Thursday, August 30, 2012

अफसोस ! कोयला खदानों में विजन नहीं मिलता


भ्रष्ट होना उतना बुरा नहीं है जितना विजन विहीन होना. कई बार हमारे शासक की सोच चुनाव खर्च जुटाने और जनता को बेवकूफ बनाने तक ही सीमित हो जाती है. जनता के पैसों और देश के संसाधनों के बदले अपनी झोली और पार्टी की थैली भर लेने के चक्कर में ही कोल-गेट जैसे घोटाले हो जाते हैं. फिर पूरा शासन तंत्र थेथरई में जुट जाता है, क्योंकि उन्हें न सिर्फ अपनी इमानदारी साबित करनी होती है बल्कि अगले चुनाव के लिए वोट मांगने लायक इमेज भी बचा कर रखना पड़ता है. हालांकि इन कोशिशों में सरकार इस कदर दंभ में डूब जाती है कि वह दिन को रात और रात को दिन साबित करने में जुट जाती है. उनके पीछे ऐसे लोगों का हुजूम होता है जो दिन को रात कहने के बजाय अमावस की रात कहने तक में नहीं शर्माता. मगर नतीजा आखिरकार जनता को भुगतना पड़ता है, क्योंकि उसने व्यावहारिक लाचारी के कारण ऐसी सरकार को चुन लिया है जिसमें हर कमी से बढ़कर विजन की भारी कमी है.
जहां तक हम सबकी आम समझ है और खुद सरकार का भी दावा है कि कोल ब्लाक के इस हड़बड़-गड़बड़ आवंटन के पीछे ऊर्जा क्षेत्र की कहानी है. देश में ऊर्जा का भारी संकट है और सरकार इस संकट का व्यापार करना चाहती है. इससे पहले सरकार एक बार और परमाणु ऊर्जा की खातिर सरकार को संकट में डाल चुकी है. हालांकि उस संकट से उबरने का आत्म विश्वास ही सरकार के मौजूदा दंभ का कारण है कि वह विपक्ष और जनांदोलनों के साथ-साथ जनता को भी जूते के नीचे रखने से गुरेज नहीं करती. ऊर्जा के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों का अनुचित दोहन और आम लोगों की सुरक्षा को ताक पर रखना हर सरकार के लिए आम बात है और यह एक पुरानी सरकारी परंपरा है. जल- विद्युत और सिंचाई के नाम पर करोड़ों लोगों को विस्थापित करने और नदियों को डस्टबिन में बदल देने के बाद भी सरकारें यह मानने को तैयार नहीं हैं कि वह तरीका गलत है. मध्यप्रदेश के ओम्कारेश्वर में आज भी विस्थापन के शिकार लोग जल सत्याग्रह कर रहे हैं, मीडिया की नींद में खलल डाले बगैर. साथ ही यह भी एक महत्वपूर्ण सूचना है कि झारखंड में एक भी व्यक्ति को विस्थापित किये पिछले दो साल में बगैर 3 लाख हेक्टेयर जमीन की सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो गयी है, यह सब सिर्फ मनरेगा के पैसे से तालाब और कुआं खुदवाकर मुमकिन हुआ है. इसके बावजूद अगर सरकार को पता चल जाये कि सुवर्णरेखा या अजय नदी पर कहीं बांध बनवाने से 20 मेगावाट बिजली का उत्पादन हो जायेगा तो सरकार सबसे पहले उस योजना को लागू कराने में जुट जायेगी.
कोल ब्लाकों के इस आवंटन से सबसे बड़ा नुकसान होना अभी बांकी है. इन 245 कोल ब्लाकों में जब उत्पादन शुरू होगा तो बड़े पैमाने पर गरीब आदिवासियों का विस्थापन होगा. फिर उन खदानों से जो कोयला निकलेगा वह भट्टियों मे जाकर अपने साथ धरती को गर्म करेगा और आसमान में कार्बन फैलायेगा. वे ताप विद्युत संयंत्र जहां यह कोयला जलाया जायेगा अपने आसपास की नदियों में कचड़ा बहायेंगे और उस नदी का तो सत्यानाश होगा ही नजदीकी इलाकों के लोग कैंसर की चपेट में आकर असमय कालकलवित होंगे. इतनी कुरबानियों के बाद हमारे घर में रोशनी आयेगी. हमारे टीवी-फ्रिज-एसी-कंप्यूटर और मोबाइल अनादिकाल तक जीवित रह पायेंगे.
क्या यह विजन की कमी नहीं है? क्या यह ठीक वैसा ही नहीं है जैसा हमने पिछली शताब्दी में अपनी नदियों और उनके किनारे रहने वाले करोड़ों गरीबों के साथ किया और नयी सदी में पता चला कि यह सब कुओं और तालाबों से भी मुमकिन है. क्या हम आज भी इस बात से अवगत नहीं कि अगर हर छत पर सोलर प्लेट और हर शौचालय में बायोगैस प्लांट लगा हो तो इतने बड़े पैमाने पर योजनागत नरसंहार की जरूरत नहीं. धरती को कुछ साल और हरा-भरा रहने और हमें बिना आक्सीजन खरीदे जीवित रहने की इजाजत मिल सकती है.
हाल ही में हमारी इसी जनोन्मुखी सरकार ने बीपीएल परिवारों के लिए 75 हजार का इंदिरा आवास और साथ में 10 हजार के शौचालय के कॉम्बो पैक देने की घोषणा की है. 85 हजार के इस प्रोजेक्ट में अगर 15 हजार और जोड़ दिये जायें तो रूफ-टाप सोलर सिस्टम और बायोगैस प्लांट की सुविधा बड़ी आसानी से उपलब्ध हो जायेगी. इस एक सुधार के कारण देश की लगभग एक तिहायी आबादी ऊर्जा के लिए सरकार, नदियों, कोल-ब्लाक या परमाणु की मोहताज नहीं रहेगी. सरकार भी घपलों, घोटालों, हंगामों और आम जनती की तबाही के पाप से बच जायेगी.
मगर हर हाल में विजन बड़ा फैक्टर है और इसका अभाव किसी और चीज से पूरा नहीं किया जा सकता. जब सरकार यह सोच ले कि जब तक हमारी पार्टी के सिर पर गांधी परिवार का हाथ है तब तक हम सोचने में ऊर्जा व्यय करने से मुक्त हैं तो फिर किसी चीज का कोई इलाज नहीं है. रोशनी के नाम पर घोटाले-घपले होंगे, फिर झूठ को सच और रात को दिन साबित करने की थेथरई होगी. गलत फैसलों के कारण जनता त्रहिमाम करती रहेगी और लाचार हालत में सरकार को और खुद अपने नसीब को कोसती रहेगी.

