Thursday, November 13, 2014

ठठरी सी इस काया में 14 बच्चे आकर लौट गये


पुष्यमित्र और मुन्ना झा
यह कहानी एक ऐसी महिला की है, जिसने 16 बच्चों को जन्म दिया और उनमें से दो बच्चों को ही बचा पायी. 14 बच्चे जन्म के एक हफ्ते के अंदर ही अकाल कलवित हो गये. विडंबना तो यह है कि इस कहानी ने ऐसे दौर में आकार लिया है जब जननी एवं बाल सुरक्षा के लिए सरकार अरबों-खरबों की राशि खर्च कर आंगनबाड़ी से लेकर जेवाइएसएस तक कई योजनाएं संचालित कर रही है. इतना ही नहीं भीषण गरीबी में रहने वाली उस महिला का नाम न बीपीएल सूची में है न एपीएल सूची में.
जनक देवी जहानाबाद जिले के कांको प्रखंड के सुलेमानपुर पंचायत के रानीपुर गांव में रहती हैं. बमुश्किल 37 साल की उम्र में वह सत्तर साल की बुढ़िया नजर आती हैं. उनके बाल सफेद हो चुके हैं, शरीर पर मांस का एक कतरा नजर नहीं आता, पांच मिनट तक खड़ी रहने की ताकत भी शायद ही उनके शरीर में बची हो. अपनी किस्म की सबसे भयावह दुख को देख चुकने के बावजूद वह आगंतुकों के लिए पड़ोस से कुर्सियां मंगवाती हैं और मुस्कुराने की कोशिश करती हैं. सेहत के मामले में थोड़ा सा भी सजग इंसान उन्हें देखकर आसानी से कह सकता है कि उनके शरीर में हिमोग्लोबिन की मात्रा न्यूनतम है.
जनक देवी को ठीक-ठीक याद नहीं है कि वह कब ब्याह कर इस गांव आयीं. मगर तब से अब तक उसने एक ही काम किया है, बच्चों को धरती पर लाने की कोशिश. वह कहती हैं, हर बार सतमस्सू (सात महीने गर्भ में रहने वाला) बच्चा होता था. कोई एक दिन तो कोई दो तीन में चला जाता. एक बच्चा सबसे अधिक धरती पर टिका वह एक हफ्ते में गुजर गया. विडंबना यह थी कि किसी बच्चे का जन्म अस्पताल में नहीं हुआ.
पति गनौरी साह जहानाबाद में किराये पर रिक्शा चलते हैं, किसी दिन पचास तो किसी दिन सौ बचाकर लाते हैं. इन्हीं पैसों से घर चलता है. जनक देवी में इतनी ताकत नहीं है कि कहीं मेहनत मजूरी कर सके. वह मुर्गियां पालती हैं और उनके अंडों को बेचती हैं. घर के नाम पर दो डिसमिल जमीन पर बना फूस औऱ मिट्टी का एक कमरा है, जिसे में रात में सोते वक्त ही घुसा जा सकता है. मगर इसके बावजूद उनका नाम न बीपीएल सूची में है न एपीएल सूची. यानी राशन दुकान से उन्हें न अनाज मिलता है न और कुछ. दो बच्चे नेहा कुमारी (6 साल) औऱ ओमप्रकाश (2 साल) जो गाय का दूध पीने के कारण बच गये हैं, वे आंगनबाड़ी के भरोसे पल रहे हैं.
