Saturday, May 31, 2014

कहानियां स्लमडॉग(?) टापर्स की


इन दिनों धड़ा-धड़ दसवीं और बारहवीं के रिजल्ट आ रहे हैं. रोज अखबारों में टॉपरों से मुलाकात हो रही है. एक ओर सीबीएसई बोर्ड के टॉपर हैं तो दूसरी तरफ राज्यों के बोर्ड के. दोनों जगह के टॉपरों की अलग-अलग कहानियां हैं. एक ओर जहां सीबीएसई बोर्ड के टॉपर बता रहे हैं कि कैसे उन्होंने सोशल मीडिया से दूरी रखकर सफलता पायी, उनके माता-पिता ने कैसे उन्हें किसी भी तरह की फिक्र और परेशानी से बचा कर रखा वहीं दूसरी तरफ राज्यों की बोर्ड के टॉपर की कहानियां हैं, किसी के पिता गैस वेंडर हैं तो कोई खुद पढ़ाई के साथ मजदूरी या कुछ और काम कर रहा है. पिछले साल झारखंड बोर्ड की एक टॉपर तो ड्रॉप आउट थी, पिता की बीमारी की वजह से उसे दो साल पढ़ाई छोड़ना पड़ा, फिर उसे कस्तूरबा विद्यालय में एडमिशन मिला. उसी विद्यालय में रखकर उसने पढाई की और पूरे कोल्हान जोन की टॉपर बनी. आज भी झारखंड की एक बच्ची की कहानी मीडिया में है जो ईंट ढोने का काम करती रही है. इसी तरह बिहार इंटरमीडियेट कॉउंसिल के कला संकाय की टॉपर पूर्णिया के एक गांव की बच्ची हुमा खातून है जो रोज सुबह खाना पकाकर स्कूल जाती थी, साइकिल से. स्कूल घर से काफी दूर है. दूसरा स्थान पाने वाली प्रियंका यादव शादीशुदा हैं. मुङो इन टॉपरों की कहानियां ज्यादा आकर्षित करती हैं.
अब यह लगभग साफ है कि इस देश में एजुकेशन बोर्डो को लेकर भी वर्ग विभेद पैदा हो गया है. राज्य के बोर्डो से परीक्षा देने वाले छात्र अमूमन गरीब और निम्न मध्यम वर्गीय ही होता है. मध्यम वर्गीय छात्र हमेशा सीबीएसई या आईसीएसई बोर्ड का ही छात्र होता है. दोनों वर्गों में पढ़ाई का माहौल और परीक्षाओं में उनकी सफलता की कहानियां अलग-अलग होती हैं. जहां सीबीएसई और आईसीएसई बोर्ड के बच्चे सफल इस वजह से होते हैं कि उनकी तैयारी सटीक होती है और परिवार के लोग उनके लिए पढ़ाई का बेहतरीन माहौल तैयार करते हैं, वहीं राज्य के बोर्ड में सफलता हासिल करने वाले बच्चे पढ़ाई के साथ-साथ जीवन की दूसरी परेशानियों से जूझते हुए आगे बढ़ते हैं. कभी उनके पास किताबें नहीं होती, कभी रात को लालटेन की रोशनी में पढ़ना पड़ता है, कभी लंबी दूरी तय कर स्कूल जाना पड़ता है. इन बच्चों को टय़ूशन अमूमन उपलब्ध नहीं होता. टेक्स्टबुकों के सहारे ही पढ़ाई करते हैं. फिर भी अव्वल आते हैं.
इनका अव्वल आना भी सीबीएसई के बच्चों से कमतर नहीं है. इनके परसेंटेज भी अच्छे होते हैं और राज्यों के बोर्ड की मार्किग प्रणाली व सीबीएसई की मार्किग प्रणाली में कुछ तो फर्क होता ही है. हमारे पास इस बात का कोई अध्ययन नहीं है कि जीवन में आगे बढ़ने वालों में सीबीएसई के टॉपर अधिक होते हैं या राज्यों के बोर्ड के. अगर ये आंकड़े होते तो हमें समझ में आता कि सरकारी स्कूलों और निजी स्कूलों की पढ़ाई का अमूमन गुणात्मक फर्क क्या है. महज दो दशक पहले तक गांवों के ये बच्चे ही हमेशा अव्वल हुआ करते थे, वही आगे बढ़कर सिविल सर्विसेज की परीक्षा में सफल होते.
बात को इस दिशा में ले जाने का मकसद इन दिनों हमारी सोच में स्कूली व्यवस्था को लेकर आये फरक को रेखांकित करना है. आज की तारीख में हममें से 99 फीसदी लोग व्यावहारिक तौर पर इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि निजी स्कूलों में पढ़ाई की व्यवस्था बेहतर है. सरकारी स्कूलों का जिक्र आते ही हमारे घरों में नाक-भौं सिकोड़ा जाने लगता है. यह सच है कि सरकारी स्कूलों में अव्यवस्था का जो आलम है उसे देखकर कोई भी अपने बच्चों को उस स्कूल में डालना नहीं चाहेगा. मगर उन स्कूलों के बच्चे भी आखिरकार दसवीं और बारहवीं की परीक्षा में 80 से 90 फीसदी अंक लाते हैं. तमाम तरह की मुसीबतों को ङोलते हुए. ये वो बच्चे हैं जो छट जा रहे हैं और इनके पास सरकारी स्कूलों में पढ़ने के सिवा कोई और विकल्प नहीं. फिर भी यह सफलता वे हासिल कर रहे हैं. यह चमत्कार कैसे हो रहा है.
सरकारी स्कूलों और निजी स्कूलों को लेकर जो एक मिथ समाज में मौजूद है वह कितना सच है इसका आकलन होना चाहिये. खर्च सरकारी स्कूलों में भी कम नहीं होता, कई दफा प्राइवेट स्कूलों से भी बेहतर. वह भी हमारा ही पैसा है. मगर हम कोशिश नहीं करते कि इन सरकारी स्कूलों में भी बेहतर पढ़ाई हो, जिससे हमें अपने बच्चों को मोटी फीस देकर प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाने के लिए विवश न होना पड़े.

Thursday, May 29, 2014

क्या सस्ते दिन भी आयेंगे..?


