Saturday, February 23, 2013

अपने पहले प्यार का कत्ल कर देना चाहती थी मैं...


अभी हाल ही में मैंने आपके सामने सोहेला अब्दुलाली की कहानी पेश की थी. किस तरह उस साहसी युवती ने गैंगरेप की घटना का सामना किया और अब वे एक सम्मानित और अपने तरीके से खुशहाल जीवन जी रही हैं. मैंने उस कहानी को इस नजरिये से पेश किया था कि कई दफा युवतियां अपने कौमार्य को ही सबकुछ मान बैठती हैं, उसे बचाने के लिए जान दे देती हैं और या फिर उसके जबरन अपहरण कर लिये जाने के बाद कुंठित जीवन जीती हैं. जबकि कौमार्य ही किसी का जीवन नहीं हो सकता... मगर आज मैंने जब भाई अरविंद शेषजी के ब्लॉग पर सूर्यानेल्ली की उस पीड़ित लड़की की कहानी पढ़ी तो लगा कि स्त्रियों की समस्या का इस तरह साधारणीकरण नहीं किया जा सकता. कई दफा सांस लेना भी उनके बस में नहीं होता. इस आलेख ने मुझे इस पूरे मसले पर दुबारा सोचने के लिए विवश किया है. मैं इसे अरविंद शेष जी की भूमिका टिप्पणी के साथ आपके सामने पेश कर रहा हूं, उनके ब्लॉग से साभार....
रसूख वाले बलात्कारी नहीं होते...
सूर्यानेल्ली में लगातार चालीस दिनों तक बयालीस वहशी धोखेबाज मर्दों ने बर्बरता की सारी हदें पार कर सूर्यानेल्ली की उस सोलह साल की बच्ची को जैसे चाहा रौंदा था और लगभग मर जाने के बाद उसके घर के आसपास फेंक दिया था। वह किसी तरह बच गई और आज तैंतीस साल की उम्र में भी वह अपने आसपास के अंधेरों का सामना करती हुई अपनी लड़ाई को अंजाम देने के लिए अपने बूते खड़ी है। अरुंधति राय ने नहीं भी कहा होता तो भी मैं ठीक वही कहता- हां, वह मेरी हीरोईन है, वह सबकी नायिका है।
फिलहाल हकीकत यह है कि दूरदराज के इलाकों में होने वाली ऐसी तमाम घटनाएं हमारी संवेदना को नहीं झकझोर पाती हैं। सवाल करने वाले कर रहे हैं कि क्या हम केवल तभी परेशान होते हैं जब कोई घटना देश की राजधानी में हो, हमारे अपने वर्ग से जुड़ी हो। वरना दिल्ली में हुई सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद इंडिया गेट के व्यापक आंदोलन से निकले संदेश के बीच इसी दौर में बिहार में सहरसा जिले के एक गांव में किसी दलित और मजदूर परिवार की आठ साल की बच्ची के साथ सामूहिक बलात्कार करके बर्बरता की सारी हदें पार कर मार ही डाला जाता है... महाराष्ट्र के भंडारा में तीन नाबालिग बच्चियों से बलात्कार के बाद उनकी हत्या कर कुंए में फेंक ही जाती है... और इस तरह की तमाम घटनाएं अपनी त्रासदी के साथ लगातार घट ही रही हैं। लेकिन हमारे भीतर कभी भी गुस्सा पैदा नहीं होता... किसी टीवी वाले को इन घटनाओं पर लोगों को आंदोलित करने की जरूरत नहीं पड़ती... इंडिया गेट पर कभी शोक की मोमबत्तियां नहीं जलाई जातीं...!
