Thursday, December 27, 2012

हारे हुए पुरुष का हथियार है बलात्कार


उम्मीद है कि पल-पल बदलती गैगरेप की खबरों के शोर में आपको मुख्य आरोपी राम सिंह का बयान याद होगा. उसने बताया था कि अपंग होने के कारण वह इंफीरियॉरिटी कॉम्प्लेक्स का शिकार हो गया था. वह अपनी अपंगता का बदला हर किसी से लेना चाहता था. मैंने जीवन में कई रेप के मामले देखे हैं और उनमें से अधिकांश मामलों में इस घृणित कृत्य करने वाले को किसी न किसी रूप में कमजोर या इंफीरियॉरिटी कॉम्प्लेक्स का शिकार ही पाया है. अधिकांश रेप दमित इच्छाओं के कारण होते हैं. पुरुष खुद को प्रेम के काबिल नहीं पाता तो जबरदस्ती प्रेम और अंततः शरीर का सुख भोगना चाहता है. कई दफा वह अपने प्रिय पात्र को मिटा भी देना चाहता है, क्योंकि उससे लगता है कि वह कितनी भी कोशिश क्यों न कर ले, अपने प्रिय पात्र की आंखों में खुद के लिए वह आकांक्षा हासिल नहीं कर सकता. इसी संदर्भ में मुझे उपन्यास मैला आंचल का मशहूर किरदार बावन दास याद आता है. वह एक दफा एक कांग्रेस नेत्री के बदन के कपड़े को चिथड़ा-चिथडा कर देना चाहता था, जबकि वह उस स्त्री को माता के तौर पर देखा करता था. हालांकि तभी एक पल ऐसा गुजरा कि उसे अपनी सोच पर खुद ही घृणा का आभास हुआ, उसका इरादा बदल गया. मगर कितने लोग इरादे के इस चरम पर जाकर लौट पाते हैं, खास तौर पर जब सिर पर शराब सवार हो.
हालांकि हमेशा ऐसा ही नहीं होता है. रेप की घटनाएं दंगों में भी होती हैं, पुलिसिया या फौजी रेड के दौरान भी होती हैं. पुराने जमाने में फौजी आक्रमण के दौरान भी होती होंगी. मगर ऐसे मामलों में भी मुझे लगता है कि बलात्कार का अगुआ वही होता होगा जिसके जीवन में प्यार का अभाव होगा. जो खुद को कमजोर और हीन समझता होगा. ठेठ बोलचाल की भाषा में कहूं तो लड़कों की दो कैटोगरी होती है. अपनी जवानी के दिनों में हमने देखा था कि हम लोग उस कैटोगिरी में आते थे जिन्हें लगता था कि लड़कियों से दोस्ती हमारे किस्मत की बात नहीं है. कुछ लड़के ऐसे होते थे जो बहुत आसानी से लड़कियों से दोस्ती कर लेते थे. हम कभी सोचते और कभी उन्हें इग्नोर करने का नाटक करते. हमारे ही ग्रुप में ऐसे कई लोग थे, जिनमें लड़कियों से दोस्ती नहीं हो पाने की कुंठा गहराती चली जाती. उनकी कल्पनाएं अश्लील होने लगतीं. वे हर दोस्ती को प्रेम और हर प्रेम में सेक्स की संभावना तलाशते और गॉशिप करते. फिर धीरे-धीरे ब्लू फिल्मों की शरण में चले जाते. उनके लिए फिर दोस्ती और प्रेम का अस्तित्व मिट जाता. उनके मन में सिर्फ सेक्स बच जाता. इनमें से कुछ लोगों के साथ अगर कोई कुसंयोग बन जाता तो वे भी जबरन सेक्स कर सकते थे. हो सकता है कि जोर-जबरदस्ती नहीं कर पाते...
यह तो एक पहलू है. रेप का दूसरा सबसे बड़ा पहलू हाल के बरसों तक रहा है स्त्रियों के जरिये उनके पुरुषों को नीचा दिखाना. अपने देश के इतिहास में जौहर होता रहा है. युद्ध में पराजित पक्ष की औरतें खुदकुशी कर लेती थीं कि कहां विजेता पक्ष उन्हें दूषित न कर दे. विजेता पक्ष अपनी जीत की मुनादी के तौर पर सामूहिक बलात्कार का तांडव रचता. हमने हाल-हाल तक ऐसी घटनाएं देखी और सुनी है कि अगर किसी प्रेमी युगल ने भाग कर शादी कर ली तो प्रेमी की मां या बहन के साथ बलात्कार, उसे नंगा घुमाना आदि घटनाएं की जाती थीं. लड़की के बदले लड़की का कॉन्सेप्ट रहा है. जैसे स्त्री संपत्ति हो और उसके साथ संपर्क कर उसके स्वामी पुरुष से बदला लिया जा रहा हो. यह दौर तब चरम पर था जब स्त्रियों की अपनी कोई पहचान नहीं थी. मगर धीरे-धीरे जमाना बदला.