इस चुनाव को प्रभावित करने वाले मुद्दों में से महंगाई एक बड़ा मसला है. पिछले तीन-चार सालों से लगातार आम जनता किसी न किसी वजह से महंगाई की मार ङोलती रही. कभी चीनी, तो कभी प्याज, कभी आलू तो कभी पेट्रोल-डीजल. सब्सिडी वाले गैस सिलिंडर का कोटा तय करने के फैसले ने भी पहले से परेशान लोगो को और त्रस्त कर दिया. दूध की कीमतें लगातार बढ़कर लगभग दोगुनी हो गयी. राशन की दुकान का बजट भी दोगुना पहुंच ही गया और इस बढ़ती महंगाई ने अंतत: दूसरी सेवाओं पर भी असर डाला और अंत में हाल ऐसे हो गये कि कुछ भी सस्ता नहीं बचा, सिवा मोबाइल के टैरिफ प्लान के. अब जबकि मोदी जी के वादे के मुताबिक अच्छे दिन आ रहे हैं, क्या इन अच्छे दिनों के साथ-साथ सस्ते दिन भी आयेंगे. या जनता को थक हार कर महंगाई के साथ जीने की आदत डाल लेना पड़ेगा.
आम तौर पर देश में मौजूद महंगाई के तीन प्रमुख कारण माने जाते हैं. पहला बिचौलिया तंत्र, जो किसानों से कम कीमत में उत्पाद खरीदा है और थोड़े से प्रसंस्करण के बाद उसी उत्पाद को दोगुनी-तीन गुनी कीमत में बेचता है. दूसरा, माल भाड़ा. प्याज, चीनी, चावल, गेंहू और दूसरे पदार्थो को देश के एक कोने से दूसरे कोने तक ले जाने की कोशिश में भाड़े के एवज में जितना पैसा खर्च होता है वह उस उत्पाद की लागत को उतना ही बढ़ा देता है. तीसरा, वायदा कारोबार, जिसमें मुनाफावसूली के लिए अक्सर जरूरी उपभोक्ता सामग्रियों की कीमत रातोरात बढ़ जाती है. सरकार चाहे तो योजनाबद्ध तरीके से प्रयास कर इन तीनों कारणों का समाधान तलाश सकती है और इन उपायों से महंगाई पर प्रभावी तरीके से नियंत्रण कर सकती है.
जहां तक बिचौलिया तंत्र का सवाल है, इसे इस उदाहरण से समझा जा सकता है कि सरकार धान का मिनिमम सपोर्ट प्राइस 13 रुपये प्रति किलो तय करती है. मगर आज की तारीख में किसी भी किस्म का चावल 25 रुपये प्रति किलो से कम में बाजार में उपलब्ध नहीं है. उसी तरह गेहूं का एमएसपी 14 रुपये किलो है, मगर बाजार में आटा सामान्यत: 25 रुपये किलो की दर से बिक रहा है. दोनों उत्पादों में थोड़े से प्रसंस्करण के बाद कीमत 11-12 रुपये प्रति किलो बढ़ जा रही है. इसकी वजह सिर्फ इतनी है कि जो सहकारी संस्थाएं किसानों से धान और गेहूं खरीदती है वह फिर इन्हें प्रसंस्करण के लिए व्यापारियों को बेच देती हैं. और व्यापारी प्रसंस्करण के बाद इनसे मनमाना मुनाफा कमाते हैं. यही सरकारी संस्थाएं राशन दुकान में सप्लाई के लिए महंगी कीमत पर इन व्यापारियों से चावल खरीदती है और नुकसान सहती है. अगर सरकार किसानों से उनकी पैदावार खरीदने वाली सहकारी संस्थाओं को आर्थिक मदद कर उनके पास मिनी राइस मिल और आटा की चक्की लगवा दे तो ये संस्थाएं कम मुनाफे में चावल और आटा तैयार कर सकती हैं. इन्हें न्यूनतम परिवहन लागत से स्थानीय राशन की दुकानों में उपलब्ध भी कराया जा सकता है और स्थानीय व्यापारियों को भी बेचा जा सकता है. खुद कोऑपरेटिव वाले अपने गांव के लोगों को 20 रुपये किलो चावल और आटा बेचकर मुनाफा कमा सकते हैं. इस तरह एक छोटे से कदम से महंगाई की दर नीचे आ सकती है. अभी पंजाब और एमपी के गेहूं का तैयार आटा बिहार और यूपी में बिकता है. इससे लागत का बढ़ना स्वभाविक है.
किसी भी उत्पाद की लागत रोकने के लिए जरूरी है कि उसे स्थानीय स्तर पर ही खपाया जाये. जैसे ही वह देश के एक कोने से दूसरे कोने की यात्रा करेगा उसकी लागत बढ़ जायेगी और मुनाफाखोरी भी. इस लिहाज से चीनी और प्याज ऐसी दो चीजें हैं जो महाराष्ट्र से देश के कोने-कोने तक जाती हैं. प्याज की पैदावार देश के अधिकांश इलाकों में हो सकती है, मगर किसान इसे उगाते नहीं हैं. इसके अलावा सरकार इस बात की भी कोई योजना नहीं बनाती कि किसी सीजन में किसानों को कितने खेत में क्या-क्या फसल उगाना चाहिये. अगर सरकार इसकी बेहतर योजना बनाये तो कई राज्यों में प्याज, दहलन और तिलहन की पैदावार हो सकती है और खपत के मुताबिक फसल उपजाया जा सकता है. यह महंगाई के लिए बड़ा चेक होगा.
महंगाई की दूसरी बड़ी वजह सरकार की पेट्रोलियम पॉलिसी है. तमाम तरह के नियंत्रण के बावजूद उपभोक्ता वस्तुओं का एक जगह से दूसरी जगह जाना लाजिमी है और इसमें डीजल से चलने वाले ट्रकों की बड़ी भूमिका है. मगर सरकार डीजल की कीमतों को नियंत्रण में रखने के लिए कोई कोशिश नहीं करती. ऐसी खबर है कि डीजल की कीमतों को डिरेगुलाइज करने के लिए भी सरकार पर दबाव दिया जाने लगा है. अगर ऐसा हुआ तो महंगाई नियंत्रण की सारी कोशिशें बेकार चली जायेंगी. इसलिए जरूरी है कि सब्सिडी देकर भी डीजल की कीमतें नियंत्रित रखी जायें और तेल खनन से जुड़ी कंपनियों को बेवजह मुनाफावसूली करने से रोका जाये. रिलांयस की ओर से नेचुरल गैस की कीमतें बढ़ाने की मांग पर नयी सरकार क्या फैसले लेती है यह भी देखने का विषय होगा.
ऐसा नहीं है कि सरकार के पास डीजल पर सब्सिडी देने के लिए पैसा नहीं है. मगर पिछली सरकार ने उस पैसे को अपने फ्लैगशिप स्कीमों पर बेवजह खर्च किया और उसका नतीजा भ्रष्टाचार के सिवा कुछ और नहीं निकला. अब खाद्य सुरक्षा कानून पर काफी राशि खर्च की जानी है. मगर यह सवाल लाजिमी है कि क्या देश के 70 फीसदी लोगों को हर महीने सस्ते दर में अनाज उपलब्ध कराना जरूरी है. इसका ठीक से आकलन होना चाहिये. सस्ते अनाज की योजना सिर्फ उनके लिए होनी चाहिये जो अत्यंत गरीब हों और उनके पास रोजी-रोटी के लाले हों. यह नहीं कि जिनकी मासिक आय 25 हजार रुपये हो और वह भी 2 रुपये किलो का चावल खरीद रहा हो. जहां तक पेट्रोल की कीमतों के बढ़ने का सवाल है उससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता. लोग कार और मोटरसाइकिल पर घूमें इससे बेहतर है शहरों में सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था चाक चौबंद की जाये. वायदा कारोबार पर तो तत्काल प्रभाव से रोक लगा देनी चाहिये. इसका देश के विकास से कोई लेना-देना नहीं है. यह सिर्फ महंगाई बढ़ाता है.
मुद्रास्फीति का हमारा मापक भी बहुत वैज्ञानिक नहीं है. इसमें सिर्फ उपभोक्ता वस्तुओं की महंगाई की गणना की जाती है, सेवाओं की नहीं. अगर बस या रेल का किराया बढ़ता है, स्कूल की फीस बढ़ती है, बिजली की दरें बढ़ती हैं इन सबका असर भी सीधे हमारी जेब पर पड़ता है. सरकार इन मामलों में भी कई दफा उदासीन रवैया अपनाती है. बिजली के प्राइवेटाइजेशन की वजह से बिल में बढ़ोतरी पर सरकार लगाम नहीं लगाती. उसी तरह स्कूलों की फीस, डॉक्टरों की फीस, स्वास्थ्य जांच की फीस और बस का किराया भी व्यावहारिक रूप से सरकार के नियंत्रण से बाहर है. आवश्यक सेवाओं का शुल्क सरकारी इजाजत के बिना नहीं बढ़े यह सुनिश्चित करना जरूरी है. इस संबंध में एक मैकेनिज्म बनाना आवश्यक है.
इसके अलावा सरकारी शिक्षण संस्थाओं और अस्पतालों की हालत बेहतर न होने से भी हमारा खर्च बढ़ता है. इस वजह से अधिकतर लोगों को निजी स्कूलों-कॉलेजों और अस्पतालों की शरण में जाना पड़ता है. अगर सरकार इन दोनों क्षेत्रों में गुणवत्ता लाने में सफल रहती है तो जाहिर है लोगों का बजट खुद-ब-खुद संतुलित हो जायेगा. और लोगों के सस्ते दिन अपने आप आ जायेंगे.

