Friday, December 26, 2014

फ्लोराइड ने छीन ली कचहरिया डीह की जवानी


कचहरिया डीह बिहार के नवादा जिले का एक बदनसीब टोला है. रजौली प्रखंड के हरदिया पंचायत में स्थित इस गांव को आस-पास के लोग विकलांगों की बस्ती कहते हैं. 71 घरों वाले इस छोटे से टोले के सौ के करीब जवान लड़के-लड़कियां चलने-फिरने से लाचार हैं. उनकी हड्डियां धनुषाकार हो गयी हैं. यह सब तीन दशक पहले शुरू हुआ जब अचानक इस बस्ती के भूजल में फ्लोराइड की मात्रा तय सीमा से काफी अधिक हो गयी और बस्ती स्केलेटल फ्लोरोसिस के भीषण प्रकोप का शिकार हो गया. हालांकि मीडिया में लगातार यहां की परिस्थितियों पर खबरें आने से एक फायदा तो यह हुआ कि सरकार का ध्यान इस और गया और यहां वाटर ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित हो गया. मगर देखरेख के अभाव में पिछले दिनों वह चार माह से खराब पड़ा था, महज दस दिन पहले यह ठीक हुआ है.
पूरी एक पीढ़ी बरबाद हो गयी
टोले की शुरुआत में ही संतोष मिलते हैं. उनके दोनों पैर धनुषाकार मुड़े हुए हैं. वे घिसट-घिसटकर चलते हैं. उनकी उम्र 19-20 साल के करीब है. उनके पिता कहते हैं, दस साल की उम्र तक संतोष बड़ा तंदरुस्त बच्चा था. फिर अचानक यह गड़बड़ाने लगा. इसका पांव मुड़ने लगा और फिर इसकी यह हालत हो गयी. आगे बढ़ने पर संतोष की तरह के और भी कई युवा मिलते हैं जिनकी हालत ऐसी ही है. इनमें कारू रजवार के पुत्र शिवबालक, बालो भुइयां के पुत्र ब्रह्मदेव, लालो राजवंशी के पुत्र पंकज आदि हैं. एक स्थानीय ग्रामीण ईश्वरी राजवंशी कहते हैं, इस गांव में आपको 16 से 24 साल का कोई नौजवान ऐसा नहीं मिलेगा जिसकी हड़्डी सही सलामत हो. फ्लोराइड के कारण पूरी एक पीढ़ी बरबाद हो गयी.
ऐसा नहीं है कि फ्लोराइड की फांस ने सिर्फ बच्चों और युवाओं को अपने कब्जे में लिया है. प्रौढ़ों और बुजुर्गों की हालत भी ठीक नहीं है. बिस्तर से उठने में उनका दम निकल जाता है. कोई झुकने कह दे तो जान मुंह को आ जाता है. हां, यह जरूर है कि वे बच्चों और युवाओं की विकलांग नहीं हुए, क्योंकि जब पानी में फ्लोराइड की मात्रा बढ़ी तो उनका शरीर इतना मजबूत हो चुका था कि वह फ्लोराइड का मुकाबला कर सके. मगर जोड़ों के दर्द और भीषण किस्म के आर्थराइटिस से वे खुद को नहीं बचा पाये. 50 साल की पन्ना देवी बताती हैं कि खाट ही अब उनका जीवन है. वे बताती हैं कि दोनों पैर नाकाम हो चुके हैं. हाथ ऊपर नहीं उठता. गोवर्धन भुइयां, द्वारी राजवंशी और ईश्वरी राजवंशी समेत कई लोगों का यही हाल है.
पानी में अचानक कैसे फ्लोराइड बढ़ गया
टोले के लोग बहुत पढ़े लिखे नहीं हैं, इसलिए उन्हें तारीखें या साल याद नहीं रहता. मगर वे बताते हैं कि पहले इस गांव का पानी ऐसा नहीं था. जबसे हरदिया में फुलवरिया डैम बना है उसके कुछ दिन बाद से यहां के कुओं का पानी तीता लगने लगा. उसके कुछ साल बाद से ही बच्चे विकलांग होते चले गये. जब तक लोग कुछ समझ पाते कि परेशानी की वजह क्या है यहां सौ से अधिक बच्चे विकलांग हो चुके थे. बिहार सरकार के रिकार्ड में बताया जाता है कि फुलवरिया डैम का निर्माण 1988 में पूरा हुआ है. स्थानीय विशेषज्ञ मानते हैं कि डैम के पानी के सिपेज से ही इस टोले के भूमिगत में फ्लोराइड की मात्रा अचानक बढ़ गयी और इसका नतीजा इस रूप में सामने आया. कचहरिया डीह के पेयजल में फ्लोराइड की मात्रा 8 मिग्रा प्रति लीटर पायी गयी है. जबकि यूनिसेफ ने पेयजल में फ्लोराइड की परमिशेबल लिमिट 1.5 मिग्रा प्रति लीटर तय की है.
मीडिया में छा गया कचहरिया डीह
2002 के बाद के सालों में कचहरिया डीह की खबरें मीडिया में लगातार आने लगी. इससे सरकार पर दबाव बढ़ा और लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग के अधिकारी बार-बार यहां आने लगे. स्थानीय अधिकारियों ने भी कचहरिया डीह पर विशेष ध्यान देना शुरू किया. इसके दो फायदे हुए. पहला, यहां एक वाटर ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित हो गया और टोले में सार्वजनिक पेयजलापूर्ति के कई नल लग गये. दूसरा तत्कालीन डीएम विजयलक्ष्मी ने यहां कैंप लगाकर कई विकलांगों का निःशक्तता प्रमाणपत्र बनवा दिया. सरकार द्वारा किये गये इन प्रयासों की वजह से एकबारगी लगने लगा कि अब इस गांव की सारी समस्याएं सुलझ जायेंगे. इस वजह से कचहरिया डीह से मीडिया अटेंशन भी कम होने लगा.
नाकाफी साबित हुए ये उपाय
सरकारी संस्थाओं द्वारा किये गये ये दोनों उपाय कुछ ही सालों में नाकाफी साबित होने लगे. वाटर ट्रीटमेंट प्लांग के संचालक दिलीप यादव बताते हैं कि तकरीबन 44 महीने ठीक-ठाक चलने के बाद प्लांट का मोटर बिगड़ गया और इसे सुधरवाने में चार महीने लग गये. इस बीच गांव के लोग दूर-दराज से पानी लाकर काम चलाते रहे. वे कहते हैं कि अब तक इस प्लांट को लगे 49 महीने बीत चुके हैं, मगर उन्हें अब तक सिर्फ 15 महीनों का मेहनताना मिला है. ऐसे में वे अब इस जिम्मेदारी से मुक्त होने की कोशिश कर रहे हैं.
वहीं, निःशक्तता प्रमाण पत्र बनने के बाद से अब तक यहां के विकलांगों को सिर्फ एक बार निःशक्तता पेंशन मिला है. उसके बाद उनका पेंशन कहां गया यह उन्हें पता नहीं. विकलांगता की वजह से यहां के नब्बे फीसदी युवा पढ़ाई-लिखाई में पिछड़ गये हैं. अब वे अपने परिवारों पर बोझ बनकर रह गये हैं. जबकि उनके लिए एक विशेष पाठशाला खोले जाने की जरूरत थी ताकि वे पढ़ लिखकर मुख्य धारा में आ सकें. कोई नौकरी कर सकें या रोजगार शुरू करके आत्मनिर्भर हो सकें.
निःशक्तों को मिलने वाला सामाजिक पेंशन अब टोले में एक राजनीतिक मसला बन चुका है. टोले के लोग मानते हैं कि उनका पैसा ग्राम सेवक हड़प कर जा रहे हैं. ईश्वरी राजवंशी अपनी बेटी ममता कुमारी का सामाजिक पेंशन का पासबुक दिखाते हुए शिकायत करते हैं कि कैसे ग्राम सेवक ने उस पर दो फरजी एंट्रियां कर दी हैं, जबकि उन्हें पेंशन का एक पैसा नहीं मिला. वार्ड नौ की वार्ड सदस्य सिया देवी भी इस बात की तसदीक करती हैं.
ट्रीटमेंट प्लांट से आया बदलाव
हालांकि यह कहना गलत होगा कि ट्रीटमेंट प्लांट से कचहरिया डीह को कोई खास लाभ नहीं हुआ. यह प्लांट द्वारा मिलने वाले शुद्ध पेयजल का ही लाभ है कि टोले के नये बच्चों में से कोई विकलांग नहीं हुआ. किसी को फ्लोरोसिस की परेशानी नहीं है. मगर जो लोग एक बार इससे प्रभावित हो चुके हैं, उनकी स्थिति जस की तस है. उनके लिए विशेष इलाज की दरकार है.
पड़ोस के गांव में भी पसर रहा संक्रमण
इस बीच कचहरिया डीह के पड़ोस के गांव पुरानी हरदिया के दो-तीन मुसलिम परिवार भी स्केलेटल फ्लोरोसिस की चपेट में आ गये हैं. ऐसा लगता है कि इस बस्ती में भी अब डैम का सिपेज घुसने लगा है. गांव के जसीम अंसारी के पांव भी कचहरिया डीह के बच्चों की तरह मुड़ गये हैं. रहमान अंसारी(62) और असगरी खातून(48) जोड़ों के भीषण दर्द से परेशान रहते हैं और चलने-फिरने से लाचार हो गये हैं. सगीना खातून(10) के पांव टेढ़े होने लगे हैं. इनकी तरफ किसी का ध्यान नहीं है.
कचहरिया एक केस स्टडी है. गया-नवादा में ऐसे कई गांव हैं, जहां ऐसी ही हालत है. दक्षिण बिहार में फ्लोराइड प्रभावित गांवों में कोई पॉलिसी बनाकर ही सरकार को काम करना होगा. ताकि वहां के लोगों को राहत मिल सके. - अशोक घोष, अध्यक्ष, पर्यावरण एवं जल प्रबंधन विभाग, एएन कॉलेज, पटना
कचहरिया डीह में वाटर ट्रीटमेंट प्लांट का निर्माण इन्वायरोटेक प्रा. लिमिटेड द्वारा कराया गया था और इसके मेंटेनेंस का जिम्मा वाटरलाइफ इंफ्राटेक को दिया गया था. पिछले तीन चार महीने से मेंटेनेंस देखने वाली कंपनी काम ठीक से नहीं कर पा रही. कुछ माह पहले जो मशीन खराब हुई थी उसकी मरम्मत का जिम्मा कंपनी का था. मगर कंपनी ने कोई पहल नहीं की, बाद में विभाग की ओर से ही उसे ठीक कराया गया. - रामजी प्रसाद, एसडीओ, रजौली अनुमंडल, नवादा

Wednesday, December 24, 2014

ओ माइ गॉड की कहानी और बर्फी का किरदार, कृष वाली हीरोइन, पीके तैयार


डिस्क्लेमर - इस समीक्षा का मकसद उस सवाल का जवाब हासिल करना नहीं है कि इस फिल्म में हिंदुओं का या हिंदू धर्म का मजाक उड़ाया गया है या नहीं. हम यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि यह फिल्म कैसी बनी है.
अब इस फिल्म की समीक्षा.
1. राजकुमार हिरानी और आमिर खान. ये दोनों इस समय बालीवुड के सबसे प्रतिभाशाली लोगों में से एक हैं. इसलिए उनसे एक बेहतरीन फिल्म की अपेक्षा दर्शक करता है. संभवतः इसी वजह से इस फिल्म के टिकट की कीमत भी अधिक वसूली जा रही है. दोनों ने अपने काम से उत्कृष्टता के अलग बैरोमीटर निर्धारित किये हैं, इसी लिहाज से उनके काम की परख की जाती है, जानी चाहिये.
2. राजकुमार हिरानी की फिल्मों का अब तक मूल मैसेज रहा है कि पढ़े-लिखे लोग कंफ्यूज करते हैं और कम पढ़े और नातजुर्बेकार लोग कई दफा सीधी सटीक बातें करते हैं और बड़ी समस्याओं का हल चुटकियों में निकाल देते हैं. चाहे मुन्नाभाई एमबीबीस की जादू की छप्पी हो, लगे रहो मुन्ना भाई की गुलाब या थ्री इडियेट्स का स्लोगन ऑल इज वेल. पीके भी इसी कड़ी में रांग नंबर का फार्मूला लेकर आयी है और इस बार उनका प्रहार धर्म के ठेकेदारों पर है.
3. मगर दिक्कत यह हुई कि इसी मसले पर ओ माइ गॉड के नाम से बहुत ही शानदार फिल्म बन चुकी है. जो टू द प्वाइंट प्रहार करती है. ओ माइ गॉड की वजह से पीके का विषय बासी लगने लगा है. खबर आयी है कि आमिर ने ओ माइ गॉड की शूटिंग रुकवाने के लिए आठ करोड़ की पेशकश की थी. मगर फिल्म आकर रही. लिहाजा पीके की टीम को सोचना पड़ा होगा कि ऐसा क्या करे कि उनकी फिल्म ओ माइ गॉड से अलग और बेहतर लगे.
4. जैसा कि हम सब जान चुके हैं कि इस फिल्म में पीके एक एलियन है. कोशिश की गयी है कि एक एलियन की निगाह से हम खुद अपनी धार्मिक व्यवस्था को टटोलें और समझें कि इसे हमने कैसे उलझाकर गड़बड़ा दिया है. हम धर्म के नाम पर क्या-क्या ढकोसले करने लगे हैं. ऐसे प्रयोग भारतीय फिल्मों में कई बार किये गये हैं. एलियन के नाम पर तो कम मगर यमराज को धरती पर बुलाकर स्क्रिप्ट रचा जाता रहा है. अभी सब टीवी पर सीरियल शुरू हुआ है, यम हैं हम. थीम यही है. एक सीरियल चल रहा है, बड़ी दूर से आये हैं. उसमें एक एलियन परिवार है. वह परिवार न सिर्फ धर्म बल्कि इस दुनिया की कई चीजों को नयी निगाह से देखता है और हम भी अपनी परंपराओं को उसकी निगाह से देखते समझते और उसके मूल तक पहुंचने की कोशिश करते हैं.
5. हां, यह फिल्म धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ नहीं है. ओ माइ गॉड ईश्वर के अस्तित्व पर सवाल खड़े करती है मगर यह फिल्म ऐसा नहीं करती. यह बस समझाने की कोशिश करती है कि हमने ईश्वर से संवाद करने का सहज तरीका खो दिया है. हमारे तरीके बेहद उलझाऊ, नकली और भ्रामक हैं. वह कहता है आप रॉंग नंबर लगायेंगे तो सही व्यक्ति से कैसे बात होगी. फिल्म मानती है कि दोष धर्म के ठेकेदारों औऱ दलालों का है वह हमें गलत तरीका बताते हैं. इस लिहाज से यह फिल्म उतनी बोल्ड नहीं है, जितनी ओ माइ गॉड थी.
6. ओ माइ गॉड एक सटायर थी और पीके फार्स. न जाने क्यों आमिर को एक जोकर जैसी भूमिका दी गयी है. पीके वाले पात्र को हंसी और ठहाकों का पात्र क्यों बनाया गया है, कतई समझ नहीं आता. पीके का किरदार कुछ ऐसा गढ़ा गया है जैसे वह सड़क पर भटकता मानसिक रोगी हो. दरअसल हिरानी साहब एक ऐसा किरदार गढ़ना चाह रहे थे जो अपनी सहज सीधी बातों से लोगों के दिल में उतर जाये. वह मूर्ख लगे, सीधा लगे मगर अपने सीधेपन में बात पते की करे. बिल्कुल दोस्तोएवस्की के नावेल इडियेट के मुख्य किरदार की तरह. मगर पीके का किरदार दिल को छू नहीं पाता, दिल में नहीं उतरता. आप जब पीके के किरदार की तुलना बर्फी के किरदार के करेंगे तो यह फर्क सहज ही महसूस करेंगे.
7. दरअसल पीके का किरदार कई मामले में बर्फी जैसा बनाने की कोशिश ही की गयी है. आमिर खान ने इस फिल्म में बिल्कुल बर्फी जैसी भाव भंगिमाएं अपनाने की नाकाम सी कोशिश की है. मगर यह हो नहीं पाया. बर्फी का किरदार अपने लफंदरपने के बावजूद आपको बहुत प्यारा लगने लगता था. मगर पीके का किरदार जोकरई की अंतिम सीमा तक चला जाता है. आपको पेट पकड़कर हंसाने की कोशिश में वह आपके मन में उतरना भूल जाता है.
8. बर्फी और ओ माइ गॉड के अलावा यह फिल्म कृष फिल्म के प्रभाव में भी नजर आती है. नायिका का पूरा किरदार और उसके टीवी चैनल के प्रसंग कृष वाले ढर्रे पर ही है. उसी तरह पीके नायिका के लिए स्टोरी बनता है.
9. पिछले साल में कई फिल्में ऐसी आयी हैं जिसमें कथाकार और निर्देशक फिल्म को किसी नतीजे पर पहुंचाने के लिए मीडिया का सहारा लेते हैं. पीके भी धर्म का भंडाफोड़ करने के लिए मीडिया की शरण में ही शरणागत है. इसे मैं कल्पनाशीलता की कमी के रूप में देखता हूं.
10. कल्पनाशीलता की कमी तो है ही, तभी तो पीके का किरदार बर्फी जैसा गढ़ा जाता है और थीम ओ माइ गॉड जैसी हो जाती है. नायिका कृष की नायिका जैसी.
11. फिल्म में एक ही धर्मगुरू है, निर्मल बाबा टाइप, हालांकि वह निर्मल बाबा से काफी अधिक शार्प है. पीके का मकसद उसे एक्सपोज करना है और उसके पास से अपना लॉकेट वापस लेना है, ताकि वह वापस अपने ग्रह पर जा सके. अगर कैनवास थोड़ा विस्तार लेता तो बेहतर होता. ओ माइ गॉड का कैनवास काफी बड़ा था.
12. फिल्म में पीके का किरदार भोजपुरी बोलने वाला और पान चबाने वाला क्यों बनाया गया है यह समझ से परे हैं. वह गुजराती, पंजाबी, मद्रासी कुछ भी बोल सकता था. हिंदी भी बोलता तो कोई फर्क नहीं पड़ता. संभवतः ऐसा कैरेक्टर को अलग रंग देने के लिए किया गया होगा. मगर आमिर भोजपुरी बोलते और पान चबाते हुए जमे नहीं. इस मामले में अमिताभ ने ऐसी लकीर खीच दी है कि उसके पास पहुंचना भी आसान नहीं है.
13. मेरे हिसाब से पीके एक कमजोर फिल्म है. पटकथा के हिसाब से, अभिनय के हिसाब से और प्रभावोत्पादकता के हिसाब से भी. संभवतः पीके के सामने निगेटिव किरदार का बहुत मजबूत नहीं होना भी इस फिल्म की एक कमजोरी है. बमन इरानी हैं, मगर एक असरहीन किरदार में. सौरभ शुक्ला को ज्यादा स्पेस ही नहीं मिला है. बस आमिर हैं और अनुष्का जो होठों का आपरेशन करवाने के बाद असामान्य दिखने लगी हैं. हां, सुशांत सिंह छोटी सी भूमिका में असर छोड़ गये हैं.
14. मुझे फिल्म का सबसे खूबसूरत हिस्सा वही लगा है जिसमें सुशांत सिंह और अनुष्का एक दूसरे के करीब आते हैं. वह हिस्सा दिल को छू लेता है.
15. इस फिल्म को देखकर महसूस किया कि अब समीक्षक भी आमिर से डरने लगे हैं. उन्होंने सोचा होगा कि इसे पांच से कम कितने स्टार दिये जायें. मुझसे पूछा जाये तो मैं ढाई स्टार से अधिक कतई नहीं दूंगा.