महिलाएं सामने आने लगीं. पुरुषों की जगह पर कब्जा करने लगीं. स्कूल, कॉलेज और दफ्तरों में न सिर्फ दिखने लगीं बल्कि पुरुषों को चुनौती देने लगीं. कक्षाओं में लड़कियां टॉप करतीं तो कहा जाता टीचर लड़कियों को अधिक नंबर दे देते हैं. दफ्तरों में भी लड़कियों के आगे बढ़ने को उसके रूप और बॉस के प्रति उसके झुकाव से देखा जाता. पराजित पुरुष अब उस स्त्री से बदला लेना चाह रहा है जिसने उसे उसकी महानता से च्युत कर दिया है. महज कुछ साल पहले तक स्त्रियां सिर्फ शहरों में मुकाबला कर रही थीं. अब गांवों में भी स्कूलों, अस्पतालों, आंगनबाड़ी केंद्रों और पंचायतों के संचालन में उनसे मौके छीन रही हैं. वह पति भी अपनी पत्नी को मिटा देना चाहता है जो बेरोजगार है और उसकी पत्नी स्कूलों में पढ़ा कर घर चलाने के लिए पैसे कमाती हैं. एक पत्रकार महिला का पति अपंग है और वह कोई कांम नहीं कर पाता. वह हर रोज अपनी पत्नी को शारिरिक तौर पर मिटाने की कोशिश करता है.
पुरुषों के लिए यह एक कठिन दौर है. उसे धीरे-धीरे अपनी सत्ता महिलाओं को सौंपनी है. सत्ता का हस्तांतरण इस तरह होना है कि प्रेम बरकरार रहे, परिवार जीवित रहे. बरसों से अदृश्य होकर दुनिया को संभाल रही औरतें अब अगुआ बनने जा रही हैं, हमें अब पार्श्व में जाना होगा. जैसे टीवी के एंकर और होते हैं और प्रोग्राम प्रोड्यूसर और. सामने दिखता एंकर ही है, प्रोड्यूसर गुमनाम रहकर सारा काम संभालता है. यह अवश्यंभावी है, बदलाव होकर रहेगा, औरतें आगे आकर सबकुछ संभालेंगी, पुरुषों को पार्श्व में रहकर उसकी मदद करनी होगी. मातृसत्तात्मक दौर भी आ सकता है. बदलाव के इस दौर में कई पुरुषों ने खुद को नयी भूमिका के लिए तैयार कर लिया है. वे अब स्त्रियों से तरीके से पेश आते हैं. उनकी बातों का सम्मान करते हैं, उनके गुस्से को जायज मानते हैं. खुद कई अधिकार उनके सामने पेश करते हैं और पार्श्व की भूमिकाएं संभालने के लिए तत्पर नजर आते हैं. चाहे वह किचेन की हो, बच्चे संभालने की हो या दफ्तर में महिला बॉस का कांम संभालने की. हमें बस में औऱतों के लिए सीट भी छोड़ना है और बस चलाने वाली औरतों को सैल्यूट भी करना है. अगर हम चूके तो मिट जायेंगे. हमसे गलतियां होंगी और हमें भरी अदालत में कहना पड़ेगा, हम कसूरवार हैं. हमें फांसी दे दो.

Monday, December 24, 2012

जागो, बढ़ो, दे दो फासी-जयंत सिन्हा


रविवार की शाम दिल्ली पुलिस ने जिन षडयंत्रकारी तरीकों से इस आंदोलन को तात्कालिक तौर पर खत्म करने की कोशिश की उसके मुताबिक आंदोलनकारियों के हुजूम में असामाजिक तत्व घुस आये थे. (हालांकि मीडिया में आयी तसवीर कुछ और ही बयां कर रही है. अगर लाठी पुलिस चला रही है तो पिटने वाले असामाजिक कैसे हो सकते हैं.) खैर जिन्हें लगता है कि यह अस्वभाविक आंदोलन दम तोड़ चुका है, उनका भ्रम आने वाले दिनों में टूटने वाला है. देश भर में फैले ऐसे ही युवाओं के हुजूम बहुत जल्द इस दमन के खिलाफ सड़कों पर उतरने वाला है. इसी मसले पर पढ़ें मित्र जयंत सिन्हा का आलेख -
दिल्ली गरम है तो क्यों न पूरे देश में प्रदर्शन का दौर शुरू किया जाए, अगर आप सरकार के भरोसे है तो कोई जरूरी नहीं कि बलात्कार के केस में सजा के नये तरीको का ईजाद करेगे मंत्री. बात सत्ता पक्ष की हो या विपक्ष की। पिछले दिनों मैने गौर किया कि किसी दल ने खुलकर बलात्कारी को सजा दिलाने की पहल नही की. आखिर क्यों ? ज्यादातर केस में मंत्री के पुत्रों और उनके सरंक्षण प्राप्त लोगों का उजागर होना देखा गया है. मित्रों अगर सरकार पर भरोसा करेगे तो छले जाओगे। जयप्रकाश बाबू को याद करो और अनवरत आन्दोलन को जारी रखो जबतक कि इसमें कोई नया अध्याय नहीं जुड़े। मसलन बलात्कारी को फांसी दिया जाना चाहिए, या उम्र कैद लेकिन सबसे जरूरी है न्यायलय प्रकिया में लेट-लतीफी को दूर करना होगा. लेट-लतीफी कैसे, किन कारणों से होती है यह जग जाहिर है.
