Saturday, July 28, 2012

रोहित शेखर की कहानी, उन्ही की जुबानी

यह उस युवक के संघर्ष की दास्तान है जिसे उसे जन्म देने वाला पिता अपना नाम नहीं देना चाहता था. उसे उसकी पहचान से वंचित रखना चाहता था. आम तौर पर ऐसे मामले में लोग शर्मिदगी के कारण चुप लगा जाते हैं और ताउम्र एक गलत पहचान के साथ जीते हैं. मगर रोहित ने शर्मिदगी को परे ढकेलते हुए अपनी पहचान की लंबी लड़ाई लड़ी और आखिरकार जीत हासिल की. ओपन पत्रिका की रिपोर्टर सोहिनी चट्टोपाध्याय से उन्होंने कभी अपनी बात साझा की थी जिसे सोहिनी ने एक आलेख का रूप दिया था. इस आलेख को पढ़ कर हम रोहित के संघर्ष को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं. मैंने इस लम्बे आलेख को टुकड़ों में अनुवाद कर पोस्ट किया था, अब इसे आप सबों की सुविधा के लिए एक साथ पेश कर रहा हूँ.
आप मेरे नाजायज बाप हैं-रोहित
मैं शायद दुनिया का पहला ऐसा इनसान हूं जो बास्टर्ड साबित होने की लड़ाई लड़ रहा हूं. लोग सम्मान के लिए लड़ते हैं, जायज संतति साबित होने के लिए लड़ते हैं. लेकिन मैं दुनिया को बताना चाहता हूं कि मैं मिस्टर एनडी तिवारी की नाजायज औलाद हूं.
जब मैं बड़ा हो रहा था, मैं त्रिशूल फिल्म को बार-बार देखता था. उस फिल्म में अमिताभ बच्चन संजीव कुमार से कहते थे, तुम मेरे नाजायज बाप हो. उनका यह डायलॉग मुझे काफी प्रभावित करता. मैं अमिताभ का फैन था, उनकी हर फिल्म देखना पसंद करता था. लेकिन जब मैंने यह जाना कि मिस्टर तिवारी मेरे जैविक पिता हैं और मिस्टर शर्मा जो मेरे स्कूल में मेरे पिता के रूप में पैरेंट्स-टीचर मीटिंग अटेंड करते हैं मेरे जैविक पिता नहीं है, मुझे लगने लगा कि यह फिल्म मेरी कहानी बता रही है. इस बात ने मेरे अंदर इस जुनून को पैदा किया कि में मिस्टर तिवारी को बताऊं कि आप मेरे नाजायज बाप हैं.
वैसे में उनसे बहुत जुड़ाव महसूस नहीं करता था. इस बात की कोई गुंजाइश भी नहीं थी. हालांकि मैं उनसे 14 साल की उम्र से ही लगातार मिला करता था. वे हमें अपने पास नहीं रखते थे, हम उनसे मिलने जाया करते थे. हर तीन महीने में हम उनसे मिलने जाया करते थे. मां मुझे स्कूल से पिक कर लेती थी और हम उनके दिल्ली वाले मकान पर जाते थे. उन दिनों वे अपने राजनीतिक कैरियर के शीर्ष पर थे. या तो वे मुख्यमंत्री होते या केंद्र में कैबिनेट मंत्री. उनके बंगले पर जबरदस्त सुरक्षा होती, सैकड़ों लोग उनसे मिलने के लिए इंतजार करते रहते. मगर हमें आने जाने में कोई रोक नहीं होती. वहां के स्टाफ मुझसे बड़े प्यार से व्यवहार करते, मुझे घर का बच्चा मानते. मेरे साथ खेलते, बात करते और मुझे कुछ न कुछ खिलाते. मैं चकित हो जाता कि ऐसा क्यों है. मुझे स्पेशल ट्रीटमेंट क्यों मिल रहा है. हमारे लिए यह इनसान क्या है. यह मेरे बर्थडे पार्टी में क्यों आता है. मुझे इतने उपहार क्यों देता है. जब मिस्टर तिवारी विदेश दौरे पर जाते तो मेरे लिए बड़े खूबसूरत पेंसिल बॉक्स लाते. उन दिनों विदेशी चीजें बड़ी मुश्किल से दिखती थीं. मैं उन्हें अपने स्कूल में दिखाता था. जब वे विदेश नहीं भी जाते तो मेरे लिए सेब और आम के बक्से भिजवाते. आप अगर जानते हों कि राजनेता किस तरह तोहफे भिजवाते हैं तो आप इसे समझ सकते हैं.
एक बार हम लोग उनसे मिलने लखनऊ गये थे. उस वक्त वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे. मैं उस वक्त आठ या नौ साल का था, मैंने देखा कि अमिताभ बच्चन सफेद कुरता पायजाम में उनसे मिलने के लिए उनका इंतजार कर रहे थे. अमिताभ उस वक्त इलाहाबाद के एमपी थे. मैंने मिस्टर तिवारी से कहा कि मैं अपने अपने हीरो के साथ एक तसवीर खिचवाना चाहता था. जब उन्होंने कहा कि यह मुमकिन नहीं है तो मैंने उनके स्टेट एयरक्राफ्ट में उड़ने की फरमाइश की. मैंने उनकी गोद में बैठ कर एयरक्राफ्ट में पूरी दिल्ली का चक्कर लगाया था.
नानी ने मुझे बताया था
मुझे अपनी तरफ ध्यान दिया जाना पसंद आता था. मगर जब नौ या दस साल का था, मैंने लोगों से पूछना शुरू कर दिया कि क्यों यह इनसान मुझे इतने तोहफे देता है. मेरा एक बड़ा भाई भी है, जो मेरी मां के कानूनी पति बीपी शर्मा का बेटा है. उसे इतना तोहफा नहीं मिलता, हालांकि मुझे जरूर उन तोहफों को उनके साथ शेयर करने कहा जाता है. और यह भी कि मेरी मां क्यों उसे अपने साथ तिवारी के पास नहीं ले जाती.
मैं गौर करता कि उनसे मुलाकात के बाद मेरी मां रोती हुई वापस होतीं. जब-जब उनसे मुलाकात होती उसके कुछ दिन बाद मेरी मां को अस्थमा का दौरा आ जाता. ज्यादातर वो और मेरी मां अकेले में बातें करते और उनमें तीखी बहस होती. उस वक्त मिस्टर तिवारी मुझे बाहर खेलने के लिए भेज देते, अपने स्टाफ के साथ. उसी दौरान मैंने महसूस करना शुरू कर दिया कि बेडरूम एक निजी क्षेत्र है और लिविंग रूम सार्वजनिक. मेरी मां क्यों एक ऐसे आदमी से मिलने आती है, जो उनके साथ इतना बुरा व्यवहार करता है. मेरे प्रति भी उनका व्यवहार बदलने लगा था. कई बार वह मेरे साथ खेलते, बातें करते और गाना गाते. गाना उन्हें काफी पसंद था. मगर कई बार ऐसा भी होता कि वे मेरी मौजूदगी पर ध्यान तक नहीं देते.
एक बार जब मैं 11 या 12 साल का था मेरी नानी ने मुझे बताया कि मिस्टर तिवारी मेरे असली पिता हैं. मैं उनकी बात सुनकर हंस पड़ा. जब मैंने अपनी मां से यह बताया तो उन्होंने कहा कि यह सच है. इसी कारण मिस्टर तिवारी से उनकी बहस होती है. वे उनपर दवाब डाल रही हैं कि वे मुझे अपना बेटा स्वीकार करें. लेकिन वे कहते हैं उनकी पत्नी इस बात के लिए तैयार नहीं है.
मेरे नाना उनके लिए गुरु सरीखे थे
नारायण दत्त तिवारी तब मेरी मां के नजदीक आये जब वह मेरे नाना प्रोफेसर शेर सिंह से मिलने उनके पास आया करते थे. यह सत्तर का दशक था. मेरे नाना उस वक्त केंद्रीय मंत्री थे और वे हरियाणा राज्य के संस्थापकों में से एक थे. मेरे नाना उनके लिए गुरु सरीखे थे. मेरी मां का वैवाहिक संबंध सुखद नहीं रहा और वे उस दौरान नाना के साथ रहा करती थीं. हालांकि मिस्टर बीपी शर्मा मेरे लिए अच्छे पिता साबित हुए मगर वे मेरी मां के लिए अच्छे पति नहीं थे. मेरे नाना इस बात को समझते थे. मिस्टर तिवारी को भी इस बात का अहसास था. उन्होंने मेरी मां से कला कि उनकी शादी भी असफल साबित हुई है. वे उस दौरान पचास के लपेटे में थे. उन्होंने मेरी मां से कहा कि वे उनसे एक बच्चा चाहते हैं, क्योंकि उनकी बीवी उन्हें यह सुख दे पाने में सक्षम नहीं है. उन्होंने मेरी मां से वादा किया कि जैसे ही उनका तलाक हो जाता है वे उनसे शादी कर लेंगे. मेरे नाना ने उन पर भरोसा किया और मेरी मां भी सहमत हो गयीं.
जब मेरा जन्म हुआ तो मां ने मुझे रोहित शेखर नाम दिया, उन्हें भरोसा था कि मिस्टर तिवारी मुझे पुत्र के रूप में स्वीकार कर लेंगे. मगर जब बर्थ सर्टिफिकेट पर हस्ताक्षर करने की बारी आयी तो मिस्टर तिवारी ने यह बहाना बनाया कि इससे उनके राजनीतिक कैरियर पर नकारात्मक असर पड़ेगा. आखिरकार बीपी शर्मा को उस पर हस्ताक्षर करने पड़े. मगर उन्होंने कभी मुझे रोहित शेखर शर्मा नहीं कहा, उन्हें विश्वास था कि मिस्टर तिवारी अपनी बात से पलटेंगे नहीं.
मैं एक गुस्सैल और संशयग्रस्त किशोर था और कई बार अपनी मां पर बरस पड़ता था कि उन्होंने मेरा जीवन बरबाद कर दिया. 1993 में मिस्टर तिवारी की पत्नी गुजर गयीं और मेरी मां ने सोच अब अंतत: वे मुझे अपनी पहचान दे देंगे. लेकिन तब मिस्टर तिवारी ने हमसे सारे नाते तोड़ लिये.
मैं कह सकता हूं कि उन दिनों मेरी जिंदगी नरक में गुजर रही थी. मुझे पढ़ने में और सोने में परेशानी होती थी. मैं गुस्से से भरा था और खुद को अपमानित महसूस करता था. उस दौरान मैं कालेज में थे, मैं डिप्रेशन और इन्सोमिया से पीड़ित था. मैं किसी तरह क्लास जाता और पढ़ाई करता.
मैंने फिर से 2002 में उनसे मुलाकात की. उस वक्त वे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री थे. मैंने पहली बार उनसे चेतावनी भरे लहजे में बात की. मगर उनका रुख सहयोगी था, उन्होंने अकेले में मुझे पुत्र के रूप में स्वीकार किया.
2002 से 2005 के बीच हम कई बार मिले, मुझे हमेशा होटल में ठहराया जाता था. कमरे में जब हम लोग अकेले होते थे तो वे हमेशा अपनी प्लेट से खाने के लिए मुझे प्रोत्साहित करते थे. एक से अधिक बार मेरे सामने वे बोल चुके थे, यह तो हमारा बेटा है यह अपना रास्ता खुद बनायेगा. मगर कमरे से बाहर वे बिल्कुल अलग इनसान होते थे. एक सुबह वे अपने समर्थकों से मुलाकात कर रहे थे, उस वक्त मैंने उनके कमरे में जाने की कोशिश की तो उनके अंगरक्षकों ने मुझे यह कहते हुए रोक दिया कि नहीं साहब इस वक्त नहीं. एक बार मेन गेट के बाहर मैं खड़ा था आसपास कई दूसरे लोग भी उनके इंतजार में खड़े थे. वे जब बाहर आये तो उन्होंने मुझसे निगाहें तक नहीं मिलायी.
