Tuesday, December 31, 2013

भाजपा और दिसंबर के आखिरी तीन हफ्ते


महज दो हफ्ते पहले तक नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री के तौर पर ताजपोशी लगभग तय लग रही थी और सांप्रदायिकता के नाम पर मोदी की मुखालफत करने वाले कई लोगों ने देश छोड़ने तक की घोषणा कर दी थी. मगर पिछले तीन हफ्तों में काफी कुछ बदल गया है. अब अरविंद केजरीवाल भी रेस में शामिल हो गये हैं और मोदी का समर्थन करने वाले कई लोग सोचने लगे हैं कि अगर बेहतर आदमी को चुनना है तो केजरीवाल को ही क्यों न चुन लिया जाये. मीडिया भी मोदी से अधिक स्पेस आम आदमी पार्टी और केजरीवाल को देने लगा है और दबे स्वर में यह भी कहा जा रहा है कि कहीं केजरीवाल और आम आदमी पार्टी अगले लोकसभा चुनाव में मोदी और भाजपा के सपनों की उड़ान पर ब्रेक न लगा दे. खुद भाजपा समर्थक डिफेंड करने के मूड में नजर आ रहे हैं. उन्हें लग रहा है कि मीडिया उनकी जीत को अंडरप्ले कर रहा है और आप को बेवजह इतना महत्व दिया जा रहा है. महज बीस-पच्चीस दिनों में यह बदलाव कैसे आ गया.
8 दिसंबर को जब चुनाव परिणाम आये थे तो ऐसा माहौल नहीं था. बदलाव के भाजपा के दावों पर जनता ने मुहर लगा दी थी. चार राज्यों में भाजपा नंबर वन पार्टी बनकर उभरी थी. राजस्थान और मध्य प्रदेश में तो पार्टी ने कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया था. दिल्ली में भी पार्टी का प्रदर्शन शानदार था. मगर आम आदमी पार्टी को अनापेक्षित तौर पर मिली 28 सीटों ने उसे न सिर्फ सकते में डाल दिया बल्कि सत्ता से चार कदम दूर कर दिया.
अगर ये 28 सीटें कांग्रेस को आयी होतीं तो भाजपा के लिए इतनी परेशानी नहीं होती, मगर एक नयी पार्टी जिसे बने जुम्मा-जुम्मा चार दिन हुए थे उसकी यह सफलता खुलकर कह रही थी कि जनता के दिलों में सिर्फ मोदी या बीजेपी नहीं है. जहां लोगों को बेहतर विकल्प मिलेगा लोग उसे ही वोट देंगे. इस नतीजे ने भले ही राहुल गांधी को पीएम बैटल से बाहर कर दिया मगर केजरीवाल के रूप में मोदी के लिए एक मजबूत प्रतिस्पर्धी को सामने ला खड़ा किया.
चीजें महज आप की जीत से ही नहीं बदली, बल्कि सरकार के गठन को लेकर उसके द्वारा अपनायी गयी नीतियों के कारण बदली. एक तरफ तो प्रेस कांफ्रेस में राहुल आप के तौर-तरीकों को कांग्रेस द्वारा अपनाने की वकालत करते नजर आये, दूसरी तरफ भाजपा सरकार गठन के लिए जोड़-तोड़ से परहेज करती दिखी. इसका संदेश दूर तय गया और लोगों ने देखा कि एक अच्छी पार्टी के कारण देश की बड़ी पार्टियां खुद को बदलने के लिए तैयार है. इसने देश भर में आप की ख्याति को चार चांद लगा दिये.
मगर प्रथम प्रतिक्रिया के रूप में इमानदार दिखने की कोशिश करने वाली दोनों पार्टियों ने बाद में तय कर लिया कि वे अपने छल-प्रपंचों से आप की इमानदारी की पोल खोलेंगी और उसे जनता के बीच शर्मसार करेंगी. यह वही खेल था, जो कुछ दिनों पहले कांग्रेस ने भाजपा के खिलाफ खेला था और येन-केन प्रकारेण साबित कर दिया था कि अगर कांग्रेस भ्रष्ट है तो भाजपा भी दूध की धुली नहीं. इस खेल में मात खायी भाजपा ने इस बार कांग्रेस का भरपूर साथ दिया, क्योंकि आम आदमी पार्टी दोनों के लिए बराबर तौर पर खतरनाक थे.
कांग्रेस ने बिना शर्त समर्थन का वादा कर दिया और भाजपा उस पर जिम्मेदारी से बचने का आरोप लगाने लगी. इस बीच दोनों ने मिलकर कामचलाउ लोकपाल पर अन्ना और किरण बेदी से मुहर लगवा ली और देश को यह दिखाने की कोशिश की कि आप वाले तो अडंगेबाज हैं. अन्ना तैयार हैं मगर वे कानून बनने नहीं दे रहे. मगर दुर्भाग्य से उनका यह दावं चला नहीं. लोगों की सहानुभूति आप की तरफ और बढ़ गयी, लोगों ने देखा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग में भाजपा जैसी पार्टी और अन्ना जैसे सफेद छवि के लोग भी समझौता करने के लिए तैयार हैं. आप उनकी लड़ाई में अकेली पड़ गयी है. भ्रष्टाचार के खिलाफ अलग-अलग रैलियों में कांग्रेस का मखौल उड़ाने वाले मोदी इस दौरान चुप ही रहे.
जैसे यह सब किसी कसी हुई फिल्म की स्क्रिप्ट की तरह था. दो-तीन महीने पहले तक कांग्रेस की वोट कटुआ कही जाने वाली पार्टी के खिलाफ भाजपा और कांग्रेस एक होकर हमले कर रही थी. फिर आप की सरकार भी बनी और आज सरकार ने अपने गठन के महज तीन दिन बाद अपना पहला वादा भी पूरा कर लिया है. लगातार चीजें आप के पक्ष में जा रही है, वे तमाम विरोधों के बीच निखर रहे हैं और उभर कर सामने आ रहे हैं.
क्या यह सब अचानक हो गया, क्या यह बिल्ली के भाग से छीक टूटने जैसा मामला है? अगर आप ऐसा सोचते हैं तो इसका मतलब आप इंडिया अगेंस्ट करप्शन का वह आंदोलन भूल गये हैं और आपको सुभाष अग्रवाल और दूसरे आरटीआई एक्टिविस्टों की कहानियां नहीं मालूम.
दरअसल आज जो कांग्रेस के खिलाफ हवा है वह किसी मोदी या किसी भाजपा की करामात नहीं है. यह सब इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन से उपजा है और इसके पीछे आरटीआई की ताकत है जिसके सबसे बड़े पैरोकार खुद अरविंद केजरीवाल हैं. उनकी संस्था परिवर्तन है.
सुभाष अग्रवाल ऐसे अकेले शख्स हैं जिनके आरटीआई आवेदनों की वजह से टू जी स्पेक्ट्रम घोटाले और कॉमनवेल्थ घोटाले समेत कई घोटाले उजागर हुए. और इंडिया अगेंस्ट करप्शन का वह आंदोलन ही देश भर में यूपीए सरकार के खिलाफ माहौल बनाने की वजह बना जिसके पीछे वही टीम थी जो आज आम आदमी पार्टी के नाम से एक राजनीतिक दल के रूप में हमारे सामने है.
भाजपा ने तो सात-आठ साल तक कांग्रेस के साथ तकरीबन सत्ता सुख ही भोगा है. उन्होंने कभी किसी बात का ढंग से विरोध नहीं किया. दिल्ली में कायम भाजपा की मशहूर चौकड़ी ने हर बार यूपीए की गलत नीतियों को वॉक ओवर दिया. बदले में अपने लिए सहूलियतें हासिल कीं. विरोध भी दिखावे के लिए ही हुए.
दरअसल भाजपा की इच्छा तो यह थी कि अन्ना, अरविंद, रामदेव और दूसरे लोग मिलकर आंदोलन करें और सरकार के खिलाफ माहौल बनायें. और बाद में उस माहौल की सवारी भाजपा खुद करे और देश भर में जीत हासिल कर सरकार बनाये. मगर टीम केजरीवाल ने राजनीतिक पार्टी बनाकर उनके सपनों पर अडंगा डाल दिया. इसके बावजूद भाजपा इसी मुगालते में रही कि एक नयी पार्टी कितना फर्क डाल पायेगी. मगर दिल्ली की जनता ने जो डरते-डरते आप को वोट डाले उसकी बदौलत पार्टी को 28 सीटें आ गयीं. बाद में आप की सरकार भी बन गयी.
दिल्ली में जीत और आप की सरकार बनने से कहीं न कहीं यह संदेश जरूर गया है कि आप एक दमदार विकल्प है और ऐसा नहीं है कि उसे स्टेबल होने में वक्त लगेगा. वह कम समय में एक मजबूत विकल्प बनकर उभरी है. लोग यह भी सोचते हैं कि अगर सपा, बसपा और अन्नाद्रमुक जैसी पार्टियां 25-30 सीटें लाकर प्रधानमंत्री की सीट पर दावा कर सकती हैं तो आम आदमी पार्टी ही इससे अधिक सीटें जीत सकती है और वह दिल्ली मॉडल पर बिना मजबूर हुए देश में सरकार भी बना सकती है. यह विकल्प भाजपा और मोदी के लिए खतरे की घंटी है. सुना है भाजपा आप के असर को लेकर एक आंतरिक सर्वेक्षण भी करा रही है.
भाजपा के लोग कहने लगे हैं कि मनोहर पर्रिकर और रमन सिंह अरविंद से अधिक इमानदार और जमीन से जुड़े नेता हैं, मगर मीडिया का अटेंशन सिर्फ आप पर फोकस है. मगर वे यह नहीं समझते कि सरकार के मुखिया का इमानदार होना काफी नहीं है, मनमोहन सिंह की इमानदारी की कीमत पूरा देश चुका रहा है. व्यक्तिगत इमानदारी के साथ बदलाव लाने की ताकत भी जरूरी है. आम आदमी पार्टी का महत्व सिर्फ बेहतर विकल्प के तौर पर नहीं है. यह राजनीति के तौर-तरीकों को बदलने की कोशिश है. ऊपरी तौर पर इमानदार और साफ-सुथरे दिखने के बावजूद भाजपा अपना पूरा कैंपेन जिस फिजूलखर्ची के साथ चला रही है, वह क्या जायज है. क्या लोगों की निगाह में यह फिजूलखर्ची नहीं आती.
हाल के वर्षो में भाजपा ने कांग्रेस की कार्य संस्कृति को अपना लिया है. वहां भी भ्रष्टाचार कोई दबी-छुपी बात नहीं रही. उनके नेता सामंती ठाठ में जीते हैं. मनोहर पर्रिकर या रमन सिंह के उदाहरणों को ही कितने भाजपाई अपनाने के लिए तैयार हैं. दबंगों से भी उन्हें परहेज नहीं है. वहां भी सीडी कांड होते हैं और कोल ब्लॉक के लिए उद्योगपतियों को मदद दी जाती है. यह ठीक है कि भाजपा कांग्रेस के मुकाबले बेहतर विकल्प है, और इसी वजह से उन्हें लोगों का समर्थन भी है. मगर जब लोगों को बेहतर और कारगर विकल्प दिख जाता है तो वह कामचलाऊ विकल्प पर क्यों ध्यान दे.
आज भाजपा के नेता फिर से लोगों के मुद्दों को लेकर सड़क पर उतरने लगे हैं, मगर पिछले दस सालों में नेताओं ने इस परंपरा का परित्याग कर दिया था. मुङो याद है कभी भागलपुर में बिजली संकट के आंदोलनों से नेता के रूप में उभरे अश्विनी चौबे मंत्री बनने के बाद भागलपुर भी कम ही आते थे. पिछले दस सालों में भाजपा के कार्यकर्ताओं ने कब आम लोगों के मुद्दे पर सड़क पर उतरकर विरोध किया हो याद नहीं आता. हां अपनी पार्टी या अपने नेताओं के मुद्दे पर वे देश बंद करवा सकते हैं.
यही वजह है कि प्रमुख विपक्षी पार्टी होने के बावजूद देश के कोने-कोने तक चल रहे जनांदोलनों में उसकी भागीदारी नगण्य रही है. चाहे सवाल चुटका में स्थापित होने वाली परमाणु परियोजनाओं का हो या रांची के नगड़ी में भूमि अधिग्रहण की लड़ाई. चाहे मुजफ्फरपुर में एसबेस्टस फैक्ट्री का विरोध हो या नंदीग्राम का संघर्ष. भाजपा जनसंघर्षो से कोसों दूर हो गयी है. यहां तक कि दिल्ली में दामिनी वाले मामले में भी उनसे अधिक सक्रिय अलका लांबा का संगठन रहा. जन संघर्षो से दूरी ने भाजपा को अंदर से कमजोर किया है. इन बातों को छोड़ भी दें तो महंगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ भी उसके कार्यकर्ताओं ने कभी दमदार प्रतिरोध दर्ज नहीं किया. यूपीए सरकार लोगों को पीसती रही और भाजपा खानापूर्ति करती रही.
आज भाजपा कार्यकर्ता वीरभद्र सिंह के खिलाफ मजबूर होकर सड़कों पर उतरे हैं. कांग्रेस भी कल लोकपाल के लिए धन्यवाद देने सड़कों पर उतरी थी. ये नये जमाने के राजा सड़कों पर आम आदमी पार्टी की नकल करते नजर आ रहे हैं. मगर पिछले दस सालों में एक विपक्ष के तौर पर भाजपा ने जो अपनी साख गंवायी है क्या उसे मोदी के मुखौटे से हासिल करना इतना आसान है?

Sunday, December 29, 2013

रांची में शेर गरजा, किसने देखा


हमारा शहर रांची महीने भर से शेर की दहाड़ सुनने का इंतजार कर रहा था. हर चौक-चौराहे पर मोदी होर्डिंगों में टंगे थे और गाड़ियों में पोस्टर फड़फड़ा रहे थे. हर तरफ शोर बरपा था कि मोदी आने वाला है और शेर गरजने वाला है. तकरीबन दो-तीन हफ्ते पहले जब सोनू निगम हमारे शहर आया था तो मुझे याद आ रहा है कुछ इसी तरह की मारा-मारी पास के लिए मची थी और उस कार्यक्रम में मैं जिस आटो पर सवार होकर गया था वह कह रहा था कि आज से ज्यादा मजा 29 को आयेगा, जब मोदीजी आयेंगे. रांची छोटा सा शहर है, अभी ठीक से महानगर भी नहीं हो पाया है. यह ठीक है कि धौनी जैसा सुपरस्टार रांची का ही रहने वाला है, मगर क्रिकेट मैच, फिल्म स्टार और बड़े नेताओं का क्रेज अभी भी इस शहर में बरकरार है. लालू जी ने चारा घोटाला में दोषी करार होने के बाद यहीं जेल में वक्त गुजारा और जब तक रहे जेल वालों के लिए परेशानी का सबब बनकर ही रहे. रोज होटवार जेल के आगे उन्हें देखने वालों की भीड़ उमड़ती थी. यहां तो मीका और राखी सावंत भी आ जायें तो दंगा होने की संभावना रहती है.
इस लिहाज से मन डरा-डरा रहता था कि मोदी के आने से कुछ घटना-वटना न हो जाये, पटना में जो कुछ हुआ उसकी छाप मन से उतरती नहीं थी. यह ठीक है कि भाजपा वालों ने सीठियो गांव के लोगों को ठीक से मैनेज कर लिया और उन्हें उर्दू में बुलावा भेजकर यह साबित करने की कोशिश की कि भाजपा मोदी के नेतृत्व में और खास तौर पर मोदी को क्लीन चिट मिलने के बाद किस तरह धर्म निरपेक्ष होती जा रही है. सीठियो वाले बेचारे अपने गांव पर से आतंक का दाग मिटाने के लिए रैली में पानी पिलाने के लिए भी तैयार हो गये.
हफ्ते भर से अखबारों में छप रहा था कि मंच ऐसा बनेगा, हैलीकॉप्टर ऐसे उतरेगा, मोदी इतनी देर रांची में ठहरेंगे और मंच पर फलां-फलां नेता बैठेंगे. कुल मिलाकर हवा ऐसी बंध गयी थी कि भाजपा के नेता ने आव न देखा ताव और घोषणा कर दी कि रैली में चार लाख लोग पहुंचेंगे. सवेरे-सवेरे मेरे कुछ रिश्तेदार रांची आने वाले थे, उन्हें मैंने यही सोचकर मना कर दिया कि 4 नहीं 3 लाख लोग भी आये तो गाड़ियों में इतनी भीड़ होगी कि उन्हें लटकने की जगह भी नहीं मिलेगी. मगर हाय रे इंतजाम, झारखंड के भाजपाइ बमुश्किल 60-70 हजार लोगों को ही जुटा पाये. हो सकता है बम-वम के डर से लोग अब मोदी की रैली में जाने से डरने लगे हों. हो सकता है झारखंडियों पर भी अरविंद केजरीवाल का नशा छाने लगा हो. मगर जो भी हो, रैली सामान्य ही थी. 5 रुपैया का टिकस लगाते तो तीन लाख टका ऊपर होता. स्टेज का खर्चा भी उपर नहीं हो पाता. वैसे झारखंड भले गरीब हो यहां की नेता-नगरी गरीब नहीं है, रैली का खर्चा तो अकेले झारखंड क्रिकेट एसोशियेसन के अध्यक्ष अमिताभ चौधरी ही उठा सकते थे, जो लंबे समय से भाजपा ज्वाइन करने के लिए प्रयासरत हैं और शहर के हर ऑटो पर नया चेहरा-नया विकल्प टाइप पोस्टर लगाकर अपनी ब्रांडिंग कर रहे हैं. नहीं तो अपने निशिकांत दुबे हैं ही. पैसे-वैसे का कोई मसला नहीं है झारखंड बीजेपी के पास. आठ-दस करोड़ तो छोटा-मोटा एमएले भी खर्च सकता है. मगर राजनाथजी और मोदीजी ने जो बड़ा टास्क इनके सिर पर डाल दिया है वह बहुत कठिन काम है. कहके गये हैं कि इस बार 14 की 14 सीट चाहिये. जबकि हकीकत यह है कि यहां जो सीट है वही बचा पाना मुश्किल है. खैर..
मोदी की रांची रैली को लेकर कई तरह की उत्सुकताएं मन में थीं, उम्मीद थी कि क्लीन चिट मिलने की खुशी जाहिर करेंगे और अरविंद केजरीवाल की निर्थकता का बखान करेंगे. मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ. लगता है मोदी का स्क्रिप्ट राइटर एक साथ सारे लोकेशन के लिए स्क्रिप्ट लिखकर चला गया है और मोदीजी को वही पढ़ना पर रहा है. किसी भाषण में न आम आदमी पार्टी है और न ही नयी राजनीति का फलसफा. वही सोनिया, वही राहुल नये में सिर्फ राज्य की समस्या. अगर उस राज्य में अपनी सरकार है तो तारीफ करो और अपनी सरकार नहीं है तो कमियां गिनाओ.
13 साल का छत्तीसगढ़ भी था और किशोर होने पर अच्छे परवरिश के लिए रमन सिंह को जिताने की अपील की गयी थी. 13 साल का झारखंड भी है और बुरी परवरिश के लिए कांग्रेस को गलियाया गया. मोदी भूल गये कि यहां उनके ही अर्जुन मुंडा तीन बार यहां सीएम बन चुके हैं और एक बार बाबूलाल मरांडी ने उनकी पार्टी में रहते हुए सीएम का पद संभाला है, यहां आठ साल तक भाजपा ने ही शासन किया है. खैर, भाषण एक ऐसी कला है जिसमें लोग आपकी बात सुनने के लिए तैयार हैं तो तथ्यों की गलतियों का रिस्क लिया ही जा सकता है.
अमीर झारखंड के गरीब लोग और अधिक बारिश वाले झारखंड में जलसंकट जैसे झारखंड के सदाबहार मुद्दों पर उन्होंने खुल कर बोला और राहुल की आकाशवाणी का भी मजाक उड़ाया. बहरहाल पत्रकार साथियों ने कहा इस बार मोदी फीके-फीके नजर आ रहे थे. जवाब मे मैंने कहा कि हो सकता है कि क्लीन चिट मिलने के बाद उनकी हालत वैसी ही हो गयी हो, जैसे शेर की दांत तोड़ देने के बाद उसकी गुर्राहट का बुरा हाल हो जाता है. मोदी की दबंगई ही उनका यूएसपी है, क्लीन चिट मिलने के बाद वे जरूर राहत महसूस कर रहे होंगे मगर लोगों की नजर में उनका असर कम ही हुआ नजर आ रहा है.
परेश रावल वाली अंदाज में उसी आरोह-अवरोह में मोदी जी शहजादे की जगह आकाशवाणी और छत्तीसगढ़ के बदले झारखंड बोलते रहते. मगर बार-बार लग रहा था कि यह रिकार्ड घिसने लगा है. ठीक उसी तरह जैसे बचपन में मेरे एक भैया सुबह से शाम तक सलमान खान की फिल्म कुरबान का गाना तू जब-जब मुझको पुकारे सुनाते थे. पहले तो गांव के लोगों को वह गाना काफी पसंद आया मगर एक हफ्ते में ही लोगों ने कहा, बंद करो, एकै गाना कितना सुनाओगे.
ऐसे में यही कहूंगा कि मोदीजी कम गाइये, गाना बदल-बदलकर गाइये. बढिया रहेगा. वैसे तहलका वाले निरालाजी ने सुझाव दिया है कि जो संसद, लाल किला और पीएमओ बनवाना है अहमदाबाद में ही बनवा लीजिये. वहीं बदल-बदल कर भाषण दीजिये. अलग-अलग स्टेट के नेताओं को वहीं बुला लीजिये. काहे ऐतना परेशान होते हैं....