Sunday, December 21, 2014

क्या आपके साथ भी ऐसा होता है...


पिछले दिनों अपना एक रेयर सा अनुभव मैंने फेसबुक पर शेयर किया था. मुझे लगता था कि ऐसा सिर्फ मेरे साथ ही होता है. मगर फेसबुक पर लोगों ने जिस तरह इस अनुभव को लेकर टिप्पणियां की उससे लगा कि कई लोग ऐसा ही फील कर रहे हैं. मेरे लिए उनकी टिप्पणियां चकित कर देने वाली थी. इसलिए उन्हें कंपाइल कर पोस्ट का रूप दे दिया है.
मेरी उम्र 39 साल हो चुकी है, मगर मैं जब किसी 25-30 साल के व्यक्ति से मिलता हूं तो उससे पहली दफा ऐसे व्यवहार करता हूं, जैसे मैं अपने चाचा लोगों से किया करता हूं. 30-32 साल की कोई महिला दिखती है तो पहले झटके में वह मुझे मेरी बुआ या मौसी जैसी लगती है. 60 साल के किसी भी व्यक्ति में मैं अपने नाना की छवि देखता हूं, जबकि मेरे पापा की उम्र 60 से अधिक हो चुकी है. 65 साल की महिला में अपनी दादी की, जबकि अब मेरी मां भी 60 साल की उम्र तक पहुंचने जा रही है. मैं अपनी उम्र के किसी व्यक्ति से टकराता हूं तो पहले झटके में महसूस करता हूं कि वह मुझसे काफी बड़ा है.
ऐसा क्यों होता है? मेरे ये परसेप्शन उस वक्त के होंगे जब में 18-20 साल का रहा होउंगा. क्या उस उम्र के बाद मैं ठहर गया? मैं हमेशा खुद को उसी उम्र में क्यों महसूस करता हूं? मैं उसी वक्त में क्यों ठहरा हुआ हूं? कहीं यह आपके साथ भी तो नहीं होता... मुझे लगता है अधिकांश लोगों के साथ ऐसा होता होगा... मैं श्योर होना चाहता हूं. मैं इस फेनोमेना को समझना चाहता हूं. मुझे लगता है मनोविज्ञान का विशेष रूप से अध्ययन करने वाले साथी जरूर इस मसले को समझा पायेंगे, ऐसी उम्मीद है...
Anshu Mali Rastogi भाई जान अब क्या कहें। कुछ दिन पहले यह लिखा था सो पढ़ लें। http://chikotii.blogspot.in/2014/09/blog-post_25.html
Nishant Mishra मैं 40 का होने वाला हूं. मेरे साथ भी ऐसा ही होता है. मुझे लगता है मैं (मानसिक तौर पर) 25 पर अटका हूं.... चेहरे-मोहरे से भी 32-33 का ही लगता हूं. मुझसे 3-4 साल बड़े लोग अंकल जैसे लगते हैं मुझे. 1990 के आसपास के दौर के बारे में सोचते रहना मेरा पसंदीदा शगल है.
Anshu Mali Rastogi मैं भी Nishant Mishra G के साथ हूं।
Kumar Pratyush thoda bahut samay bhabhi ke saath gujara kare to aapni jagah pe aa jayenge
Rajesh Mishra ekdum hamare saath bhi yahi feeling hai .... Logon ko apne age se relate karne main mushkil ho rahi hai ...
Sujata Sharma Mujhe bhi bahut vakt lag raha hai. 20s-30s ka daur kuchh aapki batayee hui tarz par guzra.Us umr se abhi tak ye Aunty urf ANTI sambodhan behad behooda aur naagavaar lagta tha aur lagta hai,halaanki paidaishi umr se badi dikhti hun. Jis umr me pehla pyaar hua hota hai, kai log umr ko vahan rok lete hain,mera vyaktigat anubhav.
Sharad Shrivastav जब सपना देखते हैं तो उसमे अपने आपको किस उम्र का पाते हैं? उससे भी आप जान सकते हैं की मानसिक अवस्था मे आप किस उम्र मे अटके हैं।
Neelmadhav Chaudhary हाँ भाई मुझे भी ऐसा लगता है | समय के साथ उम्र तो बढ़ जाती है , पर मानसिकता शीघ्र स्वीकार नही कर पाता है | कभी कभी अपने जूनियर को भी भाइजी या भाइसाहेब कह जाता हूँ , और आजकल कोई बड़ा (यहाँ मेरा सिर्फ़ उम्र से वास्ता है) बनना नही चाहता स्वतः उसके चेहरे पे परेशानी के भाव उभर जाते है और इस बात के लिए साँरी बोलूँ ये भी कहाँ सहन होगा ना इधर ना उधर| बस मुस्कुराकर रह जाता हूँ|
Ajit Singh Mere saath bhi aisa he hota hai.
Tarun Rawal man to bachcha ha ji....
Pushya Mitra जी सर...
Ravi Singh Achha hai......
Suraj P. Singh · I wonder! Exactly the same thing happening to me.. I have never told this to anyone fearing to be declared as a sick man. I feel exactly the way you do.. and some times it seems quite awkward for me and for others.
Pushya Mitra मैंने इसी वजह से लिखा था कि लोग समझ पायें कि हम इन हालात में अकेले नहीं है.
Ravi Singh Waise mujhe toh aisa feel karna hi padta hai...... in the age of 37+ ....still i am unmarried
Devendra Yadav मानव जीवन का ये भ्रमपूर्ण सत्य है कि उसके युवावस्था के बिताये सुखद पल उसके शेष जीवन पर हावी होने की कोशिश करते हैं।
Sanjay Kumar Sah tum jo samjhe ho .. vahi sahi hai bhai.
Harendra Narayan Nostalgia है ये
Pushya Mitra आप अपना अनुभव बताइये Harendra Narayan जी
Harendra Narayan मैँने तो समय के अनुसार ढाल लिया खुद को।
Dharmesh Kumar जो मैं मन में अपने लिए सोचता हूँ उसे तुम कैसे समझ लेते हो?
Neema Singh Achchha hai main aap se bahut dino se mili nahi. Aap kya mujhe chachi bulane wale hain? Neema Singh Ye baat mere husband k saath hai.
Ravi Singh Haa haaa
सतवीर सिंह 47 का हूँ , अभी भी बरसो पुराने समय में जीता हूँ ! लगभग 25 -27 की उम्र में ! जींस टी शर्ट स्थायी ड्रेस है ! अब भी लगता मानो पहले के माफिक तूफानी गेंदबाजी कर सकता हूँ , रफ़्तार से कोई भी वाहन चला सकता हूँ ! जिम में उतना ही वजन उठा सकता हूँ ! कोई अंकल कहता तो पलट कर देखता हूँ कि किसे कहा गया?
Shruti Thakur I totally get u
Uday Mishra mai khud ko boodha mehsoos nahi karta. jab aaina dekhta hoon tab lagta hai ki kitns badal gaya hai chehra Saurabh Chaubey Asal me ye 20-30 ka daur jyadatar log ya kahoon to 90+% log apne career apne aim ko paane ki jaddojahad me par kar jate hain...aise me unhe pta hi nhi hota ki 10 saal beete kaise...!! Kuch 10% hi aise log hote honge jo 20-30 masti me gujarte hain..! So lastly kahani film a Wednesday type ho jati hsi..10saal kaise gujre pta hi nhi hota..!
Shashank Raj bhaiya, mere sath bhi aisa hi hota hai. aur sabse badi muskil navoday vidyalay me shikshako ke abhiwadan me aati hai jab ye pata nahi chalata hai ki mujhase bade hai ya barabari ke ya chote.
N Singh Raj Same N Singh Raj Aisa hi hota
सतवीर सिंह आपकी इस पोस्ट से एक सवाल और जेहन में आ रहा है ! क्या हमें तब भी ग़लतफ़हमी नहीं होती जब कोई लड़की अपने बाल सुलभ तरीके से अंकल समझ कर मुस्कुराती और हम समझ बैठते कि हम अभी भी रेस में है ???
DrBijay Shankar Jha ·Sharir ki umra badhti chali jati hai lekin man apni hi Masti me bhraman karti rahti hai.ye prakriti ki apni
Santosh Singh अंतर्मन में हमारी उम्र युनिवर्सिटी के लास्ट इयर के क्लास-रूम या हॉस्टल के कमरे में ठहर जाती है ...
सतवीर सिंह पुरानी फिल्म शौकीन इस विषय पर बेहतरीन हास्य बनाती थी !
सीमा संगसार ऐसा अमूमन सबके साथ होता है जैसे शास्वत सत्य मृत्यु को लोग स्वीकार नहीँ कर पाते कभी भी वैसे ही हर इंसान का अंतर्मन बुढ़ापे की ओर जाते देखना पसंद नहीँ करता .
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Girlsguideto Survival Don't worry अपुन भी 10 साल पीच्चे चल रहे हैं बिरादार... अपुन को चिर बाला रोग हो गया है हम जवान दुनिया बूढ़ा गयी है...
Pashupati Sharma ये आपके मन मेें बैठे गहरे विश्वास हैं... या यूं कहें बुआ के बीच इतने घिरे रहे हैं कि हर महिला (30-32 की क्योंकि बचपन में बुआएं इसी उम्र सीमा में रहीं होगी) पहली नजर में बुआ नजर आती हैं... दादा-दादी और नाना-नानी के साथ भी कुछ ऐसा ही लगाव रहा होगा... और अपने बराबर के लोगों को भी ज्यादा सम्मान देने की वजह से उनकी उम्र में इजाफा कर देना भी स्वाभाविक है... मेरे साथ शायद ऐसा नहीं होता... क्या होता है वो कभी और इत्मीनान से
Siddharth Srivastava Pushya Mitra ye aur kuchh nahi us comfort zone ki talash hai jisse hume ek taraf aazadi bhi di thi aur achchhi-bure faisalo ki responsibility bade logo ki thi. Risk minimum aur mauz personal. Aisa zone life me nahi laut pata hai aur hum use har make par jeena chahte hain. Ek baar sochna ki ab jab pichhli generations ke logo ki maut ki khabar milti hai to jyada asar hota hai muqable 20 baras ki umra ke... Siddharth Srivastava Pashupati bhai ka case bhi isi ka extention hai....wo hum sab me kahin jyada independent the...ye Unki personality thi.. Isliye unke liye umra ke failed, uske jokhim, uska nafa nuksan sab unka khud ka tha.. It seems zone was not that comfortable and sedative as ours. Siddharth Srivastava Failed ko faisle padded..
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Pawan Singh बूढ़ापे का आना और जवानी का न जाना। वैसे यह अक्षय जवानी का लक्षण है और शुभ भी है।
Manish Manohar Meri samajh mein yeh sabake sath hota hai bas degree ka antar hota hai. Hum apani gujarti umra ke mutabik khud ko taiyar nahi kar paate hain ya kah lo us umra ki pace ke sath sahi talmel nahi baitha paate hain sath hi hum hum umra ke us dorahe par hain jahan aage ki taraf budhapa aur pichhe chhut chuka jawani hota hai to jahir hai hum khud ko bhudon ki category mein nahin rakh jawano ki categori mein rakhate hain aur yahi sab garbari failata hai.
Vinay Verma जय हो मिल्खा सिंह जी की
Sujeet Kumar Singh · काफी अच्छा बिन्दु उठाया है आपने, जो शायद सभी अनुभव करते हैं, परंतु इसे छूते नहीं हैं। इंसान जिस उम्र को काफी शिद्दत से जीता है, उसके अनुभव उसके जीवन में काफी गहरा असर छोड़ जाते हैं और उन अनुभवों से आगे भी उसका अन्तर्मन रिश्ता बनाए रखना चाहता है। शायद इसीलिए आपको ऐसा अनुभव हो रहा है या होता है। इधर भी ऐसा होता है ।
Harendra Narayan आदमी दोहरी मानसिकता मेँ जीता है इसलिये ये भ्रम होता है। Puberty के बाद जब आप Youth बनते हैँ तो सब पीछे छूट जाता है।. . . .कोई लौटा दे मेरे बीते हुये दिन !
सम्पा देव बरुआ मैं भी

