Friday, August 22, 2014

इतना पानी है तो बैंक में क्यों नहीं जमा करते


इन दिनों गांव बाढ़ से परेशान हैं और शहर जल जमाव से, महज कुछ महीने पहले तक शहर औऱ गांव के लोग पानी की एक बूंद के लिए तरस रहे थे.
इन दिनों उत्तराखंड से असम तक नेपाल की तराई वाला लगभग पूरा उत्तर भारतीय इलाका बाढ़ के पानी में ऊब-डूब कर रहा है. हिमालय में हुई तेज बारिश की वजह से वहां से निकलने वाली तमाम नदियों में भरपूर पानी है. इस सैलाब ने जगह-जगह नदियों के किनारे बनी मिट्टी की उन दीवारों को तोड़ दिया है जिन्हें राज्यों के जल संसाधन विभाग के अभियंता तटबंध के नाम से पुकारते हैं. और टूटे दरारों से निकले पानी के तेज बहाव से सामने के गांव भंस रहे हैं. तकरीबन वैसी ही हालत उत्तर भारतीय शहरों की है. पटना समेत कई शहरों में नाव चलने की नौबत आ गयी है, निचले इलाकों में पानी बेडरूम तक पहुंच गया है और शहर के बाशिंदे फुलपैंट का पांयचा चढ़ाकर सड़कों पर जिम्नास्टिक का खेल दिखा रहे हैं. इस सामूहिक अव्यवस्था को हमारे टीवी चैनलों ने जल प्रलय का नाम दिया है. यह दीगर बात है कि इस प्रलय में हर पुरुष मनु और हर स्त्री श्रद्धा है.
तसवीरों और विजुअल्स को देखकर हमारा द्रवित होना स्वभाविक है. मगर जब बाढ़ को प्रलय के नाम से पुकारा जाता है तो मन एकबारगी मानने को तैयार नहीं होता. बारिश के मौसम में नदियों में बढ़ आया पानी क्योंकर हमारे लिए दैत्य सरीखा हो गया है, जबकि महज चार माह पहले इन्हीं नदियों में पानी के लिए हम तरसते रहते हैं. महज चार माह बाद जब रबी का मौसम शुरू होगा तो यही किसान पानी के लिए मारे-मारे फिरेंगे जो आज खेतों में लबालब पानी देखकर टसुए बहा रहे हैं. वही शहरी जो पायचें चढ़ाकर सरकार को कोस रहा है, अप्रैल-मई में ट्यूबवेल सूख जाने पर झख मारेगा है और बगैर नहाये दफ्तर जाने के लिए विवश हो जायेगा. वह पानी जो चंद माह पहले आपके लिए अमृत होता है, क्योंकि कम होता है. वह चंद माह बाद जहर क्यों हो जाता है, जब वह अधिक होता है. यह ठीक है कि आप महीने के आखिरी दिनों में पैसों की कमी का रोना रोते हैं, मगर ऐसा तो कभी नहीं सुना कि महीने के शुरुआत में कोई पैसे अधिक होने का रोना रोये. ऐसा क्यों है कि इस दुनिया में पैसों का बैंक है, खून का बैंक है, अनाज का बैंक है, बिजली बैंक करने के तरीके हैं, सूरज की रोशनी की भी बैंकिंग कर सकते हैं, मगर बारिश के दिनों में आये इस सैलाब की बैंकिग नहीं कर सकते.
