Thursday, March 21, 2013

कानून तो बना लोगे, दारोगा कहाँ से लाओगे


जिस दिन लोकसभा ने एंटी रेप बिल पर अपनी मुहर लगायी थी, उसके अगले दिन रांची के अखबारों में एक दहलाने वाली खबर चस्पा थी. रांची से सटे सोनाहातू में एक महिला और उसके नवजात शिशु का शव पांच दिन से पड़ा था और उसके पास उसकी पांच वर्षीय बेटी बैठी थी. तफ्तीश के बाद पता चला था कि उक्त महिला विधवा थी और अपनी बेटी के साथ अकेले रहती थी. किसी व्यक्ति ने उसका यौन शोषण किया, जिसकी शिकायत करने वह थाने में गयी. मगर पुलिस ने उसे भगा दिया. बाद में यौन शोषण के कारण ठहरे गर्भ की वजह से उसने बच्चे को जन्म दिया. जन्म के वक्त ही जच्चा और बच्चा दोनों ने प्राण त्याग दिये. ऐसा नहीं है कि उस दिन अखबार में महिलाओं के खिलाफ हिंसा की यही एक खबर थी. एक और खबर कहीं की थी कि कचहरी परिसर में एक महिला के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया. अगले दिन यानी आज के अखबार भी ऐसी ही खबरों से भरे हैं. एक महिला ने दुष्कर्मी को सजा नहीं दिला पाने के कारण खुद को आग लगाकर जान दे दी है. यह नये और तथाकथित मजबूत कानून का हमारे समाज द्वारा किया जाने वाला स्वागत है. समाज तो खैर खुद को सरकार का हिस्सा ही नहीं मानता मगर सरकार का अहम हिस्सा माना जाने वाला पुलिस प्रशासन इन कानूनों को लेकर कितना संवेदनशील है, यह उपर्युक्त घटनाओं से जाहिर है. वैसे मैं यहां इस कानून और उसको लागू कराने वाली एजेंसी के बारे में सवाल नहीं उठा रहा. मेरा सवाल अपने देश के सैकड़ों कानूनों और उसे लागू किये जाने के उपायों पर है और इस बात पर भी कि देश के कितने लोग इन कानूनों के बारे में जानते हैं.
परसों ही एक सेमीनार में एक सज्जन शिक्षा का अधिकार कानून की बारीकियों का जिक्र कर रहे थे कि इसके तहत सरकार ने समाज को कितने अधिकार दिये हैं, मगर लोग ही जागरूक नहीं हैं. वे अपना हक नहीं लेते... ऐसा ही सूचना का अधिकार, मनरेगा, राइट टू फूड और कई दूसरे कानूनों के बारे में कहा जा सकता है जो पिछले एक दशक में देश को मिले हैं.... संभवतः कुछ दिनों बाद ऐसा ही खाद्य सुरक्षा कानून के बारे में भी सेमीनारों में यही कहा जायेगा. कहने वाले विशेषज्ञ जब इन बारीकियों को बता रहे होंगे तो हॉल में मौजूद अन्य विशेषज्ञ जिनकी अलग-अलग चीजों के बारे में विशेषज्ञता होगी उन्हें तमाम जानकारियां बिल्कुल नयी प्रतीत होगी. और आम जनता जिन्हें इन तमाम कानूनों के जरिये सहूलियतें देने की कोशिश की गयी है अपनी पूरी जिंदगी में इन कानूनों का दस फीसदी हिस्सा भी नहीं जान पायेंगी. विशेषज्ञ जागरुकता की कमी का रोना रोते रहेंगे और बिचौलिये जागरूक होकर मोटे होते रहेंगे.
