Saturday, June 30, 2012

वासेपुर के मुकाबले खड़ा है विशनीटीकर


जहां देश भर में वासेपुर के रंगदारी और गुंडागर्दी की चर्चा है धनबाद के पड़ोसी जिले गिरिडीह के विशनीटीकर गांव के लोगों ने शांति और व्यवस्था की ऐसी मिसाल कायम की है जिस पर दुनिया भर के काबिल मुल्कों को भी रश्क होगा. कभी अपराध और आंतक के लिए कुख्यात इस गांव के लोगों ने 18 साल से थाना-कचहरी का मुंह तक नहीं देखा है. इस गांव के लोगों ने यह कमाल सिर्फ साथ बैठने की समझदारी विकसित कर किया है. आज गांव के तमाम विवाद ग्राम सभा में सुलझा लिये जा रहे हैं. दरअसल अनुराग अपनी फिल्म में जिस वासेपुर को दिखा रहे हैं वह दौर बिहार और झारखंड में काफी पहले बीत चुका है. नई सदी ने इन दो राज्यों को शांति का उपहार दिया है. यहां के लोग वासेपुर की बदनाम कहानी को नहीं सुनना चाहते हैं. उन्हें विशनीटीकर जैसे गांवों की कहानियां अधिक लुभाती है. गिरिडीह के एक पत्रकार बंधु विनोद पांडे ने विशनीटीकर की कथा लिखी है. इस कथा को हमने इस बार पंचायतनामा में प्रकाशित किया है. पूरी कथा आप वहां पढ़ सकते हैं. कहानी की छोटी सी झलक इस पोस्ट में..
गावां प्रखंड मुख्यालय से दस किलोमीटर की दूरी पर बसा यह गांव पहले काफी पिछड़ा हुआ गांव माना जाता था. अस्सी और नब्बे के दशक में गांव में अपराध इस कदर बढ़ गया था कि लोग बाग इस तरफ फटकने से घबराते थे. इसी बीच 1993 में यहां ग्रामीणों ने राजकुमार यादव और बैजनाथ यादव के नेतृत्व में ग्राम सभा का गठन किया और इस सभा ने विशनीटीकर की तकदीर बदल दी. गांव में ग्राम सभा के गठन के बाद पिछले 18 वषों से एक भी मामला थाना नहीं पहुंचा. ऐसी बात नहीं कि मामला को थाना जाने से रोका जाता है. बल्कि परिस्थितियां इतनी बदल गयी है कि अब थाना जाने की जरूरत नहीं होती.
गांव में हर सप्ताह ग्राम सभा की बैठक होती है जहां विवादों को आपस में बैठ कर सुलझा लिया जाता है. पिछले 18 वषों में इस सभा ने 200 से ज्यादा विवाद निबटाये हैं. सभा अपराध के अनुरूप अपने स्तर से दोषी को दंडित भी करती है. यह गांव मिश्रित आबादी की बस्ती है. जहां हरिजन, मुस्लिम, यादव, ब्राह्मण जाति के करीब दो हजार लोग रहते हैं. किंतु गांव में जातीय विवाद और द्वंद का अब नामोनिशान नहीं है. विशनीटीकर की यह सभा केवल विवादों के निबटारे तक ही सीमित नहीं है बल्कि गांव के विकास के लिये सरकारी राशि की भी मुहताज नहीं. श्रमदान से यहां लोगों ने पालमो तालाब, खां आहर और गुडरी तालाब का निर्माण किया और उसकी मरम्मत की. इस तालाब से भीषण गरमी में भी यहां फसल लहलहा रही है. ग्रामीण सजग हुए तो मनरेगा और कई योजनाओं की अच्छी तसवीर झलक रही है. सरकारी मदद से गांव में 13 कूप, 5 चापानल लगाये गये. जिस गांव में कभी कायदे की पगडंडी नहीं थी, वहां मालडा से नीमाडीह तक पक्की सड़क है. गुणवत्ता भी ऐसी कि तीन वर्ष बाद भी सड़क चकचक करता है. ग्राम रक्षा दल के सहयोग से गांव में सखुआ, महुआ के करीब 20 हजार वृक्ष सुरक्षित हैं. इसी तरह शिक्षा पर भी अब गांव में विशेष बल है. ग्राम सभा में ही विद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति पर चर्चा होती है व खर्च जन सहयोग से उठाया जाता है. दस वर्ष पूर्व ही गांव में बिजली आ गयी.

