Saturday, September 29, 2012

दशरथ मांझी के गांव में सरकारी योजनाओं का हाल


दशरथ मांझी कभी गया के आसपास के लोगों के नायक हुआ करते थे, अब बिहार के सरकारी नायक हैं. पहाड़ काट कर रास्ता बना देने के उनके बेमिसाल कारनामे के कारण मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उनसे काफी प्रभावित थे. उनके गांव के लोग बताते हैं कि एक बार नीतीश ने उन्हें अपनी कुरसी पर बिठा दिया था और कहा था कि आज जो चाहे मांग लीजिये. तब भूमिहीन दशरथ मांझी ने शायद उनसे पांच एकड़ जमीन की मांग की थी, जो खुदा-न-खास्ता उनके जीते जी उन्हें सरकार दे नहीं पायी. हुक्मरानों का यही हाल है, वे अपने आप को दुनिया का मालिक मांगते हैं और हर चीज का वादा कर बैठते हैं. मगर वादा पूरा करना अफसरों का काम होता है और अफसर को गांधी जी की सुगंध मिली तो ठीक नहीं तो कानून बघारना शुरू कर देते हैं. खैर, जमीन नहीं मिली, हालांकि नीतीश कुमार ने उनके नाम पर महादलित युवक-युवतियों को रोजगारपरक प्रशिक्षण दिलाने के लिए एक योजना शुरू कर दी है, दशरथ मांझी कौशल विकास योजना. अब यह तथ्य भी सवालों के घेरे में है कि इस योजना के तहत कितने महादलित युवक-युवतियों का कौशल विकसित हुआ है, मगर दशरथ मांझी को सरकारी नायक बना देने से नीतीश अपनी पार्टी को जो राजनीतिक लाभ दिलाना चाहते हैं उसमें कुछ संभावना जरूर बनती है... खैर, मीडिया हस्तक्षेप के एक आयोजन के दौरान कई नये-पुराने साथियों के साथ दशरथ मांझी के गांव जाने और देखने का मौका मिला. वहां कई भ्रम टूटे...
सबसे पहले हमारी टोली गेहलौर के उस स्थान पर पहुंची जहां दशरथ मांझी ने अपने 22 साल के पागलपन(लोग उस वक्त यही कहते थे) की वजह पहाड़ को काट कर वजीरगंज और अतरी प्रखंड के बीच की 75 किमी की दूरी को घटाकर एक किमी कर दिया था. उस रास्ते पर सड़क बन चुकी थी और बगल में एक स्मारक भी. हमलोग दो गाड़ियों से थे, तकरीबन 25-30 लोग... हमारे पास दसेक कैमरे रहे होंगे, बांकी मोबाइल वाले कैमरे... जब इतने कैमरे एक साथ क्लिक-क्लिक का शोर मचाने लगे तो जाहिर सी बात है, आसपास के लोगों ने समझ लिया कि ये साधूजी(दशरथ मांझी) का कमाल देखने आये हैं. एक बुलंद आवाज वाली संभवतः मछुआरन(मछुआरनों के सशक्तिकरण का मैं बचपन से कायल रहा हूं) की आवाज अचानक गूंजने लगी, लोग बाग उसके चारो-ओर जमा हो गये. मैं दूर-दूर से ही उनका आख्यान सुनने लगा. ... साधू बाबा के मेहरारू का गगरी फंस के गिर गया तो उसी दिन ठान लिये कि पहाड़ को उख्खाड़ के फेंकिये देना है... मगर महिला दो दर्जन पत्रकारों के सवालों की बौछार में गड़बड़ाने लगीं. बाद में पता चला कि माताजी इस गांव की नहीं हैं, उन्हें तकरीबन उतनी ही जानकारी है जितनी हमें... आसपास के लोगों ने उनके अधजल गगरी छलक जाये वाले आचरण पर बकायदा मगही में उन्हें दोदना भी शुरू कर दिया... रहती हैं पटना में और कहती हैं गेहलौर की बात... जाइये-जाइये.
खैर हम लोग आगे बढ़ गये... दशरथ मांझी के गांव दशरथ नगर की तरफ. गेहलौर पंचायत है और दशरथ नगर गांव. दोनों के बीच सवा किमी का फासला है. दशरथ नगर नाम से कंफ्युजियाइयेगा नहीं. यह नाम सरकारी नहीं है... दशरथ नगर नाम गांव समाज के लोगों ने दिया था. पहाड़ काट देने के बाद दशरथ मांझी अपने इलाके के लिए कोई साधारण हस्ती नहीं रह गये थे. लिहाजा जहां बसे उस जगह का नाम लोगों ने दशरथ नगर रख दिया.