आखिर यह सैलाब आपके लिए लाता क्या है, पानी और गाद. आपको यह जानकर हैरत होगी कि कोसी तटबंध के बीच बसे लाखों किसान जो इस बार बाढ़ की वजह से तटबंधों पर आ बसे हैं, पिछले तीन साल से बाढ़ नहीं आने की वजह से उदास थे. बाढ़ उनके लिए परेशानी जरूर लाता है, मगर उसके साथ रिटर्न गिफ्ट भी होते हैं. जब पानी उतरता है तो खेतों में उपजाऊ मिट्टी की परत छोड़ जाता है. उस जमीन पर खेती करने के लिए भी खाद की जरूरत नहीं होती. बीज छीट देने पर भी सोना उगता है. किसान दो सीजन का लाभ एक सीजन में कमा लेते हैं. इसलिए जिस साल पानी नहीं आता तटबंधों के अंगर बसे किसान उदास हो जाते है, कहते हैं इसबार खेती गड़बड़ा जायेगी. यह कोई नयी और अजूबा बात नहीं है. इस देश में जब नदियां मिट्टी की दीवारों में कैद नहीं हुआ करती थीं तो नदी किनारे बसे किसान इसी तरह बाढ़ का इंतजार करते थे. तब एक हफ्ते की बाढ़ आती थी, घरों में भी चार दिन पानी घुसता था. लोग यह समय किसी तरह काट लेते थे, इस उम्मीद में कि खेती बंपर होगी. हालांकि बाढ़ के बाद महामारी का मौसम आता था जो खतरनाक होता था, मगर नये जमाने में डीडीटी ने महामारियों की संभावना पर भी विराम लगा दिया है.
यह सच है कि हाल के वर्षों में बाढ़ विभीषिका का रूप लेने लगी है. अब पानी पहले की तरह किनारों पर पसरता नहीं बल्कि तटबंध तोड़कर वाटर कैनन की तरह तबाही मचाता है. जब तटबंध नहीं थे तो सैलाब का पानी नदियों के किनारों पर धीरे-धीरे पसरता था और आसपास के गांवों में घुसते हुए फैलता था. कभी एक झटके में पानी का फ्लो नहीं आता था. मगर तटबंधों ने सैलाब को वाटर बम बना दिया है. बाढ़ आता है तो पानी तटबंधों के बीच उबलता रहता है औऱ किसी कमजोर बिंदू पर नदी तटबंध को तोड़कर बाहर निकल आती है. नतीजा यह होता है कि तेज बहाव सामने आने वाली हर चीज को तहस-नहस कर जाता है. इस तरह से देखा जाये तो तटबंध जो बाढ़ नियंत्रण के नाम पर बनते हैं, वे बाढ़ की विभीषिका को और बढ़ा देते हैं. हालांकि इनके जरिये बाढ़ का नियंत्रण कितना हो पाता है, यह भी सवालों के घेरे में है.
कोसी औऱ बागमती नदी पर शोधपरक काम करने वाले दिनेश मिश्र मानते हैं कि तटबंधों ने बाढ़ की संभावनाओं को घटाने के बदले बढ़ाया है. वे कोसी तटबंधों का आंकड़ा देते हुए कहते हैं कि तटबंध बनने के बाद बाढ़ पीड़ित इलाकों की संख्या में बढोतरी हुई है. अब यह लगभग मान लिया गया है कि तटबंध प्रणाली बाढ़ से सुरक्षा कर पाने में सक्षम नहीं है. मगर हर राज्य का जलसंसाधन विभाग इन तटबंधों को बचाकर रखना चाहता है, ताकि इन्हें मानसून के मौसम में सुरक्षा देने के नाम पर अरबों का वारा-न्यारा आसानी से होता रहता है. फिर जब तटबंध टूटता है और सैलाब आता है तो रिले बैटल आपदा प्रबंधन विभाग के पास चली जाती है, वह नये सिरे से अरबों का वारा-न्यारा करता है. इस तरह उत्तर भारत के इन इलाकों में बाढ़ एक उद्योग का रूप ले चुकी है. यह राजनेताओं, मंत्रियों, अफसरों, समाज सेवियों और अभियंताओं सब को सूट करती है.
