Tuesday, December 31, 2013

भाजपा और दिसंबर के आखिरी तीन हफ्ते


महज दो हफ्ते पहले तक नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री के तौर पर ताजपोशी लगभग तय लग रही थी और सांप्रदायिकता के नाम पर मोदी की मुखालफत करने वाले कई लोगों ने देश छोड़ने तक की घोषणा कर दी थी. मगर पिछले तीन हफ्तों में काफी कुछ बदल गया है. अब अरविंद केजरीवाल भी रेस में शामिल हो गये हैं और मोदी का समर्थन करने वाले कई लोग सोचने लगे हैं कि अगर बेहतर आदमी को चुनना है तो केजरीवाल को ही क्यों न चुन लिया जाये. मीडिया भी मोदी से अधिक स्पेस आम आदमी पार्टी और केजरीवाल को देने लगा है और दबे स्वर में यह भी कहा जा रहा है कि कहीं केजरीवाल और आम आदमी पार्टी अगले लोकसभा चुनाव में मोदी और भाजपा के सपनों की उड़ान पर ब्रेक न लगा दे. खुद भाजपा समर्थक डिफेंड करने के मूड में नजर आ रहे हैं. उन्हें लग रहा है कि मीडिया उनकी जीत को अंडरप्ले कर रहा है और आप को बेवजह इतना महत्व दिया जा रहा है. महज बीस-पच्चीस दिनों में यह बदलाव कैसे आ गया.
8 दिसंबर को जब चुनाव परिणाम आये थे तो ऐसा माहौल नहीं था. बदलाव के भाजपा के दावों पर जनता ने मुहर लगा दी थी. चार राज्यों में भाजपा नंबर वन पार्टी बनकर उभरी थी. राजस्थान और मध्य प्रदेश में तो पार्टी ने कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया था. दिल्ली में भी पार्टी का प्रदर्शन शानदार था. मगर आम आदमी पार्टी को अनापेक्षित तौर पर मिली 28 सीटों ने उसे न सिर्फ सकते में डाल दिया बल्कि सत्ता से चार कदम दूर कर दिया.
अगर ये 28 सीटें कांग्रेस को आयी होतीं तो भाजपा के लिए इतनी परेशानी नहीं होती, मगर एक नयी पार्टी जिसे बने जुम्मा-जुम्मा चार दिन हुए थे उसकी यह सफलता खुलकर कह रही थी कि जनता के दिलों में सिर्फ मोदी या बीजेपी नहीं है. जहां लोगों को बेहतर विकल्प मिलेगा लोग उसे ही वोट देंगे. इस नतीजे ने भले ही राहुल गांधी को पीएम बैटल से बाहर कर दिया मगर केजरीवाल के रूप में मोदी के लिए एक मजबूत प्रतिस्पर्धी को सामने ला खड़ा किया.
चीजें महज आप की जीत से ही नहीं बदली, बल्कि सरकार के गठन को लेकर उसके द्वारा अपनायी गयी नीतियों के कारण बदली. एक तरफ तो प्रेस कांफ्रेस में राहुल आप के तौर-तरीकों को कांग्रेस द्वारा अपनाने की वकालत करते नजर आये, दूसरी तरफ भाजपा सरकार गठन के लिए जोड़-तोड़ से परहेज करती दिखी. इसका संदेश दूर तय गया और लोगों ने देखा कि एक अच्छी पार्टी के कारण देश की बड़ी पार्टियां खुद को बदलने के लिए तैयार है. इसने देश भर में आप की ख्याति को चार चांद लगा दिये.
मगर प्रथम प्रतिक्रिया के रूप में इमानदार दिखने की कोशिश करने वाली दोनों पार्टियों ने बाद में तय कर लिया कि वे अपने छल-प्रपंचों से आप की इमानदारी की पोल खोलेंगी और उसे जनता के बीच शर्मसार करेंगी. यह वही खेल था, जो कुछ दिनों पहले कांग्रेस ने भाजपा के खिलाफ खेला था और येन-केन प्रकारेण साबित कर दिया था कि अगर कांग्रेस भ्रष्ट है तो भाजपा भी दूध की धुली नहीं. इस खेल में मात खायी भाजपा ने इस बार कांग्रेस का भरपूर साथ दिया, क्योंकि आम आदमी पार्टी दोनों के लिए बराबर तौर पर खतरनाक थे.