Wednesday, November 13, 2013

बाहर आयें और सड़कों पर अपना हक लें


पिछले दिनों सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट की महानिदेशक सुनीता नारायण उस वक्त दुर्घटनाग्रस्त हो गयी थीं, जब वे साइकिल से कहीं जा रही थीं. हादसा काफी गंभीर था मगर एम्स में चले लंबे इलाज के बाद वे फिर से स्वस्थ हो गयी हैं. पिछले दिनों अपने बिस्तर पर पड़े पड़े उन्होंने यह आलेख लिखा है. यह आलेख एक महत्वपूर्ण मसले को सामने ला रहा है. क्या सड़कें सिर्फ बसों, ट्रकों और कारों के लिए ही है. पदयात्रियों और साइकिल सवारों के लिए इसमें कोई जगह क्यों नहीं है. जबकि यही पदयात्री और साइकिल सवार हैं जो अपनी यात्राओं के कारण इस धरती के सेहत को सबसे कम नुकसान पहुंचाते हैं. उन्होंने पदयात्रियों और साइकिल सवारों के लिए सड़क पर अलग लेन की मांग की है और कारों की बढ़ती भीड़ पर लगाम लगाने का सुझाव दिया है. यह बहुत जरूरी कदम है, दिल्ली और मुम्बई ही नहीं बिहार और झारखंड के मझोले शहर भी इन दिनों चार पहिया गाड़ियों की भीड़ के कारण खस्ताहाल हैं. सड़कों पर ट्रैफिक रेंगता रहता है और प्रदूषण का स्तर इतना भीषण हो रहा है कि बाजार जाना यंत्रणा जैसा लगता है. इस महत्वपूर्ण आलेख का मैंने अनुवाद किया है ताकि हिंदी के पाठक भी इसे पढ़ सकें. यह आलेख डाउन टू अर्थ पत्रिका से साभार लिया जा रहा है.
सुनीता नारायण
इन दिनों जब मैं यह कॉलम लिख रही हूं, अपने बिस्तर पर पड़ी हूं और एक ऐसे एक्सीडेंट से उबरने की कोशिश कर रही हूं जिसने मेरी हड्डियां तोड़ दी हैं. मुझे एक कार ने तब टक्कर मार दी थी जब मैं साइकिल पर सवार होकर कहीं जा रही थी. टक्कर मार कर कार गायब हो गया और मैं सड़क पर लहूलुहान तड़पती रही. ऐसा देश के हर शहर की तकरीबन हर सड़क पर होता रहता है. क्योंकि हमारे यहां सड़कों पर पैदल यात्रियों और साइकिल सवारों की सुरक्षा की परवाह नहीं की जाती. ये लोग अदृश्य उपयोगकर्ता माने जाते हैं. ये लोग अक्सर बहुत मामूली सा काम करते हुए मर जाते हैं, जैसे सड़क पार करना. मैं खुशनसीब थी कि मेरे लिए दो कार रुके, अजनबियों ने मेरी मदद की और मुझे अस्पताल पहुंचाया. मेरा इलाज हुआ. अब मैं स्वस्थ होकर फिर से वापसी करूंगी.
और यह एक ऐसी जंग है जिस पर हम सभी को ध्यान देने की जरूरत है. हमें पैदल चलने और साइकिल चलाने के लिए जगह की जरूरत है और इस अधिकार को हम छोड़ नहीं सकते. जबसे मेरे साथ यह एक्सीडेंट हुआ मेरे रिश्तेदार और दोस्त मुझे लगातार इस बात के लिए फटकारते रहे हैं कि मैं दिल्ली की सड़कों पर इस तरह लापरवाह होकर साइकिल क्यों चला रही थी. वे लोग सही कह रहे हैं. यहां साइकिल सवारों और पदयात्रियों के लिए कोई अलग लेन नहीं है. सड़कों के बाद जो थोड़ी जगह बच जाती है उन पर या तो कूड़ों का कब्जा होता है या वहां भी कार ही पार्क कर दिये जाते हैं. सड़कें कार के लिए हैं. बांकी किसी का कोई महत्व नहीं है.
वैसे यहां साइकिल चलाना या पैदल चलना सिर्फ इसलिए कठिन नहीं है कि इसके लिए कोई योजना नहीं बनी है, बल्कि इसके पीछे हमारी उस मानसिकता का भी दोष है जो यह मानती है कि केवल कार पर चलने वालों का ही स्टेटस है और सड़कों पर उन्हीं का अधिकार है. जो साइकिल पर चलते हैं, गरीब हैं, दयनीय हैं और अगर मिट नहीं गये तो उन्हें अंततः हाशिये पर ही चले जाना है.
यही वह बात है जिसे बदलना होगा. हमारे पास कोई विकल्प नहीं है, सिवा इसके कि हम परिवहन के मसले को फिर से परिभाषित करें, जैसा मैं बार-बार कहती रहती हूं. इस हफ्ते दिल्ली की फिजा में जहरीले धुएं का साया और गहरा गया है. पिछले ही महीने विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वायु प्रदूषण को मानवीय कैंसर की संज्ञा दी थी. हमें हर हाल में समझना होगा कि प्रदूषण की किसी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता. यह हमें मार रहा है, और यह प्रक्रिया अब धीमी नहीं रही है. अगर हम वायु प्रदूषण से मुकाबला करना चाहते हैं तो हमारे पास कार की बढ़ती संख्या पर लगाम लगाने के सिवा कोई दूसरा चारा नहीं है. हमें सीखना होगा कि कैसे लोग चलें कारें नहीं.
पिछली सदी के आखिरी दशक के मध्य में जब सेंटर फॉर साइन्स एंड ऐन्वायरमेंट ने वायु प्रदूषण के खिलाफ अपनी मुहिम की शुरुआत की थी, उसके प्रयास पूरी तरह पारंपरिक थे. उसने इंधन की गुणवत्ता बेहतर करने, वाहनों के प्रदूषण स्तर को बेहतर बनाने और जगह-जगह पर इसकी जांच करने जैसी प्रक्रियाओं पर जोर दिया. उसने कम्प्रेस्ड नेचुरल गैस(सीएनजी) का इस्तेमाल बसों और ऑटोरिक्शा के लिए किये जाने की पैरवी की. इसमें कोई शक नहीं है कि अगर ये कदम नहीं उठाये गये होते तो हालात और भी बदतर होते.
मगर ये उपाय पर्याप्त साबित नहीं हुए. बहुत जल्द हमने यह समझ लिया. प्रदूषण का स्तर फिर से बढ़ने लगा. सभी शोधों से एक ही कारण सामने आ रहा है और एक ही बड़ा समाधान दिख रहा है, वह है परिवहन तत्र को अलग तरीके से विकसित करना. हमारे पास ऐसा करने के विकल्प भी हैं. हमें और मोटराइज्ड होने, अधिक फ्लायओवर बनाने या फोर-लेन सड़क बनाने की कतई जरूरत नहीं है. भारत के कई शहरों में आज भी लोग बसों पर सफर करते हैं, पैदल और साइकिलों पर चलते हैं. ज्यादा से ज्यादा 20 फीसदी लोग ही बाइक पर चलते हैं. हम ऐसा करते हैं क्योंकि हम गरीब हैं. पर अब चुनौती यह है कि अमीर होने के बावजूद हम ऐसा करें और इसी तरह अपने शहरों की परिवहन व्यवस्था को लागू करें.
पिछले कुछ सालों से वस्तुतः हम यही करने की कोशिश कर रहे हैं- ताकि हमारे शहरों के लिए समेकित और सुरक्षित जन परिवहन विकल्प विकसित हो, इसलिए अगर हमारे पास कार हैं भी तो भी हमें इसे चलाने की जरूरत न पड़े. हम मेट्रो रेल विकसित कर सकते हैं या बसें खरीद सकते हैं, मगर जब तक इसकी कनेक्टिविटी अंतिम घर तक नहीं होगी यह कारगर नहीं होगा. इस व्यवस्था को सहज और सरल होना चाहिये. इसलिए मैं कहती हूं कि हमें अलग तरीके से सोचने की जरूरत है.
इस मसले पर हम विकल्पहीन साबित हो जाते हैं. आज परिवहन तंत्र की चर्चा हो रही है, जबकि हमें साइकिल सवारों और पदयात्रियों के लिए भी सोचने की जरूरत है. मगर यह खोखली बातें हैं. हर बार जब मौजूदा सड़क का एक हिस्सा लेकर उसे साइकिल ट्रैक में बदलने की कोशिश की जाती है, उसे भारी विरोध का सामना करना पड़ता है. तर्क दिये जाते हैं कि इससे कारों के लिए जगह की कमी हो जायेगी और जाम लगने लगेगा. मगर दरअसल हमें यही करने की जरूरत है, कारों के लेन की चौड़ाई घटायी जाये और बसों, साइकिलों और पदयात्रियों को अधिक जगह दी जाये. यह एकमात्र रास्ता है जिससे सड़कों से कारों की भीड़ को कम किया जा सकता है.
इसे लागू करने में हिम्मत की जरूरत है. हमारे भीड़ भरे और बेलगाम सड़कों पर साइकिल ट्रैक बनाने और फुटपाथ को साफ सुथरा रखने के लिए बड़ी मेहनत की जरूरत है. मुझे ऐसा भ्रम कतई नहीं है कि ऐसी योजना बनाना और उसे लागू करना आसान काम है. मगर हम क्यों इससे भयभीत होएं. बांकी दुनिया के मुल्कों ने इस बात को सफलतापूर्वक समझा है कि सड़कों पर साइकिलसवारों और पदयात्रियों के लिए अलग लेन देकर उन्हें सम्मानित करना अच्छी बात है. उन्होंने कारों को कम जगह देना स्वीकार किया है.
जरा उस डबल बोनस के बारे में भी सोचें. प्रदूषण का स्तर कम होने से शुद्ध हवा तो मिलेगी ही, साइकिल और पदयात्रा करने से व्यायाम भी होगा और हमारी सेहत भी सुधरेगी. यह वही लक्ष्य है हम जिसकी लड़ाई लड़ रहे हैं. और हम लड़ते रहेंगे. मुझे उम्मीद है कि इसमें आप सबों का साथ मिलेगा तो हम सुरक्षित साइकिल और पद यात्राओं का अधिकार हासिल कर सकेंगे.
पुनश्च- उन अजनबियों को बहुत-बहुत धन्यवाद जिन्होंने मुझे अस्पताल पहुंचाया और एम्स ट्रॉमा सेंटर के बेहतरीन डॉक्टरों का अपने जीवन के लिए मैं जिनकी अहसानमंद हूं.

Saturday, October 26, 2013

क्या अमर्त्य सेन के मॉडल पर काम कर रही है नीतीश सरकार ?