एक-दो बार मैं उनको कह चुका था कि मैं पूरी गंभीरता से इस मसले को अदालत में ले जाने का मन बना चुका हूं. मगर वे हमेशा सोचते कि मैं ऐसा नहीं करूंगा. मेरे कई दोस्त और रिश्तेदार भी कहते थे कि बड़े लोगों में तो यह सब चलता है. मगर मैं इस बात तो मानने के लिए तैयार नहीं था कि बड़े और पावरफुल लोगों को कुछ भी करने की छूट है. यह तो सामंती मानसिकता है. मैं अपने और अपनी मैं के लिए यह पहचान हासिल करना चाहता था, क्योंकि हमनें इस दर्द सहा था.
मैं दिसंबर 2005 में उनसे आखिरी बार मिला. वे किसी काम के सिलसिले में दिल्ली आये थे और मानसिंह रोड स्थित ताज होटल में ठहरे थे. मैं मेरी मां और मेरी नानी उनसे मिलने गये थे, मगर उन्होंने हमारी तरफ देखा तक नहीं. वे कई लोगों से घिरे थे. एक घंटे से अधिक समय तक इंतजार करने के बाद हमने एक चिट में उनके लिए संदेश भिजवाया, जब भी आपको फुरसत हो आप हमारे घर आयें और हमारे साथ एक कप चाय पीने का मौका निकालें. मगर जब वे बाहर आये तो उन्होंने हमें इंतजार करता देखा. उस वक्त उन्होंने हमें दिखाते हुए उस चिट को गोल बनाकर बाहर फेंक दिया. यही वह वक्त था जब मैंने फैसला कर लिया.
हर्ट अटैक, सेरेब्रल स्ट्रोक और मुकदमा
मेरे वकील और मैंने खूब रिसर्च किया, वकील नर्वस था क्योंकि यह अनोखा मुकदमा था. इसके अलावा मिस्टर तिवारी पावरफुल आदमी थे. मैं भी डरा हुआ था. मुझे इस बात का भी डर था कि कहीं मेरे केस को पब्लिसिटी स्टंट मानकर खारिज न कर दिया जाये. इसके अलावा रात को आने वाले फोन कॉल की मुसीबत अलग थी. पिछले एक दशक से हमें इस तरह के धमकी भरे फोन आते रहते थे कि मुझे टुकड़े-टुकड़े कर देंगे और गटर में फेक देंगे. मिस्टर तिवारी हमेशा इस मामले से अपना कनेक्शन होने की बात से मुकर जाते, कहते जरूर हमारा कोई दुश्मन होगा.
5 जुलाई 2007 को मुझे दिल का दौरा पड़ा. मैं घर में बैठकर विंबलडन के मुकाबले देख रहा था कि मुङो पीठ में जबरदस्त दर्द का अहसास हुआ. मुझे देखने घर आये डॉक्टर को यह समझ नहीं आया कि मुझे हर्ट अटैक आया है, उन्होंने मुङो कोई दर्द निवारक दवा दे दी. मैं अपना काम करता रहा. सितंबर 2007 तक हमलोग मुकदमा दायर करने के लिए तैयार थे. 12 सितंबर की रात मुझे मस्तिक आघात आ गया, क्योंकि पिछले हर्ट अटैक ने मेरे हर्ट में दो थक्के छोड़ दिये थे. 13 सितंबर को मैं अस्पताल के बिस्तर पर अचेत पड़ा था उसी दौरान मेरे वकील ने मुकदमा दायर किया. मेरे स्ट्रोक के सदमे में उससे एक तकनीकी भूल हो गयी. अगर आप किसी महत्वपूर्ण सरकारी व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा करते हैं तो आपको दो माह पहले उसे नोटिस भेजना पड़ता है.जब मेरी मेडिकल रिपोर्ट आयी तो उसमें हर्ट अटैक और सेरेब्रल स्ट्रोक का कारण तनाव और इन्सोमिया बताया गया था. इसके बाद मैंने योग, ध्यान करना और हिंदुस्तानी क्लासिकल म्यूजिक सीखना शुरू कर दिया. मैं धीरे-धीरे ठीक हो रहा था, लेकिन मेरा बायां पैर ठीक से काम नहीं रहा था.
अप्रैल 2008 में मैंने दुबारा दिल्ली हाई कोर्ट में मुकदमा दायर किया. 25 नवंबर 2008 को कोर्ट ने मिस्टर तिवारी के नाम से समन जारी कर दिया. वे अब ऐसे पहले गवर्नर बन गये थे जिनके नाम कोर्ट का समन जारी हुआ हो. मिस्टर तिवारी ने इस आदेश का इस आधार पर विरोध किया कि गवर्नर के रूप में उन्हें कोर्ट में हाजिर होने से छूट मिलनी चाहिये. नवंबर 2009 में दिल्ली हाई कोर्ट ने मुकदमे को तकनीकी आधार पर खारिज कर दिया, मगर मैंने उस आदेश को चुनोती देने का फैसला किया.
मुकदमे की सुनवायी बड़ी त्रसाद थी. मुझे अक्सर बास्टर्ड, पब्लिसिटी स्टंट करने वाला और ब्लैक मेलर कहा जाता, वहीं मेरी मां को हृदयहीन महिला कह कर पुकारा जाता. तभी मुझे महसूस हुआ कि बास्टर्ड कितना जलील करने वाला शब्द है. यह समानता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करने वाला है. मैंने इस शब्द को सार्वजनिक रूप से इस्तेमाल करने पर बैन लगाने के लिए याचिका दायर की. अप्रैल 2010 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने मिस्टर तिवारी को आदेश दिया कि चार हफ्ते के भीतर वे अपना लिखित बयान पेश करें. मुकदमा पेश होने के दो साल तक उन्होंने केस के खिलाफ जवाब दायर करने की जरूरत तक नहीं समझी. इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि अपने देश में ताकतवर लोग कानून के साथ कैसा व्यवहार करते हैं.
23 अक्तूबर 2010 को दिल्ली हाई कोर्ट ने संतति (जैविक पिता) और वारिस (कानूनी पिता) को परिभाषित करते हुए मेरे पक्ष में ऐतिहासिक फैसला सुनाया. जस्टिस जेएस रविंद्र भट्ट ने इस फैसले में लिखा, कोर्ट की राय में लिजिटिमेसी और पेटरनिटी दोनों बच्चों के जायज रुचि के विषय हैं और भारतीय कानून के अंतर्गत बिना किसी पूर्वग्रह के दोनों की पहचान की जानी चाहिये. जहां लिजिटिमेसी को कानूनी आधार पर तय करना चाहिये वहीं पेटरनिटी को विज्ञान और दूसरे वैध स्रोतों से. इस आदेश में मिस्टर तिवारी से डीएनए टेस्ट करवाने के लिए कहा गया. अदालत ने ब्लड टेस्ट के मामले में शीघ्रता बरतने का निर्देश दिया यह कहते हुए कि कहीं मामले का महत्वपूर्ण सुराग हमेशा के लिए खत्म न हो जाये. अदालत का इशारा मिस्टर तिवारी की बढ़ती उम्र की तरफ था, उस वक्त वे 86 साल के हो चुके थे.
यह मामला दिल्ली हाई कोर्ट के ज्वाइंट रजिस्ट्रार के साथ आठ से दस बार लाया गया मगर मिस्टर तिवारी ने अपना सैंपल नहीं दिया. अंतत: ज्वाइंट रजिस्ट्रार ने मिस्टर तिवारी से सैंपल लेने के लिए 1 जून 2011 की तारीख तय की. उस तारीख को उनके वकील ने तर्क दिया कि वे डीएनए सैंपल के लिए जबरदस्ती नहीं कर सकते और मेरे दुर्भाग्य से कोर्ट ने सितंबर 2011 में उनकी बात मान ली.
मैंने अपील किया. 27 अप्रैल 2012 को दिल्ली हाई कोर्ट ने पिछले आदेश को खारिज करते हुए आदेश दिया कि मिस्टर तिवारी को ब्लड सैंपल देना ही होगा. उस आदेश का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह था कि अगर मिस्टर तिवारी सैंपल देने से मुकरते हैं तो समुचित मात्र में पुलिस बल का इस्तेमाल करते हुए सैंपल हासिल करने की छूट दी गयी. इसका अर्थ यह कि अगर मिस्टर तिवारी अपने हजारों समर्थकों को जुटा लेते हैं तो अधिकारी पर्याप्त मात्र में पुलिस बल जुटाकर इस आदेश का पालन करवा सकते हैं. मिस्टर तिवारी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की कि इस आदेश से उनके निजता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन हो रहा है. मगर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उनकी बढ़ती उम्र को देखते हुए उनके देहरादून स्थित आवास से सैंपल लिया जा सकता है.
29 मई 2012 को मैंने 2005 के बाद पहली बार मिस्टर तिवारी को देखा जब मैं अपनी मां, अपने वकील और कोर्ट द्वारा तय किया गये अधिकारी के साथ उनके घर गया था. वे ठीक से बातें कर रहे थे. उन्होंने मुझसे पूछा, और बेटा, तुम्हारी पढ़ाई कैसी चल रही है? मैंने कहा, आपकी कृपा की बदौलत मैंने अपनी पढ़ाई को होल्ड पर रख दिया है और अदालत के चक्कर काट रहा हूं. जब मैंने अपने वकील को उनकी दीवार पर टंगी नेहरू जी की तसवीर दिखायी तो उन्होंने अपने गार्ड से कहा, देखो बेटा क्या बोल रहा है. उन्हें यह तसवीर पसंद आयी है. उनको यह भेंट कर देना. मैंने तत्काल कहा, आपसे बहुत सारे भेंट मिले हैं. बस ब्लड सैंपल भेंट कर दीजिये.
उन्होंने बड़ी आसानी से ब्लड सैंपल दे दिये. जब हमने सैंपल पर साइन कर दिये तो वे मेरी मां की तरफ मुड़े. उन्होंने कहा, बहुत दिनों से तुम्हारी आवाज नहीं सुनी. राग दुर्गा सुना दो. मेरी मां यह सुनकर सन्न रह गयी. वह बोली, तुम फिर मुझे भ्रमित कर रहे हो. साइन करो और हमें जाने दो. मुझे भरोसा था कि सैंपल के साथ छेड़छाड़ नहीं की जायेगी. क्योंकि अदालत ने मेरी जिज्ञासा का समर्थन किया था. जब टेस्ट के नतीजे आयेंगे, मैं अपना नाम बदल कर रोहित शेखर तिवारी सिंह करने की याचिका दायर करूंगा. सिंह मेरे हीरो, मेरे नाना प्रोफेसर शेर सिंह के नाम से होगा. फिर मैं भरन-पोषण की मांग करूंगा जो मिस्टर तिवारी ने सालों से नहीं चुकाया है. पहले मैं भरन-पोषण के बारे में नहीं सोचता था मगर मुकदमे के दौरान उनके एरोगेंस ने मुझे अपना विचार बदलने के लिए मजबूर किया. मैं उन्हें हर चीज अदा करने के लिए मजबूर करूंगा.

