Thursday, January 17, 2013

बंदरों के झुण्ड में फंसा झारखण्ड


झारखंड एक बार फिर से राष्ट्रपति शासन के मुहाने पर है. 12 साल के दौरान यह तीसरा मौका होगा, जब राज्य पर गैर निर्वाचित सरकार का शासन होगा. राजनीतिक अस्थितरता का आलम यह है कि 12 साल में 8 सरकारों का पतन हो चुका है. झारखंड के इन्ही हालात पर 6 जून 2010 को मैंने एक आलेख लिखा था, जो विस्फोट.कॉम पर प्रकाशित हुआ था. वह आलेख मुझे आज भी मौजू लगता है. एक बार फिर से आपके सामने पेश कर रहा हूं...
कुछ साल पहले एक जोरदार पत्रिका शुरू हुई थी, उसमें एक लेख छपा था बंदर के हाथ में बिहार. बिहार की स्थितियों को लेकर इससे बेहतर आलेख आज तक नहीं लिखा गया. आज जब झारखंड की हालत पर नजर डालते हैं तो लगता है कि आज झारखण्ड के बारे में अगर लिखा जाए तो इससे बेहतर कोई दूसरा शीर्षक नहीं हो सकता. बिहार एक बंदर के हाथ में फंसा था तो झारखण्ड कई सारे बंदरों के हाथ में फंस गया है.
दिल्ली में रहनेवाले मेरे डाक्टर भाई पूछ रहे हैं कि भाई झारखंड में इतनी अनस्टेबिलिटी क्यों है! आखिर कभी वहां स्थायी सरकार बनेगी भी या नहीं! यह सवाल सिर्फ दिल्ली में रहने वाले मेरे भाई मुझसे नहीं पूछ रहे, बल्कि झारखंड में रहने वाला या झारखंड की स्थितियों से सहानुभूति रखने वाला हर शख्स एक दूसरे से पूछ रहा है. सरकारें छह माह पूरा नहीं करती हैं कि गिर जाती हैं. चुनी हुई सरकार की विफलता से हताश होकर राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाता है और जब राष्ट्रपति शासन के दौर में भ्रष्टाचार और अराजकता सभी सीमाएं तोडने लगती हैं तो हारकर चुनाव करवा लिए जाते हैं. मगर हर चुनाव का नतीजा वही ढाक के तीन पात खंडित राजनेता, खंडित मुद्दे लिहाजा जनादेश भी खंडित ही नसीब होता है.
आखिर इतनी बदनसीबियों की वजह क्या है! भैया ने जब मुझसे पूछा कि आखिर एक ऐसा राज्य जो संसाधनों से इतना भरा-पूरा है, बिहार से अलग होने पर हर कोई यही सोचता था कि यह राज्य विकास की मंजिलें इतनी तेजी से तय करेगा कि पूरा देश देखता रह जाएगा. मगर ऐसा क्यों हुआ कि यह विकास की रफ्तार में बिहार से भी पिछड गया जिसके पास संसाधन के नाम पर बाढ, सस्ते मजदूर और मेधावी बेरोजगार युवकों के अलावा कुछ नहीं है! हर कोई जानता है कि वजह सिर्फ अस्थिरता है, मगर इस अस्थिरता की वजह क्या है!
इस सवाल के जवाब में अनायास मेरे मुंह से निकल गया कि भैया आपने कभी फल से लदे किसी अमरुद के पेड को स्थिर देखा है! वह स्थिर हो ही नहीं सकता. हमेशा आस-पास के शरारती बच्चे पेड पर लुधके रहते हैं. कुछ लोग पत्थरों से चांदमारी करते हैं तो कुछ लग्गी बनाकर आइजमाइश करते हैं और जो बच्चा सबसे जबरदस्त होता है वह मालिकों की परवाह किए बगैर सीधे पेड पर ही चढ जाता है. ऐसे में वह पेड सुबह से शाम तक हिलता-डोलता, हिंचकोले खाता रहता है. उस पेड को स्थिर रख पाना तब तक मुमकिन नहीं जब तक उसपर फलों की बहुतायत है या उसे कोई दबंग रखवाला नहीं मिल जाता है.
बाद में जब मैंने अपने इस जवाब पर गौर किया तो लगा कि सचमुच मेरे मुंह से अनायास निकला यह जवाब झारखंड के मसले में काफी हद तक सही साबित होता है. दरअसल झारखंड की अस्थिरता और बदहाली के लिए नेताओं की जिम्मेदारी सिर्फ इतनी है कि वे इतने मजबूत और दबंग नहीं हैं कि इस राज्य के अकूत खनिज संसाधनों पर नजर गडाए लालची नजरों और उनकी मदद को तैयार राजनीतिक आकाओं से मुकाबला कर सकें. बाकी तमाम जिम्मेदारी उन कारपोरेटों और माफियाओं की है जो इस राज्य के संसाधन की लूट के लिए घुस आए हैं. उनमें से कइयों के सिर पर केंद्र सरकार के अधिपतियों का हाथ है तो कई माओवादियों की सरपरस्ती में लूट का मजा ले रहे हैं.
यह अब कोई छुपी हुई बात नहीं रही कि हमारे माननीय गृह मंत्री चिदंबरम साहब द्वारा चलाए जा रहे आपरेशन ग्रीन हंट का मुख्य उद्देश्य बड़े उद्योगपतियों को देश के खनिज संपन्न क्षेत्रों में बेधड़क और शांतिपूर्ण खनन की सुविधा उपलब्ध कराना ही है. इसलिए कई बार व्यंग्य स्वरुप आपरेशन ग्रीन हंट को ऑपरेशन मिनरल हंट कह कर भी पुकारा जाता है. मगर जो बाद अब तक सर्वविदित नहीं है वह यह है कि माओवादियों के प्रभुत्व वाले खनिज संपन्न इलाकों में भी जमकर अवैध उत्खनन हो रहा है. इस अवैध उत्खनन की पूरी प्रक्रिया खनन माफियाओं द्वारा संचालित की जा रही है. इस खनन प्रक्रिया को माओवादियों की ओर से पूरा संरक्षण मिला हुआ है. अगर इस तथ्य में सच्चाई नहीं है तो आखिर माओवादियों के निशाने पर कोई खनन माफिया क्यों नहीं होता. वे हमेशा बेगुनाह पुलिस वालों पर ही जोर आजमाइश क्यों करते हैं. क्योंकि ये खनन माफिया माओवादियों को नियमित तौर पर लेवी की मोटी रकम अदा करते हैं. लेवी के पैसों का माओवादी क्या करते हैं यह वे जाने मगर अवैध रुप से उत्खनित खनिज पदार्थो का खनन माफिया क्या करते हैं, यह अब तक सवालों के घेरे में है.