Thursday, November 13, 2014

ठठरी सी इस काया में 14 बच्चे आकर लौट गये


पुष्यमित्र और मुन्ना झा
यह कहानी एक ऐसी महिला की है, जिसने 16 बच्चों को जन्म दिया और उनमें से दो बच्चों को ही बचा पायी. 14 बच्चे जन्म के एक हफ्ते के अंदर ही अकाल कलवित हो गये. विडंबना तो यह है कि इस कहानी ने ऐसे दौर में आकार लिया है जब जननी एवं बाल सुरक्षा के लिए सरकार अरबों-खरबों की राशि खर्च कर आंगनबाड़ी से लेकर जेवाइएसएस तक कई योजनाएं संचालित कर रही है. इतना ही नहीं भीषण गरीबी में रहने वाली उस महिला का नाम न बीपीएल सूची में है न एपीएल सूची में.
जनक देवी जहानाबाद जिले के कांको प्रखंड के सुलेमानपुर पंचायत के रानीपुर गांव में रहती हैं. बमुश्किल 37 साल की उम्र में वह सत्तर साल की बुढ़िया नजर आती हैं. उनके बाल सफेद हो चुके हैं, शरीर पर मांस का एक कतरा नजर नहीं आता, पांच मिनट तक खड़ी रहने की ताकत भी शायद ही उनके शरीर में बची हो. अपनी किस्म की सबसे भयावह दुख को देख चुकने के बावजूद वह आगंतुकों के लिए पड़ोस से कुर्सियां मंगवाती हैं और मुस्कुराने की कोशिश करती हैं. सेहत के मामले में थोड़ा सा भी सजग इंसान उन्हें देखकर आसानी से कह सकता है कि उनके शरीर में हिमोग्लोबिन की मात्रा न्यूनतम है.
जनक देवी को ठीक-ठीक याद नहीं है कि वह कब ब्याह कर इस गांव आयीं. मगर तब से अब तक उसने एक ही काम किया है, बच्चों को धरती पर लाने की कोशिश. वह कहती हैं, हर बार सतमस्सू (सात महीने गर्भ में रहने वाला) बच्चा होता था. कोई एक दिन तो कोई दो तीन में चला जाता. एक बच्चा सबसे अधिक धरती पर टिका वह एक हफ्ते में गुजर गया. विडंबना यह थी कि किसी बच्चे का जन्म अस्पताल में नहीं हुआ.
पति गनौरी साह जहानाबाद में किराये पर रिक्शा चलते हैं, किसी दिन पचास तो किसी दिन सौ बचाकर लाते हैं. इन्हीं पैसों से घर चलता है. जनक देवी में इतनी ताकत नहीं है कि कहीं मेहनत मजूरी कर सके. वह मुर्गियां पालती हैं और उनके अंडों को बेचती हैं. घर के नाम पर दो डिसमिल जमीन पर बना फूस औऱ मिट्टी का एक कमरा है, जिसे में रात में सोते वक्त ही घुसा जा सकता है. मगर इसके बावजूद उनका नाम न बीपीएल सूची में है न एपीएल सूची. यानी राशन दुकान से उन्हें न अनाज मिलता है न और कुछ. दो बच्चे नेहा कुमारी (6 साल) औऱ ओमप्रकाश (2 साल) जो गाय का दूध पीने के कारण बच गये हैं, वे आंगनबाड़ी के भरोसे पल रहे हैं.
जनक देवी को संभवतः पति से भी बहुत सहयोग नहीं मिला. क्योंकि अगर पति का नजरिया सकारात्मक होता तो जनक देवी को शायद ही 16 बार गर्भवती होने पर मजबूर होना पड़ता. जनक देवी सीधे-सीधे इस बारे में कुछ नहीं कहती हैं, मगर उनकी बातें यह राज खोल देती हैं. वे कहती हैं, जब आठवां बच्चा नहीं बचा तो उनके पति ने संभवतः बच्चों के लिए दूसरी शादी कर ली. उक्त महिला उनके साथ ही उनके घर में पांच-छह साल रही, फिर वह उन्हें छोड़कर चली गयी.
इन विपरीत परिस्थितियों में उन्हें मदद सिर्फ वार्ड सदस्य और सुलेमानपुर पंचायत की उप मुखिया मैना मंती से मिली है. मैना मंती लगातार प्रयासरत हैं कि उनका नाम बीपीएल सूची में डल जाये. वे मुखिया से लेकर डीएम तक इनकी समस्या को लेकर पहुंच चुकी हैं. डीएम ने भरोसा दिलाया है कि जब नयी सूची बनेगी तो जनक देवी का नाम प्राथमिकता से शामिल किया जायेगा. मैना की वजह से ही उन्हें अब आंगनबाड़ी से बच्चों के लिए टेक होम राशन मिलने लगा है, जिससे उनकी ठीक-ठाक मदद हो जा रही है.
शिशु रोग विशेषज्ञ संदीप जैन कहते हैं कि यह मामला पहली नजर में कुपोषित माता का लगता है. एक बच्चे को जन्म देने के लिए जो पोषण अपेक्षित होता होगा वह उन्हें नहीं मिल पाता होगा और इसी वजह से हर बार प्रिमेच्योर डिलीवरी होती होगी औऱ बच्चे का वजन बहुत कम होता होगा. प्रिमेच्योर डिलीवरी में बच्चे का लालन-पालन सिर्फ मां के दूध के भरोसे नहीं हो सकता, उन्हें खास नर्सिंग केयर की जरूरत थी. चुकि उनके बच्चों का जन्म अस्पताल में नहीं हुआ, लिहाजा वह सुविधा भी नहीं हासिल हो पायी. जनक देवी के हालात डॉक्टर संदीप के बातों की पुष्टि करते हैं.
वैसे उनके बच्चों के न बच पाने की वजह जो भी हो मगर इस उदाहरण ने सरकार की कई योजनाओं पर सवाल खड़े कर दिये हैं. चाहे वह संस्थागत प्रसव का हो, मातृत्व सुरक्षा का हो, जन्मपूर्व टीकाकरण, पोषण औऱ देखभाल का हो, शिशु सुरक्षा का हो और आंगनबाड़ी केंद्रों की उपयोगिता का हो. इसके अलावा बीपीएल चयन में उस परिवार से साथ अनदेखी भी इस महिला के साथ हुई इन भीषण घटनाओं की बड़ी वजह है.

Thursday, November 06, 2014

किसिंग-विसिंग हमारी परंपरा नहीं है जी..


यह कौन है वान ब्रायंट. जो मान न मान मैं तेरा मेहमान हुआ जा रहा है औऱ कह रहा कि किसिंग यानी चुंबन की शुरुआत भारत में हुई थी और भारत से ही पूरी दुनिया में फैला. बताइये कितना बदतमीज है, जब हमने कहा कि प्लास्टिक सर्जरी की शुरुआत भारत से हुई तो ये वेस्टर्न वर्ल्ड वाले माने नहीं, लगे मजाक उड़ाने. और अब एक नयी थ्योरी लेकर आ गये हैं. अरे ब्रायंट के बच्चे, हमने किसिंग-विसिंग की शुरुआत नहीं की है. कोई भारतीय इतना घिनौना काम कर ही नहीं सकता. और अगर किसी ने गलती से यह काम कर भी दिया होगा तो हमने उसे प्रोमोट नहीं किया. हमारे पूर्वजों ने जरूर उसे देश से निकाल बाहर किया होगा और रोम भेज दिया होगा. जाओ वहीं गुंह गीजो. ऐसे लोगों के लिए इस देश में कोई जगह नहीं.
यह वेस्टर्न प्रोपेगेंडा हैं कि भारत पहले यौन के मामले में काफी उन्मुक्त था. हमने कामसूत्र से लेकर कोकशास्त्र तक इसलिए नहीं रचे थे कि हम रंगरसिया टाइप थे. दरअसल हम इतने भोले-भाले थे कि हमारे लोगों को पता ही नहीं था कि क्या करना है और कैसे करना है. अगर ये किताबें नहीं होतीं, खजुराहो और कोणार्क की मूर्तियां नहीं होतीं तो तीन चौथाई लोग बंद कमरे में होठ के बदले नाक को ही किस करके खुश हो जाते और सेक्स के बदले झूमर खेलते रहते. लोगों के कंफ्यूजन को क्लीयर करने के लिए ये किताबें लिखी गयी हैं जी, इसलिए नहीं कि हमलोग बड़े खुले हुए थे.
इस कंफ्यूजन को क्लीयर करने के लिए ही भगवान कृष्ण ने रासलीला रचाई. हमने तो पहले ही तय कर लिया था कि इस देश में खुले आम रोमांस का हक एक ही इंसान को है. भगवान कृष्ण को. उसने कर लिया, हो गया. इस पूरे मुल्क के लिए एक ही रासलीला काफी है, हमें दूसरी रासलीलाओं की जरूर नहीं. और भगवान कृष्ण ने भी ऐसा इसलिए किया कि जो लोग बंद कमरे में रासलीला करते हैं उन्हें पता रहे कि क्या क्या करना है.
हम सिर्फ सूसू करने के मामले में खुले हुए हैं, वह भी सिर्फ मरद. केवल मर्द का बच्चा है शान से सड़क किनारे पैंट की जिप खोलकर सूसू की धार बहा सकता है. लड़कियों का धर्म है घर से निकलने से पहले तीन बार चुपके से सूसू कर लेना और रास्ते में एक बूंद भी पानी या लिक्विड नहीं लेना. टट्टी करने के मामले में भी हम थोड़े खुले हैं, हमने औरतों को भी खुले में खुलकर शौच करने की आजादी दी है. मगर दिन में नहीं. हां, गालियां देने के मामले में हम तो पूरे खुले हैं और देखिये जो काम हम बंद कमरे में करने के हिमायती हैं, उसे गालियों में खुलेआम उद्धृत कर डालते हैं, बेहिचक. और आपको हमारी गलियों से समझ लेना चाहिये कि हम सेक्स-वेक्स को कितना बुरा काम मानते हैं. हमारी इस तरह की चीजों में रुचि होती तो हमारी गालियां सेक्सुअल इंटरकोर्स पर बेस्ड थोड़े ही होती. हम सेक्स को बुरा मानते हैं इसलिए लोगों को सेक्सुअल गालियां देते हैं. हमारे ऋषि-मुनियों ने औरत को नर्क का द्वार माना है, इसलिए हम औरतों के नाम से गालियां देते हैं. अब इन दिनों नरक टूरिज्म का फैशन चल गया है तो क्या किया जाये.
ब्रायंट साहब, कान खोलकर सुन लो. यह जो केरल में औऱ कोलकाता में लड़के-लड़कियां खुले आम सड़कों पर एक दूसरे को किस कर रहे हैं यह हमारी संस्कृति नहीं, तुम्हारी अपसंस्कृति है. हम भी मुहब्बत करते थे, हमें भी मालूम है मुहब्बत क्या है.
अपने जमाने में हम महबूबाओं के घर बेनामी खत भेजा करते थे और उम्मीद करते थे कि वह इशारों में समझ जाये कि भेजने वाला कौन है. थोड़ा वक्त बदला तो लैंड लाइन पर फोन करने की हिम्मत करने लगे, मगर उस वक्त भी उनकी अम्मा को यह बताया जाता था कि बातें पढ़ाई लिखाई की हो रही है और मामला दोस्ती की हद में ही है. हालांकि उस दौर में भी कुछ लोग अपसंस्कृति के शिकार थे, जिनकी महबूबाएं होस्टल में रहा करती थीं या अलग फ्लैट ले रखा था. मगर कॉलेज में भी बहुत मुश्किल से पता चलता था कि कौन सा रिश्ता दोस्ती की हद में है और कौन सा चौहद्दी पार कर गया है. तब हम जैसे लोग यह मानकर चलते थे कि दुनिया में सबकुछ पवित्र और पाक है. क्योंकि वे लोग क्या गुल खिलाते थे यह कमरे की दीवारों को छोड़कर किसी को पता नहीं चल पाता.
अब देखिये, ये लोग सड़क पर जुम्मा चुम्मा दे दे टाइप हुए जा रहे हैं. इसका सबसे बड़ा नुकसान है कि जिनकी मुहब्बत के पौधे लगने से पहले ही मुरझा गये वे इंसिक्योर हो रहे होंगे. कसम मनोहरलाल खट्टर की यही इंसिक्योर लड़के आगे चलकर रेपिस्ट हो जायेंगे. आप मेरी बात गांठ बांध कर रख लो.