उन्हें लगता था मैं कोर्ट नहीं जाऊंगा : रोहित


यह उस युवक के संघर्ष की दास्तान है जिसे उसे जन्म देने वाला पिता अपना नाम नहीं देना चाहता था. उसे उसकी पहचान से वंचित रखना चाहता था. आम तौर पर ऐसे मामले में लोग शर्मिदगी के कारण चुप लगा जाते हैं और ताउम्र एक गलत पहचान के साथ जीते हैं. मगर रोहित ने शर्मिदगी को परे ढकेलते हुए अपनी पहचान की लंबी लड़ाई लड़ी और आखिरकार जीत हासिल की. ओपन पत्रिका की रिपोर्टर सोहिनी चट्टोपाध्याय से उन्होंने कभी अपनी बात साझा की थी जिसे सोहिनी ने एक आलेख का रूप दिया था. इस आलेख को पढ़ कर हम रोहित के संघर्ष को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं. मूल आलेख के हिंदी अनुवाद का दूसरा भाग -
2002 से 2005 के बीच हम कई बार मिले, मुङो हमेशा होटल में ठहराया जाता था. कमरे में जब हम लोग अकेले होते थे तो वे हमेशा अपनी प्लेट से खाने के लिए मुङो प्रोत्साहित करते थे. एक से अधिक बार मेरे सामने वे बोल चुके थे, यह तो हमारा बेटा है यह अपना रास्ता खुद बनायेगा. मगर कमरे से बाहर वे बिल्कुल अलग इनसान होते थे. एक सुबह वे अपने समर्थकों से मुलाकात कर रहे थे, उस वक्त मैंने उनके कमरे में जाने की कोशिश की तो उनके अंगरक्षकों ने मुङो यह कहते हुए रोक दिया कि नहीं साहब इस वक्त नहीं. एक बार मेन गेट के बाहर मैं खड़ा था आसपास कई दूसरे लोग भी उनके इंतजार में खड़े थे. वे जब बाहर आये तो उन्होंने मुझसे निगाहें तक नहीं मिलायी.
एक-दो बार मैं उनको कह चुका था कि मैं पूरी गंभीरता से इस मसले को अदालत में ले जाने का मन बना चुका हूं. मगर वे हमेशा सोचते कि मैं ऐसा नहीं करूंगा. मेरे कई दोस्त और रिश्तेदार भी कहते थे कि बड़े लोगों में तो यह सब चलता है. मगर मैं इस बात तो मानने के लिए तैयार नहीं था कि बड़े और पावरफुल लोगों को कुछ भी करने की छूट है. यह तो सामंती मानसिकता है. मैं अपने और अपनी मैं के लिए यह पहचान हासिल करना चाहता था, क्योंकि हमनें इस दर्द सहा था.
मैं दिसंबर 2005 में उनसे आखिरी बार मिला. वे किसी काम के सिलसिले में दिल्ली आये थे और मानसिंह रोड स्थित ताज होटल में ठहरे थे. मैं मेरी मां और मेरी नानी उनसे मिलने गये थे, मगर उन्होंने हमारी तरफ देखा तक नहीं. वे कई लोगों से घिरे थे. एक घंटे से अधिक समय तक इंतजार करने के बाद हमने एक चिट में उनके लिए संदेश भिजवाया, जब भी आपको फुरसत हो आप हमारे घर आयें और हमारे साथ एक कप चाय पीने का मौका निकालें. मगर जब वे बाहर आये तो उन्होंने हमें इंतजार करता देखा. उस वक्त उन्होंने हमें दिखाते हुए उस चिट को गोल बनाकर बाहर फेंक दिया.
यही वह वक्त था जब मैंने फैसला कर लिया.
हर्ट अटैक, सेरेब्रल स्ट्रोक और मुकदमा
मेरे वकील और मैंने खूब रिसर्च किया, वकील नर्वस था क्योंकि यह अनोखा मुकदमा था. इसके अलावा मिस्टर तिवारी पावरफुल आदमी थे. मैं भी डरा हुआ था. मुङो इस बात का भी डर था कि कहीं मेरे केस को पब्लिसिटी स्टंट मानकर खारिज न कर दिया जाये. इसके अलावा रात को आने वाले फोन कॉल की मुसीबत अलग थी. पिछले एक दशक से हमें इस तरह के धमकी भरे फोन आते रहते थे कि मुङो टुकड़े-टुकड़े कर देंगे और गटर में फेक देंगे. मिस्टर तिवारी हमेशा इस मामले से अपना कनेक्शन होने की बात से मुकर जाते, कहते जरूर हमारा कोई दुश्मन होगा.
5 जुलाई 2007 को मुङो दिल का दौरा पड़ा. मैं घर में बैठकर विंबलडन के मुकाबले देख रहा था कि मुङो पीठ में जबरदस्त दर्द का अहसास हुआ. मुङो देखने घर आये डॉक्टर को यह समझ नहीं आया कि मुङो हर्ट अटैक आया है, उन्होंने मुङो कोई दर्द निवारक दवा दे दी. मैं अपना काम करता रहा. सितंबर 2007 तक हमलोग मुकदमा दायर करने के लिए तैयार थे. 12 सितंबर की रात मुङो मस्तिक आघात आ गया, क्योंकि पिछले हर्ट अटैक ने मेरे हर्ट में दो थक्के छोड़ दिये थे. 13 सितंबर को मैं अस्पताल के बिस्तर पर अचेत पड़ा था उसी दौरान मेरे वकील ने मुकदमा दायर किया. मेरे स्ट्रोक के सदमे में उससे एक तकनीकी भूल हो गयी. अगर आप किसी महत्वपूर्ण सरकारी व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा करते हैं तो आपको दो माह पहले उसे नोटिस भेजना पड़ता है.जब मेरी मेडिकल रिपोर्ट आयी तो उसमें हर्ट अटैक और सेरेब्रल स्ट्रोक का कारण तनाव और इन्सोमिया बताया गया था. इसके बाद मैंने योग, ध्यान करना और हिंदुस्तानी क्लासिकल म्यूजिक सीखना शुरू कर दिया. मैं धीरे-धीरे ठीक हो रहा था, लेकिन मेरा बायां पैर ठीक से काम नहीं रहा था.
अप्रैल 2008 में मैंने दुबारा दिल्ली हाई कोर्ट में मुकदमा दायर किया. 25 नवंबर 2008 को कोर्ट ने मिस्टर तिवारी के नाम से समन जारी कर दिया. वे अब ऐसे पहले गवर्नर बन गये थे जिनके नाम कोर्ट का समन जारी हुआ हो. मिस्टर तिवारी ने इस आदेश का इस आधार पर विरोध किया कि गवर्नर के रूप में उन्हें कोर्ट में हाजिर होने से छूट मिलनी चाहिये. नवंबर 2009 में दिल्ली हाई कोर्ट ने मुकदमे को तकनीकी आधार पर खारिज कर दिया, मगर मैंने उस आदेश को चुनोती देने का फैसला किया.
(यह एक लंबा आलेख है, इसका शेष भाग अगले पोस्ट में)

Friday, July 27, 2012

रोहित शेखर को पिता मुबारक


मेरे इस पोस्ट का जो शीर्षक है उसे कृपया व्यंग्य के रूप में न लिया जाये. यह संभवत: दुनिया के इतिहास में पहली घटना है जब एक बेटे ने अपने बाप को जन्म दिया. यह उस युवक के संघर्ष की दास्तान है जिसे उसे जन्म देने वाला पिता अपना नाम नहीं देना चाहता था. उसे उसकी पहचान से वंचित रखना चाहता था. आम तौर पर ऐसे मामले में लोग शर्मिदगी के कारण चुप लगा जाते हैं और ताउम्र एक गलत पहचान के साथ जीते हैं. मगर रोहित ने शर्मिदगी को परे ढकेलते हुए अपनी पहचान की लंबी लड़ाई लड़ी और आखिरकार जीत हासिल की. ओपन पत्रिका की रिपोर्टर सोहिनी चट्टोपाध्याय से उन्होंने कभी अपनी बात साझा की थी जिसे सोहिनी ने एक आलेख का रूप दिया था. इस आलेख को पढ़ कर हम रोहित के संघर्ष को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं. मूल आलेख का हिंदी अनुवाद
आप मेरे नाजायज बाप हैं-रोहित
मैं शायद दुनिया का पहला ऐसा इनसान हूं जो बास्टर्ड साबित होने की लड़ाई लड़ रहा हूं. लोग सम्मान के लिए लड़ते हैं, जायज संतति साबित होने के लिए लड़ते हैं. लेकिन मैं दुनिया को बताना चाहता हूं कि मैं मिस्टर एनडी तिवारी की नाजायज औलाद हूं.
जब मैं बड़ा हो रहा था, मैं त्रिशूल फिल्म को बार-बार देखता था. उस फिल्म में अमिताभ बच्चन संजीव कुमार से कहते थे, तुम मेरे नाजायज बाप हो. उनका यह डायलॉग मुझे काफी प्रभावित करता. मैं अमिताभ का फैन था, उनकी हर फिल्म देखना पसंद करता था. लेकिन जब मैंने यह जाना कि मिस्टर तिवारी मेरे जैविक पिता हैं और मिस्टर शर्मा जो मेरे स्कूल में मेरे पिता के रूप में पैरेंट्स-टीचर मीटिंग अटेंड करते हैं मेरे जैविक पिता नहीं है, मुझे लगने लगा कि यह फिल्म मेरी कहानी बता रही है. इस बात ने मेरे अंदर इस जुनून को पैदा किया कि में मिस्टर तिवारी को बताऊं कि आप मेरे नाजायज बाप हैं.
वैसे में उनसे बहुत जुड़ाव महसूस नहीं करता था. इस बात की कोई गुंजाइश भी नहीं थी. हालांकि मैं उनसे 14 साल की उम्र से ही लगातार मिला करता था. वे हमें अपने पास नहीं रखते थे, हम उनसे मिलने जाया करते थे. हर तीन महीने में हम उनसे मिलने जाया करते थे. मां मुझे स्कूल से पिक कर लेती थी और हम उनके दिल्ली वाले मकान पर जाते थे. उन दिनों वे अपने राजनीतिक कैरियर के शीर्ष पर थे. या तो वे मुख्यमंत्री होते या केंद्र में कैबिनेट मंत्री. उनके बंगले पर जबरदस्त सुरक्षा होती, सैकड़ों लोग उनसे मिलने के लिए इंतजार करते रहते. मगर हमें आने जाने में कोई रोक नहीं होती. वहां के स्टाफ मुझसे बड़े प्यार से व्यवहार करते, मुझे घर का बच्चा मानते. मेरे साथ खेलते, बात करते और मुझे कुछ न कुछ खिलाते. मैं चकित हो जाता कि ऐसा क्यों है. मुझे स्पेशल ट्रीटमेंट क्यों मिल रहा है. हमारे लिए यह इनसान क्या है. यह मेरे बर्थडे पार्टी में क्यों आता है. मुझे इतने उपहार क्यों देता है. जब मिस्टर तिवारी विदेश दौरे पर जाते तो मेरे लिए बड़े खूबसूरत पेंसिल बॉक्स लाते. उन दिनों विदेशी चीजें बड़ी मुश्किल से दिखती थीं. मैं उन्हें अपने स्कूल में दिखाता था. जब वे विदेश नहीं भी जाते तो मेरे लिए सेब और आम के बक्से भिजवाते. आप अगर जानते हों कि राजनेता किस तरह तोहफे भिजवाते हैं तो आप इसे समझ सकते हैं.
एक बार हम लोग उनसे मिलने लखनऊ गये थे. उस वक्त वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे. मैं उस वक्त आठ या नौ साल का था, मैंने देखा कि अमिताभ बच्चन सफेद कुरता पायजाम में उनसे मिलने के लिए उनका इंतजार कर रहे थे. अमिताभ उस वक्त इलाहाबाद के एमपी थे. मैंने मिस्टर तिवारी से कहा कि मैं अपने अपने हीरो के साथ एक तसवीर खिचवाना चाहता था. जब उन्होंने कहा कि यह मुमकिन नहीं है तो मैंने उनके स्टेट एयरक्राफ्ट में उड़ने की फरमाइश की. मैंने उनकी गोद में बैठ कर एयरक्राफ्ट में पूरी दिल्ली का चक्कर लगाया था.
नानी ने मुझे बताया था
मैं अपनी तरफ ध्यान दिया जाना पसंद करता था. मगर जब मैं नौ या दस साल का था, मैंने लोगों से पूछना शुरू कर दिया कि क्यों यह इनसान मुझे इतने तोहफे देता है. मेरा एक बड़ा भाई भी है, जो मेरी मां के कानूनी पति बीपी शर्मा का बेटा है. उसे इतना तोहफा नहीं मिलता, हालांकि मुझे जरूर उन तोहफों को उनके साथ शेयर करने कहा जाता. और यह भी कि मेरी मां क्यों उसे अपने साथ तिवारी के पास नहीं ले जाती.
मैं गौर करता कि उनसे मुलाकात के बाद मेरी मां रोती हुई वापस होतीं. जब-जब उनसे मुलाकात होती उसके कुछ दिन बाद मेरी मां को अस्थमा का दौरा आ जाता. ज्यादातर वो और मेरी मां अकेले में बातें करते और उनमें तीखी बहस होती. उस वक्त मिस्टर तिवारी मुङो बाहर खेलने के लिए भेज देते, अपने स्टाफ के साथ. उसी दौरान मैंने महसूस करना शुरू कर दिया कि बेडरूम एक निजी क्षेत्र है और लिविंग रूम सार्वजनिक. मेरी मां क्यों एक ऐसे आदमी से मिलने आती है, जो उनके साथ इतना बुरा व्यवहार करता है. मेरे प्रति भी उनका व्यवहार बदलने लगा था. कई बार वह मेरे साथ खेलते, बातें करते और गाना गाते. गाना उन्हें काफी पसंद था. मगर कई बार ऐसा भी होता कि वे मेरी मौजूदगी पर ध्यान तक नहीं देते.
एक बार जब मैं 11 या 12 साल का था मेरी नानी ने मुझे बताया कि मिस्टर तिवारी मेरे असली पिता हैं. मैं उनकी बात सुनकर हंस पड़ा. जब मैंने अपनी मां से यह बताया तो उन्होंने कहा कि यह सच है. इसी कारण मिस्टर तिवारी से उनकी बहस होती है. वे उनपर दवाब डाल रही हैं कि वे मुझे अपना बेटा स्वीकार करें. लेकिन वे कहते हैं उनकी पत्नी इस बात के लिए तैयार नहीं है.
मेरे नाना उनके लिए गुरु सरीखे थे
नारायण दत्त तिवारी तब मेरी मां के नजदीक आये जब वह मेरे नाना प्रोफेसर शेर सिंह से मिलने उनके पास आया करते थे. यह सत्तर का दशक था. मेरे नाना उस वक्त केंद्रीय मंत्री थे और वे हरियाणा राज्य के संस्थापकों में से एक थे. मेरे नाना उनके लिए गुरु सरीखे थे. मेरी मां का वैवाहिक संबंध सुखद नहीं रहा और वे उस दौरान नाना के साथ रहा करती थीं. हालांकि मिस्टर बीपी शर्मा मेरे लिए अच्छे पिता साबित हुए मगर वे मेरी मां के लिए अच्छे पति नहीं थे. मेरे नाना इस बात को समझते थे. मिस्टर तिवारी को भी इस बात का अहसास था. उन्होंने मेरी मां से कला कि उनकी शादी भी असफल साबित हुई है. वे उस दौरान पचास के लपेटे में थे. उन्होंने मेरी मां से कहा कि वे उनसे एक बच्च चाहते हैं, क्योंकि उनकी बीवी उन्हें यह सुख दे पाने में सक्षम नहीं है. उन्होंने मेरी मां से वादा किया कि जैसे ही उनका तलाक हो जाता है वे उनसे शादी कर लेंगे. मेरे नाना ने उन पर भरोसा किया और मेरी मां भी सहमत हो गयीं.
जब मेरा जन्म हुआ तो मां ने मुङो रोहित शेखर नाम दिया, उन्हें भरोसा था कि मिस्टर तिवारी मुङो पुत्र के रूप में स्वीकार कर लेंगे. जब बर्थ सर्टिफिकेट पर हस्ताक्षर करने की बारी आयी तो मिस्टर तिवारी ने यह बहाना बनाया कि इससे उनके राजनीतिक कैरियर पर नकारात्मक असर पड़ेगा. आखिरकार बीपी शर्मा को उस पर हस्ताक्षर करने पड़े. मगर उन्होंने कभी मुङो रोहित शेखर शर्मा नहीं कहा, उन्हें विश्वास था कि मिस्टर तिवारी अपनी बात से पलटेंगे नहीं.
मैं एक गुस्सैल और संशयग्रस्त किशोर था और कई बार अपनी मां पर बरस पड़ता था कि उन्होंने मेरा जीवन बरबाद कर दिया. 1993 में मिस्टर तिवारी की पत्नी गुजर गयीं और मेरी मां ने सोच अब अंतत: वे मुङो अपना पहचान दे देंगे. लेकिन मिस्टर तिवारी ने हमसे सारे नाते तोड़ लिये.
मैं कह सकता हूं कि उन दिनों मेरी जिंदगी नरक में गुजर रही थी. मुङो पढ़ने में और सोने में परेशानी होती थी. मैं गुस्से से भरा था और खुद को अपमानित महसूस करता था. उस दौरान मैं कालेज में थे, मैं डिप्रेशन और इन्सोमिया से पीड़ित था. मैं किसी तरह क्लास जाता और पढ़ाई करता.
मैंने फिर से 2002 में उनसे मुलाकात की. उस वक्त वे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री थे. मैंने पहली बार उनसे चेतावनी भरे लहजे में बात की. मगर उनका रुख सहयोगी था, उन्होंने अकेले में मुङो पुत्र के रूप में स्वीकारा.
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(यह एक लंबा आलेख है, इसका शेष भाग अगले पोस्ट में)