Wednesday, May 28, 2014

बहाने स्मृति ईरानी याद बाबू लंगट सिंह की


उत्तर बिहार के मुजफ्फरपुर में एक कॉलेज है लंगट सिंह महाविद्यालय. इस कॉलेज की स्थापना 1899 में लंगट सिंह ने की थी. तकरीबन निरक्षर लंगट सिंह रेलवे स्टेशन पर कुली का काम करते थे. कहते हैं एक अंग्रेज अधिकारी की जान बचाने के चक्कर में उनके पांव कट गये थे, इसी वजह से उन्हें लोग लंगट सिंह कह कर पुकारते थे. बाद में उस अधिकारी की कृपा से उन्हें रेलवे के ठेके मिलने लगे और उन्होंने जब ठीक-ठाक पैसा कमा लिया तो पहला काम यह किया कि अपनी तमाम जमा पूंजी से अपने इलाके में ऑक्सफोर्ड की तर्ज पर इस भव्य कॉलेज का निर्माण करवाया. उस वक्त आसपास के कई जिलों में कोई कॉलेज नहीं था. उस अनपढ़ व्यक्ति ने कॉलेज क्यों खुलवाया, कहते हैं कि उसे मालूम पड़ गया था कि आने वाले जमाने में पढे-लिखे ही आगे बढ़ पायेंगे. उनके इलाके के नौजवान पिछड़ न जायें, उनकी फिक्र इसी बात को लेकर थी. बाद में इसी कॉलेज ने हमें हमारा पहला राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद दिया, जिनकी मेधा के चर्चे वैसे ही मशहूर हैं. उस दौरान मिथिला के महाराजा ने बीएचयू के निर्माण के लिए लाखों रुपये दान दिये थे, मगर पता नहीं उनके दिमाग में यह क्यों नहीं आया कि उत्तरी बिहार में भी एक बढ़िया कॉलेज की जरूरत है. जबकि महाराज शिक्षित लोगों के बड़े कद्रदान माने जाते थे. यह प्रसंग हमें बताता है कि शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए हमेशा बहुत अधिक पढ़ा लिखा व्यक्ति ही कारगर नहीं होता है, कई दफा अनपढ़ या कम पढ़े लिखे लोग शिक्षा की अहमियत को ज्यादा समझते हैं. यह कहानी खास तौर पर स्मृति ईरानी को लेकर चल रही बहस के दौरान याद आ रही है.
झारखंड में खलारी पंचायत की मुखिया हैं तेजी किस्पोट्टा. वे भी बहुत पढ़ी-लिखी नहीं हैं, बहुत साधारण महिला हैं. मगर अपने पंचायत में शिक्षा के विकास के लिए उन्होंने असाधारण सूझ-बूझ का परिचय दिया है. उन्होंने अपने पंचायत के पांचों स्कूल में मिड-डे मील बनाने वाले कुक की भरती करते वक्त ध्यान रखा कि वे कम से कम इंटरमीडियेट पास हों. ताकि अगर स्कूल में शिक्षक न हों तो वे खाना पकाने के साथ-साथ बच्चों को पढ़ा भी सकें. इसके बहुत शानदार नतीजे सामने आये.
अनपढ़ या कम पढ़ी लिखी महिलाएं शिक्षा को महत्व को पुरुषों के मुकाबले बेहतर समझती हैं. आपने अपने आसपास कई ऐसी औरतों को देखा होगा जो बरतन मांजकर, सिलाई करके और दूसरे काम करके अपने बच्चों को पढ़ाती हैं, क्योंकि उन्हें मालूम है कि अगर हालात बदलने हैं तो उसका सबसे बेहतर जरिया शिक्षा ही है. पिछले साल झारखंड के बोर्ड में एक दर्जी के बेटे ने टॉप किया था, इस बार बिहार इंटरमीडियेट की परीक्षा में एक गैस वेंडर के बेटे ने बाजी मारी है. दोनों बच्चों के अभिभावक बहुत कम पढ़े-लिखे थे, मगर वे समझते थे कि अगर उनका बच्च पढ़ लिख जायेगा तो उसे सिलाई के काम या गैस की ढुलाई जैसा काम नहीं करना पड़ेगा.
इन दिनों हर जगह स्मृति ईरानी की डिग्री और उसे मिली जिम्मेदारी पर तीखी बहस चल रही है. इस बहस में मोदी की सबसे बड़ी प्रशंसक मधु किश्वर जैसी महिलाएं भी शामिल हैं. पता नहीं मोदी ने स्मृति ईरानी में क्या खूबियां देखीं कि उन्हें मानव संसाधन विकास मंत्रलय जैसा महत्वपूर्ण विभाग थमा दिया. अगर सिर्फ पद देखकर खुश करने की बात होती तो वे उन्हें सूचना प्रसारण मंत्रलय भी दे सकते थे और इस पर किसी को आपत्ति भी नहीं होती. मगर नहीं, उन्होंने स्मृति को शिक्षा के प्रसार का दायित्व दिया है, यह जानते हुए कि स्मृति महज इंटर पास है. यह अनजाने में हुई कोई गलती हो ऐसा नहीं लगता, क्योंकि मंत्रलय की सूची फाइनल करने के दौरान काफी विचार-विमर्श हुआ है. इसलिए लगता यही है कि मोदी और मंत्रलय फाइनल करने वाले लोगों ने जरूर स्मृति में कोई ऐसी संभावना देखी है कि उन्हें इतनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी है.
स्मृति के बारे में जानकारी जुटाते हुए पता चलता है कि उनकी पढ़ाई लिखाई ठीक से नहीं हो पायी. संभवत: उनके परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति की वजह से. दसवीं की पढ़ाई करते वक्त स्मृति खुद नौकरी भी करने लगी थी ताकि फीस और दूसरे खर्चो का जुगाड़ कर सके. बहरहाल बारहवीं के बाद उनके कैरियर की दिशा बदल गयी और वे सौंदर्य प्रतियोगिताओं के जरिये एक्टिंग के फील्ड में किस्मत आजमाने लगीं. हालांकि जानकारी यह भी मिलती है कि राजनीति में आने के बाद स्मृति ने एक संस्था की शुरुआत की है, जो छोटे बच्चों की पढ़ाई लिखाई के लिए काम करती है. अमेठी में स्मृति ईरानी के लिए प्रचार करते हुए भी मोदी ने कहा था कि उन्होंने स्मृति को गुजरात में शिक्षा के क्षेत्र में कोई बड़ी जिम्मेदारी दी थी, जिसे स्मृति ने बेहरतीन तरीके से अंजाम दिया.
2004 में स्मृति ने मोदी को हटाने के लिए आमरण अनशन किया था, मगर बाद के दिनों में मोदी और स्मृति काफी करीब आते गये. स्मृति आज गुजरात से ही राज्य सभा की सदस्य हैं. ऐसा लगता है कि मोदी स्मृति के किसी खास गुण से प्रभावित हैं. इसलिए वे स्मृति को यह जिम्मेदारी दे रहे हैं.
स्मृति भले ही कम पढ़ी लिखी हों मगर टीवी बहसों में उन्होंने यह साबित किया है कि वे तार्किक भी हैं और जिम्मेदारी पूर्वक अपनी बातें रखती हैं. वैसे भी शिक्षा मंत्री का काम कहीं से भी छात्रों को पढ़ना नहीं है, उसका काम शिक्षा के बेहतर प्रसार के लिए अपने मंत्रलय को दिशा देना है. काम कैसे होगा यह अफसरों को तय करना होता है, मंत्री का काम सिर्फ यह करना होता है कि काम की दिशा क्या हो, नीतियां कैसी हों, योजनाएं किस तर्ज पर बनें. लिहाजा उनकी योग्यता को लेकर जो सवाल उठाये जा रहे हैं, उसे सौ दिन के लिए ही सही टाला जाना चाहिये था. एक बार उनका काम देख लें, फिर तय करें कि वे सक्षम हैं या नहीं. अगर आप अब तक के मानव संसाधन विकास मंत्रियों की सूची देखेंगे तो पायेंगे कि वे इस विभाग की जिम्मेदारी पाने वाली पहली महिला कैबिनेट मंत्री हैं. इससे पहले शीला कौल को राज्य मंत्री के रूप में यह विभाग मिला था. ऐसा भी हो सकता है कि महिला होने की वजह से वे ज्यादा बेहतर तरीके से इस विभाग को संभाल सकें. क्योंकि यह लगभग साबित हो चुका है कि सेहत और शिक्षा की जिम्मेदारियां महिलाएं ही बेहतर तरीके से संभाल सकती हैं.