मैंने सोचा था कि उस समारोह में उन विशेषज्ञ महोदय से पूछूं कि ये कानून इतने जटिल क्यों हैं कि इन्हें समझने के लिए लोगों को जागरूक होना पड़े. और अगर लोग जागरूक नहीं हो पा रहे तो ऐसा क्यों माना जाये कि कानून लागू हो गया है. दरअसल पिछले कुछ सालों में खास तौर पर जबसे कांग्रेस ने नेशनल एडवाइजरी कमेटी में स्वयंसेवी संस्था के नामी-गिरामी लोगों को जगह दी है. आम आदमी के हित से जुड़े कई कानून लागू हुए हैं. मनरेगा, वनाधिकार कानून, सूचना का अधिकार कानून, महिला सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा कानून तो टटका-टटका लागू हुए हैं. पिछले कुछ साल से सिविल सोसाइटी के दूसरे नुमाइंदे जो एनएसी में शामिल होने से चूक गये वे जनलोकपाल विधेयक के लिए दबाब बना रहे हैं. अगर इन तमाम कानून की मोटी-मोटी बातें लोगों से पूछी जाये तो जाहिर हो जायेगा कि लोगों को इनके बारे में कितनी कम जानकारी है. लोग तो लोग सरकारी अमलों के अफसर भी ठीक से नहीं जानते कि मनरेगा के तहत बच्चों वाली महिलाओं को क्या-क्या सुविधाएं देनी है या सूचना का अधिकार कानून के तहत प्रथम अपील का निबटारा कैसे करना है.
वनाधिकार कानून का मामला तो कमाल है. बहुत संभव है कि कुछ साल बाद इस कानून को इस बिना पर निरस्त कर दिया जाये कि बनने के इतने साल बाद भी लागू नहीं हो पाना यह दर्शाता है कि लोगों की रुचि वनाधिकार पाने में है ही नहीं. इस कानून के तहत स्पष्ट प्रावधान है कि वन विभाग वनों की सुरक्षा कर पाने में विफल रहा लिहाजा वनों के प्रबंधन का अधिकार उनके इर्द-गिर्द रहने वाले लोगों के हाथों में स्थांतरित कर दिया जाये. ऐसे में इन कानून के लागू होते ही देश के वनों में वन विभाग के अधिकारियों की मौजूदगी अवैध हो जाती है. मगर आम लोग अब तक यही समझते हैं कि यह कानून सिर्फ जमीन का पट्टा लिखवाने का कानून है. कई जगह स्वयंसेवी संस्थाओं ने पंचायतों के नाम वन के प्रबंधन का काम स्थानांतरित करवाने की कोशिश की, मगर पूरे देश में सिर्फ एक जगह महाराष्ट्र के मेंढ़ालेखा में यह मुमकिन हो पाया और वह भी तत्कालीन वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश के सक्रिय हस्तक्षेप के कारण. आज भी पूरे देश में वन विभाग के अधिकारी पूरे ठाठ से राज कर रहे हैं और ग्रामीणों को लकड़ी काटने के जुर्म में जेल की हवा खिला रहे हैं. यह हमारे देश में बने महत्वपूर्ण कानूनों के लागू करने की प्रक्रिया और सरकारी सदिच्छा का नमूना है. दिन रात जागरूकता की दुहाई देने वाले सरकारी अधिकारी और एनजीओ वाले भी इस मसले पर जागरूकता का मंत्र भूल जाते हैं.
मैं कहता हूं कि अगर लोग मनरेगा और मिड-डे मील या शिक्षा का अधिकार को लेकर ही जागरूक हो जायें तो क्या होगा. कितने प्राइवेट स्कूलों में 25 फीसदी गरीब बच्चों का नामांकन होता है? मनरेगा में कितनी मेठ महिलाएं हैं और कितने जगह कार्य स्थल पर पालनाघर की व्यवस्था है? क्या जागरूक लोगों के शोर मचाने से यह सुनिश्चित हो जायेगा... अगर किसी को भ्रम है तो वे अपने शहर के सबसे मशहूर प्राइवेट स्कूल में एक बीपीएल बच्चे का एडमिशन करा कर देख ले.
फेसबुक पर कई पुरुष साथी नये कानून से डरने का अभिनय कर रहे हैं कि अब बुरका पहन कर गलियों में घूमना पड़ेगा. अरे भाई जब रेप का शिकायत दर्ज कराने में नाकाम होकर महिलाएं खुदकुशी करने को मजबूर हो जाती है, तो भला घूरने की शिकायत कौन दरोगा दर्ज करेगा. दरोगा भी तो आखिर पुरुष ही है, उससे अधिक पुरुषों का दर्द कौन समझेगा. उसके रोबीले अंदाज को देख कर महिलाएं यही समझेंगी कि इससे बेहतर तो छेड़खानी करने वाले से मुकाबला करना है.. हो सकता है वह घुरकी दिखाने से भाग ही जाये...