पिछले कुछ दिनों से देश में विकास के मॉडलों पर गंभीर चर्चाएं हो रही हैं. यह अच्छी बात है कि जो सवाल कल तक अतिबुद्धिजीवियों के बहस का मसला हते थे, उस पर चुनावी सभाओं में भी बातें होने लगी है. कहने को देश में विकास के दो मॉडल हैं एक भगवती मॉडल और दूसरा अमर्त्य सेन मॉडल. भगवती मॉडल जहां मानता है कि अगर व्यापार बढ़ा तो उसका लाभ निचले तबके तक पहुंच ही जायेगा, मगर अमर्त्य सेन मॉडल मानता है व्यापार बढ़ने से कई दफा पूंजी का ध्रुवीकरण होता है और गरीब और गरीब होते चले जाते हैं. इसलिए सरकार को चाहिये कि वंचित तबकों का विशेष ख्याल रखे.
हालांकि अगर इन दोनों मॉडल में से अगर एक मॉडल चुनने कहा जाये तो कोई भी समझदार व्यक्ति बिना सोचे अमर्त्य सेन के मॉडल को चुन सकता है. निश्चित तौर मेरी व्यक्तिगत पसंद भी वही है, इसके बावजूद इस बहस के कुछ मसले पर मेरी असहमतियां हैं.
1. बहस के दौरान माना गया है कि मोदी भगवती मॉडल के पैरोकार हैं और नीतीश अमर्त्य सेन मॉडल के. इस मान्यता का आधा हिस्सा तो सच है कि मोदी भगवती मॉडल के पैरोकार हैं, मगर दूसरा आधा हिस्सा पूरी तरह गलत हैं.
2. नीतीश ने अमर्त्य सेन को तो स्वीकार किया है, मगर उनके मॉडल को कतई स्वीकार नहीं किया है. इसे ऐसे समझ सकते हैं.
3. नीतीश जिसे सुशासन का नाम देते रहे हैं, उसकी तीन खूबियां. पहला- बेहतरीन सड़कें एवं अधोसंरचना का निर्माण, दूसरा- अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई, तीसरा सरकारी अस्पतालों में व्यवस्था का सुधार. इन तीन कामों के अलावा नीतीश के राज में कोई दूसरा बेहतर काम नजर नहीं आता.
4. पहला काम जो अधोसंरचना का निर्माण है वह विश्व बैंक की सहायता से हुआ है और अगर यह कोई मॉडल है तो मोदी-भगवती-चंद्रबाबू नायडू मॉडल ही है. इस काम ने अप्रत्यक्ष रूप से अपराध में कमी लाने में भी भूमिका निभायी है, क्योंकि सारे पूर्व अपराधी ठेकेदार बनकर सड़क-अस्पतालों के लिए भवन और पुल-पुलिये बनाने में व्यस्त हो गये हैं. उन्हें आपराधिक गतिविधियों के लिए फुरसत ही नहीं है.
5. दूसरा बड़े अपराधियों पर ठोस कार्रवाई का काम. यह काम नीतीश ने कल्याण सिंह मॉडल को अपनाते हुए सैप जवानों की मदद से किया है. मैं मानता हूं कि इस काम में कोई बुराई नहीं है. निगरानी और फास्ट ट्रैक अदालतों ने दिखावे के कुछ उदाहरण जरूर पेश किये हैं. मगर आम तौर पर इनकी कार्रवाइयां लोगों में भरोसा नहीं जगा पायी.
6. अस्पतालों की व्यवस्था में सुधार में एक पूर्व स्वास्थ्य मंत्री की बेहतरीन भूमिका रही है, मगर राजनीतिक कारणों से बाद में उन्हें हटा दिया गया.
अब यह जानना दिलचस्प होगा कि गरीबों के लिए नीतीश ने क्या किया.
1. विकास को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने के लिए सत्ता का विकेंद्रीकरण पहली शर्त है. मगर बिहार में पंचायतों की स्थिति बहुत बुरी है. मुखिया भ्रष्टाचार में डूबे हैं और पंचायती राज मुखिया से नीचे जा ही नहीं पाया है.
2. ग्रामसभाएं होती ही नहीं है, पंचायतों के जिम्मे कोई काम नहीं है. आज भी बीडीओ साहब ही गांव की व्यवस्था के लिए सर्वशक्तिमान हैं. उनकी इच्छा के बगैर गांव के एक व्यकित को सरकारी योजना का लाभ नहीं मिल सकता.
3. इंदिरा आवास किसे मिले यह तय करने का अधिकार भी पंचायतों से छीन लिया गया है. सिर्फ इस बिना पर कि मुखिया रिश्वत लेते हैं. रिश्वत के नाम पर केंद्रीकृत व्यवस्थाएं थोपी जा रही हैं.
4. पंचायतों को अब तक पंचायत भवन भी नहीं मिले हैं. जबकि महज दो साल पहले पंचायती राज व्यवस्था को अपनाने वाले झारखंड के तीन चौथाई पंचायतों में पंचायत भवन काम करने लगे हैं.
5. बिहार के महज तीन जिलों में ई-गवर्नेंस योजना के तहत काम हो रहा है, जबकि पड़ोसी राज्य झारखंड में अब सारे जरूरी प्रमाणपत्र आवास, जन्म, मृत्यु आदि पंचायतों में ऑनलाइन बन रहे हैं.
6. मनरेगा को लागू करने का मसला इतना बुरा है कि मजदूर फिर से पंजाब-दिल्ली जाने लगे हैं. इसके बावजूद मनरेगा के तहत देश में सबसे कम मजदूरी बिहार में ही मिलती है.
7. आंगनबाड़ियों के पैसों से सीडीपीओ मोटी हो रही है और राज्य में आज भी हर पांच में से चार बच्चा कुपोषित है.
8. स्वास्थ्य बीमा के पैसों के लिए हजारों महिलाओं का यूटरस बेवजह निकाल लिया गया, मगर एक डॉक्टर को अब तक सजा नहीं हुई.
9. मुजफ्फरपुर में हर साल इन्सेफ्लाइटिंस से सैकड़ों बच्चे असमय काल कलवित हो जाते हैं.
10. कृषि कैबिनेट और कृषि का रोडमैप खूब बना, मगर किसानों को आजतक सिंचाई, खाद या बीज की सुविधा नहीं मिली. यह संभवतः अकेला ऐसा राज्य है जहां सिंचाई के लिए डीजल सब्सिडी दी जाती है. यानी खेती भी आबोहवा में जहर घोलने का अपराधी बनाया जा रहा है. वैसे, यह सब्सिडी राज्य के प्राइवेट बस चालकों के सिवा किसी को लाभ नहीं पहुंचाती.
11. ग्रीनपीस संस्था के साथ राज्य सरकार ने राज्य में एक हजार सोलर पंप बांटने की योजना बनायी थी, पता नहीं उसका क्या हुआ.
12. शिक्षा के मसले राज्य सरकार ने कुछ काम किये हैं, जैसे स्कूलों में साइकिल और ड्रेस बंटवाना. मगर किताबें समय पर मिल जाये इसकी कोई व्यवस्था नहीं हुई है.
13. सबसे रोचक तो यह है कि बिहार में अगर आपको पुलिस विभाग में भरती होना है तो आपको परीक्षा देनी होगी, मगर शिक्षक की नियुक्ति मार्कशीट देखकर ही हो जाती है.
14. संभवतः यही एक ऐसा राज्य होगा, जहां अपराधियों से ज्यादा लाठी शिक्षकों ने खायी है. अपने लिए सुविधाएं मांगते हुए. यह रोचक है कि जब रनबीर सेना का प्रमुख की मौत पर एक खास जाति के लोग पटना में हंगामा करते हैं तो पुलिस वीडियोग्राफी करती है, मगर जब शिक्षक प्रदर्शन करते हैं तो सीधी कार्रवाई का आदेश दे दिया जाता है.
15. यही एक ऐसा राज्य है जहां महादलित आयोग है मगर नरसंहार के एक भी मुकदमें में नीतीश राज्य में दलितों को न्याय नहीं मिला है.
16. सरकार भूमिसुधार के मसले पर मौन है.
17. कोसी महाप्रलय के नाम पर दुनिया भर से 9 हजार करोड़ की भीख बटोरने वाली इस सरकार ने अब तक सिर्फ दस हजार पीडित परिवारों का आधा-अधूरा पुनर्वास किया है. पता नहीं दो लाख पीड़ितों का पुनर्वास कब तक हो पायेगा.
18. कोसी के खेतों में आ भी बालू जमा है. आपदा के पांच साल बाद भी और सरकार के पास इसके लिए कोई योजना नहीं है.
19. जरूरतमंदों को अंत्योदय और अन्नपूर्णा योजना का अनाज छह-छह महीने नहीं मिलता है. इस बीच अगर किसी की मौत भूख से हो जाये तो सरकार तरह-तरह की बहानेबाजी करती है.
20. गरीबों का एक काम बगैर घूस दिये नहीं होता है. अगर बीपीएल कार्ड बनवाना हो तो भी पैसे मांगे जाते हैं. लिहाजा पैसे वाले ही मान्यता प्राप्त गरीब हो सकते हैं.
और, भी कई जानकारियां हैं, मगर मेरे हिसाब से इतनी जानकारियां तो यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि यह सरकार अमर्त्य सेन के मॉडल पर काम नहीं कर रही.

Thursday, October 03, 2013

राइट टू रिजेक्ट़-बस प्यार से

बंदर : मुङो ये बता बाबू कहां ?
मदारी : सुशासन जी, छोटका मोदी जी, लालू जी, पासवान जी।
बंदर : मनमोहन जी, राहुल जी को लौडा, लफारी समझते हो। मदारी: लालू तो गये जेल
बंदर: बुद्घम् शरणम् गच्छामी।
मदारी : रहते बिहार में ख्वाब देखते दिल्ली का
बंदर: जब महाराष्ट्र मे छठ मना सकते तो दिल्ली में झंडा तो हमारा होगा।
मदारी : अरे चुनाव नही भक्तिमय माहौल है
बंदर : भक्तवत्सल श्री आसाराम
मदारी : चल बता यह माह कौन-सा है ? बंदर : दशहरा, बकरीद, दिपावली, छठ, वसूली
मदारी : वसूली का मतबल
बंदर : चन्दा दो नही तो धन्धा छोड़ो मदारी : शासन से डर
बंदर : फिर करप्शन कर
मदारी : पूजा-पाठ में करप्शन ना बाबा ना
बंदर : बिन करप्शन होत न पूजा़
मदारी : रावण वध की तैयारी होगी
बंदर : राम को थोड़ी उदासी होगी
मदारी : क्यू रे पेमेन्ट-वेमेन्ट का लफड़ा है
बंदर : नही जी़-ग़ठबंधन टूटने का झगड़ा है
मदारी : तुङो दशहरा में गठबंधन की है पड़ी
बंदर : बगले में बड़की भउजी खड़ी (राबड़ी देवी)
मदारी : पूजा समितियों ने की है जागरण की तैयारी
बंदर : क्यों नही घर से निकलेगी कन्याये बहुत सारी
मदरी : कन्या पूजन हमारी परम्परा है
बंदर : तो फिर बलात्कार सोसल राईट्स है
मदारी : चप्पे-चप्पे पर पुलिस खड़ी होगी
बंदर : अरे भाई तुम भूल गये, पुलिस खुद स्त्रीलिंग होती है़
( अच्छी लगे तो बजा दो ताली वरना दे दो, दो-चार गाली)
जयन्त कुमार सिन्हा
स्नातक (जनसंचार)
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय,भोपाल रहने वाला : दौलतगंज, छपरा अभी : भारतीय रेल की सेवा मे आर0डी0एस0ओ0, लखनऊ

Wednesday, September 11, 2013

अखड़ा जिंदा है तो भाषाएं भी जिंदा रहेंगी


अपने देश में अभी 480 आदिवासी भाषाएं बोली जाती हैं. इनमें से हालांकि बहुत कम ऐसी भाषाएं होंगी जिनका अपना साहित्य, अपना व्याकरण और अपनी लिपि होगी. मगर इनमें से कुछ भाषाएं ऐसी जरूर हैं जिनको बोलने वालों की संख्या लाखों में है जैसे संताली, मुंडारी, बैगानी, कुड़कु, गोंडी. (यहां उन भाषाओं और समुदायों की चर्चा नहीं की जा रही है जो उत्तरपूर्व के आदिवासी इस्तेमाल करते हैं.) मगर इन 480 भाषाओं के साथ एक सबसे बड़ी त्रसदी यह है कि इनके लिए किसी सरकार ने किसी भाषा अकादमी का गठन नहीं किया है, सामूहिक तौर पर आदिवासी भाषा-साहित्य परिषद भी नहीं. यह सब उस दौर में हो रहा है जब मध्य प्रदेश जैसे आदिवासी बहुल राज्य में भोजपुरी और पंजाबी की साहित्य अकादमियां गठित हो जाती हैं और झारखंड में द्वितीय राजभाषा का बांग्ला और उर्दू को दिया जाता है. इसके बावजूद इनमें से कई भाषाओं में साहित्यकार साहित्य रच रहे हैं, पत्रिकाएं और किताबें प्रकाशित हो रही हैं, ब्लॉग लिखे जा रहे हैं और तो और समारोह आयोजित कर पुरस्कार भी दिये जा रहे हैं.
पिछले दिनों रांची में ऐसा ही एक समारोह अखड़ा महासम्मेलन के नाम से आयोजित हुआ. दो दिन तक चले इस सम्मेलन में झारखंड, ओड़िशा, बंगाल और दूर-दराज के राज्यों में रहने वाले आदिवासी लेखक-साहित्यकार जुटे और उन्होंने आदिवासी भाषाओं की अस्मिता पर चर्चा करते हुए उनके भविष्य की रूप रेखा खींची. यह आयोजन प्यारा केरकेट्टा फाउंडेशन की ओर से आयोजित किया गया था.
प्यारा केरकेट्टा फाउंडेशन हर तीसरे साल रांची में अखड़ा महासम्मेलन का आयोजन करता है और इन सम्मेलनों में वह आदिवासी भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन पर विचार-विमर्श करता है. आदिवासियों के लिए अलग राज्य के नाम पर बने झारखंड में यही एक मात्र संगठन है जहां आदिवासी भाषाओं के लिए कुछ सार्थक काम होते हैं. फाउंडेशन की ओर से जोहार सहिया और अखड़ा के नाम से दो पत्रिकाओं का प्रकाशन होता है, जिसमें राज्य सभी आदिवासी और मूल निवासी भाषाओं की रचनाओं का प्रकाशन किया जाता है. इसके अलावा फाउंडेशन इन भाषाओं के रचनाकारों के किताबों का भी प्रकाशन करता है. इस लिहाज से यह एक छोटे-मोटे भाषा अकादमी की तरह काम करता है और संभवत: यह देश की एक मात्र ऐसी संस्था है जो आदिवासी भाषाओं के साहित्य को सामने लाने का महती काम कर रही है. इस काम को मूल रूप से वंदना टेटे और अश्विनी पंकज संभालते हैं. इसका आर्थिक पक्ष आदिवासी समाज से मिले चंदे और प्यारा केरकेट्टा फाउंडेशन में संचित छोटी से राशि से अब तक चल रहा है.
इस साल हुए महासम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में हिंदी के जानेमाने कथाकार उदय प्रकाश आमंत्रित थे, जो अंतिम समय में किसी वजह से नहीं आ पाये और अपने न आने के कारणों का उल्लेख उन्होंने फेसबुक पर विस्तार से किया है. बहरहाल दलित एवं महिला विषय पर नियमित लेखन करने वाली अनीता भारती और जेएनयू के प्राध्यापक गंगा सहाय मीणा ने इस सम्मेलन में गोतिया(अतिथियों) की भूमिकाएं अदा कीं. दूसरे दिन इस भूमिका में इंडिया टुडे के संपादक दिलीप मंडल नजर आये, जिन्होंने न सिर्फ साहित्यकारों की रैली में भाग लिया बल्कि समापन वक्तव्य भी पेश किया.
सम्मेलन में दर्जन भर से अधिक पुस्तकों का विमोचन हुआ. बीस के करीब साहित्यकारों को पुरस्कृत किया गया. पुरस्कृत साहित्यकार हैं- असुर साहित्य के लिए मेलन असुर और संपति असुर, हो भाषा से कमल लोचन कोड़ाह और दयमंति सिंकु, खड़िया से विश्रम टेटे और प्रतिमा कुल्लु, खोरठा से डॉ नागेश्वर महतो और पंचम महतो, कुरमाली से भगवान दास महतो और सुनील महतो, कुडुख से अघनु उरांव और फ्रांस्सिका कुजूर, मुंडारी से मंगल सिंह मुंड़ा और तनुजा मुंड़ा, नागपुरी से डॉ बीपी केशरी और डॉ कुमारी वासंती, पंचपरगनिया से प्रो परमानंद महतो और विपिन बिहार मुखी, संताली भाषा से चुंड़ा सोरेन ‘‘सिपाही’’ और सुन्दर हेम्ब्रम.
हिंदी की कवियत्री उज्‍जवला ज्योति तिग्गा को पहले रामदयाल मुंडा पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