Thursday, July 26, 2012

क्या भ्रष्टाचार का मुद्दा भी पिट गया


चलिए मान लेते हैं.. अन्ना का आंदोलन पिट गया.. रामदेव पहले से पिटे हुए हैं.. मगर क्या भ्रष्टाचार का मुद्दा भी पिट गया है? यह एक ऐसा सवाल है जो कल रात से मेरे मन को मथ रहा है. मैं यह मानने को तैयार नहीं कि कोई राजनीतिक दल छल-छद्म और षडयंत्रों से जनता के क्रोध को शांत कर सकता है. मुङो ऐसा लग रहा है कि सत्य की जीत को लेकर मेरे मन में जो प्रबल धारणा थी वह कोई चकनाचूर कर रहा है.
हो सकता है कि अन्ना और रामदेव के आंदोलन में सत्य से अधिक दंभ हो..उनके लड़ाई के तरीके गलत हों..उनके हथियार भोथरे हों..मगर उनका मुद्दा आम जनता का मुद्दा है, जिसे देश चुप-चाप पिछले 50 साल से भुगत रहा है. आजादी के बाद लोगों ने समानता और न्याय की उम्मीद की थी.. अपने देशवासियों से बनी सरकार से सुशासन की उम्मीद की थी. मगर सत्ता तंत्र के इस जाल ने सब गुड़गोबर कर दिया. कुरसी पर जो भी बैठा वही जनात के खिलाफ हो गया. उसने आम लोगों तक सुविधाएं पहुंचने की राह में रोड़े अटकाये और पैसे वालों की बिरादरी के लिए राहें आसान की.
सवाल जाति या आवासीय प्रमाणपत्र या ड्राइविंग लाइसेंसों के लिए लिये जाने वाले रिश्वत का नहीं है. गांव की सड़क का ठेका लेने के लिए मंत्रियों से अधिकारियों तक को देने वाले फिक्स कमीशन का भी नहीं. प्रशासन के हर तंत्र में उपर से नीचे तक रिश्वत की राशि के सरलता पूर्वक पहुंचने वाली प्रक्रिया का भी नहीं है. न ही टूजी स्प्रैक्ट्रम या कॉमनवेल्थ गेम्स या कोल ब्लॉक के लीज पर दिये जाने में बरती गयी अनियमितताओं का. कई बार मुङो लगता है सबसे बड़ा दोष उन नियमों, कानूनों और संविधान में वर्णित अनुच्छेदों का है, जो इंसान को अफसरशाही के आगे आवेदन देने और उसके फैसलों का इंतजार करने के लिए विवश करते हैं.
क्योंकि हर भ्रष्टाचार की शुरुआत उसी जगह से होती है जब आपको एक आदेश, एक स्वीकृति या एक प्रमाणपत्र चाहिए होता है. सरकार इन कानूनों के जरिये अधिक से अधिक अधिकार अपने पास रखती है और उन्हें बांटते हुए उनके कारकून आम जनता से वसूली करते हैं. हमारे अफसरशाह इस काम में बड़े निपुण हैं कि कैसे किस नुक्ते से कमाई की गुंजाइश बनायी जा सकती है. कानून बनते वक्त ही वह नुक्ता गढ़ लिया जाता है.
हमें भ्रम होता है कि सिस्टम में कुछ लोग गड़बड़ हैं जिनके कारण सारी अव्यवस्थाएं हैं.. जैसा कि शरद यादव और दूसरे राजनेता अरविंद केजरीवाल के पूरे संसद को गाली देने के सवाल पर प्रतिक्रिया जताते हुए कहते हैं कि सारे के सारे वैसे नहीं हैं. मगर मेरा दिल नहीं मानता. भ्रष्टाचार ही वह तेल है जिसके सहारे हमारे देश की पूरी राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था काम कर रही है. अगर इस व्यवस्था में एक इमानदार इंसान को फिट कर दीजिये तो या तो वह खुद बदल जायेगा या फिर लोग उसे उठाकर बाहर फेंक देंगे. ऐसा भी हो सकता है कि वह पूरी व्यवस्था को बदल दे, मगर यह रेयर है.
हम कई बार कुछ नेता या अफसर के बारे में सुनते हैं कि वह इमानदार है मगर वह अधूरा सत्य होता है. लोग कुछ दिन-कुछ महीने के लिए इमानदार हो सकते हैं.. मगर बाद में उन्हें या तो बदलना पड़ता है या क्विट करना पड़ता है. इस व्यवस्था में इमानदारी की भी अपनी सहूलियतें हैं. अगर आप व्यवस्था के दुश्मन की बेइमानी को एक्सपोज करना चाहते हैं तो आपको इमानदारी बरतने की छूट दी जा सकती है, हीरो भी बनाया जा सकता है. मगर अपनी इमानदारी बरतना बहुत मुश्किल है. एक पूरा ताना-बाना है, सिस्टम है. एक इमानदारी पूरे चेन को भंग कर सकती है.
एक इमानदार दारोगा या तो ट्रेनिंग एकेडमी में पुलिस को ट्रेनिंग दे या बेइमान हो जाये, क्योंकि थाना प्रभारी बनने की शर्त ही रिश्वत है. थाने बिकते हैं..ब्लॉक बिकते हैं.. ट्रांसफर और पोस्टिंग अब सर्विस इंडस्ट्री का रूप ले चुकी है.
खैर मैं बेवजह इतना बकबक कर रहा हूं.. यह किसे नहीं मालूम.. मगर इसका अंत कैसे होगा.. यह कौन बता सकता है.. पिछले साल अन्ना के पीछे जब गली कूचे से राजधानी तक पूरा देश सड़कों पर उमड़ पड़ा था क्या वह बेवकूफी थी?

Monday, July 23, 2012

सब टीवी के अनोखे सितारे


इन दिनों पत्रकारिता में दिन की नौकरी करने का सुअवसर प्राप्त हुआ है. रतजगे से तो मुक्ति मिली ही है, टीवी से भी संबंध गहरे हो रहे हैं. आफिस से लौटता हूं तो सब टीवी खोल कर बैठ जाता हूं. रात ग्यारह बजे तक वही चलता है. मेरे जैसे और भी न जाने कितने आफिस गोअर्स की जिंदगी में यह रूटीन की तरह शामिल हो गया होगा इसका हिसाब नहीं है. इसके हल्के-फुल्के हास्य धारावाहिक दिन भर के कामकाज के तनाव से मुक्ति दिला देते हैं और लोग रात में चैन की नींद सोते हैं.
मैं भी पिछले सात-आठ महीने से इन धारावाहिकों को नियमित देख रहा हूं. तारक मेहता का उल्टा चश्मा, चिड़ियाघर, आरके लक्ष्मण की दुनिया, लापतागंज और अंत में अपनी तरह का एक बकवास एफआइआर. कभी-कभी सोचता हूं, आखिर इन धारावाहिकों में ऐसा क्या है जो लोगों को इस तरह बांधे रखता है. इन धारावाहिकों के कलाकारों में ज्यादातर ऐसे चेहरे हैं जिनमें कोई आकर्षण नहीं है. चाहे तारक मेहता के जेठा लाल हों, आरके लक्ष्मण की दुनिया के भावेश हों या लापतागंज के मुकुंदी लाल गुप्ता. ये सब तो खैर मुख्य किरदारों में हैं, सहायक किरदारों में तो एक से एक अजीबोगरीब चरित्र हैं, लापतागंज के मामा और एलिजाबेथ, तारक मेहता के हाथी डॉक्टर और अय्यर और चिड़ियाघर का गधा प्रसाद, एफआईआर के गोपी हवलदार.
पिछले चार पांच सालों से लगातार ये चरित्र लोगों का मनोरंजन कर रहे हैं. इन हास्य धारावाहिकों की सबसे बड़ी खासियत तो यह है कि मौजूदा दौर के सामान्य प्रचलन से इतर इनमें फूहड़ और द्विअर्थी संवाद न के बराबर हैं. एफआइआर जैसे बेसिर-पैर वाले धारावाहिक में भी मैंने आज तक फूहड़ और ईलता का अंश नहीं देखा. जबकि इसके समानान्तर दूसरे चैनलों के कॉमेडी शो में इन तत्वों की भरमार आसानी से देखी जा सकती है.
इन धारावाहिकों में से दो तो साहित्यिक रचनाओं पर आधारित बताये जा रहे हैं. हालांकि इनकी मौजूदा कथा का शरद जोशी या आरके लक्ष्मण के साहित्य से ज्यादा लेना देना नहीं है, ऐसा करना मुमकिन भी नहीं था. खास तौर पर जब तमाम धारावाहिक 500-500 एपिसोड की सीमा पार कर चुके हैं. इन धारावाहिकों का बड़ा आसान तानाबाना है. पास-पड़ोस में रहने वाले चार या पांच परिवारों के आपसी संबंधों की कहानी(तारक मेहता का उल्टा चश्मा, आरके लक्ष्मण की दुनिया और लापतागंज), एक संयुक्त परिवार के रिश्ते-नाते(चिड़ियाघर) और एक अजीबोगरीब थाना(एफआइआर).
एफआइआर को छोड़ कर बांकी के धारावाहिक कहीं न कहीं आदर्शवादी सामाजिक और पारिवारिक धारणाओं को मजबूत करते हैं. बिल्कुल हृषिकेश मुखर्जी की फिल्मों की तरह. आज टीआरपी की होड़ में भी मेरा अंदाजा है यह चैनल किसी से पीछे नहीं होगा.

