Thursday, June 19, 2014

नाथुला दर्रा - आठ घंटे की ट्रिप में सात सफर में ही गुजरे


गंगटोक-दार्जिलिंग यात्रा के वृत्तांत की तीसरी किस्त. इस यात्रा वृत्तांत को शुरू से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
निर्मल ने हमें सवा आठ बजे के करीब छांगुलेक टैक्सी स्टैंड के पास छोड़ दिया. हमारा अगला सफर नौ बजे शुरू होने वाला था. इस बीच में हम नास्ता कर लेना चाहते थे. जिस बेसमेंट में टैक्सी स्टैंड है वहीं एक छोटा सा रेस्तरां भी है. नाम अभी याद नहीं आ रहा. हम तीनों वहीं पहुंचे और एक टेबुल पर कब्जा जमाकर बैठ गये. काउंटर पर रेस्तरां के मालिक बैठे थे, जनाब बिहार के रहने वाले थे मगर 30-35 साल से गंगटोक में ही रह रहे थे. हमने नास्ते के लिए पूछा तो उन्होंने पूरी सब्जी और मोमोज का नाम लिया. मोमोज मिलना सिलीगुड़ी से ही शुरू हो गया था. सिलीगुड़ी से गंगटोक की राह में एक जगह जहां टैक्सी रुकी थी वहां भी हमने वेज मोमोज खाये थे. हमारा इरादा मोमोज ही खाने का था, यहां रहते हुए बढिया मोमोज खा लेना चाह रहे थे. मगर उन्होंने कहा, अरे मोमोज क्या खाइयेगा, पूरी सब्जी खाइये... मैं समझ सकता था कि अगर बिहार का कोई आदमी 35 साल से गंगटोक में रह रहा हो तो उसे मोमोज से ऊब हो गयी होगी और पूरी सब्जी उसके लिए किसी नौस्टैल्जिया की तरह रहा होगा. उनकी बात भी रह जाये यह सोचकर मैंने बीच का रास्ता निकाला और कहा कि एक प्लेट पूरी सब्जी और एक प्लेट मोमोज दे दीजिये और बाद में दो कप चाय.
एक और जरूरी काम बचा हुआ था... शौचालय जाने का. दरअसल हमारे होटल के कमरे में शौचालय पश्चिमी तरीके का था. जहां भी कमरे में पश्चिमी बनावट के शौचालय मिलते हैं मेरा सर भारी होने लगता है. लोग देखा-देखी में पश्चिमी बनावट वाले शौचालय बना तो लेते हैं, मगर बनाते आधा-अधूरा हैं. अमूमन 90 फीसदी ऐसे शौचालयों में धोने वाली पाइप नहीं होती है. इसके अलावा मुझे कमोड की सीट पर बैठने से नफरत है, क्योंकि हमेशा ख्याल आता है कि उस सीट पर न जाने कितने लोग बैठ चुके होंगे. उसकी सफाई का ख्याल तो ठीक से रखा नहीं जाता. यहां भी वही कहानी थी इसलिए मैंने प्लान किया था कि टैक्सी स्टैंड पर सुलभ शौचालय की शरण में जाऊंगा. रेस्तरां के मालिक ने बताया कि सुलभ शौचालय तो नहीं मगर पब्लिक टॉयलेट है जो पीछे हैं. उपमा और तिया को वहां छोड़कर मैं पीछे चला गया. निवृत्त होकर आया, फिर नास्ता किया, चाय पी, रास्ते के लिए बिस्कुट, वेफर्स और पानी की बोतलें ली और टैक्सी स्टैंड के पास पहुंच गया. हमारी टैक्सी को आने में वक्त लग रहा था, इस बीच हमारे पास काफी वक्त था औऱ हम वहीं बैठकर गंगटोक शहर के लोगों की गतिविधियों को देखने-परखने लगे.
हमारी टैक्सी में बैठने वाला एक और परिवार दिल्ली से आया था. हालांकि वे रहने वाले रांची के थे. वह परिवार भी हमारे जैसा ही था. माता-पिता औऱ एक बेटी. हालांकि हमलोगों में उम्र का ठीक-ठाक फासला था. उनकी बेटी 20-25 साल की होगी. बाद में एक और परिवार चढ़ा. दो पुरुष थे और एक किशोरी. वे लोग स्थानीय दुकानदार थे, मगर रहने वाले बिहार के बक्सर जिले के थे और वे भी यहां 30-35 साल से रह रहे थे. जल्द ही हमलोग आपस में घुलमिल गये. रांची वाली फैमिली दार्जिलिंग से होकर यहां आयी थी, और लगता था कि आने से पहले इस इलाके के बारे में उन्होंने खूब रिर्सच किया था. उनसे हमें कई जानकारियां मिलीं. वे यहां से फिर पेलिंग जाने वाले जो एक छोटा सा कस्बा था. बक्सर वाले सज्जन जो यहां दुकान चलाते थे वे तो खैर लोकल एक्सपर्ट थे ही. वे ड्राइवर के बगल में बैठे थे और कभी हमसे हिंदी में बतियाने लगते तो कभी ड्राइवर के साथ लेप्चा में शुरू हो जाते.
शहर से बाहर निकलकर जैसे ही हाइवे पर पहुंचे हमें समझ में आ गया कि तीन घंटे की हमारी यह यात्रा भीषण खतरनाक रहने वाली है. सिलीगुड़ी से गंगटोक तक की यात्रा उसके सामने कुछ नहीं थी. सड़क बमुश्किल डेढ़ लेन की थी और सड़क की हालत काफी जर्जर थी. एक तरफ तो भीषण खाई थी ही दूसरी तरफ जो पहाड़ थे वहां भी जगह-जगह से पानी गिर रहा था और भू-स्खलन के निशान थे. बारिश तो नहीं हो रही थी मगर बादलों ने विजिवलिटी को शून्य के करीब पहुंचा दिया था. हालात ये थे कि दस मीटर आगे क्या हो रहा है यह नजर नहीं आ रहा था. गंगटोक शहर खुद ही चार हजार मीटर से अधिक ऊंचाई पर है, वहां से हमें तकरीबन चार सौ मीटर की चढ़ाई और चढ़नी थी. खाई वाले किनारे में तो बैरियर का कहीं नामोनिशान तक नहीं था. मगर हमारी गाड़ी इन सब बातों से बेखौफ उछलती-कूदती चली जा रही थी. काफी देर तक हम सहमे सिकुड़े से बैठे रहे कि क्या पता सही सलामत जाकर लौट पायेंगे या नहीं. मगर जब बक्सर वाले सज्जन को निश्चिंत भाव में ड्राइवर से बतियाते देखा तो लगा कि सब ठीक है. डरने का कोई मतलब नहीं है. लाना ले जाना ड्राइवर का काम है, सबकुछ उसके हाथ में है.
आगे पता चला कि सीमा सड़क संगठन इस सड़क का निर्माण करा रही है. जगह-जगह मजदूर काम करते नजर आ रहे थे. कई जगह सड़क पर बड़े-बड़े पत्थर गिरे हुए थे. बारिश की वजह से कई जगह सड़क फिसलन भरी हो गयी थी. एक घंटे लगातार चलने के बाते ड्राइवर ने एक सोते के पास गाड़ी रोक दी और सोते से पानी भरकर गाड़ी पर डालने लगा. पता चला कि लगातार चढ़ाई की वजह से गाड़ी गरम हो जाती है और इन्हें रास्ते में दो तीन जगह ऐसा करना पड़ता है. बाद में दार्जिलिंग के रास्ते में भी हमनें देखा एक बच्चा पाइप से पानी देकर गाड़ियों को ठंडा करता है और बदले में गाड़ी वाले उसे कुछ पैसे देते हैं.
रास्ते में काफी दूर-दूर पर छोटे-छोटे बाजार या कस्बे नजर आते थे. अब ज्यादातर मकान लकड़ी या टिन के बने नजर आते थे. सीमेंट के मकान बहुत कम दिखते थे. ऐसे ही एक बाजार पर हमने टिन का बना पब्लिक टॉयलेट भी देखा गाड़ी की महिलाओं ने उस शौचालय का इस्तेमाल कर लिया. ठंड काफी बढ़ गयी थी. अब मुझे लग रहा था कि अगर किराये वाला जैकेट नहीं मिला तो हालत खराब हो जायेगी. उपमा तो उलेन कपड़ों में भी सिहर रही थी. आगे चलकर ड्राइवर ने हमें एक जैकेट किराये पर दिलाया, सौ रुपये में. क्या करता कोई विकल्प नहीं था. हालांकि थोड़ी चढ़ाई के बाद हमने देखा कि धूप निकल आयी है. मुझे लगा कि अब मुझे जैकेट की जरूरत नहीं पड़ेगी, बाद में नाथुला के पास पहुंचने के बावजूद मैं हाफ शर्ट में ही रहा.