Wednesday, August 14, 2013

9 हजार करोड़ का पैकेज फिर भी कोसी बदहाल


आपदा के 5 साल बाद भी बेघर हैं लाखों कोसीवासी, खेतों में अभी भी भरा है बालू, लोग पलायन को हैं मजबूर, पुनर्वास के नाम पर अभी भूमिका ही बांध रही है सरकार
18 अगस्त 2013 को कोसी में आयी भीषण बाढ़ के पांच साल पूरे हो रहे हैं. मगर कोसी आज भी उजड़ी की उजड़ी है. खेतों में बालू भरे हैं और लोग पलायन को मजबूर हैं. बाढ़ से सर्वाधिक प्रभावित जिले सुपौल के कई गांव में सिर्फ बुजुर्ग दंपति ही बचे हैं. जिन ढाई लाख लोगों के घर इस आपदा में क्षतिग्रस्त हो चुके हैं, उन्हें सरकारी मदद का इंतजार आज भी है. मगर राज्य सरकार की पुनर्वास एवं पुनर्निर्माण सोसाइटी अब तक सिर्फ 12 हजार लोगों के लिए ही घर बनवा सकी है. सबसे महत्वपूर्ण बात इन सबकी वजह फंड की कमी नहीं है. राज्य सरकार को केंद्र और विश्व बैंक से कोसी की तसवीर बदलने के लिए 9 हजार करोड़ का बजट अलॉट किया गया है. मगर काम की रफ्तार जो है उससे लगता है कि सभी पीड़ितों को मकान मिलने में सौ साल का वक्त लग सकता है.
क्या हुआ था पांच साल पहले
18 अगस्त 2008 यानी आज से पांच साल पहले की इस तारीख को कोसी के इलाके के सहरसा, मधेपुरा और सुपौल जिलों के वासी शायद ही कभी भूल पायेंगे. यही वह दिन है जब अचानक कोसी नदी ने अपना रास्ता बदल लिया था और बस्तियों के बीच से अपनी पुरानी राह को तलाश कर बहने लगी थी. नेपाल के कुसहा से मधेपुरा के आलमनगर तक के सैकड़ों गांव महीनों जलप्लावित रहे. हजार के करीब लोगों की जान गयी. दसियों हजार जानवर मारे गये. लाखों छह महीने के लिए विस्थापित हो गये. लोगों के खेतों में बालू भर आया और उनकी आजीविका छिन गयी. लाखों लोग बेघर हो गये. आज की पीढ़ी में शायद ही कोई ऐसा हो जिसने कोसी के इलाके में इससे भीषण त्रासदी झेली हो. हालांकि त्रासदी का वह बुरा वक्त गुजर गया, मगर कई निशान आज भी मौजूद हैं.
खेतों में भरे हैं बालू
बिहार सरकार ने कोसी आपदा के वक्त आकलन किया था कि इस आपदा की वजह से 14,800 करोड़ के करीब नुकसान हुआ था. इससे उस भीषण आपदा का अनुमान लगाया जा सकता है. मगर पांच साल बाद भी तसवीर कुछ बदली नहीं है. कुशहा से सटे बिहार के सुपौल जिले के कई गांवों में खेतों में बालू भरे हैं. आरटीआई एक्टिविस्ट महेंद्र यादव की आरटीआई के जवाब में सरकार ने स्वीकार किया है कि आज भी 14,129.70 एकड़ जमीन पर बालू जमा है. कई खेतों में 2 से 4 फीट बालू है. सरकार ने किसानों को खेतों से बालू हटाने के लिए चार से पांच हजार रुपये प्रति एकड़ की राशि दी थी, मगर किसानों का कहना है कि एक एकड़ जमीन से बालू हटाने का खर्च 50 हजार रुपये प्रति एकड़ से कम नहीं है. और उनके सामने सबसे बड़ा सवाल था कि इस बालू को हटाकर रखें कहां. ऐसे में लोगों की खेती ठप पड़ गयी है और लोगों को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ रहा है.
नयी तरह का पलायन
इस इलाके में बुजुर्गों के लिए काम कर रही संस्था हेल्पेज इंडिया के राज्य प्रमुख गिरीश मिश्र कहते हैं कि पलायन तो यहां हमेशा से होता रहता था, मगर बाढ़ के बाद पलायन का नया ट्रेंड शुरू हुआ है. पहले लोग खुद मजदूरी करने जाते थे और परिवार यहां रहता था, मगर अब लोग सपरिवार बाहर जाने लगे हैं, केवल घर के बुजुर्गों को यहां छोड़ दिया जाता है. हेल्पेज इंडिया ने इस इलाके के 8 बाढ़ पीड़ित गांवों में सर्वे कराया. इस सर्वेक्षण से पता चला है कि गांवों में 66 फीसदी बुजुर्ग या बुजुर्ग दंपति अकेले रहते हैं. सहरसा से मजदूरों को दिल्ली और पंजाब ले जाने वाली गाड़िया हमेशा भरी होती हैं.
पैसों की कमी नहीं है पुनर्वास के लिए
कोसी के बाढ़ पीड़ितों के पुनर्वास और पुनर्निर्माण के लिए बिहार सरकार को विश्व बैंक से 1009 मिलियन डॉलर (6200 करोड़ रुपये) का फंड मिल रहा है, केंद्र सरकार ने भी कोसी के लिए लगभग 29 सौ करोड़ की राशि राहत और पुनर्वास के लिए दी है. मगर कोसी के पुनर्वास के लिए राज्य सरकार को कितनी राशि मिली है इसको लेकर सरकार कुछ भी साफ-साफ कहने को तैयार नहीं है. राज्य के आपदा प्रबंधन और योजना विभाग के सचिव इस सवाल पर कहते हैं कि केंद्र की ओर से उन्हें कोई सहायता नहीं मिली है, विश्व बैंक से 1194 करोड़ रुपये मिले हैं और उसी राशि से पुनर्वास का काम चल रहा है. मगर खुद राज्य का आपदा प्रबंधन विभाग हमारे आरटीआई के जवाब में कहता है कि केंद्र सरकार की ओर से उन्हें 1121.86 करोड़ रुपये की राशि राहत कार्य के संचालन के लिए दी गयी है. पुनर्वास का कार्य योजना विभाग देख रहा है, अतः उक्त प्रश्न उन्हें निर्देशित किया जा रहा है. यानी केंद्र सरकार ने कुछ राशि पुनर्वास के लिए भी दी होगी. मगर केंद्र सरकार के मंत्री ने राज्य सभा में सांसद उपेंद्र कुशवाहा के एक सवाल के जवाब में कहा है कि सरकार की ओर से 614.56 करोड़ राहत कार्यों के संचालन के लिए और 2273.15 करोड़ रुपये पुनर्वास के लिए राज्य सरकार की ओर से दिये गये. यानी कुल 29 सौ करोड़ की राशि केंद्र सरकार द्वारा कोसी की राहत और पुनर्वास के लिए केंद्र सरकार की ओर से जारी किये गये. विडंबना यह है कि राज्य सरकार का कोई विभाग यह मानने के लिए तैयार नहीं है कि यह पैसा कहां है और किस रूप में व्यय हुआ, हो रहा है, लौट गया या क्या हुआ. वैसे इसी साल मार्च में कैग ने अपने रिपोर्ट में जिक्र किया है कि कोसी राहत का पैसा ठीक से खर्च नहीं होने के कारण लौट गया है.
विश्व बैंक की सहायता
कोसी पुनर्वास के लिए विश्व बैंक की ओर से 2010 में बिहार सरकार को बड़ी सहायता मिली और इन पैसों को व्यय करने के लिए सरकार ने बिहार आपदा पुनर्वास एवं पुनर्निमाण सोसाइटी का गठन किया. इस सोसाइटी के एक अधिकारी ने जानकारी दी है कि 1009 मिलियन डॉलर की राशि इस परियोजना के लिए विश्व बैंक की ओर से स्वीकृत है. इस राशि से 2021 तक कोसी का पुनर्वास करना है. मगर यह अपने-आप में शोचनीय प्रश्न है कि आखिर किसी आपदा के पीड़ितों के पुनर्वास लिए इतना लंबा वक्त क्यों लिया जा रहा है. इतने लंबे वक्त में तो पीढ़ियां गुजर जाती हैं. बहरहाल उन्होंने आगे यह भी जानकारी दी कि पूरी परियोजना तीन चरणों में पूरी होनी है. पहली परियोजना के तहत पीड़ितों के लिए एक लाख मकान बनाने का लक्ष्य रखा गया था. जिसे पूरा करने के लिए 2014 तक की समय सीमा रखी गयी थी. यह सोचे बगैर कि आपदा से प्रभावित लोग इस बीच छह साल का वक्त क्या सड़क पर गुजारेंगे. मगर हालत यह है कि फरवरी तक इस भारी भरकम समिति ने महज 10 हजार मकान बनाये थे, यह आधिकारिक सूचना थी. अधिकारी ने कहा कि आज की तारीख तक 12 हजार के करीब मकान पूरे हुए हैं. इस तरह से देखा जाये तो बिहार की सरकार ने कोसी आपदा के पांच साल में कुल 12 हजार लोगों को किसी तरह मकान दिया है, जबकि खुद सरकार का आंकड़ा कहता है इस आपदा के दौरान कुल 2,36,632 मकान क्षतिग्रस्त हुए हैं. इस रफ्तार से देखा जाये तो कोसी आपदा से प्रभावित सभी पीड़ितों को इतनी आर्थिक सहायता के बावजूद मकान पाने में सौ साल से अधिक समय लग जायेगा. इसका लाभ सिर्फ इतना होगा कि बिहार आपदा पुनर्वास एवं पुनर्वास सोसाइटी की मोटी तनख्वाह पर बहाल विशेषज्ञ और कर्मचारी आजीवन पैसे कमाते रह पायेंगे.
सोसाइटी का क्या काम है
हमारा एक आरटीआई आवेदन आज भी सोसाइटी के दफ्तर में पड़ा है और मेरे तमाम सवालों को इस आधार पर टाल दिया गया है कि जवाब आरटीआई के तहत ही दिया जायेगा. मगर इस बीच सोसाइटी के वेबसाइट पर जो महज कुछ दिन पहले तक मौजूद था, अब नहीं है पर कई सूचनाएं थी और कुछ सूचना सोसाइटी के एक अधिकारी ने हमारे आरटीआई पहुंचने से पहले दी. इस आधार पर कहा जा सकता है कि सोसाइटी ने अपना लक्ष्य सहरसा के 5, सुपौल के 5 और मधेपुरा जिले के 11 प्रखंडों में पुनर्वास करने का रखा है. इसके तहत
1. पहले चरण में एक लाख मकान बनने हैं
2. क्षतिग्रस्त सड़कों और पुल-पुलियों का निर्माण किया जाना है
3. बाढ़ प्रबंधन का काम किया जाना है
4. खेतों से बालू हटाया जाना है
5. आजीविका के साधनों का विकास किया जाना है
पहले चरण के तहत 259 मिलियन डॉलर खर्च किये जाने हैं. पहले इसकी समय सीमा सितंबर, 2014 रखी गयी थी, काम के मौजूदा रफ्तार को देखते हुए समय सीमा बढ़ाकर 2016 कर दी गयी है. दूसरे चरण में 2019 तक 375 मिलियन डॉलर और तीसरे चरण में 2021 तक 375 मिलियन डॉलर खर्च किये जाने हैं. काम का हाल यह है कि आज की तारीख तक 12 हजार मकान बने हैं. सड़क और पुल-पुलियों का काम चल रहा है मगर एक भी परियोजना पूरी नहीं हुई है. आरटीआई एक्टिविस्ट महेंद्र यादव बताते हैं कि मधेपुरा जिले के मुरलीगंज प्रखंड के रजनी पंचायत के प्रतापनगर गांव में जो बाढ़ के वक्त धारा के बीच में पड़ गया था और बुरी तरह प्रभावित हो गया था के लोगों के पुनर्वास के लिए उनके खाते खुलवाये गये थे मगर मार्च 2013 तक उनके खातों में एक पैसा भी नहीं डाला गया है.
सरकार की कोसी आपदा नीति
कोसी के पुनर्वास के लिए राज्य सरकार ने लंबी चौड़ी नीति तैयार की थी. इस नीति का नाम रखा गया था कोसी आपदाः पुनर्वास एवं पुनर्निर्माण नीति. 22 दिसंबर 2008 को राज्य सरकार के योजना विभाग द्वारा तैयार इस नीति में बड़ी-बड़ी बातें की गयी हैं. इसके प्वाइंट 6 में उद्देश्यों का जिक्र करते हुए कहा गया है कि इसके तहत घरों का निर्माण, सामुदायिक सुविधाओं की उपलब्धता, इंफ्रास्ट्रक्चर की संपूर्ण स्थापना और आजीविका में मदद की जायेगी. आगे कहा गया कि
इस आपदा को हम एक मजबूत सामाजिक और आर्थिक वातावरण तैयार करने के मौके के रूप में देख रहे हैं.
प्रभावित क्षेत्र में निजी/सार्वजनिक संसाधनों का पुनर्वास और पुनर्निर्माण किया जायेगा
.
क्षतिग्रस्त निजी/सार्वजनिक भवनों का समुचित तरीके से मरम्मत और पुनर्निर्माण किया जायेगा.
खेती, मत्स्य उद्योग, डेयरी उद्योग, लघु व्यवसाय और हस्तशिल्प के रूप में स्थानीय समुदाय को आजीविका उपलब्ध करायेंगे.
शिक्षा और स्वास्थ्य के तंत्रों का विकास और महिलाओं व कमजोर वर्गों के सशक्तीकरण पर विशेष ध्यान दिया जायेगा.
पंचायतों को क्रियान्वयन में भागीदारी दी जायेगी. प्वाइंट 8 के मुताबिक ये काम होने थे
गृह निर्माण
कचरे का निष्पादन
अस्थायी आश्रय का निर्माण
स्थायी घरों का निर्माण
सरकारी/निजी घरों की मरम्मत
आजीविका योजनाओं का चलाया जाना

सुरक्षा के नाम पर लूट और तटबंधों के बीच कैद कोसी


कोसी आपदा के वक्त यह सवाल जोर-शोर से उठाया गया था कि आखिर तटबंध की टूट के पीछे की वजह क्या थी. आवाम और विभिन्न संगठनों के भीषण प्रतिरोध के बीच राज्य सरकार ने सेवानिवृत्त जस्टिस राजेश वालिया की अध्यक्षता में एक जांच आयोग का गठन किया. इस आयोग को छह महीने के भीतर जांच कर बताना था कि कोसी की धारा बदलने के पीछे असली वजह क्या थी? क्या पूर्ववर्ती सरकारों ने या बाढ़ नियंत्रक कार्यों में जुटे अभियंताओं और ठेकेदारों ने तटबंध की सुरक्षा में कोई चूक की या फिर पिछले सालों में कोसी की सुरक्षा को लेकर बनी उच्चस्तरीय कमेटियों की रिपोर्टों की अनदेखी की गयी? मगर विडंबना यह है कि 10 सितंबर, 2008 को गठित इस आयोग के गठन के भी 5 साल पूरे होने वाले हैं. मगर जांच आयोग की रिपोर्ट का कोई अतापता नहीं है. इस आयोग के गठन के संबंध में जारी गजट में साफ लिखा है कि कारणों को जानना इसलिए जरूरी है, ताकि भविष्य में इस घटना की पुनरावृत्ति न हो.
आयोग की रिपोर्ट कब तक पूरी होगी, इस संबंध में आयोग का कोई पदाधिकारी कुछ बताने के लिए तैयार नहीं है. इस संवाददाता ने फोन के जरिये और ई-मेल भेजकर भी सूचना की मांग की, मगर सूचना नहीं दी गयी. वैसे, इस आयोग को सूचना देने में काफी सक्रिय भूमिका निभाने वाले सेवानिवृत्त कार्यपालक अभियंता विनय शर्मा का कहना है कि सुनवाई लगभग पूरी हो चुकी है. आयोग के वेबसाइट से भी यह जाहिर है और आयोग के वकील ने अपना सबमिशन पेश कर दिया है, जिस पर विनय शर्मा की दो टिप्पणियां अप्रैल, 2013 से पड़ी है. कोसी आयोग की साइट kosi-aayog.bihar.nic.in पर इन सूचनाओं को विस्तार से देखा जा सकता है. मगर रिपोर्ट कब तक आयेगी इसका कोई अता-पता नहीं है. खबर है कि जस्टिस राजेश वालिया इन दिनों बीमार चल रहे हैं.
आयोग की साइट पर देखा जा सकता है कि सबसे विस्तृत और गंभीर सबमिशन सेनि कार्यपालक अभियंता विनय शर्मा की ही है. वे कोसी तटबंध पर तैनात रह चुके हैं और उन्हें अनुभव है कि वहां किस तरह काम होता है. उन्होंने बाढ़ के बाद कुछ स्वयंसेवक संगठनों के साथ कुशहा से कुरसैला तक भारत में पूरी कोसी की नदी की नौका यात्रा की थी. इसके अलावा आरटीआई व विभिन्न तरीकों से उन्होंने इस संबंध में सूचनाएं भी एकत्र की हैं. अपने सबमिशन में उन्होंने विस्तार से बताया है कि किस तरह तटबंध टूटने की असली वजह बाढ़ नियंत्रण और तटबंध सुरक्षा के कामकाज में भ्रष्टाचार की अपरिमित संभावनाएं हैं. वे लिखते हैं कि तटबंध की सुरक्षा के वक्त कई दफा अपातकालीन परिस्थितियों में बगैर टेंडर के भी काम कराया जा सकता है. इसका कोई फिजिकल वेरिफिकेशन भी नहीं होता क्योंकि कहा जा सकता है कि जो बोल्डर या क्रेट डाले गये उसे बाढ़ का पानी बहा ले गया. इस तकनीकी आधार पर कोसी बाढ़ नियंत्रण के कामकाज में जमकर भ्रष्टाचार होता है. उनका मानना है कि कोसी तटबंध 2008 में इसी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया.
उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि इस जांच आयोग में सरकार और मंत्रियों को बचाने की कोशिश की गयी है, क्योंकि इसके गठन के वक्त ही तकनीकी रूप से कह दिया गया था कि इसके जरिये ठेकेदारों और अधिकारियों की चूक को पता चलाना है. जबकि इस तरह की गड़बड़ियों में मंत्रियों तक की भूमिका होती है. जल संसाधन विभाग ने कोसी तटबंध सुरक्षा के लिए जारी टेंडर का अनुमोदन करने का अधिकार पटना स्थित सचिवालय के पास सुरक्षित कर लिया है, ताकि टेंडर जारी करने से लेकर पेमेंट करने वक्त तक ठेकेदारों से अपना हिस्सा सीधे वसूला जा सके. निश्चित तौर पर इसमें मंत्रियों की भूमिका भी हो सकती है. उन्होंने इस संबंध में ढेरों सबूत और प्रमाण पेश किये हैं.
हालांकि कोसी तथा नेपाल से बिहार की ओर बहने वाली दूसरी नदियों पर लंबे समय से काम करने वाले विशेषज्ञ दिनेश कुमार मिश्र इस राय से पूरी तरह इत्तेफाक नहीं रखते. उनका मानना है कि यह बात कुछ हद तक जरूर सही है, मगर यह भी सच है कि इस तटबंध को टूटना ही था. यह बार-बार टूटता रहा है और आगे भी टूटता रहेगा. क्योंकि कोसी जिस स्वभाव की नदी है उसे तटबंध में बांध कर रखना मुमकिन नहीं है. तटबंध पूरा गाद से भर गया है और नदी का रुख पूर्वी तटबंध की ओर हो गया है. ऐसे में यह वक्त की बात है कि नदी कब तक तटबंधों की कैद में रहती है. उनका कहना है कि तटबंध और बराज के निर्माण के वक्त ही इसकी आयु 25 साल निर्धारित कर दी गयी थी, जबकि आज इसके निर्माण के 50 साल से अधिक का वक्त बीत चुका है.
दिनेश कुमार मिश्र कहते हैं कि यह सोचना ही मूर्खता है कि तटबंध नहीं टूटेगा. तटबंध में इतना सिल्ट भर गया है कि इसका टूटना तय है. इसे बांध कर नहीं रखा जा सकता. यह आज टूटे या पांच साल बाद टूटे. ऐसे में राज्य सरकार को पिछले सात-आठ अनुभवों के आधार पर डिजास्टर मैपिंग कराकर रखनी चाहिये थी. यानी तटबंध के हर तीन किमी के हिसाब से देखना चाहिये कि अगर पानी की मात्र दो लाख क्यूसेक या अधिक होने पर तटबंध टूटे तो पानी कितने समय में कहां पहुंच सकता है. यह मैपिंग कराने से आपदा के वक्त बचाव अभियान चलाने में सुविधा होगी. उन्होंने इस संबंध में राज्य सरकार को सुझाव भी दिया है, मगर कोई इस बात को सुनने को तैयार नहीं है. इस मसले पर केवल पांच सितारा होटलों में बड़ी-बड़ी बैठक होती है, उसमें कुछ लफ्फाजी होती है. वहां अगर कोई बात कहूं तो अधिकारी कहते हैं मिश्रजी केवल निगेटिव बातें करते हैं. वे कहते हैं कि मैं कैसे पॉजिटिव बातें करूं. 
दिनेश मिश्र आगे कहते हैं कि पिछले कई आपदाओं का इतिहास है कि जब भी हालात बुरे होते हैं तो सेना को उतारे बिना काम नहीं चलता. फिर आपदा प्रबंधन के नाम पर बनी दर्जनों संस्थाओं का क्या काम. सेना को ही ठीक से इक्यूप किया जाये और अरबों-खरबों सेमिनार और बैठकों में खर्च करने वालों कोविदा कर दिया जाये. वे कहते हैं, राज्य में सिंचाई विभाग का काम तटबंधों पर क्रेट और बोल्डर गिराना भर रह गया है. क्योंकि इससे अवैध कमाई होती है. हालात यह हैं कि 1988 में राज्य में कुल सिंचित भूमि 21.5 लाख हेक्टेयर थी जो आज की तारीख में महज 16 लाख हेक्टेयर है. ऐसे में इस विभाग से और क्या उम्मीद की जा सकती है.
पांच साल पहले जो हादसा हुआ था, वह आज भी कोसी के बाशिंदों को सावन-भादो की रातों में चैन से सोने नहीं देता है. तटबंध को मजबूत करने के सरकारी दावे पर उसे भरोसा नहीं होता है. हर साल इन महीनों पर लोगों की नजर भीमनगर स्थित बराज के डिस्चार्ज पर होती है. 2008 में यह तटबंध महज 1,72,000 क्यूसेक पानी में ही टूट गया था. हालांकि पिछले कुछ सालों में तटबंध के बीच से इससे अधिक पानी गुजर चुका है, मगर कोसी के लोगों आज भी आश्वस्त नहीं हो पाये हैं कि बारिश के महीने सकुशल गुजर जायेंगे. मगर क्या सरकार ने इस हादसे से कोई सबक लिया, कोई तैयारी करके रखी कि अब ऐसा हादसा न हो और अगर हो तो उससे सफलतापूर्वक निबटा जा सके.
कोसी के सुपौल जिले के बसंतपुर प्रखंड में काम कर रही संस्था हेल्पेज इंडिया के बिहार प्रभारी गिरीश मिश्र कहते हैं कि मई 2008 में राज्य सरकार ने आपदा की दृष्टि से संवेदनशील बिहार के 16 जिलों में ग्रेन बैंक बनाने की योजना बनायी थी. इसके तहत इन जिलों की दलित-महादलित बस्तियों में अनाज जमा रखना था ताकि बाढ़ या दूसरी आपदा के वक्त लोगों को खाने का अनाज मिल सके. संयोग से उसी वर्ष अगस्त महीने में कोसी की बाढ़ आ गयी. इससे इस योजना की प्रासंगिकता साबित हो गयी. मगर दुर्भाग्यवश कहीं इस योजना को लागू किया गया हो तो हो मगर सुपौल जिले में इस योजना को लागू नहीं किया गया. 2011 में जिला आपूर्ति पदाधिकारी ने बताया कि फंड वापस लौट गया है. फिर हार कर हमने कुछ गांवों में ग्रेन बैंक बनवाये हैं.