Friday, July 20, 2012

लाखों पुष्पाओं के पेन किलर


एबीपी न्यूज पर फिल्म सफर का गाना बज रहा है.. हिंदी सिनेमा के पहले सुपर स्टार राजेश खन्ना की अंतिम यात्र चल रही है और ..जिंदगी का सफर, है ये कैसा सफर.. गाने की खून जमा देने वाली धुन को सुनते हुए मैं यह आलेख लिख रहा हूं. आज सुबह उनकी फिल्म रोटी देखी है जो जी सिनेमा पर दिखायी जा रही थी और कल रात अराधना के कुछ टुकड़े सैट मैक्स पर देखने का मौका मिला. कल दोपहर गिरीन्द्र ने फेसबुक पर लिखा था- पुष्पा..आई हेट टीयर्स. उनकी एक बड़ी मशहूर फिल्म अमर प्रेम का डायलॉग. फिर विनीत का आलेख पढ़ा कि कैसे उनकी दीदियां अपने पतियों में राजेश खन्ना का अक्स देखना चाहती थीं. मैंने भी अपने ब्लॉग पर लिखा था कि मेरी मां के वे सबसे चहेते अदाकार हैं. उन्हें दाग और अराधना जैसी उनकी फिल्में काफी पसंद हैं.
वह सातवां दशक था, जब बालीवुड के प्रोडय़ूसरों ने टैलेंट हंट के जरिये एक ऐसे हीरो को तलाशा था जो पुष्पा, गीता, सुनीता, कामना, रीना और अनीता को कह सके .. आई हेट टीयर्स और उन्हें देख कर गा सके .. मेरे सपनों की रानी कब आयेगी तू. और उनके इस उम्मीद पर जतिन खन्ना नामक यह अदाकार सौ फीसदी खरा उतरा. हालांकि वे देवानंद के विकल्प के रूप में लाये गये थे, मगर रोमांस के साथ-साथ एक संदिग्ध छवि को जीने वाले देवानंद के बरक्श राजेश खन्ना सीधे-सादे युवक नजर आते थे जो मरदों की दुनिया में एक ऐसा चेहरा थे जो औरतों के जख्मों पर अच्छी तरह हाथ रखना जा चुके थे. वे पेन किलर भी थे और स्लिपिंग पिल्स भी.
इस बात को समझने के लिए हमें वापस उस दौर में लौटना पड़ेगा. जब लोग-बाग दस लोगों के सामने अपनी घरवालियों से बतियाने में भी ङिाझकते थे और ऐसा करने वालों को हमारी तरफ बलगोभना कह कर पुकारा जाता था. जिसका सीधा-सपाट मतलब नामर्द होता था. औरतें मर्द के गुस्से भरे डायलॉग के बीच प्यार तलाशती थी और उस जमाने में राजेश खन्ना ने जब यह कहना शुरू किया .. कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना तो जैसे माहौल ही बदलने लगा. राजेश खन्ना को देख कर मरदों ने भी आई हेट टीयर्स कहना शुरू कर दिया. पारिवारिक और सामाजिक माहौल की घुटन में जीने वाली औरतों के लिए जाहिर सी बात है वे एक देवदूत सरीखे थे.
दर्जन भर सुपर हिट फिल्मों के बीच राजेश खन्ना ने उस दौर में आनंद, दुश्मन और रोटी जैसी फिल्मों के जरिये अपनी छवि में थोड़ा बदलाव करने की कोशिश की. अब वे सिर्फ पुष्पा ही नहीं मनोज, राकेश और अरविंद जैसे युवाओं के भी दिल के करीब होते चले गये थे. अब वे एक ऐसे दुश्मन थे जो दोस्तों से भी प्यारे थे. अब वे बाबू मोशाय.. कहते थे और आंसू भरी पलकों के बीच तालियां गूंजती. उन्होंने अपने दौर की युवा पीढ़ी को नशे में जीना सिखाया. उनकी फिल्मों को देख कर लोग हॉल से निकलते और हफ्तों उनके संवाद दुहराते.. अगर जन्म दे तो रोटी का इंतजाम करता जाये..
वे हिंदी सिनेमा के पहले सुपर स्टार थे. उनके फैन्स का हुजूम दिन रात उनके स्टूडियो, उनके बंगले और उनके मन को घेरे रहता. इस घेरेबंदी के चारो ओर निर्माता और निर्देशक डेट्स के लिए चक्कर लगाते रहते और राजेश खन्ना तारीफ के भंग में डूबे रहते. मेरे एक वरिष्ठ सहयोगी चंचल जी जो राजेश खन्ना और जार्ज फर्नांडीज अलग-अलग समय में दोनों के राजनीतिक सलाहकार हुआ करते थे ने एक किस्सा सुनाया था. एक दफा एक पारिवारिक समारोह में दोनों उनके घर पहुंचे थे. भरी महफिल में राजेश खन्ना के सामने जार्ज ने उनसे पूछ डाला, भाई! ये जनाब कौन हैं. लगता है इन्हें पहले कहीं देखा है. जार्ज की इस बात पर राजेश खन्ना इतने नाराज हुए कि उस समारोह से उठ कर चले गये. वे इस बात पर नाराज थे कि भला हिंदुस्तान में कोई इनसान ऐसा कैसे हो सकता है जो राजेश खन्ना को नहीं पहचानता हो.
उसी दौर में एक लंबा और बेढ़ंगा नौजवान आया.. जिसने कहा.. मैं आज भी फेके हुए पैसे नहीं उठाता.. और तमाशाइयों का हुजूम उसकी तरफ बढ़ गया. राजेश खन्ना फिर बार-बार पुष्पा और बाबू मोशाय पुकारते रहे मगर लोगों को वर्कशाप को अंदर से बंद कर दस गुंडों से अकेले निपटने वाले नये नायक की अदा भा गयी थी. उसी नायक ने कभी कहा था कि आनंद नहीं मरा.. आनंद मरा नहीं करते. मगर आनंद का जादू टूट चुका था.
जिंदगी के दो पल को हंसते-मुस्कुराते गुजारने का हुनर सिखाने वाला आनंद खुद चार दशक लंबी जिंदगी इस उम्मीद में जीता रहा कि एक बार फिर उसकी महफिल गुलजार होगी. वह पुष्पा बोलेगा और आंचल से आंखें पोछती पुष्पाएं मुस्कुरा उठेगी और तालियों की वह गूंज जिसने उसका साथ छोड़ दिया एक बार फिर उसके कानों में गूंजेंगी. हमने उनका आखिरी संवाद एक विज्ञापन में सुना.. बाबू मोशाय.. मेरे फैन मुझसे कोई नहीं छीन सकता. सुनकर राजेश खन्ना के लिए दुख होता.
कल से टीवी चैनलों से लेकर फेसबुक की दीवार पर पुष्पा और बाबू मोशाय गूंज रहे हैं. काश राजेश खन्ना एक दिन के लिए जिंदा होते और देख पाते कि फिर वही नम आंखें हैं और तारीफों का शोर है. भले एक ही दिन के लिए..मगर वह जमाना लौट आया है.मगर, जमाना कभी लौटता नहीं. इनसान को खुद बदलना पड़ता है. सुपर स्टार को हिमगंगा तेल बेचना पड़ता है. रोटी का इंतजाम ऊपर वाला नहीं करता. नीचे बैठे लोगों को इसके लिए पसीना बहाना पड़ता है.

Wednesday, July 18, 2012

आनंद ने लाखों को जीना सिखा दिया


आनंद मेरे जमाने की फिल्म नहीं है. राजेश खन्ना भी मेरे जमाने के हीरो नहीं थे. वे मेरी मां के टाइम के हीरो थे मगर मेरी मां की फेवरिट फिल्म आनंद नहीं दाग थी, अराधना है. वे आज भी उन फिल्मों को उतने ही लगाव से देखती हैं. आनंद मेरे बड़े मामा की फेवरिट फिल्म है, जिन्होंने पिछले बीस साल से सिनेमा हॉल जाकर शायद ही कोई फिल्म देखी हो. जब उनसे फिल्मों के बारे में पूछता हूं तो वे गमन, भूख, आविष्कार, आगंतुक और गरमा हवा जैसी फिल्मों का नाम लेते हैं. मगर जब आनंद की चर्चा होती है तो कहते हैं कि इस फिल्म में उनकी और उनके साथ न जाने कितने लोगों की सोच बदल दी. जिंदगी को हंस कर जीने की अदा सिखा दी.
सचमुच आनंद अद्भुत फिल्म है, एक जीवन दर्शन है जिसे हृषिकेश मुखर्जी ने मजेदार कहानी बनाकर पेश कर दी और राजेश खन्ना ने तो जैसे मुरदे में जान डाल दिया हो. वरना ऐसी सीधी-सच्ची, सरल और गंभीर फिल्म को देखकर लोगों के होठ हंसते हैं और आंखें रोती हैं. .और फिर उस फिल्म का क्लाइमेक्स.. जैसे बरसों पहले तय हो चुका था कि जब राजेश खन्ना की मौत होगी तो हर चैनल इसी क्लाइमेक्स को दिखायेगा. बरसों बाद इस थीम को लेकर कल हो न हो बनी. मगर वह एक चमकती हुई तसवीरों का गुच्छा थी. सहज और सामान्य बातें करने वाला और घड़ी-घड़ी बाबू मोशाय कलने वाला आनंद गायब हो चुका था.
वैसी ही कहानी राजेश खन्ना की एक और फिल्म की है, जिसका नाम दुश्मन है. फिल्म मैंने देखी नहीं है. मगर कहानी बड़ी रोचक है. एक ट्रक डाइवर के हाथों हादसे में एक किसान की मौत हो जाती है. अदालत उसे सजा देती है कि वह उस परिवार के साथ रहे और उस इनसान की कमी को पूरा करे, जिसकी उसने जान ले ली है. वह जाता है, मगर परिवार के लोग उसे स्वीकार नहीं करते. उसे दुश्मन कह कर बुलाते हैं.. उस इनसान का बेटा उसे दुश्मन चाचा कहता है. बाद में दुश्मन दोस्तों से भी प्यारा हो जाता है...