Friday, October 31, 2014

इन्हीं से तो है दावत-ए-सियासत का लुत्फ


कल से ही सोशल मीडिया पर शाही इमाम बुखारी साहब को कोसने का ट्रेंड चल रहा है. हर कोई कोस रहा है. चाहे सिकुलर हो या भगत. कोसने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहा है. स्टाइल अलग-अलग हैं, मगर हर कोई राष्ट्रवादी हुआ जा रहा है. समझाइशें दे रहा है, सवाल उठा रहा है. मुझे हमेशा से लगता है कि अपने शाही इमाम साहब, भारतीय राजनीति के शाही पनीर हैं. उनके फतवों के बिना राजनीतिक बहसों की दुनिया कितनी बेस्वाद हो जायेगी यह कभी आपने सोचा है. मैं तो ऊपरवाले से दुआ मांगता हूं कि उनके लख्ते-जिगर को ऐसा ही जिगरा दे और भारतीय राजनीति में वे लंबी पारी खेलें.
अपने देश की राजनीति में जो रंग और लुत्फ है वह ऐसी ही हस्तियों की बदौलत है. इमाम साहब हैं, बाबा रामदेव हैं, शंकराचार्य हैं. ये जो गैर सियासी लोग हैं उनका हमारी सियासत पर इतना दबदबा है कि सियासतदां भी फेल लगने लगते हैं. वैसे सियासी पार्टियों में भी ऐसे तजुर्बेकारों की कोई कमी नहीं है. ऐसे ही लोगों से तो अपने देश की राजनीति में रौनक है, वरना चीन टाइप राजनीति में रखा क्या है. न सवाल, न जवाब, न बयान, न स्कैंडल... हमारे देश में देखिये, राजनीति कितनी रंगीन है. कभी अरुण जेटली काला धन पर फिसल जाते हैं, तो कभी गडकरी 'दो काम हमारे' वाला डॉयलॉग ठोक जाते हैं, कभी दिग्विजय पुराण छाया रहता है, तो कभी कपिल सिब्बल जीरो लॉस थ्योरी लेकर हाजिर हो जाते हैं. अगर किसी रोज ऐसी चीजों का अकाल पड़ जाता है तो मन बड़ा उदास-उदास रहता है. तब लाल वाले भगवा वालों के इतिहास से कोई उद्धरण छांटते हैं और भगवा वालों को लाल वालों की हिस्ट्री की तलाशी लेनी पड़ती है. मगर हमारी खुशकिस्मती यह है कि इस विविधता भरे देश में शायद ही कोई दिन ऐसा गुजरता है जब राजनीति कोई रंगीन गुल न खिलाये.
2011 के अन्ना आंदोलन से लेकर आज तक कम से कम मेरी निगाह में कोई दिन ऐसा शायद ही गुजरा है. जब तक मनमोहन सिंह तख्तनसीन थे, उन्होंने हमें कभी ऐसी कमी महसूस होने नहीं दी, मौन रहकर हंगामा खड़ा करवा देने का जो हुनर उनके पास था, उसका आने वाले वक्त में कोई तोड़ शायद ही मिले. अब अपने प्रधान सेवक जी हैं, जनाब रोज एक अभियान चलाते हैं. अभियान शुरू करते हैं, हलचल मचाते हैं और उस अभियान को जनता के लिए छोड़ कर आगे बढ़ जाते हैं. दूसरा अभियान चलाने लगते हैं. कभी स्वच्छ भारत तो कभी मेक इंडिया, कभी आदर्श ग्राम तो कभी रन इंडिया. इसके अलावा पीपीपी, बीबीबी औऱ डीडीडी टाइप के इतने फार्मूले उन्हें बाजार में उतार दिये हैं कि यूपीएससी की तैयारी करने वाले उन्हें रट-रट कर परेशान हैं. इन लोगों के सामने एक परेशानी और है, रोमिला थापर की हिस्ट्री पढ़ें या मोदी जी की किताब छपने का इंतजार करें. मल्लब प्रधान सेवक जी ने निराश किया हो ऐसी बात नहीं.
हां, यह ठीक है कि अपने राहुल बाबा बीच-बीच में गायब हो जाते हैं, मगर समय-समय पर आकर अपनी जिम्मेदारी निभा जाते हैं. माता जी बीमारी की वजह से कटी-कटी रहती हैं, मगर जमाई सा ने पारिवारिक जिम्मेदारी को बखूबी समझा है और पूरी शिद्दत से मैदान में डंटे रहे हैं. इस बीच कयास यह है कि जैसे सर्दियों का मौसम शुरू हुआ और खांसी वाले साहब ने मफलर बांधी कि उनका जलवा फिर से शुरू हो जायेगा. एक वास्तुशास्त्री ने उन्हें पहले ही कह दिया था कि मफलर मत उतारें, मगर उस वक्त उन्हें लगा था कि वास्तुशास्त्री जरूर मोदी से मिले हुए हैं, इसलिए उतार फेंका. वैसे भी गरमी और बरसात धरनों का मौसम होता नहीं है, बड़ी परेशानी होती है. इसलिए क्रांति सर्दी के गुलाबी मौसम में होती हैं, जब धूप पसीने नहीं छुड़ाता.
अपने देश की राजनीतिक विरासत को याद करते हुए सोचता हूं कि ये लोग अगर नहीं होते तो हमारी जिंदगी कितनी वीरान नहीं होती. हार्ट के आपरेशन के बाद से लालू जी जो मौन हैं, इस बीच हमने उनके 'भक-बुरबक' को कितना मिस किया है, वो क्या जानें. वैसे ही हम शरद पवार साहब को मिस कर रहे हैं, नयी सरकार में महंगाई पर टाइट डॉयलॉग मारने वाला अभी कोई नेता डेवलप नहीं हो पाया है. क्या ठसक होती ही उनके बयान में जब वे कहते थे कि मैं कोई ज्योतिषी हूं जो बता पाऊं कि महंगाई कब खतम होगी. अहा, वे दिन भी क्या दिन थे. मैं उतना ही कपिल सिब्बल साहब की जीरो लॉस थ्योरी को मिस करता हूं. ममता बनर्जी की उस अदा को मिस करता हूं जब उन्होंने कहा था कि मनमोहन सिंह हमारा प्रेसिडेंट का कैंडिडेट है. दिग्विजय की कुटिल मुस्कान और बेनी बाबू की मासूमियत का विकल्प हम अब तक खोज नहीं पाये. हां मायावती के कुरसी पर बैठने के अंदाज की छवियां प्रधान सेवक में जरूर नजर आयी है. सुना है अमर सिंह फिर से सपा ज्वाइन कर रहे हैं, इस खबर को सुनकर ही दिल बाग-बाग है. मगर मन इस बीच यह भी सोच रहा हूं कि अपने बाबू गिरिराज सिंह इन दिनों क्यों मौन हैं. इन्हें तो बुखारी का बयान आते ही कह देना चाहिये था कि पाकिस्तान चले जायें. कहां चले गये गिरिराज बाबू. मेरे मन में थोड़ी नाराजगी महाराष्ट्र की जनता के प्रति भी है, बताइये राज ठाकरे जैसे नेता को हरा दिया. अब हम बिहारी किसे कोसेंगे. बाला साहब के गुजरने के बाद जो मायूसी का माहौल बन रहा था उसमें राज साहब से ही उम्मीदें थीं कि वे कुछ खास करेंगे. मगर उन्हें इस तरह डिमोरलाइज किया जाता रहेगा तो बताइये उनकी बातों में वह रौनक कहां से दिखेगा.
मैं इन दिनों लगातार बाबा रामदेव को मिस करता हूं. मनमोहन सिंह की सरकार गिरी कि इनके बुरे दिन आ गये, पहले दिन भर टीवी पर ही बने रहते थे. अब छठे-छमाही ही कोई इन्हें याद करता है. पिछली सरकार के गिरने से तो अन्ना भी दुखी होंगे, पता नहीं कहां. अब तो कोई उनसे पूछने भी नहीं जाता कि थप्पड़ मारा तो सही किया या गलत. कुमार विश्वास साहब भी पराये से लगने लगे हैं और शाजिया भौजी तो दिखती ही नहीं हैं. हां, नीतीश जी ने जरूर एक नयी प्रतिभा को भारतीय राजनीति में पेश किया है, हमारे नये मुख्यमंत्री तकरीबन रोज अपने नये-नये जुमलों से भारतीय राजनीति में नये-नये रंग भर रहे हैं. उधर खट्टर साहब का इतिहास जानकर उनसे भी उम्मीदें जगी हैं. मगर विजय जॉली साहब आपको सचमुच मिस कर रहा हूं और न आप दिख रहे, न शीला आंटी, न विजय गोयल और न अरविंद सिंह लवली. वे भी क्या दिन थे जब दिल्ली की राजनीति ही पूरे देश पर छायी थी. हम रोज सुबह शाम एमएलए गिनते रहते थे. डरते-डरते कि कहीं राजनीति इतनी साफ-सुथरी न हो जाये कि हॉर्स ट्रेडिंग का नामोनिशान खत्म हो जाये... मगर हमारी परिपक्व राजनीति ने केजरीवाल साहब के झटकों को न सिर्फ झेला बल्कि उन्हें भी अपने रंग में थोड़ा रंग ही डाला.
मुझे आजम खां साहब की भैंसें बहुत याद आती हैं और फलां सांसद महोदय के कटहल. उन भैसों और कटहलों का नाम भी भारतीय राजनीति के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज होगा. मुझे कतई हैरत नहीं होता कि हैदराबाद के ओबैसी साहब और गोरखपुर के योगी आदित्यनाथ एक दूसरे से हजारो किमी दूर रहने के बावजूद कैसे एक जैसी फ्रिक्वेंसी शेयर करते हैं. यह तो इस देश की खूबी है. एक अंडर करंट है, जो पूरे देश को एक सूत्र में बांधता है. हां, लालू और शिबू जैसे नेता अम्मा जयललिता से रश्क खाकर जल भुन सकते हैं कि उनके जेल जाने पर उनके एक भी समर्थक ने खुदकुशी तो दूर नाखून तक नहीं कटाया. हम भी थोड़े दुखी रहते हैं कि तमिलनाडु में चुनाव के मौके पर हजार-हजार के नोट बंटते हैं और हमें दारू की एक बोतल पर टरकाने की कोशिश की जाती है. उम्मीद है हमारे तरफ भी वह सुबह कभी तो आयेगी. मगर अभी जो है, वह क्या कम है. सियासत रोज एक ऐसी खबर से मिलाती है, जिसे सुनकर मुंह में पानी आ जाये... बहुत शुक्रिया देश के सियासतदानों, आपसे ही तो दावत-ए-सियासत का लुत्फ है.

