Wednesday, October 31, 2012

बगैर विस्थापन सिचित हो गयी 10 लाख हेक्टेयर जमीन


सरकार यह मान कर चल रही है कि बगैर विस्थापन के बड़ी परियोजनाओं को आकार नहीं दिया जा सकता। अब इस योजना के कमाल को क्या कहा जाये जिसके तहत बगैर विस्थापन 10 लाख हेक्टेयर जमीन सिंचित हो गयी। भोपाल में विस्थापन के मुद्दे पर एक सेमिनार में भागीदारी के दौरान अपनी एक पुरानी स्टोरी याद आ गयी जो पंचायतनामा के मई माह के अंक में प्रकाशित हुयी है।
पिछले खरीफ में झारखंड के किसानों ने धान की रिकार्ड पैदावार की. सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस बार लगभग 65 लाख टन खाद्यान्न का उत्पादन हुआ है, इससे पहले खाद्यान्न का अधिकतम उत्पादन 35 लाख टन ही था. अलग राज्य बनने के बाद पहली बार ऐसा हुआ, जब झारखंड ने खाद्यान्न के मामले में न सिर्फ आत्मनिर्भरता हासिल की बल्कि हमारे पास अपने खर्चे के बाद भी इतना अनाज बचा रहेगा कि अगर इस खरीफ में पैदावार कम भी हुई तो हमें बाहर से अनाज मंगाने की जरूरत नहीं रहेगी.
किसानों की इस सफलता के पीछे जहां अच्छी बारिश को क्रेडिट दिया गया, वहीं राज्य सरकार ने समय पर खाद-बीज उपलब्ध कराने की अपनी योजना का जिक्र कर अपनी ही पीठ थपथपा ली थी. किसी का ध्यान इस ओर नहीं गया कि इस दौरान राज्य में मनरेगा के तहत एक लाख से अधिक कुएं और एक लाख दस हजार से अधिक तालाब खुद गये. इसके कारण राज्य की 10 लाख हेक्टेयर से अधिक जमीन को महज दो साल में सिंचाई की सुविधा हासिल हो गयी.
एक ऐसे राज्य में जहां कुल कृषि योग्य भूमि 29.74 लाख हेक्टेयर है और जहां हाल तक सिर्फ 7.4 लाख हेक्टेयर जमीन ही सिंचित है वहां यह कोई साधारण सफलता नहीं. इन आंकड़ों को देखने के बाद यह कहना गलत नहीं होगा कि झारखंड की हालिया हरित क्रांति के पीछे मनरेगा के कारण बनकर तैयार एक लाख से अधिक कुएं और एक लाख दस हजार से अधिक तालाबों का बड़ा योगदान है.
इन तालाबों ने न सिर्फ खाद्यान्न उत्पादन में हमें आत्म निर्भर बनाया बल्कि पूरे राज्य में सब्जी उत्पादन के कई पॉकेट्स बन गये जो सब्जी उत्पादन के नये रिकार्ड कायम कर रहे हैं. अब राज्य सरकार पर दबाव है कि वे इन सब्जी उत्पादकों के लिए कोल्ड स्टोरेज की चेन बनाये और फूड प्रोसेसिंग यूनिटों की स्थापना करे ताकि इनका अतिरिक्त उत्पादन बरबाद न हो और इन्हें पसीने के एक-एक बूंद की कीमत मिले.
एक लाख से अधिक कुएं और एक लाख दस हजार से अधिक तालाबों से जुड़े सवा दो लाख से अधिक सफल किसान खनिज उत्पादन के लिए मशहूर इस राज्य को खेती के मानचित्र पर स्थापित करने में जुटे हैं. मनरेगा के सौ दिन के रोजगार की योजना आज इनके लिए ईश्वरीय वरदान साबित हो रही है. इस सफलता के पीछे 13 लाख मजदूरों के मेहनत का बड़ा योगदान है.