Tuesday, June 04, 2013

दरभा, राजनीति, लोकतंत्र और माओवाद


पिछले दिनों दरभा में हुई माओवादी वारदात के बाद सोशल मीडिया पर जमकर बहस हुई. मगर यह बहस कुछ ऐसी हुई कि हमारी समझ साफ होने के बजाय और धुंधली ही होती चली गयी. पता नहीं यह ठीक है या गलत मगर सोशल मीडिया के प्रभावी होने के बाद अक्सर ऐसा ही होता है. एक मुद्दा उठता है, कई तरह के नजरियों के साथ उस पर हम खुले हृदय से अपनी राय रखते हैं. एक जैसा नजरिया पीछे छूटता चला जाता है और जो रुख थोड़ा अलग होता है बहस उसके सहारे आगे बढ़ती चली जाती है. मेरे हिसाब से यह ठीक भी है और थोड़ा गलत भी. ठीक इस लिहाज से कि चीजों को नयी नजर से देखना कभी इतना सहज नहीं हुआ करता था और गलत इस वजह से कि हमलोग उन मसलों को भूल जाते हैं कि कम से कम कुछ बातें तो ऐसी जरूर हैं जिस पर तमाम लोग एक साथ बिना किसी प्रतिरोध के सहमत हैं. जैसे सच, इमानदारी, साहस और बदलाव. इन शब्दों का कोई विकल्प नहीं है और इन शब्दों के साथ जीने के बाद किसी वाद की जरूरत नहीं है. चाहे वह मानवतावाद ही क्यों न हो जिसका जिक्र आजकल खूब होने लगा है.
बहरहाल यहां मैं दरभा, राजनीति, लोकतंत्र और माओवाद के बारे में बात करना चाह रहा हूं. दरभा के बारे में जो सबसे पहली प्रतिक्रिया सामने आयी वह यह थी कि .. यह लोकतंत्र पर हमला है.. देखते ही देखते यह प्रतिक्रिया नारे में बदल गयी और तमाम ऐसे लोग जो भारत के निर्माण में अपने हक का दावा करते रहे हैं ने इसे हाथोंहाथ ले लिया. इसमें सिर्फ कांग्रेस के लोग नहीं थे, भाजपा समर्थकों का वह वर्ग जो मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए पिछले छह महीने से सोशल मीडिया पर अतार्किक किस्म की लॉबिग करता रहा है और हर नयी खबर के साथ केंद्र की कांग्रेस सरकार की खिंचाई करता रहा है वह भी इसे लोकतंत्र की हत्या मानने के लिए सहज तैयार हो गया. बड़ी आसानी से माओवाद और आंतकवाद को एक जैसा बताया गया, सलवां जुड़ूम के नेता महेंद्र कर्मा को शहीद और बस्तर का शेर पुकारा गया और सरकार से अपील की गयी कि जितना जल्द हो सके सारे टैंक सीमाओं से मंगवा लें और दंडकारण्य को कुचल डालें. तभी इस समस्या का समाधान हो सकेगा. ठोस कार्रवाई का समय आ चुका है और चुप-चाप बैठने से काम नहीं चलेगा.
ये प्रतिक्रियाएं सचमुच हैरत-अंगेज थीं. कांग्रेसियों की भी और भाजपाइयों की भी. क्योंकि कांग्रेसी आम तौर पर विचारधारा के नाम पर वाम की ही शरण लेते हैं और राहुल-सोनिया के नाम का जो सत्ता का केंद्र है वह 99 फीसदी वामपंथी है. कॉरपोरेट पूंजीवाद को पटाये-सटाये रखने का जिम्मा मनमोहन-चिदंबरम एंड को. के पास है. सोनिया ने एनएसी का गठन ही इस नजरिये से किया कि पार्टी के परंपरागत वोट बैंक यानी अल्पसंख्यक, आदिवासी, दलित और दूसरे सीमांत समुदायों के पक्ष में योजनाएं बनायी जा सके और इंडिया शाइनिंग के नेटवर्क एरिया से बाहर जो भारत बसता है उसे फुसलाकर रखा जा सके. वे समझ चुकी हैं कि उनकी मरहूम सास इंदिरा गांधी ने जो गरीबी हटाओ का नारा पेश किया था वह शोले फिल्म की तरह ऑल टाइम ब्लॉक बस्टर है. एनएसी की ओर से पिछले कुछ सालों में ऐसे कई कानून बनाये भी गये जो गरीबों को भिखारियों की कौम में बदल दे और भीख के बदले वोट का खेल किया जा सके. तभी हाल ही में केंद्र के कई नेताओं ने कैश(भीख) ट्रांसफर को गेम चेंजर कहते हुए पेश किया था. अब खाद्य(एक दूसरे तरह की भीख) सुरक्षा कानून पेश हो रहा है. हालांकि दानवीरों की इस सरकार में संसाधनों की लूट की कहानी भी साथ-साथ चलती रही. वनाधिकार कानून के जरिये आदिवासियों को वनों के प्रबंधन का जो अधिकार देने की बात कही गयी वो तो सात साल बाद भी कागजों पर ही रही मगर इन सात सालों में कम से कम सात लाख आदिवासियों को जंगलों से खदेड़ दिया गया ताकि मित्तलों, जिंदलों, टाटा और वेदांता के खदान धरती के गर्भ से कोयला, लोहा, बाक्साइट और दूसरे खनिज पदार्थ शांतिपूर्वक निकाल सकें. उनका परिशोधन कर उन्हें दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचा सकें. उद्योगपतियों को यह काम निर्बाध रूप से चलाने के लिए किसी कानून के सहारे की जरूरत नहीं पड़ी. सब कुछ आसानी से होता रहा. परेशानी वहां हुई, जहां माओ के पुजारी बंदूक थामे फैले हुए थे.
रेड कॉरिडोर नामक शब्द शायद पिछली सदी के आखिरी दशक में प्रचलन में आया. पता नहीं यह किसका शोध था, मगर था बहुत ही महत्वपूर्ण, कि बारस्ते नेपाल उत्तर-पूर्व, बिहार-बंगाल, झारखंड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ और आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र के कुछ हिस्से में घने जंगलों के नीचे माओवाद के सिपाहियों ने एक सुरक्षित गलियारा तैयार कर लिया है. इस गलियारे में सरकार की मौजूदगी न के बराबर है और पूरे इलाके में माओवादी ही सरकार हैं. इस थ्योरी से यह भी लिंक्ड था कि इस कारिडोर को तैयार करने के पीछे चीन का बड़ा हाथ है. हमारा यह दुष्ट पड़ोसी भारत में अंसतोष का माहौल बनाये रखना चाहता है और इसी वजह से समानता के नाम पर चल रही पूरी लड़ाई को फंड उपलब्ध करा रहा है. मगर बहुत जल्द हमें यह समझ में आ गया कि लाल गलियारे की सरकार को किसी चीनी फंड की दरकार नहीं. वह लेवी के तौर पर ठेकेदारों, सरकारी कर्मचारियों, नेताओं और व्यवसाइयों से इतनी वसूली कर लेता है कि उसकी आमदनी किसी राज्य सरकार के सालाना बजट जितनी हो ही जाती है. इन पैसों से वह भारत की सरकार के खिलाफ युद्ध लड़ता है.
हालांकि यह अजीब किस्म का युद्ध है. इस युद्ध में न कोई हारता है और न ही कोई जीतता है. लाल गलियारा न बढ़ता है और न ही घटता है. और सरकार कभी आपरेशन ग्रीन हंट चलाती है तो कभी सारंडा एक्शन प्लान लागू करती है मगर उन इलाकों में वह एक कदम भी घुस नहीं पाती हैं. अपने देश के भीतर यह एक और देश है, जिस देश में आदिवासी हैं, जंगल है और पग-पग पर बंदूक का खतरा है. वहां लोकतंत्र तो कतई नहीं है. हां कुछ उद्योग जरूर हैं, जिसे हम अवैध खनन कह सकते हैं. कई खनन माफिया उन इलाकों में सक्रिय हैं और उस इलाके की सरकार को टैक्स चुका कर खनन जारी रखे हुए हैं. रिपोर्ट है कि इन इलाकों से निकला खनिज चोरी-छिपे चीन भेजा जाता है और माओवाद इस व्यापार को भी सुरक्षा प्रदान करता है. वैसे माओवादी उन नेताओं को भी सशुल्क सुरक्षा और चुनाव जीतने लायक मत उपलब्ध करवाते हैं जो उन इलाकों से हमारी लोकसभा, विधानसभा और पंचायतों के लिए चुने जाते हैं.
कई दफा इन इलाकों में चहलकदमी करने वाले भारतीय सेना के सिपाहियों पर हमला हो जाता है और बड़ी संख्या में उनकी जान चली जाती है और कई दफा ये सिपाही माओवादियों को मार डालते हैं और कई बार ऐसा भी होता है कि इन इलाकों में रहने वाला आम आदिवासी कभी फौज के हाथों मारा जाता है तो कभी माओवादियों के हाथों. फौजियों को लगता है कि आदिवासी नक्सल समर्थक है और माओवादियों को लगता है वे पुलिस के मुखबिर हैं. शक और संदेह की बुनियाद पर उन इलाकों में रहने वाले हर आदिवासी की जान खतरे में है. कुछ ऐसा ही कश्मीर में भी है और उग्रवाद प्रभावित उत्तर पूर्वी राज्यों में भी. जहां-जहां चरमपंथ है, वहां के लोग शक के दायरे में और तलवार की धार पर खड़े जीवन जी रहे हैं. वहां लोकतंत्र नहीं है, आजादी नहीं और विवादास्पद हो चुका शब्द मानवाधिकार भी नहीं है. मगर जहां लोकतंत्र, आजादी और मानवाधिकार है. जहां नौकरियां और बाजार हैं. जहां हम टीवी पर बैठ कर आइपीएल और बिग बॉस का मजा ले सकते हैं, बेखौफ होकर. जहां खून-खराबे को फिल्मों तक से खदेड़ देने की मुहिम है और अखबार के पन्नों पर लाश की तसवीर छापना नैतिक अपराध माना जाने लगा है. वहां जाहिर तौर पर आंतकवाद, नक्सलवाद और चंबल के डकैत एक जैसे ही हैं और जब खून के छींटे जंगल से उड़कर शहर की मकानों को बदरंग करने लगते हैं तो हमें लगता है कि यह लोकतंत्र की हत्या है.
दरअसल लोकतंत्र की हत्या का जुमला उछालते वक्त हम भूल जाते हैं कि रेड कॉरिडोर में लोकतंत्र की हत्या अक्सर हो जाती है. दरभा नरसंहार से कुछ ही दिनों पहले, हफ्ता भी शायद ही बीता होगा. 22 आदिवासियों की हत्या बीजापुर के इलाके में हो गयी. इस हत्या का इल्जाम उन बंदूकधारियों पर नहीं था जो लोकतंत्र को ढेला भर भी नहीं मानते, बल्कि उन सिपाहियों के सर था जिसे भारतीय लोकतंत्र ने लोकतांत्रिक मूल्यों की बहाली का भी जिम्मा दे रखा है. मगर वे मानते हैं कि कई दफा लोकतंत्र की बहाली के लिए लोकतंत्र के शरीर से खून निकालना पड़ता है. इससे पहले लोकतंत्र के भक्षकों ने इसी इलाके में समानता की स्थापना करने के पावन उद्देश्य से 75 फौजियों की हत्या कर दी थी. और उस वक्त हममें से कई फेसबुकिया विचारकों ने आपत्ति की थी कि निरीह सिपाहियों की बलि लेने से क्या फायदा.. उनका क्या दोष और इस बार उन लोगों ने ऐसी कौम पर हमला किया जो देश के लिए नीतियां तैयार करते हैं और उसे पूरे देश में लागू करवाते हैं. इस पर हमने कहा कि भाई, तुमने तो लोकतंत्र की हत्या कर दी..
शुक्र है, हमसे कोई नहीं पूछता कि भाई, लोकतंत्र जिंदा कब था जो उसकी हत्या हो गयी. लोकतंत्र तो उसी वक्त मर गया था जब आजादी वाले साल ही झारखंड के सरायकेला जिले में हक के लिए संघर्ष करने वाली भीड़ पर हमारे ही सिपाहियों ने गोली चलवा दी थी. उसे आजादी का पहला गोलीकांड माना जाता है. लोगों ने छह माह के अंदर समझ लिया था कि अपनी सरकार होने का मतलब यह नहीं कि वे हम पर गोली न चलवा दें.
जब बंगाल के नक्सलवाड़ी में पहली दफा आवाम ने बंदूक उठायी तो वह बंदूक सरकारी बंदूक की प्रतिक्रिया में ही उठी होगी. उससे पहले देश के तकरीबन हर कोने में सरकारी बंदूक गरज चुकी होगी और लोगों को लगने लगा होगा कि हमारी अपनी सरकार बहरी हो चुकी है. हालांकि देश का आवाम और उसके लिए आंदोलन कर रहे अधिकांश संगठन साठ-सत्तर साल बाद भी यही मानते हैं कि भले ही सरकार गोलियां चलाती रहें, हमें गोली-बारूद का सहारा नहीं लेना चाहिये. हमारी सरकार आवाम को अपना भले नहीं मानती हो, मगर आवाम आज भी पूरी सहृदयता से सरकार को अपनी सरकार ही मानती है और उसे आज भी अंग्रेजी सरकार से बेहतर ही कहती है. हालांकि आज तक केंद्र से लेकर राज्य तक शायद ही कोई ऐसी सरकार बनी हो जिसने अपनी ही जनता को संगीनों के सामने खड़ा न कर दिया हो. महात्मा गांधी के नाम पर देश की बड़ी आबादी आज भी खामोश है. वह रामलीला मैदान में जाती है, जंतर मंतर में जाती है और ज्यादा नाराजगी हुई तो इंडिया गेट पर उतर जाती है. वह खिड़कियों के शीशे तोड़ती है और वाहनों को उलट कर आग लगा देती है. बस.. क्योंकि इससे ज्यादा गुस्सा बर्दास्त करना किसी सरकार के बस में नहीं. इसके बाद बंदूकें बाहर आ जाती हैं. अगर यही लोकतंत्र है तो सचमुच लोकतंत्र जिंदा है और अगर जनता की ओर से हुक्मरानों पर गोली चलाना ही लोकतंत्र की हत्या है तो सचमुच उस दिन लोकतंत्र की हत्या हो गयी.
कई कहानियां हैं, कई संदर्भ हैं. एक संदर्भ महेंद्र कर्मा का भी है और उस संदर्भ में हमें न जाने क्यों बार-बार अपने राज्य के ब्रह्मेश्वर मुखिया की याद आती है. ब्रह्मेश्वर मुखिया रनबीर सेना के प्रमुख थे. रनबीर सेना की स्थापना भी नक्सलियों से लोहा लेने के लिए ही की गयी थी. बिहार के भोजपुर इलाके में जब वर्ग संघर्ष भीषण हो उठा और दलितों के पक्ष से नक्सलियों ने खूनी संघर्ष का मोरचा उठा लिया तो उच्च वर्ग के किसानों ने सामूहिक तौर पर इसका सशस्त्र विरोध करने के लिए रनबीर सेना का गठन किया. इस सेना ने जगह-जगह पर नक्सलियों का सामना किया और नरसंहार के बदले नरसंहार होने लगे. मगर वह अलग दौर था. बिहार समेत देश के तमाम बुद्धिजीवियों ने एक सुर में रनबीर सेना को गलत ठहराया और कहा कि दलित वर्ग के लोग सदियों से सताये गये हैं, इसलिए उनके विरोध का हिंसक प्रतिरोध किसी सूरत में जायज नहीं है. हिंसक गतिविधियों के बावजूद लोगों की सहानुभूति दलितों के पक्ष में ही रही. रनबीर सेना की आम छवि नकारात्मक ही रही.
मगर दो दशक बीतते-बीतते नजारा बदल गया. माओवादियों की गोली का जवाब गोली से देने के लिए खुद आदिवासियों के हाथों में बंदूक थमा दिये गये और आदिवासियों को दो धड़ों में बांटकर कत्ले आम का सरकारी सिलसिला शुरू कर दिया गया. मीडिया में खबरें प्लांट कर यह साबित करने की कोशिश की गयी कि सलवां जुड़ूम के जरिये आदिवासी समाज ही माओवादियों को उखाड़ फेंकने के लिए आतुर है. मगर आने वाले वक्त में यह छलावा साफ होने लगा. हमने देखा कि सलवां जुड़ूम आदिवासी समाज में सरकारी गुंडों की फौज का रूप ले रहा है. वह सरकारी बंदूक से अपहरण, रेप और लूटपाट का व्यवसाय चलाने लगा है. आदिवासी समुदाय जो पहले से ही सुरक्षा बल और माओवादियों की दो धारी तलवार पर चल रहा था वह अब सलवां जुड़ूम के भालों पर भी टंग गया है. मगर माओवाद का यह विरोध सरकारी समर्थन प्राप्त था. यह जायज है या नाजायज इस पर बुद्धिजीवियों का धड़ा बंट चुका था. क्योंकि माओवाद खुद नैतिक रूप से कई सीढियां नीचे फिसल चुका था. उसकी खुद की छवि आज माफिया सरगनाओं जैसी हो गयी थी. मगर पतन की इन कहानियों के बीच ब्रह्मेश्वर मुखिया का नया अवतार महेंद्र कर्मा बस्तर का शेर कहा जाने लगा और नायक की छवि को प्राप्त हो गया. कहते हैं इस महेंद्र कर्मा ने कभी छत्तीसगढ़ में पेशा कानून लगाये जाने का भी विरोध किया था और आदिवासियों के बीच उसके खानदान की छवि शोषकों वाली रही है. यह सब तो कही सुनायी बाते हैं, मगर अगर ब्रह्मदेव मुखिया गलत थे और महेंद्र कर्मा सही हैं तो यह सिर्फ वक्त का फेर है.
भाजपा इस कहानी में एक और अजीब चरित्र है. देश की राजनीति में गैर कांग्रेसवाद का सबसे मजबूत विकल्प अगर आज आगे नहीं बढ़ पा रहा है तो इसकी वजह इसका सामंतवादी चरित्र ही है. इसके लिए अल्पसंख्यकों ही नहीं आदिवासियों, दलितों और तो और द्रविड़ों के लिए भी कोई नीति, योजना या विचार नहीं. संभवत: यह देश में हाल के बरसों में फैली समानता की लड़ाई की प्रतिक्रिया भर है. पिछड़ों, दलितों और आदिवासियों के उभार के खिलाफ उच्चवर्गीय हिंदू समाज में जो गुप्त किस्म की नाराजगी है भाजपा उसकी तुष्टिकरण करके वोट बटोरने को ही अपना अंतिम ध्येज मान बैठी है. देश को कांग्रेस का विकल्प चाहिये, मगर इस पार्टी के नेताओं को विकल्प बनने की फुरसत ही नहीं है. इसके समर्थकों को कारगिल युद्ध और दरभा के नरसंहार में कोई फर्क नजर नहीं आता. हालांकि बस्तर के इलाकों में विधानसभा की अधिकांश सीटों पर इसके ही नेता जीतते रहे हैं, वो भी माओवादियों को पैसा भरके.. मगर आदिवासियों के मसले क्या हैं इसका रत्ती भर भान इस पार्टी को नहीं है. इनके हिसाब से देश को सवर्ण हिंदुओं के लिए खाली कर दिया जाना चाहिये. यह देश उन्हीं का है.
राजनीतिक वामपंथ भी माओवादियों को भटका हुआ मानता है. यह प्रतिक्रिया किसी जवान लड़की के बाप जैसी है, जो बेटी के हर दोस्त को आवारा समझता है. भइये, आप के पास लड़ने की फुरसत नहीं है, जनता कब तक आपके कथित कयामत के दिन का इंतजार करे. इस देश में लड़ने वाला हर आदमी भटका हुआ है और जो शराफत भरे लिबास में टीवी चैनलों पर वर्ग संघर्ष की थियोरी के गर्दोगुबार साफ कर रहा है वही केवल सही रास्ते पर है. बस्तर का इलाका जहां कभी लोग पलायन नहीं करते थे आज वहां के घर-घर से लोग जबलपुर और रायपुर-बिलासपुर जा रहे हैं तो इसका कसूरवार कौन है. और आपकी अदालत का फैसला होने तक लोग कैसे भिखमंगों का जीवन जीते रहें.
दंडाकरण्य को खाली करवा लो. यह आज का सबसे पापुलर नारा है. मगर विज्ञान कहता है कि इस दुनिया में कोई चीज खाली नहीं रह सकती. तो खाली दंडकारण्य में कौन रहेगा. जिंदल-वेदांता और टाटा. किसके लिए खाली होगा दंडकारण्य. हिंसा खत्म होनी चाहिये और ठीक है इसके लिए हिंसा का सहारा भी लिया जाना चाहिये. मगर हिंसकों के खिलाफ. टैंक चलें मगर खेत न उजड़े. माओवादी जो बंदूक में आस्था रखते हैं उन्हें गोली लग भी जाये तो कोई गम नहीं क्योंकि बंदूक और गोली का रास्ता उन्होंने अपनी मरजी से चुना है. मगर उन तमाम लोगों को गोलियों से बचाने की गारंटी कौन लेगा जो शांति से रहना चाहते हैं. जिनकी एक ही मांग है, उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया जाये. क्या लोकतंत्र के पहरेदार इस बात की गारंटी लेंगे?
अब इस बात पर मेरा भरोसा पुख्ता हो गया है कि इस कंफ्यूजन भरे दौर में सच्ची बात सिर्फ सरकारी मशीनरी के बीच बैठा संवेदनशील आदमी ही कर सकता है. श्रीलाल शुक्ल की राग दरबारी और श्रीकांत वर्मा का कविता संग्रह मगध इसके उदाहरण हैं. इस पूरी बहस में मुङो सबसे पसंद केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश की बात लगती है, कि दस सालों के लिए देश के सभी आदिवासी इलाकों में खनन पर रोक लगा दी जानी चाहिये. पता नहीं किस मनोदशा में उन्होंने यह बात कही और हमारी सरकार अपने इस मंत्री की बातों को कितनी गंभीरता से लेती है, मगर इस पूरी समस्या का सबसे बेहतर समाधान यही है. हालांकि आज की तारीख में इसे यूटोपिया ही कहा जा सकता है.. मगर कई लोग यूटोपिया के पीछे ही दीवाने होते हैं.
और अंत में एक जमाने के विद्रोही कवि राजकमल चौधरी की एक कविता का अंश
आदमी को तोड़ती नहीं हैं लोकतांत्रिक पद्धतियां केवल पेट के बल
उसे झुका देती हैं धीरे-धीरे अपाहिज
धीरे-धीरे नपुसंक बना लेने के लिए उसे शिष्‍ट राजभक्‍त देशप्रेमी नागरिक बना लेती हैं
आदमी को इस लोकतंत्री सरकार से अलग हो जाना चाहिये