जनक देवी को संभवतः पति से भी बहुत सहयोग नहीं मिला. क्योंकि अगर पति का नजरिया सकारात्मक होता तो जनक देवी को शायद ही 16 बार गर्भवती होने पर मजबूर होना पड़ता. जनक देवी सीधे-सीधे इस बारे में कुछ नहीं कहती हैं, मगर उनकी बातें यह राज खोल देती हैं. वे कहती हैं, जब आठवां बच्चा नहीं बचा तो उनके पति ने संभवतः बच्चों के लिए दूसरी शादी कर ली. उक्त महिला उनके साथ ही उनके घर में पांच-छह साल रही, फिर वह उन्हें छोड़कर चली गयी.
इन विपरीत परिस्थितियों में उन्हें मदद सिर्फ वार्ड सदस्य और सुलेमानपुर पंचायत की उप मुखिया मैना मंती से मिली है. मैना मंती लगातार प्रयासरत हैं कि उनका नाम बीपीएल सूची में डल जाये. वे मुखिया से लेकर डीएम तक इनकी समस्या को लेकर पहुंच चुकी हैं. डीएम ने भरोसा दिलाया है कि जब नयी सूची बनेगी तो जनक देवी का नाम प्राथमिकता से शामिल किया जायेगा. मैना की वजह से ही उन्हें अब आंगनबाड़ी से बच्चों के लिए टेक होम राशन मिलने लगा है, जिससे उनकी ठीक-ठाक मदद हो जा रही है.
शिशु रोग विशेषज्ञ संदीप जैन कहते हैं कि यह मामला पहली नजर में कुपोषित माता का लगता है. एक बच्चे को जन्म देने के लिए जो पोषण अपेक्षित होता होगा वह उन्हें नहीं मिल पाता होगा और इसी वजह से हर बार प्रिमेच्योर डिलीवरी होती होगी औऱ बच्चे का वजन बहुत कम होता होगा. प्रिमेच्योर डिलीवरी में बच्चे का लालन-पालन सिर्फ मां के दूध के भरोसे नहीं हो सकता, उन्हें खास नर्सिंग केयर की जरूरत थी. चुकि उनके बच्चों का जन्म अस्पताल में नहीं हुआ, लिहाजा वह सुविधा भी नहीं हासिल हो पायी. जनक देवी के हालात डॉक्टर संदीप के बातों की पुष्टि करते हैं.
वैसे उनके बच्चों के न बच पाने की वजह जो भी हो मगर इस उदाहरण ने सरकार की कई योजनाओं पर सवाल खड़े कर दिये हैं. चाहे वह संस्थागत प्रसव का हो, मातृत्व सुरक्षा का हो, जन्मपूर्व टीकाकरण, पोषण औऱ देखभाल का हो, शिशु सुरक्षा का हो और आंगनबाड़ी केंद्रों की उपयोगिता का हो. इसके अलावा बीपीएल चयन में उस परिवार से साथ अनदेखी भी इस महिला के साथ हुई इन भीषण घटनाओं की बड़ी वजह है.