कोयला तो कई बार घरेलू बाजारों में खप जाता है, मगर लौह अयस्क! जानकारों का मानना है कि यह लौह अयस्क बडे पैमान पर तस्करी होता है और चीन तस्करी द्वारा भेजे गए इस लौह अयस्क का बडा बाजार है. बीजिंग ओलंपिक से पहले चीन में लौह अयस्क की बडे पैमाने पर मांग बनी थी, जानकार बताते हैं कि उस दौरान बडे पैमाने पर भारत से लौह अयस्क तस्करी के जरिये नेपाल के रास्ते चीन भेजा गया था. आप गौर करेंगे कि उन दिनों बार-बार रेड कारिडोर का जिक्र होता था. जो नेपाल से बिहार, बंगाल, झारखंड, उडीसा, छत्तीसगढ होते हुए आंध्रप्रदेश तक जाकर खत्म होता था. यह रेड कारिडोर आज भी बना है और इस पूरे कारिडोर पर माओवादियों का एकछत्र राज है.
माननीया अरुंधति राय तवज्ज्जो देंगी, माओवादियों के खिलाफ सरकार की जंग न तो गरीबों के खिलाफ जंग है और न ही सरकार की देश में अमन चैन बहाल करने की सदाशयता. यह तो खनिज पट्टी से माओवादियों को बेदखल कर टाटा, मित्तल और जिंदल जैसे कारोबारियों को स्थापित करने की मुहिम है. चिदंबरम आखिरकार मूलत वित्त मंत्री ही हैं और वे कारोबार की भाषा और कारोबारियों का संकट बेहतर समझते हैं. मंत्री की कुर्सी पांच दस या पंद्रह साल तक ही नसीब होती है और इंतजाम आने वाली दस पीढियों, रिश्तेदारों, चमचों, पार्टी कार्यकर्ताओं और पार्टी के फंड तक के लिए करना पडता है. झारखंड में अब राष्ट्रपति के नाम पर चिदंबरम का राज कायम हो चुका है, मगर इसके रेड कारिडोर पर आज भी माओवादी काबिज हैं. झारखंड में स्थायित्व और विकास का सपना देखने वाले दोस्तों अभी तो लडाई शुरू होने वाली है. अभी तो अमरुद के पेड पर बंदरों का कब्जा है और पेड ताजे पके अमरूदों से लदा है.

Sunday, January 13, 2013

झारखण्ड में एक लेडिज ओनली मेला


कभी ऐसा सुना है कि कोई मेला सिर्फ औरतों का होता है. मेले में मरद लोग नहीं घुस सकते. यहां तक कि दुकान भी औरतें ही लगाती हैं. सरायकेला जिले के मिरगी गांव में लगने वाले मिरगी-चिंगड़ा मेले का स्वरूप महज कुछ साल पहले तक ऐसा ही था. मिरगी गांव झारखंड-ओड़िशा की सीमा पर बसा है. इस गांव में हर साल मकर संक्रांति के बाद पड़ने वाले शुक्रवार और शनिवार को मिरगी चिंगड़ा मेला लगता है. शुक्रवार के दिन लगने वाला मेला तो आम मेले होता है, मगर इसके अगले दिन शनिवार को महिलाओं का मेला लगता है. हाल के कुछ सालों में हालात बदले हैं, अब कई पुरुष भी मेले में आने लगे हैं. इसके बावजूद इसकी पहचान महिलाओं के मेले के तौर पर ही है और इस मेले का इंतजार महिलाएं पूरे साल करती हैं.
अपने समाज का कायदा कानून ऐसा है कि औरतें अक्सर एक-दूसरे से नहीं मिल पातीं. ऐसे में पूरे कस्बे की औरतों के लिए यह एक बेहतरीन सोशल गेदरिंग साबित होता है. यहां उन्हें दूसरे परिवारों और समाजों की औरतों के बारे में एक से एक सूचनाएं मिलती हैं. उन्हंे यह भी पता चलता है कि किसकी बेटी का ब्याह किस गांव में हुआ और किसके घर किस गांव की बहू आई. और यह भी कि बहू अच्छी है या नहीं. ऐसी छोटी-मोटी बातें तो वहां होना लाजिमी है मगर कई बार औरतें इस मेले से अपने लिये बहू तक ढूंढ लाती हैं.
इस मेले के बारे में कई पौराणिक मान्यताएं प्रचलित हैं. अधिवक्ता और स्थानीय इतिहास में रुचि रखने वाले विश्वनाथ रथ बताते हैं कि खरकई नदी के तट पर बसे मिरगी गांव की भौगोलिक स्थिति बड़ी रोचक है. दक्षिण से उत्तर की ओर बहने वाली यह नदी इस जगह पश्चिम से पूरब की ओर घूम जाती है. ऐसी जनश्रुति है कि पहले भगवान जगन्नाथ का मंदिर यहीं बनने वाला था. इसके लिए देवताओं ने एक बार रात के वक्त इसी जगह पर बैठक की. मगर यहां मंदिर बनाया जाय या नहीं इस मुद्दे पर देवताओं के बीच अलग-अलग राय थीं. ऐसे में पूरी रात चर्चा चलने के बावजूद कोई फैसला नहीं हो पाया और सुबह हो गयी. सवेरा होते ही बैठक में भगदड़ मच गई, दरअसल देवताओं को सुबह होने से पहले ही मृत्युलोक छोड़ देना था ताकि इनसान उन्हें देख न पाएं. ऐसे में हड़बड़ी में देवताओं के कई चित्र वहीं छूट गए. आज भी वहां नदी के तट पर पत्थरों पर कई चित्र ऐसे बने हैं जैसे देवताओं के शस्त्र या अन्य चीजें हों. वैसे भूवैज्ञानिकों का कहना है कि ये नदी की धारा के कारण बने निशान हैं. बहरहाल असलियत जो भी हो, इन्हीं चित्रों के कारण यह स्थल लंबे समय से लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है और हर साल यहां मेला लगता है.
