने अपने चुटीले अंदाज में सरकारों की कलई खोल कर रख दी. मुख्यमंत्री से मुखातिब होकर बलवीर दत्त जी ने कहा कि एक विधायक ने इन्हें मंत्री पद देने के बदले कुछ लाख रुपये प्रति माह रिश्वत देने की पेशकश कर डाली थी. उन्होंने झारखंड निर्माण के दस सालों की राजनीतिक कारगुजारियों पर खुल कर टिप्पणी की. अर्जुन मुंडा के चेहरे पर थोड़ी शिकन जरूर आयी, मगर वे विचलित नहीं हुए. बाद में बड़ी शालीनता से उन्होंने कई आरोपों के जवाब दिये, मगर अपने खिलाफ आरोपों को सुनने का उनका धैर्य लाजवाब था. बलवीर दत्त जी के प्रति भी उन्होंने अभिभावक जैसे सम्मान का ही प्रदर्शन किया.
दूसरा आयोजन एक मीडिया वर्कशाप का था. इस समारोह में भी संयोगवश हमारे प्रधान संपादक मौजूद थे. उप मुख्यमंत्री जब हॉल में पहुंचे तो उन्होंने सबसे पहले हरिवंश जी के पास जाकर सम्मान प्रकट किया. लोगों की बातें सुनी और पूरी विनम्रता प्रदर्शित करते हुए अपनी बातें रखी. कोई दंभ नहीं, उनकी कई मामलों में कुख्याति है, मगर दूसरों को सुनने का धैर्य उनमें भी है और दूसरों को सम्मान देने की भावना भी. वर्कशाप के दूसरे दिन का माहौल बड़ा रोचक था. एक तरफ योजना आयोग के सचिव थे तो दूसरी तरफ पंचायतों के मुखिया और जिला परिषद के उपाध्यक्ष.
सचिव महोदय ने ब्यूरोक्रेटिक हुनर के साथ सरकार की सदाशयता का बखान किया, मगर जिला परिषद के उपाध्यक्ष ने जमीनी हकीकत का बयान करते हुए उन्हें ऐसा धोया कि मंचासीन ग्रामीण विभाग के सचिव तो तनाव में नजर आने लगे. बहरहाल, सचिव महोदय उनकी और उनका पक्ष लेने वाले पत्रकारों के आरोपों को सुनते रहे और बाद में ब्यूरोक्रेटिक चतुराई का परिचय देते हुए उनका जवाब भी दिया. यहां इस बात का जिक्र जरूरी है कि यह सेमिनार सरकारी था और सचिव महोदय खुद आयोजक थे.
फिर आदिवासी एक्टिविस्टों की बारी आयी. उन्होंने तो सरकारी नीतियों और बाबुओं की कार्यप्रणाली की बैंड बजा दी. सेमिनार के विषय को पूरी तरह बकवास करार दिया. मगर लोगों ने इस पूरी बहस को पूरे धैर्य के साथ सुना और आरोपों के जवाब दिये. असहमति के स्वर को सुनने का यह धैर्य आज की तारीख में बहुत कम हुक्मरानों में बचा है. अगर झारखंड के लोगों के पास यह आजादी है तो निश्चित तौर पर यह खुश होने का विषय है. तमाम भ्रष्टाचार और विसंगतियों के बावजूद.

Saturday, May 19, 2012

प्रकृति से प्रेम और परंपराओं की छांव


जब भी मैं पर्यावरण के बारे में सोचता हूं, यह मुङो हमेशा से एक भारी भरकम शब्द की तरह लगता रहा है. जैसे किसी विदेशी आका ने गंवार भारत वासियों को एक लंबा-चौड़ा कठिन होमवर्क दे डाला हो और हम मन मार कर इसे पूरा करने का दिखावा करते रहते हैं. वृक्षारोपण की रस्म अदायगी सरकारी और गैरसरकारी मंचों पर उबाऊ भाषणों के साथ होती है और पांच-छह महीने बाद कोई गाय या बकरी बाड़ा तोड़कर मंत्री, विधायक या अफसर द्वारा लगाये गये पेड़ को चर जाती है. मगर जब अपनी परंपराओं की पड़ताल करता हूं तो प्रकृति से प्रेम के अनुष्ठान यत्र-तत्र बिखरे नजर आते हैं.