आखिर ऐसा क्यों है, गड़बड़ी कहां है...
बड़ी-बड़ी कमेटियां मिलकर कानून तैयार करती हैं. संसद में उस तैयार कानून के हर छेद में उंगली डाल कर हंगामा किया जाता है, फिर सरकार लाचार होकर उन छेदों को भी बंद करती हैं. फिर कानून बनता है. मगर जब उसे लागू करने का बारी आती है तो न उसकी जानकारी लागू करने वालों को होती है और न ही उनको जिसके लिए यह कानून बना है. क्या यह सवाल सिर्फ जागरूकता और प्रचार-प्रसार में कमी का है या हमारे कानून निर्माण प्रक्रिया में... अब तक तो संविधान के मूल प्रावधानों के बारे में ही लोगों को ठीक से जानकारी नहीं है तो फिर वे सौ की संख्या में पहुंचे संशोधनों को कैसे समझेंगे. अगर आप इसकी असली वजह जानना चाहते हैं कि कृपया किसी भी एक कानून के दस्तावेज का पीडीएफ डाउनलोड करके उसे समझने की कोशिश करें. पहले पांच पन्नों में तो सिर्फ परिभाषाएं होती हैं कि इस कानून में वर्णित फलां शब्द का अर्थ फलां है, उसके बाद कही प्रावधानों को शुरू होने का मौका मिलता है.
मुझे हैरत होती है कि अगर अपना संविधान लिखित के बदले मौखिक होता तो क्या होता. लोग कैसे इस इनसाइक्लोपीडिया को याद रखते. क्यों हम ऐसे नियम-कानून नहीं बनाते जिसमें पेंच कम हो और समझदारी ज्यादा. जो फिल्मी गानों की तरह लोगों को याद हो जाये और जिसमें नियम के लिए कम और संवेदनशीलता के लिए अधिक गुंजाइश हो. अगर कोई किसी को थप्पर मारता है तो उसे सजा देने के लिए कानून की धारा याद रखने की जरूरत क्यों पड़े... घर में दो बच्चे जब झगड़ते हैं तो कौन आइपीसी के रेफरेंस याद करता है. मगर जब यही लड़ाई घर से बाहर होती है तो वकील हमें बताता है कि गाली के साथ-साथ जातिसूचक गाली का भी आरोप लगाओ इसमें अधिक सजा मिलेगी. पति-पत्नी के झगड़े में वकील पत्नी को दहेज प्रताड़ना का आरोप लगाने की सलाह देता है और पति को कहता है कि वह तभी बच सकता है जब वह पत्नी को बदचलन साबित कर दे.
अब आने वाले दिनों में क्या लड़कियों का पीछा करना और उसके साथ बसों और सार्वजनिक स्थलों पर छेड़खानी बंद हो जायेगी...? मगर कुछ ऐसे मामले जरूर होंगे जिसमें वकील अपने मुवक्किल को इन आरोपों का लाभ लेने का हुनर सिखायेगा...
इसके बदले देश में जो कानून और जितनी योजनाएं बीस साल पहले थीं उसका इस्तेमाल ठीक से होता तो इतने नये कानून बनाने की जरूरत नहीं होती. मगर दुर्भाग्यवश हमारे हुक्मराने ने जितनी मेहनत कानून बनाने में की उसका एक चौथाई काम इन्हें ठीक से लागू कराने पर नहीं हुआ. सरल कानून बने और सही तरीके से लागू हो जाये तो देश और उसकी संसद को, अदालतों को संविधान और उसके सौ के करीब संशोधनों के प्रावधानों और उनकी नियमावली को याद करने की जरूरत नहीं पड़े.