एक अन्य जानकार अवकाश प्राप्त शिक्षक नलिन कांत सत्पथी दूसरी ही कहानी बताते हैं. उनकी कहानी के पात्र पांडव और कुंती हैं. वनवास के दौरान विराट नगर जाते वक्त कुंती और पांडव तीन-चार दिनों के लिए मिरगी गांव में खरकई नदी के तट पर ठहरे थे और वहां मौजूद चित्र उन्हीं पांडवों और कुंती के बताए जाते हैं. दरअसल वहां पहले दिन लगने वाला मेला पांडवों के स्वागत में आयोजित होता है जबकि दूसरे दिन जब पांडव दिन के वक्त अपनी मां को अकेला छोड़ कर कहीं चले गए थे, बहुत संभव है भिक्षाटन के लिए. उस इलाके की औरतें माता कुंती का साथ देने और उनसे मुलाकात करने वहां गई थीं जिस कारण मेले के दूसरे दिन महिलाओं का मेला लगने लगा.
वैसे मेले के इतिहास के बारे में सबसे प्रमाणिक जानकारी सरायकेला रियासत के एक ¨प्रस ब्रजभानु सिंहदेव की लगती है. वे बताते हैं, यह मिरगी चिंगड़ा मेला किसी जाति या समुदाय विशेष का मेला नहीं है और न ही इसका कोई धार्मिक आधार. सही अर्थों में फसलों की कटाई के बाद मौज-मस्ती और सामाजिक जुड़ाव को केंद्र में रखते हुए इस मेले की शुरुआत हुई होगी. करीब साढ़े-तीन सौ साल पहले इस मेले की शुरुआत सरायकेला इस्टेट की रानियों और कस्बे की अन्य औरतों ने की है. कला और संस्कृति से जुड़ाव रखने वाला उनका खानदान हमेशा से स्त्रियों के प्रति संवेदनशील नजरिया अपनाता रहा है और हमेशा उनकी भावनाओं को तरजीह देने की कोशिश की जाती रही है. चूंकि खरकई नदी के तट पर बसा मिरगी गांव इस इलाके का सबसे रमणीय स्थल है, इसलिए फसलों की कटाई के बाद लगने वाले मेले के लिए उसी जगह को चुना गया. पहले तो वहां सामान्य मेले लगते रहे होंगे, मगर आने वाले दिनों में स्त्रियों ने अपने लिए एक स्वतंत्र मेले की जरूरत महसूस की जहां वे पुरुषों के प्रभाव से मुक्त होकर पूरा दिन हंसते-खेलते गुजार सके. संभवत: इसी तरह इस अनोखे मेले की शुरुआत हुई. सिंहदेव बताते हैं कि पहले मेला स्थल को हमारे सिपाही चारो ओर से घेरे रहते थे ताकि कोई अवांछित तत्व वहां प्रवेश न कर पाएं. मेले के अंदर सातवीं कक्षा तक के बच्चे वालेंटीयर के रूप में मौजूद रहते थे जो मेले में महिलाओं को विभिन्न कार्यों में सहयोग किया करते थे. सिंहदेव ने बताया कि दस साल की उम्र तक वे भी इस मेले में शामिल होते रहे हैं, बाद में उनके पिता ने उन्हें मना कर दिया. (पंचायतनामा में प्रकाशित)

Sunday, January 06, 2013

कंफ्यूशियस, बलात्कार, इज्जत और सोहेला


प्रसिद्ध चीनी दार्शनिक कन्फ्यूशियस बलात्कार के बारे में कहा है कि अगर कोई स्त्री बलात्कारियों के चंगुल में फंस जाये तो पहले तो उसे उन बलात्कारियों का विरोध करना चाहिये. पर जब लगे कि विरोध करने से भी उनके इरादे बदले नहीं जा सकते, तो फिर स्त्री को बलात्कार का मजा लेना चाहिये. निश्चित तौर पर यह एक बहुत क्रूर सलाह है. क्योंकि मजा तो स्त्रियां अपने पति की जबरदस्ती का भी नहीं ले पातीं. हालांकि वे अनिच्छा से बरसों इसे झेलती रहती हैं. अधिकांश मामलों में मना भी नहीं करतीं और पति समझ भी नहीं पाता कि इतने सालों तक उसने अपनी पत्नी के साथ जो किया वह प्रेम नहीं बल्कि शारिरिक अत्याचार था. खैर, वह अलग संदर्भ है, यहां संदर्भ दूसरा है. अत्यधिक क्रूर होने के बावजूद मेरे मन में कंफ्यूशियस की यह उक्ति सालों से चक्कर खा रही है. हाल की घटनाओं के बाद छिड़ी बहस में कई दफा मैंने चाहा कि इन पंक्तियों को अपने मित्र समुदाय के बीच सोशल मीडिया में साझा करूं मगर हर बार कुछ सोच कर अपना इरादा बदल देता. पर दो दिन पहले एक बलात्कार पीड़ित युवती का आलेख पढ़ने को मिला. सोहेला अब्दुलाली, उनके साथ 1983 में गैंगरेप हुआ था. बाद में मानुषी नामक पत्रिका में उन्होंने एक आलेख लिखा जिसमें उन्होंने गैंगरेप के अपने अनुभव और रेप से संबंधित दूसरी बातों के बारे में लिखा है. कई मित्रों की तरह मैं भी मानता हूं कि यह मस्ट रीड टाइप आलेख है. इसलिए मूलतः अंग्रेजी में लिखे गये इस आलेख का मैंने हिंदी में अनुवाद किया है.
मगर इस आलेख से पहले कुछ अपनी बात भी कहना चाहूंगा. खास तौर पर कंफ्यूशियस की उस उक्ति के संदर्भ में. कंफ्यूशियस को चीन में कमोबेस वही स्थान हासिल है जो अपने देश में चाणक्य और पश्चिमी देशों में मैकियावेली को. वे सीधी सपाट और बेलाग शब्दों में समाधान पेश करते हैं. अगर मुझे उनकी उस उक्ति पर कुछ कहना हो तो सिर्फ इतना कहूंगा कि मजा लेने के बदले अगर उन्होंने झेल लेना लिखा होता यह और भी सटीक होता. क्योंकि मेरे हिसाब से बलात्कार कतई एक क्षुद्र किस्म की क्षति से अधिक नहीं है. इतनी भी नहीं कि इसे आपकी कानी उंगली के कटने के बराबर माना जाये. हालांकि मैं यहां स्पष्ट करना चाहूंगा कि मैं यह बात क्षति के संदर्भ में कह रहा हूं, न तो यंत्रणा के संबंध में और न ही अपराध के मसले पर नहीं.