अचानक धूप निकलने के बारे में बक्सर वाले सज्जन ने बताया कि चुकि इतनी ऊंचाई तक बादल नहीं आते इसलिए आसमान यहां साफ है और धूप खिली है. यानी बादल हम से नीचे की ऊंचाई पर थे. यह भी हमारे लिए अनूठा अनुभव था. देर काफी हो चुकी थी इसलिए तय हुआ कि पहले नाथुला के पास वाले हरभजन बाबा के मंदिर ही घूम आया जाये, नाथुला बार्डर बंद है इसलिए वहां जाने का कोई मतलब नहीं है. लौटते वक्त छांगु लेक के पास ठहरेंगे. हालांकि हम छांगु लेक के सामने से ही गुजर रहे थे मगर वहां रुके नहीं सीधे आगे बढ़ते चले. छांगु लेक से आगे बढ़ते ही हमें कुछ चोटियां ऐसी नजर आयीं जिस पर थोड़ी-थोड़ी बर्फ जमी थी. बक्सर वाले सज्जन ने कहा ठंड के दिनों में ये चोटियां भी बर्फ से ढकी होती हैं और छांगु लेक का पानी भी जम जाता है.
हम अब चीन की सीमा के बिल्कुल करीब थे. शायद आपको यह जानकारी न हो, मगर इस इलाके में यही एकमात्र भूभाग है जहां भारत की सीमा सीधे चीन की सीमा से जुड़ती है. नाथुला बार्डर के जरिये हाल के कुछ वर्षों से दोनों देशों के बीच सीधा व्यापार शुरू हुआ है. बक्सर वाले सज्जन ने बताया कि अक्तूबर-नवंबर के महीने में सामान की आवाजाही शुरू होती है और दोनों मुल्कों के बीच 27 सामानों का लेन-देन होता है. उन्होंने रोष जताते हुए कहा कि चीन अपने घटिया प्लास्टिक और इलेक्टॉनिक के सामान हमारे देश में भेज देता है जबकि यहां से चावल, दाल, आलू और प्याज जैसी चीजें भेजी जाती हैं. जिससे इस इलाके में खाने-पीने की चीजें महंगी हो जाती हैं.
रास्ते में कई जगह ऐसे साइनबोर्ड लगे थे जिसपर लिखा था यह इलाके चीन की सर्विजिलांस में है. पहाड़ों पर एक जगह बहुत बड़े आकार में लिखा था मेरा भारत महान. पढ़कर खुशी हुई. जल्द ही हम बाबा मंदिर पहुंच गये. बाबा मंदिर के नाम से ऐसा लगता है कि यह किसी संन्यासी का मंदिर है, जबकि असलियत में यह एक फौजी की याद में बना मंदिर है.फौजी हरभजन सिंह जिसके नाम पर यह मंदिर बना है उसकी कहानी बड़ी दिलचस्प है. हरभजन सिंह की मौत 1967 में सीमा पर पेट्रोलिंग करते वक्त बर्फ में दबकर हो गयी थी. मगर आने वाले वक्त में वहां के सिपाहियों ने महसूस किया कि हरभजन सिंह जिंदा है और अकेले सीमा पर पहरा देता है. अगर पहरे के दौरान कोई सिपाही सोने लगता है तो वह उसे थप्पड़ मारकर जगाता है. उसके रहते किसी सिपाही को कोई नुकसान नहीं हो सकता. हरभजन सिंह के जीवित होने की कहानी इतनी दमदार निकली की आखिरकार भारतीय फौज के अधिकारियों को भी उस पर भरोसा हो गया. सरकारी दस्तावेजों में अभी भी वह एक फौजी के तौर पर नौकरी कर रहा है. शायद प्रोमोशन के बाद उसे कोई पद भी मिल गया है. उसे बकायदा वेतन मिलता है, वरदी औऱ जूते मिलते हैं. उसके रहने की जगह है, बिस्तर है, बैठने की जगह है. सब हम देखकर आय़े हैं और तसवीरें भी हैं. साल में एक बार उसकी छुट्टी होती है और उसके साथ एक अर्दली उसे लेकर उसके पंजाब स्थित पैतृक गांव लेकर जाता है और बाद में वहां से लेकर आता है.
बाबा हरभजन सिंह का मंदिर काफी भव्य था औऱ उसकी देखरेख फौजी ही करते थे. बगल में फौजियों ने एक स्मृतिचिह्नों की दुकान और चाय-नास्ते की एक कैंटीन भी खोल रखी थी. मंदिर के पास आक्सीजन की मात्रा कम हो गयी थी जिस वजह से सांस लेने में थोड़ी परेशानी हो रही थी. फिर भी वहां सैकड़ों की भीड़ थी. मंदिर में अरदास बज रहा था और श्रद्धालु पूरी श्रद्धा से वहां शीश नवा रहे थे और मिनरल वाटर की बोतलें चढ़ा रहे थे. एक कमरे में रिवाल्विंग चेयर रखा था, बताया गया कि बाबा उस वक्त वहां बैठे थे. हमने उनके सोने का कमरा भी देखा. डिस्कवरी ने भी उनकी कहानी पर फिल्म बनायी है, कहते हैं उस फिल्म में सोते वक्त बाबा के बिस्तर के दबने तक को दिखाया गया है. कैंटीन में हमने दो मसाला पाव खाया और वहां से चल पड़े.
लौटते वक्त जब हम छांगु लेक के पास पहुंचे तो पानी बरसने लगा. यह बहुत बुरा हुआ. क्योंकि हम झील के किनारे कुछ पल बैठना चाहते थे. खैर, हम फिर भी उतरे. वहां पारंपरिक भूटानी वेशभूषा किराये पर मिल रही थी लोग जिन्हें पहनकर और याक पर बैठकर फोटो खिचा रहे थे. ड्रेस के लिए 80 रुपये मांगते हैं मगर बारगेनिंग करने पर 30 रुपये में एक जोड़ी ड्रेस मिल जाती है. याक पर बैठने का किराया 50 रुपये है. हम तीनों ने ड्रेस पहनकर फोटो खिंचवाया पर याक पर नहीं बैठे. बारिश की वजह से हम वहां ज्यादा देर रुक नहीं पाये. भूख भी लग गयी थी. बगल में एक छोटा सा मार्केट है, बक्सर वाले सज्जन हमें यह कहते हुए वहां लेकर चले गये कि वहां खाने को कुछ मिल जायेगा. वेज मोमोज और मैगी. यही मिला. फिर वापसी.
लौटते वक्त रास्ता और खराब हो गया था, बारिश की वजह से. ढलान के कारण गाड़ी ज्यादा उछलकूद मचा रही थी. मगर हम थक इतने गये थे कि सोने लगे. शाम पांच बजे गंगटोक पहुंचे तो अंधेरा हो गया था. गाड़ी वाले ने हमें फिर छांगुलेक के पास उतार दिया. लौटते वक्त हमने कैलकुलेट किया तो पता चला कि आठ घंटे के इस ट्रिप में तकरीबन सात घंटे हमने यात्रा करते हुए गुजारे हैं. आधा धंटे से कुछ कम बाबा मंदिर पर ठहरे और आधे धंटे से कुछ अधिक छांगु लेक में जहां हमने झील कम देखा और मोमोज खाने में ज्यादा वक्त बरबाद किया. शरीर थकान की वजह से टूट रहा था. अगले दिन फिर हमें दार्जिलिंग की तरफ निकलना था. हमने टैक्सी स्टैंड से एक टैक्सी ली और एमजी रोड की तरफ निकल पड़े ताकि कुछ निशानियां खरीद सकें.

Wednesday, June 18, 2014

पुण्य और पाप अपनी जगह, पोर्क और बीफ अपनी जगह...


अपनी यात्रा के दूसरे दिन हम गंगटोक शहर घूमने निकले, पढिये इस वृत्तांत की दूसरी किस्त...