Thursday, March 21, 2013

कानून तो बना लोगे, दारोगा कहाँ से लाओगे


जिस दिन लोकसभा ने एंटी रेप बिल पर अपनी मुहर लगायी थी, उसके अगले दिन रांची के अखबारों में एक दहलाने वाली खबर चस्पा थी. रांची से सटे सोनाहातू में एक महिला और उसके नवजात शिशु का शव पांच दिन से पड़ा था और उसके पास उसकी पांच वर्षीय बेटी बैठी थी. तफ्तीश के बाद पता चला था कि उक्त महिला विधवा थी और अपनी बेटी के साथ अकेले रहती थी. किसी व्यक्ति ने उसका यौन शोषण किया, जिसकी शिकायत करने वह थाने में गयी. मगर पुलिस ने उसे भगा दिया. बाद में यौन शोषण के कारण ठहरे गर्भ की वजह से उसने बच्चे को जन्म दिया. जन्म के वक्त ही जच्चा और बच्चा दोनों ने प्राण त्याग दिये. ऐसा नहीं है कि उस दिन अखबार में महिलाओं के खिलाफ हिंसा की यही एक खबर थी. एक और खबर कहीं की थी कि कचहरी परिसर में एक महिला के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया. अगले दिन यानी आज के अखबार भी ऐसी ही खबरों से भरे हैं. एक महिला ने दुष्कर्मी को सजा नहीं दिला पाने के कारण खुद को आग लगाकर जान दे दी है. यह नये और तथाकथित मजबूत कानून का हमारे समाज द्वारा किया जाने वाला स्वागत है. समाज तो खैर खुद को सरकार का हिस्सा ही नहीं मानता मगर सरकार का अहम हिस्सा माना जाने वाला पुलिस प्रशासन इन कानूनों को लेकर कितना संवेदनशील है, यह उपर्युक्त घटनाओं से जाहिर है. वैसे मैं यहां इस कानून और उसको लागू कराने वाली एजेंसी के बारे में सवाल नहीं उठा रहा. मेरा सवाल अपने देश के सैकड़ों कानूनों और उसे लागू किये जाने के उपायों पर है और इस बात पर भी कि देश के कितने लोग इन कानूनों के बारे में जानते हैं.
परसों ही एक सेमीनार में एक सज्जन शिक्षा का अधिकार कानून की बारीकियों का जिक्र कर रहे थे कि इसके तहत सरकार ने समाज को कितने अधिकार दिये हैं, मगर लोग ही जागरूक नहीं हैं. वे अपना हक नहीं लेते... ऐसा ही सूचना का अधिकार, मनरेगा, राइट टू फूड और कई दूसरे कानूनों के बारे में कहा जा सकता है जो पिछले एक दशक में देश को मिले हैं.... संभवतः कुछ दिनों बाद ऐसा ही खाद्य सुरक्षा कानून के बारे में भी सेमीनारों में यही कहा जायेगा. कहने वाले विशेषज्ञ जब इन बारीकियों को बता रहे होंगे तो हॉल में मौजूद अन्य विशेषज्ञ जिनकी अलग-अलग चीजों के बारे में विशेषज्ञता होगी उन्हें तमाम जानकारियां बिल्कुल नयी प्रतीत होगी. और आम जनता जिन्हें इन तमाम कानूनों के जरिये सहूलियतें देने की कोशिश की गयी है अपनी पूरी जिंदगी में इन कानूनों का दस फीसदी हिस्सा भी नहीं जान पायेंगी. विशेषज्ञ जागरुकता की कमी का रोना रोते रहेंगे और बिचौलिये जागरूक होकर मोटे होते रहेंगे.
मैंने सोचा था कि उस समारोह में उन विशेषज्ञ महोदय से पूछूं कि ये कानून इतने जटिल क्यों हैं कि इन्हें समझने के लिए लोगों को जागरूक होना पड़े. और अगर लोग जागरूक नहीं हो पा रहे तो ऐसा क्यों माना जाये कि कानून लागू हो गया है. दरअसल पिछले कुछ सालों में खास तौर पर जबसे कांग्रेस ने नेशनल एडवाइजरी कमेटी में स्वयंसेवी संस्था के नामी-गिरामी लोगों को जगह दी है. आम आदमी के हित से जुड़े कई कानून लागू हुए हैं. मनरेगा, वनाधिकार कानून, सूचना का अधिकार कानून, महिला सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा कानून तो टटका-टटका लागू हुए हैं. पिछले कुछ साल से सिविल सोसाइटी के दूसरे नुमाइंदे जो एनएसी में शामिल होने से चूक गये वे जनलोकपाल विधेयक के लिए दबाब बना रहे हैं. अगर इन तमाम कानून की मोटी-मोटी बातें लोगों से पूछी जाये तो जाहिर हो जायेगा कि लोगों को इनके बारे में कितनी कम जानकारी है. लोग तो लोग सरकारी अमलों के अफसर भी ठीक से नहीं जानते कि मनरेगा के तहत बच्चों वाली महिलाओं को क्या-क्या सुविधाएं देनी है या सूचना का अधिकार कानून के तहत प्रथम अपील का निबटारा कैसे करना है.
वनाधिकार कानून का मामला तो कमाल है. बहुत संभव है कि कुछ साल बाद इस कानून को इस बिना पर निरस्त कर दिया जाये कि बनने के इतने साल बाद भी लागू नहीं हो पाना यह दर्शाता है कि लोगों की रुचि वनाधिकार पाने में है ही नहीं. इस कानून के तहत स्पष्ट प्रावधान है कि वन विभाग वनों की सुरक्षा कर पाने में विफल रहा लिहाजा वनों के प्रबंधन का अधिकार उनके इर्द-गिर्द रहने वाले लोगों के हाथों में स्थांतरित कर दिया जाये. ऐसे में इन कानून के लागू होते ही देश के वनों में वन विभाग के अधिकारियों की मौजूदगी अवैध हो जाती है. मगर आम लोग अब तक यही समझते हैं कि यह कानून सिर्फ जमीन का पट्टा लिखवाने का कानून है. कई जगह स्वयंसेवी संस्थाओं ने पंचायतों के नाम वन के प्रबंधन का काम स्थानांतरित करवाने की कोशिश की, मगर पूरे देश में सिर्फ एक जगह महाराष्ट्र के मेंढ़ालेखा में यह मुमकिन हो पाया और वह भी तत्कालीन वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश के सक्रिय हस्तक्षेप के कारण. आज भी पूरे देश में वन विभाग के अधिकारी पूरे ठाठ से राज कर रहे हैं और ग्रामीणों को लकड़ी काटने के जुर्म में जेल की हवा खिला रहे हैं. यह हमारे देश में बने महत्वपूर्ण कानूनों के लागू करने की प्रक्रिया और सरकारी सदिच्छा का नमूना है. दिन रात जागरूकता की दुहाई देने वाले सरकारी अधिकारी और एनजीओ वाले भी इस मसले पर जागरूकता का मंत्र भूल जाते हैं.
मैं कहता हूं कि अगर लोग मनरेगा और मिड-डे मील या शिक्षा का अधिकार को लेकर ही जागरूक हो जायें तो क्या होगा. कितने प्राइवेट स्कूलों में 25 फीसदी गरीब बच्चों का नामांकन होता है? मनरेगा में कितनी मेठ महिलाएं हैं और कितने जगह कार्य स्थल पर पालनाघर की व्यवस्था है? क्या जागरूक लोगों के शोर मचाने से यह सुनिश्चित हो जायेगा... अगर किसी को भ्रम है तो वे अपने शहर के सबसे मशहूर प्राइवेट स्कूल में एक बीपीएल बच्चे का एडमिशन करा कर देख ले.
फेसबुक पर कई पुरुष साथी नये कानून से डरने का अभिनय कर रहे हैं कि अब बुरका पहन कर गलियों में घूमना पड़ेगा. अरे भाई जब रेप का शिकायत दर्ज कराने में नाकाम होकर महिलाएं खुदकुशी करने को मजबूर हो जाती है, तो भला घूरने की शिकायत कौन दरोगा दर्ज करेगा. दरोगा भी तो आखिर पुरुष ही है, उससे अधिक पुरुषों का दर्द कौन समझेगा. उसके रोबीले अंदाज को देख कर महिलाएं यही समझेंगी कि इससे बेहतर तो छेड़खानी करने वाले से मुकाबला करना है.. हो सकता है वह घुरकी दिखाने से भाग ही जाये...
आखिर ऐसा क्यों है, गड़बड़ी कहां है...
बड़ी-बड़ी कमेटियां मिलकर कानून तैयार करती हैं. संसद में उस तैयार कानून के हर छेद में उंगली डाल कर हंगामा किया जाता है, फिर सरकार लाचार होकर उन छेदों को भी बंद करती हैं. फिर कानून बनता है. मगर जब उसे लागू करने का बारी आती है तो न उसकी जानकारी लागू करने वालों को होती है और न ही उनको जिसके लिए यह कानून बना है. क्या यह सवाल सिर्फ जागरूकता और प्रचार-प्रसार में कमी का है या हमारे कानून निर्माण प्रक्रिया में... अब तक तो संविधान के मूल प्रावधानों के बारे में ही लोगों को ठीक से जानकारी नहीं है तो फिर वे सौ की संख्या में पहुंचे संशोधनों को कैसे समझेंगे. अगर आप इसकी असली वजह जानना चाहते हैं कि कृपया किसी भी एक कानून के दस्तावेज का पीडीएफ डाउनलोड करके उसे समझने की कोशिश करें. पहले पांच पन्नों में तो सिर्फ परिभाषाएं होती हैं कि इस कानून में वर्णित फलां शब्द का अर्थ फलां है, उसके बाद कही प्रावधानों को शुरू होने का मौका मिलता है.
मुझे हैरत होती है कि अगर अपना संविधान लिखित के बदले मौखिक होता तो क्या होता. लोग कैसे इस इनसाइक्लोपीडिया को याद रखते. क्यों हम ऐसे नियम-कानून नहीं बनाते जिसमें पेंच कम हो और समझदारी ज्यादा. जो फिल्मी गानों की तरह लोगों को याद हो जाये और जिसमें नियम के लिए कम और संवेदनशीलता के लिए अधिक गुंजाइश हो. अगर कोई किसी को थप्पर मारता है तो उसे सजा देने के लिए कानून की धारा याद रखने की जरूरत क्यों पड़े... घर में दो बच्चे जब झगड़ते हैं तो कौन आइपीसी के रेफरेंस याद करता है. मगर जब यही लड़ाई घर से बाहर होती है तो वकील हमें बताता है कि गाली के साथ-साथ जातिसूचक गाली का भी आरोप लगाओ इसमें अधिक सजा मिलेगी. पति-पत्नी के झगड़े में वकील पत्नी को दहेज प्रताड़ना का आरोप लगाने की सलाह देता है और पति को कहता है कि वह तभी बच सकता है जब वह पत्नी को बदचलन साबित कर दे.
अब आने वाले दिनों में क्या लड़कियों का पीछा करना और उसके साथ बसों और सार्वजनिक स्थलों पर छेड़खानी बंद हो जायेगी...? मगर कुछ ऐसे मामले जरूर होंगे जिसमें वकील अपने मुवक्किल को इन आरोपों का लाभ लेने का हुनर सिखायेगा...
इसके बदले देश में जो कानून और जितनी योजनाएं बीस साल पहले थीं उसका इस्तेमाल ठीक से होता तो इतने नये कानून बनाने की जरूरत नहीं होती. मगर दुर्भाग्यवश हमारे हुक्मराने ने जितनी मेहनत कानून बनाने में की उसका एक चौथाई काम इन्हें ठीक से लागू कराने पर नहीं हुआ. सरल कानून बने और सही तरीके से लागू हो जाये तो देश और उसकी संसद को, अदालतों को संविधान और उसके सौ के करीब संशोधनों के प्रावधानों और उनकी नियमावली को याद करने की जरूरत नहीं पड़े.