Saturday, March 02, 2013

खैराती अम्मा का सामाजिक अर्थशास्त्र


चिदंबरम साहब ने यूपीए-2 का आखिरी बजट पेश कर दिया है. तमाम कयासों के बावजूद यह बजट भी खैराती अम्मा का पिटारा ही है. यूपीए-1 की एंट्री से यूपीए-2 की एक्जिट तक खैराती अम्मा का पिटारा ही कांग्रेस की यूएसपी रही है. आम आदमी का हाथ, कांग्रेस के साथ के नारे से एनडीए के फीलगुड फैक्टर को मात देने के बाद जैसे इस फार्मूले पर कांग्रेस अंधविश्वास करने लगी है. पार्टी की सरकार में दुबारा वापसी भी इसी फार्मूले के कारण हुई, मनरेगा ही सरकार के लिए ट्रंप कार्ड साबित हुआ, सो इस पार्टी के लिए ऐसा सोचना कोई गलत नहीं. यूपीए ने सीजन-3 में वापसी के लिए भी ऐसे ही दो ट्रंप कार्ड सोच रखे हैं, पहला कैश सब्सिडी यानी सब्सिडी का पैसा सीधे खाते में और दूसरा फूड सिक्योरिटी एक्ट यानी खाना मिलेगा, पीना मिलेगा... खैराती अम्मा के पिटारे में सब कुछ मिलेगा. खैर हर राजनीतिक दल को राजनीतिक फार्मूला अपनाने की पूरी छूट होती है और हर सरकार को जाते-जाते जनता के लिए चुग्गा फेकने की भी पूरी आजादी मिलती है... हालांकि हर फार्मूला दो बार इस्तेमाल होने के बाद आउटडेटेड हो जाता है, ठीक उसी तरह जैसे कोई आज के टाइम में मर्द और कुली जैसी फिल्में बनाये और उसके हिट हो जाने की उम्मीद पाल बैठे. वैसे मेरा इरादा यहां इस फार्मूले के हिट या फ्लाप होने पर अपनी राय व्यक्त करना नहीं था बल्कि इस खैराती अर्थशास्त्र पर चंद फिकरे कसना चाह रहा था जिस पर हमारे देश के छोटे-बड़े तमाम सामाजिक विचारक वारे-वारे जाते हैं. किसानों की कर्जमाफी, मनरेगा और दोपहर की खिचड़ी से लेकर चुनाव से ऐन पहले अवतरित होने वाले खाद्य सब्सिडी योजना तक के लिए....
यह हमारा सौभाग्य है कि हम महात्मा गांधी के देश में पैदा हुए हैं मगर हमारा सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि अक्सर हम इस सौभाग्य वाली बात को भूल जाते हैं. ऐसा अगर न होता तो हमने नरेगा के आगे महात्मा गांधी का नाम शायद ही जुड़ने दिया होता. हालांकि मनरेगा न तो रोजगार की गारंटी साबित हो पायी और न ही बिना रोजगार के सौ दिन का मेहनताना पाने की गारंटी. हर राज्य में मनरेगा की उपलब्धियों को सामने लाने के लिए एक पीआरओ की नियुक्ति की गयी है, मगर ये तमाम पीआरओ मिलकर आज तक एक भी ऐसा केस खोजकर सामने नहीं ला पाये, जिसे साल सौ दिनों का रोजगार मिला हो और उसे समय पर मेहनताना मिल गया हो, या फिर न भी मिला हो पर इस योजना के संचालकों ने उसे सौ दिन की मजदूरी समय पर दे दी हो. अगर एक भी ऐसा केस होता तो देश के सभी अखबारों में यह सक्सेस स्टोरी की तरह चमक न रहा होता. मगर मेरा ऐतराज इसकी सफलता-असफलता से नहीं है, बल्कि इसके सिद्धांत से है. यह कानून रोजगार की गारंटी नहीं देता है बल्कि रोजगार मिले न मिले मेहनताने की गारंटी जरूर देता है. यानी सरकारी खैरात की गारंटी... महात्मा गांधी ने कभी देश के गरीबों के लिए सरकारी खैरात का सपना नहीं देखा था. मगर इक्कीसवीं सदी में गांधी के ब्रांड नेम से राज करने वाले नासमझ लोगों की समाजसेवा का मंत्र खैरात से ही शुरू होता है.