लोकल प्वाइंट घुमाने वाला टैक्सी ड्राइवर सुबह साढ़े पांच बजे पहुंच गया. हालांकि दो दिन की थकावट के बाद इतने सवेरे उठने का हमारा इरादा कतई नहीं था, मगर हम उठे और छह बजे तक उसकी शरण में पहुंच गये. गीजर के पानी ने तैयार होने में काफी मदद की, हमने इतनी ठंड में भी नहाने का रिस्क उठा लिया. गणेश टोक औऱ बाबा मंदिर का नाम सुनकर उपमा को लगा कि अगर बिना नहाये पहुंच गये तो भगवान क्लास ले सकते हैं. मैं भी अपने शरीर से पसीने के आखिरी निशान को मिटा देना चाहता था ताकि यहां के ठंडे मौसम का ठीक से लुत्फ ले सकूं.
ड्राइवर का नाम निर्मल था. वे तकरीबन 45 साल के व्यक्ति थे. उन्होंने साढ़े आठ बजे से किसी और पर्यटक को समय दे रखा था लिहाजा वे चाहते थे कि हम उन्हें सवा आठ बजे तक छोड़ दें. मैंने कहा ठीक है, आठ बजे तक हम जितना घूम पायेंगे वे घुमा दें, फिर हमें छांगुलेक टैक्सी स्टैंड के पास छोड़ दें, जहां से हमें शोम्गो(छांगु) लेक औऱ बाबा मंदिर के लिए टैक्सी मिलने वाली थी. निर्मल बड़े मिलनसार व्यक्ति थे, उनसे जल्द ही आत्मीय बातचीत शुरू हो गयी. वे कहने लगे, गंगटोक शहर में टाटा सुमो या बोलेरो जैसी गाड़ियों का चलना मना है, यहां छोटी कार ही चला सकते हैं. हालांकि इन छोटी कारों को लेकर आप शहर से बाहर नहीं जा सकते. वहां जाने के लिए आपको टाटा सुमो या बोलेरो जैसी गाड़ियों का सहारा ही लेना होगा. उनके कहने का मतलब था कि शहर में डीजल गाड़ियों का प्रवेश वर्जित है, जबकि पहाड़ी रास्तों पर छोटी कारें नहीं जा सकतीं. तापमान 13-14 डिग्री के आसपास था. उपमा ने पिछली शाम को एक उलेन ड्रेस ले लिया था और तिया का जैकेट हम साथ में ही लाये थे. मगर मेरे पास सिर्फ हाफ शर्ट और टीशर्ट थे. इन दिनों पहाड़ी शहरों में भी गरमी पड़ने लगी है, ऐसी खबरें मैंने लगातार पढ़ी थी, इस लिहाज से लगता था कि ठंड कितना भी पड़े मगर स्वेटर की जरूरत शायद ही होगी. मगर गंगटोक ने हमारे आकलन को गलत साबित कर दिया था. मैंने एहतियातन शर्ट के नीचे एक टीशर्ट पहना हुआ था, मगर ऐसा लगता था कि शोम्गो लेक के पास जहां गर्मियों में भी बर्फीले पहाड़ नजर आते हैं, मुझे कुछ और कपड़ों की जरूरत होगी.
निर्मल ने यह कह कर हमें आश्वस्त किया कि शोम्गो लेक के पास किराये पर भी गर्म कपड़े मिल जाते हैं, अगर हम चाहें तो उन्हें खरीद भी सकते हैं. उपमा ने सवाल किया कि अगर गर्मियों में यहां का मौसम ऐसा है तो जाड़े के दिनों में क्या हाल होता होगा. इस पर निर्मल ने कहा, जाड़े के मौसम में तो आपलोग यहां रह ही नहीं पायेगा... क्यों नहीं रह पायेगा, हमलोग आदमी नहीं है क्या... मैंने सवाल किया.
अरे नहीं, आप लोग से नहीं होगा. यहां जाड़े में हमलोग रम पीता है, रोज पोर्क या बीफ खाता है. आपलोग खायेगा ? नहीं खायेगा... कहेगा धर्म भ्रष्ट हो जायेगा... हम भी हिंदू है, मगर क्या करेगा जब जान पर आफत आता है तो सब नियम बदलना होता है... लाचारी है, बीफ नहीं खायेगा, पोर्क नहीं खायेगा तो यहां जी नहीं पायेगा... बीफ और पोर्क की चर्चा हो ही रही थी कि हम गणेश टोक पहुंच गये. गंगटोक के सबसे ऊंचे शिखर पर स्थित गणेश जी का मंदिर. निर्मल ने नीचे बने एक पार्किंग जोन में गाड़ी पार्क की, जहां सेना के कुछ जवान जॉगिंग कर रहे थे. हमलोग मंदिर की तरफ बढ़ चले. वह एक छोटा सा मंदिर था, मगर काफी साफ-सुथरा और करीने से बना हुआ. हिंदी बेल्ट के मंदिरों जैसा गंदा और भीड़भाड़ वाला नहीं था. राधाकृष्ण मंदिर जैसा या इस्कॉन के मंदिरों जैसा. हमलोग उस मंदिर में पहुंचने वाले पहले श्रद्धालु थे. वहां की व्यवस्था देखकर उपमा का मन श्रद्धा से भर उठा. जूते खोलकर और हाथ धोकर हम मंदिर पर पहुंचे. हमें देखकर पुजारी अंदर गया और भगवान की पूजा अर्चना करने लगा. हमें तिलक किया और अराची दाने का प्रसाद दिया. वह अपने सामने में दस-दस के कुछ नोट पहले से निकाल कर रखा था. यह इस बात का संकेत था कि यहां तिलक के एवज में पैसा देना पड़ता है और वह भी दस-दस के नोट की शक्ल में. हमने भी बीस रुपये उसके सामने में रख दिये. दो-चार फोटो सेशन के बाद हम नीचे उतर आये. वहां इतनी ठंड थी कि बगैर जूतों के रहना मुश्किल था, तिया तो गोद से उतरने का नाम ही नहीं ले रही थी.
अगला पड़ाव ताशी व्यू प्वाइंट था. गणेश टोक और ताशी व्यू प्वाइंट गंगटोक शहर के दो ऐसे प्वाइंट हैं जहां से कंचनजंघा पर्वत के सुनहले शिखर को देखा जा सकता है. यह पर्वत सिक्किम और नेपाल की सीमा पर स्थित है. मगर जून के महीने में जब हर तरफ बादलों का डेरा हो, दस कदम आगे की चीज देखना मुश्किल हो तो कंचनजंघा के शिखर को देखने की बात सोची भी नहीं जा सकती. निर्मल बता रहे थे कि पिछले दस-बारह दिनों से कंचनजंघा की चोटी साफ नजर नहीं आ रही थी. मगर फिर भी इन जगहों की यात्रा बेकार साबित हुई हो ऐसा नहीं लगा. खास तौर पर ताशी व्यू प्वाइंट जहां उस रोज बादलों के फाहे यहां वहां उड़ रहे थे. वहां पहुंचकर ऐसा लगा कि हम 1942 ए लव स्टोरी के रिम-झिम-रुम-झुम वाले गाने के सेट पर आ गये हों. सामने कंचनजंघा के बदले एक साधारण सा होटल नजर आ रहा था मगर वह बादलों के बीच कुछ इस तरह लिपटा था कि लग रहा था जैसे यह स्वर्ग में भगवान इंद्र का महल हो. हमने उस होटल को बैकग्राउंड में रखकर कुछ तसवीरें लीं जो इस पोस्ट के साथ संलग्न हैं.
ऊपर ड्रेगेन की दो मूर्तियां थीं, एक गुंबदनुमा बैठक जहां से खुले दिनों में लोग कंचनजंघा की चोटियों को निहारतो होंगे. सामने एक बड़ी बिल्डिंग थी जिसमें सिक्किम के स्मृतिचिंह्नों की एक दुकान और छोटा सा कैफेटेरिया था. उपमा सीधे उस दुकान में जा घुसी और हमदोनों बाप-बेटी उस छतनुमा जगह पर यहां वहां भटकते हुए फोटोशूट करते रहे. वहां भी हमारे अलावा कोई और पर्यटक नहीं था. पर्यटकों के लिहाज से शायद यह काफी सुबह थी. लोग नौ-दस बजे आना शुरू करते हैं. वे एक दिन छांगुलेक, नाथुला और बाबा मंदिर के लिए रखते हैं औऱ एक दिन लोकल साइटसीइंग के लिए, जिसमें टैक्सी वाले उन्हें आठ-नौ जगह ले जाते हैं. तीसरा दिन रूमटेक मोनेस्ट्री के लिए होता है जो शहर से 24 किमी दूर है. मगर हमारे पास एक ही दिन था जिसमें नाथुला पास की तरफ भी जाना था और लोकल साइटसीइंग भी करना था. रूमटेक का इरादा तो हमने पहले ही छोड़ दिया था. इसलिए सुबह-सवेरे भूखे-प्यासे गणेश टोक और ताशी व्यूप्वाइंट का चक्कर लगा रहे थे.