कांग्रेस ने बिना शर्त समर्थन का वादा कर दिया और भाजपा उस पर जिम्मेदारी से बचने का आरोप लगाने लगी. इस बीच दोनों ने मिलकर कामचलाउ लोकपाल पर अन्ना और किरण बेदी से मुहर लगवा ली और देश को यह दिखाने की कोशिश की कि आप वाले तो अडंगेबाज हैं. अन्ना तैयार हैं मगर वे कानून बनने नहीं दे रहे. मगर दुर्भाग्य से उनका यह दावं चला नहीं. लोगों की सहानुभूति आप की तरफ और बढ़ गयी, लोगों ने देखा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग में भाजपा जैसी पार्टी और अन्ना जैसे सफेद छवि के लोग भी समझौता करने के लिए तैयार हैं. आप उनकी लड़ाई में अकेली पड़ गयी है. भ्रष्टाचार के खिलाफ अलग-अलग रैलियों में कांग्रेस का मखौल उड़ाने वाले मोदी इस दौरान चुप ही रहे.
जैसे यह सब किसी कसी हुई फिल्म की स्क्रिप्ट की तरह था. दो-तीन महीने पहले तक कांग्रेस की वोट कटुआ कही जाने वाली पार्टी के खिलाफ भाजपा और कांग्रेस एक होकर हमले कर रही थी. फिर आप की सरकार भी बनी और आज सरकार ने अपने गठन के महज तीन दिन बाद अपना पहला वादा भी पूरा कर लिया है. लगातार चीजें आप के पक्ष में जा रही है, वे तमाम विरोधों के बीच निखर रहे हैं और उभर कर सामने आ रहे हैं.
क्या यह सब अचानक हो गया, क्या यह बिल्ली के भाग से छीक टूटने जैसा मामला है? अगर आप ऐसा सोचते हैं तो इसका मतलब आप इंडिया अगेंस्ट करप्शन का वह आंदोलन भूल गये हैं और आपको सुभाष अग्रवाल और दूसरे आरटीआई एक्टिविस्टों की कहानियां नहीं मालूम.
दरअसल आज जो कांग्रेस के खिलाफ हवा है वह किसी मोदी या किसी भाजपा की करामात नहीं है. यह सब इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन से उपजा है और इसके पीछे आरटीआई की ताकत है जिसके सबसे बड़े पैरोकार खुद अरविंद केजरीवाल हैं. उनकी संस्था परिवर्तन है.
सुभाष अग्रवाल ऐसे अकेले शख्स हैं जिनके आरटीआई आवेदनों की वजह से टू जी स्पेक्ट्रम घोटाले और कॉमनवेल्थ घोटाले समेत कई घोटाले उजागर हुए. और इंडिया अगेंस्ट करप्शन का वह आंदोलन ही देश भर में यूपीए सरकार के खिलाफ माहौल बनाने की वजह बना जिसके पीछे वही टीम थी जो आज आम आदमी पार्टी के नाम से एक राजनीतिक दल के रूप में हमारे सामने है.
भाजपा ने तो सात-आठ साल तक कांग्रेस के साथ तकरीबन सत्ता सुख ही भोगा है. उन्होंने कभी किसी बात का ढंग से विरोध नहीं किया. दिल्ली में कायम भाजपा की मशहूर चौकड़ी ने हर बार यूपीए की गलत नीतियों को वॉक ओवर दिया. बदले में अपने लिए सहूलियतें हासिल कीं. विरोध भी दिखावे के लिए ही हुए.
दरअसल भाजपा की इच्छा तो यह थी कि अन्ना, अरविंद, रामदेव और दूसरे लोग मिलकर आंदोलन करें और सरकार के खिलाफ माहौल बनायें. और बाद में उस माहौल की सवारी भाजपा खुद करे और देश भर में जीत हासिल कर सरकार बनाये. मगर टीम केजरीवाल ने राजनीतिक पार्टी बनाकर उनके सपनों पर अडंगा डाल दिया. इसके बावजूद भाजपा इसी मुगालते में रही कि एक नयी पार्टी कितना फर्क डाल पायेगी. मगर दिल्ली की जनता ने जो डरते-डरते आप को वोट डाले उसकी बदौलत पार्टी को 28 सीटें आ गयीं. बाद में आप की सरकार भी बन गयी.