Sunday, October 19, 2014

साइकिल की सवारी


हिंदी की पाठ्यपुस्तकों के लेखकों में सुदर्शन की कहानियां बड़ी रोचक हुआ करती थीं. अखबार में नाम और साइकिल की सवारी जैसी कहानियां मैं आज तक नहीं भूल पाता. इस आत्मस्मरण का शीर्षक मैंने उनकी कहानी से ही उधार लिया है. दरअसल मैं पिछले दस दिनों से साइकिल की सवारी कर रहा हूं. साइकिल से ही रोज दफ्तर आना-जाना कर रहा हूं. उन दस दिनों के अनुभवों से आपको सरा(सर)-बोर करने की नीयत से यह सब लिख रहा हूं.
जी हां, यह सोशल मीडिया के उसी फैशन के अनुरूप है, जिसमें आदमी करता कम है और भजता ज्यादा है. मैंने दस दिन साइकिल चला लिये तो सोचा कि लिखकर आपको इम्प्रैस करूं कि देखिये मैं किस तरह ईको-फ्रैंडली होने की ओर कदम बढ़ा चुका हूं. यह सोचे बगैर कि पटना शहर में दसियों हजार लोग रोज साइकिल से आना-जाना करते हैं. उनमें से कई तो हाजीपुर और दानापुर से आने वाले लोग हैं. मैंने अगर दस दिन साइकिल से राजा बाजार से बोरिंग रोड आना जाना कर लिया तो क्या तीर मार लिया. मगर जनाब, मेरे पास फुरसत है, नेट कनेक्शन है, यूनिकोड इनेबल्ड पीसी है, लिखने का चस्का है, फेसबुक अकाउंट है जिस पर मुझे पढ़ने वाले दो हजार दोस्त हैं, मुझे रोज फेसबुक पर कूड़ा डालने की आदत है, फेसबुक ही रोज मुझसे पूछता है कि व्हाट इज इन योर माइंड तो क्या करूं. कुछ तो माल चाहिये रोज के लिए. मेरा वॉल रोज मुझसे खुराक मांगता है. आज के लिए यही खुराक सही.
जब रांची से पटना आया था (यानी फरवरी, 2014) में तभी तय किया था कि साइकिल से ही आया जाया करूंगा. मगर शिफ्ट और एडजस्ट होते-होते गरमी का मौसम आ गया. भरी दुपहरी में घर से दफ्तर की पांच किमी की दूरी साइकिल से तय कर पाऊंगा यह भरोसा नहीं होता था. लिहाजा तय किया कि जरा सूरज महराज के तेवर ठंडे हो जायें फिर इस प्रयोग को करके देखा जायेगा. और अक्तूबर महीना मुझे इसके लिए सबसे मुफीद महसूस हुआ.
मेरे लिए हर तरह से मुफीद थी साइकिल
दरअसल, निम्न मध्यवर्ग के लोगों की आदत होती है कि वे हर काम करने के पहले उस पर ढेर सारा विमर्श करते हैं. हर एंगल से सोचते हैं कि उक्त कार्य उसके लिए कहीं से हानिकारक तो साबित नहीं हो जायेगा. इस लिहाज से साइकिल की सवारी मेरे लिए हर तरह से लाभप्रद लग रही है. पिछले दिनों डॉक्टर ने कोलेस्ट्रॉल घटाने का फरमान जारी किया था उसके लिए यह रामबाण है. आजकल दफ्तर आने-जाने में रोज औसतन 30 रुपये की बचत हो जा रही है, यह बोनस है. अक्सर लौटते वक्त जब रात को 11 से अधिक बज जाते थे तो घर आने के लिए सवारी नहीं मिलती थी, इस फैसले से उस समस्या का भी समाधान हो गया है. इसके अलावा ईको-फ्रैंडली होने का टैग अलग से है. यह अलग बात है कि दफ्तर के गार्ड और मेरी बिल्डिंग के कुछ अपरिचित लोग मुझे साइकिल पर चढ़ता देख मेरे इकॉनॉमिक स्टेटस के बारे में कुछ अंदाजा लगाने की कोशिश करते हैं और हो सकता है वे मुझे फक्कड़ या कंजूस समझते होंगे. वे न मेरे फेसबुक फ्रेंडलिस्ट में हैं और न ही ईको-फ्रैंडली या हेल्थ कॉंसश होने की बात को समझ पाते होंगे. उन्हें अवाइड करने की कोशिश करता हूं.
दीगर बात यह भी है कि मुझे बाइक चलाना नहीं आता. इस उम्र में बाइक चलाना सीखना मुझे शर्मनाक लगता है, इसलिए भी साइकिल मेरे लिए परफैक्ट ऑप्शन है. मुझे बाइक चलाना क्यों नहीं आता या मैंने बाइक चलाना क्यों नहीं सीखा, इसकी कथा भी दिलचस्प है. दिलचस्प होने का दावा इसलिए कर रहा हूं कि जबानी तौर पर कई मित्रों को यह कथा मैंने सुनाई है और उन लोगों ने इस कथा में भरपूर दिलचस्पी ली है. बाइक चलाना सीखने की उम्र अमूमन किशोरावस्था की होती है, जब बच्चा साइकिल की पैडल मार-मार कर बोर हो चुका होता है. मैं भी तब नौवीं में पढ़ता था, जब महसूस किया कि अब बहुत हो चुका. अब मुझे बाइक चलाना सीख ही लेना चाहिये. उन दिनों राजदूत की गाड़ियां शान की सवारी मानी जाती थीं. संजय दत्त फेम येजडी या पता नहीं शायद एचडी बाइक आउट ऑफ फैशन हो चुकी थी. बुलेट कुछ ही लोग चलाते थे. चचेरे भाई साहब के पास राजदूत थी. वे सहरसा में रहते थे और अक्सर हमसे मिलने हमारे गांव आते थे. मैं भी नवोदय के हॉस्टल में रहा करता था. एक बार छुट्टियों में घर गया तो भाई साहब भी राजदूत से पधारे हुए थे. वे घर में लोगों से बतिया रहे थे और राजदूत बाहर खड़ी मुझे ललचा रही थी.
बाइक सीखने के सिलसिले
इस बीच मैंने जान लिया था कि राजदूत की गाड़ियां बांस की करची से भी स्टार्ट हो जाया करती है. करना सिर्फ इतना है कि करची डालकर किक मारना है. स्टार्ट होने पर क्लच लेकर गाड़ी को गियर में डालना है, फिर क्लच धीरे-धीरे छोड़ना है और एक्सीलेरेटर घुमाते रहना है. तो उस रोज मैंने उस थ्योरी का प्रैक्टिकल कर ही डाला. कुछ ही देर में मैं गाड़ी के साथ सड़क पर था और गाड़ी आगे बढ़ती जा रही थी. यह अनुभव मेरे लिए किसी उपलब्धि से कम नहीं था कि मैंने मोटर साइकिल चला रहा हूं. मैं आगे बढ़ता जा रहा है, मुझे लगा कि मैं हवा में तैर रहा हूं, बाल अजय देवगन की तरह लहरा रहे हैं. मगर थोड़ी ही देर में मुझे अपनी गलती का आभास हुआ, कि मुझे गाड़ी बंद करना नहीं आता. इसे रोकूं कैसे और बंद करके उतरूं कैसे. अब यह गाड़ी मेरे लिए आफत का सबब साबित होने लगी. गांव की अलग-अलग सड़कों पर मैं लगातार गाड़ी चलाता रहा, पास से गुजरने वाले हर परिचित से पूछता रहा कि कोई बताये इसे बंद करके कैसे उतरा जाये. अव्वल तो कोई मेरी बात समझ नहीं रहा था, समझता भी था तो जब तक वह बताता मैं आगे निकल चुका होता. तकरीबन 25 किमी गाड़ी चला चुकने के बाद मैं थक हार कर अपने दरवाजे पर इस इरादे से लौटा कि चाबी खीचकर वहां रखे पुआल पर ही गाड़ी को गिरा दूंगा. तभी कट से आवाज हुई और गाड़ी बंद हो गयी और मैंने पांव रखकर गाड़ी को गिरने से रोक लिया. भाई साहब दरवाजे पर मेरा और गाड़ी का इंतजार कर रहे थे. उन्हें कहीं से खबर मिल गयी थी. मैंने चुपचाप उन्हें गाड़ी थमा दी और तेजी से पड़ोस वाले आंगन में चला गया कि जब उनका गुस्सा शांत होगा फिर उनके सामने जाऊंगा.
भाई साहब मुझे पसंद करते थे, इसलिए उन्होंने मुझे कुछ कहा नहीं. बस मेरी दूसरी बड़ी गलती का अहसास दिलाया कि मुझे गियर चेंज करना नहीं आता था, जिस वजह गाड़ी 25 किमी तक पहले ही गियर में चलती रही. यह शुक्र था कि चेन ने देर तक मेरा साथ निभाया और वह दरवाजे पर पहुंचकर टूटा. वरना सुनसान में कहीं यह घटना होती तो मैं गिर सकता था और मुझे गाड़ी को धक्के देकर घर लाना पड़ता. बहरहाल मिस्त्री बुलाया गया, भाई साहब की जेब लगभग खाली हो गयी. घर में मम्मी-पापा को पता चल गया. और कुल मिलाकर मेरे जैसे सुटेबुल ब्वाय के लिए बड़ी शर्मनाक स्थिति पैदा हो गयी. पता नहीं उस वक्त मां ने समझाया था कि मैंने खुद तय कर लिया कि अब गाड़ी तभी सीखूंगा जब अपने पास अपनी गाड़ी हो. दूसरे की गाड़ी के साथ इस तरह का खतरनाक खेल ठीक नहीं. उस प्रण ने फिर मुझे किसी परिचित को बाइक को हाथ लगाने से हमेशा के लिए रोक दिया और मैं लंबे समय तक बाइक सीखने के प्रयोग को फिर दुहरा नहीं पाया. सीखने के लिए कई दोस्तों ने अपनी बाइक ऑफर की, मगर मैं हर बार उनके प्रस्ताव को ठुकराता रहा.
दूसरी नाकाम कोशिश
तकरीबन दस साल बाद जब मैं सागर में एक बड़ी फंडिंग एजेंसी के प्रोजेक्ट ऑफिस का इंचार्ज बनाया गया तो फील्ड विजिट के लिए मेरे नाम से दो बाइक खरीदी गयी. एक राजदूत और एक यामाहा क्रक्स. हालांकि तब तक मैं 25 साल का हो चुका था, मगर बाइक सीखने के लिए यह उम्र कोई अजीब नहीं थी. मैंने सागर विवि की खुली और खाली सड़कों पर बाइक चलाने का अभ्यास शुरू कर दिया. अब मैंने यह भी सीख लिया था कि गियर कैसे बदलना है और गाड़ी कैसे रोकना है. कुछ दिनों से अभ्यास के बाद मैंने गाड़ी चलाना सीख लिया. अब तक फील्ड विजिट में मैं अपने साथियों के पीछ बैठकर जाया करता था. एक महिला साथी गायत्री जी भी हमारे साथ थीं, वे बाइक चलाने में एक्सपर्ट थीं, मैंने उनकी बाइक के पीछे बैठकर भी यात्रा की है.
जब मैंने बाइक चलाना सीख लिया तो मैंने एक दिन तय किया कि आज खुद गाड़ी चलाकर फील्ड जाऊंगा. ऑफिस से निकलकर मैं आराम से आगे बढ़ा, तीन चार किमी के बाद बस स्टैंड पड़ता था, उसे पार करने के बाद हाइवे शुरू हो जाता था. बस स्टैंड के सामने से गुजर रहा था कि ग्रामीण महिलाओं का एक झुंड सड़क पार कर रहा था, मैं उन्हें सड़क पार करता देख रहा था. मैं दूर था, इस बीच उन्होंने बड़े आराम से सड़क पार कर लिया. अब सड़क खाली थी, मैं आराम से सड़क क्रॉस कर रहा था. तभी एक अनहोनी घट गयी. ग्रामीण महिलाओं के साथ एक बच्चा था जो दूसरी तरफ ही रह गया था. वह रोने लगा, सड़क पार कर चुकी महिलाओं ने उसे देखा तो कहा, आजा बेटा... आजा और वह दौड़ पड़ा. मैंने बाइक रोकने की कोशिश में ब्रेक लिया और हैंडल घुमा लिया. बच्चा बच गया, मगर मैं सड़क किनारे बालू पर गिर गया. फिर उठा, कपड़े झाड़े, बांह में खरोच थी, वहां से मिट्टी साफ की और चल पड़ा. करीब दस किमी गाड़ी चलाने के बाद महसूस हुआ कि बायें हाथ में काफी दर्द है और वह लगातार फूल रहा है. दर्द अहसनीय हो चुका था, यानी कोई फ्रैक्चर हो गया था. संयोग से थोड़ी देर में जैनियों का एक बड़ा अस्पताल दिखा, मैं उसमें घुस गया. थोड़ी ही देर में पता चल गया कि मेरा हाथ टूट गया है और मैं चार हफ्तों के लिए प्लास्टरशुदा होने वाला हूं. इस तरह से दूसरा प्रयास सफल होते हुए भी असफल साबित हो गया. इस बीच नौकरी बदल गयी और अखबारों के डेस्क पर आंखें अंधी करने का शौक पाल लिया.
डेस्क की नौकरी और सवारियां
अखबारों में डेस्क की नौकरी का अपना अंदाज है. जब पूरी दुनिया नौकरी बजाकर घर लौटने की तैयारी कर रही होती है, डेस्क के सिपाही नहा-सुनाकर ऑफिस जाने की तैयारी करते हैं. जब वे रात को अपनी ड्यूटी पूरी करके घर लौटते हैं तो इलाके की अस्सी-नब्बे फीसदी आबादी नींद की आगोश में पहुंच चुकी होती है. सड़क पर पागल, कुत्ते, इक्का-दुक्का गाड़ियां ही नजर आती हैं. ऐसे में डेस्क वाले कोशिश करते हैं कि उनका घर दफ्तर के करीब ही हो ताकि दफ्तर से निकलने के पांच मिनट के अंदर घर पहुंच जायें और फालतू की परेशानियों से बच सकें. लिहाजा मैंने भी अलग-अलग शहरों में डेस्क पर नौकरी बजाते हुए दफ्तर से वाकिंग डिस्टेंस पर हो. यह सिलसिला रांची तक जारी रहा. लिहाजा बाइक खरीदने का मसला कभी इतना महत्वपूर्ण नहीं हुआ कि उस पर गंभीरता से विचार किया जाये, न कभी इतनी सैलरी मिली कि इस गैरजरूरी उपादन पर पैसे खर्च किये जायें. लिहाजा बाइक खरीदना और उसे फिर से चलाना सीखना लगातार टलता रहा. शादी के बाद कई बार यह सोचा कि स्कूटी ले लें जिसे उपमा और मैं दोनों चलाना सीख लें और घर के कुछ काम इस बहाने निबटाये जा सकें. मगर जाहिर है कि जब बजट बनता तो यह खर्च गैरजरूरी लगने लगता और हमने रिक्शा, शेयरिंग ऑटो और दूसरी सवारियों के भरोसा जीना सीख लिया.
ऐसे खरीदी साइकिल
पहले मैंने सोचा था कि नयी साइकिल खरीदूंगा, मगर आखिरी वक्त मैं मैंने फैसला बदल लिया. अपनी बढ़ती उम्र को फूलकर फैल चुके शरीर पर भरोसा नहीं था कि रोज पांच किमी का सफर साइकिल से पूरा कर पाऊंगा या नहीं. अगर यह कार्यक्रम फ्लॉप साबित हुआ तो बेवजह चार हजार का झटका लग जायेगा. लिहाजा तय किया कि ओएलक्स की मदद से सेकेंड हेंड साइकिल खरीदूंगा. ओएलएक्स पर पटना वाले कई साइकिल बेचने के लिए तैयार थे, एक मेरे मोहल्ले के करीब भी था. हजार रुपये में पुरानी साइकिल थी. फोन किया तो किसी महिला ने उठाया. मैं उस जगह को जितना करीब और ओएलएक्स के सौदे को जितना आसान समझ रहा था, वह उतना आसान था नहीं. रिक्शे से वहां पहुंचने में 40 रुपये खर्च हो गये, और साइकिल पंचर पड़ी थी, उसकी रिम जंग खायी हुई थी. कई महीनों से साइकिल चली नहीं थी औऱ उसे चालू हालत में लाने में कितना खर्च होगा इसका अंदाजा लगाना मुश्किल था. अब दो ही रास्ते थे, एक या तो यहां से फिर 40 रुपये खर्च करके घर लौट जाऊं या फिर इस साइकिल को खरीदकर इसे मिस्त्री से सुधरवाकर उसे चलाकर घर लौटूं. मैंने हिसाब लगाया हजार रुपये इसे देने होंगे, अगर 500 रुपये में साइकिल ठीक हो जाये तो भी सौदा बुरा नहीं है. मगर अगर साइकिल में हजार रुपये और लग गये तो यह घाटे का सौदा होगा. मैंने मोहतरमा से कहा कि मुझे एक बार साइकिल को मिस्त्री को दिखानें दें अगर पांच सौ में ठीक हो गया तो मैं इसे खरीद लूंगा. मगर मोहतरमा को शायद लगा होगा कि मैं साइकिल लेकर चंपत हो जाउंगा. फिर मैंने दूसरा ऑफर प्लेस किया कि मैं उन्हें हजार रुपये दे देता हूं, फिर साइकिल ले जाता हूं. अगर मिस्त्री के पास मेरी बात जम गयी तो ठीक वरना साइकिल वापस कर जाऊंगा और अपने पैसे ले जाऊंगा. मगर इस पर भी मोहतरमा राजी नहीं हुई, इस बार वे शायद कुछ अधिक ही सोच रही थीं कि मैं साइकिल के पार्ट्स बदल डालूंगा. यह एक्सट्रीम था. मैडम ने मुझसे पानी तक के लिए नहीं पूछा, उन्हें लगा होगा कि मैं उनका घर लूट लूंगा. साफ-साफ कहा, साइकिल लेना हो तो हजार रुपये दें या बाद में आयें. फिर मैंने तीसरा ऑफर किया, कहा एक बार पड़ोस की साइकिल दुकान से पूछकर आता हूं कि इस साइकिल को चालू होने में कितना खर्च होगा. मैं दुबारा रिक्शे को तलाशना और उसे 40 रुपये देना नहीं चाहता था. साइकिल की दुकान पर मेरी समस्या का अलग तरीके से समाधान हो गया. उन मोहतरमा की साइकिल के बारे में तो कुछ पता नहीं चल पाया, मगर साइकिल वाले के पास एक सेकेंड हेंड साइकिल बेचने के लिए टू-टंच करके रखी हुई थी, 1500 रुपये में. उसने मुझे टेस्ट ड्राइव का भी ऑफर दिया, जिसे मैंने स्वीकार कर लिया. टेस्ट ड्राइव के बाद मुझे सौदा ठीक ही लगा. फिर उसमें ताला और सीट लगवाकर 1600 रुपये में घर ले आया.
साइकिल के साथ दस दिन
पहले दिन साइकिल लेकर दफ्तर पहुंचा तो काफी थकावट महसूस हुई, फिर मैंने सोचा कि शायद बहुत दिनों बाद चला रहा हूं और दूरी अधिक है इस वजह से ऐसा महसूस हो रहा है. मगर दूसरे दिन समझ आया कि सीट अंदर से टूटी हुई है और सीट की हाइट कम है. इस वजह से ऐसा हो रहा है. फिर डेढ़ सौ रुपये लगाकर सीट बदलवाई. अगले दिन ब्रेक टूट गया तो उसे बदलवाया. खैर दो-तीन के खुदरा खर्च में साइकिल कुछ ऐसी हो गयी कि मैं आराम से चलाकर जाता हूं और रात में खुली हवा का मजा लेते हुए, बड़े गुलाम अली और पंडित छन्नूलाल की ठुमरी सुनते हुए, रास्ते में सस्ती सब्जी खरीदते हुए घर लौटता हूं. कुछ गड़बड़ियां और हैं, मैं यह समझ रहा हूं कि फर्स्ट हैंड साइकिल लेना चाहिये था. मगर अब इसे ले लिया है तो छह महीने चलाकर इसकी कीमत वसूल लेना चाहता हूं.
बहरहाल दस दिनों तक साइकिल से आने-जाने के बाद समझ आया कि कैसे हाल के दिनों में साइकिल भारतीय सड़कों पर महादलित सवारी बनकर रह गयी है. पटना का बेली रोड आम तौर पर ज्यादा भीड़-भाड़ भरा नहीं रहता, फिर भी साइकिल सवारों को कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है. साइकिल की अमूमन कोई लेन नहीं होती और जहां होती भी है तो उस पर कई तरह के कब्जे होते हैं. कई जगह फुटपाथिया दुकानदार इस स्पेस को घेर लेते हैं. कई जगह लोग बालू और गिट्टी गिराकर रखते हैं. स्टैंड के आसपास उस स्पेस पर ऑटोवाले कब्जा जमाये रहते हैं. कई दफा उल्टी साइड से बाइक वाले, रिक्शा वाले और गाड़ी वाले बड़े आराम से चले आते होते हैं. उनके मन में ऐसा करने पर कोई अफसोस नहीं होता. साइकिल सवार को हर बार या तो ब्रेक लेकर खड़ा होना पड़ता है या लेन बदलकर बसों और कारों वाली खतरनाक लेन में घुसना पड़ता है. हर बार पेट्रोल डीजल फूंकने वाली गाड़ियों पर सवार लोग साइकिल वालों को हिकारत की निगाह से देखते हैं. कुछ इस तरह कि अलकतरे पर क्यों चल रहे हो, शर्म नहीं आती. अलकतरे वाली सड़क से नीचे उतरो मलेच्छ.
इसके बावजूद पटना में सड़कों पर साइकिल वाले खूब मिलते हैं. इस वजह से मुझे अपने रास्ते में कई साइकिल मिस्त्री भी नजर आ जाते है, यह इस बात की गारंटी है कि अगर कहीं आपका साइकिल पंचर हो गया तो उसे ज्यादा देर तक घसीटना नहीं पड़ेगा. खुशकिस्मती है कि अब तक पंचर नहीं हुआ, एक बार हवा कम होने पर हवा भरवाया है. अगर आप पंप से खुद हवा भरते हैं तो आज भी पंचर वाले उसका पैसा नहीं मांगते. 16 साल पहले जब मैं पटना में था तो साइकिल से घूमा करता था. तब भी यही रीत थी. हालांकि तब कोई राजा बाजार नहीं जाता था. पटना महेंद्रू घाट से शुरू होकर चिड़ियाखाने तक पहुंचते-पहुंचते खत्म हो जाया करता था. दूसरी तरफ बोरिंग रोड के पानी टंकी के पास. हमारे दोस्त पानी टंकी, कंकड़बाग, महेंद्रू और बहादुरपुर गुमटी के बीच रहा करते थे और हम साइकिल से एक दूसरे के ठिकाने पर आराम से आया जाया करते थे. तब इतनी भीड़ नहीं होती थी औऱ हम बीच सड़क पर आऱाम से साइकिल चलाते थे.
मगर अब पटना बदल गया है. हर गली में गड्ढे भी हैं और ढेर सारी गाड़ियां भी. रोज रात जब सवा ग्यारह बजे घर लौटता हूं तो अपनी ही गली में कोई न कोई एसयूवी मिल जाती है. रात में कुत्ते को भरोसा दिलाना पड़ता है कि भाई लोकल हूं, आउटसाइडर मत समझना. उम्मीद है कुछ दिनों में पहचान जायेगा. प्लान है, कम से कम मार्च, 2015 तक यह सफर जारी रहेगा. जब तक धूप चमड़ी झुलसाने न लगे. वैसे अगर धूप झेलना मुमकिन होगा तो इस सफर को जारी रखा जायेगा. तो इस सफर के लिए मुझे शुभकामनाएं दें. अगर आपने अंत तक इस बकवास को झेल लिया तो मैं आपको धन्यवाद कहता हूं.

Friday, September 05, 2014

सिंहा सर न होते तो मैं आइआरएस न होती- ललिता


यह कहानी सुपौल नवोदय विद्यालय के लाइब्रेरियन आरके सिंहा की है. जिसकी मदद से कई लड़कियों ने कम उम्र में विवाह के बंधन में बंधने के बदले उच्च कैरियर को हासिल किया. गरीब छात्रों की पढ़ाई में पैसा बाधक नहीं हुआ और बच्चों को बचपन से उनकी रुचि के अनुसार कैरियर से जुड़ने का मौका मिला. जिनसे आज भी जुड़े रहते हैं उनके पुराने शिष्य...
सिंहा सर का नाम सुनते ही ललिता चहक उठती हैं. वे राउरकेला में इनकम टैक्स डिपार्टमेंट में डिप्टी कमिश्नर हैं. ललिता कहती हैं उसका कैरियर बनाने में सिंहा सर की बड़ी भूमिका रही है. उसे खुद नहीं मालूम था कि वह क्या कर सकती हैं, मगर सर ने उसे हमेशा प्रोत्साहन दिया. आर्थिक रूप से कमजोर परिवार की होने की वजह से वह पूर्णिया शहर में रहकर ट्यूशन नहीं कर पा रही थीं, तो आरके सिंहा ने उन्हें अपने घर में रहने का ऑफर किया. पिता की तरह संभाला. कई दफा तो साइकिल पर बिठाकर ट्यूशन पहुंचाया. बाद में ललिता ने पहले वेटनरी डॉक्टर की पढ़ाई की और फिर सिविल सर्विसेज की परीक्षा पास की. इस पूरे दौर में सिंहा सर का मार्गदर्शन उसे हमेशा मिलता रहा. आज भी वह उनमें पिता की छवि देखती हैं.
नया जमाना शिक्षक के ट्यूटर हो जाने का है और फीस के बराबर कीमत में बच्चों को पढ़ा देने के अलावा शिक्षक उससे और कोई रिश्ता नहीं रखना चाहते, मगर इसी जमाने में नवोदय विद्यालय सुपौल के लाइब्रेरियन राकेश कुमार सिंहा जैसे शिक्षक भी हैं. उनका हर शिष्य कहता है कि अगर सिंहा सर नहीं होते तो उनके जीवन का यह रुख नहीं होता. उन्होंने न सिर्फ बच्चों को पढ़ाया बल्कि बचपन से ही छात्रों की रुचि को देखते हुए उसके कैरियर को दिशा दी. इतना ही नहीं उन्होंने कई लड़कियों का विवाह कम उम्र में होने से बचाया, माता-पिता को पढ़ाई का महत्व समझाया. आज वे लड़कियां बेहतर कैरियर हासिल कर आत्मसम्मान भरा जीवन जी रही हैं. गरीब बच्चों को पैसों से मदद की और करवाई ताकि उनकी पढ़ाई रुके नहीं. छात्र-छात्रओं को अपने घर में रहने की जगह दी, ताकि वह ट्यूशन कर सके. आज उनके पढ़ाये बच्चे आइएएस, आइपीएस, आइआइएम टॉपर तक हैं. फिर भी ये लोग जब किसी मुसीबत में फंसते हैं या अनिर्णय की स्थिति में आते हैं तो अपने सिंहा सर को याद करते हैं. इतना ही नहीं उनके सफल छात्रों ने तो एक एसोशियेसन भी बना लिया है ताकि जरूरतमंद छात्रों की पढ़ाई लिखाई में मदद कर सकें.
ललिता जैसी ही कहानी पूर्णिया के बनमनखी की रहने वाली निभा की है, जिसके पिता एक कपड़ा व्यवसायी की दुकान पर काम करते थे. उन्होंने उसकी प्रतिभा को देखते हुए उसे हमेशा ऊंची पढ़ाई के लिए प्रेरित किया. जब मैनेजमेंट की पढाई के लिए सिम्बायोसिस में उसका एडमिशन होना था तो पैसे का अभाव आड़े आ गया था. तब सिंहा सर ने अपने एक पूर्व छात्र अमरेंद्र की मदद से पैसों का इंतजाम कराया. आज निभा मोन्सेंटों इंडिया में उच्च पद पर कार्यरत है.
सुपौल के राजेंद्र की कहानी तो विलक्षण है. एक परिवार में नौकर का काम करने वाले राजेंद्र का एडमिशन जब नवोदय में हुआ तो उसके लिए यह एक सपने की शुरु आत थी. वहां संयोग से उसे सिंहा सर जैसा मार्गदर्शक मिल गया. उन्होंने न सिर्फ राजेंद्र के मन से झङिाक को हटाया बल्कि उसे ऊंची पढ़ाई के लिए प्रेरित किया. स्कूल से निकलने के बाद जब उच्च शिक्षा का सवाल उठा तो सिंहा सर ने उसे रांची भेजा. रांची में उसका नामांकन सेंट जेवियर्स कालेज में हो गया. वहां रहने और खाने-पीने का इंतजाम सिंहा सर के एक रिश्तेदार के घर हुआ. वहां राजेंद्र बीएससी में यूनिवर्सिटी टॉपर रहा और एमएससी करने के बाद पारिवारिक जिम्मेदारियों को समझते हुए उसने एक सरकारी प्लस टू स्कूल में शिक्षक की नौकरी कर ली है.
आरके सिंहा हालांकि एक लाइब्रेरियन हैं. मगर वे हमेशा स्कूल की एक्सट्रा कैरिकुलर एक्टिविटीज के भी इंचार्ज रहे हैं. वे कहते हैं, एक शिक्षक के पास देने के लिए मार्गदर्शन के अलावा और क्या होता है. उन्होंने सिर्फ अपना काम किया है. बच्चे आज सफल होकर अच्छा काम कर रहे हैं तो उन्हें यह देखकर खुशी होती है. बच्चे याद कर लें यही उनका पारितोषिक है.
ललिता अपने पति और बच्चे के साथ. तसवीर उसके फेसबुक वाल से