Saturday, March 02, 2013

खैराती अम्मा का सामाजिक अर्थशास्त्र


चिदंबरम साहब ने यूपीए-2 का आखिरी बजट पेश कर दिया है. तमाम कयासों के बावजूद यह बजट भी खैराती अम्मा का पिटारा ही है. यूपीए-1 की एंट्री से यूपीए-2 की एक्जिट तक खैराती अम्मा का पिटारा ही कांग्रेस की यूएसपी रही है. आम आदमी का हाथ, कांग्रेस के साथ के नारे से एनडीए के फीलगुड फैक्टर को मात देने के बाद जैसे इस फार्मूले पर कांग्रेस अंधविश्वास करने लगी है. पार्टी की सरकार में दुबारा वापसी भी इसी फार्मूले के कारण हुई, मनरेगा ही सरकार के लिए ट्रंप कार्ड साबित हुआ, सो इस पार्टी के लिए ऐसा सोचना कोई गलत नहीं. यूपीए ने सीजन-3 में वापसी के लिए भी ऐसे ही दो ट्रंप कार्ड सोच रखे हैं, पहला कैश सब्सिडी यानी सब्सिडी का पैसा सीधे खाते में और दूसरा फूड सिक्योरिटी एक्ट यानी खाना मिलेगा, पीना मिलेगा... खैराती अम्मा के पिटारे में सब कुछ मिलेगा. खैर हर राजनीतिक दल को राजनीतिक फार्मूला अपनाने की पूरी छूट होती है और हर सरकार को जाते-जाते जनता के लिए चुग्गा फेकने की भी पूरी आजादी मिलती है... हालांकि हर फार्मूला दो बार इस्तेमाल होने के बाद आउटडेटेड हो जाता है, ठीक उसी तरह जैसे कोई आज के टाइम में मर्द और कुली जैसी फिल्में बनाये और उसके हिट हो जाने की उम्मीद पाल बैठे. वैसे मेरा इरादा यहां इस फार्मूले के हिट या फ्लाप होने पर अपनी राय व्यक्त करना नहीं था बल्कि इस खैराती अर्थशास्त्र पर चंद फिकरे कसना चाह रहा था जिस पर हमारे देश के छोटे-बड़े तमाम सामाजिक विचारक वारे-वारे जाते हैं. किसानों की कर्जमाफी, मनरेगा और दोपहर की खिचड़ी से लेकर चुनाव से ऐन पहले अवतरित होने वाले खाद्य सब्सिडी योजना तक के लिए....
यह हमारा सौभाग्य है कि हम महात्मा गांधी के देश में पैदा हुए हैं मगर हमारा सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि अक्सर हम इस सौभाग्य वाली बात को भूल जाते हैं. ऐसा अगर न होता तो हमने नरेगा के आगे महात्मा गांधी का नाम शायद ही जुड़ने दिया होता. हालांकि मनरेगा न तो रोजगार की गारंटी साबित हो पायी और न ही बिना रोजगार के सौ दिन का मेहनताना पाने की गारंटी. हर राज्य में मनरेगा की उपलब्धियों को सामने लाने के लिए एक पीआरओ की नियुक्ति की गयी है, मगर ये तमाम पीआरओ मिलकर आज तक एक भी ऐसा केस खोजकर सामने नहीं ला पाये, जिसे साल सौ दिनों का रोजगार मिला हो और उसे समय पर मेहनताना मिल गया हो, या फिर न भी मिला हो पर इस योजना के संचालकों ने उसे सौ दिन की मजदूरी समय पर दे दी हो. अगर एक भी ऐसा केस होता तो देश के सभी अखबारों में यह सक्सेस स्टोरी की तरह चमक न रहा होता. मगर मेरा ऐतराज इसकी सफलता-असफलता से नहीं है, बल्कि इसके सिद्धांत से है. यह कानून रोजगार की गारंटी नहीं देता है बल्कि रोजगार मिले न मिले मेहनताने की गारंटी जरूर देता है. यानी सरकारी खैरात की गारंटी... महात्मा गांधी ने कभी देश के गरीबों के लिए सरकारी खैरात का सपना नहीं देखा था. मगर इक्कीसवीं सदी में गांधी के ब्रांड नेम से राज करने वाले नासमझ लोगों की समाजसेवा का मंत्र खैरात से ही शुरू होता है.
इस खैराती अर्थशास्त्र की शुरुआत सरकार ने किसानों के कर्जमाफी से की थी और अंत खाद्य सुरक्षा कानून से करने जा रही है. ताज्जुब तो इस बात पर होती है कि इस खैराती अर्थशास्त्र का सिद्धांत पेश करने और इसके लिए नित नये कानून बनाने का जिम्मा जिस किचेन कैबिनेट के पास है उसमें ऐसे-ऐसे लोग हैं जो ऊंची-ऊंची नौकरियां छोड़ कर न्यूनतम मजदूरी पर जीवन जीते हुए लोगों की मदद करने के लिए गांवों की खाक छानते थे. मगर इन लोगों ने इस सरकार को गरीबी मिटाने के लिए जितने फार्मूले दिये सबके सब खैरात बांटने वाले ही थे. एक भी ऐसा नहीं था जिसमें गरीब आदमी के सामने मेहनत मजदूरी करके आगे बढ़ने का फार्मूला हो. महात्मा गांधी ने गांव के गरीबों के लिए यह सपना नहीं देखा था. अधिकांश योजनाकार यही सोचते हैं कि इस देश में गरीबी इसलिए है कि लोगों के पास पैसा नहीं है, उन्हें पैसे दे दो गरीबी दूर हो जायेगी. मगर हकीकत तो यह है कि गरीब आदमी खैरात बांटने वाले को हमेशा बेवकूफ समझता है और यही मानता है कि उसने सामने वाले के पैसे ठग लिये. खैरात को वह बिल्ली के भाग से फूटे छीके की तरह देखता है. उसे अपनी गरीबी मिटाने के लिए खैरात या पैसों की जरूरत नहीं है, उसे अगर कुछ चाहिये तो बस समानता और समान अवसर. वह अपनी गलीज जिंदगी में इसलिए फंसा है क्योंकि उसके आसपास के बड़े लोग उसे गलीज हालत से निकलने नहीं देते. वह मेहनत मजूरी करके पैसा कमाता है, मगर मेहनत के ये पैसे महाजन का सूद, डॉक्टर की फीस, मरनी-हरनी, शादी-ब्याह जैसे हजारों छेदों से रिस कर बह जाते हैं.
आजादी के पैंसठ-छियासठ सालों में हुए हजारों आंदोलनों के बावजूद गांवों से पुरानी महाजनी तो खत्म हुई नहीं, दसियों नये किस्म के लुटेरे जरूर पैदा हो गये. बदला अगर कुछ तो सिर्फ इतना ही कि कल तक गांव के जमींदारों के हुक्म पर वोट डालने वाले गरीब अब एक बोतल दारू और पांच सौ की हरी पत्ती पर वोट डालते हैं. चुनाव के एक रात पहले पैसा और शराब बांटने पर चुनाव आयोग की रोक रहती है, मगर चुनाव से आठ-दस महीने पहले मनरेगा का सपना दिखाने और कैश सब्सिडी का गेमचेंजर पेश करने पर कोई रोक नहीं होती. सबसे बड़ी बात तो यह है कि गरीबों के लिए गांवों की गलियां छानने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी यह सब रास आता है.
मनरेगा से पहले क्या नहीं था, और मनरेगा के बाद क्या बदल गया. सिर्फ एक चीज... मजदूरी की दर... इसके अलावा...? राजीव गांधी के समय में भी रुपये में पांच पैसे ही लोगों तक पहुंचते थे, आज भी मनरेगा का पांच पैसा ही मजदूरों तक पहुंच पाता है. किसानों के कर्ज माफी से क्या बदला, किसान कल भी आत्महत्या करते थे, आज भी करते हैं... हां बैंक मैनेजरों और उनके दलालों के दुतल्ले मकानों में मारबल जरूर लग गया. क्या मनरेगा से पहले प्रधानमंत्री रोजगार योजना नहीं थी. इंदिरा आवास योजना में अब 70-75 हजार रुपये मिलने लगे हैं, तो क्या छप्पर के लिए टीन बेचने वाले दुकान बंद हो गये... हां, मुखियाजी ने ईंट का भट्ठा जरूर लगवा लिया.
दरअसल इसी खैराती अर्थव्यवस्था ने देश में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया. पहले ड्राइविंग लाइसेंस, जाति प्रमाण पत्र, चीनी के परमिट और गैस के कनेक्शन के लिए सौ-दो सौ रिश्वत लिये जाते थे. अब करोड़ों-अरबों की परियोजनाएं हैं और 40 फीसदी का कमीशन मंत्री जी के खाते में ही चला जाता है.
संताल परगना के एक लाभुक ने मनरेगा का कुआं तैयार करवाया और उस पर लगने वाले बोर्ड पर हिसाब लिख दिया कि किसे कितना परसेंट पीसी देना पड़ा. अंत्योदय और अन्नपूर्णा जैसी खैराती योजनाएं भी हैं और इसे खैरात की तरह ही बांटा जाता है. इसका लाभ पाने वालों में इतनी हिम्मत नहीं कि देने वाले से कह सके कि भाई साहब वजन चेक कर लें... पेंशन योजनाएं हैं और इन्हें पाने के लिए गांवों और कस्बों के बैंक में महीने के पहले हफ्ते दिन-भर मेला लगा रहता है. विधवाएं और बुजुर्ग सुबह आते हैं और शाम तक पड़े रहते हैं. क्या यह खैरात नहीं...
खैर, इस बजट में चिदंबरम साहब ने न जाने क्या सोचकर मनरेगा का बजट घटा दिया है. देर सवेर इस बात का आकलन भी होगा कि इस मनरेगा से क्या फायदा हुआ. आकलन करने वाले यह भी साबित कर सकते हैं गरीबों का काफी भला हुआ. हालांकि कुछ लोग इस बात का आकलन भी करें कि जितना खर्च हुआ उसके मुकाबले कितना लाभ हुआ. मगर क्या इस बात का भी आकलन होगा कि कितने लोगों को आजन्म रोजगार की गारंटी मिली. कितने लोगों को सूद चुकाने से मुक्ति मिली. कितने भूमिहीनों को खेती के लिए जमीन मिल गयी. अगर आप गांवों में जाते होंगे और गरीबी रेखा से नीचे के लोगों से मिलने का मौका मिलता होगा तो आपने जरूर गौर किया होगा. अगर नहीं किया तो एक ही वर्ग के एक मनरेगा मजदूर और स्वयं सहायता समूह की एक महिला से मुलाकात करें. फिर तय करें कि किसकी जिंदगी बदली और इस बदलाव की खातिर सरकार का कितना पैसा किस योजना के लिए खर्च हुआ. एक-एक, दो-दो रुपये हर हफ्ते जमा करने वाली औरतें कैसे साल भर में महाजनों से मुक्ति पा लेती हैं. और दो-चार सालों में इंटरप्रेण्योर बन जाती हैं. ... और मनरेगा के मजदूर को तो हर साल मनरेगा ही चाहिये होगा.
... और यह फर्क कोई छोटा सा फर्क नहीं है. यही फर्क इस देश की तकदीर साबित होने वाला है. 2005 तक जब इस देश में यूपीए का शासन नहीं शुरू हुआ था इसी स्वयं सहायता समूह को देश की गरीबी मिटाने का सबसे बड़ा फार्मूला माना जाता था. मगर जैसे ही नरेगा कानून बना, इसे ही हर रोग की दवा मान लिया गया. मेहनत, बचत और व्यापार का फार्मूला खारिज होने लगा और नरेगा का खैराती फार्मूला हिट होने लगा. गरीब मेहनतकश से लाभार्थी में बदल गया. इस खैरात ने भ्रष्टाचार को जन्म दिया और भ्रष्टाचार ने हताशा को. आज उसी खैराती फार्मूला का नया दावं है कैश सब्सिडी और फूड सिक्योरिटी. मगर हताशा इतनी फैल गयी है कि हर खैरात गरीबों का मुंह चिढा रहा है...

Saturday, February 23, 2013

अपने पहले प्यार का कत्ल कर देना चाहती थी मैं...