दिल्ली में जीत और आप की सरकार बनने से कहीं न कहीं यह संदेश जरूर गया है कि आप एक दमदार विकल्प है और ऐसा नहीं है कि उसे स्टेबल होने में वक्त लगेगा. वह कम समय में एक मजबूत विकल्प बनकर उभरी है. लोग यह भी सोचते हैं कि अगर सपा, बसपा और अन्नाद्रमुक जैसी पार्टियां 25-30 सीटें लाकर प्रधानमंत्री की सीट पर दावा कर सकती हैं तो आम आदमी पार्टी ही इससे अधिक सीटें जीत सकती है और वह दिल्ली मॉडल पर बिना मजबूर हुए देश में सरकार भी बना सकती है. यह विकल्प भाजपा और मोदी के लिए खतरे की घंटी है. सुना है भाजपा आप के असर को लेकर एक आंतरिक सर्वेक्षण भी करा रही है.
भाजपा के लोग कहने लगे हैं कि मनोहर पर्रिकर और रमन सिंह अरविंद से अधिक इमानदार और जमीन से जुड़े नेता हैं, मगर मीडिया का अटेंशन सिर्फ आप पर फोकस है. मगर वे यह नहीं समझते कि सरकार के मुखिया का इमानदार होना काफी नहीं है, मनमोहन सिंह की इमानदारी की कीमत पूरा देश चुका रहा है. व्यक्तिगत इमानदारी के साथ बदलाव लाने की ताकत भी जरूरी है. आम आदमी पार्टी का महत्व सिर्फ बेहतर विकल्प के तौर पर नहीं है. यह राजनीति के तौर-तरीकों को बदलने की कोशिश है. ऊपरी तौर पर इमानदार और साफ-सुथरे दिखने के बावजूद भाजपा अपना पूरा कैंपेन जिस फिजूलखर्ची के साथ चला रही है, वह क्या जायज है. क्या लोगों की निगाह में यह फिजूलखर्ची नहीं आती.
हाल के वर्षो में भाजपा ने कांग्रेस की कार्य संस्कृति को अपना लिया है. वहां भी भ्रष्टाचार कोई दबी-छुपी बात नहीं रही. उनके नेता सामंती ठाठ में जीते हैं. मनोहर पर्रिकर या रमन सिंह के उदाहरणों को ही कितने भाजपाई अपनाने के लिए तैयार हैं. दबंगों से भी उन्हें परहेज नहीं है. वहां भी सीडी कांड होते हैं और कोल ब्लॉक के लिए उद्योगपतियों को मदद दी जाती है. यह ठीक है कि भाजपा कांग्रेस के मुकाबले बेहतर विकल्प है, और इसी वजह से उन्हें लोगों का समर्थन भी है. मगर जब लोगों को बेहतर और कारगर विकल्प दिख जाता है तो वह कामचलाऊ विकल्प पर क्यों ध्यान दे.
आज भाजपा के नेता फिर से लोगों के मुद्दों को लेकर सड़क पर उतरने लगे हैं, मगर पिछले दस सालों में नेताओं ने इस परंपरा का परित्याग कर दिया था. मुङो याद है कभी भागलपुर में बिजली संकट के आंदोलनों से नेता के रूप में उभरे अश्विनी चौबे मंत्री बनने के बाद भागलपुर भी कम ही आते थे. पिछले दस सालों में भाजपा के कार्यकर्ताओं ने कब आम लोगों के मुद्दे पर सड़क पर उतरकर विरोध किया हो याद नहीं आता. हां अपनी पार्टी या अपने नेताओं के मुद्दे पर वे देश बंद करवा सकते हैं.
यही वजह है कि प्रमुख विपक्षी पार्टी होने के बावजूद देश के कोने-कोने तक चल रहे जनांदोलनों में उसकी भागीदारी नगण्य रही है. चाहे सवाल चुटका में स्थापित होने वाली परमाणु परियोजनाओं का हो या रांची के नगड़ी में भूमि अधिग्रहण की लड़ाई. चाहे मुजफ्फरपुर में एसबेस्टस फैक्ट्री का विरोध हो या नंदीग्राम का संघर्ष. भाजपा जनसंघर्षो से कोसों दूर हो गयी है. यहां तक कि दिल्ली में दामिनी वाले मामले में भी उनसे अधिक सक्रिय अलका लांबा का संगठन रहा. जन संघर्षो से दूरी ने भाजपा को अंदर से कमजोर किया है. इन बातों को छोड़ भी दें तो महंगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ भी उसके कार्यकर्ताओं ने कभी दमदार प्रतिरोध दर्ज नहीं किया. यूपीए सरकार लोगों को पीसती रही और भाजपा खानापूर्ति करती रही.