इस खैराती अर्थशास्त्र की शुरुआत सरकार ने किसानों के कर्जमाफी से की थी और अंत खाद्य सुरक्षा कानून से करने जा रही है. ताज्जुब तो इस बात पर होती है कि इस खैराती अर्थशास्त्र का सिद्धांत पेश करने और इसके लिए नित नये कानून बनाने का जिम्मा जिस किचेन कैबिनेट के पास है उसमें ऐसे-ऐसे लोग हैं जो ऊंची-ऊंची नौकरियां छोड़ कर न्यूनतम मजदूरी पर जीवन जीते हुए लोगों की मदद करने के लिए गांवों की खाक छानते थे. मगर इन लोगों ने इस सरकार को गरीबी मिटाने के लिए जितने फार्मूले दिये सबके सब खैरात बांटने वाले ही थे. एक भी ऐसा नहीं था जिसमें गरीब आदमी के सामने मेहनत मजदूरी करके आगे बढ़ने का फार्मूला हो. महात्मा गांधी ने गांव के गरीबों के लिए यह सपना नहीं देखा था. अधिकांश योजनाकार यही सोचते हैं कि इस देश में गरीबी इसलिए है कि लोगों के पास पैसा नहीं है, उन्हें पैसे दे दो गरीबी दूर हो जायेगी. मगर हकीकत तो यह है कि गरीब आदमी खैरात बांटने वाले को हमेशा बेवकूफ समझता है और यही मानता है कि उसने सामने वाले के पैसे ठग लिये. खैरात को वह बिल्ली के भाग से फूटे छीके की तरह देखता है. उसे अपनी गरीबी मिटाने के लिए खैरात या पैसों की जरूरत नहीं है, उसे अगर कुछ चाहिये तो बस समानता और समान अवसर. वह अपनी गलीज जिंदगी में इसलिए फंसा है क्योंकि उसके आसपास के बड़े लोग उसे गलीज हालत से निकलने नहीं देते. वह मेहनत मजूरी करके पैसा कमाता है, मगर मेहनत के ये पैसे महाजन का सूद, डॉक्टर की फीस, मरनी-हरनी, शादी-ब्याह जैसे हजारों छेदों से रिस कर बह जाते हैं.
आजादी के पैंसठ-छियासठ सालों में हुए हजारों आंदोलनों के बावजूद गांवों से पुरानी महाजनी तो खत्म हुई नहीं, दसियों नये किस्म के लुटेरे जरूर पैदा हो गये. बदला अगर कुछ तो सिर्फ इतना ही कि कल तक गांव के जमींदारों के हुक्म पर वोट डालने वाले गरीब अब एक बोतल दारू और पांच सौ की हरी पत्ती पर वोट डालते हैं. चुनाव के एक रात पहले पैसा और शराब बांटने पर चुनाव आयोग की रोक रहती है, मगर चुनाव से आठ-दस महीने पहले मनरेगा का सपना दिखाने और कैश सब्सिडी का गेमचेंजर पेश करने पर कोई रोक नहीं होती. सबसे बड़ी बात तो यह है कि गरीबों के लिए गांवों की गलियां छानने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी यह सब रास आता है.
मनरेगा से पहले क्या नहीं था, और मनरेगा के बाद क्या बदल गया. सिर्फ एक चीज... मजदूरी की दर... इसके अलावा...? राजीव गांधी के समय में भी रुपये में पांच पैसे ही लोगों तक पहुंचते थे, आज भी मनरेगा का पांच पैसा ही मजदूरों तक पहुंच पाता है. किसानों के कर्ज माफी से क्या बदला, किसान कल भी आत्महत्या करते थे, आज भी करते हैं... हां बैंक मैनेजरों और उनके दलालों के दुतल्ले मकानों में मारबल जरूर लग गया. क्या मनरेगा से पहले प्रधानमंत्री रोजगार योजना नहीं थी. इंदिरा आवास योजना में अब 70-75 हजार रुपये मिलने लगे हैं, तो क्या छप्पर के लिए टीन बेचने वाले दुकान बंद हो गये... हां, मुखियाजी ने ईंट का भट्ठा जरूर लगवा लिया.