केरल में सूर्यानेल्ली की यह लड़की किसी तरह जिंदा बच गई थी। अगर देश के सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में दफन कर दिए गए मुकदमे पर सवाल नहीं उठाया होता तो इसमें भी अदालतों ने चुपचाप सभी अपराधियों को पवित्र ब्रह्मचारी घोषित कर ही दिया था। इसके बावजूद इस देश की महान पार्टी कांग्रेस के एक महान और "पवित्र" सांसद पीजे कूरियन यह कह ही रहे हैं कि उनके खिलाफ सीपीएम झूठा प्रचार कर रही है। इस देश में सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की सत्ताधारी पार्टी कूरियन का झंडा उठा कर कूद रही है... सत्ता की दावेदार एक पार्टी अपनी इस बात की फिक्र को दूर करने की फिराक में है कि उसके पूरे गिरोह के भगवा आतंकवाद के आरोप से मुक्त कर दिया जाए...। आगे क्या होगा, सभी अपराधी एक बार फिर से पवित्रीकरण की प्रक्रिया से गुजरेंगे या फिर सूर्यानेल्ली की लड़की पर ढाए गए जुल्म की सजा पा सकेंगे, यह हमारी व्यवस्था, अदालतों, राजनीतिक दलों के रुख पर निर्भर करेगा। लेकिन इसी के साथ राजधानी दिल्ली और ताकतवर मध्यवर्गीय संवेदनाओं से उपेक्षित ये तमाम घटनाएं एक बार फिर सचमुच की समाजी और इंसानी संवेदनाओं की परीक्षा की कसौटी पर भी गुजरेंगी...। रोजाना के अनगिनत ऐसे मामलों की तरह... ।
टाइम्स ऑफ इंडिया में सूर्यानेल्ली की लड़की की यह पीड़ा उसी के शब्दों में प्रकाशित हुई थी। अनुवाद करने की कोशिश मैंने ही की है। अंग्रेजी बहुत अच्छी नहीं है। इसलिए जहां भी जरूरी लगे, एक बार इस लिंक पर क्लिक कर लीजिएगा, लेकिन पढ़िएगा जरूर...
मैं सचमुच अपने पहले प्यार का कत्ल कर देना चाहती थी...
- सूर्यानेल्ली की लड़की
आपने शायद कभी मेरा नाम नहीं सुना हो! मुझे उस पहचान के साथ नत्थी कर दिया है, जिससे मैं छुटकारा नहीं पा सकती- मैं सूर्यानेल्ली की लड़की हूं। पिछले सत्रह सालों से मैं इंसाफ पाने की लड़ाई लड़ रही हूं। कुछ लोग मुझे बाल-वेश्या कहते हैं तो कुछ पीड़ित। लेकिन किसी ने मुझे दामिनी, निर्भया या अमानत जैसा कोई नाम नहीं दिया। मैं कभी भी इस देश के लिए गर्व नहीं बन सकती! या उस महिला का चेहरा भी नहीं, जिसके साथ बहुत बुरा हुआ।
मैं तो स्कूल में पढ़ने वाली सोलह साल की एक मासूम लड़की भी नहीं रह सकी, जिसे पहली बार किसी से प्यार हो गया था। लेकिन उसी के बाद उसने अपनी जिंदगी ही गंवा दी। अब तैंतीस साल की उम्र में मैं रोज °डरावने सपनों से जंग लड़ रही हूं। मेरी दुनिया अब महज उस काली घुमावदार सड़क के दायरे में कैद है जो मेरे घर से चर्च और मेरे दफ्तर तक जाती है।
लोग अपनी प्रवृत्ति के मुताबिक मुझ पर तब तंज कसते हैं जब मैं उन चालीस दिनों को याद करती हूं, जब मैं सिर्फ एक स्त्री शरीर बन कर रह गई थी और जिसे वे जैसे चाहते थे, रौंद और इस्तेमाल कर सकते थे। मुझे जानवरों की तरह बेचा गया, केरल के तमाम इलाकों में ले जाया गया, हर जगह किसी अंधेरे कमरे में धकेल दिया गया, मेरे साथ रात-दिन बलात्कार किया गया, मुझे लात-घूंसों से होश रहने तक पीटा गया।
वे मुझसे कहते हैं कि मैं कैसे सब कुछ याद रख सकती हूं, और मैं हैरान होती हूं कि मैं कैसे वह सब कुछ भुला सकती हूं? हर रात मैं अपनी आंखों के सामने नाचते उन खौफ़नाक दिनों के साथ किसी तरह थोड़ी देर एक तकलीफदेह नींद काट लेती हूं। और मैं एक अथाह अंधेरे गहरे शून्य में बार-बार जाग जाती हूं जहां घिनौने पुरुष और दुष्ट महिलाएं भरी पड़ी हैं।