अमूमन विरोध की शुरूआत सदैव शांतिपूर्ण आन्दोलन के रूप में जन्म लेती है परन्तु अब बहुत हुआ, आज दोपहर टीवी के लाइव प्रसारण में देखा कि आन्दोलनकारी छात्रों पर पुलिस ने डंडा घुमाना शुरू कर दिया. कुछ मेरे भाईयों ने पलटवार किया और उसी डंडे से पुलिस वालों की पिटाई कर दी. यानि इस घटना से पुलिसिया बर्बता को सामने लाने का प्रयास किया है. एक तरफ शीला दीक्षित चैनल के माध्यम से रोती है और दूसरे तरफ बच्चों पर डंडा चलवाकर सोनिया, राहुल, मनमोहन को आराम देना चाहती है. कहां है कानूनविद सलमान खुर्शीद, दिग्विजय, पाल सहित तथाकथित सरकार के बाडीर्गाड. मेरा मकसद हंगामा खड़ा करना नहीं मगर कोई पूछे की मंत्रियों के घरों में, उनके नातेदारों में क्या लड़कियां नहीं है. अगर है तो सभी को जेड सुरक्षा प्राप्त है. शिंदे साहब तुम्हारे घर अगर ऐसी वारदात हुई होती तो क्या करते?
ठीक दूसरी तरफ सवाल यह उठता है कि क्या केवल सरकारी मशीनरी ऐसे कुकृत्य को रोक पाने में सक्षम है, शायद नहीं. यह कुछ मनचलो का दिमागी फितरत नहीं वरन समूचे पुरूष प्रधान समाज की मानसिकता पर उठ रहा सवाल है. सड़क पर हुई घटना को सबने जाना परन्तु घरों के अन्दर चुप-चाप से किये जा रहे रेप. घरेलु वारदात से लड़की के तन नही उसके मन:स्थिति का भी रेप किया जाता रहा है कारण हमारी सामाजिक मर्यादा. मेरी राय में सामाजिक दोष को खत्म करना होगा. सती प्रथा की तरह इसे भी लेना होगा. यानि जिसने भी यह जघन्य अपराध किया उसका सामाजिक बहिष्कार किया जाए. उसके चेहरे को मीडिया के द्वारा प्रदर्शित किया जाए, ताकि कोई दूसरा ऐसे अपराध को अंजाम देने में संकोच करे.
अब रही बात आन्दोलन की तो भाईयों अपने खून को गरम होने दो, आन्दोलन को उग्र करो ताकि दमनकारी सरकार की नीद खुले, तुम्हारे आन्दोलन से कई बहनों-बेटियों की लाज बचेगी. मुझे पता है मेरी विवशता ही मुझे उग्रता के लिए उकसा रही है. निर्मल भारत के निर्माण के लिए बलात्कारी को फांसी दिया जाए. भारत के सभी राज्यों के स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय के छात्रों से अनुरोध है शैक्षणिक कार्य का बहिष्कार करो, बिना सरकारी सम्पत्ति को हानि पहुचाएं राज्य सरकार से केन्द्र सरकार को विवश कर दो की इस छुई-मुई जैसे कानून में बदलाव करके एक सख्त कानून बनाए.
मेरे आन्दोलन का उद्देश्य अस्मिता स्वाभिमान की लाज के लिए है. जिसमें एकतरफा न्याय किया जाना होगा. सावधान रहना होगा क्योकि बीच में कोई नेता, मंत्री भरोसा का पाठ जरूर पठाएगां जिससे की आन्दोलन को कमजोर किया जा सके या बन्द कर देना पड़े. बात महज एक बलात्कार की नहीं, इस तरह कि तमाम घटनाएं एक मिडिल मैन के घरवालों के साथ आए दिन होती है. किसी नेता, मंत्री के घरवालों के साथ नही. अफसोस होता है जब हर घटना के बाद मामूली-सी खानापूर्ति के बाद आजतक कुछ नहीं हुआ ( कुछ चर्चित घटनाओं को छोड़). जागो, और इस कदर जागो की जम्मू से कन्याकुमारी तक आन्दोलन का रंग दिखे. तुम्हारे अन्दर चली रहीं आत्ममंथन खत्म हो गयी, तो यह तेरा, यह मेरा का प्रश्न छोड़ो। तुम्हारी लड़ाई सरकार और समाज दोनों से है, एक तरफ कमजोर कानून तो दूसरी तरफ दोगला समाज. सोच लेना अगले निशाने पर तुम्हारे घर की बहने होगी़ और तुम़.

Sunday, December 23, 2012

कौन सिखायेगा हमें गुस्से को वोट में बदलना?


संचार क्रांति के इस दौर में भी सरकार को दिल्ली की गूंज ही सुनायी पड़ती है, यह निश्चित तौर पर गंभीर सवाल है. मगर सिर्फ इस बिना पर हम किसी आंदोलन को खारिज नहीं कर सकते. अगर सरकार को दिल्ली का उबाल ही समझ में आता है तो हमें दिल्ली जाकर ही उबलना पड़ेगा. अगर सरकार को यही दवा सूट कर रही है तो उसी दवा का डोज देना पड़ेगा. लोग इसे वीकेंड की भीड़ कह सकते हैं. यह है भी. हो सकता है सोमवार से भीड़ छटने लगे और उबाल घट जाये. मगर अगर सरकार ने कुछ सकारात्मक नहीं किया तो यही भीड़ दुबारा शनिवार को ज्यादा जोर-शोर से उमड़ेगी. अगर इतवारी क्रांति से व्यवस्था बदलेगी तो हमें इतवारी क्रांति का ही सहारा लेना पड़ेगा.