कोसी की भीषण बाढ़ के बाद जब मैं सहरसा-मधेपुरा और सुपौल के गांवों में अपने मित्र रूपेश के साथ भटक रहा था, तो एक गांव में एक सज्जन ने बताया कि महज 50 साल पहले तक कोसी के इलाके में तालाब या कुएं की खुदाई होती थी तो खुदाई के बाद उसका विवाह संस्कार संपन्न कराया जाता था. यह विवाह संस्कार सामान्य विवाह की तरह ही होता था, उसमें दूल्हे भी होते थे जो गांव के युवक होते थे. विवाह के उपरांत वे युवक गांव भर के दामाद माने जाते थे. युवक के माता-पिता और भाई-बहन भी उन्हें दामाद जी कहकर ही बुलाते थे. मैंने इस जानकारी की इस्तेमाल सुन्नैर नैका में किया है.
खैर! इस पोस्ट में मैं मुख्य तौर पर रविवार को होने के वाले वट सावित्री पूजन का जिक्र करना चाह रहा हूं. लगभग पूरे देश में ज्येष्ठ माह में बरगद के पेड़ की पूजा की जाती है. पूजन विधि भी तकरीबन एक जैसी ही है. महिलाएं देवी सावित्री की याद में व्रत रखती हैं और बरगद के पेड़ के नीचे बैठ कर उसके सतीत्व की कथा सुनती है. वैसे सतीत्व शब्द आजकल बुद्धिजीवियों के बीच अस्पृश्य हो गया है. इसका अर्थ संकुचित कर दिया गया है और इसकी चर्चा करने वाला व्यक्ति बौद्धिक अपराधी मान लिया जाता है. बहरहाल अपने देश की अधिकांश महिलाएं अभी तक बुद्धिजीवी होने का दर्जा हासिल नहीं कर पायी हैं और न ही उन्हें इस वर्ग से बहिष्कृत होने का कोई अफसोस भी होता है. वे आम तौर पर अपने पति और बच्चों के बारे में अधिक सोचती हैं और सावित्री उनके लिए आज भी आदर्श हैं जो यमराज से अपने पति को जीत लेती हैं. वे इस मौके पर बरगद के पेड़ में जल डालती हैं और धागे से इसके तने को बांध कर बरगद से अपना रिश्ता और प्रगाढ़ करती हैं. हमारे धर्म ग्रंथ कहते हैं कि बरगद के पेड़ के जड़ में ब्रrा, तना में जनार्दन(विष्णु) और शिखर पर शिव का निवास होता है. चुकि बरगद की आयु बहुत लंबी होती है इसलिए इसे दीर्घायु होने का प्रतीक भी माना जाता है. हालांकि पहली नजर में लोग इसे दीर्घायु होने की इच्छा के साथ किया जाने वाला अनुष्ठान मान सकते हैं, मगर मुङो इस पर्व में अपने पूर्वजों के प्रकृति प्रेम की झलक मिलती है.
वर्तमान पर्यावरण संबंधी धारणाओं के अनुसार पेड़ का महत्व भले ही धरती को प्रदूषण मुक्त रखना भर हो, मगर हमारे ग्रामीण पूर्वजों के लिए जेठ के महीने में बरगद की छांव किसी वरदान से कम नहीं थी. उन्हें यह शायद ही पता होगा कि यह विशाल पेड़ आक्सीजन की मात्र बढ़ाता है और आक्सीजन हमारे स्वास्थ्य के लिए जरूरी है. मगर इतना उन्हें पता था कि भरी दुपहरी में थोड़ा सुस्ताने के लिए इससे बेहतर कोई दूसरी जगह नहीं.
