Friday, February 14, 2014

पंचायतनामा के साथ दो खुशगवार साल


पंचायतनामा को छपते हुए आज दो साल पूरे हो गये. आज के ही दिन 14 फरवरी, 2012 को पंचायतनामा का पहला अंक प्रकाशित हुआ था और इसका विमोचन हुआ था. पंचायतनामा की छोटी सी टीम के लिए यह एक अनूठा अनुभव है. खास तौर पर जब हम दो साल पुरानी अपनी दुनिया की तरफ झांकते हैं, जब यह पत्र शुरू हो रहा था. कई साथी और पत्रकारिता को गहरायी से जानने समझने वाले लोग तब हमें सलाह दे रहे थे कि मेन स्ट्रीम अखबार को छोड़ कर गांव की पत्रिका के लिए काम करना अपने कैरियर को भट्ठी में झोंक देने जैसा है. मगर पता नहीं हमें क्यों ऐसा लग रहा था कि यह हमें नुकसान के बदले लाभ ही देगा. संजय भैया (हमारे संपादक संजय मिश्र) के लिए तो जैसे यह जीवन मरण का प्रश्न था. उन्हें डेढ़ सौ फीसदी भरोसा था कि यह प्रयोग सफल होकर रहेगा. यह कहना गलत होगा कि हमारे मन में कोई भय नहीं था. हमें कभी-कभी लगता था कि छह महीने या साल भर के प्रयोग के बाद इस पर ताला लग जायेगा. जिस वक्त तमाम प्रकाशन समूह यूथ सेंट्रिक और अर्बन सेंट्रिक अखबार प्लान कर रहे थे. हमारे प्रकाशन समूह ने गांवों के लिए एक अखबार निकालने का फैसला किया था, वह भी 12 रुपये कीमत के साथ. इसे कौन खरीदेगा और कितना पसंद किया जायेगा यह हम नहीं जानते थे. हमें तो यह भी नहीं पता था कि इसमें कंटेंट क्या होगा? यह 12 रुपये में भी खरीदा गया और जब हम इसे पांच रुपये में बेचने लगे तब भी खरीदा गया. इसे आम ग्रामीण ने और पंचायत प्रतिनिधियों ने तो पसंद किया ही, सचिवालयों में बैठे अधिकारी भी इसके प्रशंसक बन गये.
और इसकी वजह रही कि हमने इसके लिए दो विषय चुने. पहला सरकारी योजनाओं की सरल भाषा में जानकारी, इनके लाभ लेने के तरीके और दूसरा इन योजनाओं के साथ या दूसरे तरीके से अपने या अपने इलाके में बड़ा बदलाव लाने वाले लोगों की कहानियां. सफलता की कहानियों और योजनाओं की जानकारी के इस मिक्ंिसग को लोगों ने न सिर्फ पसंद किया, बल्कि इस्तेमाल किया. हमसे फोन करके सलाह ली और खुद लाभान्वित हुए और अपने गांव को बदला. यही वजह है कि जब हमने काम शुरू किया था तो देश में पांच-सात सफल गांवों की कहानियां थीं. आज झारखंड में ही ऐसी दर्जनों कहानियां हैं. हमने बख्तावरपुरा की साफ-सफाई की कहानी छापी तो एक साल बाद पाया कि झारखंड में कई गांव खुले में शौच से मुक्त हो गये हैं. हमने गिरिडीह के एक गांव की कथा छापी कि कैसे वहां कोई मामला कोर्ट-कचहरी नहीं जाता तो आज ऐसे कई गांवों की कहानियां सामने आ रही हैं. हमने ललगढ़ी पंचायत की कहानी छापी कि कैसे लोगों ने खुद नाला खोदकर गांव को सिंचित करने का प्रबंध किया तो आज ऐसी कई कहानियां सामने आ रही हैं जब लोग खुद आगे आकर हालात बदलने की कोशिश कर रहे हैं.