यहां आज भी तकरीबन 50 मुशहर(सरकारी भाषा में महादलित) परिवार रहते हैं, सभी दशरथ मांझी के सगे-संबंधी ही हैं. उनका इकलौता बेटा भागीरथ पांव जल जाने के कारण जो बचपन से चलने फिरने में संघर्ष करता है(विकलांग शब्द का ठीक विकल्प है न, अब लोग नाराज तो नहीं होंगे) सपरिवार रहता है. पत्नी, बेटी-दामाद और नाती-नातिन.... साधू बाबा अब नहीं रहे. गांव बिल्कुल वैसा ही है जैसी बिहार की कोई और मुशहर बस्ती हो सकती है. साधू बाबा के सरकारी नायक बन जाने के बावजूद इसकी सूरत नहीं बदली है, हालांकि लालू सरकार के टाइम से ही इस गांव के चेहरे पर सरकारी योजनाओं का पावडर लगाने की कोशिश चलती रही है. लालूजी के समय गांव में 35 इंदिरा आवास बंटे, मगर इनमें से अधिकतर आवास पड़ोसी जिला नालंदा के बौद्ध खंडहरों जैसे नजर आते हैं. अधिकांश मकान खाली पड़े हैं और लोग वहां कपड़े सुखाते हैं या पुआल रखते हैं, रहने का काम फूस की झोपड़ियों में करते हैं. दो हैंडपंप लगवा दिये गये हैं, मगर दोनों बिगड़ गये हैं लिहाजा लोग एक गंदे कुएं(तसवीर चस्पा है, देखकर आप अंदाजा लगा सकते हैं) का पानी पीते हैं. पहाड़ तोड़ कर रास्ता बना देने वाले इंसान के गांव में किसी को हैंडपंप सुधारना नहीं आता, अगर दशरथ मांझी कौशल विकास योजना के तहत इस गांव के दो युवकों को हैंडपंप सुधारना ही सिखा दिया जाता तो उस योजना की भी एक उपलब्धि होती. एक एनजीओ ने गांव में चार शौचालय भी बनवाये थे(तसवीर लगी है, देख कर सब समझा जा सकता है) मगर कोई उसके पैन में बने छेद में निशानेबाजी करने के लिए तैयार नहीं हुआ. लिहाजा महिला और पुरुष आज भी समभाव से खेतों को उर्वरक उपलब्ध करा रहे हैं. इन्हीं हालात में गांव के लोग यह बहुमूल्य जानकारी भी दे रहे थे कि साधू बाबा को साफ-सफाई से बहुत प्रेम था, इसी वजह से 25-30 साल पहले वे अपने चचेरे भाइयों को गेहलौर गांव में छोड़कर यहां आ बसे थे. इसी संदर्भ में यह सूचना भी दी गयी कि वे अंधविश्वास और नशाखोरी के खिलाफ भी थे.
अच्छा हुआ साधू बाबा गुजर गये, नहीं तो गांव का यह हाल देखते तो वापस गेहलौर लौट जाते. हो सकता है, उन्होंने अपने जीते-जी यह सब देख भी लिया हो...
गांव के लोग साधू बाबा की याद में बहुत कुछ करना चाहते हैं. उन्हें याद है कि साधू बाबा चाहते थे कि गेहलौर प्रखंड बन जाये, अब लोग उनके इस सपने को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. गेहलौर में साधू बाबा के नाम पर जो स्मारक बना है, वहां का पुजारी भागीरथ मांझी(बाबा के पुत्र) को बनाने की पूरी तैयारी है, कहते हैं, बेचारा चल फिर नहीं पाता है, मेहनत मजूरी कैसे करेगा. सरकार अगर वादा पूरा करते हुए पांच एकड़ जमीन दे देती तो इसका थोड़ा भला हो जाता. मगर कोई बात नहीं समाधि स्थल पर बैठेगा तो कुछ न कुछ चढ़ावा मिल ही जायेगा.
सरकार के खिलाफ लोगों में जबरदस्त गुस्सा है, गनीमत है कि रामविलास पासवान जी को यह सूचना नहीं मिली है. मुख्यमंत्री महोदय को तो सूचना मिलने का तो सवाल ही नहीं उठता, वे आजकल कान में ठेपी लगाकर राज करते हैं. खैर, यहां लोग चप्पल नहीं चलायेंगे इस बात की पूरी गारंटी है. (इस संबंध में एक खबर पंचायतनामा में भी प्रकाशित हुई है)