जब भी तटबंध को लेकर सवाल खड़े किये जाते हैं तो इसे अव्यावहारिक करार दिया जाता है. मगर लोग यह भूल जाते हैं कि इन तटबंधों के बीच भी करोड़ों की आबादी गुजर-बसर कर रही है. तटबंध नहीं टूटे तब भी उन्हें हर साल सैलाब झेलना पड़ता है, हां जब तटबंध टूट जाते हैं तो उनको राहत मिल जाती है. प्रेसर तटबंध के बाहर निकल जाता है. तटबंधों और बराजों ने एक और समस्या खड़ी की है. कब्जियत की. इनकी वजह से नदी कब्ज का शिकार हो रही हैं. गाद बाहर नहीं निकल पाता और नदी का पेट फूलता रहता है. यह ठीक उसी तरह है जैसे मनुष्य की शिराओं में वसा की परतें जम जाती हैं और वह ब्लड प्रेसर का शिकार हो जाता है. उसी तरह नदियां भी अलग तरह के प्रेसर का शिकार हैं. तटबंधों में फंसी और गाद से भरी. लिहाजा थोड़ा पानी भी बढ़ता है तो सैलाब का रूप ले लेता है और फिर वह प्रेसर कुछ न कुछ तोड़ फोड़ तो करता ही है. अगर नदियों पर बराज न बने, तटबंध न हों तो यह गाद खुद-ब-खुद खेतों में फैल जाये और नदियां फिर से गहरी हो जायें. फिर न कभी जल सैलाब आयेगा, न तबाही होगी. मगर...
वही कहानी शहरों की है. बारिश के पानी के निकासी के लिए हमने नालियां बनायी हैं, जिन्हें फिर से उन्हीं नदियों में गिरना है जो पहले ही लबालब हैं. हम इतने सुव्यवस्थित नहीं हुए हैं कि हमारी नालियां मानसून से पहले प्रवाहमयी हो जायें. हमारे शहरों में नालियां शायद ही बहती हैं. मैंने आजतक किसी शहरी नालियों को बहते हुए नहीं देखा है. ये आम तौर पर कचरों से भरी होती हैं. छठे-छमाही जब इन्हें साफ किया जाता है तो भी इनमें प्रवाह नहीं दिखता. मेरे मन में दो सवाल आते हैं. पहला नालियों में कचरा कहां से आता है, दूसरा नालियां बहती क्यों नहीं है. हालांकि जब भी शहर में पानी का जमाव हो जाता है तो हम सब लोग नालियों की सफाई का मसला उठाकर नगर निकाय व्यवस्था पर हमलावर हो जाते हैं. जब नालियों का निर्माण जल निकासी के लिए हुआ तो उसमें कचरा कहां से आता है. इसकी वजह है कि हमारे शहरों में कचरा निस्तारण की बेहतर व्यवस्था नहीं है. सवाल यह भी है कि आखिर नालियां नदियों में ही क्यों गिरती है. ड्रेनेज को कितना भी साफ क्यों न कर लिया जाये इसे नदियों में क्यों गिराया जाये. इन तमाम सवालों के जरिये मैं मानता हूं कि हमारे शहर में नालियों की प्रणाली ठीक नहीं है. जो नालियां बहती नहीं है, हमेशा जाम रहती हैं और जिनका काम शहर की गंदगी को नदियों तक ले जाना है उसकी हमें क्या जरूरत है.
मुझे लगता है शहरों में ड्रेनेज के निष्पादन के लिए कोई दूसरी व्यवस्था होनी चाहिये. जिन शहरों के किनारे नदियां नहीं होती वे क्या करते हैं. मैंने कई शहरों में देखा है तालाब बनाकर गंदे पानी को जमा करते हैं फिर उसे खूबसूरत रूप देकर टूरिस्ट प्वाइंट की शक्ल दे देते हैं. हैदराबाद का टैंक बंड और भोपाल का शाहपुरा लेक इसी तरह बना है. अगर हर बड़े मुहल्ले में इस तरह के छोटे-छोटे तालाब हों तो नालियां आसानी से पानी वहां तक पहुंचा पायेंगी. मगर इसके लिए हर मुहल्ले में तालाब होने चाहिये. शहरों में बिल्डरों की गिद्ध दृष्टि हर खाली जमीन पर होती है. जो तालाब थे वे भर डाले गये और उन पर अपार्टमेंट खड़े हो गये, फिर शहरों में तालाब कहां से मिले. मगर अगर शहरों को सर्वाइव करना है तो उन्हें अपार्टमेंट से अधिक तालाबों की जरूरत होगी. वाटर सप्लाई के लिए भी और ड्रेनेज के लिए भी. वरना हमारे शहर महज कुछ सालों में रहने लायक नहीं रहेंगे. गरमियों में पानी बिकेगा और बरसात में नावें चलेंगी. पटना में भवनों का नक्शा पास करने के लिए वाटर हार्वेस्टिंग का प्रावधान अनिवार्य कर दिया गया है. यह अच्छा कदम है. इस तरह के कदम हर शहर में उठाने की जरूरत है.