Saturday, May 24, 2014

आपबीती- गैस और बैंक अकाउंट ट्रांसफर के तकनीकी झमेले


रांची से पटना आये तीन महीने गुजर चुके हैं. इस बीच मैं अपना दो काम नहीं करवा पाया हूं. ये दो काम हैं बैंक खाते और गैस कनेक्शन का ट्रांसफर. मैं पिछले चार साल से स्टेट बैंक ऑफ इंडिया और इंडियन ऑयल का उपभोक्ता हूं. इन चार सालों में मेरा रिकार्ड बेहतर और बेदाग माना जा सकता है. इसके बावजूद ये दोनों कंपनियां मेरे ऊपर इतना भी भरोसा नहीं कर रही कि तबादले के बाद मैं अपना पता जो इन्हें बता रहा हूं वह सच हो सकता है. इन्हें मेरे पटना के आवास के पते का प्रमाण पत्र चाहिये. सबसे रोचक तो यह है कि बिहार सरकार की ओर से जो स्थायी आवास प्रमाणपत्र मैंने पिछले दिनों बनवाया है, वह भी इनके लिए दो कौड़ी का है. अगर मेरा मकान मालिक मेरे साथ रेंट एग्रीमेंट करे और उसकी कॉपी मैं इन दोनों कंपनियों को उपलब्ध कराऊं तभी वे मानेंगे कि मैं पटना में फलां पते पर रह रहा हूं.
अच्छा, यह भी दिलचस्प है कि मैं जिनका किरायेदार हूं, न उन्हें रेंट एग्रीमेंट कराने में दिलचस्पी है और न मुङो. मगर हो सकता है कि लाचार होकर मुङो उनसे रेंट एग्रीमेंट कराना पड़े. क्योंकि इन दोनों कंपनियों की मुङो कदम-कदम पर जरूरत है.
मैं पिछले तीन महीने से तकरीबन हर हफ्ते अपने ऑफिस जाने के वक्त में से वक्त चुराकर इनके दफ्तरों में दो या तीन दिन हाजिरी लगाता हूं. मगर काम आगे नहीं बढ़ पा रहा. पहले गैस एजेंसी की कथा सुनिये. पहली विजिट में मुङो एक फार्मेट थमाया गया और कहा गया कि इसका एफिडेविट बनवा लूं. साथ में रेसिडेंशियल प्रूफ मांगा गया. लगभग दो सौ रुपये खर्च कर मैंने एफिडेविट बनवा लिया और पहले बेटी की एडमिशन के लिए फार्म भरने के सिलसिले में एक आवासीय प्रमाणपत्र बनवाया था उसकी प्रति ली और गैस एजेंसी पहुंचा. मैं निश्चिंत था कि अब मेरे पास एफिडेविट भी है और रेसिडेंशियल प्रूफ भी. उस बार एजेंसी वाले ने रांची से मिले ट्रांसफर के पेपर पर गौर किया और कहा कि इसमें कुछ गड़बड़ी है, आप इंडियन ऑयल के सेल्स ऑफिसर से मिल लीजिये. वहां गया तो पता चला कि सेल्स ऑफिसर महीने की एक और 15 तारीख को ही मिलते हैं. एक तारीख को गया तो उन्हें एजेंसी वाले को फोन पर समझा दिया कि गड़बड़ी कुछ नहीं है. आप इस तरह करें तो सब ठीक हो जायेगा. मैं खुशी-खुशी अगले दिन एजेंसी पहुंचा.
मगर इस बार एजेंसी वाले ने मेरे पेपर पर गौर किया और कहा आपका रेसिडेंशियल प्रूफ नहीं चलेगा. मैं चकित रह गया, राज्य सरकार का आवासीय प्रमाणपत्र रेसिडेंशियल प्रूफ नहीं माना जा रहा है. उन्होंने कहा वे कुछ नहीं कर सकते. वोटर आइडी, ड्राविंग लाइसेंस, राशन कार्ड, जमीन या मकान के कागजात वगैरह कुछ भी जिस पर आपका पटना का पता हो ले आइये, काम चल जायेगा. मगर मैं जब पटना का निवासी ही नहीं हूं, तबादले के बाद यहां आया हूं तो भाई मेरे पास इन कागजात पर पटना का पता कैसे हो सकता है. फिर उन्होंने कहा, रेंट एग्रीमेंट करवाइये या बैंक खाते पर पटना का पता हो तो वही ले आइये.
साथ-साथ मेरे बैंक खाते के ट्रांसफर का भी मसला चल रहा था. मैंने सोचा यही करवा लूं. वहां खाता तो ट्रांसफर हो गया था, अब मुझसे फिर से केवाइसी मांगा जा रहा था. जैसे पिछले पांच साल से वे मेरे बारे में कुछ नहीं जानते थे और अब नो योर कस्टमर वाला फार्म भरवा रहे थे. खैर. मैंने उसे भी भर दिया. आइडेंटिटी प्रूफ के लिए पैन कार्ड की कॉपी लगायी और एड्रेस प्रूफ के लिए बैंक के स्टॉफ की सलाह पर मकान मालिक का बिजली बिल उनके हस्ताक्षर के साथ पेश कर दिया. पांच दिन बात पहुंचा तो पता चला कि मेरा केवाइसी फार्म ही खो गया है. खैर दो दिन बाद फाम्र मिल गया. अब मुङो लगा कि काम हो जायेगा. मगर तीन दिन बाद भी काम नहीं हुआ तो पूछने गया. इस पर मुङो बताया गया कि वे कैसे मान सकते हैं कि बिजली बिल पर जो मकान मालिक के हस्ताक्षर हैं वे असली हैं. इसके लिए अगर मकान मालिक का एसबीआई का अकाउंट है तो नंबर लाइये, हम सिग्नेचर वेरिफाइ कर लेंगे. मकान मालिक का अकाउंट किसी और बैंक में है, लिहाजा मामला वहीं फंस गया. कहा गया अब एक ही रास्ता है रेंट एग्रीमेंट कराइये.
यानी रेंट एग्रीमेंट के बिना कोई राह नहीं है. मगर इस रेंट एग्रीमेंट की कीमत संभवत: ग्यारह-बारह सौ है. क्योंकि जैसी जानकारी है कि पटना में कोई भी एग्रीमेंट हजार रुपये के स्टांप पेपर पर ही होता है.
यह मेरी आपबीती है, इसलिए मैं इस परेशानी को समझ पा रहा हूं कि सरकारी व्यवस्था कैसे लोगों को तकनीकी बहानों में उलझाकर परेशान कर देती हैं. इन हालात में सिर्फ अंदाजा ही लगाया जा सकता है कि इस देश के गरीब और कम पढ़े लिखे लोगों से यह व्यवस्था कैसे पेश आती होगी. मेरे गांव की एक महिला जो महादलित समुदाय से आती है का कभी बीपीएल कार्ड नहीं बन पाया. वे मनरेगा का जॉब कार्ड बनवाने के लिए पांच साल से परेशान हैं. उसे विधवा पेंशन नहीं मिलता. इंदिरा आवास के बारे में तो उसने सोचना ही छोड़ दिया है. गांव से लेकर शहर तक यह सामान्य सिद्धांत बन गया है कि सरकारी काम कराना है तो किसी दलाल को पकड़ना होगा. ये दलाल हर दफ्तर के बाहर दर्जनों की संख्या में हाजिर हैं सौ, दो सौ पांच सौ लेकर आपका काम करने के लिए. आप सीधे जाकर किसी दफ्तर से बिना घूस दिये कोई प्रमाणपत्र नहीं बनवा सकते.
यह लाल फीताशाही हाल के वर्षों में विकसित हुई है. वोटर कार्ड वोट डालने से अधिक दूसरे दस तरह के काम में इस्तेमाल होने लगा है. कल को अगर एटीएम से पैसे निकालने से पहले वोटर कार्ड की फोटोकॉपी गार्ड को देने का नियम बना दिया जाये तो कोई आश्चर्य नहीं. इन सबकी वजह यह है कि कुछ लोग आतंकवादी गतिविधियों में शामिल हैं और इन सेवाओं का उपयोग करते हैं. मगर इसके लिए पुलिस और गुप्तचर एजेंसियों को सजग करने की जरूरत है, न कि पूरे देश को शक और शुब्हे की निगाह से देखने की.
अगर मैं स्टेट बैंक और इंडियन ऑयल का चार साल से ग्राहक हूं तो तबादले के बाद मैं जो पता उन्हें दे रहा हूं उस पर उन्हें क्यों भरोसा नहीं होना चाहिये. जिस बैंक में हर महीने मेरी तनख्वाह आती है, जिस कंपनी से मैं हर साल छह-सात सिलिंडर खरीदता हूं. उसे अपने पांच साल पुराने ग्राहक पर इतना भी भरोसा क्यों नहीं. जहां वोटर आइडी, राशन कार्ड और दूसरी सेवाओं की पोर्टिबिलिटि की बात चल रही है, वहां गैस या बैंक अकाउंट ट्रांसफर करने में इतने झमेले क्यों?