ताशी व्यू प्वाइंट से उतरे तो मुश्किल से सात ही बजा था. हमने निर्मल जी से अनुरोध किया कि बचे वक्त का इस्तेमाल करते हुए हमें दो-तीन जगह औऱ घुमा दें. निर्मल जी ने कहा कि वे हमें बाख्तांग वाटर फॉल और छोड़देन गुम्बा मोनेस्ट्री घुमा सकते हैं. मगर उसके एवज में हमें तीन सौ रुपये और देने होंगे. सौदा बुरा नहीं था, हम राजी हो गये. बाख्तांग वाटर फॉल तो सड़क के किनारे ही एक मझोले आकार का वाटर फॉल था जो फोटोग्राफिक प्वाइंट से अधिक कुछ नहीं था. मगर छोड़देन गुम्बा एक मझोले आकार का बौद्ध मठ था. चुकि हम रूमटेक नहीं जा रहे थे, इस लिहाज से छोड़देन जाना फायदे का सौदा रहा. वरना सिक्किम घूमने के बावजूद बौद्ध मठ का दर्शन न हो तो यह तो दुर्भाग्य ही कहा जायेगा.
शहर के निचले हिस्से में यह मोनेस्ट्री है. जब हम पहुंचे तो वहां भिक्षुक कैंपस में झाड़ू लगा रहे थे. पता चला कि भिक्षु अपना सारा काम खुद करते हैं. एक कमरे में हमने देखा कि दो भिक्षु मिलकर सौ से अधिक दीयों की सफाई कर रहे हैं. कहीं भिक्षु पानी से कैंपस धो रहे थे. हमने उन गोल बेलनों को घुमाने का आनंद लिया जो हिमालय के बौद्ध मंदिरों में अक्सर नजर आते हैं, तसवीर संलग्न है. फिर कैंपस का जायजा लेने लगे. हमने देखा वहां कई बिल्लियां शांत बैठी हुई हैं. तवांग और लद्दाख के उन बौद्ध मठों की याद आय़ी जहां शेर भी रहते हैं. बौद्ध भिक्षु अपने वातावरण के जरिये अपने आस पास रहने वाले पशुओं को भी अहिंसक बना लेते हैं. तभी याद आया कि ये बौद्ध भिक्षु तो मांसाहर और मदिरा सेवन नहीं करते होंगे. चाहे कितनी भी ठंड पड़े. मगर इनकी सेहत पर तो कोई नकारात्मक असर नहीं दिखा. बजाय इसके निर्मल की सेहत ही ढलती नजर आती है. जी में आया कि लौटते वक्त निर्मल से पूछूंगा, मगर पूछा नहीं... पूछने से भी क्या हासिल होता... अपने-अपने तर्क हैं, अपना-अपना नजरिया...
चित्र परिचय- पहली तसवीर बाख्तांग वाटर फॉल की है, दूसरी-तीसरी छोड़देन गुम्बा मोनेस्ट्री की, चौथी-पांचवी गणेश टोक की और सातवीं-आठवीं ताशी व्यू प्वाइंट की...

Tuesday, June 17, 2014

जैसे कोई सितारा, बादल के गांव में


पिछले दिनों सपरिवार दार्जिलिंग-गंगटोक घूम आया. वहां का यात्रा वृत्तांत लिखने की योजना थी. काम शुरू हो गया है, पहली कड़ी आज आपके सामने है...
सुबह सवेरे जब हम पूर्णिया बस स्टैंड पर उतरे तो हल्की बूंदाबांदी शुरू हो गयी थी. किशनगंज पहुंचते-पहुंचते बारिश की रफ्तार इतनी तेज हो गयी कि खेतों में एक ईंच पानी जमा हो गया था. लगने लगा कहीं पूरी ट्रिप बारिश की भेंट न चढ़ जाये. पिछली शाम जब पटना से हम चले थे तो रात नौ बजे भी कुरता पसीने से भींगा हुआ था. गांधी सेतु पुल पर जब खिड़कियों से हवा का झोंका आना शुरू हुआ तब जाकर थोड़ी राहत मिली थी. ऐसे में इस तरह के हालात की उम्मीद भी नहीं की जा सकती थी. फेसबुक चेक किया तो सारे दोस्त अब भी गरमी, पावर कट और उमस का रोना रो रहे थे.
इस यात्रा की योजना अचानक बनी. पत्रकार साथी हेमंत जी दफ्तर आये हुए थे और अपनी नेपाल यात्रा की कहानी सुना रहे थे. मैं उस कहानी के लपेटे में ऐसा आया कि आइआरसीटीसी पर टिकट चेक करने लगा. योजना जोगबनी के रास्ते नेपाल जाने की थी. टिकट भी ले लिया था. मगर उपमा ने भेटाटांड का नाम सुनकर कुछ यूं मुंह बनाया कि वह जैसे वह कोसी दियारे का कोई गांव हो. ऐसे में हारकर दार्जिलिंग-गंगटोक यात्रा की अरसे से बनती-बिगड़ती योजना पर ही दांव लगाना पड़ा. जोगबनी का टिकट कैंसिल कराकर हम बस से वाया पूर्णिया-सिलिगुड़ी इस सफर पर निकल पड़े.
दार्जिलिंग जाने की हमारी योजना बहुत पुरानी थी. कितनी यह याद नहीं. दरअसल दिल्ली वालों की नजर जो जगह शिमला के लिए है, वही जगह पूरब के वासियों के मन में दार्जिलिंग के लिए है. दरअसल ठंडे मुल्क से आये अंग्रेजों को इस गरम मुल्क में एक अदद लंदन की जरूरत हमेशा महसूस होती थी, इसलिए छुट्टियां मनाने के लिए उन्होंने शिमला औऱ दार्जिलिंग जैसे शहरों को आकार दिया. जब वे कोलकाता से राज करते थे तो दार्जिलिंग का जलवा हुआ करता था, मगर जब राजधानी कोलकाता से दिल्ली शिफ्ट हो गयी तो शिमला को पटरानियों वाला दर्जा मिल गया. मगर हम पूरब के लोगों के मन पर हमेशा दार्जिलिंग ही राज करता रहा. शादी के बाद हनीमून का जिक्र जब भी आता तो यार दोस्त कहते दार्जिलिंग घूम आओ. घर के अलबम में बड़े पापा और बड़ी मां की दार्जिलिंग की तसवीर हमेशा से देखता आया हूं, जिसमें वे दोनों चाय बगान में पारंपरिक वेश-भूषा में नजर आ रहे हैं. बाद में छोटे भाई को हम सब लोगों ने हनीमून के लिए शिमला भेजा. मगर अपनी बारी में मौका नहीं बन पाया.
वैसे, दार्जिलिंग से हमारा रिश्ता कुछ अलग है. मेरे अपने जिले पूर्णिया का गजेटियर बताता है कि कभी दार्जिलिंग पूर्णिया जिले का हिस्सा था. (हालांकि यह कैसे रहा होगा यह सोचकर थोड़ी हैरत होती है, क्योंकि पूर्णिया शहर से दार्जिलिंग शहर की दूरी लगभग 300 किमी है.) इस लिहाज से यह पहाड़ी शहर हमें हमेशा से अपना लगता रहा है. मगर अफसोस आधी जिंदगी गुजर जाने के बाद भी मैं दार्जिलिंग नहीं जा पाया था, जबकि 2004 में एक साल पंचकूला में रहने के दौरान दसियों बार शिमला घूम चुका हूं. अक्सर वीकली ऑफ के रोज कालका से ट्वाइ ट्रेन पर चढ़ता और 13 रुपये के टिकट पर शिमला पहुंच जाता. वहां मेरा जूनियर नौशाद आलम सीएजी ऑफिस में काम करता था, लिहाजा अगर रुकने की नौबत आती तो उसी के घर ठहरता, वरना शाम को बस से लौट आता. जब बिहार लौट आया तो हर साल प्लानिंग करता कि इस बार दार्जिलिंग घूम आना है, मगर हर बार कोई न कोई प्रेत बाधा इस योजना को चौपट कर देती. बाद में इस योजना में गंगटोक का नाम भी जुड़ गया जो सिक्किम की राजधानी और दार्जिलिंग का पड़ोसी शहर है. और पता नहीं क्यों धीरे-धीरे दार्जिलिंग गौण होता गया और गंगटोक अहम.