किसी भी व्यक्ति की यौन स्वतंत्रता के अतिक्रमण को एक सर्वाधिक घृणित अपराध के रूप में देखा जाना चाहिये, और उसके लिए कड़ी से कड़ी सजा होनी ही चाहिये. मगर साथ ही इस क्षति के आकलन पर पुनर्विचार भी करने की जरूरत है. क्योंकि यह पुनर्विचार उसके लिए अपराध का सामना करते वक्त और उसके बाद के जीवन के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है. अधिकांश पीड़ित महिलाएं विरोध करते वक्त बड़ा शारिरिक नुकसान झेलती हैं, जैसा कि इस केस में हमने देखा कि उस युवती को जान तक गंवानी पड़ी. कई पीड़ित बाद में जान दे देती हैं, क्योंकि उनकी और समाज की नजर में बलात्कार का अर्थ उनकी इज्जत का चला जाना है. और इसके बाद जीना निर्रथक होता है. मगर क्या सचमुच यह इतना निर्रथक है. इस दुनिया में स्टीफन हाकिंग्स जैसा शारिरिक तौर पर अक्षम व्यक्ति अपनी हर महत्वाकांक्षा की पूर्ति करते हुए जी सकता है, वहां एक दफा किसी यौन कुंठित अपराधी के हमले के बाद कोई भला ऐसा क्या हो जाता है कि कोई व्यक्ति जीने लायक नहीं बचता है.
इज्जत, यह जो शब्द है. बहुत पुराना और सर्वव्यापी शब्द है. हमारी दुनिया में बलात्कार ही एकमात्र ऐसा अपराध है जिसमें दोषी की इज्जत का तो पता नहीं, पीड़ित की इज्जत निश्चित तौर पर चली जाती है. देश में चल रहे महिला आंदोलनों ने कभी इस सवाल को बहुत गंभीरता से नहीं देखा, आज भी वे बलात्कार के बाद पीड़ित को हुई मानसिक क्षति को काफी बड़ा मानकर उसके लिए सजा की मात्रा बढ़ाने की मांग कर रही हैं. मगर वे कतई यह नहीं सोचतीं कि इस अपराध को सबसे पहले इज्जत के ठप्पे से मुक्त करने की जरूरत है. यह जो इज्जत इस अपराध के बाद जाती है, वह किसकी है? उस औरत की कतई नहीं जो शादी के बाद इस इज्जत को अपने पति को समर्पित कर देती है. यह इज्जत उस पुरुष की है, जिसे समाज पिता-भाई और पति के तौर पर स्त्री का स्वामी समझता है. इस समाज में औरतों का यौन संक्रमण उसकी इज्जत से जुड़ा है, जबकि पुरुषों का यौन संक्रमण हाल-हाल तक घर की औरतों द्वारा ही नजरअंदाज कर दिया जाता रहा है.
सबसे पहले तो इज्जत के इस दोहरे मानदंड को खत्म करने की जरूरत है. रेप एक हादसा है इससे अगर किसी की इज्जत जाने की संभावना होनी चाहिये तो उस रेपिस्ट की जो किसी स्त्री के साथ दुर्व्यवहार करता है. ठीक उसी तरह जैसे एक चोर, एक पाकेटमार, एक घोटालेबाज की इज्जत चली जाती है. एक बार यह तथ्य स्थापित हो जाये तो फिर स्त्री जाति के लिए बलात्कार के हमले का सामना और उसके बाद का जीवन आसान हो जायेगा. फिर स्त्रियां यौन हमलों का सामना दृढ़ता से कर पायेंगी.
अब आपके सामने पेश है सोहेला का यह आलेखः
“मैंने अपनी जिंदगी के लिए लड़ा... और जीत हासिल की” – सोहेला अब्दुलाली
तीन साल पहले मेरा गैंगरेप हुआ था, उस वक्त मैं 17 साल की थी. मेरा नाम और मेरी तसवीर इस आलेख के साथ प्रकाशित हुए हैं. 1983 में मानुशी पत्रिका में. मैं बंबई में पैदा हुई और आजकल यूएसए में पढ़ाई कर रही हूं. मैं बलात्कार पर शोधपत्र लिख रही हूं और दो हफ्ते पहले शोध करने घर आयी हूं. हालांकि तीन साल पहले भी जब मेरे साथ यह हुआ था, मैं रेप, रेप के अभियुक्तों और पीड़ितों को लेकर लोगों में फैली गलत धारणाओं के बारे में समझती थी. मुझे उस ग्रंथि का भी पता था जो पीड़ित के मन के साथ जुड़ जाती हैं. लोग बार-बार यह संकेत देते हैं कि अमूल्य कौमार्य को खोने से कहीं बेहतर मौत है. मैंने इसे मानने से इनकार कर दिया. मेरा जीवन मेरे लिए सबसे कीमती है.
मैंने महसूस किया है कि कई महिलाएं इस ग्रंथि के कारण चुप्पी साध लेती हैं, मगर अपने मौन के कारण उन्हें अपार वेदना का सामना करना पड़ता है. पुरुष पीड़ितों को कई वजहों से दोषी ठोहराते हैं और हैरत की बात तो यह है कि कई दफा महिलाएं भी पीड़ितों को ही दोषी ठहराती हैं, संभवतः आंतरिक पितृसत्तात्मक मूल्यों के कारण, संभवतः खुद को ऐसी भीषण संभावनाओं से बचाये रखने के लिए.