Monday, August 18, 2014

छह साल बीते मगर जख्म हरे के हरे


2008 की कोसी जल प्रलय की छठी बरसी आज
- पीड़ित 2.36 लाख, बने सिर्फ 27 हजार मकान. - 37 में से एक ही ग्रामीण सड़क हुई बनकर तैयार. - अभी भी नहीं बन पाये 70 में से 34 पुल-पुलिया. - विश्व बैंक ने घटाया योजना का लक्ष्य. - हजारों एकड़ खेतों में आज भी जमा है बालू. - नौ हजार करोड़ की है पुनर्वास की योजना.
मधेपुरा के शंकरपुर प्रखंड स्थित मधेली नहर के पास बिरेन यादव का ध्वस्त मकान आज भी उसी हालत में है, जैसा 2008 में कोसी नदी की धारा ने उसे छोड़ा था. वे पिछले छह सालों से प्रखंड मुख्यालय की दौड़ लगा रहे हैं कि उनके ध्वस्त मकान का मुआवजा मिल सके और वे अपने खस्ताहाल मकान को ठीक-ठाक करा सकें. इस बीच 2011 से कोसी के इलाके में विश्व बैंक समर्थित नौ हजार करोड़ वाली पुनर्वास योजना भी शुरू हो चुकी है. मगर बिरेन यादव जैसे हजारों लोग कोसी की उस भीषण आपदा के छह साल बाद भी एक अदद मकान के लिए तरस रहे हैं. इस काम को अंजाम देने में जुटी बिहार आपदा पुनर्वास एवं पुनर्निर्माण सोसाइटी अब तक कोसी के इलाके में महज 27 हजार लोगों को घर उपलब्ध करा पायी है, जबकि खुद सरकार ने कभी माना था कि 2008 की भीषण बाढ़ में 2,36,632 मकान क्षतिग्रस्त हुए थे. तसवीर बदल देने के वायदों के बावजूद कोसी आज भी उजड़ी की उजड़ी है. खेतों में बालू भरे हैं और लोग पलायन को मजबूर हैं.
2008 के बाढ़ पीड़ित इलाकों में पुनर्वास के तहत बन रहे मकानों की हालत बहुत बुरी है. 2011 में शुरू हुए कई मकान अब तक लिंटर से ऊपर नहीं जा पाये हैं. अधबने मकानों पर झाड़ियां और लताओं ने डेरा बना लिया है. ऐसे ही एक लाभुक रायभीड़ पंचायत के अरताहा गांव के जनार्दन ठाकुर कहते हैं, क्या करें पुनर्वास के तहत जितना पैसा मिला था उससे मकान बना पाना संभव नहीं है. जो पैसा मिला है वह इंदिरा आवास से भी कम है. इसमें मकान, शौचालय और सोलर लाइट तक लगवाना है, सब नक्शा के मुताबिक. इस बीच बालू, सीमेंट और छड़ का दाम दुगुना-तिगुना हो गया है. जिनके पास पैसा है वे लोग अपना पैसा लगाकर किसी तरह मकान पूरा कर रहे हैं, हम गरीब लोग के पास इसमें लगाने के लिए पैसा कहां है.