Friday, September 21, 2012

भूख से मौत की जिम्मेदारी किसकी


दो दिन पहले गया के एक गांव में भूख से हुई मौत के शिकार परिवार से मिलने का मौका मिला. परिवार और समाज के लोग तथा कई स्थानीय पत्रकार और बुद्धिजीवी मिलकर यह साबित नहीं कर पा रहे थे कि मौत भूख से हुई. पूरी सरकार इस सच को झूठ में बदलने के लिए जुटी थी. इससे पहले भी मुझे भूख से हुई मौत से जुड़े तीन-चार मामलों से सीधे जुड़ने का मौका मिला. हर बार यही हुआ. ऐसे में मेरी राय यही बनी है कि इस पूरे मामले में बेवजह मुख्य सचिव और दूसरे अधिकारियों को शामिल किया गया है. अगर सीधी जिम्मेदारी उन पर न हो जो उचित भी नहीं तो इसके समाधान की दिशा में कुछ सार्थक प्रयास हो सकते हैं.
राइट टू फूड अभियान के कारण देश में एक बड़ा फैसला हुआ था, जिसके तहत यह नियम बना था कि अगर देश में कहीं किसी की मौत भूख के कारण हुई तो इस घटना के लिए उक्त राज्य के मुख्य सचिव समेत सभी अधिकारियों को जिम्मेदार माना जायेगा. इसके बाद विभिन्न राज्य सरकारों ने अपने सूबे के गरीबों को सरकारी अनाज उपलब्ध कराने की कई योजनाओं का संचालन शुरू किया, हालांकि उन योजनाओं को लागू करने में कहीं न कहीं चूक रह ही जाती है और गरीब लोग भूख के कारण मारे जाते हैं.
मगर राइट टू फूड अभियान से जुड़े कार्यकर्ता हों, जमीनी पत्रकार हों या अन्य समाजसेवी. हम सभी अब जान चुके हैं कि मौजूदा हालात में भूख से हुई मौत के मामले को साबित कर पाना बहुत मुश्किल है. चुंकि इस मामले में मुख्य सचिव की गरदन फंसी होती है, वह हर तरह के हथकंडे अपनाता है जिससे साबित हो सके कि मौत का कारण भूूख नहीं था.
पहला सवाल तो पोस्टमार्टम का उठता है. आम तौर पर गांव के लोग किसी मौत के बाद पोस्ट मार्टम करवाने के बारे में नहीं सोचते. मरने वाला हिंदु हुआ तो आनन-फानन में फुंक जाता है, बांकी लोग दफना दिये जाते हैं. अगर कोई जानकार इनसान आसपास हो तभी वह मृतक के परिजनों को पोस्टमार्टम के लिए राजी कर पाता है.