Wednesday, August 29, 2012

ओम्कारेश्वर में जल सत्याग्रह


साथी प्रशांत दुबे ने यह खबर फेसबुक पर चस्पा की है...
250 महिला पुरुष निरंतर पानी में
ओम्कारेश्वर बांध में पानी बढाने पर बांध प्रभावित लगभग 250 महिला पुरुषों ने पानी में जल सत्याग्रह प्रारंभ कर दिया. उल्लेखनीय है कि वर्तमान में ओम्कारेश्वर बांध का जल स्तर 189 मीटर रहा है. हजारों ओम्कारेश्वर बांध प्रभावितों का पुनर्वास न होने के बावजूद गत दिनों राज्य सरकार द्वारा बांध में 193 मीटर तक पानी भरने कि घोषणा कि गयी थी. इस घोषणा के खिलाफ ओम्कारेश्वर बांध के डूब के गाँव घोगाल्गाँव में प्रभावित गत 16 जुलाई से निरंतर सत्याग्रह इस संकल्प के साथ चला रहे है कि वो पानी बढाने पर पानी में डूबने को तैयार हैं पर पानी नहीं बढने देंगे. कल देर शाम जब बांध में जल स्तर करीब 1.5 मीटर बढ़ा दिया गया तो लगभग 250 महिला पुरुषो ने पानी में उतर कर जल सत्याग्रह प्रारंभ कर दिया.
बिना पुनर्वास डुबो कर भगाने का विरोध
उल्लेखनीय है कि ओम्कारेश्वर बांध प्रभावितों के बारे में पहले उच्च न्यायालय ने और फिर सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेशों में स्पष्ट रूप से कहा है कि प्रभावितों के लिए बनी पुनर्वास नीति का पालन नहीं किया गया है. इन आदेशों के आधार पर प्रभावितों द्वारा शिकायत निवारण प्राधिकरण में जमीन के दावे लगाने पर प्राधिकरण ने भी स्पष्ट आदेश दिए हैं कि पुनर्वास नीति का पालन नहीं हुआ है और सभी प्रभावितों को जमीन के बदले जमीन दी जाये. यह भी उल्लेखनीय है कि सर्वोच्च न्यायालय के ओम्कारेश्वर बांध के आदेश के अनुसार यह पुनर्वास बांध निर्माण के पहले हो जाना चाहिए एवं सर्वोच्च न्यायालय के अन्य अनेक आदेशों के अनुसार प्रभावितों का पुनर्वास डूब लाने के 6 माह पूर्व पूरा होना जरूरी है. अतः सरकार इन सभी आदेशों का खुला उल्लंघन कर प्रभावितों का पुनर्वास करने के स्थान पर उन्हें डुबोकर बिना पुनर्वास भगाना चाहती है. प्रभावितों ने चुनौती दी है कि वो इसे किसी भी हालत में स्वीकार नहीं करेंगे, वो डूबने को तैयार है पर बिना अधिकार लिए नहीं हटेंगे.
बांध में पानी कम कर सभी प्रभावितों का पुनर्वास किया जाये
जल सत्याग्रह कर रहे सैकड़ो महिला पुरुषों एवं उनके साथ बैठे हजारों प्रभावितों कि मांग है कि ओम्कारेश्वर बांध में जल स्तर वापस 189 मीटर लाया जाये और सभी प्रभावितों को जमीन के बदले जमीन एवं अन्य पुनर्वास के अधिकार देकर पुनर्वास किया जाये. जल सत्याग्रह में ग्राम घोघल्गाँव की नीलाबाई, सुरेश पटेल, ग्राम कामनखेडा की सकुबाई, गिरिजाबाई, ग्राम टोकी के अंतरसिंह, संतोषबाई, ग्राम एखंड की नानीबाई, कैलाश राव आदि के साथ नर्मदा आन्दोलन की वरिष्ठ कार्यकर्ता सुश्री चित्तरूपा पालित एवं अन्य लगभग 250 महिला पुरुष पानी में निरंतर सत्याग्रह कर रहे हैं इन सत्याग्रहियों के साथ लगभग 3000 महिला पुरुष धरने पर बैठे है. नर्मदा आन्दोलन सरकार को चेतावनी देता है कि यदि तत्काल पानी कम करके विस्थापितों के पुनर्वास की करवाई नहीं की गयी तो लोग अपना जीवन देने में हिचकेंगे नहीं और पूरी नर्मदा घाटी और देश में इस लड़ाई को ले जाया जायेगा.