Wednesday, May 21, 2014

आदरणीय श्री जीतनराम मांझी, मुख्यमंत्री, बिहार सरकार


सबसे पहले तो अपने राज्य के एक नागरिक से शुभकामनाएं स्वीकार कीजिये. यह अलग बात है कि हमने आप को नहीं चुना है और न ही हमने जिन विधायकों को चुना था उन्होंने आपको चुना है. आप अपने पार्टी के सर्वोच्च नेता द्वारा मुख्यमंत्री पद के लिए अधिकृत हुए हैं. फिर भी आप हमारे मुख्यमंत्री हैं, राज्य को आगे बढ़ाने का दायित्व अब आपके ही कंधे पर है. आपसे आशाएं भी बहुत हैं.
यह अलग बात है कि आपको काम करने के लिए महज 14 महीने मिले हैं और आपके पास टीम भी अपनी नहीं है. मगर जनता को हर नये शासक से बहुत सारी उम्मीदें हैं. खास तौर पर जब से आपको महादलित सीएम कहकर बुलाने का रिवाज शुरू हुआ है, महादलितों को तो लगता है कि आपकी सरकार उनका कायाकल्प कर देगी. मगर इधर आपने शपथ ली और उधर कल एक महादलित परिवार को गांव की पंचायत ने गांव छोड़ने पर मजबूर कर दिया, यह खबर भी अखबारों में है.
मुझे याद है कि एक बार आपने कहा था कि मुशहरों का चूहा खाना कोई गलत बात नहीं, क्योंकि चूहा मुरगे से अधिक पौष्टिक होता है. और मुशहरों के चूहा खाने की प्रवृत्ति से फसल का नुकसान भी कम होता है. मगर यह भी सच है कि आपके राज्य का हर पांच में से चार बच्चा कुपोषित है और आपकी जाति मुशहर के बच्चों में कुपोषण का हाल बहुत बुरा है. राज्य में नौ साल से सुशासन की सरकार है और जहां तक मेरी जानकारी है आप भी लंबे समय से कल्याण मंत्री का दायित्व संभाल रहे हैं. इसके बावजूद यह शर्मनाक आंकड़ा बिहार अस्मिता की पोल खोल देता है. मुझे उम्मीद है कि आप अपने छोटे से कार्यकाल में इस आंकड़े को थोड़ा बहुत बेहतर करने की कोशिश जरूर करेंगे. आपको तो मालूम ही होगा कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं है. बस आंगनवाड़ी के डिलिवरी मैकेनिज्म को बेहतर बना देने से बड़ा बदलाव आ सकता है. कमी फंड की नहीं बल्कि इसके बेहतर यूटिलाइजेशन की है. अगर आपके शासन की इस छोटी सी अवधि में अगर यह आंकड़ा बेहतर हो जाये तो इसे आपके शासन की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जायेगी.
दूसरी बड़ी चुनौती जो मेरे हिसाब से आपके सरकार की है वह स्कूली शिक्षा की है. बिहार शायद देश का एकमात्र ऐसा राज्य है जहां आधे शिक्षक अनुबंध पर नियुक्त हैं और इनमें बड़ी संख्या ऐसे शिक्षकों की है जो प्रशिक्षित भी नहीं हैं. इसका नतीजा यह है कि बच्चे स्कूल तो जाते हैं पर वहां से ज्ञान लेकर नहीं लौटते. स्कूलों की पढ़ाई का स्तर बहुत बेकार है और शिक्षकों व अन्य स्टाफ की कमी की वजह से स्कूल बदहाल हैं. इसी का नतीजा है छपरा में मिड डे मील में जहर होने की वजह से दर्जनों बच्चों की मौत. इसका एक ही इलाज है योग्य एवं पूर्णकालिक शिक्षकों की नियुक्ति. क्या हम आपकी अल्पकालिक सरकार से उम्मीद रख सकते हैं कि वह इस मसले पर कोई बड़ा कदम उठा पायेगी?
मुख्यमंत्री जी पिछले लंबे समय से बिहार राज्य चुनाव और दूसरे मसायलों में व्यस्त रहा है. इस बीच मई का महीना आ गया है. चुकि आप बिहार सरकार से लंबे समय से जुड़े हैं, इसलिए आपको मालूम होगा कि बिहार राज्य में मई के महीने का मतलब क्या है. पश्चिमी चंपारण से लेकर किशनगंज तक आपके राज्य के उत्तरी जिले जो नेपाल की सीमा से जुड़े हैं उनमें मई के आखिर से ही पानी उतरना शुरू हो जाता है और मानसून आने से पहले इन जिलों के कई गांवों में बाढ़ का पानी घुस जाता है. हालांकि यह सालाना आपदा है और रूटीन है फिर भी आपदा में फंसे लोगों को बचाना भी तो आपके सरकार की ही जिम्मेदारी है.