ठीक है यह मिडिल क्लास की भीड़ है और इसके पीछे मीडिया का हाइप है. गांव के लोग गांव में लड़ते-लड़ते मर जाते हैं और उनकी आवाज कोई सुनता तक नहीं. पर क्या इस वजह से इस आंदोलन को समर्थन नहीं दिया जाये? लोग यह भी कहेंगे कि यह इंडिया का आंदोलन है भारत का नहीं. सही है. आंदोलन के पीछे जो ताकत काम कर रही है, वह मल्टीनेशनल में काम करने वालों और मल्टीनेशनल के लिए मजदूर पैदा करने वाले संस्थानों से जुड़ी है. मगर यह भी तो सोचिये कि यह सवाल उस व्यवस्था और उस विकल्प पर भी है जो हमारे हुक्मरानों ने देश की परंपरा और गांवों की सोच को खारिज करके चुना है. अगर सरकार का खुद का बनाया हिंदुस्तान, मनमोहन सिंह द्वारा रचा गया इंडिया ही उससे परेशान है तो यह सुखद अहसास है. हर हालत में व्यवस्था ही खारिज हो रही है, लोग नहीं.
यह आंदोलन क्या चाहता है? शायद इसका सही जवाब किसी के पास नहीं. उनके पास भी नहीं जो दो दिनों से इंडिया गेट के पास डटे हैं. क्या वे बलात्कारियों के लिए फांसी की सजा मुकर्रर होने पर संतुष्ट हो जायेंगे? यह सवाल ठीक वैसा ही है जैसा अन्ना और अरविंद के पीछे जुटी भीड़ का सवाल था कि वे क्या जन लोकपाल लेकर संतुष्ट हो जाने वाले थे? नहीं, यह इतनी छोटी बात नहीं है. लोग नाराज हैं, नाखुश हैं और बदलाव चाहते हैं. लोग पूरी शासन प्रक्रिया में बदलाव चाहते हैं, प्रक्रिया से अधिक सोच में बदलाव चाहते हैं. निरंकुशता को खत्म करना चाहते हैं. लूटतंत्र से मुक्ति चाहते हैं. लोग एक साथ सबकुछ चाहते हैं.
लोगों को लग सकता है कि यह नारीवादी आंदोलन का स्वरूप है. कई महिला मित्र इसे इस रूप में देख रही हैं, मगर वे यह भूल जा रही हैं कि इस आंदोलन में निशाना पुरुषवादी सोच और पुरुष नहीं हैं. पुरुष तो इस आंदोलन में नारियों के साथ खड़े हैं और कंधे से कंधा मिलाकर नारे लगा रहे हैं. नुक्कड़ कर रहे हैं और पिट रहे हैं. यह आंदोलन सत्ता के खिलाफ है और सत्ता के खिलाफ चल रहे आंदोलनों की कड़ी है. लोगों में नाराजगी है क्योंकि इस मसले पर भी सरकार अपेक्षित संवेदना का प्रदर्शन नहीं कर पा रही है. क्यों नहीं कर रही यह अपने आप में सौ टके का सवाल है. सरकार ने शुरू से ही संवेदनहीनता का प्रदर्शन किया जिससे आंदोलन को आग मिली. अब कोई फैसला करने के बदले पुलिस को वाटर कैनन और टियर गैस के साथ भेज दिया ताकि आंदोलन और भड़के. कोई ऐसा है जो चाह रहा है कि आंदोलन और भड़के. खैर, यह तो अंदर की बात है.
मगर सरकार ऐसे आंदोलनों को कितना नोटिस करती है? बहुत पहले बिहार में लालू कहते थे कि कौन मीडिया. अखबार में जो छापना है छापो, मेरा भोटर अखबार नहीं पढ़ता. यह सरकार भी वही सोचती है कि उनका वोटर आजतक और जीटीवी नहीं देखता है. अगर देखता होता तो गुजरात में उसका सूपड़ा साफ हो गया होता और हिमाचल में सरकार बनाना नामुमकिन है. यह भी सच है. सड़क पर उतरे ये आंदोलनकारी क्या वोट डालेंगे,यह लाख टके का सवाल है. यह हुजूम जब नाराज होता है तो फेसबुक में स्टेटस बदल देता है. कुछ अधिक नाराज होता है तो इंडिया गेट पर पहुंच जाता है. मगर वोट डालते वक्त सोचता है कि यार एक दिन की तो छुट्टी है. दो घंटा वोट डालने में क्यों बरबाद किया जाये. किसी पुराने दोस्त से मुलाकात कर लिया जाये. कहीं घूम आयें. और नहीं तो थोड़ा सो ही लिया जाये. महानगरों के जीवन में आज कल अच्छी नींद भी तो विलासिता ही हो गयी है.
तो फिर कौन सिखायेगा कि गुस्से को वोट में बदलना चाहिये. क्या अन्ना, अरविंद या रामदेव सिखायेंगे. या कोई और. या फिर यह गुस्सा भी फेसबुकिया उबाल बनकर रह जायेगा?