Wednesday, August 22, 2012

महज १५० साल पहले स्तन ढक नहीं सकती थीं केरल की महिलाएं


केरल के त्रावणकोर इलाके, खास तौर पर वहां की महिलाओं के लिए 26 जुलाई का दिन बहुत महत्वपूर्ण है. इसी दिन 1859 में वहां के महाराजा ने अवर्ण औरतों को शरीर के ऊपरी भाग पर कपड़े पहनने की इजाजत दी. अजीब लग सकता है, पर केरल जैसे प्रगतिशील माने जाने वाले राज्य में भी महिलाओं को अंगवस्त्र या ब्लाउज पहनने का हक पाने के लिए 50 साल से ज्यादा सघन संघर्ष करना पड़ा.
इस कुरूप परंपरा की चर्चा में खास तौर पर निचली जाति नादर की स्त्रियों का जिक्र होता है क्योंकि अपने वस्त्र पहनने के हक के लिए उन्होंने ही सबसे पहले विरोध जताया. नादर की ही एक उपजाति नादन पर ये बंदिशें उतनी नहीं थीं. उस समय न सिर्फ अवर्ण बल्कि नंबूदिरी ब्राहमण और क्षत्रिय नायर जैसी जातियों की औरतों पर भी शरीर का ऊपरी हिस्सा ढकने से रोकने के कई नियम थे. नंबूदिरी औरतों को घर के भीतर ऊपरी शरीर को खुला रखना पड़ता था। वे घर से बाहर निकलते समय ही अपना सीना ढक सकती थीं. लेकिन मंदिर में उन्हें ऊपरी वस्त्र खोलकर ही जाना होता था.
नायर औरतों को ब्राह्मण पुरुषों के सामने अपना वक्ष खुला रखना होता था. सबसे बुरी स्थिति दलित औरतों की थी जिन्हें कहीं भी अंगवस्त्र पहनने की मनाही थी. पहनने पर उन्हें सजा भी हो जाती थी. एक घटना बताई जाती है जिसमें एक निम्न जाति की महिला अपना सीना ढक कर महल में आई तो रानी अत्तिंगल ने उसके स्तन कटवा देने का आदेश दे डाला.
इस अपमानजनक रिवाज के खिलाफ 19 वीं सदी के शुरू में आवाजें उठनी शुरू हुईं. 18 वीं सदी के अंत और 19 वीं सदी के शुरू में केरल से कई मजदूर, खासकर नादन जाति के लोग, चाय बागानों में काम करने के लिए श्रीलंका चले गए. बेहतर आर्थिक स्थिति, धर्म बदल कर ईसाई बन जाने औऱ यूरपीय असर की वजह से इनमें जागरूकता ज्यादा थी और ये औरतें अपने शरीर को पूरा ढकने लगी थीं. धर्म-परिवर्तन करके ईसाई बन जाने वाली नादर महिलाओं ने भी इस प्रगतिशील कदम को अपनाया. इस तरह महिलाएं अक्सर इस सामाजिक प्रतिबंध को अनदेखा कर सम्मानजनक जीवन पाने की कशिश करती रहीं.
यह कुलीन मर्दों को बर्दाश्त नहीं हुआ. ऐसी महिलाओं पर हिंसक हमले होने लगे. जो भी इस नियम की अवहेलना करती उसे सरे बाजार अपने ऊपरी वस्त्र उतारने को मजबूर किया जाता. अवर्ण औरतों को छूना न पड़े इसके लिए सवर्ण पुरुष लंबे डंडे के सिरे पर छुरी बांध लेते और किसी महिला को ब्लाउज या कंचुकी पहना देखते तो उसे दूर से ही छुरी से फाड़ देते. यहां तक कि वे औरतों को इस हाल में रस्सी से बांध कर सरे आम पेड़ पर लटका देते ताकि दूसरी औरतें ऐसा करते डरें.
लेकिन उस समय अंग्रेजों का राजकाज में भी असर बढ़ रहा था. 1814 में त्रावणकोर के दीवान कर्नल मुनरो ने आदेश निकलवाया कि ईसाई नादन और नादर महिलाएं ब्लाउज पहन सकती हैं. लेकिन इसका कोई फायदा न हुआ. उच्च वर्ण के पुरुष इस आदेश के बावजूद लगातार महिलाओं को अपनी ताकत और असर के सहारे इस शर्मनाक अवस्था की ओर धकेलते रहे.
आठ साल बाद फिर ऐसा ही आदेश निकाला गया. एक तरफ शर्मनाक स्थिति से उबरने की चेतना का जागना और दूसरी तरफ समर्थन में अंग्रेजी सरकार का आदेश. और ज्यादा महिलाओं ने शालीन कपड़े पहनने शुरू कर दिए. इधर उच्च वर्ण के पुरुषों का प्रतिरोध भी उतना ही तीखा हो गया. एक घटना बताई जाती है कि नादर ईसाई महिलाओं का एक दल निचली अदालत में ऐसे ही एक मामले में गवाही देने पहुंचा. उन्हें दीवान मुनरो की आंखों के सामने अदालत के दरवाजे पर अपने अंग वस्त्र उतार कर रख देने पड़े. तभी वे भीतर जा पाईं. संघर्ष लगातार बढ़ रहा था और उसका हिंसक प्रतिरोध भी.
सवर्णों के अलावा राजा खुद भी परंपरा निभाने के पक्ष में था. क्यों न होता. आदेश था कि महल से मंदिर तक राजा की सवारी निकले तो रास्ते पर दोनों ओर नीची जातियों की अर्धनग्न कुंवारी महिलाएं फूल बरसाती हुई खड़ी रहें. उस रास्ते के घरों के छज्जों पर भी राजा के स्वागत में औरतों को ख़ड़ा रखा जाता था. राजा और उसके काफिले के सभी पुरुष इन दृष्यों का भरपूर आनंद लेते थे.
आखिर 1829 में इस मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया.
कुलीन पुरुषों की लगातार नाराजगी के कारण राजा ने आदेश निकलवा दिया कि किसी भी अवर्ण जाति की औरत अपने शरीर का ऊपरी हिस्सा ढक नहीं सकती. अब तक ईसाई औरतों को जो थोड़ा समर्थन दीवान के आदेशों से मिल रहा था, वह भी खत्म हो गया. अब हिंदू-ईसाई सभी वंचित महिलाएं एक हो गईं और उनके विरोध की ताकत बढ़ गई. सभी जगह महिलाएं पूरे कपड़ों में बाहर निकलने लगीं.
इस पूरे आंदोलन का सीधा संबंध भारत की आजादी की लड़ाई के इतिहास से भी है. विरोधियों ने ऊंची जातियों के लोगों दुकानों और सामान को लूटना शुरू कर दिया. राज्य में शांति पूरी तरह भंग हो गई. दूसरी तरफ नारायण गुरु और अन्य सामाजिक, धार्मिक गुरुओं ने भी इस सामाजिक रूढ़ि का विरोध किया.
मद्रास के कमिश्नर ने त्रावणकोर के राजा को खबर भिजवाई कि महिलाओं को कपड़े न पहनने देने और राज्य में हिंसा और अशांति को न रोक पाने के कारण उसकी बदनामी हो रही है. अंग्रेजों के और नादर आदि अवर्ण जातियों के दबाव में आखिर त्रावणकोर के राजा को घोषणा करनी पड़ी कि सभी महिलाएं शरीर का ऊपरी हिस्सा वस्त्र से ढंक सकती हैं. 26 जुलाई 1859 को राजा के एक आदेश के जरिए महिलाओं के ऊपरी वस्त्र न पहनने के कानून को बदल दिया गया. कई स्तरों पर विरोध के बावजूद आखिर त्रावणकोर की महिलाओं ने अपने वक्ष ढकने जैसा बुनियादी हक छीन कर लिया.
यह आलेख चोखेर बाली ब्लॉग से लिया गया है... इसे आर. अनुराधा ने लिखा है..