यूं तो बिहार की सरकार ने भ्रष्टाचार के मसले पर काम करके दुनिया भर का ध्यान अपनी ओर खींचा है. निगरानी विभाग की सक्रियता बढ़ी है और भ्रष्ट अधिकारियों की संपत्ति जब्त की गयी है. मगर बड़े दुख के साथ कहना पड़ता है कि राजधानी पटना में गांधी मैदान से सटे समाहरणालय तक में सरकार के इस कड़े कदम का न्यूनतम असर नजर आता है. आप कभी एक सामान्य इंसान बनकर कारगिल चौक से उस ओर घुसेंगे तो पायेंगे कि कदम-कदम पर दलाल आपको टोक रहे हैं प्रमाणपत्र बनवाना है या एफिडेविट करवाना है. हर काम के लिए राजधानी से लेकर पंचायत स्तर तक दलाल तैनात हैं, रेट तय है और बिना पैसे के एक काम नहीं होता. इस मसले पर आपकी पुरानी सरकार का राइट टू सर्विस कानून भी फेल हो चुका है. यह कैसे दूर होगा इस बारे में आप कोई कदम उठायें. आपसे जनता को इस मसले पर बड़ी उम्मीदें हैं. इस अफवाह के बावजूद कि भ्रष्टाचार के खिलाफ खुद आपका ट्रैक रिकार्ड बेहतर नहीं है...
किसानों को खेत तक पानी, समय पर और उचित मूल्य पर खाद-बीज की उपलब्धता और फसल का वाजिब दाम. यह तो बड़ी मांग है. यह मांग किसान आजादी के बाद से ही हर सरकार से करते आये हैं. मगर आजतक कोई सरकार उनकी इस इकलौती मांग को पूरा नहीं कर पायी है. इसलिए आपसे इस छोटी सी अवधि में ऐसी उम्मीद रखना भी बेकार है. मगर हमें याद है कि पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कई दफा कहा था कि अगर 2015 तक राज्य का बिजली संकट दूर नहीं हुआ तो वे वोट मांगने नहीं जायेंगे. मगर जहां तक मेरी जानकारी है भागलपुर जैसे बड़े शहर में आज भी 12-14 घंटे बिजली एक सपना है. राजधानी पटना तक में बिजली नियमित नहीं है, हां बिजली की दर 5 रुपये से अधिक जरूर हो गयी है. यह कैसे दूर होगा इस मसले पर आपको सोचना है.
राजधानी पटना में लाखों छात्र हजारों रुपये प्रतिमाह खर्च कर नरक जैसे हालात में जीते हैं. वे पटना पढ़ने नहीं कोचिंग करने आते हैं. राज्य में शिक्षण संस्थाएं अब छात्रों के भरोसे के लायक नहीं बचीं. आज भी बिहार के युवाओं को बेहतर शिक्षा के लिए दिल्ली और दूसरे राज्यों की ओर निकलना पड़ता है. जो हाल कुशासन के वक्त था वही सुशासन की सरकार के नौ साल होने के बावजूद है. मैं जानता हूं आपको यह जानकारी देना आपका सरदर्द बढ़ाना ही है. जो काम बड़े-बड़े नहीं कर पाये उसकी उम्मीद आपसे महज 14 महीने में करना आप पर जुल्म है. मगर आप शासक हैं तो कम से कम हालात का पता तो आपको होना चाहिये.
आपको पता होना चाहिये कि आपकी जाति की अधिकांश आबादी आज भी भूमिहीन है और आपकी सरकार ने भूमिसुधार के प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में डाल दिया है. मालूम यह भी होना चाहिये कि दलितों-महादलितों की आबादी जो महज एक दशक पहले जनसंहारों की बलि चढ़ गयी थी, उनके परिजनों को न्याय नहीं मिल पाया है. मालूम आपको यह भी होना चाहिये कि आपके ही जिले के जिस दशरथ मांझी का नाम लेकर आपकी सरकार ने अपनी ब्रांडिंग की है, उनकी पतोहू की मौत पिछले दिनों इलाज न करा पाने की वजह से हो गयी. उनके गांव में तमाशा तो बहुत होता है मगर वहां भी महादलितों की हालत वैसी ही है, जैसी दशकों पहले थी. लोग उसी गंदगी में जी रहे हैं और वैसा ही दूषित जीवन. फिर भी, सिंबलिज्म ही सही, आपको सीएम बनाया तो गया है. आप अगर इनमें से कोई काम न कर सकें तो भी आपसे एक उम्मीद है. आप दलित समुदाय के अपने पूर्ववर्ती मुख्यमंत्री भोला पासवान शास्त्री की मिसाल जरूर याद रखेंगे. जो तीन दफा बिहार से मुख्यमंत्री बने, केंद्र में भी लंबे समय तक मंत्री रहे. मगर जब उनकी मौत हुई तो उनके खाते में अंतिम संस्कार के पैसे तक नहीं थे. आज उनका परिवार पूर्णिया जिले के एक गांव में मेहनत मजदूरी करके जी रहा है. मैं यह नहीं कहूंगा कि आप उस परिवार की स्थिति में बदलाव लायें. आपसे इतनी ही उम्मीद करता हूं कि अगर 14 महीने में आप कोई खास काम न कर सकें तो कम से कम भोला पासवान शास्त्री की तरह इमानदार भर रहें. राज्य की तसवीर खुद ब खुद बदल जायेगी.