Tuesday, July 10, 2012

हे वधु से वेश्या तक चुनने के अधिकारी


अजीज मित्र जयंत मास कम्यूनिकेशन ग्रेजुएट हैं, मगर कैरियर के रूप में उन्होंने रेलवे की नौकरी चुनी. कहा जाना चाहिए इस नौकरी ने ही इन्हें चुन लिया. लखनऊ में रहते हैं.. नौकरी के सिलसिले में पूरा देश घूमते हैं. कोर्स करने के बाद जो लिखने का सिलसिला छूटा वो दस साल बाद अब जारी हुआ जब विभाग की ओर से एक प्रतियोगिता आयोजित कराई गयी. इस प्रतियोगिता में उन्होंने महिला सशक्तिकरण पर यह आलेख लिखा है. आलेख पढ़िये और उनकी भाषा की धार को एक बार फिर से महसूस कीजिये.. धार तेज है.
कहानी पुरानी है मगर प्रसंग नया. मुङो समझने के लिए बहस करो. नीति-नियमों में आजतक बांधे रखा. फिर भी आत्मीय संतुष्टि नहीं मिली. मैं तो कहती हूं सड़क से संसद तक खुले मंच पर बहस करो. तुमने कोई कसर नहीं छोड़ी हमें रोकने की. कभी चार दीवारी तक सीमित किया. कभी पढ़ने नहीं दिया. पर्दा को मेरा श्रृंगार, चौखट को मर्यादा बनाकर सीमाएं तय की तुमने.तुम कितने महान हो, घर के मुखिया हो, तुम्हारी पहचान है. तुम्हें अपने नाम पर गर्व है, जबकि हमें तो पप्पू की मां कहके ही नवाजा. वधु से वेश्या तक चुनने के अधिकारी हो. मैं गलत नहीं हूॅ तो शासन की परिभाषा आप मुझसे जानो. पहले पिता का, फिर भाई का, उसके बाद पति परमेश्वर का, फिर पुत्र का. जब तक इहलीला समाप्त नहीं होती शासन ही शासन.
तुम्हे बेशर्म कहूॅ तो गलत नहीं होगा. तुमने कहां था मैं झुकता नहीं हूॅ परन्तु विपदा के पल तुम झुके थे एक स्त्री की प्रतिमूर्ति के सामने. वो दुर्गा थी, काली थी, वो भी एक स्त्री थी. पर शायद वहां जरूरत थी. अब क्या.. बीत गये दु:ख के पल, आ गयी खुशहाली. भूल गये तुम भी, थी कोई औरत. खैर छोड़ो तुम्हारी आत्मीयता तो गुलाम है ओछी मानसिकता की. जिसमें केवल सिर्फ अहंकार का वास है.
मेरी एक पहचान थी. प्राचीन काल में हम शिक्षित थे. तुम्हारे बराबर के दज्रे में थे. हमारी योग्यता का लोहा माना तुमने ही. विश्वास न हो तो पंतजलि, कात्यायन के पन्नों को खोल के देखो. साध्वी, गार्गी, मैत्रेयी, मीरा सभी मिलेंगी. ऋग्वेदिक ऋचाएं आज भी गवाह हैं हमारी. आज भी जेहन में सभी बातें दफ़न हैं.तुम्हें विज्ञान पर भरोसा है, तो सुनो. मानव जाति को केवल पुरुष या स्त्री में ही नहीं बांटा जा सकता हैं. हम क्या हैं, कैसे हैं, यह क्रोमोसोम तय करते हैं. यह जोड़े में आते हैं. हम में क्रोमोसोम के 23 जोड़े रहते हैं. हम पुरुष हैं या स्त्री, यह 23 वें जोड़े पर निर्भर करता है. अब बताओ, इसमें मेरी क्या गलती जो तुम मुङो दासी समझते आये हो.
बाल विवाह के समय हाथ नहीं कांपे तुम्हारे. उल्टे गाली दी तुमने. प्यारी नहीं डायन, कुल्टा, अभागन, बनायी गयी. अभी कहां पूरी हुई तुम्हारी दिल की मुराद. तुमने जलती चिता पर मुङो लिटाया. नाम दिया सती. एक पावन पुनीत धार्मिक कार्य.तुम्हारी आत्मीयता आज भी जिंदा है. बलात्कार, दहेज कांड, छेड़खानी के बहाने. हे पुरूष परमेश्वर कब समझोगे अपनी मर्यादा. लाज करो शान मत बघारो. तुम याद रखो-
मैं न कैदी हूॅ न भिखारी मेरा हक है एक समूची साबुत आज़ादी. मेरी सुनो
अन्तत: तुमने हमें विवश किया एक आन्दोलन के लिए. हम कहां चुप बैठने वाले थे. सम्भाली कमान बनाये कई कीर्तिमान. आज प्रतिभा राष्ट्र को संबोधित करती तो किरण की नई ऊर्जा ने नई दुनिया दिखायी. किया क्या एक प्रयास. शस्त्र उठायी, शासक बनी, तुम्हारी प्रिय कुलटा विश्व सुन्दरी बनी. रेल से जेल तक हमारा राज. जम़ी तो क्या आसमान भी हमारा गुलाम. सड़क से संसद तक छायी हूॅ. शांति पुरस्कार मेरे पास, मदर टेरेसा मेरी पहचान. कैसे रोकोगे मुङो. 9 मार्च को मिले आजादी के हिसाब से केवल 60 साल लगे हमारे प्रयास को. अभी आगे बढ़ी थी कि तुमने 33 प्रतिशत आरक्षण में बाधकर दायरे को सीमित करना चाहा. अब सभी तरह की गतिविधियां हमारे सामने छोटी है. शिक्षा, राजनीति, मीडिया, कला और संस्कृति, सेवा क्षेत्र, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी आदी में हम बराबर के हिस्सेदार है.
मेरी बहुत-सी बहनें आज भी दासता की जंजीर से बंधी है. अशिक्षित हैं. पुरुषों के अत्याचार से बंधी है. उनके पल्ले बंधे हैं शराबी, जुआरी, बलात्कारी, पतियों का साथ. उन्हें भी आजादी दिलानी होगी. मुसलिम महिलाएं शरीयत कानून के तहत अधिकारों से वंचित हो रही हैं. तीन तलाक की व्यवस्था की आलोचना करनी होगी. बाल विवाह की प्रथा तो समाप्त हुई लेकिन बाल मजदूरी की प्रथा ज्यों की त्यों बनी हुई है, इसे खत्म करो. मुनिया को स्कूल भेजों. वैसे भी लड़कों की तुलना में बहुत ही कम लड़कियॉ स्कूलों में दाखिला लेती हैं. कई बीच में ही अपनी पढ़ाई छोड़ देती हैं. इसका खास कारण लड़कों और लड़कियों के बीच लालन-पालन में हो रही असमानता है. कुछ राज्यों में साक्षरता दर को हासिल किया है. परन्तु कुछ राज्य से ही महिलाओं की स्थिति नहीं बदलती. ग्रामीण इलाकों में 18 साल से कम उम्र में शादी करने की परम्परा भी अहम हिस्सा है. समय से पहले विवाह का होना, फिर बच्चों के लिंग को चयन करने में कई बार भ्रूण हत्या जैसे अपराध भी किये जाते है. जिसका सीधा सम्बन्ध महिला के स्वास्थ्य से जुड़ता है. भारत में मातृत्व संबंधी मृत्यु दर दुनिया भर में दूसरे सबसे ऊंचे स्तर पर हैं. केवल 42 प्रतिशत जन्मों की निगरानी पेशेवर स्वास्थ्य कर्मियों द्वारा की जाती है. ज्यादातर महिलाएं अपने बच्चे को जन्म देने के लिए परिवार की किसी महिला की मदद लेती है. जिसके पास अक्सर न तो इस कार्य की जानकारी होती है और न ही मॉ की जिंदगी खतरे में पड़ने पर उसे बचाने की सुविधाएं. यूएनडीपी विकास रिपोर्ट (1997) के अनुसार 88 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं 15-49 वर्ष की आयु में एनीमिया से पीड़ित हो जाती है. दूसरी ओर देश के तराई क्षेत्र से अशिक्षित महिलाओं को अनैतिक तरह से तस्करी करके महिलाओं को वेश्यावृति के धंधे में डालने की प्रवृति को रोकना होगा.
राधिका जैसी न जाने कितनी महिलाओं को दहेज़ के कारण जान देनी पड़ती है. प्रत्येक वर्ष लगभग 5,000 राधिका रसोई घर में जलती है. जलती नहीं उसे जलाया जाता है दहेज की आग में और तो और इस अपराध पर शर्म करने के वजाय कहते हो ‘दुल्हन की आहुति’(ब्राइड बर्निग).
पर मैं खुश हूॅ, तुम कुछ तो हुए. वरना तुम्हारी सहिष्णु चुप्पी लगातार मेरा अपमान करती चलती है. तुम्हारी प्रतिक्रियाओं के बिना मेरी अगली लड़ाइयों के नक्शे अधूरे हैं. (दोनों कविताओं के अंश ममता कालिया के कविता-संग्रह से संदर्भ के रूप में लिए हैं.)

Thursday, July 05, 2012

मैं गरीब हूं

मित्र प्रशांत दुबे ने एक शानदार रिपोर्ट लिखी है... सरकारी संवेदनहीनता का जबर्दत नमूना है यह...
विश्व की जानी मानी पत्रिका फोब्स जब विश्व के चुनिंदा अमीरों की सूची जारी करती है तो उस सूची में शामिल होने वाले रसूखदारों की छाती और चौड़ी हो जाती है. हर अमीर व्यक्ति का सपना होता है कि उसका नाम फोब्स की सूची में आये . इससे उस व्यक्ति के नाम के आगे एक तमगा और जुड़ जाता है. यह उसके लिये तो बडे़ ही सम्मान की बात है. लेकिन इसके ठीक उलट किसी गरीब को, गरीब बताना ना केवल असम्मानजनक है बल्कि गैर संवैधानिक भी है. उसकी गरीबी का सार्वजनिक होना या किया जाना भी प्रत्यक्ष रुप से उसकी गरीबी के साथ किया जाने वाला भद्दा मजाक से बढकर कुछ नहीं. लेकिन मध्यप्रदेश का खंडवा जिला प्रशासन गरीबों के साथ यह भद्दा मजाक कर रहा है. खंडवा जिले में राज्य सरकार ने गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने वाले परिवारों के घरों के सामने लिखवा दिया है- मैं गरीब हूं.
खंडवा जिले के खालवा ब्लॉक के डाभिया गांव के राजाराम पलायन पर बाहर गांव (दूसरे जिले में) गये थे, जब लौटकर आये तो उन्होंने अपने घर की दीवारों पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा पाया- मैं गरीब हूं. वे उसे देखकर कुछ समझ नहीं पाये. सुबह उठकर उन्होंने देखा तो केवल उनका ही घर नहीं बल्कि आसपास के कई घरों में इस तरह से ही लिखा गया था. राजाराम को माजरा समझ नहीं आया. राजाराम ने पंचायत सचिव से यह पूछा तो उन्होंने बताया कि ऐसे लोग जो गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन कर रहे हैं, उनके घरों के सामने राज्य सरकार के आदेश से यह लिखा जायेगा.
यह काम क्यों शुरु किया गया, इस पर खालवा जनपद के मुख्य कार्यपालन अधिकारी बी.के.शुक्ला कहते हैं कि गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने वाले परिवारों की पहचान में दिक्कत ना हो और यदि कोई व्यक्ति गलत तरीके से इस व्यवस्था का लाभ ले रहा हो तो वह सामने आयेगा. इस योजना का मूल भाव तो समझ में आता है लेकिन उसके लिये और तरीके उपयोग में लाये जाने चाहिये, ना कि किसी को भी असम्मानजनक तरीके से उसके घर के सामने ’’मैं गरीब हूं‘‘ लिखकर उसे अपमानित करने के. इस सवाल पर श्री शुक्ला कन्नी काटते हुये नजर आये. उन्होंने कहा कि आप तो इस विषय पर वरिष्ठ अधिकारियों से बात कर लीजिये. मैं मीटिंग में हूं, यह कहकर उन्होंने फोन काट दिया.
डाभिया पंचायत के सचिव माखन बताते हैं कि लगभग 1 वर्ष पूर्व उनके पास जनपद पंचायत से लिखित आदेश आया था कि वर्ष 02-03 के सर्वे के आधार पर जारी की गई गरीबी रेखा की सूची के आधार पर गांव के प्रत्येक गरीब परिवार के घरों के सामने की दीवार पर ’’मैं गरीब हूं‘‘ लिखवा दिया जाये. इस पत्र के साथ उसका प्रोफॉर्मा भी था. आदेश था तो लिखवा दिया हमने. अब अच्छा लगे या बुरा, लिखना तो पड़ेगा ही. ऊपर से आदेश है. फिर यह केवल हमारी पंचायत में नहीं है बल्कि पूरे विकासखंड में है. आसपास के गांव दगड़कोट, लमोठी, पीपरी आदि गांवों में भी यह लिखा पाया गया.
जिले के कलेक्टर कवींद्र कियावत कहते हैं कि नाम तो पुराने ही लिखे हैं, कोई नया नाम नहीं लिखा है. उन घरों में पुताई नहीं हुई होगी. इस तरह की नई प्रक्रिया नहीं चल रही है. यदि यह नया नहीं चल रहा है तो फिर उसे पुतवाया क्यों नहीं गया तब तक फोन कट गया.
इस मामले में यह गौरतलब है कि पंचायतों को नाम ना लिखे जाने के संबंध में कोई लिखित आदेश जारी नहीं किया गया है. तभी तो डाभिया के सचिव माखन कहते हैं कि अभी कुछ नये नाम जुड़े हैं, उनके घरों के सामने भी यह लिखा जाना है. राशि अभी किसी मद में नहीं है, जिसके कारण देर हो रही है. उनसे यह पूछे जाने पर कि क्या अभी यह नाम नहीं लिखे जाने को कोई आदेश आपके पास आया है ? उनका जवाब था- “लिखने का आया था. ना तो मिटाने का आया, ना ही रोकने का.”
लगभग 600 घरों के इस डाभिया गांव में 237 परिवार गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करते हैं यानी औसतन हर दूसरा परिवार यहां गरीब है. ऐसी स्थिति में गांव में लगभग हर दूसरे घर पर यह लिखा गया है. अपने घर पर लिखी पट्टी को देखकर करमा कहते हैं- “यह तो हमारे लिये बेहद शर्मनाक है. हम गरीब हैं तो हैं, हमारी गरीबी मिटाने के बजाये सरकार हमारी हंसी उड़वा रही है. हम गरीब हैं, यह हम और पूरा गांव जानता है लेकिन उसके बाद भी इस तरह से लिखा जाना दुःखद है.”
उनका दावा है कि इस तरह घरों के सामने गरीबी का उपहास उड़ाने वाले सरकारी नारे का कई लोगों ने विरोध भी किया. लेकिन पंचायत ने ऐसे विरोधों की अनदेखी कर दी. हालांकि गांव में कई लोग अपने घर इस तरह ‘मैं गरीब हूं’ नहीं लिखने के अपने विरोध पर अड़े रहे.
गांव के अजुर्न सिंह, बाबू ने अपने घर की दीवार पर लिखने से मना कर दिया. मोहन कटारे ने भी नहीं लिखने दिया. हालांकि अभी उनका घर टूटा हुआ है लेकिन उन्होंने फैसला किया है कि घर बन जाने पर भी वे इसे नहीं लिेखने देंगे.
उनकी पत्नी विजया मोहन कहती हैं- “और भी तरीके हैं गलत व्यक्ति को पकड़ने के. सरकार उन लोगों के नाम ग्रामसभा में बताये, सूची पंचायत में टांगे. लेकिन हमारे घरों के सामने इस तरह से लिखवाना, हमारी गरीबी का विज्ञापन है. क्या हम हमारी मर्जी से गरीब हुये हैं या परिस्थिति ने हमारी हालत ऐसी बनाई है ?”
इलाके में कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिन्होंने सरकार के इस निर्णय को अपने तरीके से चुनौती देना शुरु कर दिया है. चबूतरा गांव की बुधिया बाई जैसे लोगों ने खुद ही गोबर से लीप कर सरकार की पुताई को मिटा दिया है.
खंडवा में विभिन्न मुद्दों पर काम कर रही स्पंदन संस्था की सीमा कहती हैं- “जब सरकार ने अपना ही सर्वेक्षण किया, अपने ही मापदंड़ों पर परिवारों को गरीब घोषित किया तो फिर उन घरों के सामने यह लिखने का क्या औचित्य?” वे कहती हैं कि गड़बड़ियों को रोकने के और भी तरीके हो सकते हैं. जब गामसभा से ही प्रस्ताव पारित होते हैं तो फिर वहीं पर जांचा जाये, पंचायत में सूची चस्पा की जाये लेकिन जो तरीका अभी प्रशासन ने अख्तियार किया है, वह तो बहुत ही निदंनीय है. यह गरीबों का मखौल उड़ाने की बात है.
भोजन का अधिकार अभियान प्रकरण में उच्चतम न्यायालय की ओर से नियुक्त आयुक्तों के राज्य सलाहकार सचिन जैन का कहना है कि यह मानवाधिकारों के हनन के साथ-साथ सम्मानजनक जीवन जीने के अधिकार का हनन है. आर्थिक रुप से कमजोर वर्ग के व्यक्ति का इस तरह से मखौल उड़ाना शर्मनाक है. प्रशासन को अपनी क्षमता, समझ व प्रतिबद्धता का उपयोग कर गरीब परिवारों की पहचान करने का जतन करना होगा.
भोपाल की सामाजिक कार्यकर्ता रोली शिवहरे कहती हैं कि यह तो वर्ग का भेदभाव है जो कि संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन भी है. वे इस संबंध में नागरिक और राजनैतिक अधिकारों के लिये अंर्तराष्ट्रीय समझौते की धारा 26 की ओर ईशारा करती हैं, जिसमें कहा गया है कि रंग, जाति, भाषा, धर्म, विचार, उत्पत्ति, जन्मस्थान या अन्य किसी भी तरह से भेदभाव नहीं किया जा सकता है.
वे कहती हैं- “हमारा संविधान कहता है कि हम सब संविधान और कानून की नजर में बराबर हैं तो फिर खंडवा प्रशासन कैसे संविधान की मूल भावना से हटकर काम कर सकता है ? पिछले साल सिवनी जिले में भी सरकार ने यह कारनामा किया था और विरोध करने पर रातों रात उस निर्णय को वापस लेना पड़ा था.” बहरहाल लाख टके का सवाल यह है कि क्या लोगों को अपमानित कर ईजाद किये गये इस नये तरीके से भी सरकार गरीबों के नाम पर होने वाली गड़बड़ी को रोक लगा पाई है ? इसका जवाब है-नहीं !
अब जैसे गांव के राजाराम का ही उदाहरण लें. उनके घर के सामने सरकार ने ’’मैं गरीब हूं‘‘ पुतवा दिया है. जबकि उनके पास गरीबी रेखा का कार्ड नहीं, बल्कि सफेद कार्ड है. सफेद कार्ड यानी गरीबी रेखा से ऊपर वाला कार्ड यानी राजाराम गरीबी रेखा के नीचे नहीं हैं. तो सवाल यह है कि फिर राजाराम के नाम पर कौन ले रहा है इस बीपीएल योजना का लाभ ?
रविवार से साभार