यह घटना जुलाई की एक गर्म शाम की घटी. उस साल महिलाओं का समूह रेप के खिलाफ कानून में संशोधन की मांग कर रहा था. मैं अपने दोस्त राशिद के साथ थी. हम लोग घूमने निकले थे और बंबई की उपनगरी चेंबूर स्थित अपने घर से करीब डेढ़ मील दूर एक पहाड़ी के पीछे पहुंच गये थे और वहां बैठे थे. हम पर चार लोगों ने हमला किया, वे लोग दरांती से लैस थे. उन्होंने हमारे साथ मारपीट की, पहाड़ी पर चढ़ने के लिए मजबूर किया और वहां हमें दो घंटे तक बिठाये रखा. हमें शारीरिक और मानसिक तौर पर प्रताड़ित किया गया, और जैसे ही अंधेरा गहराया, हमें अलग कर दिया गया और अठ्ठाहस करते हुए उन्होंने राशिद को बंधक बनाकर मेरे साथ रेप किया. हममें से कोई प्रतिरोध करता तो दूसरे को वे चोट पहुंचाते. यह एक प्रभावी तरीका था.
वे तय नहीं कर पा रहे थे कि वे हमारी हत्या करें या नहीं. हमें अपने दम भर वह सब कुछ किया जिससे हम जिंदा बच जायें. मेरा जिंदा बचना था और वह हर चीज से अधिक महत्वपूर्ण था. मैं पहले उन लोगों का शारीरिक रूप से प्रतिरोध किया और जब मुझे गिरा दिया गया तो मैं शब्दों से प्रतिरोध करने लगी. गुस्से और चीखने-चिल्लाने का कोई असर नहीं हो रहा था, इसलिए मैंने बड़बड़ाना शुरू कर दिया, मैं उन्हें प्रेम, करुणा और मानवता के लिए प्रेरित करने लगी, क्योंकि जिस तरह मैं इंसान थी, वे भी तो इंसान ही थे. इसके बाद उनका रवैया नर्म पड़ने लगा, खास तौर पर उनका जो उस वक्त मेरे साथ बलात्कार नहीं कर रहे थे. मैंने उनमें से एक से कहा कि अगर मुझे और राशिद को जिंदा छोड़ दिया गया तो मैं अगले दिन उनसे मिलने आउंगी. हालांकि इन शब्दों के बदले मुझे कहीं अधिक भुगतना पड़ा, मगर दो जिंदगियां दांव पर थीं. यही एकमात्र तरीका था कि मैं वहां से लौट पाती और अगली दफा खुद को रेप से बचा पाती.
जिसे बरसों की पीड़ा कहा जा सकता है उसे झेलने के बाद(मुझे लगता है मेरा 10 बार बलात्कार किया गया और कुछ देर बाद मैं यह समझना भूल गयी कि क्या हो रहा है), हमें जाने दिया गया. जाते वक्त उन लोगों ने हमें एक नैतिक उपदेश के साथ विदा किया कि मेरा एक लड़के के साथ इस तरह घूमना अनैतिक था. इस बात ने उन्हें सबसे अधिक नाराज किया था. उन्होंने ऐसा मेरे हित में ही किया था, वे मुझे एक पाठ पढ़ाना चाहते थे. यह बड़ी कट्टर किस्म की नैतिकता थी. उन्होंने हमें पहाड़ के नीचे छोड़ दिया और हम लड़खड़ाते हुए अंधेरी सड़क पर चलते रहते, एक-दूसरे पर टगते हुए और धीरे-धीरे चलते हुए. वे कुछ देर तक हमारा पीछा करते रहे, दरांती हिलाते हुए, और वह संभवतः सबसे बुरा पहलू था कि भागना इतना आसान था मगर मौत हमारे उपर ठहल रही थी. अंततः हम घर पहुंचे, टूटे हुए, क्षत-विक्षत, चूर-चूर. यह बच कर आने का एक अतुलनीय अनुभव था, अपने जीवन के लिए मोलभाव करना, हर शब्द तोलकर बोलना क्योंकि हम उन्हें नाराज करने की कीमत जानते थे, दरांती का वार कभी भी हमारे जीवन को समाप्त कर सकती थी. हमारी हड्डियों और हमारी आंखों में राहत दौड़ रही थी और हम ऐतिहासिक विलाप के साथ ढेर हो गये.
मैंने बलात्कारियों से वादा किया था कि मैं इस बात को किसी और से नहीं बताउंगी, मगर घर पहुंचते ही सबसे पहले मैंने अपने पिता से कहा कि वे पुलिस को बुलाएं. वे इस बात को सुनकर चिंतित हो गये. मैं परेशान थी कि किसी और को उस अनुभव से नहीं गुजरना पड़े जिससे मुझे गुजरना पड़ा था. पुलिस असंवेदनशील थी, घृणित भी और वह किसी तरह मुझे दोषी साबित करने पर तुली थी. जब मैंने कहा कि मेरे साथ क्या हुआ, तो मैंने सीधे-सीधे कह डाला और इस बात को उन्होंने मुद्दा बना लिया कि अपने साथ हुए इस हादसे को बताने में मैं शर्मा नहीं रही थी. जब उन्होंने कहा कि इस बात का प्रचार हो जायेगा तो मैंने कहा, कोई बात नहीं. मैं इमानदारी से कभी यह सोच नहीं सकी थी कि मुझे या राशिद को दोषी माना जायेगा. जब उन्होंने कहा कि मुझे मेरी सुरक्षा किशोर रिमांड होम भेजा जायेगा. मुझे बलात्कारियों और दलालों के बीच रहना होगा ताकि मुझ पर हमला करने वालों को न्याय के सामने लाया जा सके.
बहुत जल्द मैंने समझ लिया कि इस कानून व्यवस्था के तहत महिलाओं के लिए न्याय मुमकिन नहीं है. जब उन्होंने पूछा कि हम पहाड़ी के पीछे क्या कर रहे थे तो मैं क्रुद्ध हो गयी. जब उन्होंने राशिद से पूछा कि वह क्यों निष्क्रिय हो गया, तो मैं चीख पड़ी. क्या वे यह नहीं समझते थे कि राशिद का प्रतिरोध मेरे लिए और पीड़ा का कारण बन सकता था. वे ऐसे सवाल क्यों पूछते थे कि मैंने कैसे कपड़े पहने थे, राशिद के शरीर पर कोई चोट का निशान क्यों नहीं है (पेट पर लगातार हमले के कारण उसे इंटरनल ब्लीडिंग हो रही थी), मैं दुख और निराशा में डूबने लगी, और मेरे पिता ने उन्हें घर से बाहर भगा दिया यह कहते हुए कि वे उनके बारे में क्या सोचते हैं. यह वह सहायता थी जो मुझे पुलिस से मिली. पुलिस ने बयान दर्ज किया कि हम टहलने गये थे और लौटते वक्त देर हो गयी.