Tuesday, June 19, 2012

लापता जमीर की अनोखी दास्तान


इन दिनों मैंने मंजूर एहतेशाम का उपन्यास दास्तान-ए-लापता पढ़कर खत्म किया है. मंजूर एहतेशाम इस दौर के चुनिंदा उपन्यासकारों में एक हैं और उनका सर्वाधिक प्रसिद्ध उपन्यास सूखा बरगद देश में बढ़ रहे साम्प्रदायिक तनाव और मुसलिम समुदाय के प्रगतिशील युवकों के कट्टर धर्मावलंबियों में तब्दील होने की दास्तान है. यह पुस्तक इग्नू के एमए हिंदी के सिलेबस में शामिल संभवतः एक मात्र ऐसी पुस्तक है जिसके लेखक जीवित हैं. हालांकि लेखक खुद दास्तान-ए-लापता को अपना सबसे पसंदीदा उपन्यास मानते हैं और इसमें लेखक के अपने जीवन की कई घटनाओं के अक्स नजर आते हैं. इस उपन्यास को पढने के दौरान हुए अनुभव का मैं खास तौर पर इसलिए जिक्र करना चाह रहा हूं, क्योंकि भोपाल के अपने प्रवास के दौरान लेखक के साथ मेरे संबंध घनिष्ठ हो गये थे. मैं उनके जीवन की कुछ घटनाओं के बारे में अवगत हूं और उपन्यास पढने के दौरान मैंने उपन्यासकार से फोन पर दो दफा लंबी बातें की जिससे इस उपन्यास को पढने और समझने का सर्वथा अनूठा अनुभव हुआ. किसी पिछली बैठक में मंजूर सर(मैं उन्हें इसी नाम से पुकारता हूं) ने इस उपन्यास के बारे में सतही तौर पर बताया था और मैनें खासी तवज्जो नहीं दी थी. यह जरूर जेहन में था कि किताब अच्छी है, कुछ दिनों पहले अपने शहर भागलपुर में एक किताब की दुकान में यह किताब नजर आ गयी और वह भी पेपरबैक संस्करण में तो रहा नहीं गया और खरीदकर घर ले आया.
किताब के पहला अध्याय डॉक्टर मगरमच्छ के नाम से शुरू होता है, एक मरीज डॉक्टर से शिकायत करता है कि उसे अपने लापता होने का अहसास होता है. वह मरीज बरसों से उस डॉक्टर से अपनी इसी बीमारी का इलाज करवा रहा है, मगर डाक्टर हर बार उसे यह कह कर लौटा देता है कि उसे कोई बीमारी नहीं है न शारीरिक और न ही मानसिक. मगर इस लापता होने के अहसास के कारण उस मरीज का जीवन उसके हाथ से लगातार फिसलता चला गया है. शुरुआती कुछ अध्याय इतने खूबसूरत हैं कि बार-बार अहसास होता है कि अल्बेर कामू का कोई उपन्यास पढ़ रहे हों. वही व्यंग्य की धार और वही जिंदगी की नस को छूने का चकित कर देने वाला अहसास. करीब ५० पेज पढने के बाद मैंने उन्हें फोन लगा दिया.
आमतौर पर मंजूर सर अपनी रचनाओं पर बात करने में परहेज करते हैं. भोपाल प्रवास के दसियों बार उनके साथ चार-चार, पांच-पांच घंटे लंबी बैठक हुई मगर हम ज्यादातर फ्योदोर दोस्तोवस्की, लेव टॉल्सटॉय, अल्बेर कामू, निर्मल वर्मा और शानी के बारे में बतियाते रहे. सूखा बरगद, दास्तान-ए-लापता पर कम ही बातें हुईं. हां, उन्होंने उन दो कहानियों का जरूर कई बार जिक्र किया था जो एक ही विषय उन्होंने और उनके मित्र सत्येन कुमार ने क्रमशः रमजान में मौत और जहाज के नाम से लिखी थीं. दोनों संभवतः उन दोनों प्रसिद्ध लेखकों की पहली रचना थी. खैर, जब मैंने दास्तान.. का जिक्र छेड़ा तो उन्होंने एक ही बात कही कि यह किताब उनके दिल के सबसे करीब है और उनके जीवन को छूते हुए गुजरती है.