मलाइ सिक्किम
जब इस सफर की योजना बना रहा था तो मेरे सामने यह बड़ा सवाल था कि पहले दार्जिलिंग जाऊं या गंगटोक. मेरे पास चार दिन और चार रातें थीं. पहला दिन तो पहले डेस्टिनेशन तक पहुंचने में ही खत्म होने वाला था. एक टूरिस्ट साइट ने सलाह दी कि गंगटोक से सिलिगुड़ी लौटना कहीं कठिन है, बनिस्पत दार्जिलिंग के. 11 तारीख को शाम पौने पांच बने सिलिगुड़ी से वापसी की ट्रेन थी. ऐसे में मैंने तय किया कि पहले गंगटोक ही जाऊंगा.
बारिश की बौछारें सिलिगुड़ी तक जारी थीं. बस से उतरकर हम स्टैंड पर पहुंचे तो पता चला कि सिक्किम की बस में टिकट नहीं है. विकिट्रेवल्स वालों की सलाह थी कि पहली प्राथमिकता बस को दें, बस नहीं मिले तो बाहर शेयरिंग वाली टैक्सियां मिल जायेंगी. उनके मुताबिक शेयरिंग टैक्सी का किराया 200 रुपये प्रति व्यक्ति होगा. मगर टैक्सी वाले 250 रुपये प्रति व्यक्ति मांग रहे थे. मैं सोच रहा था कि उन्हें विकिट्रेवल्स का रेफरेंस दूं या न दूं. बहरहाल आगे की पूरी सीट उन्होंने हमें छह सौ रुपये में दे दी, मैं, उपमा और तिया वहां बैठ गये. बाद में यह समझ आया कि जिसे हम फायदे का सौदा समझ रहे थे, वह उतना फायदेमंद नहीं था. मेरे दोनों पैर गियर के दोनों ओर फंसे थे. तिया आधे वक्त सीट पर बैठी औऱ आधे वक्त मेरी या उपमा की गोद में.
ड्राइवर, जो गंगटोक का ही रहने वाला था, उपमा के हिसाब से वह एक नंबर का लफंगा था. पूरे रास्ते में उसने ऐसे तमाम काम किये जो एक ड्राइवर को नहीं करने चाहिये थे. कई दफा उसने सिगरेट पीयी. फोन पर लंबी-लंबी बातें करता रहा. जब फोन बंद होता तो पीछे की सीट पर बैठी उसकी परिचित महिला चालू हो जाती... नेपाली भाषा में... जबकि सिलिगुड़ी से गंगटोक का पूरा रास्ता खतरों से भरा था. पूरे रास्ते में कहीं खाई वाले छोर की तरफ डिवाइडर नहीं था. उपमा सोच रही थी कि रास्ता रामगढ़-रांची टाइप का होगा, फोर लेन और खाई की तरफ बैरियर वाला. मगर यह रास्ता बमुश्किल टू-लेन था. सड़क कई जगह जर्जर थी. खाई की तरफ लगातार तीस्ता नदी बह रही थी. और हमारा ड्राइवर ओवरटेक करने में कुछ ज्यादा ही दिलचस्पी लेता था. एक बार तो उससे ऐसी चूक हुई कि गाड़ी गिरते-गिरते बची. मैंने उसे खुद देखा अपनी ही ऊंगली को अपने दांत से कांटते हुए... राम-राम करते-करते सफर पूरा हुआ और हम गंगटोक शहर पहुंचे.
ड्राइवर की बदतमीजियों और सीने की तेज धड़कनों के बावजूद यह सफर काफी दिलचस्प था. तकरीबन पूरा सफर तीस्ता नदी के साथ गुजरा. नदी में भरपूर पानी था, मगर पानी का रंग मटमैला था, संभवतः बारिश की वजह से ऐसा रहा होगा. पहाड़ों पर जब तेज बारिश होती है तो मिट्टी बहकर नदी के पानी में घुलने लगती है, इसी वजह से बारिश के दिनों में पहाड़ी नदियों के पानी का रंग मटमैला हो जाता है. यही पानी जब बह कर मैदानी इलाकों में पहुंचता है तो गांव के लोगों के लिए यह आसन्न बाढ़ का संकेत होता है. हमारी तरफ इसे गेरुआ पानी कहते हैं. रास्ते में तीस्ता नाम का एक कस्बा भी पड़ता है. सिलिगुड़ी से गंगटोक औऱ दार्जिलिंग की राह इस कस्बे तक एक ही है. तीस्ता से दोनों शहरों की राह अलग हो जाती है. सिक्किम राज्य में प्रवेश से पहले एक कस्बा आता है मेल्ली. यह कस्बा रिवर राफ्टिंग के लिए मशहूर है. हम जब वहां पहुंचे तो रिवर राफ्टिंग के कई बोट ट्रैक्टर की ट्रॉलियों पर पड़े थे. कुछ लड़के-लड़कियां छतरियां लिये पत्थरों पर बैठे थे, शायद बारिश खत्म होने का इंतजार कर रहे थे. हालांकि आगे जाने पर एक दो बोट जरूर पानी में नजर आया. रिवर राफ्टिंग के नाम पर उपमा ने पहले ही ना कह दी थी, मौसम ठीक रहता तो एक बार ट्राइ करने का मेरा इरादा जरूर था.
रेंगपो शहर के पास सिक्किम राज्य के प्रवेश द्वार ने हमारा स्वागत किया. वहां वाहनों की चेकिंग के लिए सिक्किम के सिपाही खड़े थे. दरअसल सिक्किम पूरी तरह हरित राज्य बनने की दिशा में अग्रसर है. पूरे राज्य में रासायनिक खाद का इस्तेमाल नहीं होता, धीरे-धीरे इंधन के नाम पर भी हरित होने की तैयारी है. रेंगपो को सिक्किम की व्यावसायिक राजधानी कहा जा सकता है. इस शहर के आसपास हाल के वर्षों में दर्जनों दवा कंपनियों ने आकार लिया है. हाइवे के किनारे आपको कुछ दवा कंपनियां नजर आ जायेंगी. मशहूर सिक्किम मणिपाल यूनिवर्सिटी भी इसी शहर में है. रास्ते से ही इस विवि की खूबसूरत लोकेशन नजर आती है. तात्पी नदी के किनारे बिल्कुल खाई में. विवि इतना भव्य है और इसकी लोकेशन इतनी शानदार है कि देखकर मन में आया कि नौकरी छोड़कर यहां आ जाऊं और दो साल का पीजी कोर्स कर लूं. सिक्किम में प्रवेश के साथ ही रास्ते की रंगत बदल जाती है. अब जहां-तहां सड़क के किनारे बैरियर नजर आते हैं. सड़क की गुणवत्ता भी बेहतर है. दरअसल सिक्किम पूर्वोत्तर का सबसे शांत राज्य है, लिहाजा पूर्वोत्तर राज्यों को औद्योगिक विकास में मिलने वाली रियायत का सबसे अधिक फायदा इसी राज्य को होता नजर आ रहा है. इस विकास ने सिक्किम की तसवीर बदल दी है. फरक लोगों की आर्थिक स्थिति और वहां के रिहायिशों पर साफ नजर आता है.