उस बात के तीन साल हो गये हैं, मगर ऐसा एक दिन भी नहीं बीता जब मुझे इस बात ने परेशान नहीं किया कि उस दिन मेरे साथ क्या हुआ. असुरक्षा, भय, गुस्सा, निस्सहायपन- मैं उन सब से लड़ती रही. कई दफा, जब मैं सड़क पर चलती थी और अपने पीछे कोई पदचाप सुनायी पड़ती तो मैं पसीने-पसीने होकर पीछे देखती और एक चीख मेरे होठों पर आकर ठहर जाती. मैं दोस्ताना स्पर्श से परेशान हो जाया करती, मैं कस कर बंधे स्कार्फ को बर्दास्त नहीं कर पाती, ऐसा लगता कि मेरे गले को हाथों ने दबा रखा है. मैं पुरुषों की आंखों में एक खास भाव से परेशान हो जाती- और ऐसे भाव अक्सर नजर आ जाते.
इसके बावजूद कई दफा मैं सोचती कि मैं अब मजूबत इंसान हूं. मैं अपने जीवन की सराहना पहले से अधिक करती. हर दिन एक उपहार था. मैंने अपने जीवन के लिए संघर्ष किया था और मैं जीती थी. कोई भी नकारात्मक भाव मुझे यह सोचने से रोकती कि यह सकारात्मक है.
मैं पुरुषों से घृणा नहीं करती. ऐसा करना सबसे आसान था, और कई पुरुष ऐसे विभिन्न किस्म के दबाव के शिकार थे. मैं जिससे नफरत करती वह पितृसत्ता थी और उस झूठ की विभिन्न परतों से जो कहती कि पुरुष महिलाओं से बेहतर होते हैं, पुरुषों के पास अधिकार हैं जो महिलाओं के पास नहीं, पुरुष हमारे अधिकार संपन्न विजेता हैं. मेरी नारीवादी मित्र सोचतीं कि मैं महिलाओं के मसले पर इसलिए चिंतित हूं क्योंकि मेरा रेप हुआ है. मगर ऐसा नहीं है. रेप उन तमाम प्रतिक्रियाओं में से एक है जिसकी वजह से मैं नारीवादी हूं. रेप को किसी खाने में क्यों डाला जाये? ऐसा क्यों सोचा जाये कि रेप ही अकेला अवांछित संभोग है? क्या हर रोज गलियों में गुजरते वक्त हमारा रेप नहीं होता? क्या हमारा रेप तब नहीं होता जब हमें यौन वस्तु के तौर पर देखा जाता है, हमारे अधिकारों से इनकार कर दिया जाता है, कई तरीकों से दबाया जाता है? महिलाओं के दमन को किसी एक नजरिये से नहीं देखा जा सकता है. उदाहरण के लिए, वर्ग विश्लेषम आवश्यक है, मगर क्यों बहुत सारे बलात्कार अपने ही वर्ग में किये जाते हैं.
जब तक महिलाएं विभिन्न तरीकों से दमित की जाती हैं. सभी महिलाएं लगातार बलात्कार के खतरे में हैं. हमें रेप को पेचीदा बनाने से रोकना पड़ेगा. हमें समझना पड़ेगा कि यह हमारे चारो तरफ अस्तित्व में है, और इसके विभिन्न स्वरूप हैं. हमें इसे गुप्त तौर पर दफन करना बंद कर देना होगा और इसे अपराध के एक रूप के तौर पर देखना होगा- इसे हिंसात्मक अपराध मानना होगा और बलात्कारी को अपराधी के तौर पर देखना होगा. मैं उत्साहपूर्वक जीवन जी रही हूं. बलात्कार का शिकार होना बहुत खौफनाक है, मगर जिंदा रहना कहीं अधिक महत्वपूर्ण है. मगर जब एक औरत को इसे महसूस करने से रोका जाता है, इसे तो हमारे तंत्र की गड़बड़ी माना जाना चाहिये. जब कोई बेवकूफ बनकर जिंदगी के एवज में खुद पर हमले को झेल लेती है तो किसी को ऐसा नहीं सोचना चाहिये कि वह स्वेच्छा से मार खाना चाहती थी. बलात्कार के मामले में एक औरत से पूछा जाता है कि उसने ऐसा क्यों होने दिया, उसने प्रतिरोध क्यों नहीं किया, कहीं उसने इसका मजा तो नहीं लिया.
रेप किसी खास समूह की औरतों के साथ नहीं होता और न ही रेपिस्ट एक खास तरह के पुरुष होते हैं. रेपिस्ट एक क्रूर पागल भी हो सकता है और पड़ोस में रहने वाला लड़का भी या एक दोस्ताना अंकल भी. हमें अब रेप को किसी अन्य महिला की समस्या के तौर पर देखना बंद करना होगा. इसे हमें सार्वभौमिक तरीके से देखना होगा और एक बेहतर समझ की तरफ बढ़ना होगा. जब तक रिश्तों का आधार शक्तियां होंगी, जब तक महिलाओं को पुरुषों की संपत्ति के तौर पर देखा जाता रहेगा, हम लगातार अपनी इज्जत गंवाने के खतरे में रहेंगे. मैं बचकर निकली हूं. मैं रेप किये जाने के लिए नहीं कहती और न ही मैंने इसका मजा लिया. यह एक सबसे बुरा किस्म का टार्चर है. मगर यह महिलाओं की गलती नहीं है.
आज सोहेला लिखती हैं, पढ़ती हैं और घूमती हैं. उसके दो उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं. द मैडवुमन ऑफ जोगर एंड इयर ऑफ टाइगर, बच्चों की तीन किताबें, और कई छोटी कहानियां, लेख, खबरें, ब्लाग, कॉलम, मैनुअल आदि वे लिख चुकी हैं. उनके लिखित सामग्रियों को उनकी साइट www.sohailaink.com पर देखा जा सकता है.