मैं उन तमाम चेहरों को साफ-साफ याद कर सकती हूं। सबसे पहले राजू आया था। यह वही शख्स था, जिसे मैंने प्यार किया था और जिस पर भरोसा किया था। और उसी ने मेरे प्यार की इस कहानी को मोड़ देकर मुझे केरल के पहले सेक्स रैकेट की आग में झोंक दिया। रोजाना स्कूल जाने के रास्ते में जिस मर्द का चेहरा मेरी आंखें तलाशती रहती थीं, वही उनमें से एक था जिसे मैंने शिनाख्त परेड में पहचाना था और अदालत के गलियारे में मेरा उससे सामना हुआ। उन दिनों... मैं सचमुच उसका कत्ल कर देना चाहती थी। हां... अपने उस पहले प्रेमी का...।
लगभग मरी हुई हालत में उन्होंने मुझे मेरे घर के नजदीक फेंक दिया। लेकिन मेरे दुख का अंत वहीं नहीं हुआ। मेरा परिवार मेरे साथ खड़ा था। मैंने यह सोच कर मुकदमा दायर किया कि ऐसा किसी और लड़की के साथ नहीं हो। मैंने सोचा कि मैं बिल्कुल सही कर रही हूं। लेकिन इसने मेरे पूरे भरोसे को तोड़ दिया। मेरे मामले की जांच के लिए जो टीम थी, वह मुझे लेकर राज्य भर में कई जगहों पर गई। उसने मुझे अनगिनत बार उस सब कुछ का ब्योरा पेश करने को कहा जो सबने मेरे साथ किया था। उन्होंने मुझे इस बात का अहसास कराया कि एक औरत होना आसान नहीं है, वह पीड़ित हो या किसी तरह जिंदा बच गई हो।
मेरे लिए यह राहत की बात है कि दिल्ली की उस लड़की की मौत हो गई। वरना उसे सभी जगह ठीक वैसे ही अश्लील सवालों से रूबरू होना पड़ता जो उसे उस खौफनाक रात को भुगतना पड़ा। इसकी वजह बताने के लिए उसे बार-बार मजबूर किया जाता। और अकेले बिना किसी दोस्त के वह अपनी ही छाया से डरती हुई जिंदगी का बाकी वक्त किसी तरह काटती।
मेरा भी कोई दोस्त नहीं। मेरे दफ्तर में कोई भी मुझसे बात नहीं करना चाहता। मेरे मां-बाप और कर्नाटक में नौकरी करने वाली मेरी बहन ही बस वे लोग हैं जो मेरी आवाज सुन पाते हैं। हां, कुछ वकील, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता भी।
मैंने इन दिनों खूब पढ़ा है। फिलहाल केआर मीरा की एक किताब "आराचार" (द हैंगमैन) पढ़ रही हूं।
मेरे परिवार के अलावा कोई भी नहीं जानता कि मैं अपनी गिरती सेहत को लेकर डरी हुई हूं। लगातार सिर दर्द, जो उन चालीस दिनों की त्रासदी का एक हिस्सा है जब उन्होंने मेरे सिर पर लात से मारा था। मेरे डॉक्टर कहते हैं कि मुझे ज्यादा तनाव में नहीं रहना चाहिए। और मैं सोचती हूं कि सचमुच ऐसा कर पाना दिलचस्प है।
मेरा वजन नब्बे किलो हो चुका है। जब मैं अपनी नौकरी से नौ महीने के लिए मुअत्तल कर दी गई थी, उस दौरान मेरा ज्यादातर वक्त बिस्तर पर ही कटता था और इसी वजह से वजन भी बढ़ता गया। अब मैं कुछ व्यायाम कर रही हूं। पूरी तरह ठीक हो पाना एक सपना भर है। लेकिन कुछ प्रार्थनाएं मुझे जिंदा रखे हुए हैं।
भविष्य पर मेरा यह यकीन अब भी जिंदा है कि एक दिन सब कुछ ठीक हो जाएगा। मैं हर सुबह और रात को प्रार्थना करती हूं। मैं नहीं पूछती कि फिर मुझे ही क्यों...! मैं उन दिनों भी उस पर भरोसा करती रही, जब मैं मुश्किल से अपनी आंखें खोल पाती थी या किसी तरह जिंदा थी। मैंने प्रार्थना की। मैं लैटिन चर्च से आती हूं जो कैथोलिक चर्च में सबसे बड़ा चर्च है। मगर पिछले सत्रह सालों से कहीं भी और किसी भी चर्च में मेरे लिए कोई प्रार्थना नहीं की गई। पवित्र मरियम को कोई गुलाब की माला अर्पित नहीं की गई और न ही कोई फरिश्ता अपने दयालु शब्दों के साथ मेरे दरवाजे पर आया।
लेकिन मेरा भरोसा टूटा नहीं है। इसने मुझे हफ्ते के सातों दिन चौबीसों घंटे चलने वाले टीवी चैनल देखने की ताकत बख्शी है, जहां कानून के रखवाले मुझे बाल-वेश्या बता रहे हैं, और कुछ मशहूर लोग इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि मेरे मुकदमा टिक नहीं पाएगा। यहां तक कि जब मैं दफ्तर में वित्तीय धोखाधड़ी के मामले में फंसाई गई हूं और मेरे माता-पिता बहुत बीमार चल रहे हैं, तब भी मैं खुद को समझाती हूं कि यह भी ठीक हो जाएगा... एक दिन..!!!