आज भाजपा कार्यकर्ता वीरभद्र सिंह के खिलाफ मजबूर होकर सड़कों पर उतरे हैं. कांग्रेस भी कल लोकपाल के लिए धन्यवाद देने सड़कों पर उतरी थी. ये नये जमाने के राजा सड़कों पर आम आदमी पार्टी की नकल करते नजर आ रहे हैं. मगर पिछले दस सालों में एक विपक्ष के तौर पर भाजपा ने जो अपनी साख गंवायी है क्या उसे मोदी के मुखौटे से हासिल करना इतना आसान है?

Sunday, December 29, 2013

रांची में शेर गरजा, किसने देखा


हमारा शहर रांची महीने भर से शेर की दहाड़ सुनने का इंतजार कर रहा था. हर चौक-चौराहे पर मोदी होर्डिंगों में टंगे थे और गाड़ियों में पोस्टर फड़फड़ा रहे थे. हर तरफ शोर बरपा था कि मोदी आने वाला है और शेर गरजने वाला है. तकरीबन दो-तीन हफ्ते पहले जब सोनू निगम हमारे शहर आया था तो मुझे याद आ रहा है कुछ इसी तरह की मारा-मारी पास के लिए मची थी और उस कार्यक्रम में मैं जिस आटो पर सवार होकर गया था वह कह रहा था कि आज से ज्यादा मजा 29 को आयेगा, जब मोदीजी आयेंगे. रांची छोटा सा शहर है, अभी ठीक से महानगर भी नहीं हो पाया है. यह ठीक है कि धौनी जैसा सुपरस्टार रांची का ही रहने वाला है, मगर क्रिकेट मैच, फिल्म स्टार और बड़े नेताओं का क्रेज अभी भी इस शहर में बरकरार है. लालू जी ने चारा घोटाला में दोषी करार होने के बाद यहीं जेल में वक्त गुजारा और जब तक रहे जेल वालों के लिए परेशानी का सबब बनकर ही रहे. रोज होटवार जेल के आगे उन्हें देखने वालों की भीड़ उमड़ती थी. यहां तो मीका और राखी सावंत भी आ जायें तो दंगा होने की संभावना रहती है.
इस लिहाज से मन डरा-डरा रहता था कि मोदी के आने से कुछ घटना-वटना न हो जाये, पटना में जो कुछ हुआ उसकी छाप मन से उतरती नहीं थी. यह ठीक है कि भाजपा वालों ने सीठियो गांव के लोगों को ठीक से मैनेज कर लिया और उन्हें उर्दू में बुलावा भेजकर यह साबित करने की कोशिश की कि भाजपा मोदी के नेतृत्व में और खास तौर पर मोदी को क्लीन चिट मिलने के बाद किस तरह धर्म निरपेक्ष होती जा रही है. सीठियो वाले बेचारे अपने गांव पर से आतंक का दाग मिटाने के लिए रैली में पानी पिलाने के लिए भी तैयार हो गये.
हफ्ते भर से अखबारों में छप रहा था कि मंच ऐसा बनेगा, हैलीकॉप्टर ऐसे उतरेगा, मोदी इतनी देर रांची में ठहरेंगे और मंच पर फलां-फलां नेता बैठेंगे. कुल मिलाकर हवा ऐसी बंध गयी थी कि भाजपा के नेता ने आव न देखा ताव और घोषणा कर दी कि रैली में चार लाख लोग पहुंचेंगे. सवेरे-सवेरे मेरे कुछ रिश्तेदार रांची आने वाले थे, उन्हें मैंने यही सोचकर मना कर दिया कि 4 नहीं 3 लाख लोग भी आये तो गाड़ियों में इतनी भीड़ होगी कि उन्हें लटकने की जगह भी नहीं मिलेगी. मगर हाय रे इंतजाम, झारखंड के भाजपाइ बमुश्किल 60-70 हजार लोगों को ही जुटा पाये. हो सकता है बम-वम के डर से लोग अब मोदी की रैली में जाने से डरने लगे हों. हो सकता है झारखंडियों पर भी अरविंद केजरीवाल का नशा छाने लगा हो. मगर जो भी हो, रैली सामान्य ही थी. 5 रुपैया का टिकस लगाते तो तीन लाख टका ऊपर होता. स्टेज का खर्चा भी उपर नहीं हो पाता. वैसे झारखंड भले गरीब हो यहां की नेता-नगरी गरीब नहीं है, रैली का खर्चा तो अकेले झारखंड क्रिकेट एसोशियेसन के अध्यक्ष अमिताभ चौधरी ही उठा सकते थे, जो लंबे समय से भाजपा ज्वाइन करने के लिए प्रयासरत हैं और शहर के हर ऑटो पर नया चेहरा-नया विकल्प टाइप पोस्टर लगाकर अपनी ब्रांडिंग कर रहे हैं. नहीं तो अपने निशिकांत दुबे हैं ही. पैसे-वैसे का कोई मसला नहीं है झारखंड बीजेपी के पास. आठ-दस करोड़ तो छोटा-मोटा एमएले भी खर्च सकता है. मगर राजनाथजी और मोदीजी ने जो बड़ा टास्क इनके सिर पर डाल दिया है वह बहुत कठिन काम है. कहके गये हैं कि इस बार 14 की 14 सीट चाहिये. जबकि हकीकत यह है कि यहां जो सीट है वही बचा पाना मुश्किल है. खैर..