उनके घर भी नहीं जिनकी खिड़कियां आम तौर पर बहुत छोटी होती थीं. उन दिनों आम तौर पर पूरा का पूरा टोला दोपहर का वक्त ऐसे ही पेड़ों या आम के बगीचों में गुजारता था. आज भले ही वट सावित्री पूजन के लिए हमें बरगद का पेड़ ढूंढना पड़ता है, उन दिनों बरगद गांव का हिस्सा हुआ करते थे, जो पीढ़ियों को अपने सामने बड़ा होते देखते. तभी रेणुजी ने अपनी पहली कहानी का सूत्रधार बरगद के पेड़ को ही बनाया जो एक गांव की कहानी कहता है. इन दिनों मैं रांची में हूं और पहली बार पत्नी को अकेले वट सावित्री पूजन करना पड़ रहा है. बरगद का पेड़ तो मिल गया है(कोकर मुहल्ले के हैदर अली रोड के ठीक समाने). मगर उसकी हालत दयनीय है. दो दुकानों के बीच यह बुरी तरह फंसा है. सामने वाला हिस्सा तो नजर आ रहा है. पीछे वाले हिस्से से होकर गुजरने का रास्ता नहीं है. पता नहीं औरतें कैसे धागा लपेटती होंगी. वैसे उस पेड़ में काफी धागा लपेटा हुआ नजर आ रहा है. किसी न किसी तरह से लपेटा ही गया होगा. कोकर चौक से लालपुर तक के रास्ते में संभवत: यही इकलौता वट वृक्ष है.
रविवार को अचानक बरगद बाबा का भाव बढ़ जायेगा. पूरे मुहल्ले की औरतें वहां सज-धजकर पहुंचेंगी और उनकी अभ्यर्थना करेंगी. मगर फिर एक साल के लिए लोग उन्हें बिसार देंगे. ऐन सड़क पर होने के बावजूद वह हर किसी के लिए अदृश्य हो जायेगा. लोग ऑटो पकड़ने के लिए वहां खड़े होंगे, उन्हें सिर पर छाया का अहसास होगा मगर इतनी फुरसत नहीं होगी कि पता कर सकें यह छांव किसकी है.

Friday, May 11, 2012

सेलिब्रिटी का सत्य


एक कहावत बड़ी मशहूर है..लीक छोड़ तीनो चले..शायर, शेर, सपूत.. मतलब साफ है. शायर, शेर और सपूत तीनों बनी बनायी लीक पर चलना पसंद नहीं करते. अपनी राह खुद बनाते हैं. मगर बदलते जमाने के साथ कहावत का अर्थ भी काफी बदला है.
आज ब्रेक द रूल ही रूल बन गया है. अगर आपको कोई नहीं जानता और नजर में आना चाहते हैं तो भी या फिर मशहूर हैं और कैरियर में आई स्थिरता की स्थिति में बदलाव चाहते हैं तो भी.
बने-बनाये र्ढे पर अगर आप चलेंगे तो किसी को नजर ही नहीं आयेंगे. ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं. हर जगह, हर फील्ड में. यह कोई नयी बात नहीं. चाहे आप राखी सावंत और पूनम पांडे को देखें, चाहे निर्मल बाबा या फिर इमरान हाशमी और इरफान जैसे अभिनेता. फिल्मी दुनिया तो जैसे रूल ब्रेकरों के उदाहरण से भरी है. अमिताभ तभी छाये जब उन्होंने राजेश खन्ना के रोमांसवाद को झटका देकर एंग्री यंग मैन छवि को पेश किया. शाहरुख ने बाजीगर और डर की नेगेटिव भूमिका स्वीकारी और बादशाह बन बैठे. हालिया उदाहरण देखिये विद्या बालन का डर्टी पिर के इमेज ब्रेकिंग किरदार ने उसे हीरोइन से हीरो बना दिया. जहां तक आमिर खान का सवाल है वे तो जैसे इमेज और रूल दोनों को ब्रेक करने के लिए ही बने हैं. पिछले 24 साल से हिंदी फिल्मों की दुनिया पर राज करने वाले 47 वर्षीय आमिर ने शुरुआत चाकलेटी भूमिका से की मगर जल्द ही जो जीता वही सिकंदर की मदद से एक संवेदनशील कलाकार की छवि बनाने में कामयाब हुए. उस छवि के सहारे रंगीला और राजा हिंदुस्तानी तक का सफर तय किया. फिर सरफरोश से छवि बदलने की कोशिश की. लगान के जरिये तो उन्होंने फिल्म निर्माण में ही छलांग लगा दी.