Tuesday, August 21, 2012

आप देवदूत हैं लच्छी मामा - मुरली कार्तिक


कुछ लोग वीवीआईपी नहीं होते वे वीवीएस होते हैं. वीवीएस लक्ष्मण वीवीआईपी नहीं थे इसलिए उन्हें शुरूआती दिनों में लगातार ओपनिंग करना पड़ा, जबकि वे स्वाभाविक रूप से मिडल आर्डर के बल्लेबाज थे. उन्हें लगातार परफोर्म करना पड़ा, क्योंकि दो मैच की असफलता उन्हें टीम से बाहर का रास्ता दिखा देती. इसके बावजूद अगर टीम एक समय टेस्ट में नंबर वन हुयी तो इसका बड़ा श्रेय उनको जाता है. खास कर सेकेण्ड इनिंग की उनकी बल्लेबाजी को. उनके रिटायर होने पर एक साथी खिलाडी मुरली कार्तिक ने बड़े भावुक अंदाज में उन्हें याद किया है. क्रिकेट की दुनिया को समझने के लिए यह आलेख बड़ा महत्वपूर्ण है. मूल सामग्री क्रिकइन्फो.कॉम से साभार.
प्रिय लच्छी मामा, हमने जो वक़्त साझा किया है उसके बारे में कहाँ से लिखना शुरू करूँ? एक घटना से शुरू करता हूँ. जैसा कि आप जानते हैं मैंने आपके लिए कई, कई बार नेट पर बोलिंग की है. 2005 में श्रीलंका के खिलाफ अहमदाबाद टेस्ट मैच की पूर्व संध्या पर आपने मेरी एक गेंद पर अस्वाभाविक ड्राइव किया था. इससे पहले कि मैं अपनी भावना व्यक्त कर पता आपने खुद ही माफ़ी मांग ली. प्यारी सी दकनी में जिसे हम हैदराबादी हिन्दी कहते हैं, आपने कहा:. "जान बूझ के नहीं मारा. होना बोल के मारा. प्रक्टिस करने के लिये होना बोल के मारा.
इतनी प्यारी जुबान. आपको भला कोई कैसे पसंद नहीं करेगा?
अगर आप बुरा न माने तो मैं कहना चाहूँगा कि मैं खुद को लकी समझता हूँ जो आपका करीबी दोस्त बन सका. इस डॉग इट डॉग वर्ल्ड में, आपके पास होने से हमेशा सुकून महसूस होता था. 2000 में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ जब मैंने अंतरराष्ट्रीय कैरियर की शुरुआत की, आपने हमेशा मेरे लिए समय निकला. मैंने पहली बार आपके खिलाफ चेन्नई में पचैयाप्पस के कॉलेज मैदान में एक अभ्यास मैच खेला था और अविश्वसनीय रूप से, उस दिन से आज तक, आप वैसे के वैसे ही हैं.
भारतीय क्रिकेट में आप मेरे सबसे अच्छे दोस्त रहे हैं. मैंने खुद को गौरवान्वित महसूस किया जब 2004 में अपनी शादी के समारोह में आपने क्रिकेटर के रूप में अकेले मुझे ही आमंत्रित किया. अगर आपको याद हो, शादी में एक अनुष्ठान हुआ था जिसमे पुजारी दो लकड़ी की कठपुतलियों एक लड़का और एक लड़की को पकडे हुए थे, वे परिवार के प्रतिरूप थे. शादी के बाद परंपरागत रूप से उन कठपुतलियों को दूल्हे की बहन को दिया जाता है. मगर आपने उसे मेरी पत्नी श्वेता को दे दिया और जब जब आपके बच्चे पैदा हुए तो उन्हें लेकर आप हमारे घर गुड़गांव आये थे.
जब मैं सोचता हूँ कि हम कैसे इतने करीबी दोस्तों बन गए, तो एक घटना याद आती है. यह मुझे वापस 2003 में ले जाती है और मुझे हंसी आ जाती है. मुझे यकीन है कि आपको पता है कि मैं क्या बात कर रहा हूँ. 2003 के विश्व कप से पहले, मैं न्यूजीलैंड के दौरे के लिए चुना गया था, इससे पहले मैं वेस्टइंडीज के खिलाफ एकदिवसीय श्रृंखला में बेहतर प्रदर्शन कर चुका था. मगर मुझे न्यूजीलैंड के साथ वन डे श्रंखला में शामिल नहीं किया गया. यह मेरे लिए बड़े हैरत की बात थी.
उस वक़्त आप ही ने मुझे शान्ति दी थी, कहा था- इस तरह की बातें होती हैं. वैसे भी न्यूजीलैंड में एक स्पिनर के लिए कुछ नहीं रखा. टीम में अनिल कुंबले और हरभजन सिंह जैसे सीनियर खिलाडी थे. मैं एकदिवसीय श्रृंखला के लिए इसलिए उम्मीद कर रहा था, क्योंकि विश्व कप टीम के लिए जल्द ही टीम की घोषणा होने वाली थी.
लेकिन जब विश्व कप टीम की घोषणा हुयी तो आश्चर्यजनक तरीके से आपका नाम उसमे नहीं था. विडंबना यह हुयी कि हम दोनों ने खुद को एक दूसरे के खिलाफ हैदराबाद में रणजी ट्राफी मैच खेलता पाया और एक महीने बाद हम दोनों कैरेबियन दौरे के लिए साथ साथ इंडिया ए टीम का हिस्सा बन कर रवाना हुए. जब भी हम न्यूजीलैंड के बारे में सोचते हैं, हम हँस पड़ते हैं. यह कहना बेकार है, कि हममें से कोई मानसिक रूप से ए टीम का हिस्सा बनना नहीं चाह रहा था, आप तो विशेष रूप से. यह देखते हुए कि आप पहले दो मैचों में लगातार चार बार डक पर आउट हुए थे. आपने उस वक़्त कहा था: "कार्तिक, मैं अब से तुम्हे सलाह नहीं दूंगा क्योंकि मैं जो तुमसे कहता हूँ वह मुझ पर ही लागू हो जाता है." आपके जैसा दोस्त मिलना मेरे लिए क्रिकेट के किसी अवार्ड से बहुत बड़ा इनाम है.
मैं भाग्यशाली हूँ कि आपकी कप्तानी में खेलने का मौका मिला है. आपके समेत मुझे तीन बड़े अच्छे कप्तानो की कप्तानी में खेलने का मौका मिला. अज्जू भाई (मोहम्मद अजहरुद्दीन) के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और वीबी चंद्रशेखर के साथ इंडियन सीमेंट्स में. आप इनमे सबसे बेहतर थे. आपकी शैली अजहरुद्दीन स्कूल से मिलती जुलती है. आप मानते हैं की गेंदबाज एक हद तक अपना कप्तान खुद होता है.
मेरे लिए, यह शानदार था. क्योंकि मुझे मालूम था कि मैं क्या करने की कोशिश कर रहा हूँ. इसपर अगर मेरे कप्तान का मुझे समर्थन मिल गया तो इससे अधिक मैं और क्या उम्मीद कर सकता हूँ? आपने कोई बात मुझ पर थोपने की कोशिश की कभी नहीं की. आप सकारात्मक थे, पर अटैकिंग फील्ड लगते थे और मैं एक चैंपियन की तरह गेंदबाजी करता.
मुझे 2004 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ मुंबई टेस्ट आज भी याद है जब आपने उस खतरनाक पिच पर 69 रनों(दोनों टीम में किसी भी बल्लेबाज द्वारा उच्चतम) की यादगार पारी खेली थी. जबकि मेन ऑफ़ द मैच का पुरस्कार सात विकेट झटकने के लिए मुझे दिया गया. पुरस्कार के तौर पर मिले बड़े से प्लास्टिक चेक पर सबसे पहले आप ही ने लिखा था, "एबसोल्युट मैचविनर, हमेशा उम्मीद करता हूँ कि ऐसी सफलता बार-बार हासिल करो."
लेकिन मामा हम जानते हैं कि सच्चे मैचविनर आप थे. कई अवसरों पर, विशेष रूप से 2003 में एडिलेड में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ दूसरे टेस्ट में. 45 डिग्री की गर्मी में आप और राहुल द्रविड़ ने आश्चर्यजनक बल्लेबाजी कर 303 रन की भागीदारी निभायी, खास तौर पर इन हालातों में जब एक समय भारत 4 विकेट पर 85 रनों के स्कोर पर था. लोग आपके 281 रन वाली पारी के बारे में बात करते हैं, लेकिन मुझे 148 रन की पारी में ज्यादा मज़ा आया. आपकी इस पारी के कारण हमने ऑस्ट्रेलिया पर जीत दर्ज की और भारत नंबर 1 टेस्ट टीम बनने की रह पर निकल पड़ा.
मुझे आश्चर्य होता है कि आपने कैसे किसी के खिलाफ कभी कोई गलत बात नहीं कही यहां तक ​​कि ऐसे लोगों के खिलाफ भी जिन्होंने आपको नुकसान पहुंचाया है. बहुत लोग चुप नहीं रह पाते.
याद है जब आपने आईपीएल के उद्घाटन सत्र में डेक्कन चार्जर्स के आइकन का दर्जा छोड़ने का फैसला किया था? मैं जानता था कि आप के लिए पैसे का कोई आकर्षण नहीं है. आपने ऐसा सिर्फ इसलिए किया था क्योंकि आप हैदराबाद को एक मजबूत टीम बनाने चाहते थे. आप हमेशा अपनी टीम के बेहतर प्रदर्शन के लिए इमानदारी से प्रयासरत रहते थे. जब मैंने भारतीय घरेलू टीम के एक वरिष्ठ खिलाडी का नाम लिया था जिसे पहली आईपीएल के दौरान अनदेखा किया गया था, तो आपने उसे टीम में शामिल कर लिया.
हमने शनिवार को एक बार फिर आपकी निस्वार्थता को देखा, जब आपने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कहा. जब आप भारतीय टीम में आये थे तो शुरूआती कुछ वर्षों में आपको विदेशों में खेलन पड़ा था. उस दौरान भारतीय टीम बाहर अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पा रही थी तो किसी न्यू कमर को पहले होम ग्राउंड पर खेलने का मौका देना चाहिए था. मुझे मालूम है आपने सोचा होगा कि अगर खेलते रहे तो यह अच्छी बात नहीं होगी. कितने लोग भारतीय क्रिकेट के बारे में सोचते हैं, कितने लोग ऐसा सोचते हैं कि नए खिलाडी को ग्रूम करने का मौका मिलना चाहिए. हालाँकि आप बड़ी आसानी से अपने 134 टेस्ट कैप को आगे बढ़ा सकते थे.
मैंने हमेशा सही बात कहने में विश्वास किया है बनिस्पत अच्छी बात कहने के. आप मृदुभाषी हैं और बहुत आदर्शवादी भी. आपके इसी रवैये ने मुझे वैसा बनाया जैसा मैं हूँ. आप हमेशा मानते रहे कि कुछ चीजों को बदला नहीं जा सकता. आपकी इसी बात ने मुझे उत्साह बनाये रखने के लिए प्रेरित किया, क्योंकि मैं कई-कई बार टीम से बाहर रहा हूँ. इसके बावजूद मैं असंतुष्ट नहीं हूँ.
मैं सचमच विश्वास नहीं कर सकता कि अब आप अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट नहीं खेलेंगे. जब मैंने आपके रिटायर्मेंट के बारे में सुना, मैं आंसुओं में डूब गया. मेरे जीवन पर हमेशा आपका शांत प्रभाव रहेगा. यदि सचिन क्रिकेट के भगवान हैं, तो आप वीवीएस किसी देवदूत सरीखे हैं.
सच में आपका, कार्तिक