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी कई झोल होते हैं. अगर मृतक के पेट में अनाज का एक दाना भी पड़ा मिल गया तो उसे भूख से मौत नहीं माना जाता. सरकार ने अब तक इस बात को नहीं माना है कि अगर चार रोटी खाने वाले को आधी रोटी मिले तो उसे भूखा ही कहना चाहिये. कई भूखे लोग तो खाना खाने के कारण भी मर जाते हैं. चार दिन की भूख के बाद अगर कुछ दिख गया तो उसे ही भकोसने लगते हैं. कमजोर शरीर उस अन्न को पचा पाने में नाकामयाब रहता है और मौत हो जाती है. मगर सरकारी और कानूनी परिभाषा है कि अगर आमाशय में अनाज का एक दाना या घर में एक किलो अनाज भी पाया गया तो मृतक की मौत भूख से हुई नहीं मानी जायेगी.
जब कोई बड़ा अधिकारी खास तौर पर मुख्य सचिव स्तर का अधिकारी फंस रहा हो तो जाहिर है उसे बचाने के लिए कोई उसकी झोपड़ी में या उसके आमाशय में अनाज का दाना डाल सके. खैर..
यह सब कानूनी दांव-पेंच हैं. भूख से हुई मौत के साबित न हो पाने की एक बड़ी वजह यह है कि यह साबित होने पर मुख्य सचिव की गरदन फंसती है. अगर इस मसले पर थोड़ा समझदारी से विचार किया जाये तो क्या यह उचित है कि भूख से हुई हर मौत का जिम्मेदार मुख्य सचिव को माना जाये. पटना-रांची और भोपाल में बैठा अधिकारी सैकड़ों किमी दूर किसी गांव में रह रहे गरीब की मौत का जिम्मेदार तभी हो सकता है जब उसने किसी योजना के लिए फंड या अनाज जारी करने में कोई आनाकानी की हो. उसी तरह जिले का अधिकारी और प्रखंड का अधिकारी भी अपनी तरफ से तभी जिम्मेदार हो सकता है जब उसने गरीबों की मददगार योजनाओं के लागू होने में कोई बाधा खड़ी की हो. मगर उसके गांव का पंचायत सचिव, मुखिया, उसका वार्ड सदस्य, आंगनबाड़ी सेविका, आसा आदि लोग जो उस व्यक्ति को सीधे तौर पर जानते हैं, इस मौत के असली जिम्मेदार होने चाहिये. भूख से होने वाली मौतों को रोकने की जिम्मेदारी जब तक इन पर नहीं दी गयी तब तक मौते होती रहेंगी.
इन लोगों के जिम्मे कई सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन का अधिकार होता है. मुखिया के पास आपात स्थिति में बांटे जाने लायक अनाज भी होता है. उसे अपने वार्ड सदस्यों के माध्यम से यह पता लगाते रहना पड़ेगा कि क्या गांव में कोई ऐसा व्यक्ति है जो भूख से जूझ रहा है और उसे मदद करना उचित होगा. फिर उस वार्ड और आस-पास के लोगों की राय लेकर उसे मदद करना पड़ेगा.
वरना मुखियाजी तो यही सोचते हैं सचिव महोदय का मामला है, वे अपनी गरदन बचायेंगे तो हमारी गरदन भी बच जायेगी.

Tuesday, September 11, 2012

हीरो न बनायें..असीम ने सीमा तोड़ी है..


कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी की बात करते वक्त चाहे-अनचाहे ओम्कारेश्वर के वे सत्याग्रही याद आ जाते हैं जो पिछले एक पखवाड़े से अधिक वक्त से पानी में बैठे अपनी जमीन के लिए संघर्ष कर रहे हैं. बांध की ऊंचाई बढ़ा दिये जाने के कारण इनके गांव के अस्तित्व पर खतरा उत्पन्न हो गया था. राज्य सरकार ने बांध की ऊंचाई कम करने का आश्वासन दिया है, इसके बावजूद लोगों को भरोसा नहीं है कि सरकार इतनी जल्दी उनके पक्ष में हो जायेगी और बिजली उत्पादन कंपनी के खिलाफ फैसले दे देगी. मगर इसके बावजूद वे चुपचाप रोज पानी में बैठ जाते हैं. उनके पांवों में पाको(पानी में ज्यादा देर तक बैठने के कारण होने वाला रोग) लग चुका है. मगर उनके नारों में क्रूर सरकारों के खिलाफ बददुआ तक नहीं निकलती. यह ठेठ गांव वालों का विरोध है, यह गांधीवाद नहीं है. गांधी जी ने जरूर इनसे अहिंसक विद्रोह के ये नायाब तरीके सीखे होंगे.
असीम के पक्ष में दर्जनों पोस्ट लिखे गये होंगे. क्योंकि सरकार अगर एक कार्टूनिस्ट को देशद्रोही करार देती है तो स्वभाविक तौर पर लोगों का गुस्सा भड़केगा. पता नहीं सरकार ने ऐसी बेवकूफी क्यों की, लगता है सरकार के भीतर एक धड़ा काम कर रहा है जो गाहे-बगाहे सरकार को इस तरह की परेशानियों में डालकर चुपचाप मजे लेता है. निश्चित तौर असीम देशद्रोही नहीं हैं, मगर उन्होंने सीमा जरूर पार की है. असीम ने यह सब या तो मानसिक दीवालियापन के तहत किया है या अतिरेक में आकर.
इंडिया अगेंस्ट करप्शन का आंदोलन भी इन्हीं सस्तेपनों के कारण असफल हुआ. आंदोलनकारी मुद्दे पर चोट नहीं कर पाये. खुद गांधीवादी अन्ना हजारे आंदोलन के रचनात्मक और अहिंसात्मक तरीकों की तलाश नहीं कर पाये. आशा है उन्होंने ओंकारेश्वर वाला आंदोलन देखा होगा और उस मौन विरोध की ताकत तो महसूस किया होगा.
असीम की भावनाएं गलत नहीं है, मगर अगर आप आंदोलन का नेतृत्व करना चाहते हैं तो छिछोरापन आपके लिए जहर है.असीम ने अपनी सीमा का अतिक्रमण किस तरह किया है उसके उदाहरण स्वरूप मैं कार्टून अगेंस्ट करप्शन की साइट से उनके बनाये कुछ कार्टून यहां लगा रहा हूं. ये कार्टून सिर्फ इस बात का इशारा करते हैं कि एक योद्धा किस तरह आपा खो बैठता है और ऊल-जुलूल हरकतें करने लगता है.
कई साथियों ने पाश और दूसरे कवियों की कविताओं के उदाहरण पेश करते हुए यह समझाने की कोशिश की है कि जब हालात हद से बाहर हो जाते हैं तो विरोध भी उसी स्तर का हो जाता है. एक तो व्यक्तिगत तौर पर मैं इस बात से सहमत नहीं कि शोषक के विरोध के लिए शोषक की भाषा अपना ली जाये. अगर ऐसा है भी तो धूमिल और राजकमल चौधरी जैसे कवियों ने भी अपनी विरोध की भाषा को इस कदर स्खलित नहीं होने दिया कि उनकी कविता और शराबी के आत्मालाप में फर्क न रहे. ऐसे में एक ही अनुरोध है असीम को हीरो न बनायें..

Wednesday, September 05, 2012

ठेट गंवई आन्दोलन है यह जल सत्याग्रह


ओम्कारेश्वर बांध के खिलाफ वहां के लोग १३ दिनों से जल सत्याग्रह कर रहे है... उनका पुनर्वास किये बगैर बांध से पानी छोड़ दिया गया है... बांध की ऊँचाई भी बढ़ायी जा रही है... इस आन्दोलन के समर्थ में भोपाल में भी समाजसेवी टंकियों में खड़े होने की योजना बना रहे है.. मगर इस आन्दोलन को न सरकार नोटिस कर रही है न ही मीडिया ... पेश है इस अनूठे आन्दोलन की तस्वीरें.. इस आन्दोलन की सबसे बड़ी खासियत है कि यह ठेट गंवई आन्दोलन है... यह साफ करता है कि गाँव के लोग परंपरागत तरीके से किसी अन्याय का विरोध कैसे करते हैं...