लगान कई मामलों में उनके जीवन का टर्निग प्वाइंट साबित हुई. इस फिल्म की अपार सफलता के बाद उन्हें लगा कि देश और समाज को केंद्र में रख कर फिल्में बनानी चाहिए. इससे पैसे तो बनते ही हैं, छवि भी निखरती है.
दरअसल भारतीय दर्शन को ठीक से समझने वाले जानते हैं कि महज पैसा कमाने से एक महत्वाकांक्षी व्यक्ति संतुष्ट नहीं हो सकता. वह जय-जयकार भी चाहता है. महत्वाकांक्षा के कई स्तर होते हैं. यही वजह है कि एमजी रामचंद्रन, एनटी रामाराव और अमिताभ जैसे अभिनेता राजनीति में कूद पड़ते हैं. राजकपूर मेरा नाम जोकर बनाकर अपनी गाथा सुनाने निकल पड़ते हैं. बिल गेट्स जैसे कई धनी अपनी संपत्ति दान करने पर उतारू हो जाते हैं.
बहरहाल आमिर ने भी लगान के बाद रंग दे बसंती जैसी देशभक्ति फिल्म और तारे जमीं पर व थ्री इडियेट्स जैसी शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े करनी वाली फिल्में स्वीकारी. अब लोगों के सामने सत्यमेव जयते है. संभवत: आमिर की सबसे महत्वाकांक्षी पेशकश. वे इस पेशकश के जरिये पूरे देश पर छा जाना चाहते हैं और लगभग छा रहे हैं. उनकी पब्लिसिटी टीम ने कोई कसर नहीं छोड़ी है. टीम को पता है कि पहले एपिसोड के बाद क्या माहौल बनेगा और उसे कैसे कैश कराया जा सकता है. अशोक गहलोत से शायद पहले ही बात हो चुकी होगी. अगले एपिसोड के लिए भी कोई ऐसी ही योजना होगी. मगर..
मगर, यहां दो सवाल है. पहला यह शो जिस कथित उद्देश्य से बनाया गया है उसमें वह कितना खरा है? दूसरा इससे अजिर्त छवि कितनी टिकाऊ होगी?
पहले पहला सवाल. जैसा अभी तक लग रहा है, यह शो भारतीय समाज की मूलभूत सामाजिक समस्याओं को पेश कर देश और समाज में एक सार्थक बहस शुरू कराना चाहता है. एक आम टीवी शो के नजरिये से हमें इसकी गुणवत्ता की समीक्षा करनी चाहिए. जैसे कि मूवर्स एंड शेकर्स एक टीवी शो है, इंडियन आइडल दूसरा, एक कॉफी विद करण भी है, एक सच का सामना भी है. जहां तक सत्यमेव जयते का सवाल है, उसने दूसरे शोज के बरक्श मनोरंजन को कतई तरजीह नहीं दी है. संदेश ही उसका मकसद है. शो ने आमिर को प्रेजेंटर चुना है ताकि संदेश प्रभावशाली बन सके और अधिकतम लोगों तक जा सके. जैसे कोई विज्ञापन धोनी या सचिन को या शाहरुख को रखता है. केबीसी ने अमिताभ को रखा और दस का दम ने सलमान को. इस लिहाज से आमिर शो के प्रेजेंटर भी हैं और ब्रांड अंबेस्डर भी. ये दोनों चीजें इस शो का प्लस प्वाइंट हैं. अब अभिनय की कसौटी पर इसे तौला जाये. आमिर ने जिस तरीके से शो को पेश किया, उनकी एंट्री, संवाद अदायगी, साक्षात्कार लेने का तरीका, आंकड़े पेश करने का तरीका और आंसू बहाना भी. शो को गंभीरता से देखने वाला हर इनसान यहां तक कि आमिर का अंध प्रशंसक भी कहेगा यह शो का सबसे कमजोर पहलू है. बिल्कुल नाटकीय,
न एंट्री ठीक थी, न संवाद अदायगी, न तीनों महिलाओं से बात करने का तरीका और न ही आंसू बहाने का अंदाज . इसकी तुलना जरा अमिताभ के केबीसी से या शेखर सुमन के मूवर्स एंड शेकर्स से करें. शाहरुख के पांचवीं पास, सलमान के दस का दम या यहां तक कि राखी सावंत के शो से भी नहीं कर सकते. आमिर बिल्कुल बेजान प्रेजेंटर लग रहे थे. शो में महिलाओं के नकली आंसू न होते तो लगता लोकसभा टीवी पर कोई टॉक शो चल रहा है.