ऐसा नहीं है कि यह सब पंचायतनामा की वजह से ही हुआ. मगर हमने माहौल बदलने में थोड़ी सी भूमिका जरूर निभायी. दो साल पहले झारखंड में पंचायत प्रतिनिधि अधिकार की मांग करने के अलावा कोई काम नहीं करते थे. आज यह सुखद बदलाव दिखता है कि बिना फंड के तेजी किस्पोट्टा जैसी मुखिया अपने पंचायत में बड़े बदलाव ला रही हैं. उन्होंने अपने क्षेत्र के स्कूलों में पढ़ी लिखी रसोइया भरती करने की प्रथा शुरू की ताकि वे मौका आने पर बच्चों को पढ़ा भी सके. कलावती देवी ने इंदिरा आवास में भ्रष्टाचार पर अपने तरीके से प्रतिबंध लगाया. अर्चना महतो ने पंचायतनामा में पेयजल एवं स्वच्छता विभाग से संबंधित जानकारियां देखकर विभाग से संपर्क किया और कई योजनाएं अपने क्षेत्र में लागू कराया. उन्होंने विभाग के अवर मुख्य सचिव से नेट पर संपर्क करने के लिए कंप्यूटर और इंटरनेट का इस्तेमाल करना सीखा, वो भी टय़ूटर रखकर. पानो सरदार जो मुखिया चुने जाने से पहले स्वास्थ्य कार्यकर्ता थीं. आज दोनों काम बखूबी निभा रही हैं.
इसके पीछे कहीं न कहीं इस बात का असर जरूर है कि अगर हम अच्छा काम करेंगे तो हमारी तारीफ होगी. और हमने इन दो सालों में अच्छा काम करने वालों की जमकर तारीफ की और खूब तालियां बजायी ताकि इन तालियों से खुश होकर लोग और सकारात्मक काम करें. इस प्रयास में झारखंड महिला पंचायत रिसोर्स सेंटर, पेयजल और स्वच्छता विभाग, झारखंड ग्रामीण आजीविका मिशन, यूनीसेफ और दूसरी कई संस्थाओं के साथ मिलकर हमने कई प्रयोग किये. मगर अखबारी दुनिया का एक अर्थशास्त्र होता है, लागत और लाभ का आकलन किया जाता है और यह भी देखा जाता है कि आपकी बढ़त कितनी है. हमने कभी उस दिशा में ठीक से सोचा नहीं.
हमारे पाठक सुदूर ग्रामीण इलाकों में थे, जहां हॉकर नहीं जाते थे. हर अंक के प्रकाशन के बाद हमारे दफ्तर में लोग फोन करते हैं कि हमें अंक नहीं मिल रहा है, कहां से खरीदें. फेसबुक पर भी ऐसी मांग की जाती है. कई लोग एक साथ सारा अंक खरीदना चाहते हैं. देश के कई इलाकों में लोग पंचायतनामा पढ़ना चाहते हैं. मगर हमारी छोटी सी टीम अब तक कोई ऐसा मैकेनिज्म विकसित नहीं कर पायी जिससे हम उन पाठकों तक पंचायतनामा को पहुंचा सकें. हर बार अंक छपने के बाद कई संस्थाएं फोन करती हैं कि हमें इसे बांटने के लिए सौ-पांच सौ या हजार प्रतियां चाहिये, मगर हमें कहना पड़ता है कि अब हमारे पास प्रतियां नहीं बचीं. कई संस्थाओं ने पहले से तय कर लिया है कि वे हमसे पांच सौ या हजार प्रतियां हर बार लेंगे. उन्हें हम उपलब्ध करा देते हैं. उनकी वजह से हमारी पहुंच उन इलाकों तक हो पाती हैं, जहां हमारे असली पाठक हैं. यानी सुदूर देहातों में, जहां तसवीर बदलने की सबसे अधिक जरूरत है. मगर हमारे अखबार उद्योग की विडंबना है कि हमारी पहुंच कस्बों से आगे नहीं है. गांव के लोग आज भी अखबार शहरों और कस्बों से ही खरीदते हैं. ऐसे में गांव का यह अखबार गांव तक कैसे पहुंचे यह आज भी एक बड़े सवाल की तरह हमारे सामने खड़ा है. फिर भी हम डटे हैं, उम्मीद कायम है.