शाम पांच बजे जब गंगटोक पहुंचा तो बारिश थम गयी थी, मगर पूरे शहर में बादल रुई के फाहे की तरह टहल रहे थे. मैं तो एक दफा शिमला में ऐसा नजारा देख चुका था, मगर उपमा के लिए यह अविस्मरणीय अनुभव था. कार की खिड़की के बगल से बादल के फाहे निकल रहे थे, वह हाथ निकालकर बार-बार बादलों को छूने की कोशिश कर रही थी. हालांकि तिया को इन बातों में कोई मजा नहीं आ रहा था. वह हर पांच मिनट पर पूछ रही थी कि सात बजने में कितना समय बांकी है. क्योंकि इन दिनों उसे स्टार प्लस के धारावाहिक साथ निभाना साथिया देखने का चस्का लगा था. तिया को लग रहा था कि मम्मी-पापा के फालतू के इस चकल्लस में उसका पसंदीदा धारावाहिक मिस न हो जाये. वह इस धारावाहिक को शाम सात बजे भी देखती है और अगले दिन सुबह दस बजे उसका रिपीट शो भी देखती है. पूरे ट्रिप में वह प्राकृतिक नजारों को लेकर कमोबेस उदासीन ही रही, चुकि उसे वक्त का अंदाजा लगाना नहीं आता था सो बारह बजे दिन में भी पूछ बैठती, सात बजने में कितना टाइम बांकी है और इसके बाद पूछती दस बजने में कितना टाइम लगेगा.
होटल रेड रोज पहुंचकर मैंने महसूस किया कि ऑनलाइन टिकट बुक कराना तो ठीक है, मगर ऑनलाइन होटल बुक कराना फायदे का सौदा नहीं. एक तो होटल बस स्टैंड से दूर था, दूसरा अत्यंत साधारण किस्म का. जबकि किराया ठीक-ठाक वसूल कर लिया था क्लियर ट्रिप वालों ने. साथ ही कंडीशन यह भी थी कि अगर कैंसिल कराना हो तो एक महीने पहले करायें, वरना आधा पैसा काट लिया जायेगा वह भी महज सात दिन पहले तक. हमारे पास अब उसी घटिया होटल के तीसरे माले पर बने कमरे में रहने के सिवा कोई चारा नहीं था. एक ही खासियत थी कि कमरे की खिड़की से बाहर अच्छा व्यू नजर आता था. अगले दिन सुबह-सुबह उसी खिड़की से कुछ ऐसे नजारे दिखे कि लगा, पैसा वसूल हो गया.
होटल के मैनेजर ने पिछवाड़े का एक रास्ता दिखा दिया औऱ कहा कि इस गली की सीढियों से लगातार चढ़ने पर पहले लाल मार्केट और फिर एमजी रोड आ जायेगा. एमजी रोड गंगटोक का मॉल रोड है. शाम को वहां पर्यटक बैठकर बतियाते हैं औऱ आसपास के रेस्तरां में खाकर लौट जाते हैं. फ्रेश होकर औऱ हमने थोड़ा आराम किया औऱ चाय पी. पिछले लगभग 22 घंटे से हम सफर कर रहे थे. थोड़ा आराम तो चाहिये था. शाम सात बजे हम होटल मैनेजर के बताये रास्ते से एमजी रोड की तरफ चल पड़े. सीढियां चढ़ते-चढ़ते ऐसा लगा कि हम एमजी रोड नहीं बल्कि पारसनाथ मंदिर की सीढियां चढ़ रहे हैं. बारिश की वजह से सीढियां फिसलन भरी हो गयी थीं. संभल-संभल कर चलना पड़ रहा था. ये तो अच्छा था कि सीढियों के बगल से वाटर सप्लाई की पाइपें भी थीं. जिन्हें पकड़-पकड़ कर हम चढ़ रहे थे. लाल मार्केट पहुंचते-पहुंचते उपमा की सांसें उखड़ गयीं. उसने एमजी रोड जाने से साफ इनकार कर दिया. ये तो अच्छा था कि लाल मार्केट में जहां हम अपने आइडी का फोटो कॉपी करा रहे थे, उसके दुकानदार ने कहा कि अब रास्ता ज्यादा कठिन नहीं है. इसके अलावा लाल मार्केट से एमजी रोड जाने वाले रास्ते में सीढियों के किनारे-किनारे काफी दुकान थे. उपमा का फैसला बदलने के लिए यह तथ्य कारगर साबित हुआ. ये अलग बात है कि लाल मार्केट से एमजी रोड पहुंचते-पहुंचते मुझे पांच सौ रुपये का चूना लग चुका था. मैं पछता रहा था कि इससे बेहतर होटल से टैक्सी कर लेना ही सस्ता रहता...
गंगटोक का एमजी रोड किसी सूरत में शिमला के मॉल रोड जैसा नहीं है. यह एक आधा किमी लंबी सड़क है, जिस पर गाड़ियां बैन हैं. सड़क के बीचोबीच पर्यटकों के बैठने के लिए कुरसियां लगी हैं और दोनों किनारे में रेस्तरां, गिफ्ट इम्पोरियम और ट्रेवल एजेंट के शॉप हैं. अगला दिन हमने शोम्गो लेक और बाबा मंदिर के लिए तय कर रखा था, दोनों नाथुला दर्रे की राह में थे. इन दिनों नाथुला दर्रा बंद था, लिहाजा हमें शोम्गो लेक और बाबा मंदिर घूमकर लौट आना था. वहां जाने के लिए भी शेयर टैक्सियों का ऑप्शन है ऐसा विकी ट्रेवल्स ने जानकारी दी थी. हालांकि पहले दो-तीन ट्रेवल एजेंसियों ने साफ मना कर दिया और कहा कि खुद की टैक्सी लेना होगा और उसका किराया 36 सौ रुपये था. बहरहाल बाद में दो-तीन एजेंसियां ऐसी मिल गयीं जो शेयरिंग ऑप्सन की सुविधा दे रही थीं. एक हजार रुपये की हमें तीन सीटें मिलीं. यह टैक्सी सुबह नौ बजे खुलने वाली थीं, सो हमने एक और टैक्सी सुबह शहर के आसपास घूमने के लिए कर ली. 5 सौ रुपये में वह हमें गणेश टोक और ताशी व्यू प्वाइंट घुमाकर वापस नाथुला वाले टैक्सी स्टैंड पर छोड़ देने वाला था. एमजी रोड का खाना महंगा था, सो हमने तय किया कि अपने होटल में ही खा लेंगे. लिहाजा टूर की बुकिंग करके हम लौट गये, इस बार हमनें लाल मार्केट से सड़क रास्ता चुना. (दूसरी किस्त में शोम्गो लेक और बाबा मंदिर के यात्रा की कहानी)
पहली तसवीर में तीस्ता नदी के किनारे सिक्किम मणिपाल विश्वविद्यालय. दूसरी, तीसरी और चौथी तसवीर में सिक्किम जाने के पूरे रास्ते में सड़क किनारे बहती तीस्ता नदी है.
अगली किस्त

Thursday, June 05, 2014

आस्था नहीं, विज्ञान की भेट चढीं हैं नदियां


पर्यावरण दिवस के मौके पर
पिछले दिनों जनसत्ता के संपादक ओम थानवी जी ने फेसबुक पर गंगा की सफाई को लेकर एक अलग किस्म की बहस की शुरुआत की थी. उनका कहना था कि गंगा में जिस तरह श्रद्धालु नैवेद्य चढ़ाते हैं और हिंदू जिस तरह उसके किनारे शवधान करते हैं यह भी गंगा के प्रदूषण का बड़ा कारण है. इससे पहले भी इस तरह की बहसें होती रही हैं और हमारे एक साथी ने आस्था के कारण प्रदूषित होती नदियों को लेकर एक अभियान ही शुरू किया था. पिछले साल मैंने फेसबुक पर एक तसवीर देखी थी कि एक जगह मूर्तियों को दफन करने की परंपरा शुरू की गयी है, ताकि नदियों को प्रदूषण से बचाया जा सके. आम बौद्धिकों को भी यह सहज स्वाभाविक लगता है कि नदियों इन्हीं धार्मिक और लोक परंपराओं की वजह से लगातार मरणासन्न हो रही हैं. अगर नदियों को बचाना है तो इन परंपराओं को रोकना होगा. मगर ऐसे लोग यह सवाल खुद से नहीं पूछते कि ये परंपराएं तो हजारों सालों से चली आ रही हैं, हजारो सालों से हिंदुओं के लिए अंतिम संस्कार का सबसे प्रिय स्थल नदियों का तट ही रहा है और मूर्तियों व निर्माल्य का विसजर्न भी नदियों में ही किया जाता रहा है. मगर नदियां तब तो नहीं मरीं. वे पिछली शताब्दि के दौरान मरणासन्न होने लगीं जब इन नदियों के तट पर बसे शहरों ने औद्योगिक और घरेलू कचरा इन नदियों को समर्पण करना शुरू किया. इससे भी अधिक तब जब हमारे विज्ञान ने इन नदियों पर बड़े बांधों और तटबंधों का निर्माण शुरू किया. दरअसल हमारी नदियां हमारी आस्था की भेट नहीं चढ़ी हैं, उन्हें आधुनिक विज्ञान ने सूली पर चढ़ाया है. इसके बावजूद अगर हम इलजाम आस्था को ही देते रहेंगे तो यह सिर्फ मुद्दों को भटकाना होगा.