Sunday, December 16, 2012

कैश सब्सिडी - बड़े धोखे हैं इस राह में

दिल्ली सरकार ने अन्न श्री योजना लागू कर कैश सब्सिडी पर छाये धुंध को साफ़ कर दिया है। अब तक लोग यही कह रहे थे कि सरकार राशन के बदले कैश नहीं देगी। मगर सरकार कैश सब्सिडी के नाम पर क्या और कैसे करेगी यह इस ताजा तरीन उदाहरण से जाहिर है। वह इसी तरह पूरे देश के गरीबों के खाते में 600 रुपये दाल देगी और कहेगी इससे सपरिवार पूरे महीने खा लो। पंचायतनामा का हमारा नया अंक संयोगवश इसी मुद्दे की पड़ताल कर रहा है। इसमें मेरा एक आलेख प्रकाशित हुआ है कि कैसे गरीब कैश सब्सिडी के बदले राशन प्रणाली में सुधार चाहते है। पूरा आलेख पढ़ें -
छोटी-छोटी चोरियों के कारण गांवों में बरसों से गरीबों को राशन और केरोसिन उपलब्ध करा रही जन वितरण प्रणाली की छवि नकारात्मक हो गयी है और इस प्रणाली की ऐसी छवि के कारण सरकार ने इन्हें बंद करवा कर लोगों के खाते में उनकी सब्सिडी एकमुश्त डलवा देने का फैसला कर लिया है. पहली नजर में तो इस भारी भरकम रकम के बारे में जान कर लोगों को लगता है कि इससे बेहतर कोई बात नहीं हो सकती, मगर जब वही लोग इस मसले पर गंभीरता से विचार करते हैं तो उन्हें लगता है कि लाख बुरा सही अपनी राशन दुकान ही बेहतर है, इसी व्यवस्था में सुधार लाया जाये तो उनके लिए बेहतर होगा. खाते में आने वाली रकम को लेकर उनके मन में कई आशंकाएं हैं. इन आशंकाओं ने मनरेगा के लिए काम करते हुए उनके मन में जगह बनायी है. यह सर्वविदित तथ्य है कि मनरेगा का पैसा कभी समय पर नहीं मिलता, राशन तो महीने के महीने मिल ही जाता है. अगर सब्सिडी का पैसा समय पर नहीं मिला तो भूखों मरने की नौबत आ जायेगी. इसके अलावा लोगों को यह भी लगता है कि सब्सिडी के पैसों का दुरुपयोग हो सकता है. लोग इस पैसे का इस्तेमाल उस काम में नहीं करेंगे जिसके लिए यह दिया जा रहा है. विशेष तौर पर महिलाएं मानती हैं कि पैसा मर्दो के नाम पर आयेगा और वे इसे दारू में या जुएं में फूंक डालेंगे. वहीं, बाजार की कीमतों ने हाल के वर्षो में इस कदर बेवफाई की है कि गरीब लोगों का खास तौर पर इस बात से भरोसा उठ गया है कि पैसों से जरूरत का हर सामान समय पर खरीदा जा सकता है. उन्हें लगता है कि जिस केरोसिन पर सब्सिडी उन्हें 30 रुपये की दर पर मिल रही है, वह किसी भी रोज 50 से 60 रुपये की दर पर उपलब्ध हो सकता है. ऐसे में उनका कैश बेकार साबित हो जायेगा. राशन दुकान की कीमतों का भरोसा है, मगर बाजार की कीमतों का कोई भरोसा नहीं है. इन्हीं वजहों से अधिकतर गरीब लोग चाहते हैं कि जन वितरण प्रणाली में ही अपेक्षित सुधार लाया जाये बनिस्पत कि सरकार सब्सिडी का पैसा उनके खाते में डाल दे. लोगों की राय जानने के लिए हाल ही में इससे संबंधित दो अध्ययन सामने आये, पहला जानेमाने अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज और रीतिका खेड़ा द्वारा किया गया अध्ययन है और दूसरा दिल्ली की संस्था रोजी रोजी अभियान का. इन सव्रेक्षणों से उपर बतायी गयी बातें पुख्ता तरीके से प्रमाणित होती हैं. इन दोनों अध्ययनों के मुताबिक गरीब लोग उनके अकाउंट में नकदी के हस्तांतरण के बदले अनाज पाना अधिक पसंद करते हैं. जबकि मुक्त बाजार के कई पैरोकार अर्थशास्त्री मानते हैं कि सरकार को भ्रष्ट जनवितरण प्रणाली से निजात पा लेना जरूरी है और इसका सबसे बेहतर उपाय नकदी हस्तांतरण की पद्धति को लागू करना है. हालांकि उनका यह नजरिया दूसरे मुल्कों के अनुभवों पर आधारित है, जबकि ये दोनों अध्ययन अपने देश के सबसे गरीब लोगों के बीच कराये गये हैं. देश के कई सामाजिक संगठनों और ग्रामीण क्षेत्र में कार्यरत संगठनों का मानना है कि छत्तीसगढ़ और आंध्रप्रदेश की तर्ज पर अगर जनवितरण प्रणाली को विकसित किया जाये तो यह ज्यादा बेहतर साबित हो सकता है.