इधर पुनर्वास सोसाइटी के अधिकारी भी काम की गति कम होने की बात स्वीकार करते हैं. वे बताते हैं कि अब तक सिर्फ 27,203 मकान ही बन पाये हैं. हैरत अंगेज बात तो यह है कि उन्होंने लक्ष्य ही 66,203 लोगों को मकान देने तक सीमित कर लिया है, जो पहले एक लाख का था. संभवतः काम की रफ्तर देखकर विश्व बैंक ने लक्ष्य में संशोधन किया है. विश्व बैंक के पर्यवेक्षक भी कई बार धीमी रफ्तार की शिकायत कर चुके हैं. अधिकारी बताते हैं कि ग्रामीण सड़क निर्माण की 37 योजनाओं में से महज एक ही पूरी हुई है और 70 में से महज 36 पुल ही बनाये जा सके हैं. ऐसी जानकारी है कि स्थानीय स्तर पर ठेकेदार जानबूझकर काम को लटका रहे हैं और सोसाइटी उन पर समुचित दबाव नहीं बना पा रही. विडंबना तो यह है कि खेतों से बालू निकालने के काम को 2016 तक के लिए टाल दिया गया है. अधिकारी कहते हैं यह काम दूसरे फेज में होना है. जबकि सुपौल जिले के कई गांवों में खेतों में बालू भरे हैं. आरटीआई एक्टिविस्ट महेंद्र यादव की आरटीआई के जवाब में सरकार ने स्वीकार किया था कि 14,129.70 एकड़ जमीन पर बालू जमा है. कई खेतों में 2 से 4 फीट बालू है. सरकार ने किसानों को खेतों से बालू हटाने के लिए चार से पांच हजार रुपये प्रति एकड़ की राशि दी थी, मगर किसानों का कहना है कि एक एकड़ जमीन से बालू हटाने का खर्च 50 हजार रुपये प्रति एकड़ से कम नहीं है. और उनके सामने सबसे बड़ा सवाल था कि इस बालू को हटाकर रखें कहां. ऐसे में लोगों की खेती ठप पड़ गयी है और लोगों को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ रहा है.
कोसी के पुनर्वास के लिए विश्व बैंक की योजना
विश्व बैंक ने कोसी के पुनर्वास के लिए 1009 मिलियन डॉलर की राशि स्वीकृत की है. इस राशि से 2021 तक कोसी का पुनर्वास करना है. परियोजना तीन चरणों में पूरी होनी है. काम मुख्यतः सहरसा के 5, सुपौल के 5 और मधेपुरा जिले के 11 प्रखंडों में होना है. इसके तहत
1. पहले चरण में एक लाख मकान बनने हैं 2. क्षतिग्रस्त सड़कों और पुल-पुलियों का निर्माण किया जाना है 3. बाढ़ प्रबंधन का काम किया जाना है 4. आजीविका के साधनों का विकास किया जाना है
पहले चरण के तहत 259 मिलियन डॉलर खर्च किये जाने हैं. पहले इसकी समय सीमा सितंबर, 2014 रखी गयी थी, काम के मौजूदा रफ्तार को देखते हुए समय सीमा बढ़ाकर 2016 कर दी गयी है. दूसरे चरण में 2019 तक 375 मिलियन डॉलर और तीसरे चरण में 2021 तक 375 मिलियन डॉलर खर्च किये जाने हैं.
कोसी आपदा- पुनर्वास एवं पुनर्निर्माण नीति
22 दिसंबर 2008 को राज्य सरकार ने कोसी आपदा- पुनर्वास एवं पुनर्निर्माण नीति घोषित की थी. इसके तहत घरों का निर्माण, सामुदायिक सुविधाओं की उपलब्धता, इंफ्रास्ट्रक्चर की संपूर्ण स्थापना और आजीविका में मदद की बात की गयी थी. कहा गया था कि
- इस आपदा को हम एक मजबूत सामाजिक और आर्थिक वातावरण तैयार करने के मौके के रूप में देख रहे हैं. - प्रभावित क्षेत्र में निजी/सार्वजनिक संसाधनों का पुनर्वास और पुनर्निर्माण किया जायेगा. - क्षतिग्रस्त निजी/सार्वजनिक भवनों का समुचित तरीके से मरम्मत और पुनर्निर्माण किया जायेगा. - खेती, मत्स्य उद्योग, डेयरी उद्योग, लघु व्यवसाय और हस्तशिल्प के रूप में स्थानीय समुदाय को आजीविका उपलब्ध करायेंगे. - शिक्षा और स्वास्थ्य के तंत्रों का विकास और महिलाओं व कमजोर वर्गों के सशक्तीकरण पर विशेष ध्यान दिया जायेगा. - पंचायतों को क्रियान्वयन में भागीदारी दी जायेगी.