उस दफा फोन पर ज्यादातर मैं हीं बोलता रहा, उत्तेजना के वशीभूत होने के कारण जमकर तारीफ करता रहा और वे चुपचाप सुनते रहे. अंत में यही कहा कि उन्हें इंतजार रहेगा कि किताब खत्म होने के बाद मैं उन्हें बताउं कि किताब कैसी लगी.
यह किताब मूलतः एक ऐसे व्यक्ति के बारे में है जो अपने अतिसंवेदनशील मिजाज के कारण दुनियावी तौर-तरीकों से तालमेल नहीं बिठा पाता है. दो-दो इंजीनियरिंग कालेज में एडमिशन होने के बावजूद कोर्स पूरा नहीं कर पाता. एक खूबसूरत और जहीन युवती के मुहब्बत को इसलिए ठुकरा देता है, क्योंकि उसने उसे पहले बहन मान लिया था. दो बार बिजनेस का असफल तजुर्बा लेता है और जमा पूंजी और आत्म विश्वास लुटाकर घर बैठ जाता है. उसके निकम्मेपन से आजिज आकर उसकी बीवी अपनी बेटियों के साथ घर छोङकर चली जाती है और तलाक लेने का फैसला कर बैठती है. इन घटनाओं से गुजरते हुए वह खुद अहसास ए लापता के गिरफ्त में पङ जाता है.
बकौल मंजूर एहतेशाम यह किरदार उनका लापता है. हम सब के अपने-अपने लापता होते हैं, जो जिंदगी की आपाधापी हमारे अंदर ही कहीं खो जाते हैं और हम भी उन्हें भूल जाते हैं. मंजूर एहतेशाम ने भी इंजीनियरिंग की पढाई अधूरी छोङ दी थी और असफल प्रेम की दास्तान भी बकौल उनके सच्ची है, उनकी है या नहीं न मैंने पूछा और न ही उनने बताया. मगर उनका परिवार और बेटियां साथ रहते हैं, उनका फर्नीचर का अच्छा खासा बिजनेस है और सबसे बड़ी बात वे हिंदी के सफल रचनाकार हैं पद्म श्री समेत कई पुरस्कारों से नवाजे जा चुके हैं, निराला सृजनपीठ के अध्यक्ष रह चुके हैं. जबकि वह किरदार जिसका नाम जमीर है अंत में इतना अकेला हो चुका है कि संभवतः खुदकुशी कर लेता है. उपन्यास बाबरी मसजिद के ध्वंस के बाद शहर में लगाये गये कर्फ्यू के बीच मसजिद से लापता की जनाजे की नमाज की गुहार के साथ खत्म होता है.
यह तो है मूल कथा, मगर इसके साथ-साथ कई और गंभीर किरदार है जो जमीर के संपर्क में आते हैं और उसके जीवन को गहराई से प्रभावित करते हैं. बचपन के खेल का साथी अपयैया जो गूंगा है लिहाजा हर खेल में साथी बच्चों के शोषण का शिकार होता है, मगर उसके बिना बच्चों का काम भी नहीं चलता. एक बुआ हैं जो हज से लौटकर आती हैं तो शैतान को पत्थर मारने और एक शिला को चूमने की प्रथा के दौरान हुई ऊब से परेशान रहती है. एक आपा हैं जो जीवन में पहली बार किसी फूल की महक की तरह छा जाती है. एक दोस्त है जो इतना अजीज है कि लोग उसे उसका गे पार्टनर मान बैठते हैं. एक बिजनेस मैन है जो उसका करीबी रिश्तेदार है, पैसे कमाने और ऊंचे रसूख वाले लोगों से ताल्लुकात पैदा करने का हर हुनर उसे मालूम है, मगर वह जमीर से दिली मुहब्बत करता है उसकी दुनियावी मामलों की नातजुर्बेकारी पर हमेशा मशविरा देता है और जब देश छोङकर जा रहा होता है तो उसे खासी रकम देकर जाता है.