द्रेज और खेड़ा का अध्ययन- द्रेज और खेड़ा ने आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, ओड़िशा, राजस्थान, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश राज्य के दो जिलों के दो-दो प्रखंडों के बीच यह सव्रेक्षण कराया. यह सव्रेक्षण में हर चयनित प्रखंड के छह गांवों के 12 परिवारों के बीच कराया गया, इस तरह इस अध्ययन में कुल 1227 गरीब और अंत्योदय योजना का लाभ ले रहे परिवार शामिल हुए. इन 106 गांवों में फैले परिवारों में से महज 18 फीसदी परिवार ने ही नकदी हस्तांतरण की योजना को पसंद किया, जबकि 67 फीसदी लोगों ने अपने राशन की दुकान से अनाज हासिल करने के विकल्प को पसंद किया. नकदी हस्तांतरण के विकल्प को पसंद करने वाले लोग ज्यादातर उन इलाकों के थे जहां जनवितरण प्रणाली ठीक से काम नहीं करती है. ये राज्य हैं बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश. जबकि जिन इलाकों में हाल के वर्षों में जनवितरण प्रणाली की प्रक्रिया में सकारात्मक बदलाव आया है वहां के लोग अपनी राशन दुकानों से ही राशन लेना चाहते हैं. आंध्र प्रदेश में ऐसा चाहने वालों की संख्या 91 फीसदी है, छत्तीसगढ़ में 90 फीसदी और ओड़िशा में 88 फीसदी है.द्रेज और खेड़ा के अध्ययन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि जनवितरण प्रणाली उन राज्यों में काफी बेहतर काम कर रही है जहां बाजार में अनाज की कीमत अधिक है और राशन दुकानों में कीमतें कम और राशन दुकानदार के साथ-साथ सरकार की राजनीतिक इच्छा ऐसी है कि अधिक से अधिक लोग राशन दुकान से लाभान्वित हो सकें. कई राज्यों में राशन की गड़बड़ियों को रोकने के लिए जीपीआरएस, जीपीएस, एसएमएस और बायोमीट्रिक प्रणाली का इस्तेमाल किया जा रहा है.
रोजी-रोटी अधिकार अभियान का अध्ययन- रोजी-रोटी अधिकार अभियान, दिल्ली जो 30 के करीब संस्थाओं का संगठन है ने दिल्ली सरकार द्वारा स्मार्ट कार्ड को लागू करते हुए पीडीएस प्रणाली को खत्म करने के सुझाव पर दिल्ली की झुग्गी-झोपड़ियों के 4005 घरों में सव्रेक्षण कराया. अध्ययन से नतीजे निकल कर आये कि कैश ट्रांसफर योजना को लागू करने से बेहतर जन वितरण प्रणाली में सुधार लाना होगा. 90 फीसदी उत्तरदाताओं ने जनवितरण प्रणाली में सुधार के विकल्प को पसंद किया, महज 5 फीसदी वोटरों ने कैश सब्सिडी के विकल्प को बेहतर बताया जबकि 3.6 फीसदी लोगों ने इस पर कोई राय जाहिर नहीं की. अंत्योदय पाने में यह संख्या कहीं और अधिक थी (91.7 फीसदी), बीपीएल परिवार (94.5 फीसदी) और एपीएल परिवार (90.1 फीसदी) ने जन वितरण प्रणाली की बेहतरी की वकालत की. सिर्फ 3.6 फीसदी बीपीएल परिवार, 7 फीसदी एपीएल परिवार और 5.8 फीसदी अंत्योदय का लाभ ले रहे परिवार ने कैश सब्सिडी के विकल्प को पसंद किया.
लाभार्थियों की होगी जेब ढीली!-झारखंड में राशन दुकानों पर मुख्यत: खाद्यान्न(चावल और गेहूं), केरोसिन और आयोडाइज्ड नमक मिलता है. जहां बीपीएल योजना और अंत्योदय अन्न योजना के तहत एक रुपये प्रति किलो की दर से 35 किलो चावल दिया जाता है, वहीं अतिरिक्त बीपीएल योजना के तहत इसी दर से 20 किलो अनाज दिया जाता है. अन्नपूर्णा योजना के तहत 10 किलो चावल मुफ्त वितरित किया जाता है. एपीएल परिवारों को 7.5 किलो चावल और 7.5 किलो गेहूं वितरित किया जाता है, जिसकी कीमत क्रमश: 9.21 रुपये और 6.88 रुपये प्रति किलो होती है. सभी बीपीएल परिवारों को एक किलो रिफाइंड आयोडाइज्ड नमक बांटा जाता है और उसकी कीमत 50 पैसे प्रति किलो की दर से ली जाती है. शहरी क्षेत्रों में 3 लीटर और ग्रामीण क्षेत्रों में 4 लीटर केरोसिन वितरित की जाती है. नयी योजना के तहत इनके बदले नकद राशि सीधे लाभार्थियों के खाते में जायेगी. इसके लिए यह तय किया जाना है या तय होगा कि इन खाद्यान्नों, नमक या केरोसिन को सरकार कितने पैसे में खरीदती है. सरकारी खरीद मूल्य में से लाभार्थियों द्वारा चुकायी गयी कीमत को घटाने के बाद जो कीमत बचती है