इस बदलाव को केवल किसानों को उपलब्ध होने वाली सुविधा के रूप में और मजदूरों को मिलने वाली मजदूरी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. इसने विकास की बरसों पुरानी सोच को भी खारिज कर दिया है जिसके तहत माना जाता था कि बड़ी परियोजनाओं से ही बदलाव संभव है.
जैसे कि ऊपर बताया जा चुका है कि महज चार-पांच साल में पूरी होने वाली इस परियोजना से न एक घर उजड़ेगा और न ही कोई नदी असमय काल के गाल में समायेगी. पिछले चालीस साल से स्वर्णरेखा समेत कई बड़ी परियोजनाएं झारखंड में चल रही हैं. इसके कारण लाखों लोग विस्थापित होकर बदहाल हो गये हैं. मनरेगा के मसले में जितनी भ्रष्टाचार की चर्चा होती है उससे काफी अधिक भ्रष्टाचार इन परियोजनाओं के जरिये हुआ है. इसके बावजूद आज तक नहरों में पानी के दर्शन नहीं होते. जहां होते भी हैं वहां कुछ ही सालों में नहरें बेकार हो जाती हैं.
पिछले दशक से देश के पर्यावरणविदों ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि नहरों के बदले सिंचाई के परंपरागत साधन जैसे तालाब, आहर और कुएं ज्यादा बेहतर परिणाम दे सकते हैं. मगर इसे हमेशा पुरातनपंथी विचारधारा मान कर खारिज किया जाता रहा. इसके बदले नदी जोड़ो परियोजना जैसी अव्यवहारिक योजना को बढ़ावा दिया जाता रहा. मगर अब मनरेगा के बहाने इन परंपरागत उपायों की बहाली के सकारात्मक उपाय सामने आ रहे हैं.
देश के तमाम पर्यावरणविद अगर चाह भी लेते तो उनकी बातों का समर्थन करने वाले हजारों एनजीओ मिल कर यह काम एक पूरी सदी में नहीं कर पाते. मगर मनरेगा के कारण यह काम आज जमीन पर उतरा है. आज झारखंड ही नहीं पूरा भारत पर्यावरणविद अनुपम मिश्र की इस बात को समझ रहा है कि सचमुच आज भी खरे हैं तालाब. झारखंड के गांव-गांव में नये तालाब खुद रहे हैं और पुराने तालाबों में जान-फूंकने की कोशिश की जा रही है.
पेयजल एवं स्वच्छता विभाग तक पेयजल आपूर्ति के लिए अब पाइप आधारित परियोजना के साथ-साथ पुराने कुओं के जीणोंद्धार की योजना को मदद करने के लिए तैयार है. पंचायतनामा के साथ हुई बातचीत के दौरान विभाग के प्रधान सचिव सुधीर प्रसाद ने कहा कि ताजा जनगणना के आंकड़े बताते हैं, झारखंड के 36 फीसदी लोग आज भी कुएं का पानी पीना पसंद करते हैं. ऐसे में अगर कोई पंचायत अपने पुराने कुएं को पुनर्जीवित करना चाहती है तो योजना बनाकर हमारे पास भेजे. हम उन्हें इसके लिए आवश्यक धनराशि उपलब्ध करायेंगे. जब हर पंचायत में 50-50 कुएं खुद रहे हों तो भला पेयजल का संकट कैसे होगा. गांव की महिलाओं को दो-दो किलोमीटर दूर जाकर पानी लाने की परेशानी से भी मुक्ति मिलेगी.