Monday, May 19, 2014

तो नीतीश अब बिहारियों से बदला लेना चाहते हैं


शनिवार की शाम बिहार के लोगों ने यह खबर किसी कहर की तरह आयी कि नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है. शाम पांच बजे अपने प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने कहा कि वे नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दे रहे हैं, क्योंकि लोकसभा चुनाव की अगुआई वही कर रहे थे लिहाजा इस हार की जिम्मेदारी भी उनकी ही बनती है. इस खबर को जिसने सुना वही परेशान हो गया. क्योंकि भले गिरिराज सिंह टाइप भाजपा नेता कह दें कि लगे हाथ बिहार में भी सरकार बना लेते हैं, मगर 2005 से पहले के बिहार में जिसने दिन गुजारे हैं उन्हें एक पल के लिए यही लगा कि कहीं फिर से वह दौर लौटकर न आ जाये.
यह निर्विवाद सत्य है कि 15 साल तक डिरेल रहने वाले राज्य बिहार को नीतीश कुमार ने ही पटरी पर लाया और आगे बढ़ाया है. उनके शासन ने ही बिहार को जजर्र सड़कों और अपराधियों के तांडव से मुक्ति दिलायी है. सरकारी संस्थाएं फिर से काम करने लगीं और बाद के दिनों में बिजली संकट में भी अपेक्षाकृत सुधार हुआ. गांवों में लड़कियों का बेहिचक साइकिल पर स्कूल जाना और पटना में महिलाओं का सिनेमा हॉल के नाइट शो में पहुंचना एक सिंबल बना. हालांकि यह सब सिंबलिज्म ही था, क्योंकि सब कुछ अभी भी ठीक नहीं हुआ था, इसके उदाहरण थे कोसी में भीषण बाढ़ के बाद बिहार सरकार का असहाय नजर आना, छपरा के एक स्कूल में मिड-डे मील खाकर दर्जनों बच्चों का मारा जाना और धमहरा स्टेशन के पास सड़क के अभाव में रेल की पटरियों से गुजर रहे श्रद्धालुओं के जत्थे का ट्रेन से कटकर मारा जाना. ये बिना शक प्रशासनिक विफलता के ही उदाहरण हैं.
नीतीश राज में स्कूलों की तसवीर बदली मगर पढ़ाई ठप हो गयी, अस्पतालों के भवन बने मगर स्वास्थ्य सुविधाओं को लौटाया नहीं जा सका. यहां हर पांच में से चार बच्च आज भी कुपोषित है, राइट टू सर्विस जरूर है मगर सरकारी दफ्तरों में बिना पैसा दिये आज भी कोई काम नहीं होता. कोसी के पुनर्निमाण के लिए 9 हजार करोड़ रुपये की सहायता आयी है मगर कोसी जस का तस है. यह सच है कि रातो रात तसवीर बदल नहीं सकती, मगर यह भी है कि दूसरे टर्म में उनकी निगाहें विकास पर और पीएम की कुरसी पर ज्यादा रही है. बिहार की राजनीति को करीब से समझने वाले इस बात से सहमत होंगे कि मोदी विरोध और मोदी की वजह से भाजपा से नाता तोड़ने के नीतीश के कदम की एकमात्र वजह यह है कि वे मोदी को अपना प्रतिद्वंद्वी मानते रहे हैं. यह जरूर है कि उन्हें उम्मीद रही होगी कि भाजपा से नाता तोड़कर वे नवीन पटनायक की तरह बिहार की राजनीति में स्थायी हो जायेंगे और बिहार के मुसलमान लालू को छोड़कर उनके समर्थन में आ जायेंगे. इस बात पर पर्याप्त बहस हो चुकी है कि वे अगर इतने ही धर्मनिरपेक्ष मिजाज थे तो उन्होंने गुजरात दंगों के बाद एनडीए सरकार से इस्तीफा क्यों नहीं दिया. बहरहाल यह राजनीति है और एक राजनीतिक दल को राजनीतिक तरीकों से खुद को स्थापित करने का पूरा हक है.
मगर यह बात भी पूरी तरह सच है कि नीतीश सौ टका राजनेता नहीं हैं. राजनेता न जिद्दी होता है और न ही इगोइस्ट. राजनेता जनादेश को सर्वोपरि मानता है और खुद को जनमत के हिसाब से ढालता है. वह जनता को ही अंतिम सत्य मानता है और जनता से कभी बदला नहीं लेता. वह जब देखता है कि जनता ने उसके खिलाफ मत दिया है तो उसे वह सिर झुकाकर कबूल करता है और कहता है कि वह आगे जन अपेक्षाओं पर खरा उतरेगा. मगर कुछ नेताओं से यह मुमकिन नहीं है, जैसे ममता बनर्जी. नीतीश भी उसी धारा के हैं, वे हार के बाद भी मानते हैं कि सही वही हैं अगर वे नहीं जीते तो इसमें दोष जनता का है.
नीतीश को बहुत पहले से इस बात का अंदाजा था कि बिहार में मोदी की लहर है और इस लहर में खुद बिहार के लोग उनके बदले मोदी को ही चुनेंगे. मगर फिर भी उन्होंने भाजपा से नाता तोड़ा. यह एक जिद थी. उन्हें शायद लगता होगा कि अपनी जिद से वह तसवीर बदल सकते हैं. जबकि उनके ही दौर में मुलायम सिंह जैसे राजनेता भी थे जो बाहर कांग्रेस को गालियां देते थे और संसद में धर्मनिरपेक्षता को ढाल बनाकर कांग्रेस के समर्थन में खड़े हो जाते थे. उन्होंने इस लोकसभा चुनाव में अपने कामकाज के आधार पर बिहारियों से वोट मांगा. मगर बिहार के लोग इस बार आमदा थे कि दिल्ली की कुरसी पर हर हाल में मोदी का कब्जा हो. एक अनपढ़ बिहारी भी जो नीतीश के कामकाज का अंध समर्थक हो वह भी कह रहा था कि नीतीश तो दिल्ली में सरकार बना नहीं पायेंगे इसलिए इस बार वोट मोदी जी को दे रहे हैं. नीतीश जी को बिहार वाले चुनाव में वोट देंगे. इस चुनाव में मतदाताओं ने नीतीश को खारिज नहीं किया, बल्कि अपने तरीके से यह सुनिश्चित किया कि दिल्ली में मोदी की कुरसी मजबूत हो. वह दिल्ली में मोदी और पटना में नीतीश को देखना चाहता था और है.
मगर नीतीश जी के सामने और भी कई संकट हैं. सबसे बड़ा संकट यह है कि वे मोदी को देखना ही नहीं चाहते. अब जबकि मोदी का पीएम बनना तय है तो ऐसे में वे हर संभव कोशिश कर रहे हैं कि औपचारिक बैठकों में भी मोदी का सामना न हो और प्रोटोकॉल निभाने के लिए भी उन्हें मोदी से हाथ मिलाना न पड़े. लिहाजा यह चुनावी नतीजे उनके लिए एक सेटबैक की तरह आये हैं. और वे इसके लिए पूरी तरह बिहार के मतदाताओं को दोषी मान रहे हैं. वे अंदर से महसूस कर रहे हैं कि जिस बिहार के लिए उन्होंने इतना कुछ किया मगर यहां के लोगों ने उनके साथ गद्दारी की. तो लो भुगतो.. आपको अगर जंगल राज ही पसंद है, तो वहीं चले जाओ.. यह इस्तीफा उनके इसी भाव का प्रदर्शन कर रहा है. बाहर से शरद विरोध और दूसरी चीजें नजर आ रही है. मगर अंदर से यह भाव प्रबल है कि नीतीश हर्ट हैं और वे प्रतिकार स्वरूप बिहारी मतदाताओं को हर्ट करना चाह रहे हैं.
अब तकरीबन यह तय है कि नीतीश मुख्यमंत्री के पद पर लौटने वाले नहीं हैं. वे अपने लिए एक मनमोहन सिंह चुनने जा रहे हैं और खुद सोनिया की तरह पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने जा रहे हैं. मगर ऐसा नहीं है कि वे रिमोट कंट्रोल से सीएम को चलायेंगे. एक जिद्दी और इगोइस्ट इंसान जब हारता है तो वह सिर्फ अपना नुकसान करता है. वह पलटकर अगली लड़ाई के लिए तैयार नहीं होता, वह धीरे-धीरे अकेला और निर्विकार होता चला जाता है और खुद को सबसे अलग कर लेता है. उसकी एक ही तमन्ना होती है कि जिसने उसे दुखी किया है वह किसी कोने में बैठकर उसकी दुर्गति का नजारा देखे. इन पंक्तियों को लिखते हुए मैं यही सोच रहा हूं कि काश मेरा यह आकलन झूठ साबित हो जाये.