अगर सच पूछा जाये तो नदियों को सबसे अधिक नुकसान किसी चीज से हुआ है तो वे हैं बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई और विद्युत परियोजनाएं. इन परियोजनाओं की शुरुआत आजादी के बाद हुईं. देश के पहले प्रधानमंत्री नेहरू का प्रिय वाक्य था, बड़े बांध देश के मंदिर हैं. उस वक्त भाखड़ा नांगल परियोजना का जलवा था, जिसने पंजाब में नहरों का जाल बिछाकर उस राज्य को खेती में शीर्ष पर पहुंचा दिया था और उससे उत्पादित बिजली से देश के शहर रोशन हो रहे थे. नेहरू उस मॉडल को पूरे देश में लागू करना चाहते थे. आज जब हम उस मॉडल का नतीजा देखते हैं तो पाते हैं कि भाखड़ा नांगल और इंदिरा सरोवर परियोजना को छोड़ दिया तो देश में शायद ही कोई ऐसी सिंचाई परियोजना हो जिसका लाभ किसानों को ठीक से मिल पाया हो. कई परियोजनाएं जो उस दौर में शुरू हुई थीं, वे आज तक पूरी नहीं हो पा रही हैं. उन परियोजनाओं में हर साल हजारो करोड़ झोंके जा रहे हैं, बेवजह. फरक्का परियोजना उनमें से ही एक परियोजना है, जिसने बिहार-झारखंड और बंगाल को सस्ती बिजली को उपलब्ध करा दी, मगर उससे सिंचाई का लाभ नहीं के बराबर मिला, साइड इफेक्ट के तौर पर गंगा कब्जियत का शिकार हो गयी. विशेषज्ञ बताते हैं कि उस परियोजना का गुप्त मकसद हुगली नदी के सिल्ट की सफाई थी, ताकि डायमंड हार्बर पोर्ट से आने वाले जहाज हुगली में फंसे नहीं और सीधे कोलकाता पहुंच सकें. वह मकसद कमोबेस आज भी पूरा हो रहा है. मगर उस परियोजना का असर गंगा पर बहुत ज्यादा हुआ. गंगा पहाड़ों से जो सिल्ट अपने साथ लेकर बहती थी वह उस परियोजना की वजह से चलायमान नहीं रह सका. जो सिल्ट कभी सुंदरवन डेल्टा के किनारे जमा होता था, वह अब गंगा के बेड में ही जमा होने लगा और इसकी वजह से गंगा का बेड उथला हो गया और नदी की चाल अस्वभाविक होकर रह गयी. मगर अभियंताओं का मन इस प्रयोग से नहीं भरा. उन्होंने एक और बांध टिहरी पर बना दिया. यह कुछ ऐसा ही था कि किसी व्यक्ति का पहले मलद्वार बंद कर दिया जाये फिर गले को जाम कर दिया जाये. इससे बावजूद अगर गंगा में पानी है तो बस अपनी सहायक नदियों की वजह से जो पूर्वी उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार के हर कोने में गंगा में अपनी जलराशि समर्पित करती रही हैं.
यही हाल देश की दूसरी नदियों के साथ हो रहा है. नर्मदा और महानदी में तो पग-पग पर बांध बनाये जा रहे हैं. उत्तर बिहार की नदियों, कोसी, बागमती, गंडक, कमला आदि को बराज और तटबंधों के जरिये खत्म किया जा रहा है. अब नदी जोड़ो परियोजना का एक नया शिगूफा है. दरअसल सच्चई यह है कि नदियों को अगर जिंदा रखना है तो उसकी पहली शर्त है उसके धारा से छेड़छाड़ कम से कम किया जाये. न बांध बनें, न बैराज, न तटबंध. उन्हें स्वभाविक रूप से बहने दिया जाये. मगर हमारे देश और राज्यों में बने जल संसाधन विभाग का एकमात्र मकसद इन नदियों के बहाव के साथ तरह-तरह के प्रयोग करना है. सच्चई यह है कि कम से कम पूर्वी भारत में जितनी नहरें बनी हैं वे सब अपेक्षा का दस फीसदी सिंचाई भी उपलब्ध नहीं करा पातीं और अब यह स्वीकृत तथ्य है कि तालाब और कुओं से बेहतर सिंचाई के साधन दूसरे नहीं हैं. इसलिए कम से कम सिंचाई के नाम पर नदियों से छेड़छाड़ न हो और जलविद्युत का लालच भी न रखा जाये. बिजली उत्पादन के दूसरे कई साधन हैं उनका सहारा लिया जाये. नदी जोड़ो परियोजना से भी कुछ हासिल नहीं होने वाला है, सिवा ठेकेदारों और अभियंताओं के आर्थिक हित सधने के. बरसात को छोड़ दिया जाये तो दूसरे किसी मौसम में देश के किसी नदी के पास इतना पानी नहीं है कि वह दूसरी नदी को उधार दे सके और बरसात में हर नदी के पास पर्याप्त जलराशि होती है.
हां, बरसात में नदियों में आने वाले अतिरिक्त जलराशि को अगर संग्रहित करने का कोई उपाय हो तो वह बेहतर नतीजा दे सकता है.
नदियों को दूसरा सबसे अधिक नुकसान औद्योगिक और घरेलू कचरे से हो रहा है. सबसे पहले तो यह सोच ही गलत है कि कचरा नदी में डाला जाये. आज तक इस सोच पर लगाम नहीं लगी है. नदियों के किनारे बने जलशोधन संयंत्र इसके उदाहरण हैं, जो यह मानते हैं कि शहरों का गंदा पानी साफ कर नदी में डाला जा सकता है. आखिर क्यों, नदियों को किसी तरह के कचरे या पानी की कतई जरूरत नहीं है. नदियों को ग्लैसियर और उसकी सहायक नदियों से खूब जलराशि मिलती हैं और बरसात में वैसे भी पानी बहकर नदियों में पहुंचता ही है. इसलिए नदियों के किनारे बसे तमाम औद्योगिक इकाइयों को जगह खाली कर कहीं और चले जाने कहा जाये और शहर की सीवेज नालियों की दिशा किसी और तरफ मोड़ दी जाये, तभी नदियां बच सकती हैं. मगर राजनीतिक इच्छाशक्ति के बगैर यह मुमकिन नहीं. इतने दिनों से गंगा को लेकर हाय-तौबा मचने के बावजूद कानपुर का औद्योगिक कचरा गंगा में मिलने से नहीं रोका जा सका है. कहते हैं इसकी वजह वोट बैंक पॉलिटिक्स है. झारखंड की तमाम नदियां औद्योगिक प्रदूषण की शिकार हैं. देश के तमाम ताप और विद्युत संयंत्र नदियों के किनारे ठिकाना ढूंढते हैं. उन्हें इससे रोकना होगा और उन्हें पहले झील बनाकर उसमें बरसाती पानी इकट्ठा करना चाहिये तब विद्युत संयंत्र स्थापित करना चाहिये. सरकार को भी इस संबंध में कड़ाई से काम लेना होगा.
शहर का गंदा पानी क्यों नदी में डाला जाये. मैंने कई शहरों में देखा है कि गंदे पानी को जमाकर झीलनुमा शक्ल दिया गया है और उन्हें पर्यटन का केंद्र बना दिया गया है. नदियों के किनारे बसे शहरों को भी इस मॉडल को अपनाना चाहिये, इसके बदले जल शोधन संयंत्रों में करोड़ों का खर्च करना बेकार है.