Monday, August 20, 2012

सात हजार में देश की चौहद्दी नापने का जुनून


पर्यटन एक महंगा शौक है. समय खपाऊ और खर्चीला. जबकि घुमक्कड़ी इसके ठीक विपरीत है. यहां पर आप देखेंगे किस तरह कम समय और सस्ते में बेहतरीन घुमक्कड़ी की जा सकती है. घुमक्कड़ी के लिये रु पये-पैसे की जरूरत नहीं है, रुपये -पैसे की जरूरत है टैक्सी वाले को, जरूरत है होटल वाले को. अगर यहीं पर कंजूसी दिखा दी तो समझो घुमक्कड़ी सफल है.
नीरज जाट की ये पंक्तियां उसके ब्लॉग मुसाफिर हूं यारों पर परिचय वाले कॉलम में दर्ज है. इसके अलावा उनके ब्लॉग पर पिछले तीन साल में उनके द्वारा की गयी घुमक्कड़ी की कई कहानियां और तसवीर भी नुमायां हैं. नीरज जितने अच्छे घुमक्कड़ हैं उतने ही अच्छे ब्लॉगर भी. यात्रओं के बारे में उनके वृत्तांत इस बात की गवाही देते हैं. 292 लोग उनके इस ब्लॉग के सदस्य हैं.
पिछले दिनों उनके ब्लॉग पर एक रोचक जानकारी नजर आयी. वे रेल यात्र के जरिये पूरे देश की चौहद्दी नापने की योजना बना चुके हैं और आठ अगस्त को इस 13 दिवसीय यात्र पर निकलने वाले हैं(जब यह आलेख प्रकाशित होगा वे इस अनूठी यात्र के लिए निकल चुके होंगे). ऐसे में हमने पंचायतनामा के लिए उनसे इस यात्र के बारे में विस्तार से बातचीत की.
देल्ही मैट्रो के जूनियर इंजीनियर नीरज जाट को बचपन से ही घुमक्कड़ी का शौक रहा है. खास तौर पर रेल यात्र और हिमालय की सैर उनकी कमजोरियों में शामिल है. उन्हें जब भी मौका मिलता है, छुट्टी लेकर अपना शौक पूरा करने वे निकल पड़ते हैं. नीरज बताते हैं कि शौक तो बचपन से ही था मगर पूरा करने का मौका नौकरी मिलने के बाद मिला. 24 वर्षीय नीरज पिछले साढ़े तीन साल से इस नौकरी में हैं और पिछले साढ़े सात साल में 533 बार रेल यात्र कर 73663 किमी की दूरी नाप चुके हैं. इस बार उन्होंने इस घुमक्कड़ी को एक आकार देने का फैसला किया है, वे देश की चौहद्दी नापने निकल रहे हैं.
घुमक्कड़ी क्यों? जब यह सवाल नीरज से पूछा तो उन्होंने कहा, निरुद्देश्य. घुमक्कड़ी निरुद्देश्य ही हो सकती है. मगर हर बार ऐसा नहीं होता. भारत भ्रमण के इस प्रोग्राम के बारे में खुद नीरज लिखते हैं.
अक्सर मेरी सोच ज्यादा लम्बी नहीं चलती, बस एक महीने आगे की ही सोच सकता हूं. जून का महीना जब चल रहा था, तो मेरी सोच मात्र जुलाई तक ही सीमित थी, अगस्त के बारे में कि कहां जाना है, मैं सोच भी नहीं सकता था. लेकिन अब जमाना बदल गया है. हमने भी लम्बा-लम्बा सोचना शुरू कर दिया है. उसी का नतीजा है यह धाकड़ प्रोग्राम. वे बताते हैं, इस योजना के बारे में पहला ख्याल जून में आया.
जून में जब मैं गौमुख गया था तो हमारे दिमाग ने स्पेशल सोचा. वहीं ट्रेकिंग करते-करते अपने दिमाग में आया कि एक लम्बी ट्रेन यात्र की जाये. वहीं समय भी तय हो गया कि अगस्त में चलेंगे. क्योंकि अगस्त तक प्राय: मानसून पूरे भारत पर कब्जा जमा लेता है और धरती का रंग रूप बदल जाता है. वापस आकर इस दिशा में काम शुरू कर दिया. यह इतना आसान नहीं था. खूब दिमाग की खिचडी बनाई और तब जाकर फाइनल हुआ कि ट्रेन से भारत की परिक्र मा करेंगे.
योजना बनाकर नीरज ने रूटचार्ट तैयार किया और तय किया कि क्लॉकवाइज देश की परिक्रमा करेंगे. हर दो ट्रेन के बीच ऐसा माजिर्न रखा कि एक ट्रेन के लेट होने पर दूसरी ट्रेन मिस न हो. तब जाकर कुल 13 दिनों का प्रोग्राम बना. 14 अलग-अलग ट्रनों के जरिये वे 12 हजार किमी की यात्र करेंगे. शिडय़ूल इतना टाइट है कि इस यात्र के दौरान वे किसी शहर में घूमने नहीं जा सकेंगे. इस बात का उन्हें अफसोस भी है. उनका सारा समय रेलगाड़ियों में यात्र करते हुए और प्लेटफार्म पर दूसरी ट्रेन का इंतजार करते हुए गुजरेगा. हालांकि रेलगाड़ियां और रेलवे स्टेशन से उन्हें इतना प्यार है कि यह समय वे बगैर बोर हुए गुजार लेंगे.
नीरज औसतन हर साल दस हजार किमी की यात्र करते हैं और इसमें उनके 35 हजार रुपये खर्च करते हैं. अब तक यह तमाम खर्च वे खुद वहन करते हैं, अपने वेतन से. अपनी जेब से खर्च कर और नौकरी से छुट्टी लेकर इस तरह यात्र करना हर किसी के लिए मुमकिन नहीं. कई लोग शौक रहने के बावजूद नहीं कर पाते. मगर नीरज ने रास्ते निकाल लिये हैं. वे कहते हैं कि वे घरेलू मसलों के लिए कम से कम छुट्टी लेते हैं, ऐसे में घुमक्कड़ी के लिए उन्हें आसानी से छुट्टी मिल जाती है. अविवाहित होने के कारण वेतन के पैसे से हर माह तीन हजार खर्चना आसानी से मुमकिन हो जाता है.
इस बार उनकी भारत परिक्रमा का बजट छह से सात हजार के बीच का है. जिसमें साढ़े तीन हजार रुपये टिकट में खर्च होने हैं और ढाई से तीन हजार खाने-पीने में. टिकट वे कटा चुके हैं और खाने-पीने का एक खर्च एक कनाडावासी मित्र सुरेंद्र शर्मा उठा रहे हैं.
(पंचायतनामा के अगस्त द्वितीय अंक में प्रकाशित)