उसके बड़े भाई हैं जो दुनियावी मामलों के उस्ताद हैं. अम्मी का तोता है जिसे वह अम्मी की मौत के बाद आजाद कर देता है. हर किरादर की अजीबो-गरीब कहानी है. मगर जिस कहानी से मेरे जैसा पाठक, यह पूरा उपन्यास और खुद जमीर अहमद का किरदार सबसे अधिक प्रभावित होता है वह है मेडिकल की स्टूडेंट अनीसा का.
खुले विचार वाली अनीसा ने पहली ही मुलाकात में जमीर को प्रभावित कर लिया था, मगर अनीसा का यह कहना कि जमीर का चेहरा उसके मरहूम छोटे भाई से मिलता है जमीर ने खुद को अनीसा का मुंहबोला छोटा भाई घोषित कर दिया. आने वाले दिनों में दोनों की नजदीकियां बढ़ती गयीं और जमीर के दिन का अधिकांश वक्त अनीसा के साथ गुजरने लगा. उसके आसपास के लोगों का मानना था कि दोनों के संबंध प्रेमी-प्रमिकाओं जैसे हैं, मगर खुद जमीर इन बातों से इत्तेफाक नहीं रखता था. मगर एक रोज जब अनीसा ने खुद कह दिया कि वह उससे शादी करना चाहती है तो जमीर सकते में आ गया. उसने अनीसा से साफ कह दिया कि अब वह इस तरह से सोच नहीं सकता है. इसके बाद अनीसा ने अपनी जिंदगी के कई राज जमीर को बताये जो खुद अपने आप में दहला देने वाले थे. जैसे कि वह पिछले कई सालों से अपने ही मामा की हवस का शिकार बनती आयी है, क्योंकि उसके यतीम अनीसा पर बड़े अहसान हैं. अनीसा द्वारा शादी का आफर किये जाने के बाद जमीर को जबरदस्त झटका लगा. उसे यह सोचकर दुख हुआ कि उसका यह संबंध भाई-बहन के रिश्ते की छाया पनप रहा था. उसने अनीसा से मिलना बंद कर दिया. इस बीच एक दिन उसने अखबार में खबर देखी कि अनीसा ने खुदकुशी कर ली है.
संयोगवश मैं यह प्रकरण दफ्तर से लौटने के बाद देर रात को पढ़ रहा था. घर में अकेला था. इस प्रकरण को पढ़ कर मैं इतना बेचैन हुआ कि घंटों नींद नहीं आयी. अपना पूरा जीवन नजरों के सामने से गुजरने लगा. कोफ्त भी हुई कि मंजूर सर ने आखिर इतना हिटिंग और कंपेलिंग चेप्टर क्यों लिखा. अगर यह उनकी व्यक्तिगत अनुभूति है तो पाठकों को सदमा देने का क्या तुक था. बहुत संभव है कि आम जीवन में ऐसी घटनाएं होती हों, मगर क्या इसे उपन्यास में शामिल किया जाना चाहिए. यह प्रसंग न सिर्फ कथ्य को प्रभावित करता हुआ जान पड़ा बल्कि उपन्यास के तारतम्य को झटका देता हुआ भी.
अगले दिन न चाहते हुए भी उन्हें फोन लगा बैठा. उन्होंने कहा कि इस बारे में फिलहाल वे कुछ नहीं कहना चाहते, कहानी खत्म होने पर अगर मेरे विचार ऐसे ही होंगे तब बातें होंगी. बहरहाल उन्होंने यह जरूर स्वीकार किया कि कहानी सच्ची है और आगे चल कर ऐसी घटनाएं बढेंगी. मैनें अनुमान लगाया कि शायद यह गाड ऑफ स्माल थिंग्स की तरह अंत तक पढ़ा न जा सके. वैसे भी उनके पहले उपन्यास कुछ दिन और को पढ़ पाना भी मेरे लिए नामुमकिन साबित हुआ था. डॉक्टर मगरमच्छ जैसे व्यंग्यात्मक उदबोधन के साथ शुरू होने वाला यह उपन्यास अंत में कही दिमाग की नसें न दूह ले.