Monday, September 03, 2012

आज नहीं अज्जो बानों


‘‘साजन मेरा उस पार है मिलने को दिल बेकरार है़.... परदेशी परदेशी जाना नहीं.... मुझे छोड़ क़े़... ज़ैसे कर्णप्रिय गाने अक्सर भारतीय रेल से सफर के दौरान सुने होगे. गाना, गाने का अंदाज, गाने वाले, कभी कौतुहल का विषय हुआ करते थे, आज गाना गायब, अंदाज बदला, बकसीस के जगह जबरन वसूली करके हमें लूटते हिजरे... कुछ इस तरह से मेरी मुलाकात आज ठाकरे नाम के हिजरे से हुई, आइए सुने आज ने कैसे उठाए अपने राज के पर्दे
-मेरा नाम आज ठाकरे उर्फ अज्जो
-उम्र वसूली लायक है यानि जवानी जिन्दाबाद
-आपका घर मतलब की स्थायी ठिकाना तो होगा ?
-है न, अपुन मुम्बई की हूँ
-आप किस तरह से इस धंधे में आयी ?
- देखो साहब अपुन का धंधा ज्यादा इच पुराना नहीं.. वो क्या बोलो़, अभी हमारा चचाजान इस धंधे का शेर हुआ करता था.. आज अपुन लोग उसको आगे ले जाने का क्यो, बराबर बोला ना़...
-चचाजान से मतलब कुछ समझा नही ?
-अरे बाबा बोला ना़... चचाजान अभी बुढ़ा हो गया है उसको अपुन ने बोल दिया इधर इच कुर्सी पे बैठने का़... अपुन के जवानी के दिन है क्या़... दुसरे स्टाइल से धंधा करेग़े़...
-रज्जो तुम्हारी इनकम कितनी हो जाती है ?
-अभी क्या बोलूं पहले अपुन लोग केवल दुसरों की खुशियों में जाते थे, धीरे-धीरे महंगाई बढ़ती गई, आपको मालूम कि अपुन ने सरकारी, प्राइवेट नौकरी तो की नहीं की पगार मिले सो हमने अब पेट को भरने के लिए मौके अपने आप बना लेते है, बस रोटी चलनी चाहिए
-अभी हाल के मुम्बई चुनाव में आपने कैसे जीत हासिल किया ?
-अरे बाबा तुम खाली फोकट की बात करते हो़, हिजरो के आगे कोई चुनाव लड़ने आएगा क्या ? हमारा अपना पार्टी है, पार्टी के प्रति हमारा समाज वफादार है...
-बिहारीयों से मनमुटाव का कोई खास कारण है ?
-बिहारी सा.. होते काफी मेहनती. अपुन लोगों को हफ्ता देने में काफी चिकचिक किया करते हैं.. यही बिहारी अपने गांव जाकर सोहर गवाते है रूप्या पैसा खर्च करते है जब हम लोग मांगते है तो नाक भौ सिकोरते है, आखिर अपुन लोग कहां जायेंगे. आज बिहारी हफ्ता नहीं देगा कल यूपी वाला, परसो बंगाली, नरसो गुजराती फिर अपुन लोग का बंटाधार हो जाएगा. अपुन लोग क्या मांगते कुछ कमाई का हिस्सा हिजरों पर खर्च करो फिर मौज से रहो. -तो बिहारीयों से इतना डरना आखिर क्यों ?
- तुमने सुना नही क्या एक बिहारी सब पऱ.....
- अन्त मे आप कुछ कहना चाहेगे ?
-अन्त, शुरू, धर्म, कुछ भी मायने नही रखता बस हमें किसी हाल में रूप्या चाहिए. हमने स्ट्रगल किया है यानि काफी कठीनाई से इस मुकाम तक पहुंचे है, दरवाजे-दरवाजे नाचना अब अच्छा नहीं लगता, धंधा तो वही पर अंदाज राजनीति का. यही हमारी पावर है... बात अलग है कि दिल्ली अभी दूर है.
जयंत सिन्हा