ऊपर जिन मसलों को उठाया गया है, उससे यह स्पष्ट है कि नदियों को दूषित और मृतप्राय बनाने में हमारे विज्ञान और विकासवादी सोच का बड़ा हाथ है. हां, आस्थावान लोगों से भी चूक होती है, जैसे वे निर्माल्य पॉलिथीन में फेंकते हैं, नदियों में साबुन लगाकर नहाते हैं, कैमिकल रंगों के बनी मूर्तियों का विसजर्न करते हैं. इन तमाम वजहों से नदियां प्रदूषित तो होती हैं, भले ही वह औद्योगिक प्रदूषण के मुकाबले नगण्य हो फिर भी, इन पर रोक लगनी चाहिये. इस संबंध में संत समुदाय को भी जागृति फैलानी चाहिये. इस देश में नदी को स्वच्छ बनाने का एक अनूठा प्रयोग संत सीचेवाल ने किया है. वह प्रयोग साबित करता है कि नदियों को आस्थावान लोग ही बचा सकते हैं, खास तौर पर वैसा समुदाय जो सदियों से नदियों के साथ स्नेहपूर्ण संबंध निभा रहा है.

Wednesday, June 04, 2014

कश्मीर का दिल चाहिए तो 370 को मत छेड़िए - महबूबा मुफ्ती


पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती काफी संवेदनशील राजनेता मानी जाती हैं और कश्मीर के लोगों के लिए हमेशा सक्रिय रहती हैं. युवाओं के बीच भी उनकी अच्छी-खासी लोकप्रियता है. वे कश्मीर में अमन-चैन का माहौल बनाने और अलगाववादियों को राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल करने की पक्षधर रही हैं. हाल में जब नयी सरकार ने शपथग्रहण के मौके पर सार्क देशों के साथ-साथ पाकिस्तान के राष्ट्रपति नवाज शरीफ को भी आमंत्रित किया तो उन्होंने खुले दिल से इसका स्वागत किया. मगर जब नयी सरकार के एक मंत्री ने धारा 370 के खिलाफ बयान दिया तो उनका उखड़ जाना स्वभाविक था. नयी सरकार के इन दोनों कदमों के मसले पर मैंने उनसे टेलीफोन पर लंबी बातचीत की है, पेश है उस बातचीत का ब्योरा.
पिछले दिनों नयी सरकार के दो रुख सामने आये, पहला मोदी के शपथ ग्रहण के मौके पर पाकिस्तान के हुक्मरान समेत सार्क देशों के प्रतिनिधियों को भारत बुलाना, दूसरा सरकार के बनते ही एक राज्य मंत्री का धारा 370 के खिलाफ बयान देना. जहां पहले कदम पर कश्मीर के आवाम में उत्साह का माहौल नजर आया, वहीं दूसरे कदम से वहां से बड़ी तीखी प्रतिक्रियाएं आयीं. इन दोनों कदमों के आधार पर आप नयी सरकार का कैसा आकलन करती हैं?
370 के खिलाफ जो स्टेटमेंट है वह बिल्कुल कंडेम्नेबल है. एक तरफ दोस्ती और विश्वास बहाली की बात और दूसरी तरफ दिल तोड़ने वाली बातें. दोनों चीजें अजीबोगरीब लग रही हैं. आप लोगों को बेवकूफ नहीं बना सकते. क्योंकि बीजेपी समेत देश के सभी पढ़े-लिखे लोग जानते हैं कि धारा 370 को बदला नहीं जा सकता. इसे खत्म नहीं किया जा सकता. चुनाव तक तो ठीक था, चुनाव के बाद इस तरह के बयान बिल्कुल नहीं आने चाहिये थे. खुद पीएम को इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिये और स्टेट मिनिस्टर को जिनके जरिये यह बात सामने आयी है, रोकना चाहिये. नहीं तो जम्मू-कश्मीर के लोग पहले से ही खौफजदा हैं, ऐसे में उनकी दिल में भरोसा और भी कम होगा.
नवाज शरीफ को भारत बुलाने के कदम को आप किस नजर से देखती हैं?
यह बढ़िया कदम था और मैंने इसकी तारीफ भी की है. जहां हमारे पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे मुल्कों से साथ बेहतर संबंध नहीं हैं, ऐसे में उन्हें शपथ ग्रहण के मौके पर बुला कर नयी सरकार ने अच्छा मैसेज दिया है. खास तौर पर अगर पाकिस्तान के साथ बेहतर रिश्ते होते हैं तो इसका पॉजिटिव असर कश्मीर के मसलों पर भी पड़ेगा. हालांकि अभी यह शुरुआत ही है, सरकार इस शुरुआत को कहां तक ले जाती है इसे देखना होगा. यह सिर्फ हेंडशेक तक सीमित न रह जाये. बातें आगे भी बढ़े. अभी इस बारे में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी.
आपके हिसाब से इस मसले पर नयी सरकार को क्या कदम उठाने चाहिये?
कई चीजें करनी चाहिये. बातचीत के साथ रास्ते भी खुलें. आवाजाही हो, लोग एक दूसरे के साथ व्यापार कर सकें. रिश्तेदारियां कर सकें. संवाद हो. इसके अलावा कश्मीर के सेपरेटिस्ट के साथ बातचीत हो उन्हें डेमोक्रेटिक प्रोसेस में लाया जा सके. उनके साथ विश्वास बहाली हो. साथ में सियाचिन और सरक्रीक के मसले पर भी बातचीत हो और उसका समाधान निकाला जा सके.
ऐसा देखा गया है कि एनडीए की सरकारों के साथ आपकी पार्टी का तालमेल बेहतर रहा है.
नहीं मेरा यूपीए सरकार के साथ भी बेहतर तालमेल रहा है.
सामान्य राय यह है कि भाजपा पाकिस्तान विरोधी है, कश्मीर को लेकर उसका अलग ही रुख है. मगर जब भाजपा सरकार में आती है तो उसका अलग ही चेहरा सामने आता है.
इस नयी सरकार के बारे में तो मैं कुछ नहीं कह सकती, मगर वाजपेयी जी की सरकार को लेकर अनुभव अच्छे रहे हैं. उन्होंने पाकिस्तान से दोस्ती की हर संभव कोशिशें की थीं. यह पहली बार था कि एक प्रधानमंत्री बस पर बैठकर पाकिस्तान गया था. बाद में करगिल हो गया, मगर फिर भी उन्होंने जनरल मुशर्रफ को इंडिया बुलाया. कश्मीर में सीज फायर करवाया. वाजपेयी जी के इनिशियेटिव्स काफी अच्छे थे. मगर नयी सरकार के बारे में कुछ कह नहीं सकते. लोगों को पहले से शक था कि ये ऐसा करेंगे, अब इनके इस 370 वाले बयान ने कश्मीर के लोगों का दिल तोड़ दिया.
370 पर कई तरह की बातें होती हैं, कोई इसे खत्म करने की बात करता है तो कोई इसमें बदलाव की बात करता है. यह भी कहा जाता है कि कश्मीर की महिलाओं को यह बराबरी का हक नहीं देता..
370 खत्म करने की तो बात ही नहीं होनी चाहिये. अगर कश्मीर का दिल जीतना है तो यह सोचना होगा कि 370 को कैसे मजबूत किया जाये. पिछले दिनों गुपचुप तरीके से इसे कमजोर करने का ही काम किया गया है. उसे दुरुस्त करना जरूरी है. कश्मीर फिजिकली तो हिंदुस्तान के साथ है, अगर कश्मीरियों का दिल भी जीतना है तो 370 को मजबूत करना होगा, कमजोर नहीं. और जहां तक महिलाओं की बात है, यहां की महिलाएं मौजूदा प्रावधान से संतुष्ट हैं. इस मसले पर किसी बाहरी नेता को सलाह या सुझाव देने की जरूरत नहीं है.
उमर अब्दुल्ला ने कहा है कि 370 खत्म हुआ तो कश्मीर भारत से अलग हो जायेगा..
उन्होंने क्या कहा यह मैं नहीं जानती. मगर मेरे हिसाब से 370 ही वह पुल है जो कश्मीर को हिंदुस्तान से जोड़ता है. महाराजा हरि सिंह ने जो विलय किया था उसमें 370 ही बड़ा आधार बना था. अगर इस पुल को आप तोड़ने या कमजोर करने की कोशिश करेंगे तो जाहिर है कश्मीर आपकी पहुंच से दूर जायेगा. और इसके जिम्मेदार वे लोग होंगे, जो 370 को कमजोर करने या खत्म करने की कोशिश करेंगे.
(प्रभात खबर पॉलिटिक्स के ताजा अंक में प्रकाशित)