जहां तक व्यक्तिगत लाभ का सवाल है, उसमें भी हम जबरदस्त फायदे में रहे. मैं और राहुल जी (हमारे दूसरे साथी जो शुरुआत से पंचायतनामा से जुड़े हैं) कई बार सोचते हैं कि पंचायतनामा नहीं होता तो हमारी पत्रकार के तौर पर इतनी ग्रूमिंग नहीं होती. आज हम ग्रामीण विकास के छोटे-मोटे एक्सपर्ट हो गये हैं. गांव के लोग तो हमसे राय लेते ही हैं, कई संस्थाएं अपने कार्यक्रमों में हमें विशेषज्ञ के तौर पर बुलाने लगी हैं. हमने दो साल में न सिर्फ गांवों के चक्कर लगाये बल्कि सचिवालयों की भी भरपूर खाक छानी और इंटरनेट के सहारे देश और दुनिया के अलग-अलग इलाकों में ग्रामीण विकास के मसले पर क्या हो रहा है यह जानने की कोशिश की ताकि हम अपने पाठकों को बेहतर जानकारी दे सकें. हमें अक्सर लगता है कि अगर खुदा न खास्ता हमें यह काम छोड़ना पड़ा तो हम एक ही काम करेंगे. अपने गांव जाकर वहां स्वरोजगार करेंगे और पंचायती राज व्यवस्था को सुदृढ़ करने में सहयोग करेंगे. यह आत्मविश्वास हमें यहां काम करते हुए आया. हम आज सरकारी योजनाओं की एनसाइक्लोपीडिया में बदलने लगे हैं. हमें पता है कि किसी ग्रामीण समस्या के लिए सरकारी इलाज क्या है. यहां काम करते हुए मुङो सीएसडीएस के मीडिया फेलोशिप के लिए चुना गया और झारखंड सरकार ने जब पिछले साल मीडिया फेलोशिप का वितरण किया तो इस छोटी सी पत्रिका जिसके संपादकीय विभाग में संपादक को छोड़ कर तीन लोग ही काम करते हैं के नाम से पांच लोगों को फैलोशिप दिया गया.
आज हम इन दो सालों के बारे में सोचते हैं तो खुशी से भर उठते हैं. कम से कम मैं अपने बारे में तो कह ही सकता हूं कि मैंने अपने पत्रकारिता के कैरियर में इससे बेहतर काम नहीं किया है. इस मौके पर 17 फरवरी को हम प्रभात खबर सभागार में एक छोटा सा कार्यक्रम कर रहे हैं, जिसमें इन दो सालों के काम काज पर कुछ सरकारी अधिकारियों, कुछ संस्थाओं के प्रमुख और पंचायत प्रतिनिधियों के साथ बैठकर बातचीत करेंगे. आगे क्या हो सकता है यह विचार भी करेंगे. अगर आप 17 फरवरी को रांची में हैं और 3 से 6 बजे के बीच फुरसत में हैं तो आपका स्वागत है.

Thursday, February 06, 2014

उनका क्या, जिन तक आज भी नहीं पहुंचा है आरक्षण


सोशल मीडिया के जमाने का चलन है कि बड़े लोग मुद्दों को उछालते हैं और छोटे लोग उस पर बहस करते हैं. उसी परंपरा का निर्वाह करते हुए वरिष्ठ कांग्रेस नेता जनार्दन द्विवेदी ने जो आरक्षण पर बहस छेड़ी है उस पर हम उस पर बहस करने के लिए तैयार हो गये हैं. होना भी चाहिये, हो सकता है खुद जनार्दन द्विवेदी के लिए यह मामला उतना गंभीर नहीं रहा होगा, मगर गांव गिरांव के हम जैसे लोगों के लिए यह मसला साधारण नहीं है. माननीय महोदय के द्वारा उपलब्ध कराये गये इस मौके का हम बहस करने के लिए इस्तेमाल जरूर करेंगे और कोशिश करेंगे कि इस बहस का कोई सार्थक नतीजा सामने आये.