खबर आज के प्रभात खबर के अंक में प्रकाशित है.

Friday, August 08, 2014

कहां है पानी, पानी तो खाली टीवी और पेपर में है...


पिछले दिनों कोसी के इलाके में बाढ़ की संभावना ने लोगों को हलकान कर दिया था. बाढ़ तो आयी नहीं मगर तीन दिन नौ जिलों के लोग तबाह रहे. उन दिनों मैं उसी इलाके में था. यह रिपोर्ताज लिखी, जो प्रभात खबर में प्रकाशित भी हुआ...
वीरपुर बाजार के एक नेट कैफे में जब यह खबर टाइप की जा रही है, बाजार के तीन चौथाई दुकान बंद हैं और सड़कें सूनी हैं. लोग बताते हैं कि सोमवार को तो और भी सूना-सपाटा माहौल था. वीरपुर और आसपास के कई गांवों के लोग दो अगस्त की शाम से ही घर छोड़कर सुरक्षित स्थान की ओर जाने लगे थे. तीन अगस्त औऱ चार अगस्त के दिन यहां एक इंसान नजर नहीं आता था. आसपास के गांव ललितग्राम, बलुआ बाजार, लछमिनियां, भीमनगर, ठुठ्ठी, चापीन, हृदयनगर, सीतापुर आदि गांवों के तकरीबन 90 फीसदी लोगों ने अपने रिश्तेदारों के घरों में शरण ले ली थी. मंगलवार को खतरा टलने की खबर सुनकर पास पड़ोस में रहने वाले इक्का-दुक्का परिवार रहे हैं.
नेट कैफे संचालक संजय कुमार राय बताते हैं कि तीन अगस्त को तो सड़कों पर एक आदमी नजर नहीं आता था. आसपास के दर्जनों गांवों के लोग पलायन कर गये थे. ऐसा इस वजह से हुआ कि 2008 की भीषण बाढ़ में सबसे अधिक तबाही हमारे इलाके के लोगों ने ही झेली थी. यह इलाका कुसहा के मुहाने पर पड़ गया था. इसलिए बाढ़ की बात सुनकर ही लोग घबरा गये और कोई रिस्क लेने के बदले घर छोड़ कर सुरक्षित इलाकों में चले गये. एक स्थानीय होटल संचालक भी इस बात की पुष्टि करते हैं और कहते हैं कि आम दिनों में आप आते तो यहां भयंकर शोर-शराबा और भीड़-भाड़ का माहौल देखते. तीन दिन से इतना सन्नाटा है कि लगता है हम किसी और जगह में रह रहे हैं.
वैसे तो इन गांवों के लोग ज्यादातर अपने रिश्तेदारों के घर गये हैं. कुछ गरीब तबके के लोग राघोपुर स्टेशन के पास भी शरण लिये हुए हैं, जहां 2008 में बाढ़ का पानी नहीं आया था. इसके अलावा बड़ी संख्या में लोग सरायगढ़ स्थित रिलीफ कैंपों में नजर आते हैं. वैसे तो ये कैंप तटबंध के भीतर के लोगों के लिए बने थे. मगर वहां बसंतपुर प्रखंड के दहशतजदां लोगों ने भी बड़ी संख्या में शरण ले रखी हैं. कैंप में उन्हें चार वक्त का भोजन, रहने की सुविधा, स्वास्थ्य सुविधा आदि तो उपलब्ध है ही साथ ही छोटे बच्चों के लिए आंगनबाड़ी केंद्र भी काम कर रहे हैं. इस बार के सरकारी रिलीफ कैंपों की सुविधा से लोग काफी संतुष्ट नजर आते हैं. वे अभी इन कैंपों में चार दिन और रहकर लौटना चाहते हैं. इन्हें अभी भी भरोसा नहीं है कि खतरा टल गया है. एक बुजुर्ग लक्ष्मी राम बताते हैं कि कभी कहा जाता है विस्फोट किया जायेगा, कभी कहा जाता है खतरा टल गया. हम कैसे भरोसा कर लें. एक तरह की बात कही जाये तब तो.