Tuesday, October 16, 2012

प्रेम की आग और नाबालिग समाज


प्रेम की आग बड़ी भीषण होती है, इस पर जितना पानी डालो आग बुझती नहीं भड़कती ही है. मगर हमारा समाज जो खुद प्रेम के मामलों को हैंडिल करने में इतना नाबालिग है कि वह प्रेम की आग में पानी के बदले केरोसिन उढ़ेल देता है.
महज एक दशक पहले तक जब मैं युवा था, हमारे लिए प्रेम दूसरी दुनिया की चीज हुआ करती थी. हमारा समाज युवाओं के इस लहकते प्रेम से तकरीबन अनजान था. प्रेमी युगल फरार जैसी खबरें कोसी-मिथिला इलाकों में नहीं छपती थीं. यह रांची-पटना और टाटा जैसे शहरों की कहानी होती थी. मगर इक्कीसवीं सदी ने हमारे समाज को प्रेम की लपटों के करीब ला दिया है. समाज झुलसने लगा है.
जाहिर है संदर्भ मधुबनी की वह घटना है जिसमें एक किसान का बेटा एक अफसर की बेटी के साथ प्रेम कर बैठा और इसके बाद जो आग जली उसने न सिर्फ मधुबनी शहर बल्कि पूरे बिहार को झुलसा डाला. मुख्यमंत्री की सालों की मेहनत लगा एक पल में स्वाहा हो जायेगी. इससे पहले एक पत्रकार युवती की कहानी हम देख ही चुके हैं, जिसने खुदकुशी कर ली थी. कहने को ही वह कहानी महानगरीय थी, उसकी जड़ें कोसी और मिथिला के कछार में ही थी. पिता ज्योतिष की दुहाई दे रहे थे कि तुम्हारा राहु प्रबल है वह मस्तिष्क को स्थिर रहने नहीं दे रहा. ऐसे में कोई निर्णय नहीं लेना चाहिये. युवती राहू के क्षणिक आवेग से बचायी नहीं जा सकी.
भागलपुर के नाथनगर शहर की एक घटना भुलाये नहीं भूलती. एक युवती ने अपने मामा पर दुष्कर्म का आरोप लगाता हुआ एक पत्र अपने घर पर छोड़ दिया और लापता हो गयी. पत्र में उसने जान देने की सूचना छोड़ी थी. पूरा शहर इस चिट्ठी से उद्वेलित हो गया. रिश्तों के खत्म हो जाने की दुहाई दी गयी. मामा को तत्काल गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया. 15 दिनों बाद पता चला कि भांजी अपने प्रेमी के साथ दिल्ली में है. यह काम उसने लोगों का ध्यान भटकाने के लिए किया था. मधुबनी से गायब हुए किशोर ने भी कुछ ऐसी ही हरकत की. इन बच्चों का क्या किया जा सकता है?
किसको दोष दिया जाये? टीवी पर सपरिवार बिग बॉस देखने वाले हमारे समाज में आज भी शादी से पहले लड़की देखने का रिवाज नहीं है. जो देखते हैं उन पर नैतिक दबाव रहता है कि देख कर लड़की को न ठुकरायें वरना लड़की की शादी में परेशानी होगी. आप कहेंगे, दकियानूसी बातें कर रहा हूं. मगर कैसे प्रगतिशील हो जाऊं. पूरे समाज को हनुमान कूद लगाने कैसे कह दूं.
एक परिचित हैं, उनके बेटे ने जिद ठान ली कि शादी वह अपनी ममेरी बहन से ही करेगा. वरना जान दे देगा. बेबस होकर उनने बेटे की बात मान ली, अब एक तरह से पूरे समाज का अघोषित बहिष्कार ङोल रहे हैं. एक सज्जन ने बेटे के प्रेम विवाह को औपचारिक रूप दिया और कहा अंतजार्तीय विवाह समय की मांग है, वरना उनका समाज जेनेटिक बीमारियों से अकाल-कलवित हो जायेगा.
मगर इतनी समझ और हिम्मत किसमें है. जिस बेटी का बाप ए-ग्रेड का अधिकारी है, राजनेता है. वह तो पूरी ताकत झोंक देगा.
बच्चे डरते हैं अपने मां-बाप से प्रेम की बात करने में. इसलिए वे एक झटके में फैसला करते हैं. भाग चलें या जान दे दें. आप जब बिग बॉस देख रहे होते हैं तो उसकी घटनाओं पर चर्चा क्यों नहीं करते. बच्चों को समझाते क्यों नहीं, उनसे बातें क्यों नहीं करते, उनसे प्यार क्यों नहीं करते, उन्हें वक्त क्यों नहीं देते. बातें करेंग तब तो बतायेंगे कि पापा मुङो फलानां बाबू की बेटी अच्छी लगती है.
अच्छी लगने का मतलब हमेशा शादी कर लेना थोड़े ही होता है. अच्छी लगती है तो बातें करो, साथ खेलो, पढ़ो, घूमे, देखो-समझो.. फिर बताओ दोस्ती के लिए अच्छी लगती है या शादी के लिए. करीना और सैफ पांच साल साथ रहने के बाद शादी का फैसला करते हैं, मगर हमारे गांव के बच्चे दो बार नजर मिलते ही शादी का फैसला कर बैठते हैं. ये हालात कब बदलेंगे.