Thursday, August 16, 2012

ससुराल गेंदा फूल और तार बिजली


तार बिजली गाने की काफी चर्चा सुनी. आभासी दुनिया में शोर बरपा हुआ है.. शारदा सिन्हा का नाम बरबस खींचता है. डाउनलोड करना ही पड़ा. घर में जब पहली बार बजा..तार बिजली के जैसे हमारे पिया..हाये सासू बता तूने ये क्या किया तो उपमा पूछ बैठी. सोहर है क्या? उपमा धनबाद में पली बढ़ी है.. मगर उसे गैंग्स ऑफ वासेपुर के बारे में ज्यादा नहीं मालूम.. हां, सोहर के बारे में थोड़ा बहुत मालूम है. गाना जब खत्म होने को आया तो फिर से उसकी आवाज आयी.. शारदा सिंहा गा रही है. हां.. इतनी देर बाद समझ आया? मैंने पूछा तो उसने जवाब दिया- अभी भी उसका टोन नहीं लग रहा है..
दिन में तीन या चार बार गाना बजा. बेटी एक-आध बार झूम के नाची भी. उपमा ने कहा, ससुराल गेंदा फूल जैसा नहीं है. तिया भी वैसे नहीं नाची, जैसे ससुराल गेंदा फूल सुनकर आज भी उछल जाती है. उपमा और तिया मेरे कान और आंख हैं. इनके रहने पर मैं बहुत जल्दी किसी से प्रभावित नहीं होता. डर्टी पिक्चर देखकर उपमा ने कहा था, फैशन का कॉपी है.. इससे पहले हम लोग सपरिवार गैंग्स ऑफ वासेपुर पार्ट 1 के गाने भी सुन चुके हैं. वुमनिया से लेकर टैटै-टूटू तक. तिया को टैटै-टूटू और हंटर काफी पसंद आया. उपमा मुंह बनाये रही.
मैं जरूर शुरुआत में गैंग्स ऑफ वासेपुर के संगीत से प्रभावित होता रहा. मुझे लगता था कि इस तमाशे में अगर कोई चीज बहुत अच्छी है तो वह इसका संगीत है. स्नेहा खानवलकर ने पहली दफा बिहार के विभिन्न इलाकों के लोक संगीत को इतने बड़े पैमाने पर बालीवुड की दुनिया में लांच किया है. फिर एक दिन रोटी, कपड़ा और सिनेमा नामक ब्लॉग पर स्नेहा के बारे में बड़ी अच्छी रपट पढ़ी.
कह के लूंगा. पता नहीं.. इस तीसरे दरजे के लेन-देन के बिना अनुराग क्यों नहीं काम चला पाये. अपनी काबिलियत पर भरोसा नहीं था या दर्शकों की समझ-बूझ पर. यह बेवजह का गाना था. इक बगल में चांद होगा.. बड़ा अच्छा लिखा और गाया गया. हंटर के बारे में जैसा पता चला कि मारिशस से मिला था. वुमनिया और मुहझौंसा.. मुहझौंसा तो ठीक है.मगर वुमनिया कहां से आया.. आज तक यह राज मेरे लिए राज ही है. भूस के ढेर में राई जहां बिदेसिया की याद दिलाते हैं वहीं एक गाना हमारे इलाके में होने वाले भगैत जैसा है. बोल याद नहीं आ रहे. जियो हो बिहार के लाला.. भी अनुराग एंड कंपनी की आत्मविश्वास की कमी को ही रेखांकित करता है.
इन गानों को सुनते-सुनते एक महीना गुजरने वाला है. अब इन्हें बजाया नहीं जाता. बजाता हूं तो उपमा मुंह बनाने लगती है और तिया कहती है..दूसला..दूसला. तीसरी कसम का बरसों पुराना एक गाना है..आज भी नया ही है..किसी भदेस पार्टी में बजता है तो हमारे जैसे जवानी को विदा कर रहे देहाती भी उछलने लगते हैं.. वही..पिंजरे वाली मुनिया.. यह भी बिहार का ही लोक गीत है. हमारे जिले के फारबिसगंज मेले में बजता होगा. रेणुजी ने वहां से उड़ाया और शंकर-जयकिशन(शायद) ने पता नहीं कहां से उड़ाया. गैंग्स ऑप वासेपुर के गीतों की चर्चा करते हुए पिंजरे वाली मुनिया की याद आ जाती है. आखिर क्या वजह है कि गैंग्स ऑफ वासेपुर के दो दर्जन से अधिक गानों में से एक भी न ससुराल गेंदा फूल जैसा बना और न ही पिंजरे वाली मुनिया के आसपास पहुंच पाया.
इसकी वजह भी मुझे कहीं न कहीं अनुराग का नेतृत्व ही लगता है. वे इतनी अच्छी फिल्मोग्राफी करने के बावजूद कह के लूंगा के भरोसे फिल्म का भविष्य तलाशते रहे और उसी कहके लूंगा ने उनकी फिल्म की लुटिया डुबो दी(शायद). अच्छी खासी रिसर्च के बावजूद अगर संगीत वैसा(अपेक्षित) जादू नहीं कर पा रहा है(किसी लोकल मेस की दाल जैसा लग रहा है, जिसे गाढ़ा करने के लिए होटल का मालिक उसमें मांड मिला देता है, या तीन बार इस्तेमाल किये गये तेल में छने पकौड़े या चार बार यूज की गयी चाय पत्ती की बनी चाय जैसा) तो इसकी वजह भी कह के लूंगा ही है. वुमनिया से लेकर तार बिजली तक कई गानों में अच्छी शायरी का कौशल डर्टी हो जाने की बहक में खत्म हो रहा है. स्नेहा ने बिहार के लोक संगीत का चेहरा तो पहचान लिया है मगर उसके चेहरे पर वह लाली नहीं है जो पिया को पा जाने या पिया को गंवा देने पर उभरती है. तार बिजली दिल के तार को नहीं छूती क्योंकि संगीत के शोर में शारदा सिंहा की खनक खो जाती है. तमाम गानों के मुखड़े उम्मीद जगाते हैं मगर अंतरा आते-आते जादू टूटने लगता है.