Friday, August 22, 2014

इतना पानी है तो बैंक में क्यों नहीं जमा करते


इन दिनों गांव बाढ़ से परेशान हैं और शहर जल जमाव से, महज कुछ महीने पहले तक शहर औऱ गांव के लोग पानी की एक बूंद के लिए तरस रहे थे.
इन दिनों उत्तराखंड से असम तक नेपाल की तराई वाला लगभग पूरा उत्तर भारतीय इलाका बाढ़ के पानी में ऊब-डूब कर रहा है. हिमालय में हुई तेज बारिश की वजह से वहां से निकलने वाली तमाम नदियों में भरपूर पानी है. इस सैलाब ने जगह-जगह नदियों के किनारे बनी मिट्टी की उन दीवारों को तोड़ दिया है जिन्हें राज्यों के जल संसाधन विभाग के अभियंता तटबंध के नाम से पुकारते हैं. और टूटे दरारों से निकले पानी के तेज बहाव से सामने के गांव भंस रहे हैं. तकरीबन वैसी ही हालत उत्तर भारतीय शहरों की है. पटना समेत कई शहरों में नाव चलने की नौबत आ गयी है, निचले इलाकों में पानी बेडरूम तक पहुंच गया है और शहर के बाशिंदे फुलपैंट का पांयचा चढ़ाकर सड़कों पर जिम्नास्टिक का खेल दिखा रहे हैं. इस सामूहिक अव्यवस्था को हमारे टीवी चैनलों ने जल प्रलय का नाम दिया है. यह दीगर बात है कि इस प्रलय में हर पुरुष मनु और हर स्त्री श्रद्धा है.
तसवीरों और विजुअल्स को देखकर हमारा द्रवित होना स्वभाविक है. मगर जब बाढ़ को प्रलय के नाम से पुकारा जाता है तो मन एकबारगी मानने को तैयार नहीं होता. बारिश के मौसम में नदियों में बढ़ आया पानी क्योंकर हमारे लिए दैत्य सरीखा हो गया है, जबकि महज चार माह पहले इन्हीं नदियों में पानी के लिए हम तरसते रहते हैं. महज चार माह बाद जब रबी का मौसम शुरू होगा तो यही किसान पानी के लिए मारे-मारे फिरेंगे जो आज खेतों में लबालब पानी देखकर टसुए बहा रहे हैं. वही शहरी जो पायचें चढ़ाकर सरकार को कोस रहा है, अप्रैल-मई में ट्यूबवेल सूख जाने पर झख मारेगा है और बगैर नहाये दफ्तर जाने के लिए विवश हो जायेगा. वह पानी जो चंद माह पहले आपके लिए अमृत होता है, क्योंकि कम होता है. वह चंद माह बाद जहर क्यों हो जाता है, जब वह अधिक होता है. यह ठीक है कि आप महीने के आखिरी दिनों में पैसों की कमी का रोना रोते हैं, मगर ऐसा तो कभी नहीं सुना कि महीने के शुरुआत में कोई पैसे अधिक होने का रोना रोये. ऐसा क्यों है कि इस दुनिया में पैसों का बैंक है, खून का बैंक है, अनाज का बैंक है, बिजली बैंक करने के तरीके हैं, सूरज की रोशनी की भी बैंकिंग कर सकते हैं, मगर बारिश के दिनों में आये इस सैलाब की बैंकिग नहीं कर सकते.
आखिर यह सैलाब आपके लिए लाता क्या है, पानी और गाद. आपको यह जानकर हैरत होगी कि कोसी तटबंध के बीच बसे लाखों किसान जो इस बार बाढ़ की वजह से तटबंधों पर आ बसे हैं, पिछले तीन साल से बाढ़ नहीं आने की वजह से उदास थे. बाढ़ उनके लिए परेशानी जरूर लाता है, मगर उसके साथ रिटर्न गिफ्ट भी होते हैं. जब पानी उतरता है तो खेतों में उपजाऊ मिट्टी की परत छोड़ जाता है. उस जमीन पर खेती करने के लिए भी खाद की जरूरत नहीं होती. बीज छीट देने पर भी सोना उगता है. किसान दो सीजन का लाभ एक सीजन में कमा लेते हैं. इसलिए जिस साल पानी नहीं आता तटबंधों के अंगर बसे किसान उदास हो जाते है, कहते हैं इसबार खेती गड़बड़ा जायेगी. यह कोई नयी और अजूबा बात नहीं है. इस देश में जब नदियां मिट्टी की दीवारों में कैद नहीं हुआ करती थीं तो नदी किनारे बसे किसान इसी तरह बाढ़ का इंतजार करते थे. तब एक हफ्ते की बाढ़ आती थी, घरों में भी चार दिन पानी घुसता था. लोग यह समय किसी तरह काट लेते थे, इस उम्मीद में कि खेती बंपर होगी. हालांकि बाढ़ के बाद महामारी का मौसम आता था जो खतरनाक होता था, मगर नये जमाने में डीडीटी ने महामारियों की संभावना पर भी विराम लगा दिया है.
यह सच है कि हाल के वर्षों में बाढ़ विभीषिका का रूप लेने लगी है. अब पानी पहले की तरह किनारों पर पसरता नहीं बल्कि तटबंध तोड़कर वाटर कैनन की तरह तबाही मचाता है. जब तटबंध नहीं थे तो सैलाब का पानी नदियों के किनारों पर धीरे-धीरे पसरता था और आसपास के गांवों में घुसते हुए फैलता था. कभी एक झटके में पानी का फ्लो नहीं आता था. मगर तटबंधों ने सैलाब को वाटर बम बना दिया है. बाढ़ आता है तो पानी तटबंधों के बीच उबलता रहता है औऱ किसी कमजोर बिंदू पर नदी तटबंध को तोड़कर बाहर निकल आती है. नतीजा यह होता है कि तेज बहाव सामने आने वाली हर चीज को तहस-नहस कर जाता है. इस तरह से देखा जाये तो तटबंध जो बाढ़ नियंत्रण के नाम पर बनते हैं, वे बाढ़ की विभीषिका को और बढ़ा देते हैं. हालांकि इनके जरिये बाढ़ का नियंत्रण कितना हो पाता है, यह भी सवालों के घेरे में है.
कोसी औऱ बागमती नदी पर शोधपरक काम करने वाले दिनेश मिश्र मानते हैं कि तटबंधों ने बाढ़ की संभावनाओं को घटाने के बदले बढ़ाया है. वे कोसी तटबंधों का आंकड़ा देते हुए कहते हैं कि तटबंध बनने के बाद बाढ़ पीड़ित इलाकों की संख्या में बढोतरी हुई है. अब यह लगभग मान लिया गया है कि तटबंध प्रणाली बाढ़ से सुरक्षा कर पाने में सक्षम नहीं है. मगर हर राज्य का जलसंसाधन विभाग इन तटबंधों को बचाकर रखना चाहता है, ताकि इन्हें मानसून के मौसम में सुरक्षा देने के नाम पर अरबों का वारा-न्यारा आसानी से होता रहता है. फिर जब तटबंध टूटता है और सैलाब आता है तो रिले बैटल आपदा प्रबंधन विभाग के पास चली जाती है, वह नये सिरे से अरबों का वारा-न्यारा करता है. इस तरह उत्तर भारत के इन इलाकों में बाढ़ एक उद्योग का रूप ले चुकी है. यह राजनेताओं, मंत्रियों, अफसरों, समाज सेवियों और अभियंताओं सब को सूट करती है.
जब भी तटबंध को लेकर सवाल खड़े किये जाते हैं तो इसे अव्यावहारिक करार दिया जाता है. मगर लोग यह भूल जाते हैं कि इन तटबंधों के बीच भी करोड़ों की आबादी गुजर-बसर कर रही है. तटबंध नहीं टूटे तब भी उन्हें हर साल सैलाब झेलना पड़ता है, हां जब तटबंध टूट जाते हैं तो उनको राहत मिल जाती है. प्रेसर तटबंध के बाहर निकल जाता है. तटबंधों और बराजों ने एक और समस्या खड़ी की है. कब्जियत की. इनकी वजह से नदी कब्ज का शिकार हो रही हैं. गाद बाहर नहीं निकल पाता और नदी का पेट फूलता रहता है. यह ठीक उसी तरह है जैसे मनुष्य की शिराओं में वसा की परतें जम जाती हैं और वह ब्लड प्रेसर का शिकार हो जाता है. उसी तरह नदियां भी अलग तरह के प्रेसर का शिकार हैं. तटबंधों में फंसी और गाद से भरी. लिहाजा थोड़ा पानी भी बढ़ता है तो सैलाब का रूप ले लेता है और फिर वह प्रेसर कुछ न कुछ तोड़ फोड़ तो करता ही है. अगर नदियों पर बराज न बने, तटबंध न हों तो यह गाद खुद-ब-खुद खेतों में फैल जाये और नदियां फिर से गहरी हो जायें. फिर न कभी जल सैलाब आयेगा, न तबाही होगी. मगर...
वही कहानी शहरों की है. बारिश के पानी के निकासी के लिए हमने नालियां बनायी हैं, जिन्हें फिर से उन्हीं नदियों में गिरना है जो पहले ही लबालब हैं. हम इतने सुव्यवस्थित नहीं हुए हैं कि हमारी नालियां मानसून से पहले प्रवाहमयी हो जायें. हमारे शहरों में नालियां शायद ही बहती हैं. मैंने आजतक किसी शहरी नालियों को बहते हुए नहीं देखा है. ये आम तौर पर कचरों से भरी होती हैं. छठे-छमाही जब इन्हें साफ किया जाता है तो भी इनमें प्रवाह नहीं दिखता. मेरे मन में दो सवाल आते हैं. पहला नालियों में कचरा कहां से आता है, दूसरा नालियां बहती क्यों नहीं है. हालांकि जब भी शहर में पानी का जमाव हो जाता है तो हम सब लोग नालियों की सफाई का मसला उठाकर नगर निकाय व्यवस्था पर हमलावर हो जाते हैं. जब नालियों का निर्माण जल निकासी के लिए हुआ तो उसमें कचरा कहां से आता है. इसकी वजह है कि हमारे शहरों में कचरा निस्तारण की बेहतर व्यवस्था नहीं है. सवाल यह भी है कि आखिर नालियां नदियों में ही क्यों गिरती है. ड्रेनेज को कितना भी साफ क्यों न कर लिया जाये इसे नदियों में क्यों गिराया जाये. इन तमाम सवालों के जरिये मैं मानता हूं कि हमारे शहर में नालियों की प्रणाली ठीक नहीं है. जो नालियां बहती नहीं है, हमेशा जाम रहती हैं और जिनका काम शहर की गंदगी को नदियों तक ले जाना है उसकी हमें क्या जरूरत है.
मुझे लगता है शहरों में ड्रेनेज के निष्पादन के लिए कोई दूसरी व्यवस्था होनी चाहिये. जिन शहरों के किनारे नदियां नहीं होती वे क्या करते हैं. मैंने कई शहरों में देखा है तालाब बनाकर गंदे पानी को जमा करते हैं फिर उसे खूबसूरत रूप देकर टूरिस्ट प्वाइंट की शक्ल दे देते हैं. हैदराबाद का टैंक बंड और भोपाल का शाहपुरा लेक इसी तरह बना है. अगर हर बड़े मुहल्ले में इस तरह के छोटे-छोटे तालाब हों तो नालियां आसानी से पानी वहां तक पहुंचा पायेंगी. मगर इसके लिए हर मुहल्ले में तालाब होने चाहिये. शहरों में बिल्डरों की गिद्ध दृष्टि हर खाली जमीन पर होती है. जो तालाब थे वे भर डाले गये और उन पर अपार्टमेंट खड़े हो गये, फिर शहरों में तालाब कहां से मिले. मगर अगर शहरों को सर्वाइव करना है तो उन्हें अपार्टमेंट से अधिक तालाबों की जरूरत होगी. वाटर सप्लाई के लिए भी और ड्रेनेज के लिए भी. वरना हमारे शहर महज कुछ सालों में रहने लायक नहीं रहेंगे. गरमियों में पानी बिकेगा और बरसात में नावें चलेंगी. पटना में भवनों का नक्शा पास करने के लिए वाटर हार्वेस्टिंग का प्रावधान अनिवार्य कर दिया गया है. यह अच्छा कदम है. इस तरह के कदम हर शहर में उठाने की जरूरत है.