वही सब्सिडी है, जिसे सरकार सीधे आपके खाते में डालने जा रही है. सरकार आपसे चाह रही है कि इन पैसों से आप अपनी जरूरत की इन तमाम सामग्रियों को खुद खरीद लें. मगर इस व्यवस्था में कुछ ऐसे सवाल हैं जो लाभार्थियों को परेशानी में डाल सकते हैं. पहला सवाल यह है कि सरकार चावल, गेहूं या नमक, केरोसिन का खरीद मूल्य जिसे मानती है वह बाजार मूल्य से काफी कम है. वह केरोसिन, नमक, चावल और गेहूं थोक कीमत पर खरीदती है. मगर उपभोक्ताओं को उसकी खुदरा कीमत चुकानी होगी. हम यह भली भांति जानते हैं कि महानगरों के थोक मूल्य और गांवों की दुकानों में खुदरा मूल्य में कितना अंतर हो सकता है. नमक का कोई पैकेट आज शायद ही दस रुपये प्रति किलो से कम बिकता हो. गांव के बाजार में शायद ही कहीं केरोसिन 30 रुपये प्रति लीटर से कम बिकता हो. इस तरह जितना पैसा आपको मिलेगा उसमें उतना सामान आप शायद ही खरीद पायें जितना आपको राशन की दुकानों में मिल जाता है. दूसरा सवाल यह है कि बाजार की कीमतों पर किसी सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है. बंपर पैदावार के बावजूद चावल और गेहूं की अनियंत्रित कीमतें किसी से छुपी नहीं हैं. केरोसिन किसी पंप पर बिकेगा नहीं जहां उसकी कीमत तय हो. खुले बाजार में यह 50 रुपये लीटर भी बिक सकता है. सरकार को तो केरोसिन थोक में 15 रुपये लीटर ही पड़ता हो सो सरकार आपको सब्सिडी के तौर पर इसके लिए शायद ही कोई पैसा दे. तीसरा सवाल यह है कि सब्सिडी कैश में आने से बाजार में मांग बढ़ेगी और उपलब्धता में कमी आयेगी. ऐसे में कीमतों में उछाल स्वभाविक है. इन तीनों वजहों से यह लगभग तय है कि लोगों को हर हाल में अधिक कीमत चुकानी पड़ेगी.

Sunday, December 02, 2012

हौसला बढ़ाता सुपर पॉजिटिव फौजी


आनंद (बदला हुआ नाम) से जब आप मिलेंगे तो लगेगा कि इससे अधिक सकारात्मक सोच का इंसान हो ही नहीं सकता. चेहरे पर मुस्कान, आंखों में उम्मीद और बातों में जोश, बहुत कुछ बदल देने की तमन्ना. क्यों न हो, आखिर वे झारखंड के पॉजिटिव लोगों के समूह के सचिव जो हैं. पॉजिटिव समूह के नेता को तो सुपर पॉजिटिव दिखना ही चाहिये. अपने दो अन्य सक्रिय साथियों के साथ आनंद इस नेटवर्क से जुड़े 3000 एचआइवी पीड़ितों के लिए उम्मीद और भरोसे का नाम बन गये हैं. एचआइवी की रिपोर्टिग के दौरान हमारी मुलाकात अनायास ही उनसे हो गयी. डेढ़ घंटे चली इस मुलाकात के बाद हमारा मानना था कि आनंद से अधिक सकारात्मक इंसान आम लोगों की दुनिया में भी गिने-चुने ही नजर आते हैं.
एचआइवी-एड्स रोगों के इतिहास में सबसे भीषण रोग माना जाता है. अगर किसी को पता चल जाये कि वह एचआइवी का शिकार हो चुका है तो वह एक झटके में घनघोर निराशा में डूब जाता है. उसे सामने मौत नजर आती है और अपने परिचितों की नजर में नफरत. किस्मत के मारे और समाज से ठुकराये ऐसे लोगों के लिए सबसे बड़ी चुनौती होती है सकारात्मक सोच के साथ जीवन जीना. मगर अधिकांश लोग इतने सौभाग्यशाली नहीं होते. ऐसे ही एक व्यक्ति हैं सतीश(बदला हुआ नाम). पिछले दिनों जब उन्हें पता चला कि वे एचआइवी से पीड़ित हैं तो सदमे में उन्हें पारालाइसिस का अटैक आ गया. पिछले कुछ दिनों से आनंद उन्हें अपने साथ ही लेकर घूम रहे हैं. आनंद की जिंदादिली और आसपास के लोगों के सकारात्मक बर्ताव को देखकर सतीश में काफी सुधार आया है. अब वे लोगों से बातचीत करते हैं. लकवे का शिकार उनका हाथ भी थोड़ा बहुत काम करने लगा है. आंनद के कारण सतीश जैसे सैकड़ों एचआइवी पीड़ितों के जीवन में सकारात्मक बदलाव आया है. उन लोगों की कहानियां सुनाते-सुनाते आनंद की आंखें नम हो जाती हैं. कहते हैं, अधिकांश एचआइवी पीड़ितों से उनकी पहली मुलाकात किसी अंधेरे कोने में होती है. वह कंबल में या किसी ओढ़ने में अपना शरीर छुपाए बैठा रहता है. अब तो अस्पताल में इस तरह बैठे लोगों को पहली नजर में देख कर ही उन्हें समझ में आ जाता है कि वह व्यक्ति जरूर एचआइवी पॉजिटिव होगा.