Thursday, November 06, 2014

किसिंग-विसिंग हमारी परंपरा नहीं है जी..


यह कौन है वान ब्रायंट. जो मान न मान मैं तेरा मेहमान हुआ जा रहा है औऱ कह रहा कि किसिंग यानी चुंबन की शुरुआत भारत में हुई थी और भारत से ही पूरी दुनिया में फैला. बताइये कितना बदतमीज है, जब हमने कहा कि प्लास्टिक सर्जरी की शुरुआत भारत से हुई तो ये वेस्टर्न वर्ल्ड वाले माने नहीं, लगे मजाक उड़ाने. और अब एक नयी थ्योरी लेकर आ गये हैं. अरे ब्रायंट के बच्चे, हमने किसिंग-विसिंग की शुरुआत नहीं की है. कोई भारतीय इतना घिनौना काम कर ही नहीं सकता. और अगर किसी ने गलती से यह काम कर भी दिया होगा तो हमने उसे प्रोमोट नहीं किया. हमारे पूर्वजों ने जरूर उसे देश से निकाल बाहर किया होगा और रोम भेज दिया होगा. जाओ वहीं गुंह गीजो. ऐसे लोगों के लिए इस देश में कोई जगह नहीं.
यह वेस्टर्न प्रोपेगेंडा हैं कि भारत पहले यौन के मामले में काफी उन्मुक्त था. हमने कामसूत्र से लेकर कोकशास्त्र तक इसलिए नहीं रचे थे कि हम रंगरसिया टाइप थे. दरअसल हम इतने भोले-भाले थे कि हमारे लोगों को पता ही नहीं था कि क्या करना है और कैसे करना है. अगर ये किताबें नहीं होतीं, खजुराहो और कोणार्क की मूर्तियां नहीं होतीं तो तीन चौथाई लोग बंद कमरे में होठ के बदले नाक को ही किस करके खुश हो जाते और सेक्स के बदले झूमर खेलते रहते. लोगों के कंफ्यूजन को क्लीयर करने के लिए ये किताबें लिखी गयी हैं जी, इसलिए नहीं कि हमलोग बड़े खुले हुए थे.
इस कंफ्यूजन को क्लीयर करने के लिए ही भगवान कृष्ण ने रासलीला रचाई. हमने तो पहले ही तय कर लिया था कि इस देश में खुले आम रोमांस का हक एक ही इंसान को है. भगवान कृष्ण को. उसने कर लिया, हो गया. इस पूरे मुल्क के लिए एक ही रासलीला काफी है, हमें दूसरी रासलीलाओं की जरूर नहीं. और भगवान कृष्ण ने भी ऐसा इसलिए किया कि जो लोग बंद कमरे में रासलीला करते हैं उन्हें पता रहे कि क्या क्या करना है.
हम सिर्फ सूसू करने के मामले में खुले हुए हैं, वह भी सिर्फ मरद. केवल मर्द का बच्चा है शान से सड़क किनारे पैंट की जिप खोलकर सूसू की धार बहा सकता है. लड़कियों का धर्म है घर से निकलने से पहले तीन बार चुपके से सूसू कर लेना और रास्ते में एक बूंद भी पानी या लिक्विड नहीं लेना. टट्टी करने के मामले में भी हम थोड़े खुले हैं, हमने औरतों को भी खुले में खुलकर शौच करने की आजादी दी है. मगर दिन में नहीं. हां, गालियां देने के मामले में हम तो पूरे खुले हैं और देखिये जो काम हम बंद कमरे में करने के हिमायती हैं, उसे गालियों में खुलेआम उद्धृत कर डालते हैं, बेहिचक. और आपको हमारी गलियों से समझ लेना चाहिये कि हम सेक्स-वेक्स को कितना बुरा काम मानते हैं. हमारी इस तरह की चीजों में रुचि होती तो हमारी गालियां सेक्सुअल इंटरकोर्स पर बेस्ड थोड़े ही होती. हम सेक्स को बुरा मानते हैं इसलिए लोगों को सेक्सुअल गालियां देते हैं. हमारे ऋषि-मुनियों ने औरत को नर्क का द्वार माना है, इसलिए हम औरतों के नाम से गालियां देते हैं. अब इन दिनों नरक टूरिज्म का फैशन चल गया है तो क्या किया जाये.
ब्रायंट साहब, कान खोलकर सुन लो. यह जो केरल में औऱ कोलकाता में लड़के-लड़कियां खुले आम सड़कों पर एक दूसरे को किस कर रहे हैं यह हमारी संस्कृति नहीं, तुम्हारी अपसंस्कृति है. हम भी मुहब्बत करते थे, हमें भी मालूम है मुहब्बत क्या है.
अपने जमाने में हम महबूबाओं के घर बेनामी खत भेजा करते थे और उम्मीद करते थे कि वह इशारों में समझ जाये कि भेजने वाला कौन है. थोड़ा वक्त बदला तो लैंड लाइन पर फोन करने की हिम्मत करने लगे, मगर उस वक्त भी उनकी अम्मा को यह बताया जाता था कि बातें पढ़ाई लिखाई की हो रही है और मामला दोस्ती की हद में ही है. हालांकि उस दौर में भी कुछ लोग अपसंस्कृति के शिकार थे, जिनकी महबूबाएं होस्टल में रहा करती थीं या अलग फ्लैट ले रखा था. मगर कॉलेज में भी बहुत मुश्किल से पता चलता था कि कौन सा रिश्ता दोस्ती की हद में है और कौन सा चौहद्दी पार कर गया है. तब हम जैसे लोग यह मानकर चलते थे कि दुनिया में सबकुछ पवित्र और पाक है. क्योंकि वे लोग क्या गुल खिलाते थे यह कमरे की दीवारों को छोड़कर किसी को पता नहीं चल पाता.
अब देखिये, ये लोग सड़क पर जुम्मा चुम्मा दे दे टाइप हुए जा रहे हैं. इसका सबसे बड़ा नुकसान है कि जिनकी मुहब्बत के पौधे लगने से पहले ही मुरझा गये वे इंसिक्योर हो रहे होंगे. कसम मनोहरलाल खट्टर की यही इंसिक्योर लड़के आगे चलकर रेपिस्ट हो जायेंगे. आप मेरी बात गांठ बांध कर रख लो.