बहरहाल अगले पन्ने में ही मेरे सवालों के जवाब थे. लेखकीय में उन्होंने खुद ही इस घटना की चीड फाड़ करते हुए लिखा था कि हकीकत में ऐसा नहीं हुआ था. यह तो उसके लापता की दास्तान है जहां अनीसा ने खुदकुशी कर ली है.
बाद की कहानी दहलाने वाली नहीं थी मगर अनीसा की खुदकुशी के बाद जो झटका लगा था वह धीरे-धीरे उदासी में बदलता गया. जमीर एक पैसे वाली औरत के चक्कर में फंस गया और उसके साथ जमीर के जिस्मानी ताल्लुकात बन गये. शराब वह पहले भी पीता था, भले ही एविल खाकर मगर बाद में उसका आदी हो गया. बाजारू औरतें भी उसके रूटीन का हिस्सा हो गयी. फिर एक दहलानी वाली रात आयी ३-४ दिसंबर की दरमियानी रात जब यूनियन कारबाइड के कारखाने से निकली गैस ने पूरे भोपाल शहर को अपने आगोश में ले रखा था. दुर्भाग्य से उस रात भी वह अपने घर पर नहीं था, एक दोस्त के साथ शराब पी रहा था और एक बाजारू औरत को विदा कर चुका था. जब गैस का शोर हुआ तो वह अपने दोस्त की स्कूटर पर भाग खड़ा हुआ. चाहते हुए भी अपने परिवार, बीवी-बच्चे की फिकर नहीं कर पाया. और यह चूक उसके बाद के दौर में हमेशा उसे कचोटती रही और बीवी के ताने का कारण बनती रही.
जमीर की मौत रफ्ता-रफ्ता होती रही, वह पल-पल गिरता गया और एक रोज एक पहाडी की चोटी से उसने देखा कि उसके परिवार के कई मरहूम सदस्य एक खुली जीप में सवार होकर उसके पास आ रहे हैं. फिर उसी जीप में उसके लिए भी जगह बनाई गयी. फिर वही बाबरी विध्वंस का शोर, लापता जनाजे की नमाज की हलचल. इस तरह लापता भी लापता हो गया.
हालांकि उपन्यास के बैक कवर पर लिखा है कि यह एक इंसान की उसके वक्त की राजनीतिक घटनाओं से मुठभेङ की कहानी है. मगर मेरी राय में यह एक इंसान की अंदरूनी कथा है. हर इनसान अपने लिए अपने जीवन के कुछ बेहतरीन प्रसंग चुन लेता है और कुछ दुखद और महत्वहीन प्रसंगों को भुला देता है ताकि जीवन अच्छे मूड में जिया जा सका. यह कथा उन भुलाये गये प्रसंगों के सहारे आकार ले चुके उस लापता की है जो धीरे-धीरे इतना मजबूत हो जाता है कि आपके व्यक्तित्व पर ही हावी हो जाता है. फिर वह एक अरसे तक आपको अपने हिसाब से चलाता है, जब वह आपको छोङकर जाता है तो आपका पुराना खुशनुमा व्यक्तित्व भी लापता हो चुका होता है. बहुत संभव है इस कहानी के सहारे लेखक ने इनसानी जमीर के लापता होने की कहानी कही हो. क्योंकि मुख्य किरदार का नाम भी तो जमीर ही है. बहरहाल, मायने अलग-अलग निकाले जा सकते हैं. सागर में डुबकी लगाने पर किसी के नसीब में मोतियां आतीं हैं तो किसी के हिस्से मछलियां... बहरहाल इतना जरूर है कि यह उपन्यास आपके आपकी अपनी ही जिंदगी के बारे में नये सिरे से और पूरी गंभीरता से सोचने पर मजबूर करता है.

