Friday, September 05, 2014

सिंहा सर न होते तो मैं आइआरएस न होती- ललिता


यह कहानी सुपौल नवोदय विद्यालय के लाइब्रेरियन आरके सिंहा की है. जिसकी मदद से कई लड़कियों ने कम उम्र में विवाह के बंधन में बंधने के बदले उच्च कैरियर को हासिल किया. गरीब छात्रों की पढ़ाई में पैसा बाधक नहीं हुआ और बच्चों को बचपन से उनकी रुचि के अनुसार कैरियर से जुड़ने का मौका मिला. जिनसे आज भी जुड़े रहते हैं उनके पुराने शिष्य...
सिंहा सर का नाम सुनते ही ललिता चहक उठती हैं. वे राउरकेला में इनकम टैक्स डिपार्टमेंट में डिप्टी कमिश्नर हैं. ललिता कहती हैं उसका कैरियर बनाने में सिंहा सर की बड़ी भूमिका रही है. उसे खुद नहीं मालूम था कि वह क्या कर सकती हैं, मगर सर ने उसे हमेशा प्रोत्साहन दिया. आर्थिक रूप से कमजोर परिवार की होने की वजह से वह पूर्णिया शहर में रहकर ट्यूशन नहीं कर पा रही थीं, तो आरके सिंहा ने उन्हें अपने घर में रहने का ऑफर किया. पिता की तरह संभाला. कई दफा तो साइकिल पर बिठाकर ट्यूशन पहुंचाया. बाद में ललिता ने पहले वेटनरी डॉक्टर की पढ़ाई की और फिर सिविल सर्विसेज की परीक्षा पास की. इस पूरे दौर में सिंहा सर का मार्गदर्शन उसे हमेशा मिलता रहा. आज भी वह उनमें पिता की छवि देखती हैं.
नया जमाना शिक्षक के ट्यूटर हो जाने का है और फीस के बराबर कीमत में बच्चों को पढ़ा देने के अलावा शिक्षक उससे और कोई रिश्ता नहीं रखना चाहते, मगर इसी जमाने में नवोदय विद्यालय सुपौल के लाइब्रेरियन राकेश कुमार सिंहा जैसे शिक्षक भी हैं. उनका हर शिष्य कहता है कि अगर सिंहा सर नहीं होते तो उनके जीवन का यह रुख नहीं होता. उन्होंने न सिर्फ बच्चों को पढ़ाया बल्कि बचपन से ही छात्रों की रुचि को देखते हुए उसके कैरियर को दिशा दी. इतना ही नहीं उन्होंने कई लड़कियों का विवाह कम उम्र में होने से बचाया, माता-पिता को पढ़ाई का महत्व समझाया. आज वे लड़कियां बेहतर कैरियर हासिल कर आत्मसम्मान भरा जीवन जी रही हैं. गरीब बच्चों को पैसों से मदद की और करवाई ताकि उनकी पढ़ाई रुके नहीं. छात्र-छात्रओं को अपने घर में रहने की जगह दी, ताकि वह ट्यूशन कर सके. आज उनके पढ़ाये बच्चे आइएएस, आइपीएस, आइआइएम टॉपर तक हैं. फिर भी ये लोग जब किसी मुसीबत में फंसते हैं या अनिर्णय की स्थिति में आते हैं तो अपने सिंहा सर को याद करते हैं. इतना ही नहीं उनके सफल छात्रों ने तो एक एसोशियेसन भी बना लिया है ताकि जरूरतमंद छात्रों की पढ़ाई लिखाई में मदद कर सकें.
ललिता जैसी ही कहानी पूर्णिया के बनमनखी की रहने वाली निभा की है, जिसके पिता एक कपड़ा व्यवसायी की दुकान पर काम करते थे. उन्होंने उसकी प्रतिभा को देखते हुए उसे हमेशा ऊंची पढ़ाई के लिए प्रेरित किया. जब मैनेजमेंट की पढाई के लिए सिम्बायोसिस में उसका एडमिशन होना था तो पैसे का अभाव आड़े आ गया था. तब सिंहा सर ने अपने एक पूर्व छात्र अमरेंद्र की मदद से पैसों का इंतजाम कराया. आज निभा मोन्सेंटों इंडिया में उच्च पद पर कार्यरत है.
सुपौल के राजेंद्र की कहानी तो विलक्षण है. एक परिवार में नौकर का काम करने वाले राजेंद्र का एडमिशन जब नवोदय में हुआ तो उसके लिए यह एक सपने की शुरु आत थी. वहां संयोग से उसे सिंहा सर जैसा मार्गदर्शक मिल गया. उन्होंने न सिर्फ राजेंद्र के मन से झङिाक को हटाया बल्कि उसे ऊंची पढ़ाई के लिए प्रेरित किया. स्कूल से निकलने के बाद जब उच्च शिक्षा का सवाल उठा तो सिंहा सर ने उसे रांची भेजा. रांची में उसका नामांकन सेंट जेवियर्स कालेज में हो गया. वहां रहने और खाने-पीने का इंतजाम सिंहा सर के एक रिश्तेदार के घर हुआ. वहां राजेंद्र बीएससी में यूनिवर्सिटी टॉपर रहा और एमएससी करने के बाद पारिवारिक जिम्मेदारियों को समझते हुए उसने एक सरकारी प्लस टू स्कूल में शिक्षक की नौकरी कर ली है.
आरके सिंहा हालांकि एक लाइब्रेरियन हैं. मगर वे हमेशा स्कूल की एक्सट्रा कैरिकुलर एक्टिविटीज के भी इंचार्ज रहे हैं. वे कहते हैं, एक शिक्षक के पास देने के लिए मार्गदर्शन के अलावा और क्या होता है. उन्होंने सिर्फ अपना काम किया है. बच्चे आज सफल होकर अच्छा काम कर रहे हैं तो उन्हें यह देखकर खुशी होती है. बच्चे याद कर लें यही उनका पारितोषिक है.
ललिता अपने पति और बच्चे के साथ. तसवीर उसके फेसबुक वाल से