मोदी की रांची रैली को लेकर कई तरह की उत्सुकताएं मन में थीं, उम्मीद थी कि क्लीन चिट मिलने की खुशी जाहिर करेंगे और अरविंद केजरीवाल की निर्थकता का बखान करेंगे. मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ. लगता है मोदी का स्क्रिप्ट राइटर एक साथ सारे लोकेशन के लिए स्क्रिप्ट लिखकर चला गया है और मोदीजी को वही पढ़ना पर रहा है. किसी भाषण में न आम आदमी पार्टी है और न ही नयी राजनीति का फलसफा. वही सोनिया, वही राहुल नये में सिर्फ राज्य की समस्या. अगर उस राज्य में अपनी सरकार है तो तारीफ करो और अपनी सरकार नहीं है तो कमियां गिनाओ.
13 साल का छत्तीसगढ़ भी था और किशोर होने पर अच्छे परवरिश के लिए रमन सिंह को जिताने की अपील की गयी थी. 13 साल का झारखंड भी है और बुरी परवरिश के लिए कांग्रेस को गलियाया गया. मोदी भूल गये कि यहां उनके ही अर्जुन मुंडा तीन बार यहां सीएम बन चुके हैं और एक बार बाबूलाल मरांडी ने उनकी पार्टी में रहते हुए सीएम का पद संभाला है, यहां आठ साल तक भाजपा ने ही शासन किया है. खैर, भाषण एक ऐसी कला है जिसमें लोग आपकी बात सुनने के लिए तैयार हैं तो तथ्यों की गलतियों का रिस्क लिया ही जा सकता है.
अमीर झारखंड के गरीब लोग और अधिक बारिश वाले झारखंड में जलसंकट जैसे झारखंड के सदाबहार मुद्दों पर उन्होंने खुल कर बोला और राहुल की आकाशवाणी का भी मजाक उड़ाया. बहरहाल पत्रकार साथियों ने कहा इस बार मोदी फीके-फीके नजर आ रहे थे. जवाब मे मैंने कहा कि हो सकता है कि क्लीन चिट मिलने के बाद उनकी हालत वैसी ही हो गयी हो, जैसे शेर की दांत तोड़ देने के बाद उसकी गुर्राहट का बुरा हाल हो जाता है. मोदी की दबंगई ही उनका यूएसपी है, क्लीन चिट मिलने के बाद वे जरूर राहत महसूस कर रहे होंगे मगर लोगों की नजर में उनका असर कम ही हुआ नजर आ रहा है.
परेश रावल वाली अंदाज में उसी आरोह-अवरोह में मोदी जी शहजादे की जगह आकाशवाणी और छत्तीसगढ़ के बदले झारखंड बोलते रहते. मगर बार-बार लग रहा था कि यह रिकार्ड घिसने लगा है. ठीक उसी तरह जैसे बचपन में मेरे एक भैया सुबह से शाम तक सलमान खान की फिल्म कुरबान का गाना तू जब-जब मुझको पुकारे सुनाते थे. पहले तो गांव के लोगों को वह गाना काफी पसंद आया मगर एक हफ्ते में ही लोगों ने कहा, बंद करो, एकै गाना कितना सुनाओगे.
ऐसे में यही कहूंगा कि मोदीजी कम गाइये, गाना बदल-बदलकर गाइये. बढिया रहेगा. वैसे तहलका वाले निरालाजी ने सुझाव दिया है कि जो संसद, लाल किला और पीएमओ बनवाना है अहमदाबाद में ही बनवा लीजिये. वहीं बदल-बदल कर भाषण दीजिये. अलग-अलग स्टेट के नेताओं को वहीं बुला लीजिये. काहे ऐतना परेशान होते हैं....