अभी कुछ ही दिन पहले मैं अपने गांव धमदाहा गया था एक पारिवारिक उत्सव में भागीदारी करने के लिए. उस दौरान बचपन के एक सहपाठी से मुलाकात हुई. सहपाठी पिछड़ी जाति से संबंधित था और ऑटो चलाया करता था. हम उसी की ऑटो से गाड़ी पकड़ने पूर्णिया जा रहे थे. दोस्त से पारिवारिक मसले पर बातें होने लगी. मुङो याद आया कि मेरा वह मित्र पढ़ने लिखने में ठीक-ठाक था, मुझे आश्चर्य हुआ कि पढ़ाई-लिखाई में औसत से बेहतर होने के बावजूद उसे आरक्षण का लाभ क्यों नहीं मिला. उसने बताया कि उसकी आर्थिक क्षमता पटना में रहकर कोचिंग करने की नहीं थी, लिहाजा उसे आरक्षण वर्ग में रहने के बावजूद आरक्षण का लाभ नहीं मिल पाया. वह काफी बिफरा हुआ था. उसका कहना था कि आरक्षण का मसला सिर्फ अमीर और सामथ्र्यवान पिछड़ों और दलितों का है. वह कह रहा था - तुम देखो अपने गांव में किसको-किसको आरक्षण का लाभ मिला है? ये वही लोग हैं जिनके पास पहले से काफी जमीन थी. जिनके परिवार में नौकरी करने वाले लोग पहले से थे. यादवों और कुरमियों को छोड़कर किसी और जाति को आरक्षण का लाभ मिला है क्या, देख कर बताओ. वह कह रहा था कि यादवों में भी कई उपजातियां हैं, जो गरीब हैं, दूध बेचती हैं और कुछ और छोटा-मोटा धंधा करती हैं, उनके बच्चे आज क्या कर रहे हैं? कोई मेरी तरह टैंपो चला रहा है, तो कोई किसी छोटे-मोटे डॉक्टर के क्लीनिक में कंपाउंडर है. कई लोग तो हलवाही ही कर रहे हैं. उसने कहा कि देखो अपने यहां धानुख जाति भी ओबीसी है. उसके कितने लोग सरकारी नौकरी में हैं. एक भी नहीं हैं. आरक्षण ने हम लोगों को क्या दिया? सिर्फ बदनामी कि हमलोग आरक्षण श्रेणी में हैं.
दोस्त की बातों ने मेरी आंखें खोल दीं. अगड़ी जाति समूह का होने के बावजूद मंडल आंदोलन के वक्त मैंने पिछड़ों के आरक्षण का समर्थन किया था और यह समर्थन अभी भी जारी है. मगर उक्त जिन पिछड़ों के हालात बदलने का हमने सपना देखा था, वे लोग तो आज भी वहीं हैं. उसी मोड़ पर. पिछड़ों में उन्हीं लोगों को आरक्षण का लाभ मिला है जिनकी सामाजिक आर्थिक स्थिति कमोबेस हमलोगों जैसी ही है. पटना में जब हम पढ़ाई करते थे तो वे भी हमारी तरह ही पढ़ाई करते थे. एक जैसे कमरों में रहते थे, एक जैसे कोचिंग में पढ़ते थे और उनके घर से भी उतना ही पैसा आता था जितना हमारे घर से. बांकी, जो लोग हमारे खेतों में बटेदारी करते थे और हैं, जो नाई, बढ़ई और कुम्हार का काम करते थे. जो हल चलाते थे और जो मछली पकड़ते थे. उनके बच्चे क्या कर रहे हैं? वे आज भी अपने मां-बाप के पेशे को ही आगे बढ़ा रहे हैं, अगर बदले भी तो सिर्फ इतना कि कुछ लोगों ने चाय-पान की दुकान खोल ली, तो कोई रिक्शा-टैंपो चलाने लगा. अधिकतर लोग दिल्ली-पंजाब जाने लगे हैं. आखिर इन लोगों को आरक्षण का लाभ क्यों नहीं मिला. जबकि हम देखे हैं कि आरक्षित श्रेणी वाले कई परिवारों में एक ही घर में दस-दस लोग सरकारी नौकरी में हैं. हमनें क्या उन्हीं के लिए आरक्षण के जरिये हालात बदलने का सपना देखा था?