एक एचआइवी पीड़ित से इतना कहना कि देखो, मैं भी एचआइवी पीड़ित हूं. एचआइवी पीड़ित होने से दुनिया खत्म नहीं हो जाती. उसका आत्म विश्वास लौटाने के लिए काफी होता है. और आनंद के इस पहले संबोधन और उसके संसर्ग के कारण उन तमाम लोगों के जीवन में फिर से सवेरा आ गया है. मगर जीवन की उम्मीद जगाना ही सब कुछ नहीं है. आनंद कहते हैं कि हमारा समाज आज भी एचआइवी पीड़ितों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होता. अच्छे खासे हैसियत वाले एचआइवी पीड़ितों को भी घर के किसी कोने में, गुहाल में या गैराज में रहने की जगह दी जाती है. उनसे भेद-भाव किया जाता है. अगर एचआइवी पीड़ित विधवा हो तो उसे कई तरह की यंत्रणा भी दी जाती है. इसके अलावा रिश्तेदार उनकी सम्पत्ति हड़पने की भी कोशिश करते हैं. अनाथ बच्चों के मामले तो और भी दुखदायी है. स्कूलों में कोई उनसे बातें नहीं करता. घर में कोई उनकी देखभाल करने वाला नहीं होता. इसके अलावा इंश्योरेंश कंपनियों के एजेंट भी एचआइवी पीड़ितों का पैसा अटका लेते हैं. नेटवर्क की सबसे बड़ी जिम्मेदारी इन लोगों के लिए लड़ाई लड़ना है. एक फौजी होने के नाते आनंद इन लड़ाइयों में हमेशा आगे रहते हैं. वे बताते हैं कि पिछले दिनों गिरिडीह के राजधनवार में एक एचआइवी पीड़ित महिला को जिंदा जलाने की कोशिश की गयी, वहीं बोकारो के नवाडीह में पीड़ित महिला को निर्वस्त्र करने की कोशिश की गयी. इन मौकों पर वे झारखंड एड्स नियंत्रण सोसाइटी की टीम के साथ गये और इन महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित की.
आनंद हमेशा से इतने ऊर्जावान और उत्साही नहीं थे. एचआइवी ग्रस्त होने के बाद 5-6 साल तक उनका जीवन भी निराशा में डूबा हुआ था. वे बताते हैं कि 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान रक्तदान करते वक्त उन्हें पता चला था कि वे पॉजिटिव हैं. फिर उन्हें जबरन वीआरएस देकर घर भेज दिया गया कि उनकी शारीरिक स्थिति फौज में काम करने लायक नहीं रही. घर लौटकर आये तो खुद से ही शर्म आती थी, परिवार का सामना करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे. इस बीच थोड़ा-बहुत इलाज भी चलता रहा. 2005 में उनकी मुलाकात हजारीबाग में एड्स पीड़ितों की सेवा करने वाली सिस्टर ब्रीटो से हुई. इस मुलाकात के बाद उनका जीवन बदल गया. आनंद बताते हैं कि सिस्टर ने उन्हें अपने साथ जोड़ लिया और वे उनके साथ गांव-गांव जाकर लोगों को एड्स के बारे में जागरूक करने और एड्स पीड़ितों को परामर्श देने लगे. उनके सात दो अन्य एचआइवी पॉजिटिव एक पुरुष और एक महिला ने काम करना शुरू किया था. दूसरे रोगियों की हालत देखकर वे अपना गम भूलने लगे. इसी बीच वे झारखंड एड्स नियंत्रण सोसाइटी के संपर्क में आये. सोसाइटी के ही सहयोग से 18 मई 2006 को रांची में पॉजिटिव लोगों के नेटवर्क की स्थापना की गयी. पहली बैठक में 110 एचआइवी पॉजिटिव जमा हुए थे. फिर सात अन्य जिलों में जिला स्तरीय नेटवर्क की स्थापना की गयी.
2008 में आनंद ने एक पॉजिटिव विधवा युवती से विवाह किया और अभी दोनों एक साथ रांची में रहते हैं और दूसरे पीड़ितों की मदद करते हैं. वे राज्य के पहले एचआइवी पीड़ित हैं जिन्होंने विवाह किया है. उनके बाद राज्य में 9 पॉजिटिव जोड़ियों का विवाह हुआ है. आनंद अपनी पत्नी से काफी प्यार करते हैं, इसलिए संतानोत्पत्ति के लिए प्रयास नहीं करते. उन्हें लगता है कि गर्भावस्था के दौरान कहीं उनकी पत्नी की रोग प्रतिरोधक क्षमता घट न जाये.
आज उनकी जिंदगी इतनी व्यस्त हो गयी है कि उन्हें अपने रोग के बारे में भी सोचने का वक्त नहीं मिलता. हमेशा साथियों के दुख, उनकी असुविधाओं, उनके साथ होने वाले अन्याय और उनके जीवन के बारे में सोचते-सोचते ही उनका वक्त गुजरता है. पिछले 13 सालों से एचआइवी के साथ जी रहे आनंद कोई दवा नहीं लेते. वे मानते हैं कि उनकी सक्रियता और सकारात्मकता का ही कमाल है कि उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बिना किसी दवा के बढ़ रही है. वे कहते हैं कि इस रोग का कोई भरोसा नहीं, किसी भी दिन यह उन पर हावी हो सकता है. मगर आज तक वे पूरी तरह स्वस्थ हैं, लगातार सक्रिय हैं और दूसरों के लिए मददगार
(यह खबर पंचायतनामा के 3 दिसंबर के अंक में प्रकाशित हुयी है.)
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