Monday, February 04, 2013

नये हिंदुस्तान में आपकी तसवीर कहां है?


मौका महात्मा गांधी की पुण्यतिथि का था और पंचायतनामा के दफ्तर में प्रसिद्ध गांधीवादी विचारक एवं प्रतिष्ठित पत्रिका गांधी मार्ग के संपादक राजीव वोरा संयोगवश उपस्थित थे. वोराजी इन दिनों बिहार में माओवाद प्रभवित इलाकों में अहिंसा के सहारे शांति स्थापित करने के अभियान में जुटे हैं. उन्होंने पंचायतनामा की पूरी टीम और प्रभात खबर के वरिष्ठ संपादकीय सहयोगियों के साथ देश में इन दिनों फैली हिंसा, उसके निवारण के उपाय, देश के मौजूदा हालत के मूल कारण और पंचायती राज व्यवस्था को जनोपयोगी बनाने के मसले पर लंबी बातचीत की.
हिंसा की महिमा बढ़ना है खतरनाक
सबसे पहले उन्होंने अपने मौजूदा अभियान के बारे में बताते हुए कहा कि देश में हिंसक घटनाओं का बढ़ना उतना खतरनाक नहीं है, जितना हिंसा की महिमा का बढ़ना है. हालांकि इस माहौल में लोग त्रस्त भी नजर आ रहे हैं. दरअसल जो हिंसा अन्याय के खिलाफ, अपना गौरव और स्वाभिमान बचाने के लिए गांव में रहने वाले भोले-भाले समुदायों द्वारा की जा रही है उसके बारे में पूरे देश को सोचने की जरूरत है. क्योंकि अगर शरीर का कोई एक हिस्सा कष्ट में है तो दूसरे हिस्से का मौन रह जाना भी एक तरह का अपराध ही है.
लोगों से जुड़ने की है जरूरत
हिंसा की निंदा और अहिंसा का गुणगान करना बड़ा आसान है, मगर आज जरूरत कहीं इससे बड़ी है. हमें यह देखने की जरूरत है कि लोग क्यों परेशान होकर हथियार उठा ले रहे हैं. उनसे बातें करने और उनसे व्यक्तिगत रिश्ता बनाने की जरूरत है. हमने वही काम बिहार के माओवाद प्रभावित इलाकों में करने की कोशिश की है. हम मुजफ्फरपुर, जमुई और बांका के सुदूरवर्ती गांवों में जाकर लोगों से मिल रहे हैं. उनसे बातें कर रहे हैं. उनकी परेशानी समझने और उन्हें यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि वे खुद को अकेला समझने की कोशिश न करें. हम लोग उनके साथ हैं. उन्होंने कहा कि मैं अक्सर लोगों से यह सवाल करता हूं कि इस नये हिंदुस्तान में आपको अपनी तसवीर कहीं नजर आती है क्या? आज तक मुङो कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो यह बताये कि मुङो इस नये हिंदुस्तान में अपनी तसवीर नजर आती है.
ऐसा क्यों?
इस सवाल के जवाब में राजीव वोरा ने कहा कि हिंदुस्तान का आम व्यक्ति आज भी आत्मा केंद्रित है. मुक्ति और मोक्ष आज भी अधिकांश लोगों के मन की मूल भावना है. मगर आज जो कुछ घट रहा है उसने एक आम इंसान के मन में संघर्ष पैदा कर दिया है. वह भौतिक जगत और आत्मिक भाव के संघर्ष में पिस रहा है. मगर जिस इंसान के मन का यह संघर्ष समाप्त हो गया है, या जिसने इसे नोटिस करना बंद कर दिया है, वह शोषक में तब्दील हो गया है. लोग इसलिए भी परेशान हैं कि उनके लिए यह माहौल बड़ा अपरिचित सा है.
आजादी के बाद आये इस बदलाव के कारण क्या हैं?