Monday, August 18, 2014

छह साल बीते मगर जख्म हरे के हरे


2008 की कोसी जल प्रलय की छठी बरसी आज
- पीड़ित 2.36 लाख, बने सिर्फ 27 हजार मकान. - 37 में से एक ही ग्रामीण सड़क हुई बनकर तैयार. - अभी भी नहीं बन पाये 70 में से 34 पुल-पुलिया. - विश्व बैंक ने घटाया योजना का लक्ष्य. - हजारों एकड़ खेतों में आज भी जमा है बालू. - नौ हजार करोड़ की है पुनर्वास की योजना.
मधेपुरा के शंकरपुर प्रखंड स्थित मधेली नहर के पास बिरेन यादव का ध्वस्त मकान आज भी उसी हालत में है, जैसा 2008 में कोसी नदी की धारा ने उसे छोड़ा था. वे पिछले छह सालों से प्रखंड मुख्यालय की दौड़ लगा रहे हैं कि उनके ध्वस्त मकान का मुआवजा मिल सके और वे अपने खस्ताहाल मकान को ठीक-ठाक करा सकें. इस बीच 2011 से कोसी के इलाके में विश्व बैंक समर्थित नौ हजार करोड़ वाली पुनर्वास योजना भी शुरू हो चुकी है. मगर बिरेन यादव जैसे हजारों लोग कोसी की उस भीषण आपदा के छह साल बाद भी एक अदद मकान के लिए तरस रहे हैं. इस काम को अंजाम देने में जुटी बिहार आपदा पुनर्वास एवं पुनर्निर्माण सोसाइटी अब तक कोसी के इलाके में महज 27 हजार लोगों को घर उपलब्ध करा पायी है, जबकि खुद सरकार ने कभी माना था कि 2008 की भीषण बाढ़ में 2,36,632 मकान क्षतिग्रस्त हुए थे. तसवीर बदल देने के वायदों के बावजूद कोसी आज भी उजड़ी की उजड़ी है. खेतों में बालू भरे हैं और लोग पलायन को मजबूर हैं.
2008 के बाढ़ पीड़ित इलाकों में पुनर्वास के तहत बन रहे मकानों की हालत बहुत बुरी है. 2011 में शुरू हुए कई मकान अब तक लिंटर से ऊपर नहीं जा पाये हैं. अधबने मकानों पर झाड़ियां और लताओं ने डेरा बना लिया है. ऐसे ही एक लाभुक रायभीड़ पंचायत के अरताहा गांव के जनार्दन ठाकुर कहते हैं, क्या करें पुनर्वास के तहत जितना पैसा मिला था उससे मकान बना पाना संभव नहीं है. जो पैसा मिला है वह इंदिरा आवास से भी कम है. इसमें मकान, शौचालय और सोलर लाइट तक लगवाना है, सब नक्शा के मुताबिक. इस बीच बालू, सीमेंट और छड़ का दाम दुगुना-तिगुना हो गया है. जिनके पास पैसा है वे लोग अपना पैसा लगाकर किसी तरह मकान पूरा कर रहे हैं, हम गरीब लोग के पास इसमें लगाने के लिए पैसा कहां है.
इधर पुनर्वास सोसाइटी के अधिकारी भी काम की गति कम होने की बात स्वीकार करते हैं. वे बताते हैं कि अब तक सिर्फ 27,203 मकान ही बन पाये हैं. हैरत अंगेज बात तो यह है कि उन्होंने लक्ष्य ही 66,203 लोगों को मकान देने तक सीमित कर लिया है, जो पहले एक लाख का था. संभवतः काम की रफ्तर देखकर विश्व बैंक ने लक्ष्य में संशोधन किया है. विश्व बैंक के पर्यवेक्षक भी कई बार धीमी रफ्तार की शिकायत कर चुके हैं. अधिकारी बताते हैं कि ग्रामीण सड़क निर्माण की 37 योजनाओं में से महज एक ही पूरी हुई है और 70 में से महज 36 पुल ही बनाये जा सके हैं. ऐसी जानकारी है कि स्थानीय स्तर पर ठेकेदार जानबूझकर काम को लटका रहे हैं और सोसाइटी उन पर समुचित दबाव नहीं बना पा रही. विडंबना तो यह है कि खेतों से बालू निकालने के काम को 2016 तक के लिए टाल दिया गया है. अधिकारी कहते हैं यह काम दूसरे फेज में होना है. जबकि सुपौल जिले के कई गांवों में खेतों में बालू भरे हैं. आरटीआई एक्टिविस्ट महेंद्र यादव की आरटीआई के जवाब में सरकार ने स्वीकार किया था कि 14,129.70 एकड़ जमीन पर बालू जमा है. कई खेतों में 2 से 4 फीट बालू है. सरकार ने किसानों को खेतों से बालू हटाने के लिए चार से पांच हजार रुपये प्रति एकड़ की राशि दी थी, मगर किसानों का कहना है कि एक एकड़ जमीन से बालू हटाने का खर्च 50 हजार रुपये प्रति एकड़ से कम नहीं है. और उनके सामने सबसे बड़ा सवाल था कि इस बालू को हटाकर रखें कहां. ऐसे में लोगों की खेती ठप पड़ गयी है और लोगों को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ रहा है.
कोसी के पुनर्वास के लिए विश्व बैंक की योजना
विश्व बैंक ने कोसी के पुनर्वास के लिए 1009 मिलियन डॉलर की राशि स्वीकृत की है. इस राशि से 2021 तक कोसी का पुनर्वास करना है. परियोजना तीन चरणों में पूरी होनी है. काम मुख्यतः सहरसा के 5, सुपौल के 5 और मधेपुरा जिले के 11 प्रखंडों में होना है. इसके तहत
1. पहले चरण में एक लाख मकान बनने हैं 2. क्षतिग्रस्त सड़कों और पुल-पुलियों का निर्माण किया जाना है 3. बाढ़ प्रबंधन का काम किया जाना है 4. आजीविका के साधनों का विकास किया जाना है
पहले चरण के तहत 259 मिलियन डॉलर खर्च किये जाने हैं. पहले इसकी समय सीमा सितंबर, 2014 रखी गयी थी, काम के मौजूदा रफ्तार को देखते हुए समय सीमा बढ़ाकर 2016 कर दी गयी है. दूसरे चरण में 2019 तक 375 मिलियन डॉलर और तीसरे चरण में 2021 तक 375 मिलियन डॉलर खर्च किये जाने हैं.
कोसी आपदा- पुनर्वास एवं पुनर्निर्माण नीति
22 दिसंबर 2008 को राज्य सरकार ने कोसी आपदा- पुनर्वास एवं पुनर्निर्माण नीति घोषित की थी. इसके तहत घरों का निर्माण, सामुदायिक सुविधाओं की उपलब्धता, इंफ्रास्ट्रक्चर की संपूर्ण स्थापना और आजीविका में मदद की बात की गयी थी. कहा गया था कि
- इस आपदा को हम एक मजबूत सामाजिक और आर्थिक वातावरण तैयार करने के मौके के रूप में देख रहे हैं. - प्रभावित क्षेत्र में निजी/सार्वजनिक संसाधनों का पुनर्वास और पुनर्निर्माण किया जायेगा. - क्षतिग्रस्त निजी/सार्वजनिक भवनों का समुचित तरीके से मरम्मत और पुनर्निर्माण किया जायेगा. - खेती, मत्स्य उद्योग, डेयरी उद्योग, लघु व्यवसाय और हस्तशिल्प के रूप में स्थानीय समुदाय को आजीविका उपलब्ध करायेंगे. - शिक्षा और स्वास्थ्य के तंत्रों का विकास और महिलाओं व कमजोर वर्गों के सशक्तीकरण पर विशेष ध्यान दिया जायेगा. - पंचायतों को क्रियान्वयन में भागीदारी दी जायेगी.
खबर आज के प्रभात खबर के अंक में प्रकाशित है.

Friday, August 08, 2014

कहां है पानी, पानी तो खाली टीवी और पेपर में है...


पिछले दिनों कोसी के इलाके में बाढ़ की संभावना ने लोगों को हलकान कर दिया था. बाढ़ तो आयी नहीं मगर तीन दिन नौ जिलों के लोग तबाह रहे. उन दिनों मैं उसी इलाके में था. यह रिपोर्ताज लिखी, जो प्रभात खबर में प्रकाशित भी हुआ...
वीरपुर बाजार के एक नेट कैफे में जब यह खबर टाइप की जा रही है, बाजार के तीन चौथाई दुकान बंद हैं और सड़कें सूनी हैं. लोग बताते हैं कि सोमवार को तो और भी सूना-सपाटा माहौल था. वीरपुर और आसपास के कई गांवों के लोग दो अगस्त की शाम से ही घर छोड़कर सुरक्षित स्थान की ओर जाने लगे थे. तीन अगस्त औऱ चार अगस्त के दिन यहां एक इंसान नजर नहीं आता था. आसपास के गांव ललितग्राम, बलुआ बाजार, लछमिनियां, भीमनगर, ठुठ्ठी, चापीन, हृदयनगर, सीतापुर आदि गांवों के तकरीबन 90 फीसदी लोगों ने अपने रिश्तेदारों के घरों में शरण ले ली थी. मंगलवार को खतरा टलने की खबर सुनकर पास पड़ोस में रहने वाले इक्का-दुक्का परिवार रहे हैं.
नेट कैफे संचालक संजय कुमार राय बताते हैं कि तीन अगस्त को तो सड़कों पर एक आदमी नजर नहीं आता था. आसपास के दर्जनों गांवों के लोग पलायन कर गये थे. ऐसा इस वजह से हुआ कि 2008 की भीषण बाढ़ में सबसे अधिक तबाही हमारे इलाके के लोगों ने ही झेली थी. यह इलाका कुसहा के मुहाने पर पड़ गया था. इसलिए बाढ़ की बात सुनकर ही लोग घबरा गये और कोई रिस्क लेने के बदले घर छोड़ कर सुरक्षित इलाकों में चले गये. एक स्थानीय होटल संचालक भी इस बात की पुष्टि करते हैं और कहते हैं कि आम दिनों में आप आते तो यहां भयंकर शोर-शराबा और भीड़-भाड़ का माहौल देखते. तीन दिन से इतना सन्नाटा है कि लगता है हम किसी और जगह में रह रहे हैं.
वैसे तो इन गांवों के लोग ज्यादातर अपने रिश्तेदारों के घर गये हैं. कुछ गरीब तबके के लोग राघोपुर स्टेशन के पास भी शरण लिये हुए हैं, जहां 2008 में बाढ़ का पानी नहीं आया था. इसके अलावा बड़ी संख्या में लोग सरायगढ़ स्थित रिलीफ कैंपों में नजर आते हैं. वैसे तो ये कैंप तटबंध के भीतर के लोगों के लिए बने थे. मगर वहां बसंतपुर प्रखंड के दहशतजदां लोगों ने भी बड़ी संख्या में शरण ले रखी हैं. कैंप में उन्हें चार वक्त का भोजन, रहने की सुविधा, स्वास्थ्य सुविधा आदि तो उपलब्ध है ही साथ ही छोटे बच्चों के लिए आंगनबाड़ी केंद्र भी काम कर रहे हैं. इस बार के सरकारी रिलीफ कैंपों की सुविधा से लोग काफी संतुष्ट नजर आते हैं. वे अभी इन कैंपों में चार दिन और रहकर लौटना चाहते हैं. इन्हें अभी भी भरोसा नहीं है कि खतरा टल गया है. एक बुजुर्ग लक्ष्मी राम बताते हैं कि कभी कहा जाता है विस्फोट किया जायेगा, कभी कहा जाता है खतरा टल गया. हम कैसे भरोसा कर लें. एक तरह की बात कही जाये तब तो.
कोसी के तटबंध के भीतर रहने वाले लोग भी बड़ी संख्या में उस रिलीफ कैंप में हैं. इनमें ढोली, कटैया भुलिया, कटैया, बलथरवा, सियानी, बनैनिया, सिरपुर गिरधारी, गौरीपट्टी आदि गांवों के लोग हैं. मगर उन लोगों में दहशत का माहौल कम ही नजर आता है. इनमें से अधिकांश लोग सेना द्वारा दबाव बनाकर यहां लाये गये हैं. पुरुष वर्ग के लोग दिन के वक्त अभी भी कैंप छोड़कर गांवों में चले जाते हैं, जहां उनके मवेशी रह रहे हैं. दरअसल रिलीफ कैंपों का इंतजाम तो बेहतर है, मगर मवेशियों के लिए ठीक इंतजाम हो नहीं पाया है. हालांकि पानी बढ़ने की वजह से उनके गांव पहुंचे का एक मात्र रास्ता नावें ही रह गयी हैं. मगर वे फिर भी गांव आना-जाना छोड़ नहीं रहे हैं. ऐसे ही गांव का एक युवक रवि राम कहता है कि हमलोगों का जीवन तो पानी में ही गुजरा है, हमको क्या भय. कितना भी पानी आ जायेगा. हमलोग अपने बचने का रास्ता निकाल लेंगे. यह तो आप लोगों ने सबको डरा दिया है, हम लोग तो जानते हैं कुछ नहीं होगा. कुछ होगा भी तो बराज के पहले ही तटबंध टूट जायेगा और पानी निकल जायेगा.
वैसे तटबंध के किनारे-किनारे चलने बड़ी संख्या में बांस और बत्ती लगे हुए हैं. पूछने पर लोग बताते हैं कि बांध के अंदर के लोगों ने बांस-बल्ली लगाकर जगह घेर लिया है कि अगर पानी आया तो यहीं आकर रहेंगे. तटबंध की ओर हाथ दिखाकर बताते हैं कि झुट्ठो हल्ला है, बताइये कहां है पानी... तीन दिन से परेशान-परेशान हैं, पानी अब आयेगा, तब आयेगा... खाली फौरकास्टिंग करता है, लगता है हदसा कर जान ले लेगा...
तकरीबन ऐसा ही माहौल सिमराही बाजार के आसपास का है. वहां के लोगों को इस बात का आत्मविश्वास है कि यहां तो 2008 में भी पानी नहीं आया था, अब क्या आयेगा. वीरपुर और आसपास के गांवों से पलायन करने वाले लोग भी इसी उम्मीद पर सिमराही बाजार में जा बसे हैं. वहां भी तीन दिन से लगातार इसी बात पर बहस हो रही है कि पानी आयेगा या नहीं आयेगा. विस्फोट होगा तो पानी कहां तक पहुंचेगा... बाजार पर रहने वाले युवक रोज-सुबह शाम पास के तटबंध के इलाके में झांक कर आ जाते हैं कि पानी बढ़ा तो नहीं. पानी की स्थिति जस की तस देखकर लौट आते हैं औऱ कहते हैं फॉल्स खबर उड़ा दिया है... चौक पर बैठे एक सिपाही जी कहते हैं, खाली माइकिंग है, हमको तो समझे में नहीं आता है पानी कहां है. न नहर में पानी न बैराज में पानी खाली पेपर और टीवी में है...