कोसी के तटबंध के भीतर रहने वाले लोग भी बड़ी संख्या में उस रिलीफ कैंप में हैं. इनमें ढोली, कटैया भुलिया, कटैया, बलथरवा, सियानी, बनैनिया, सिरपुर गिरधारी, गौरीपट्टी आदि गांवों के लोग हैं. मगर उन लोगों में दहशत का माहौल कम ही नजर आता है. इनमें से अधिकांश लोग सेना द्वारा दबाव बनाकर यहां लाये गये हैं. पुरुष वर्ग के लोग दिन के वक्त अभी भी कैंप छोड़कर गांवों में चले जाते हैं, जहां उनके मवेशी रह रहे हैं. दरअसल रिलीफ कैंपों का इंतजाम तो बेहतर है, मगर मवेशियों के लिए ठीक इंतजाम हो नहीं पाया है. हालांकि पानी बढ़ने की वजह से उनके गांव पहुंचे का एक मात्र रास्ता नावें ही रह गयी हैं. मगर वे फिर भी गांव आना-जाना छोड़ नहीं रहे हैं. ऐसे ही गांव का एक युवक रवि राम कहता है कि हमलोगों का जीवन तो पानी में ही गुजरा है, हमको क्या भय. कितना भी पानी आ जायेगा. हमलोग अपने बचने का रास्ता निकाल लेंगे. यह तो आप लोगों ने सबको डरा दिया है, हम लोग तो जानते हैं कुछ नहीं होगा. कुछ होगा भी तो बराज के पहले ही तटबंध टूट जायेगा और पानी निकल जायेगा.
वैसे तटबंध के किनारे-किनारे चलने बड़ी संख्या में बांस और बत्ती लगे हुए हैं. पूछने पर लोग बताते हैं कि बांध के अंदर के लोगों ने बांस-बल्ली लगाकर जगह घेर लिया है कि अगर पानी आया तो यहीं आकर रहेंगे. तटबंध की ओर हाथ दिखाकर बताते हैं कि झुट्ठो हल्ला है, बताइये कहां है पानी... तीन दिन से परेशान-परेशान हैं, पानी अब आयेगा, तब आयेगा... खाली फौरकास्टिंग करता है, लगता है हदसा कर जान ले लेगा...
तकरीबन ऐसा ही माहौल सिमराही बाजार के आसपास का है. वहां के लोगों को इस बात का आत्मविश्वास है कि यहां तो 2008 में भी पानी नहीं आया था, अब क्या आयेगा. वीरपुर और आसपास के गांवों से पलायन करने वाले लोग भी इसी उम्मीद पर सिमराही बाजार में जा बसे हैं. वहां भी तीन दिन से लगातार इसी बात पर बहस हो रही है कि पानी आयेगा या नहीं आयेगा. विस्फोट होगा तो पानी कहां तक पहुंचेगा... बाजार पर रहने वाले युवक रोज-सुबह शाम पास के तटबंध के इलाके में झांक कर आ जाते हैं कि पानी बढ़ा तो नहीं. पानी की स्थिति जस की तस देखकर लौट आते हैं औऱ कहते हैं फॉल्स खबर उड़ा दिया है... चौक पर बैठे एक सिपाही जी कहते हैं, खाली माइकिंग है, हमको तो समझे में नहीं आता है पानी कहां है. न नहर में पानी न बैराज में पानी खाली पेपर और टीवी में है...