दरअसल इसी खैराती अर्थव्यवस्था ने देश में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया. पहले ड्राइविंग लाइसेंस, जाति प्रमाण पत्र, चीनी के परमिट और गैस के कनेक्शन के लिए सौ-दो सौ रिश्वत लिये जाते थे. अब करोड़ों-अरबों की परियोजनाएं हैं और 40 फीसदी का कमीशन मंत्री जी के खाते में ही चला जाता है.
संताल परगना के एक लाभुक ने मनरेगा का कुआं तैयार करवाया और उस पर लगने वाले बोर्ड पर हिसाब लिख दिया कि किसे कितना परसेंट पीसी देना पड़ा. अंत्योदय और अन्नपूर्णा जैसी खैराती योजनाएं भी हैं और इसे खैरात की तरह ही बांटा जाता है. इसका लाभ पाने वालों में इतनी हिम्मत नहीं कि देने वाले से कह सके कि भाई साहब वजन चेक कर लें... पेंशन योजनाएं हैं और इन्हें पाने के लिए गांवों और कस्बों के बैंक में महीने के पहले हफ्ते दिन-भर मेला लगा रहता है. विधवाएं और बुजुर्ग सुबह आते हैं और शाम तक पड़े रहते हैं. क्या यह खैरात नहीं...
खैर, इस बजट में चिदंबरम साहब ने न जाने क्या सोचकर मनरेगा का बजट घटा दिया है. देर सवेर इस बात का आकलन भी होगा कि इस मनरेगा से क्या फायदा हुआ. आकलन करने वाले यह भी साबित कर सकते हैं गरीबों का काफी भला हुआ. हालांकि कुछ लोग इस बात का आकलन भी करें कि जितना खर्च हुआ उसके मुकाबले कितना लाभ हुआ. मगर क्या इस बात का भी आकलन होगा कि कितने लोगों को आजन्म रोजगार की गारंटी मिली. कितने लोगों को सूद चुकाने से मुक्ति मिली. कितने भूमिहीनों को खेती के लिए जमीन मिल गयी. अगर आप गांवों में जाते होंगे और गरीबी रेखा से नीचे के लोगों से मिलने का मौका मिलता होगा तो आपने जरूर गौर किया होगा. अगर नहीं किया तो एक ही वर्ग के एक मनरेगा मजदूर और स्वयं सहायता समूह की एक महिला से मुलाकात करें. फिर तय करें कि किसकी जिंदगी बदली और इस बदलाव की खातिर सरकार का कितना पैसा किस योजना के लिए खर्च हुआ. एक-एक, दो-दो रुपये हर हफ्ते जमा करने वाली औरतें कैसे साल भर में महाजनों से मुक्ति पा लेती हैं. और दो-चार सालों में इंटरप्रेण्योर बन जाती हैं. ... और मनरेगा के मजदूर को तो हर साल मनरेगा ही चाहिये होगा.
... और यह फर्क कोई छोटा सा फर्क नहीं है. यही फर्क इस देश की तकदीर साबित होने वाला है. 2005 तक जब इस देश में यूपीए का शासन नहीं शुरू हुआ था इसी स्वयं सहायता समूह को देश की गरीबी मिटाने का सबसे बड़ा फार्मूला माना जाता था. मगर जैसे ही नरेगा कानून बना, इसे ही हर रोग की दवा मान लिया गया. मेहनत, बचत और व्यापार का फार्मूला खारिज होने लगा और नरेगा का खैराती फार्मूला हिट होने लगा. गरीब मेहनतकश से लाभार्थी में बदल गया. इस खैरात ने भ्रष्टाचार को जन्म दिया और भ्रष्टाचार ने हताशा को. आज उसी खैराती फार्मूला का नया दावं है कैश सब्सिडी और फूड सिक्योरिटी. मगर हताशा इतनी फैल गयी है कि हर खैरात गरीबों का मुंह चिढा रहा है...