Wednesday, June 06, 2012

चकई के चकधुम, मकई के लावा


कल ही गांव से लौटा हूं.बाल और दाढ़ी में मकई का रेशा बरकरार है. हर दुआर पर बोलरी(दाना हटा लेने के बाद बचा भुट्टा) और डंठल का ढेर निगाहों से नहीं हटता.जब तक सोचा कि तसवीरें खीच लूं, देर हो चुकी थी और मैं गाड़ी पर सवार था.फिर भी सोनवर्षा से महेशखूंट के रास्ते में चलती गाड़ी से कुछ तसवीरें खीचने की कोशिश की जो काम चलाऊ भी नहीं है.मगर उन्हें आपके जेरेनजर पेश कर रहा हूं.. साथ में यह मिथलांग गपास्टक भी जो भुट्टों के बारे में है..
बचपन में हम एक दूसरे को पहेलियां बुझाते थे भुट्टे के बारे में .हरी थी मन भरी थी..लाख मोती जड़ी थी..राजा जी के बाग में ..दुशाला ओढ़े खड़ी थी.मगर मैंने कभी मकई को किसी राजा या रईस के बाग में नहीं देखा. भले मक्के दी रोटी गरीब की थाली से उठकर फाइव स्टार होटल तक पहुंच गयी, मगर मक्के की फसल हमेशा की तरह आज भी गरीबों की ही फसल है. जब पूरा मध्य और दक्षिणी बिहार सब्जियों की खेती से तसवीर और तकदीर बदलने में जुटा है. कोसी के किनारे बसने वाले लाखों किसानों ने न जाने क्यों मकई की खेती का रोग लगा लिया है.
कोसी के इलाके में मकई की फसल का फैलना मुङो नीतीश राज में सड़कों के निर्माण से जुड़ा नजर आता है. इस इलाके में पिछले कुछ सालों से चमचमाती सड़कों का जाल बिछ गया है और उन सड़कों के आधे हिस्से पर साल में छह महीने मकई सूखते हुए बड़े आराम से देखा जा सकता है. मगर मकई की खेती ही क्यों.. मुङो इसका जवाब नहीं मिलता.. इससे पहले लोग केले की खेती करते थे, जब इलाके में सड़कें नहीं थी. अक्सर किसान केला काटकर ट्रक पर लाद देते थे और टूटी सड़कों पर कलकत्ता(कोलकाता) या गोरखपुर की मंडी के लिए निकला नवगछिया का केला पसराहा के पास कहीं जाम में फंस जाता और साल भर की मेहनत ट्रक में गल जाती.. सड़कें ठीक हुई तो जाम लगना बंद हुआ..मगर लोगों ने केले की खेती करना ही छोड़ दिया.मकई के पीछे पड़ गये. पूरे इलाके में डिकाल्ब और मोनसेंटो जैसी बीज कंपनियों के इतने पोस्टर चिपके नजर आते हैं कि लगता है कंपनियों ने इस इलाके को गोद ले लिया है. पिछले सालों तक इन कंपनियों के बीज में गड़बड़ी की शिकायतें होती थीं और मकई में दाने ही नहीं आते..फिर किसान बीडीओ के दफ्तर के आगे जाकर फसल के ठूठ को जलाते..ब्लॉक स्तर के रिपोर्टर उनकी तसवीरें खींचकर अपने दफ्तर भेज देते.शुरुआत में यह पेज वन पर छपता फिर अंदर के पन्नों पर रूटीन की औकात में आ जाता..