Thursday, July 24, 2014

भारतीय भाषाओं को हक दिलाने की एक कारगर लड़ाई


सोलहवीं लोकसभा में शपथ ग्रहण के दौरान आपने महसूस किया होगा कि कई सांसदों ने हिंदी, संस्कृत और अपनी मातृभाषा में शपथ ली. आंकड़ों के मुताबिक यह पहला मौका था जब संसद में 17 अलग-अलग भारतीय भाषाओं में शपथ लिये गये थे. इनमें हिंदी और अपनी मातृभाषा में शपथ लेने वालों की संख्या तो काफी थी, सबसे रोचक यह तथ्य है कि सभी भारतीय भाषाओं की जननी कही जाने वाली संस्कृत भाषा में भी 42 सांसदों ने शपथ ग्रहण किया. मगर क्या आप जानते हैं कि यह मुमकिन कैसे हुआ. इसे मुमकिन किया कुछ ऐसे लोगों के समूह ने जो देश में भारतीय भाषाओं को उनका अधिकार दिलाने के लिए लंबे समय से सक्रिय हैं. इस अभियान का नेतृत्व करने वाले प्रवीण कुमार जैन ने तो पिछले तीन-चार सालों में हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं को उनका अधिकार दिलाने के लिए इतने अभियानों का संचालन किया है कि वे वन मैन आर्मी की तरह माने-जाने लगे हैं.
हिंदी में शपथ ग्रहण के अलावा सरकार द्वारा सोशल मीडिया में हिंदी को प्राथमिकता दिये जाने के फैसले के पीछे भी उनका दबाव ही कारगर साबित हुआ है. प्रवीण बताते हैं कि वे पिछले दो-ढाई साल से इस अभियान में जुटे थे और अपने मित्र समूह की मदद से सभी मंत्रालयों को पत्र लिख रहे थे कि वे सोशल मीडिया के संदेशों में हिंदी को प्राथमिकता दें. उनका तर्क यह था कि इस देश की 97 फीसदी आबादी अंग्रेजी भाषा का प्रयोग नहीं करती तो फिर हर मामले में अंग्रेजी को क्यों थोपा जाता है. प्रवीण बताते हैं कि यह आदेश बेवजह राजनीतिक विवाद में पड़ गया. दरअसल, इस आदेश की मंशा कतई दूसरी भारतीय भाषाओं को कमतर साबित करना नहीं था. इसका उद्देश्य सभी भारतीय भाषाओं को गौरव दिलाना था.
मध्यप्रदेश के सागर जिले के रहने वाले प्रवीण कुमार जैन मुम्बई में कंपनी सचिव(सीएस) हैं. वे साल 2011 से ही हिंदी और दूसरी भाषाओं को सम्मान दिलाने के अभियान में जुटे हैं. इस अभियान के तहत उन्होंने सिर्फ सरकारी विभागों को ही फोकस नहीं किया है, वे सरकारी और निजी सभी बैंकों और उपभोक्ता सामग्री निर्माण करने वाली कंपनियों को भी हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए प्रेरित किया और कई दफा मजबूर भी. वे कहते हैं कि हमें उपभोक्ता वस्तु और सेवा प्रदान करने वाली कंपनियों की जिम्मेदारी बनती है कि हमें उपलब्ध होने वाली सेवा या वस्तु के बारे में वे हमारी भाषा में जानकारी दे. जैसे, पारले का बिस्कुट गांव-गांव में इस्तेमाल किया जाता है, मगर इसके रैपर पर जितनी जानकारियां होती हैं, सब अंग्रेजी में लिखी होती हैं. नाम से लेकर मूल्य तक और इस बिस्कुट के निर्माण में जो सामग्री इस्तेमाल की गयी है उसका विवरण भी अंग्रेजी में ही होता है. क्या एक उपभोक्ता का यह अधिकार नहीं कि उसे यह जानकारियां उसकी भाषा में दी जाये. वे बैंकिग सेवाओं में भारतीय भाषाओं के प्रयोग के लिए भी लगातार संघर्ष करते रहे हैं.
पासबुक की प्रिंटिंग, एटीएम की स्लिप और एसएमएस अलर्ट तक में भारतीय भाषाओं का इस्तेमाल हो इसके लिए उन्होंने देश की तमाम बैंकों को लगातार पत्र लिखा और उनके शीर्ष अधिकारियों पर दबाव बनाया. आरबीआइ और सेबी को भी शिकायतें कीं. इस संघर्ष का सकारात्मक नतीजा भी आया. वे बताते हैं कि एचडीएफ जैसे बैंक ने उनके सुझाव को सकारात्मक रूप में लिया और मोबाइल बैंकिग और एसएमएस अलर्ट की सुविधा हिंदी में मुहैया कराने वाला वह पहला भारतीय बैंक बन गया. अब केनरा बैंक भी ऐसी सुविधा देने लगा है. उनकी एक सहयोगी विजयलक्ष्मी द्वारा लगातार दबाव बनाने की वजह से देश के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने ग्राहकों के कहने पर पासबुक हिंदी में प्रिंट कर देने की व्यवस्था की है. अब वे दबाव बना रहे हैं कि हिंदी भाषी क्षेत्रों में पासबुक बाइ डिफॉल्ट हिंदी में प्रिंट हों और अगर कोई अंग्रेजी में मांग करे तो उन्हें यह सुविधा दी जाये. इसके लिए वे आरबीआइ पर भी दबाव बना रहे हैं. उनके प्रयासों की वजह से ही यूनियन बैंक एटीएम की पर्चियां नौ भारतीय भाषाओं में देने लगा है. उनका कहना है कि बैंकों की ऑनलाइन सेवाओं में अंग्रेजी का एकाधिकार शर्मनाक है. क्या अंग्रेजी नहीं जानने वालों का संचार क्रांति पर कोई हक नहीं है?
उपभोक्ता वस्तुओं के मसले पर उन्हें ज्यादा सफलता नहीं मिली है. कोलगेट के कुछ पेस्ट और कुछ साबुन के नाम हिंदी में जरूर आने लगे हैं. वे कहते हैं कि आकाश नमकीन और हल्दीराम जैसी कंपनियों पर भी उन्होंने दबाव बनाया है, यह कहते हुए कि वे भारतीय स्वाद का प्रचार करती हैं मगर भारतीय भाषा का इस्तेमाल क्यों नहीं करतीं. वे बताते हैं कि यह हैरत की बात है कि हल्दीराम के पैकेट पर फ्रेंच, रशियन जैसी भाषाओं में तो लिखा होता है, मगर हिंदी में नहीं. जिस हिंदी इलाके में उसके सबसे अधिक उपभोक्ता हैं. वे कहते हैं कि जब तक इन वस्तुओं के निर्माण सामग्री का ब्योरा जब तक भारतीय भाषाओं में नहीं आयेंगे तब तक इस मसले पर उनकी लड़ाई अधूरी रहेगी. जहां निजी कंपनियों से लड़ाई में उपभोक्ता अधिकार को वे अपना हथियार बनाते हैं, वहीं सरकारी विभागों में हिंदी और दूसरी भाषाओं को अधिकार दिलाने के लिए प्रवीण ने राजभाषा अधिनियम और राजभाषा नियमावली को आधार बनाया है. उन्होंने इसके आधार पर भारत सरकार के तमाम मंत्रलयों, सूचना प्रसारण विभाग के प्रतिष्ठानों व अन्य सरकारी प्रतिष्ठानों को पत्र लिखे, आरटीआइ दायर किया और सामूहिक संदेश भेजे. प्रवीण कहते हैं कि सबसे पहले उन्होंने प्रधानमंत्री की वेबसाइट पर हिंदी के इस्तेमाल का अनुरोध करते हुए पत्र लिखा. लगातार पत्राचार करने के बावजूद जब कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी तो उन्होंने सूचना का अधिकार कानून के तहत सूचना मांगी कि वहां राजभाषा अधिनियम के प्रावधानों का इस्तेमाल क्यों नहीं हो रहा. छह-सात महीने तक लगातार सूचना मांगने बाद वहां हिंदी का प्रयोग होता नजर आने लगा. फिर उन्होंने राष्ट्रपति भवन के वेबसाइट पर हिंदी का प्रयोग सुनिश्चित करने का अभियान शुरू किया. वे बताते हैं कि राष्ट्रपति भवन के ज्यादातर अधिकारी दक्षिण भारतीय थे, इसलिए वे इस मसले में बहुत रुचि नहीं ले रहे थे. फिर उन्होंने उन्हें याद दिलाया कि राजभाषा अधिनियम और नियमावली के साथ-साथ केंद्रीय हिंदी समिति के कई प्रस्ताव राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से ही लागू हुए हैं. 1 अप्रैल 2014 से वहां भी हिंदी सम्मानित रूप में नजर आने लगी.
इस बीच उनकी निगाह दलाई लामा के वेबसाइट पर गयी. वहां उन्होंने देखा कि अंग्रेजी के साथ-साथ मंगोल, जर्मन, फ्रेंच और कई पश्चिमी भाषाएं मौजूद हैं मगर वे जिस देश में रहते हैं उसकी कोई भाषा वे इस्तेमाल नहीं कर रहे. उन्होंने इस पर दलाई लामा को पत्र लिखा और आग्रह किया. प्रवीण बताते हैं कि दलाई लामा ने उनके इस अनुरोध को स्वीकार कर लिया और जून, 2013 में गुरु पूर्णिमा के दिन से ही यह वेबसाइट हिंदी में भी नजर आने लगी. प्रवीण कुमार जैन बताते हैं कि बचपन से ही उनके मन में यह बात रहती थी कि देश में हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं को समुचित सम्मान नहीं मिला है. अंग्रेजी की तुलना में उनकी हैसियत कमतर रहती है. वे बताते हैं कि एक दिन तीन मित्रों ने मिलकर शपथ लिया कि वे चाहे बड़े पद पर क्यों न चले जायें मगर वे हिंदी का ही इस्तेमाल करेंगे.देवनागरी में ही हस्ताक्षर करेंगे और देवनागरी अंकों का ही इस्तेमाल करेंगे. मगर बचपन में ली गयी शपथ की बात आयी गयी हो गयी. 2011 में अचानक उनकी नजर राजभाषा अधिनियम और नियमावली पर पड़ी तो उन्हें लगा कि देश में भारतीय भाषाओं का सम्मान तो इस कानून के जरिये ही वापस लाया जा सकता है. इसके बाद उन्होंने अपना अभियान शुरू कर दिया.
प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के वेबसाइट के बाद उन्होंने प्रसार भारती के संस्थानों में भारतीय भाषाओं को सम्मान दिलाने की मुहिम शुरू की. उन्होंने कहा कि दूरदर्शन के सारे चिह्न यूपीए शासन में अंग्रेजी में हो गये थे. उन्होंने अभियान चलाकर प्रसार भारती पर दबाव बनाया कि दूरदर्शन का लोगो और दूसरे चिह्न हिंदी में लायें. इस मुहिम का नतीजा यह निकला कि डेढ़ साल के अभियान के बाद पिछले साल जून में दूरदर्शन के राष्ट्रीय चैनल में पहले हिंदी और फिर अंग्रेजी वाला लोगो दिखना शुरू हो गया. जबकि क्षेत्रीय भाषाओं के चैनल में पहले उस भाषा का लोगो आता है फिर अंग्रेजी का. प्रवीण बताते हैं कि अब वे इस बात की मांग कर रहे हैं कि त्रिभाषा फार्मूले के तहत क्षेत्रीय भाषा के चैनल में उस भाषा और अंग्रेजी के साथ हिंदी का लोगो भी दिखाया जाये. अगर दो भाषाओं में ही दिखाना है तो अंग्रेजी के बदले हिंदी का लोगो दिखायें. प्रवीण बताते हैं कि इसी तरह सूचना का अधिकार की वेबसाइट भी हिंदी में नहीं थी, सिर्फ अंग्रेजी में थी. उनलोगों के दबाव के बाद यह हिंदी में हुई. हालांकि अभी भी इस साइट के जरिये हिंदी में आवेदन नहीं किया जा सकता. हिंदी में आवेदन करने के लिए अभी पीडीएफ फाइल अपलोड करना पड़ता है.
मगर वे लगातार जोर डाल रहे हैं कि इस साइट पर हिंदी समेत दूसरी भारतीय भाषाओं में आवेदन की सुविधा उपलब्ध हो सके. उसी तरह टीवी चैनलों पर आने वाले धारावाहिक में भी क्रेडिट लाइन अंग्रेजी में होते रहे हैं. प्रवीण जैन ने इसके खिलाफ मुहिम में जीटीवी में कार्यरत अपने मित्र चंद्रकांत जोशी का सहयोग लिया और उसी का नतीजा है कि आज कई धारावाहिकों के नाम और क्रेडिटलाइन में हिंदी और देवनागरी नजर आने लगे हैं. अब वे लोग मिलकर हिंदी फिल्मों में हिंदी और देवनागरी के प्रयोग के लिए अभियान चला रहे हैं. वे कहते हैं कि जब हिंदी फिल्में हिंदी के नाम पर व्यापार कर रही हैं तो फिर वे फिल्मों के नाम में भी हिंदी या देवनागरी का इस्तेमाल क्यों नहीं करतीं. प्रवीण जैन यह अभियान अकेले नहीं चलाते. उनके कई साथी हो गये हैं. वे आवेदन का परफार्मा तैयार कर मेल और सोशल मीडिया के जरिये उसे सर्कुलेट कर देते हैं. फिर कई लोग एक साथ पत्र लिखते हैं या आरटीआइ का आवेदन करते हैं. इस तरह से संबंधित संस्था पर दबाव बनता है और वे माकूल फैसले लेने को प्रेरित या बाध्य होती है. इस तरह से एक अकेले व्यक्ति के जरिये शुरू हुआ भारतीय भाषाओं को सम्मान दिलाने का यह अनूठा अभियान आज लगातार नये-नये लक्ष्य हासिल कर रहा है.

Tuesday, July 22, 2014

धरनई गांव का अपना माइक्रो ग्रिड- यानी बिजली पर अपनी मरजी


इस रविवार की दोपहर जहानाबाद के धरनई गांव में बने स्टेज पर पंचायत प्रतिनिधि लोगों को एक ऐसी सेवा उपलब्ध करा रहे थे जो उनके लिए दो दशकों तक 24 घंटे रोजाना बिजली की गारंटी बनने वाली थी. उधर गांव में एक पक्के मकान में अपने कमरे के अंदर एक बुजुर्ग खाट पर लेटकर पंखे की हवा का आनंद ले रहे थे. गांव की औरतें बता रही थीं कि अब उनके घरों में बल्व जलते हैं और मोबाइल भी चार्ज होता है. किसान बता रहे थे कि अगले साल धान के मौसम में खेत में पानी की भी किल्लत नहीं होगी. बारिश हो न हो उनके खेतों को सोलर पंप से भरपूर पानी मिलेगा. ये घटनाएं धनरई के लोगों के लिए इसलिए बड़ी थीं क्योंकि उन्होंने बिजली के लिए तीन दशकों का इंतजार किया था. गांव में बिजली के पोल गड़े हैं मगर 30 साल से कभी बिजली आयी ही नहीं.
धनरई गांव में रविवार को हुए इस प्रयोग के जरिये देश में संभवत: पहली बार एक पंचायत ने माइक्रो ग्रिड बिठाकर खुद को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर घोषित कर दिया. दिलचस्प यह है कि गांव की रातों का अंधेरा दूर करने के लिए न किसी को एक इंच विस्थापित होना पड़ा, न पर्यावरण हो रहा है, न वे किसी कोल ब्लॉक की सप्लाई पर आश्रित हैं और न ही उन्हें निरंतर सप्लाई के लिए किसी एजेंसी का मुंह जोहना पड़ेगा. यहां के रातों का अंधेरा गांव के आकाश में जगमगाने वाले सूरज ने ही मिटाया है. वैकल्पिक स्रोतों के जरिये देश और दुनिया का ऊर्जा दारिद्र्य मिटाने का सपना देखने वालों के लिए यह बड़ी जीत है.
धनरुआ के सोलर माइक्रो ग्रिड के निर्माण में कुल 3 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं. अब इन तीन करोड़ रुपये के निवेश के बाद गांव तकरीबन दो दशक तक चौबीसो घंटे निर्बाध बिजली का इस्तेमाल कर सकता है. बिना टैरिफ में वृद्धि किये. इस योजना के क्रियान्वयन से जुड़ी संस्था ग्रीनपीस के प्रतिनिधि बताते हैं कि 3 करोड़ की राशि तो इतनी छोटी है कि इतना तो किसी गांव तक पोल, बिजली के तार और ट्रांसफार्मर लाने में खर्च हो जाते हैं. फिर उस गांव में बिजली उपलब्ध होगी या नहीं यह कहना मुश्किल होता है. जैसे धरनई गांव का सालों पहले विद्युतीकरण हो चुका था. मगर तीस साल से गांव में बिजली कभी आयी ही नहीं. इस लिहाज से यह मॉडल 24 घंटे निर्बाध बिजली की गारंटी देता है.
यह सर्वज्ञात तथ्य है कि हमारा देश आज भी ऊर्जा संकट का कोई स्थायी समाधान नहीं तलाश पाया है. बिजली के नाम पर पहले बड़े बांध और अब थर्मल पावर स्टेशन ही विकल्प माने जाते हैं. यह ठीक है कि इन साधनों से सस्ती और बड़े पैमाने पर बिजली पैदा की जा सकती है. मगर परियोजनाओं का दुष्प्रभाव जानने के बाद वह सस्ती बिजली काफी महंगी मालूम पड़ती है. इन परियोजनाओं की वजह से लाखों परिवार विस्थापित होते हैं और बड़े पैमाने पर प्रदूषण फैलता है. इसी वजह से दुनिया भर में धीरे-धीरे सहमति बन रही है कि हम अपनी ऊर्जा जरूरतों को इन विनाशकारी परियोजनाओं से गैरपारंपरिक ऊर्जा उपायों की तरफ शिफ्ट करें. जिसमें न विस्थापन का खतरा है, न प्रदूषण का. इसके अलावा ऊर्जा के साधनों पर स्थानीय लोगों का अपना स्वामित्व हो ताकि वह अपनी जरूरतों के हिसाब से ऊर्जा का ससमय उपयोग कर सकें. जबकि बड़े पावर ग्रिड के जरिये हमेशा गांव और हाशिये के लोगों की जरूरतों को महत्व नहीं दिया जाता. ऐसे में माइक्रो पावर ग्रिड की परिकल्पना ने आकार लिया है. मगर हर बार यह सवाल भी उठता है कि ये परियोजनाएं क्या वास्तव में धरती पर आकार ले सकती हैं. क्या इसे वास्तव में जमीन पर सुगमता पूर्वक संचालित किया जा सकता है.
ऐसे ही विचार पर लगातार काम करने वाली संस्था ग्रीनपीस ने पिछले दिनों बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को इस तरह के परियोजनाओं के बारे में प्रेजेंटेशन दिखाकर उनसे बिहार में इसे लागू करने की अपील की थी. संस्था के प्रतिनिधियों के मुताबिक तब नीतीश कुमार ने कहा था कि यह योजना आकर्षक तो लगती है मगर इसे क्या जमीन पर उतारा जा सकता है. तब संस्था के लोगों ने कहा था कि वे इसे एक गांव में लागू करके दिखायेंगे ताकि इस मॉडल को बिहार के बिजली विहीन दूसरे हजारों गांवों में लागू किया जा सके. उसके बाद ही 2012 में संस्था के लोगों ने जहानाबाद के इस धनरु आ गांव का चयन किया ताकि इस योजना को वहां लागू किया जा सके. दो साल की अनवरत कोशिशों के बाद आखिरकार धरनई में यह प्रयोग सफल हुआ है. अब सरकार को तय करना है कि क्या वह इस मॉडल को अपनाने जा रही है.