Thursday, January 03, 2013

अपने ही कानून का सम्मान नहीं करती सरकार : दयामनी बारला


सामाजिक कार्यकर्ता दयामनी बारला लंबे समय तक जेल में रहने के बाद अब बाहर आ चुकी हैं. नगड़ी के मसले पर उनका संघर्ष और विस्थापन के मुद्दे पर उनके बेबाक ख्याल झारखंड के लोगों के लिए हमेशा से प्रेरणा के स्रोत रहे हैं. होटल में काम करते हुए जीवन की शुरुआत करने वाली दयामनी बारला ने पहले पत्रकारिता फिर पूरे आदिवासी समुदाय के लिए संघर्ष को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया. उन्होंने हमेशा सच की लड़ाई लड़ी, जो देखा उसे लिखा, और जो लिखा उसके लिए संघर्ष किया. आरटीआई को हथियार बनाकर उन्होंने कई मौकों पर गांव के लोगों को उनका हक दिलाया. सरकार उन्हें विद्रोहिनी मानती है, मगर दयामनी कहती हैं कि वे कतई सरकार, सत्ता या व्यवस्था के खिलाफ नहीं हैं. वे तो बस उनसे उनके ही बनाये नियमों का इमानदारी से पालन करने की अपेक्षा रखती हैं. आज जब झारखंड के किसानों की जमीन पर औद्योगिक घरानों की काली नजर है, ऐसे में दयामनी बारला गरीब और मासूम किसानों का सबसे बड़ा सहारा हैं. नगड़ी आंदोलन ने उनके संघर्ष को नयी धार दी है. आज जब साल 2013 हमारे दरवाजे पर दस्तक दे चुका है तो झारखंड के किसानों के मन में अपनी जमीन को लेकर कई तरह की आशंकाएं हैं. उन्हीं आशंकाओं और उससे निबटने के उपायों पर पंचायतनामा के लिए मैंने उनसे लंबी बातचीत की. पेश है इस बातचीत के प्रमुख अंश:
नगड़ी के आंदोलन को आप किस रूप में देखती हैं?
नगड़ी का आंदोलन दूसरे आंदोलनों से बिल्कुल अलहदा है. इसी आंदोलन में मैंने पहली बार देखा कि फौज जमीन एक्वायर करने आयी है. इससे पहले नेतरहाट के पायलट प्रोजेक्ट वाले आंदोलन में भी मैंने ऐसा नजारा नहीं देखा था. यही वह आंदोलन है जिसमें पीड़ित किसानों ने सरकार के सामने विकल्प पेश किया. 15 सौ एकड़ जमीन का टुकड़ा दिखाया जहां सरकार चाहे तो शैक्षणिक संस्थान बनवा सकती है. यही वह आंदोलन है जिसमें सरकार खुद अपने स्टैंड को ही बार-बार खारिज कर रही है. सरकार कहती है कि 1957-58 में ही उसने इस जमीन को बीएयू के विस्तार के लिये एक्वायर कर लिया है. इसके बावजूद उसी जमीन के लिएवह गांव वालों से 2012 तक रेवेन्यू वसूल कर रही है. यह कैसे हो सकता है. खुद बीएयू कह रहा है कि उसने जमीन का पैसा नहीं चुकाया है. अगर पैसा नहीं चुकाया है तो वे जमीन कैसे एक्वायर कर सकते हैं. खैर, यह सब तो विसंगतियां हैं. सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि सरकार खेती की जमीन के पीछे क्यों पड़ी है जबकि राज्य की आधी से अधिक जमीन बंजर है. कई खदान भी खुदाई हो जाने के बाद बेकार प.डे हैं. ऐसी जमीनों को विकसित कर उसका अधिग्रहण करने के बजाय सरकार किसानों की उपजाऊ जमीन पर नजर गड़ाये बैठी है. मैं पूछती हूं अगर खेती की जमीन बांट दोगे तो खाओगे क्या? अत्र का सम्मान करना सीखो, कंकड़ के लिएमत जान दो. हाल ही में पर्यावरण मंत्रालय की रिपोर्ट पढ.कर बड़ी खुशी हुई कि उसका भी मानना है कि शैक्षणिक संस्थान बंजर और जंगली इलाकों में खुलना चाहिये, न कि खेतिहर जमीन पर. मैं आइआइएम के निदेशक की भी शुक्रगुजार हूं, जिन्होंने कहा कि नगड़ी की जमीन कृषि भूमि है. हम वहां अपना संस्थान नहीं खोलना चाहते.
विस्थापन के खिलाफ संघर्ष को ही आपने अपने जीवन का लक्ष्य क्यों बनाया?
मैं विस्थापन विरोधी आंदोलनों से किसी भावनात्मक कारणों से नहीं जुड़ी. मैंने हमेशा तथ्यों और आंकड़ों को अधिक महत्व दिया. जब तथ्य और आंक.डे इस बात की गवाही देने लगे कि लोगों के साथ बड़ा अन्याय हो रहा है, तभी मैंने यह राह चुनी. कोयलकारो से लेकर नगड़ी तक के सभी आंदोलनों में मैंने यही तरीका अपनाया. हर बार मैंने सरकारी दस्तावेजों को पढ.ा, नक्शे का अध्ययन किया. जैसे कोयलकारो परियोजना में मैंने इसके डीपीआर का अध्ययन करने पर पाया कि इस परियोजना से 2.5 लाख लोग बेघर होंगे, 55 हजार एकड़ जमीन डूबेगी और इसमें 27 हजार एकड़ धान की एक नंबर जमीन होगी. नेतरहाट आंदोलन में भी इसी तरह मैंने डीपीआर देखा तो पाया कि साथियों की बात सही है, लोगों की लड़ाई जायज है. उन दिनों मैं प्रप्रभात खबर में खबरें लिख रही थीं. मैंने 1999 में एनएचपीसी के एक अवकाश प्राप्त इंजीनियर के हवाले से एक खबर लिखी, तो उसके जवाब में एनएचपीसी के डायरेक्टर ने बयान दिया कि दयामनी लोगों को बरगला रही है. इसी बात ने मेरा जीवन बदल दिया. मुझे लगा कि अगर मैं सच कह रही हूं तो इस सच के सर्मथन में कुछ आंक.डे, कुछ तथ्य भी होने चाहिये. फिर मैंने राज्य की तमाम बड़ी परियोजनाओं से विस्थापित लोगों के जीवन की पड़ताल शुरू कर दी.
इस दौरान आपने कहां-कहां के विस्थापितों से संपर्क किया?