अभी हाल ही में मैंने आपके सामने सोहेला अब्दुलाली की कहानी पेश की थी. किस तरह उस साहसी युवती ने गैंगरेप की घटना का सामना किया और अब वे एक सम्मानित और अपने तरीके से खुशहाल जीवन जी रही हैं. मैंने उस कहानी को इस नजरिये से पेश किया था कि कई दफा युवतियां अपने कौमार्य को ही सबकुछ मान बैठती हैं, उसे बचाने के लिए जान दे देती हैं और या फिर उसके जबरन अपहरण कर लिये जाने के बाद कुंठित जीवन जीती हैं. जबकि कौमार्य ही किसी का जीवन नहीं हो सकता... मगर आज मैंने जब भाई अरविंद शेषजी के ब्लॉग पर सूर्यानेल्ली की उस पीड़ित लड़की की कहानी पढ़ी तो लगा कि स्त्रियों की समस्या का इस तरह साधारणीकरण नहीं किया जा सकता. कई दफा सांस लेना भी उनके बस में नहीं होता. इस आलेख ने मुझे इस पूरे मसले पर दुबारा सोचने के लिए विवश किया है. मैं इसे अरविंद शेष जी की भूमिका टिप्पणी के साथ आपके सामने पेश कर रहा हूं, उनके ब्लॉग से साभार....
रसूख वाले बलात्कारी नहीं होते...
सूर्यानेल्ली में लगातार चालीस दिनों तक बयालीस वहशी धोखेबाज मर्दों ने बर्बरता की सारी हदें पार कर सूर्यानेल्ली की उस सोलह साल की बच्ची को जैसे चाहा रौंदा था और लगभग मर जाने के बाद उसके घर के आसपास फेंक दिया था। वह किसी तरह बच गई और आज तैंतीस साल की उम्र में भी वह अपने आसपास के अंधेरों का सामना करती हुई अपनी लड़ाई को अंजाम देने के लिए अपने बूते खड़ी है। अरुंधति राय ने नहीं भी कहा होता तो भी मैं ठीक वही कहता- हां, वह मेरी हीरोईन है, वह सबकी नायिका है।
फिलहाल हकीकत यह है कि दूरदराज के इलाकों में होने वाली ऐसी तमाम घटनाएं हमारी संवेदना को नहीं झकझोर पाती हैं। सवाल करने वाले कर रहे हैं कि क्या हम केवल तभी परेशान होते हैं जब कोई घटना देश की राजधानी में हो, हमारे अपने वर्ग से जुड़ी हो। वरना दिल्ली में हुई सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद इंडिया गेट के व्यापक आंदोलन से निकले संदेश के बीच इसी दौर में बिहार में सहरसा जिले के एक गांव में किसी दलित और मजदूर परिवार की आठ साल की बच्ची के साथ सामूहिक बलात्कार करके बर्बरता की सारी हदें पार कर मार ही डाला जाता है... महाराष्ट्र के भंडारा में तीन नाबालिग बच्चियों से बलात्कार के बाद उनकी हत्या कर कुंए में फेंक ही जाती है... और इस तरह की तमाम घटनाएं अपनी त्रासदी के साथ लगातार घट ही रही हैं। लेकिन हमारे भीतर कभी भी गुस्सा पैदा नहीं होता... किसी टीवी वाले को इन घटनाओं पर लोगों को आंदोलित करने की जरूरत नहीं पड़ती... इंडिया गेट पर कभी शोक की मोमबत्तियां नहीं जलाई जातीं...!
केरल में सूर्यानेल्ली की यह लड़की किसी तरह जिंदा बच गई थी। अगर देश के सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में दफन कर दिए गए मुकदमे पर सवाल नहीं उठाया होता तो इसमें भी अदालतों ने चुपचाप सभी अपराधियों को पवित्र ब्रह्मचारी घोषित कर ही दिया था। इसके बावजूद इस देश की महान पार्टी कांग्रेस के एक महान और "पवित्र" सांसद पीजे कूरियन यह कह ही रहे हैं कि उनके खिलाफ सीपीएम झूठा प्रचार कर रही है। इस देश में सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की सत्ताधारी पार्टी कूरियन का झंडा उठा कर कूद रही है... सत्ता की दावेदार एक पार्टी अपनी इस बात की फिक्र को दूर करने की फिराक में है कि उसके पूरे गिरोह के भगवा आतंकवाद के आरोप से मुक्त कर दिया जाए...। आगे क्या होगा, सभी अपराधी एक बार फिर से पवित्रीकरण की प्रक्रिया से गुजरेंगे या फिर सूर्यानेल्ली की लड़की पर ढाए गए जुल्म की सजा पा सकेंगे, यह हमारी व्यवस्था, अदालतों, राजनीतिक दलों के रुख पर निर्भर करेगा। लेकिन इसी के साथ राजधानी दिल्ली और ताकतवर मध्यवर्गीय संवेदनाओं से उपेक्षित ये तमाम घटनाएं एक बार फिर सचमुच की समाजी और इंसानी संवेदनाओं की परीक्षा की कसौटी पर भी गुजरेंगी...। रोजाना के अनगिनत ऐसे मामलों की तरह... ।
टाइम्स ऑफ इंडिया में सूर्यानेल्ली की लड़की की यह पीड़ा उसी के शब्दों में प्रकाशित हुई थी। अनुवाद करने की कोशिश मैंने ही की है। अंग्रेजी बहुत अच्छी नहीं है। इसलिए जहां भी जरूरी लगे, एक बार इस लिंक पर क्लिक कर लीजिएगा, लेकिन पढ़िएगा जरूर...
मैं सचमुच अपने पहले प्यार का कत्ल कर देना चाहती थी...
- सूर्यानेल्ली की लड़की
आपने शायद कभी मेरा नाम नहीं सुना हो! मुझे उस पहचान के साथ नत्थी कर दिया है, जिससे मैं छुटकारा नहीं पा सकती- मैं सूर्यानेल्ली की लड़की हूं। पिछले सत्रह सालों से मैं इंसाफ पाने की लड़ाई लड़ रही हूं। कुछ लोग मुझे बाल-वेश्या कहते हैं तो कुछ पीड़ित। लेकिन किसी ने मुझे दामिनी, निर्भया या अमानत जैसा कोई नाम नहीं दिया। मैं कभी भी इस देश के लिए गर्व नहीं बन सकती! या उस महिला का चेहरा भी नहीं, जिसके साथ बहुत बुरा हुआ।
मैं तो स्कूल में पढ़ने वाली सोलह साल की एक मासूम लड़की भी नहीं रह सकी, जिसे पहली बार किसी से प्यार हो गया था। लेकिन उसी के बाद उसने अपनी जिंदगी ही गंवा दी। अब तैंतीस साल की उम्र में मैं रोज °डरावने सपनों से जंग लड़ रही हूं। मेरी दुनिया अब महज उस काली घुमावदार सड़क के दायरे में कैद है जो मेरे घर से चर्च और मेरे दफ्तर तक जाती है।
लोग अपनी प्रवृत्ति के मुताबिक मुझ पर तब तंज कसते हैं जब मैं उन चालीस दिनों को याद करती हूं, जब मैं सिर्फ एक स्त्री शरीर बन कर रह गई थी और जिसे वे जैसे चाहते थे, रौंद और इस्तेमाल कर सकते थे। मुझे जानवरों की तरह बेचा गया, केरल के तमाम इलाकों में ले जाया गया, हर जगह किसी अंधेरे कमरे में धकेल दिया गया, मेरे साथ रात-दिन बलात्कार किया गया, मुझे लात-घूंसों से होश रहने तक पीटा गया।
वे मुझसे कहते हैं कि मैं कैसे सब कुछ याद रख सकती हूं, और मैं हैरान होती हूं कि मैं कैसे वह सब कुछ भुला सकती हूं? हर रात मैं अपनी आंखों के सामने नाचते उन खौफ़नाक दिनों के साथ किसी तरह थोड़ी देर एक तकलीफदेह नींद काट लेती हूं। और मैं एक अथाह अंधेरे गहरे शून्य में बार-बार जाग जाती हूं जहां घिनौने पुरुष और दुष्ट महिलाएं भरी पड़ी हैं।
मैं उन तमाम चेहरों को साफ-साफ याद कर सकती हूं। सबसे पहले राजू आया था। यह वही शख्स था, जिसे मैंने प्यार किया था और जिस पर भरोसा किया था। और उसी ने मेरे प्यार की इस कहानी को मोड़ देकर मुझे केरल के पहले सेक्स रैकेट की आग में झोंक दिया। रोजाना स्कूल जाने के रास्ते में जिस मर्द का चेहरा मेरी आंखें तलाशती रहती थीं, वही उनमें से एक था जिसे मैंने शिनाख्त परेड में पहचाना था और अदालत के गलियारे में मेरा उससे सामना हुआ। उन दिनों... मैं सचमुच उसका कत्ल कर देना चाहती थी। हां... अपने उस पहले प्रेमी का...।
लगभग मरी हुई हालत में उन्होंने मुझे मेरे घर के नजदीक फेंक दिया। लेकिन मेरे दुख का अंत वहीं नहीं हुआ। मेरा परिवार मेरे साथ खड़ा था। मैंने यह सोच कर मुकदमा दायर किया कि ऐसा किसी और लड़की के साथ नहीं हो। मैंने सोचा कि मैं बिल्कुल सही कर रही हूं। लेकिन इसने मेरे पूरे भरोसे को तोड़ दिया। मेरे मामले की जांच के लिए जो टीम थी, वह मुझे लेकर राज्य भर में कई जगहों पर गई। उसने मुझे अनगिनत बार उस सब कुछ का ब्योरा पेश करने को कहा जो सबने मेरे साथ किया था। उन्होंने मुझे इस बात का अहसास कराया कि एक औरत होना आसान नहीं है, वह पीड़ित हो या किसी तरह जिंदा बच गई हो।
मेरे लिए यह राहत की बात है कि दिल्ली की उस लड़की की मौत हो गई। वरना उसे सभी जगह ठीक वैसे ही अश्लील सवालों से रूबरू होना पड़ता जो उसे उस खौफनाक रात को भुगतना पड़ा। इसकी वजह बताने के लिए उसे बार-बार मजबूर किया जाता। और अकेले बिना किसी दोस्त के वह अपनी ही छाया से डरती हुई जिंदगी का बाकी वक्त किसी तरह काटती।
मेरा भी कोई दोस्त नहीं। मेरे दफ्तर में कोई भी मुझसे बात नहीं करना चाहता। मेरे मां-बाप और कर्नाटक में नौकरी करने वाली मेरी बहन ही बस वे लोग हैं जो मेरी आवाज सुन पाते हैं। हां, कुछ वकील, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता भी।
मैंने इन दिनों खूब पढ़ा है। फिलहाल केआर मीरा की एक किताब "आराचार" (द हैंगमैन) पढ़ रही हूं।
मेरे परिवार के अलावा कोई भी नहीं जानता कि मैं अपनी गिरती सेहत को लेकर डरी हुई हूं। लगातार सिर दर्द, जो उन चालीस दिनों की त्रासदी का एक हिस्सा है जब उन्होंने मेरे सिर पर लात से मारा था। मेरे डॉक्टर कहते हैं कि मुझे ज्यादा तनाव में नहीं रहना चाहिए। और मैं सोचती हूं कि सचमुच ऐसा कर पाना दिलचस्प है।
मेरा वजन नब्बे किलो हो चुका है। जब मैं अपनी नौकरी से नौ महीने के लिए मुअत्तल कर दी गई थी, उस दौरान मेरा ज्यादातर वक्त बिस्तर पर ही कटता था और इसी वजह से वजन भी बढ़ता गया। अब मैं कुछ व्यायाम कर रही हूं। पूरी तरह ठीक हो पाना एक सपना भर है। लेकिन कुछ प्रार्थनाएं मुझे जिंदा रखे हुए हैं।
भविष्य पर मेरा यह यकीन अब भी जिंदा है कि एक दिन सब कुछ ठीक हो जाएगा। मैं हर सुबह और रात को प्रार्थना करती हूं। मैं नहीं पूछती कि फिर मुझे ही क्यों...! मैं उन दिनों भी उस पर भरोसा करती रही, जब मैं मुश्किल से अपनी आंखें खोल पाती थी या किसी तरह जिंदा थी। मैंने प्रार्थना की। मैं लैटिन चर्च से आती हूं जो कैथोलिक चर्च में सबसे बड़ा चर्च है। मगर पिछले सत्रह सालों से कहीं भी और किसी भी चर्च में मेरे लिए कोई प्रार्थना नहीं की गई। पवित्र मरियम को कोई गुलाब की माला अर्पित नहीं की गई और न ही कोई फरिश्ता अपने दयालु शब्दों के साथ मेरे दरवाजे पर आया।
लेकिन मेरा भरोसा टूटा नहीं है। इसने मुझे हफ्ते के सातों दिन चौबीसों घंटे चलने वाले टीवी चैनल देखने की ताकत बख्शी है, जहां कानून के रखवाले मुझे बाल-वेश्या बता रहे हैं, और कुछ मशहूर लोग इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि मेरे मुकदमा टिक नहीं पाएगा। यहां तक कि जब मैं दफ्तर में वित्तीय धोखाधड़ी के मामले में फंसाई गई हूं और मेरे माता-पिता बहुत बीमार चल रहे हैं, तब भी मैं खुद को समझाती हूं कि यह भी ठीक हो जाएगा... एक दिन..!!!

Monday, February 04, 2013

नये हिंदुस्तान में आपकी तसवीर कहां है?


मौका महात्मा गांधी की पुण्यतिथि का था और पंचायतनामा के दफ्तर में प्रसिद्ध गांधीवादी विचारक एवं प्रतिष्ठित पत्रिका गांधी मार्ग के संपादक राजीव वोरा संयोगवश उपस्थित थे. वोराजी इन दिनों बिहार में माओवाद प्रभवित इलाकों में अहिंसा के सहारे शांति स्थापित करने के अभियान में जुटे हैं. उन्होंने पंचायतनामा की पूरी टीम और प्रभात खबर के वरिष्ठ संपादकीय सहयोगियों के साथ देश में इन दिनों फैली हिंसा, उसके निवारण के उपाय, देश के मौजूदा हालत के मूल कारण और पंचायती राज व्यवस्था को जनोपयोगी बनाने के मसले पर लंबी बातचीत की.
हिंसा की महिमा बढ़ना है खतरनाक
सबसे पहले उन्होंने अपने मौजूदा अभियान के बारे में बताते हुए कहा कि देश में हिंसक घटनाओं का बढ़ना उतना खतरनाक नहीं है, जितना हिंसा की महिमा का बढ़ना है. हालांकि इस माहौल में लोग त्रस्त भी नजर आ रहे हैं. दरअसल जो हिंसा अन्याय के खिलाफ, अपना गौरव और स्वाभिमान बचाने के लिए गांव में रहने वाले भोले-भाले समुदायों द्वारा की जा रही है उसके बारे में पूरे देश को सोचने की जरूरत है. क्योंकि अगर शरीर का कोई एक हिस्सा कष्ट में है तो दूसरे हिस्से का मौन रह जाना भी एक तरह का अपराध ही है.
लोगों से जुड़ने की है जरूरत
हिंसा की निंदा और अहिंसा का गुणगान करना बड़ा आसान है, मगर आज जरूरत कहीं इससे बड़ी है. हमें यह देखने की जरूरत है कि लोग क्यों परेशान होकर हथियार उठा ले रहे हैं. उनसे बातें करने और उनसे व्यक्तिगत रिश्ता बनाने की जरूरत है. हमने वही काम बिहार के माओवाद प्रभावित इलाकों में करने की कोशिश की है. हम मुजफ्फरपुर, जमुई और बांका के सुदूरवर्ती गांवों में जाकर लोगों से मिल रहे हैं. उनसे बातें कर रहे हैं. उनकी परेशानी समझने और उन्हें यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि वे खुद को अकेला समझने की कोशिश न करें. हम लोग उनके साथ हैं. उन्होंने कहा कि मैं अक्सर लोगों से यह सवाल करता हूं कि इस नये हिंदुस्तान में आपको अपनी तसवीर कहीं नजर आती है क्या? आज तक मुङो कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो यह बताये कि मुङो इस नये हिंदुस्तान में अपनी तसवीर नजर आती है.
ऐसा क्यों?
इस सवाल के जवाब में राजीव वोरा ने कहा कि हिंदुस्तान का आम व्यक्ति आज भी आत्मा केंद्रित है. मुक्ति और मोक्ष आज भी अधिकांश लोगों के मन की मूल भावना है. मगर आज जो कुछ घट रहा है उसने एक आम इंसान के मन में संघर्ष पैदा कर दिया है. वह भौतिक जगत और आत्मिक भाव के संघर्ष में पिस रहा है. मगर जिस इंसान के मन का यह संघर्ष समाप्त हो गया है, या जिसने इसे नोटिस करना बंद कर दिया है, वह शोषक में तब्दील हो गया है. लोग इसलिए भी परेशान हैं कि उनके लिए यह माहौल बड़ा अपरिचित सा है.
आजादी के बाद आये इस बदलाव के कारण क्या हैं?
उन्होंने कहा कि गांधी के समय देश स्व से उपर उठ चुका था. गांधी ने आजादी के बदले देश को स्वराज शब्द दिया. स्वराज का अर्थ सिर्फ आजादी नहीं पूरे सोच में बदलाव से था. उसका अर्थ सत्ता में अंग्रेजों के बदले भारतीयों के आ जाने से नहीं था. इस शब्द से देश को नया उद्देश्य मिला. यह शब्द राष्ट्रीय अस्मिता का रूप ले चुका था. मगर ठीक उसी वक्त जब देश आजाद होने वाला था, उसी वक्त हमारे नये हुक्मरानों ने यह धारा ही मोड़ दी. उन्होंने आजादी के दौरान हुई घटनाओं का जिक्र करते हुए बताया कि किस तरह देश के भविष्य की रूपरेख को लेकर महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू में लगातार मतभेद गहरे होते चले गये थे. कैसे नेहरू ने हिंद स्वराज की अवधारणाओं को खारिज कर दिया था.
गांधी को समझ नहीं पाये हुक्मरान
वोराजी ने बताया कि गांधी जी ने दुनिया के सामने पहली दफा ऐसा राजनीतिक विकल्प पेश किया था, जिसमें आजादी और न्याय एक दूसरे के लिए पूरक साबित हो रहे थे. इससे पहले की व्यवस्थाएं जैसे पूंजीवाद जहां व्यक्तिगत आजादी की तो बात करते हैं मगर न्याय के मसले पर उनका दावा फेल हो जाता है. वहीं साम्यवादी व्यवस्था न्याय की लड़ाई लड़ते हैं मगर व्यक्तिगत आजादी को लेकर उनकी व्यवस्था असफल साबित हो जाती है. दुनिया में साम्यवाद के पतन के पीछे भी यही वजह रही है और आज पूंजीवाद का पतन होगा तो इन्हीं कारणों से. मगर अपने ही देश में लोग गांधी को समझ नहीं पाये.
लोगों में सिर्फ युद्ध के वक्त राष्ट्रभक्ति क्यों जागती है?
हमें समझना पड़ेगा कि राष्ट्रवाद और राष्ट्रभक्ति अलग-अलग चीज है. सेवा की भावना ही असली राष्ट्रभक्ति है. जबकि सैनिक के सिर काटने की घटना पर हमारी उग्र प्रतिक्रिया कतई राष्ट्रभक्ति नहीं है. चैनलों ने इस घटना पर तो एक तरह से स्टूडियो में युद्ध का माहौल पैदा कर दिया था. दरअसल हमारा जीवन इतना अस्थिर हो गया है कि हमें किसी बात के बारे में गंभीरता से सोचने की फुरसत नहीं है. हम हमेशा इस सदमे में रहते हैं कि कब तेल की कीमतें बढ़ जायेंगी और हमारी परिस्थितियां बेकाबू हो जायेंगी.
पंचायती राज बनाम ग्राम स्वराज
पंचायती राज एक व्यवस्था है, एक उपकरण है जो गांव को मिला है. अब इस उपकरण के सहारे हमें गांव को बदलना है. अधिकार संपन्न बनाना है. लोगों में इस भावना को आकार देना है कि यह आपका गांव है और इसे आप ही बेहतर बना सकते हैं. जब यह भावना विकसित होगी तभी ग्राम स्वराज को हासिल किया जा सकेगा. इसके लिए हमें लोगों में सकारात्मक सोच विकसित करने की जरूरत है. और मुङो लगता है कि आप लोग, पंचायतनामा के जरिये यह काम कर रहे हैं.
गांधीवादियों और समाजवादियों के पतन और परिवर्तन
साम्यवाद की समाप्ति के बाद शायद हम सबने वैश्वीकरण के सामने आत्मसमर्पण कर दिया. हमें लगने लगा कि अब कोई रास्ता ही नहीं है. जिस दिन महात्मा गांधी की हत्या हुई, उसके ठीक छह हफ्ते बाद सेवाग्राम में एक बैठक होने वाली थी जिसमें सरकार और स्वतंत्रता सेनानी मिलकर देश की दिशा तय करने से संबंधित नीति तय करने को लेकर बैठक होने वाली थी. गांधी जी तो उस बैठक में नहीं शामिल हो पाये. मगर बैठक हुई. उस बैठक की रिपोर्ट को पढ़कर बड़ी निराशा होती है. (पंचायतनामा में प्रकाशित)