Wednesday, July 04, 2012

माजुली का हीरो संजय घोष


मेरा पिछला पोस्ट असम की विनाशकारी बाढ़ और कोसी से उसके अंतर्समबंध को लेकर था.. आज ही चरखा फीचर का एक आलेख हाथ लगा है जिसमे असम के एक द्वीप माजुली और उसके लिए संघर्ष करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता संजय घोष की कथा है. माजुली एक अनूठी प्राकृतिक संरचना वाला द्वीप है मगर ब्रह्मपुत्र पर बने तटबंध के कारण यह लगातार नष्ट हो रहा है. संजय ने इसे बचने का सपना देखा था मगर उल्फा उग्रवादियों ने उसका क़त्ल कर दिया...अंशु मेश्‍क की रिपोर्ट
इस वर्ष ब्रह्मपुत्र नदी में आई बाढ़ ने जैसी तबाही मचाई है वैसी कल्पना कभी असमवासियों ने नहीं की थी। पानी के विकराल रूप ने सबसे ज्यादा माजुली द्वीप पर बसे 1.6 लाख वासियों को प्रभावित किया है। जो जिदगी और मौत के दरम्यान खुद को बचाने की कशमकश में घिरे हुए हैं। सबके मन मस्तिष्‍क में बस एक ही प्रश्‍न घूम रहा है ‘यदि ऐसा होता तो क्या होता? और इन प्रष्नों में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्‍न यह है कि ‘यदि आज संजय जीवित होते तो क्या होता? परंतु संजय के जीवित रहने की आशा तो 15 वर्ष पहले ही (4 जुलाई) को उस समय समाप्त हो गई जब उल्फा विद्रोहियों ने उनका अपहरण करके उसी माजुली द्वीप में कत्ल कर दिया जिसे तबाही से बचाने के लिए वह दिन रात संघर्ष कर रहे थे।
विश्‍व मानचित्र पर आसाम की आत्मिक और सांस्कृतिक राजधानी के रूप में अपनी पहचान दर्ज करवाने वाली माजुली पिछले सप्ताह से सुर्खियों में है। जहां बाढ़ से संबंधित रिपोर्टें उसके अस्तित्व पर खतरे की घंटी बजा रही है। रिपोर्टों से जाहिर होता है कि बाढ़ के कारण इस द्वीप के 70 देहातों में पानी भर गया है जबकि गुस्साई लहरें 30 देहातों को अपने साथ बहा ले गई है। माजुली को देश के अन्य हिस्सों से जोड़ने वाला एकमात्र परिवहन साधन नौकाएं जिसे फेरी कहकर पुकारा जाता है, कई दिनों के लिए बंद कर दिए गए हैं। जिसके कारण इस द्वीप के लोग दूसरे इलाकों से कट गए हैं। द्वीप के 75000 से अधिक लोग अस्थायी कैंपों में रहने के लिए विवश हैं। उन्हें अस्थायी कैंपों में रहने का दुख नहीं है और न ही उन्हें इसकी चिंता है। उन्हें तो केवल एक ही दुख अंदर ही अंदर खाए जा रहा है कि यदि बारिश तुरंत नहीं रूकी तो इनकी जमीन खेती बाड़ी के लायक नहीं रह जाएगी।
मुसिबतों के पहाड़ का यह तो एकमात्र हिस्सा है। रिपोर्टें इस बात की ओर इशारा करती हैं कि इस द्वीप की जमीनें प्रति वर्ष 7.4 वर्ग किमी की गति से कट कर नदी में समाहित हो रही है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 1969 से अबतक 9.566 परिवार बेघर हो चुके हैं। बताया जाता है कि इनमें केवल 500 परिवारों का ही पुर्नवास किया गया है। लेकिन जो हजारों परिवार रह गए हैं उनका क्या किया? और इस उजाड़ द्वीप के बारे में क्या कदम उठाए गए हैं जिसने विष्व के मानचित्र पर असम को रेखांकित किया है।
यह प्रश्‍न आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना 90 के दशक में था। ये वही प्रश्‍न थे जिसने एक युवा सामाजिक विकास कार्यकर्ता संजय घोष को बेचैन कर दिया था। इतना कि उन्होंने अपने सात अति विश्‍वस्नीय साथियों के साथ अप्रैल 1996 में AVARD-NE (Association of Voluntary Agencies for Rural Development-North East) की स्थापना की और इस वीरान होते द्वीप माजुली में अपना बेस स्थापित किया।
माजुली विश्‍व का सबसे बड़ा तटवर्ती द्वीप में से एक है जो अपने अभूतपूर्व भौगोलिक स्थिति के कारण विश्‍व के दूसरे हिस्सों से जमीनी रास्ते से कटा हुआ है। वर्तमान परिदृश्‍य में इसे असम में होने वाले विकास का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। जोरहाट, डिब्रुगढ़ और गुवहाटी की तरफ से गुजरनी वाली नदियों पर बनाए गए सुरक्षा बाधों के कारण नदी अपना रास्ता तलाश करते हुए इस द्वीप की तरफ आ निकलती है। प्रत्येक वर्ष नदी या तो कमजोर तटबंधों को तोड़कर गुजरती है या फिर बिना तटबंधों वाले इलाकों को अपना शिकार बनाती है। कम आबादी और कम सियासी रसूख के कारण माजुली की गिनती उन इलाकों में होती है जहां बाढ़ से बचाव के लिए तटबंध नहीं बनाए गए हैं। चूंकि राजनीतिक दृष्टि से माजुली के साथ ऐसी विशेषता नहीं जुड़ी है जो इसे दूसरे क्षेत्रों की तरह सम्मान की दृष्टि से देखा जाए और यहां के लोग भी कोई बड़े पूंजीपति नहीं हैं जिनकी फिक्र की जाए। इसलिए इसे कई दहाईयों से नदी का दंश झेलना पड़ रहा है। संजय ने कितना सटीक आंकलन किया था। वो लिखते हैं ‘माजुली का ऐसे ही कटते रहना सिर्फ जमीन या रोजगार का नुकसान नहीं है बल्कि इसके कारण एक पूरी सभ्यता का नाश हो जाएगा‘।
ऑक्सफोर्ड से शिक्षित और इंस्टीट्यूट ऑफ रूरल मैनेमेंट आनंद और जॉन हॉप्किंस विश्‍वविद्यालय के भूतपूर्व छात्र संजय ने अपने कार्य क्षेत्र के लिए धरती से जुड़ी एक ऐसी समस्याग्रस्त क्षेत्र का चयन किया जिससे मिलती जुलती समस्या पर वह पहले ही राजस्थान में नौ वर्षों तक कार्य कर चुके थे। महीनों तक घर में कैद रहने और इस क्षेत्र तथा यहां के लोगों के बारे में गहन अध्ययन करने के कारण उन्हें लोगों का विश्‍वास प्राप्त हो सका। जो इस क्षेत्र में एक अर्थ पूर्ण योगदान देने के लिए आवश्‍यक था। यहां के किसानों की मेहनत के बावजूद उन्हें कोई सरकारी मदद प्राप्त नहीं था और वह तेजी से आर्थिक कमजोरियों के पेच में उलझते जा रहे हैं। संजय का मिशन था, जैसा कि वह लिखते हैं ‘समाज में स्वेच्छा से की जानी वाले कार्यों के लिए स्थान बनाना आवश्‍यक है। जो शायद जमीन से जुड़े लोगों को मजबूत तथा उनकी सहायता से संभव है। इसके लिए हमें सपोर्ट संस्थान बनाकर एक ऐसी प्रक्रिया तैयार करने की आवश्‍यकता है जिसमें उनकी आकांक्षाएं पूरी हो सकें। अर्थात वे राज्य और समाज के लिए उनके समक्ष प्रश्‍न भी उठा सकें और इनमें से कुछ प्रश्‍नों के उत्तर भी दे सकें।‘
यहां के लोगों के बारे में कुछ लोगों की नकारात्मक प्रतिक्रिया थी जिसे एक वर्ष से कुछ अधिक समय के अंदर संजय और उनकी टीम ने गलत साबित कर दिया। इस यात्रा के दौरान एक महत्वपूर्ण पड़ाव फरवरी 1997 में उस समय आया जब तीन हजार मजदूरों ने, जिनमें अधिकांश महिलाएं थीं अपनी स्वेच्छा, विवके और साधनों का उपयोग करके 1.7 किमी लंबे पटटे को कटने से बचा लिया। अगले वर्श द्वीप का यही पटटा बाढ़ से बचा रहा। इस सकारात्मक सहयोग ने उनके अंदर उम्मीद की एक नई किरण पैदा कर दी। संजय लिखते हैं कि ‘वह कोशिश केवल जमीन के कटाव को रोकने की नहीं थी बल्कि हम लोगों को स्थानीय सहयोग की भावना, रूचि और अनुभव कराना चाहते थे। हम उनमें यह विश्‍वास पैदा करना चाहते थे कि छोटे स्तर पर भी बहुत कुछ किया जा सकता है।‘ उन्होंने लिखा ‘यदि यह सफल रहा तो यह माजुली में जमीन के एक टुकड़े को न केवल सदा के लिए तबाह होने से बचा लेगा बल्कि सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह लोगों में परस्पर सहयोग और विष्व भर में अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही छोटी बिरादरियों के लिए प्रतिरोध का प्रतीक बन जाएगा।‘
टीम और शायद स्वयं स्थानीय लोग भी इस बात की पहचान करने में असफल रहे कि आत्म निर्भरता का यह रवैया और बिरादरी का मालिकाना अधिकार का आभास उन लोगों में असुरक्षा की भावना पैदा कर रहा है जो पिछली कई दहाईयों से बनी इस स्थिती से लाभ उठा रहे हैं। उनमें ठेकेदार भी थे और राजनेता भी और सबसे बड़ी बात तो यह थी कि इसमें प्रतिबंधित संगठन जो लोगों का प्रतिनिधित्व करने का दावा करता है यानि युनाइटेड लिब्रेशन फ्रंट ऑफ आसाम यानि उल्फा भी शामिल था।
इस टीम को पूरा विश्वास था कि मीडिया की शक्ति द्वारा इंकलाब लाया जा सकता है और यही कारण था कि वे आसामी भाषा में ‘‘द्वीप आलोक’’ नामी एक न्युज-बुलेटिन पत्रिका भी निकाला करते थे। इस पत्रिका द्वारा लोगों को सरकार के कार्यक्रमों के बारे में बताया जाता था, उन्हें बताया जाता था कि इस तक कैसे पहुंचा जा सकता है या इसका बजट या खर्च कितना है। इसमें कई विषयों पर विस्तृत केस-स्टडी भी प्रस्तुत की जाती थी। ऐसा करने के दौरान, न चाहते हुए भी, स्वयं घोटालों का भी पर्दाफाश होने लगा। संजय को लोगों का जबरदस्त समर्थन प्राप्त था और इस पर उन्हें मीडिया से मिलने वाली ताकत ने और भी शक्तिशाली बना दिया। सत्ता के गलियारों में रहने वालों को ये बात कुछ जंची नहीं और इसी के बाद से उन्हें धमकियां मिलने लगीं।
जून 1997 के आखरी सप्ताहों की बात है, संजय ने लिखा, ‘‘आज भी, जबकि मैं ये पंक्तियां लिख रहा हूं, लोगों को धमकियां दी जा रही हैं, उन्हें सावधान रहने को कहा जा रहा है, और हमारे लिए इस वातावरण में, तनाव और भय के इस माहौल में कार्य करना कठिन हो रहा है। लोग विकास और परिवर्तन चाहते हैं, लेकिन डरे हुए हैं। अब वह बंद, हफ्ता-वसूली, हत्या और अपहरण से तंग आ चुके हैं। इसे बस एक जोर का धक्का देने की आवश्यकता है.’’
धक्का तो आया, लेकिन आशा के विपरीत। 4, जुलाई, 1997 की देर शाम को संजय जब अपने एक स्थानीय आसामी साथी के साथ घर लौट रहे थे, उल्फा के सदस्यों ने उन्हें बातचीत के लिए बुलाया। ताकि स्थानीय स्तर पर उनके द्वारा किए जा रहे कार्यों पर वह अपनी बात सविस्तार रख सकें, इसके लिए वह तुरंत ही उनके साथ जाने के लिए राजी हो गए। दो दिन बाद संजय के साथ जाने वाला युवा लौट आया, लेकिन वह अकेला था। उसके बाद आज तक संजय की कोई सूचना नहीं आई। वे 37 वर्ष के थे। उल्फा ने उनकी हत्या की बात को स्वीकार करने में 12 वर्ष का समय लगा दिया। पिछले वर्ष मई में, जबकि उन्हें गायब हुए पूरे 14 वर्ष हो चुके थे, उल्फा के सदस्यों ने स्वीकार किया कि ‘‘वह एक गलती थी’।
बहरहाल इन वर्षों में राज्य सरकार ने कई संगठन बनाए, लोगों की समस्याओं के निवारण के लिए कई योजनाएं और प्रोजेक्ट्स लाँच किए, इनके लिए करोड़ों रुपये मंजूर किए। 2005 में, बृह्मपुत्र बोर्ड, 2007 में माजुली डेवलपमेंट अथार्टी, 2012 की शुरुआत में प्लानिंग कमीशन का एक प्रोजेक्ट और एक महीने पहले माजुली कल्चरल लैंडस्कैप मैनेजमेंट अथार्टी। संजय ने माजुली को विश्व की धरोहर (विरासत) बनाने की पहल की थी, परंतु उनका सपना अभी तक पूरा नहीं हो पाया है। 2004 में युनेस्को ने तीसरी बार भारत का माजुली को विश्व धरोहर बनाने के प्रस्ताव यह कह कर ठुकरा दिया कि उसके आवेदन में तकनीकी खामियां हैं और वह अपूर्ण है।
बताया जाता है कि इस साल की बाढ़ पिछले 14 वर्षों में आने वाली बाढ़ों में सबसे अधिक खतरनाक है। द्वीप के लोगों ने 1997 में जो कुछ गंवाया उसका उन्हें अच्छी तरह आभास है, परंतु पछतावे के कड़वे घोंट उन्हें सान्त्वना नहीं देते। ऐसा बार बार न हो, इसके लिए क्या किया जाए? संजय को भी यही प्रश्न परेशान किए रहता था, जैसा कि उनकी अंतिम पंक्तियों से जाहिर है ‘‘दुर्भाग्य से ऐसी त्रासदी को रोकने का एक ही उपाय है और वह है बांध बना कर पानी के तांडव को रोकना। अगर यह कार्य अच्छी तरह कर लिया जाए, तो इससे प्रति वर्ष होने वाले जान और माल की हानि से बचा जा सकेगा। दूसरी बात जमीन को और कटने से बचाने के लिए बेहतर होगा कि उसके चारों तरफ बांस की बाड़ लगा दी जाए। आखिर हमारे अंदर यह एहसास पैदा होने के लिए और कितनी बार बाढ़ को झेलना होगा कि इस बाढ़ ने पहले ही कितने लोगों को डुबाया है?’’
सोलह वर्ष बाद आज भी हमें इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिल पाया है कि माजुली को बचाने के लिए दूसरा कोई उपाय क्या है? संजय लिखते हैं ‘‘हमें लोगों के इस हौसले और शक्ति का पूरा एहसास है जिसे ब्रह्मपुत्र ने सुरक्षित रखा है.’’ माजुली के अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे लोगों के लिए यह पंक्तियां आज भी उनका हौसला बढ़ाती हैं। क्योंकि अहसास जगाने वाला माजुली का वह हीरो उनके दिलों में अब भी जिंदा है। (चरखा फीचर्स)