Tuesday, August 07, 2012

सोना तो मम्मी मेरीकॉम के लिए ही बना है


पांच अगस्त को जब मेरीकॉम दनादन पंच चलाते हुए अपने प्रतिद्वंद्वी को धूल चटा रही थी तो उसके जुड़वां बेटे रेचुंगवार और खुपनेवार अपना पांचवां जन्मदिन माना रहे थे. यह उनका पहला जन्मदिन था जब उनकी ममा उनके साथ नहीं थीं. बहुत संभव है कि मेरीकॉम उनके लिए और पूरे देश के लिए सोने का तमगा लेकर लंदन से वापस लौटे. मुक्केबाज मम्मी मेरीकॉम के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं है. उसने अब तक 15 अंतरराष्ट्रीय मेडल जीते हैं जिसमें 11 गोल्ड और 3 सिल्वर हैं. उसने 6 वर्ल्ड चैंपियनशिप में भाग लिया है और पांच बार सोना हासिल कर लौटी है. उसने तीन सोना शादी से पहले जीता है और दो बच्चों के पैदा होने के बाद. सीजेरियन करवा चुकी मेरीकॉम के मुक्के की ताकत घटने के बजाय बढ़ रही है. उसके माता-पिता से लेकर स्पोर्ट्स ऑथारिटी तक पिछले पांच साल से उसके रिटायर होने का इंतजार कर रहे हैं. मगर 29 साल की उम्र में जिस करिश्मे पर उसकी नजर है वह न सिर्फ उसकी बल्कि पूरे देश की ख्याति में चार चांद लगाने वाला है.
इस बार जब ओलिंपिक में भारतीय टोली पहुंची थी तो मेरीकॉम के नाम की कहीं चर्चा नहीं थी. मेडल के दावेदारों में सायना नेहवाल, अभिनव बिंद्रा, दीपिका और सुशील कुमार के चर्चे थे. अब इन तमाम चर्चो पर विराम लग गया है. कई वर्ल्ड चैंपियन खाली हाथ लौट आये हैं. मगर मेरीकॉम का सोना लगभग पक्का लग रहा है.
मणिपुर के एक छोटे से गांव में एक भूमिहीन परिवार में पैदा हुई मेरीकॉम कभी सोच भी नहीं सकती थी कि वह खेल-कूद के सिलसिले में पूरी दुनिया का चक्कर लगायेगी. बचपन में उसे ठीक से खाने के लिए नहीं मिलता था. मांस और मछली के लिए तरसती थी. एक बार स्कूल की स्पर्धा में भाग लेने के लिए इंफाल गयी थी, जेवलिन थ्रो में हिस्सा लिया था. वहां मणिपुर के चैंपियन बॉक्सर डिंको सिंह का नाम सुना तो बाक्सिंग को ही सपना बना बैठी. एक कोच से अपने दिल की ख्वाहिश बता दी. उसने एक साल कोचिंग दिया और अगले साल वह बाक्सिंग की नेशनल चैंपियन थी.
फिर तो चैंपियन बनने का सिलसिला ही चल पड़ा. जहां जाती सोना जीत कर ही लौटती. मगर पिता को उसका यह खेल पसंद नहीं था. कहते थे, सूरत बिगड़ जायेगी. मगर जब बिगड़ती सूरत के सहारे ही मेरीकॉम ने पिता के हाथ में सोने के दो तमगे धर दिये तो उनको भी चुप होना पड़ा.
कैरियर ठीक-ठाक चल रहा था, तभी शादी करने का इरादा कर लिया. लोगों ने कहा, अभी कैरियर पीक पर चल रहा है अभी तो घर बसाने की मत सोचो. मगर मेरीकॉम ने कहा, घर बसाने से ही कैरियर जमेगा. अभी अकेले यहां-वहां घूमने में परेशानी होती है. पति साथ रहेगा तो बेफिक्र होकर खेल सकेंगी.
फिर बच्चे हुए. जुड़वां.. वो भी सिजेरियन. घर वालों ने सोचा अब तो घर बैठेगी. मगर मेरीकॉम कहां घर बैठने वाली थी. अगले साल ही निकल पड़ी और वर्ल्ड टाइटल जीत लिया. अब ऐसी जिद्दी खिलाड़ी का क्या किया जा सकता है.
कहते हैं स्पोर्ट्स ऑथारिटी भी इस इंतजार में थी कि मेरीकॉम कब खेलना बंद करती है, मगर मेरीकॉम ने तो जैसे अभी सफर शुरू ही किया है. मम्मी मेरीकॉम जब रिंग में उतरती हैं तो जैसी उसके शरीर में बिजली दौड़ने लगती है. जब तक प्रतिद्वंद्वी संभलता है वह जीत चुकी होती हैं. उससे पूरा देश कह रहा है, एक सोने का सवाल है. मगर मुङो लगता है सोना तो मेरीकॉम के लिए ही बना है.