इन हालातों को देखकर मैं जनार्दन द्विवेदी को सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि अभी आरक्षण को आर्थिक आधार पर करने का वक्त नहीं आया है. मगर आरक्षित समूह की आंतरिक संरचना को समझने और उसकी विसंगतियों को दूर करने का वक्त जरूर है. कमोबेस यही हालात एससी-एसटी वर्ग का है. कुछ जातियां, कुछ परिवार इसका लाभ लेकर सामान्य श्रेणी के लोगों को टक्कर देने लायक हो गये हैं, मगर बड़ी आबादी आज भी हाशिये पर है. जाति जनगणना के सामने आने के बाद ऐसे कई तथ्य सामने आयेंगे कि आरक्षण का लाभ कहां तक पहुंचा और किस तरह के लोग आज भी डार्क एरिया में हैं? मगर यह समझना सबसे जरूरी है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ, क्यों विसंगतियों को दूर करने के लिए बनी इस नीति ने समाज में विसंगतियों को घटाने के बदले बढ़ा दिया है. क्योंकि पिछड़ों में सिर्फ कुरमी-यादव और दलितों में सिर्फ पासवान जाति के लोगों को इस आरक्षण नीति का लाभ मिला, शेष दसियों जाति हाशिये पर ही छूट गयीं. बेहतर आर्थिक स्थिति की वजह से कैसे पूरी आरक्षण व्यवस्था को कुछ जातियों ने हाई-जैक कर लिया.
इसकी सबसे बड़ी वजह है कि हमारे देश की राजनीति ने आरक्षण को बहसों से परे बना दिया है. जैसे ही आरक्षण का मसला उठता है कि कई लोगों की भावनाएं आहत होने लगती हैं. बहस बहस नहीं रह जाती, वह सिर-फुटौव्वल में बदल जाती है. हम एक सुर में कहते हैं कि समाज के एक बड़े तबके के साथ हजारो सालों से अन्याय हुआ है, उसका प्रतिकार आरक्षण के जरिये ही हो सकता है, इसलिए इस पर कोई बहस नहीं की जा सकती. मगर क्या इसकी सफलता-असफलता पर विचार भी नहीं किया जा सकता. सरकार अपनी तमाम योजनाओं के प्रभाव का आकलन किसी बाहरी एजेंसी से करवाती रही है. अगर उसने हर दस साल में ही आरक्षण की सफलता-असफलता का आकलन कराया होता तो ये घाव पहले ही नजर आ जाते और इसका समाधान निकाला जा सकता था. मगर आरक्षण को राजनीतिक तौर पर ऐसा नंगा तार मान लिया गया है, जिसे छूना मौत को दावत देना है.
इसका नतीजा यही निकलता है कि इस नीति का सारा लाभ कुछ समृद्ध जातियों ने हासिल कर लिया है और पिछड़े और पिछड़ गये हैं. वे हताश हैं, अपनी स्थितियों से समझौता करने के लिए मजबूर हैं. सरकार सोचती है कि उसने आरक्षण की सुविधा देकर उनके लिए सारा इंतजाम कर दिया है.