Monday, July 02, 2012

असम की बाढ़, कोसी के लिए इशारा


असम इन दिनों भीषण बाढ़ का सामना कर रहा है. सौ से अधिक लोग इस बाढ़ की भेंट चढ़ चुके हैं, इसके अलावा राज्य के 23 में से 21 जिलों के 20 लाख से अधिक लोग बाढ़ से प्रभावित होकर विस्थापन का दंश ङोल रहे हैं. विश्व प्रसिद्ध काजीरंगा नेशनल पार्क पूरी तरह जल प्लावित हो गया है. आम तौर बिल्कुल पड़ोस में रहने के बावजूद हम कोसी वासी असम के संकट से बिल्कुल निस्पृह रहते हैं. इसमें कुछ दोष स्थानीय मीडिया का भी है, जो पूरे उत्तर पूर्व की खबरों को जगह की बरबादी मानकर रिजेक्ट कर देता है. मगर असम की बाढ़ की खोजखबर रखना हम कोसी वासियों के लिए नितांत आवश्यक है. क्योंकि वह ब्रह्मपुत्र नदी के आसपास जो घटनाएं घट रही हैं, वे कोसी के इलाके के लिए इशारा हैं. अगर हम समय से न चेते तो आने वाले वर्षो में हमारे साथ भी ऐसी ली घटनाएं पेश आएंगी.
अगर आप खबरों पर पैनी नजर रखते हैं तो आपको मालूम होगा कि असम बाढ़ से प्रभावित होने के मामले में पूरे देश में सबसे अव्वल है. तकरीबन हर तीसरे साल यहां ऐसी ही विनाशकारी बाढ़ आती है और भारी तबाही मचाती है. हर बार जैव उद्यान्नों के साथ-साथ बड़े-बड़े चाय बगान डूब जाते हैं. लाखों लोग सड़क पर आ जाते हैं. बाढ़ असम के लिए एक रूटीन आपदा का शक्ल ले चुकी है. ठीक उसी तरह जैसे दरभंगा-मधुबनी-समस्तीपुर के इलाके में हर तीसरे साल बाढ़ आ ही जाती है. हर बार सरकार, स्थानीय प्रशासन और आवाम डट कर बाढ़ का मुकाबला करते हैं, मगर बाढ़ के मूल कारण पर हाथ रखने में परहेज करते हैं.
दरअसल इस आपदा की वजह ठीक वही है जो कोसी और उत्तरी बिहार के दूसरे इलाकों में आने वाली बाढ़ का कारण है. वह है तटबंध. पता नहीं किस दौर में हमारे अभियंताओं ने बाढ़ से बचने के लिए इस बेहूदा तरकीब को ढ़ूंढ़ निकाला था? ऐसा क्यों सोचा गया था कि नदियों के किनारे मिट्टी की दीवार खड़ी कर दी जाये तो बाढ़ का खतरा टल जायेगा? जैसे कोसी, बागमती, गंडक और महानंदा नदियों को मिट्टी की दीवारों से घेर दिया गया, ठीक वैसे ही ब्रह्मपुत्र को भी कैद करने की कोशिश की गयी. 1958-59 के आसपास यह तटबंध बना, इस तटबंध ने लगभग 25 साल तक असम की थोड़ी बहुत रक्षा की. मगर जैसे 1984 में सहरसा के नवहट्टा में तटबंध टूटने के बाद कोसी के तटबंधों का नाकारापन सामने आने लगा वैसे ही असम में 1986 के बाद तटबंध फटाफटा टूटने लगे. वजह वही थी. सिल्ट के कारण तटबंधों के बीच नदी उथली हो गयी थी. कैचमेंट एरिया में थोड़ी सी बारिश के बाद हालात बेकाबू होने लगे. तकरीबन हर दूसरे-तीसरे साल तटबंध टूटने लगे और ब्रह्मपुत्र का कहर बरपने लगा.
इन दिनों वहां जिओ फेब्रिक ट्रेक्सटाइल इंबेकमेंट बनते हैं. दरअसल जिओ फेब्रिक एक ऐसा टेक्सटाइल है जो तटबंध को दरार पड़ने से बचाता है. अपने इलाके में जो बोल्डर क्रेटिंग की तकनीक अपनायी जाती है वह इंजीनियर और ठेकेदारों को तो मुफीद लगती है मगर जिओ फेब्रिक टेक्निक इससे कम खर्चीली और ज्यादा उपयोगी होती है. मगर यह तकनीक भी फेल हो रही है. सबसे ऊपर वाली तस्वीर में जिओ फेब्रिक टेक्सटाईल तटबंध की हालत साफ़ नजर आ रही है. इस बार भी असम में तटबंध 12 जगहों पर टूटा है. वहां के हालात कोसी से अधिक खतरनाक हैं. इसकी वजह यह है कि ब्रह्मपुत्र बड़ी नदी है. इसमें अपेक्षाकृत अधिक पानी आता है. इसका कैचमेंट एरिया भी बड़ा है. यहां तटबंधों के बीच कोसी से अधिक सिल्ट भर गया है.
आने वाले दिनों में कोसी की भी यही हालत होने वाली है. कोसी में भी सिल्ट का भराव काफी अधिक है. तटबंध पर खड़े होकर समझा जा सकता है कि तटबंध के अंदर का तल बाहर के तल के मुकाबले कितना ऊंचा हो गया है. मगर हमारे यहां भी मुद्दे पर गौर करने की परंपरा का उतना ही अभाव है जितना असम में है. फिलहाल सरकार तटबंधों को मजबूत कर उस पर पक्की सड़क बनवाने में जुटी है. नदी के आर-पार एक पुल बन चुका है दूसरा सहरसा में बनने वाला है. एक और बराज के निर्माण की योजना है..मगर तटबंध की अवैज्ञानिकता को लेकर कहीं कोई बहस नहीं है. अगर ऐसा ही रहा तो आने-वाले कुछ सालों में हमारा भविष्य भी कुछ ऐसा ही लोगा. हर तीसरे साल तटबंध कई-कई विंदुओं पर टूटेंगा. इसका लाभ वशिष्ठ कंस्ट्रक्शन जैसी कंपनियों, हर साल तटबंध बचाने में जुटे अभियंताओं और बाढ़ के बाद राहत चलाने वाली संस्थाओं को होगा. आम कोसी वासियों को तो हर साल बाढ़ झेलना ही पड़ेगा. कोसी के संकट के बारे में मेरी एक पुरानी पोस्ट..