Friday, August 03, 2012

प्रधानमंत्री जी आप तो अन्तरयामी ठहरे


जयंत ने इस बार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नाम एक चिट्ठी लिख भेजी है... मौन मोहन सिंह इसे पढ़ पायें इसी कोशिश में यह चिट्ठी यहाँ टांग रहा हूँ..
प्रधानमंत्री साहेब,
प्रणाम
देश का समाचार सब ठीक है, खासकर मेरे राज्य का, वो आपकी दुआ से एकदम चकाचक है. सब लोग कमा खा रहे हैं, योजना आयोग जिन्दाबाद के नारे के साथ. ठीक ही किया आपके योजना विभाग ने जो एकदम टेटुआ टाईट करके भारतीयों के जीने का दाम तय किया. प्रधानमंत्री जी आप तो अन्तरयामी ठहरे, आपको पता है आदमी को ज्यादा रूपया मिलेगा तो आदमी का बुद्घि दारू, जुआ, नशा में लग कर भन्ना जाएगा. ऐसे में क्या खाक देश का विकास होगा. ऐ हुजूर एक बात सुने थे, सोचे चिट्ठी में लिखकर गंगा नहा लेगे, परन्तु हमारा भ्रम है. अब गंगा पर काफी ड्रामा हो रहा है. कुछ इलाज किजिए इ पंडितवन के, साले घिघियाके मर जाएगे. हम बुरबक क्या से क्या बोल गये. आप पंडित पर हाथ कैसे डालेगे, राहुल गांधी भी बाभन है. आप त बाभन समाज के एहसानमंद है.
बेकार का बात करना हमारा आदत नहीं, हमारा समाचार आप तक पहुंच जाए बहुत है. हमारा दोनों बिटिया स्कूल जाती है, एक लईका(लड़का) है उसे भी भेजता हूं. समस्या है मेरे बेटे के दिमाग में पढ़ाई का बात घुसता नहीं. हम केतना बार बोले पढ़ ध्यान लगाके, नहीं पढ़ेगा तो कही का नहीं रहोगे. ए सर, बचवा कहता है अब दिमाग का नहीं चुप रहने का जेनरेशन है. हम बोले, तनी खुल के बताओ, तो़ क़हता है हमारे प्रधानमंत्री दिमाग लगाते हैं क्या?
ऐसे प्रश्नचिह्न वाला बात बोला के हम ही प्रश्नवाचक बन गये. हम खूब डांटे, बाप रे बाप छोटी मुंह बड़ी बात. प्रधानमंत्री को दिमाग नहीं ऐसा कैसे हो सकता है. कही ऐसा हुआ है क्या? वह भी आप जैसे अर्थशास्त्री के लिए जो पाई-पाई जोड़ने में माहिर हो. रूपया पैसा से याद आया आपको उपरी आमदनी होता है कि नहीं. महंगाई के हिसाब से होना चाहिए. अगर नहीं होता तो ठीक बात नहीं है, इ 6-7 साल में आपके देख-भाल में लोगों ने काफी रूपया कमाया, वो भी कोई बाहरी नहीं मंत्रीमंडल के ए राजा, कलमाडी उसमें कोई लेडिज भी है. उपरी इनकम हक है, ध्यान दिजिएगा अपने कमीशन का. इसमें अगर आपको कोई बुराई लगे ऐसी कोई बात नहीं सब किसी को घर चलाना है, आपको महिना भर का राशन लाना होता होगा कि नहीं, बच्चा का स्कूल फीस, बिजली बिल, गेस्ट का सत्कार आखिर सब होगा रूपया से. गाँठ बाँध के रख लिजिए, जितना भी आपके मंत्री लोग कमाए उसपर आपका कमीशन फिक्स होना चाहिए. कोर्ट-कचहरी से डरना नहीं, आखिर जज, सीबीआई आपके अन्डर में है फिर डरना क्या.
आप कितना फेमस हो गये है इसका अनुमान आपकी धर्मपत्नी को भी नहीं होगा. मध्यवर्गीय समाज में वर पक्ष वधु पक्ष से कन्या के संबंध में सवाल करता है कि लड़की मनमोहन सिंह जैसा चुप रहती है या ममता की तरह चपड़-चपड़ जवाव सवाल करती है. हैरत तो तब होती की लड़की वाला विन्रमता से कहता भाईसाहब न्यू जेनरेशन है मतलब की प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह है.
प्रधानमंत्री जी रमुआ अपने गांव काम मांगने गया तो मुखिया उसको मनरेगा में काम देने के लिए रिश्वत मांगता है, शिकायत करने के लिए बोलने पर कहता है कि राहुल जी, सोनिया जी, मनमोहन जी, गृह मंत्री जी और बाकी सब जी मिलकर कितना रूपया पैसा खर्चा करके राष्ट्रपति बनाये. वह लोग शिकायत करने नहीं गये. आप बता दिजिए की मुखियवा ठीक कहता है, आपलोगों को बहुते रूपया-पैसा खर्चा हुआ है क्या ?
हमारे बाबूजी गांव के चौकीदार थे, चाचा आदेशपाल... आपसे क्या छुपाना है हमको एक जनलोकपाल का नौकरी दे दिजिए. टीवी पर देखे जब अन्ना बाबा बूढ़ा होने पर नौकरी के लिए हल्ला किये हैं तो हम जवान हैं. विश्वाश नहीं हो तो नाप-जोख लिजिए. किरण जी दुबारा नौकरी करेगी और हम लोग बेकार घूमेंगे. इ कहां का इंसाफ होगा. गांव के चट्टी (बाजार) पर गये जनलोकपाल का फार्म लाने सोचा भर दे कही टाईम खत्म हो गया फिर आपका पैरवी भी काम नहीं आएगा. फार्म मांगे दुकानदार से, दुकानदार बोला की जनलोकपाल नौकरी नहीं बिल है, इंसाफ का. अरे भाई बिजली बिल, राशन बिल तो सुने थे. जनलोकपाल बिल जरूर महंगाई बढ़ाने वाला मशीन है क्या भाई. दुकानदार ने फिर बताया कि अन्ना बाबा इसी चक्कर से प्रधानमंत्री जी परेशान हैं. हमको तो एक ही बात पता कि ऐसे देवता मानुष पंतप्रधान जो किसी के बारे में कुछ बोलता नहीं उसको परेशान करना तोबा-तोबा. ए मालिक आप इ अन्नवा को चुपे-चुपे इलाज कर दिजिए, ससुरा का घिध्घी बन्द हो जाएगा. सुना है अन्न-जल त्याग दिया है, आपके इलाज से अन्न तो क्या सूखा लकड़ी भी चबाने लगेगा.
सब चिन्ता छोड़ अपने सेहत पर ध्यान दिजिए. पूरे देश की उम्मीद आपसे है. सुबह-सुबह योग किजिए अनुलोम-विलाम, प्राणायाम से तबीयत ठीक रहेगा. हमलोग भोरे-भोरे मंटेसरी स्कूल के फिल्ड में जाते है। वही पर अनुपवा बता रहा था कि बाबा रामदेव काला धन लाने के फिराक में प्रधानमंत्री पर जोर लगाए है. इस मुर्ख को कौन समझाए कि जो पैसा जल गया उसके लिए प्रधानमंत्री को कहना या तंग करता अच्छी बात है? अनुपवा फिर बोला की काला धन से देश में खुशहाली आएगा. अरे अनुपवा.. हम तुमसे पूछते हैं काला धन कोई खाद-बीज है जिससे फसल अच्छा होगा. मान ले कि खाद-बीज है तो इससे किसान को फायदा होगा, प्रधानमंत्री को बीच में घसीटना कहां का समझदारी है. रामदेव बाबा को योग से रूपया का रोग लग गया. कुछ दिन पहले इसी रूपया रोग के कारण रामदेव बाबा को गेरूआ वस्त्र उतरवाके लेडिज का कपड़ा प्रधानमंत्री का आदमी पहनाया था. अब अगर आप जैसे सन्त महात्मा प्रधानमंत्री को किसी ने तंग किया तो नर्क में भी उसे जगह नहीं मिलेगा.
बाकी क्या लिखू, पत्र के मजमून को पढ़कर सोच विचार के कभी-कभी बोल दिजिएगा. आपके चुप्प रहने से मन घबरा जाता है. हम कसम खाते है अगर मुझे नौकरी मिली तो आप जैसा बन जाऊगा, खाली सुनूँगा. किसी एक लेडिज ( सोनिया माई) की बात पर ध्यान दूंगा. राहुल बबुआ जैसे मालिक के हां में हां मिलाकर बोलने का प्रयास करूंगा. अपने मालिक के परिवार के बारे में सोचना मेरा परम धर्म होगा. ईश्वर आपको पक्ष-विपक्ष की विपदा से बचाए. मुलायमा, ललुआ, इ सब आदमी ठीक नहीं है. शरदवा जैसा काला है उसका दिल भी उतना ही काला है. हमको विश्वास है कि आप पर माई जी और बबुआ का आशीर्वाद और दुलार जब तक रहेगा कोई माई का लाल आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता है. अन्त में हमार बाबुजी और माई जी का आर्षिवाद आपको मिले घर के छोटका बच्चन के प्रणाम स्वीकार किजिए. कोसी मईया के शाप से बचूंगा तो अगले पत्र में अपने बचने को कारण लिखकर भेजूंगा.
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एक शुभचिंतक... जिम्मेदार ग्रामीण