इस लिहाज से देखें तो सबसे बड़ी जरूरत यह है कि आरक्षण की सफलता-असफलता का आकलन कराया जाये. यह पता लगाने की कोशिश की जाये कि किन जातियों को आरक्षण से बहुत कम या नहीं के बराबर लाभ मिला. इसके बाद समीक्षा करके ऐसी नीति बनायी जाये कि इस व्यवस्था का लाभ हर वंचित समुदाय के लोगों को मिले और आरक्षण की व्यवस्था का जो सामाजिक न्याय का सपना था वह ठीक से पूरा हो. अलग-अलग जातियों के लिए जगह निर्धारित करके भी यह विवाद खत्म किया जा सकता है. इसके अलावा यह भी सोचा जा सकता है कि किन जातियों-उपजातियों ने इस व्यवस्था का समुचित लाभ ले लिया है और उन्हें इस व्यवस्था से बाहर जाने की जरूरत है. कई जातियां जो तमाम पिछड़ा समुदाय की पैरोकारी करती हैं, वे वालिंटियरली खुद को इस व्यवस्था से बाहर कर उदाहरण पेश कर सकती हैं, ताकि अत्यंत पिछड़ी जातियों को अधिक लाभ मिल सके. कई जातियों के लिए तय किया जा सकता है कि अगर वे बीपीएल श्रेणी में हों तभी उन्हें आरक्षण का लाभ मिले.
जहां तक गरीब सवर्णों को आरक्षण देने की बात है, मैं आज भी इसके खिलाफ हूं. आरक्षण गरीबी उन्मूलन की व्यवस्था नहीं है, यह सामाजिक न्याय है. सदियों से जिन जातियों को पिछड़ा रखने का अन्याय किया गया, उन्हें न्याय देना है. सवर्णो ने हमेशा प्रिविलेज का लाभ उठाया है, वे अगर गरीब हैं तो अपनी कमजोरी की वजह से. उन्हें किसी ने गरीब होने के लिए मजबूर नहीं किया. उनके लिए दूसरी कई योजनाएं हैं, उन्हें उसका लाभ लेना चाहिये. गरीब सवर्णो को आरक्षण देने की मांग एक पॉलिटिकल स्टंट से अधिक कुछ भी नहीं.
नोट- इस पोस्ट में दिखायी गयी तसवीरें खगड़िया के गुलरिया गांव की है. इस गांव में आज भी एक व्यक्ति सरकारी नौकरी में नहीं जा सका है, जबकि पूरा गांव महादलितों का है. इन्हें आरक्षण का लाभ क्यों न मिल पाता इसके पड़ताल की भी जरूरत है.

Wednesday, February 05, 2014

आनंद नगर में कुछ घंटे आनंद के


युवा फिल्म में ट्राम के इस सीन ने मेरा ट्राम के प्रति सम्मोहन बढ़ाया था. उस सीन में विवेक ओबेराय के चेहरे पर गजब की खुशी थी, उसे भूला नहीं जा सकता. सच पूछिये तो एक जागते रहो फिल्म का वह गाना.. जिंदगी खाब है.. जो शायद पार्क स्ट्रीट की सड़कों पर रात के तीसरे पहर में फिल्माया गया था कोलकाता की छवि को मेरे मन में गढ़ा और दूसरा युवा फिल्म के गाने.. ए खुदा हाफिज.. शुक्रिया-मेहरबानी वाले गाने ने. वैसे अमर प्रेम में भी कोलकाता है मगर वहां कोलकाता की कोई रोमेंटिक छवि नहीं बनती. मगर जिंदगी खाब है गाने में जिस तरह की मस्ती उस शराबी कलाकार के चेहरे पर है तकरीबन वही मस्ती युवा के गाने में करीना और विवेक के चेहरे पर नजर आती है. और पहले गाने में सोया हुआ पार्क स्ट्रीट है तो दूसरे गाने में चहकती ट्राम, ढेर सारे बच्चे हालांकि यह गाने सागर तट से शुरू होता है. मगर आकर्षण का चरम ट्राम की वे अनवरत यात्रएं ही हैं.
इस आलेख को जानकी पुल पर पढ़ें http://www.jankipul.com/2014/02/blog-post_3.html