बहरहाल इस बार कुछ अलग कहानी है. फसल जबरदस्त हुई है.. बंपर ..इतनी कि आंगन से लेकर दुआर तक सोने के कमरे में चौकी के नीचे तक हर जगह मकई ही मकई भरा नजर आता है..पुराना जमाना होता तो बच्चे घर छोड़कर भाग जाते, क्योंकि उस दौर में मकई से दाना खुद छुड़ाना पड़ता था.. मैं खुद इस हालात को ङोल चुका हूं.. सुबह होते ही शुरू हो जाता था.. खाना-नहाना और शौच छोड़कर जितनी तरह के काम होते.वह मकई छुड़ाते-छुड़ाते ही किये जाते थे.. अंगुलियां लहरने लगती..खैर! अब थ्रेसर मशीन आ चुकी है. पल भर में भुट्टे के दाने अलग हो जाते हैं.. थोड़ा शोर होता है, थोड़ी गर्द उड़ती है..मगर हाथों में छाले नहीं पड़ते..
मैं बता रहा था कि इस दफा बंपर फसल हुई है, मगर किसानों के चेहरे पर बंपर खुशी वाला भाव नहीं है. चेहरे से लावा फूट रहा है. कारण इस बंपर फसल को आठ रुपये किलो खरीदने वाला खरीदार भी आसानी से नहीं मिल रहा. किसान ऑफर दे रहे हैं, दो महीने बाद पैसा दे देना. मगर खरीदार मकई के ढेर में हाथ घुसाकर आइडिया लेता है, अभी कच्च है.. दो दिन और सुखाइये. किसान आसमान की ओर देखता है..भीषण गर्मी में भी बच्चों के शरीर पर हर जगह उग आई घमोरियों को देखकर भी ईश्वर से प्रार्थना करता है..चार दिन और रुक जाइये इंद्रदेव.फिर बरसियेगा जितना बरसना होगा..
व्यापारी दो दिन बाद की बात कह कर चला जाता है, मगर किसान को उसकी बात पर भरोसा नहीं. परसों वह सुबह से ही उसके दरवाजे पर खड़ा हो जायेगा. रिक्शे पर बिठा कर दरवाजे पर लायेगा. 5 क्विंटल मकई यानी महज 4 हजार रुपये.. उसे याद आ रहा है. इतना तो खर्च ही हो गया था.. फायदा तो एक पैसे का नहीं हुआ.. मगर दाम तो निकालना ही पड़ेगा नहीं तो धान कैसे रोपेगा..? इलाके में कई लोग व्यापारी हो गये हैं.. किसान को दो माह बाद पैसे देने का वादा कर लिया है.. महज ट्रक का किराया देकर गल्ले का बिजनेस शुरू है.. योजना है कि मुहदब्बू लोगों को तो साल भर टरकाया जायेगा.. जितने निखट्ट थे सब व्यापारी हो गये हैं.. मगर किसान को खुद व्यापारी बनने की हिम्मत नहीं..
वह मर कर फसल उपजायेगा और जैसे-तैसे फसल बेच कर जो पैसा मिला उससे साल भर खेपने की कोशिश करेगा.. जिस साल किसी फसल का बेहतर दाम मिल गया.. कांवर सजा कर बोलबम चला जायेगा या बेटी का बियाह कर लेना.. छुट्टा हुआ तो गांजा पीके ताश खेलने का हुनर सीख लेगा और मन फिर भी नहीं संभला तो एक ठो मडर करके जेल में जा बैठेगा..मगर बिजनेस उससे नहीं होगा.. फसील को व्यापारी को ही बेचेगा..
एक मित्र के घर गया था.. लौटते वक्त सहरसा-बैजनाथपुर वाला रास्ता पकड़ा गया. सड़क के किनारे एक धूर जमीन ऐसी नहीं मिली जिस पर मकई, बोलरी या डंठल न हो.. पता नहीं क्यों इस साल पूरे कोसी वालों ने एक साथ मकई की खेती क्यों कर डाली.. अब आठ रुपये में दो महीने के उधार पर बेचने के लिए व्यापारी के दरवाजे का चक्कर लगा रहे हैं.
शाम ढलने लगी हैं..सोचते-सोचते आंखों के आगे धुंधलका छाने लगता है.. हर तरह मकई का पीला रंग किसी जल समूह सा नजर आने लगता है.. ऐसा लगता है फिर से बाढ़ आ गयी है.. कोसी वाले फिर से एक डूब का शिकार हो गये हैं.. सफर जारी रहता है..कंडक्टर उठाता है.. उठिये महेशखूट आ गया है.