उन्होंने कहा कि गांधी के समय देश स्व से उपर उठ चुका था. गांधी ने आजादी के बदले देश को स्वराज शब्द दिया. स्वराज का अर्थ सिर्फ आजादी नहीं पूरे सोच में बदलाव से था. उसका अर्थ सत्ता में अंग्रेजों के बदले भारतीयों के आ जाने से नहीं था. इस शब्द से देश को नया उद्देश्य मिला. यह शब्द राष्ट्रीय अस्मिता का रूप ले चुका था. मगर ठीक उसी वक्त जब देश आजाद होने वाला था, उसी वक्त हमारे नये हुक्मरानों ने यह धारा ही मोड़ दी. उन्होंने आजादी के दौरान हुई घटनाओं का जिक्र करते हुए बताया कि किस तरह देश के भविष्य की रूपरेख को लेकर महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू में लगातार मतभेद गहरे होते चले गये थे. कैसे नेहरू ने हिंद स्वराज की अवधारणाओं को खारिज कर दिया था.
गांधी को समझ नहीं पाये हुक्मरान
वोराजी ने बताया कि गांधी जी ने दुनिया के सामने पहली दफा ऐसा राजनीतिक विकल्प पेश किया था, जिसमें आजादी और न्याय एक दूसरे के लिए पूरक साबित हो रहे थे. इससे पहले की व्यवस्थाएं जैसे पूंजीवाद जहां व्यक्तिगत आजादी की तो बात करते हैं मगर न्याय के मसले पर उनका दावा फेल हो जाता है. वहीं साम्यवादी व्यवस्था न्याय की लड़ाई लड़ते हैं मगर व्यक्तिगत आजादी को लेकर उनकी व्यवस्था असफल साबित हो जाती है. दुनिया में साम्यवाद के पतन के पीछे भी यही वजह रही है और आज पूंजीवाद का पतन होगा तो इन्हीं कारणों से. मगर अपने ही देश में लोग गांधी को समझ नहीं पाये.
लोगों में सिर्फ युद्ध के वक्त राष्ट्रभक्ति क्यों जागती है?
हमें समझना पड़ेगा कि राष्ट्रवाद और राष्ट्रभक्ति अलग-अलग चीज है. सेवा की भावना ही असली राष्ट्रभक्ति है. जबकि सैनिक के सिर काटने की घटना पर हमारी उग्र प्रतिक्रिया कतई राष्ट्रभक्ति नहीं है. चैनलों ने इस घटना पर तो एक तरह से स्टूडियो में युद्ध का माहौल पैदा कर दिया था. दरअसल हमारा जीवन इतना अस्थिर हो गया है कि हमें किसी बात के बारे में गंभीरता से सोचने की फुरसत नहीं है. हम हमेशा इस सदमे में रहते हैं कि कब तेल की कीमतें बढ़ जायेंगी और हमारी परिस्थितियां बेकाबू हो जायेंगी.
पंचायती राज बनाम ग्राम स्वराज
पंचायती राज एक व्यवस्था है, एक उपकरण है जो गांव को मिला है. अब इस उपकरण के सहारे हमें गांव को बदलना है. अधिकार संपन्न बनाना है. लोगों में इस भावना को आकार देना है कि यह आपका गांव है और इसे आप ही बेहतर बना सकते हैं. जब यह भावना विकसित होगी तभी ग्राम स्वराज को हासिल किया जा सकेगा. इसके लिए हमें लोगों में सकारात्मक सोच विकसित करने की जरूरत है. और मुङो लगता है कि आप लोग, पंचायतनामा के जरिये यह काम कर रहे हैं.
गांधीवादियों और समाजवादियों के पतन और परिवर्तन
साम्यवाद की समाप्ति के बाद शायद हम सबने वैश्वीकरण के सामने आत्मसमर्पण कर दिया. हमें लगने लगा कि अब कोई रास्ता ही नहीं है. जिस दिन महात्मा गांधी की हत्या हुई, उसके ठीक छह हफ्ते बाद सेवाग्राम में एक बैठक होने वाली थी जिसमें सरकार और स्वतंत्रता सेनानी मिलकर देश की दिशा तय करने से संबंधित नीति तय करने को लेकर बैठक होने वाली थी. गांधी जी तो उस बैठक में नहीं शामिल हो पाये. मगर बैठक हुई. उस बैठक की रिपोर्ट को पढ़कर बड़ी निराशा होती है. (पंचायतनामा में प्रकाशित)