Friday, May 09, 2014

मंजूनाथः ईमानदारी कोई स्टुपिडिटी नहीं है


फिल्म समीक्षा- मंजूनाथ
मंजूनाथ एक ईमानदार अफसर की सच्ची कहानी है जो सिस्टम को सुधारने की कोशिश में मारा गया था. मगर यह कहानी ईमानदारी की मौत की नहीं है, बल्कि इससे उलट इस कहानी में दिखाने की कोशिश की गयी है कि ईमानदारी ही अंततः जीतती है. यह समाज आमतौर पर ईमानदारी को मूर्खता समझता है और हर आदमी ईमानदार कोशिशों को समझदारी से बीच का रास्ता अपनाने की सलाह देता है. ऐसे में हमेशा सिस्टम को चुनौती देने वाला शख्त मिसफिट, बेवकूफ और कई मामलों में सनकी मान लिया जाता है. मगर मंजूनाथ की कहानी के जरिये निर्देशक संदीप वर्मा इस पूरी समझ को उलटने की कोशिश करते हैं. यह फिल्म आज 9 मई को रिलीज हो रही है.
यह फिल्म मंजूनाथ षंमुगम नामक एक दक्षिण भारतीय दलित युवक की सच्ची कहानी पर आधारित है. 2004 में आइआइएम पास आउट यह युवक अपने कैरियर की शुरुआत यूपी के लखीमपुर खीरी में इंडियन आयल कॉरपोरेशन में सेल्स ऑफिसर के रूप में करता है. मगर वहां उसका सामना डीजल में सब्सिडी वाले कैरोसिन मिलाकर बेचने वाले गिरोह से हो जाती है. वह उस गिरोह के खिलाफ कार्रवाई करना चाहता है, मगर खुद उसके साथी, उसके अफसर, दुनिया वाले और दूसरे लोग उसे समझाते हैं कि यह बड़ा खेल है इसमें उलझना बेवकूफी है. वह इस दौरान मानसिक रूप से बीमार हो जाता है, फिर बीमारी से उबर कर वह उस गैंग से टकराता है. एक पेट्रोल पंप उसकी वजह से सील भी हो जाता है. मगर इन कार्रवाइयों की वजह से पेट्रोल पंप का संचालक उसका दुश्मन हो जाता है और अंततः वह उसकी हत्या कर देता है.
मगर फिल्म मंजूनाथ की मौत के साथ खत्म नहीं होती. उसके बाद एक लंबा एंटीक्लाइमेक्स चलता है. इस एंटीक्लाइमेक्स का मकसद इस सच को स्थापित करना है कि ईमानदारी स्टुपिडिटी नहीं है. मौत के बाद भी मंजूनाथ का किरदार अपने हत्यारे से लगातार संवाद करता है. इस संवाद में हत्यारा उसे समझाने की कोशिश करता है कि वह बेवकूफ है, कोई भी मां-बाप अपने घर में मंजूनाथ जैसा बेटा नहीं चाहेगा जो भरी जवानी में उन्हें छोड़ कर चला जाये. जबकि मंजूनाथ साबित करता है कि मां-बाप उसके जैसे बेटे को क्यों चाहेंगे जो हत्यारा साबित हो रहा है. इस एंटीक्लाइमेक्स के बीच आइआइएम के छात्रों-पूर्व छात्रों का उसे न्याय दिलाने के लिए अभियान चलता रहता है. इस अभियान की अपनी विसंगतियां हैं, जैसे तमाम संवेदनाओं के बावजूद कोई इस अभियान को लीड करने सामने नहीं आता, चंदे के नाम पर महज पांच हजार रुपये इकट्ठा हो पाते हैं. इसके बावजूद लड़ाई जीती जाती है, मंजूनाथ के हत्यारे को फांसी की सजा सुनायी जाती है और फिल्म इस नोट के साथ खत्म होती है कि मंजूनाथ बनना और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ते हुए मारा जाना स्टुपिडिटी नहीं है. इस फिल्म की सबसे बड़ी उपलब्धि मंजूनाथ का किरदार निभाने वाला दक्षिण भारतीय कलाकार सशो सथियश सारथी है. सारथी की यह पहली फिल्म है, वह देखने में बहुत साधारण है, मगर वह अपने अभिनय के जादू लोगों के दिल में आसानी से घर बना लेता है और पूरी फिल्म उसकी धुन पर थिरकती रहती है. इसके अलावा प्रतिनायक के रूप में यशपाल शर्मा जो पेट्रोल पंप का संचालक की भूमिका में हैं ने भी उतनी ही लाजवाब अदाकारी की है. उनका किरादर हमें यह समझने में मदद करता है कि भ्रष्टाचार में लिप्त छोटे-छोटे लोग कितने कमजोर होते हैं और कैसे मक्कारी से लेकर हत्या करने तक के हुनर में पारंगत होते चले जाते हैं. सीमा विश्वास मंजू की मां बनी हैं और उनका अभियन भी बेहतरीन है. फिल्म के आखिर में दिव्या दत्ता और विनीत नारायण नजर आते हैं, छोटी-छोटी भूमिकाओं में उन दोनों के करने लिए कुछ खास नहीं है. इसके अलावा कई और किरदार हैं जो बेहतर अभिनय करते नजर आते हैं.
दूसरे हाफ में, खास तौर पर मंजूनाथ की हत्या के बाद फिल्म की पकड़ ढीली होती है. लंबा एंटीक्लाइमेक्स संभलता नहीं है और निर्देशक संदीप वर्मा फिल्म को किसी नतीजे पर पहुंचने के दबाव में नजर आते हैं. मगर फिल्म का पहला हाफ इतना प्रभावशाली है कि दर्शकों के मन से फिल्म उतरने से पहले खत्म हो जाती है. मगर इसे बेहतर बनाया जा सकता था. सवाल यह नहीं है कि मंजूनाथ सही था या पेट्रोल पंप का संचालक. सवाल यह है कि वे लोग जो मंजूनाथ की लड़ाई से जुड़े थे, क्या वे अपने जीवन में इमानदारी को उस हद तक जगह दे पायेंगे जिस हद को मंजूनाथ ने चुना था. एक ईमानदार को हीरो बनाने से अधिक जरूरी काम पूरे समाज को ईमानदार लोगों के समूह में बदलना है. एक दृश्य में जरूर दिव्या दत्ता ऐसा हल्का सा संकेत देती है. मगर इमानदारी की लड़ाई में मारे गये योद्धा की लड़ाई उसे न्याय दिलाने की कोशिश तक में ही सिमट जाती है.
इसके बावजूद यह एक जरूरी फिल्म है. इसका बनना ही बड़ी बात थी, मगर यह बनी ही नहीं काफी खूबसूरत बनी है. पहले हाफ में आइआइएम कैंपस के दृश्य दिल को छू जाते हैं और पेट्रोल पंप मालिकों के साथ मंजूनाथ के उलझते रहने की कथा बहुत सजीव लगते हैं. एक दृश्य में अपनी मारुति कार से मंजूनाथ कहीं से लौट रहा है, रास्ते में लड़की का गट्ठर लेकर गांव जा रही बूढ़ी औरत को वह लिफ्ट देता है. कार में मंजूनाथ के साथ अपनी पोती को गोद में लिये वह बूढ़ी महिला और पीछे की सीट पर पड़ा लकड़ी का गट्ठर. इस दृश्य को कभी भुलाया नहीं जा सकता.
(प्रभात खबर के सिटी पुलआउट लाइफ @ पटना में प्रकाशित)