शुरुआत मैंने एचइसी के विस्थापितों से की फिर चांडिल डैम के विस्थापितों की खोज-खबर ली. दोनों जगह मैंने देखा कि लोग बहुत बुरी हालत में जीवन जी रहे हैं. मैंने इन पर खबरें भी लिखीं जो प्रप्रभात खबर में प्रमुखता से प्रकाशित हुईं. फिर मेरी रुचि बढ.ती गयी, यूसिल, बोकारो स्टील प्लांट, तेनुघाट के विस्थापितों की खोजबीन की. सरकार ने इन लोगों को विकास के नाम पर विस्थापित किया था और इनके सर्मथन में लड़ने वालों को वह विकास विरोधी कहती है. मगर इन संस्थानों से किसका विकास हुआ यह सोचने के लिए कोई तैयार नहीं है. फिर मेरी समझ साफ हो गयी कि विस्थापन से उनका विकास कतई नहीं होना है जिनकी जमीन जा रही है. फिर मित्तल आ रहे थे तो मैं इस जंग में कूद पड़ी. आरटीआई का सहारा लिया, एमओयू की कॉपी निकाली और गांव वालों के पास पहुंच गयी. उन्हें बताया कि सरकार आपकी जमीन, आपके जंगल और आपकी नदियां कंपनी को बेच रही है. लोगों ने कहा, हम ऐसा होने नहीं देंगे. फिर मैंने दर्जनों आरटीआई डाली और तथ्यों के सहारे मुकाबला किया. फिर लोगों की जीत हुई. मैंने पूरी लड़ाई भारत सरकार के कानून के सहारे ही लड़ी, फिर भी सरकार मुझे व्यवस्था विरोधी कहती है. एक वाकया बताती हूं. कर्रा में एक डैम बन रहा था. वह बड़ा अजीब डैम था. खुद सरकार को भी नहीं पता था कि वहां डैम बन रहा है. इंजीनियर और ठेकेदार ने मिलकर डैम बनाना शुरू कर दिया. मैंने सरकार के पास आरटीआई डाला तो पता चला कि अभी डीपीआर भी नहीं बना है. डीसी ने मुझे बुलवा कर पूछा कि कहां डैम बन रहा है? कौन बनवा रहा है? किसकी योजना है? मैंने अधिकारियों के बयान को कोट करते हुए पंफ्लेट छपवाया और गांव में बांटा.
आप कहती हैं कि खदानों में इस्तेमाल की गयी भूमि बेकार पड़ी है, इसका क्या किया जा सकता है?
सबसे पहले तो इन बेकार खदानों को फिर से उपयोगी बनाना खनन कंपनियों का काम है. उनका दायित्व है कि वे जमीन समतल करके लोगों को लौटाएं. मगर ऐसा वे करते नहीं और माफियाओं का उस जमीन पर कब्जा हो जाता है. अगर सरकार चाहे तो इस जमीन को उपयोगी बनाकर विकास कार्य के लिए इसका आराम से इस्तेमाल कर सकती है.
इस साल आप आजाद है. अब आपको कैसा लग रहा है कि नया साल क्या राज्य के किसानों के लिए नयी उम्मीद लेकर आयेगा या फिर 2013 भी 2012 की तरह ही किसानों के लिए दुखदायी साबित होगा?
यह बात तो इस आंदोलन से साबित हो गयी है कि सरकार ने किसानों के खिलाफ मामले दर्ज किये हैं और मानवाधिकार की बात करने वालों को जेल में डाल रही है. अब यह साफ है कि वह कारपोरेट घरानों के लिए काम कर रही है. ऐसे में किसानों को सरकार से कोई उम्मीद रखनी ही नहीं चाहिये.
पंचायतों से कोई उम्मीद?
मेरे हिसाब से पंचायतें तो दमन का विकेंद्रीकरण हैं. पहले सरकारी भ्रष्टाचार और दमन की पहुंच बीडीओ तक ही थी, अब यह फैलते-फैलते वार्ड सदस्यों तक पहुंच गयीं. वार्ड सदस्य खुद को लोगों का हिस्सा कम सरकार का हिस्सा अधिक समझते हैं. चुने जानेके छह माह के भीतर कई मुखियो ने बोलेरो खरीद लिया. बताइये कहां से बरसा यह पैसा.
और ग्राम सभा से..
ग्राम सभा होती कहां है? होती भी है तो जनता के हितों की सुरक्षा या उसके उत्थान के लिए नहीं होती है.
तो फिर उपाय क्या है?
उपाय आम जनता है. निम्न और मध्यम वर्गीय जनता. मैंने अपने जेल प्रवास के दौरान महसूस किया कि यही वह जनता है जो न्याय के पक्ष में है. लोग न्याय के लिए छटपटा रहे हैं. यह लोग मिलकर झारखंड को बचायेंगे. वे झारखंड को बचायेंगे ताकि उन्हें शुद्ध हवा, शुद्ध पानी, शुद्ध भोजन और बेहतर स्वास्थ्य हासिल हो सके. जेल प्रवास के दौरान मैंने महसूस किया कि यह वर्ग सही मायने में भ्रष्टाचार और अन्याय से मुक्ति चाहता है. खुद पुलिस और अदालत में बैठे निचले दज्रे के कर्मचारियों ने मेरी मदद की और मुझे वह सम्मान दिया जिसके बारे में मैं सोच भी नहीं सकती थी. ब.डे अधिकारी मेरे काम को अटकाते थे, किसी न किसी बहाने से विलंब करते कि मेरी रिहाई न हो सके. मगर छोटे कर्मचारी हर कदम पर मेरी मदद करते कि दयामनी दीदी की रिहाई जल्द हो जाये. वे कहते कि दीदी आप जल्दी रिहा हो जाइये, यह जगह आपके लिए नहीं है. इसी वजह से मुझे इन लोगों से काफी उम्मीदें हैं.
दयामनी बारला की प्रकाशित पुस्तकें
१. विस्थापन का दर्द- झारखंड राज्य में विकास के नाम पर विस्थापित लोगों के कष्टों का वर्णन.
२. एक इंच जमीन नहीं देंगे-मित्तल के खिलाफ आंदोलन के अनुभव.
३. दो दुनिया- अमेरिकी यात्रा के दौरान वहां के अनुभवों पर आधारित.
४. स्वीट प्वाइजन- कंपनियों द्वारा कराये जा रहे समाज सेवा अभियानों की हकीकत.