अब शो के कंटेंट पर बात करें, तीन पीड़ित महिलाओं की कहानी सुनायी गयी, कुछ आंकड़े पेश किये गये और यह बताया गया कि लिंग भेद शहरी समाज में अधिक है. दिल्ली की डाक्टर कथा शो का प्लस प्वाइंट थी, मगर एक पीड़ित महिला का वीभत्स चेहरा दिखाना शो के कंटेंट की कमजोर कड़ी. आपमें दम नहीं था इसलिए एक वीभत्स तस्वीर दिखाना पड़ा. समाचार चैनलों में खास तौर पर एनडीटीवी में इस तरह के इश्यूज बड़े शानदार तरीके से दिखाये जाते रहे हैं. निर्माता-निर्देशक को इन शोज से सीखना चाहिये था कि कैसे एक हार्डकोर इश्यू को बेहतर प्रेजेंटेशन के साथ पेश किया जा सकता है. अब सवाल है कि क्या इस शो से आमिर खान को मेधा पाटेकर या अन्ना हजारे या बाबा आम्टे जैसी छवि हासिल हो पायेगी? पहले एपिसोड ने आमिर को बड़ा हाइप दिया है. टीवी से लेकर फेसबुक तक उनकी जय-जयकार है. मगर कुछ विरोध के भी स्वर हैं. कुछ सवाल हैं. सवाल इसलिए हैं कि एक सेलिब्रिटी चाहे तो रातो रात सांसद बन जाता है या समाजसेवक बन जाता है.
आमिर को समझना होगा कि फिल्म की कहानी और समाज के मुद्दों में फर्क होता है. यहां महज अभिनय से काम नहीं चलता. लोग बरसों रास्ते की धूल फांकते हैं. अस्वीकार और अवहेलना सहते हैं. समझ विकसित करते हैं, पीड़ितों के जीवन का हिस्सा बनते हैं. लाठियां खाते हैं, जेल जाते हैं तब जाकर नायक बनते हैं. गरीब की कुटिया में घुस कर रोटी खाने और उसकी कहानी सुनते नकली-आंसू बहाने से लोग नायक नहीं बना करते.
अगर कोई समाज इस आंसुओं को देखकर भावुक हो जाता है तो इसे उस समाज की कमजोरी समझना चाहिये. समझना चाहिये कि हम आज भी राजसत्तात्मक मनोवृत्तियों से उबर नहीं पाये. दुख है बुद्धिजीवी वर्ग के लोग भी बड़ी संख्या में अह्लादित हैं. वे आमिर की पिछली फिल्म डेल्ही बेली का डीके बोस और उनकी पहली बीवी और बच्चों का दुख भूल जाते हैं. अगर आमिर सिर्फ पैसों के लिए ऐसा कर रहे हैं तो ज्यादा चिंता की बात नहीं, पर यदि वे सचमुच समाजसुधार बनना चाह रहे हैं तो उन्हें हूट करने की जरूरत है. साथ ही
ऐसे ट्रेंड को भी अंगूठा दिखाने की जरूरत है जो सेलिब्रिटी को रातोरात कुछ भी बनने की सहूलियत देता है.