Monday, October 12, 2015

खाली बतवे के बोरिंग चलावल करे हे नेताजी


चुनावी जमीन पर मुद्दों की पड़ताल 3
खेती की राजनीति
केड़िया ग्राम, बरहट प्रखंड, जमुई जिला
जीतेगा भाई जीतेगा लालटेन छाप जीतेगा... हमारा नेता कैसा हो अजै प्रताप जैसा हो.... फलां छाप पर मोहर लगा कर विजै बनावें... यह चुनाव आपकी तकदीर बदल देगा... बदलिये बिहार... फिर से नीतीश कुमार... लाउडस्पीकर लगातार चीख रहा था. शाम होने से पहले पार्टी वाले भोंपू गाड़ी को मोहलत देने के लिए तैयार नहीं थे. शाम में तो प्रचार अभियान बंद हो ही जाना था. इसी शोरगुल के बीच यह संवाददाता जमुई के केड़िया गांव पहुंचा. आप केड़िया गांव को जानते हैं... ? क्यों जानें, आखिर क्या है, इस गांव में... ? 94 किसान परिवारों की साधारण सी नजर आने वाली इस बस्ती में कि इसे पूरे बिहार के लोग जानें. ऐन चुनाव के वक्त उसकी चर्चा की जाये. क्या खास है...
वैसे देखा जाये तो कुछ बहुत खास नहीं है. इस गांव के सभी किसानों ने पिछले साल दृढ़ निश्चय करके यह तय कर लिया कि वे रासायनिक खाद और कीटनाशक का इस्तेमाल करना छोड़ देंगे. हालांकि अभी इनका इस्तेमाल पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. गांव वाले कहते हैं, नशा कभी एक बार में नहीं छोड़ाना चाहिये.. धरती को भी यूरिया-डीएपी का नशा लगा हुआ है और किसान को तो पैसों का नशा है ही... धीरे-धीरे छूटेगा. इसके बावजूद इस गांव में कीटनाशकों का इस्तेमाल पूरी तरह बंद है, रासायनिक खाद का प्रयोग एक चौथाई रह गया है. इसके बदले किसान जीवामृत, अमृत जल, केचुआ खाद, अग्नेयास्त्र और क्या-क्या तरीके आजमाते हैं पता नहीं. पड़ोस के गांव के किसान हैरत में हैं कि बताइये बिना यूरिया-डीएपी के धान छाती भर का हो गया है. क्या जादू करते हैं, ये लोग.
अब केड़िया गांव वाले अपने खेत में चाहे जो भी जादू-टोना करें, हमें इससे क्या मतलब. हम तो यह समझने गये थे कि चुनाव में नेताजी लोग तरह-तरह का फार्मूला बता रहे हैं. बिहार के किसानों का तकदीर बदल देंगे, ऐसा कह रहे हैं. इसके बारे में केड़िया के जादूगर किसानों का क्या कहना है?
आनंदी यादव जी, आप ही बताइये. आप प्रगतिशील किसान हैं. बीजेपी वालों के दृष्टिपत्र में लिखा है कि किसानों के लिए अलग फीडर बना कर सिंचाई के लिए कम से कम 10 घंटे बिजली उपलब्ध करायेंगे. ऐसा हो गया तो आप लोगों का तो सारा प्रोब्लम खतम ही हो जायेगा. मगर मेरे इस बात पर आनंदी यादव भड़क गये. कहने लगे, देखिये ऊ बिजली का खंभा. उस पर तार भी नहीं चढ़ा है. सरकार ऐसे ही काम करती है. आजादी के 60 साल बाद हमारे गांव में बिजली का खंभा गड़ा है. जबकि ऐसा नहीं है कि हमारा गांव कोई ऐल-गैल इंटीरियर में है. हाइवे से मात्र डेढ़ किमी अंदर है. पूर्व कृषि मंत्री का इलाका है. तब ई हाल है. पूरी दुनिया के किसान को पूछिये तो वह यही कहेगा कि आप खाली उसके खेत में पानी का इंतजाम करवा दीजिये, बांकी वह सलट लेगा.
जब से खेती शुरू हुआ है किसान एक ही मांग कर रहा है. मगर सतजुग से आज तक कोई सरकार ऐसी नहीं हुई जो किसान के खेत में पानी का सही इंतजाम करा सके. हमलोगों ने पंचायत से मांग की कि हमारे खेतों में 10 फुटिया (10 फुट चौड़ाई वाला) एक-एक कुआं दे दीजिये, उसी से हमारा काम हो जायेगा. मगर वह भी नहीं मिला. शायद जादवों का गांव था इसलिए. अब सरकार ने डीजल पर सब्सिडी देना शुरू कर दिया. उसमें घुसखोरी अलग है. इसके अलावा हमलोग मानते हैं कि बोरिंग की सिंचाई से फायदा कम नुकसान ज्यादा है. गांव का वाटर लेयर तुरंत डाउन हो जायेगा. हम समझ गये कि सरकार से कुछ नहीं होगा. सारे किसान एकजुट हुए. गांव से एक कोस दूर एक कैनाल था, वहां से पइन खोदकर गांव तक ले आये. अब हर खेत तक पानी पहुंच रहा है. हालांकि इतने से ही काम पूरा नहीं हुआ है. साल में चार बार पूरा गांव पईन को साफ करता है, तब जाकर खेत में हरियाली आती है.
पास में ही बैठे थे, चुन्नी यादव. कहने लगे, सरकार के भरोसे रहेंगे तो हो गयी खेती. इनको चुनाव में किसान-किसान कहने दीजिये. भोट लेना है तो कुछ न कुछ तो कहेंगे. मगर सरकार बनने पर सब पार्टी एक जैसी हो जाती है. अब बीज की कहानी सुनिये, कहते हैं कि ब्लॉक में सरकारी बीज फिरी(फ्री) बंटता है. मगर लेने की कोशिश कीजिये तो पता चलेगा. सब्सिडी तो बाद में मिलेगा, पहले 300 रुपया किलो के दर से एडवांस पैसा जमा कराइये. अब बताइये, जब जुताई, सिंचाई, खाद और दस तरह के काम में किसान का बटुआ ढीला हो रहा है, उस वक्त दस किलो बीज के लिए एडवांस पैसा जमा कराना ही पड़ गया तो क्या फायदा. और फिर सरकारी बीज का कोई भरोसा नहीं, कब फ्लॉप हो जाये. फिर इसको दुबारा इस्तेमाल भी नहीं कर सकते. हवा हवाई योजना बनता है, ग्राउंड पर आकर देखिये कि जरूरत क्या है.
आनंदी यादव से बरदास्त नहीं होता है, कहने लगते हैं, घोषणा पत्र तो हम भी पढ़ रहे हैं, अब जैसे कह रहे हैं पैक्स को कंप्यूटराइज करेंगे. अरे कंप्यूटराइज बाद में कीजियेगा, पहले पैक्स और गल्ला व्यापारी का जो तालमेल है उसको तो तोड़िये. पिछले साल धान का सरकारी रेट 1,660 रुपये तय हुआ, मगर हमारे पंचायत का पैक्स वाला पहले धान खरीदने के लिए तैयार ही नहीं हुआ. लाचारी में किसानों को धान व्यापारियों को लागत की लागत में 1,050-1100 रुपये दर से बेचना पड़ा. बाद में पता चला कि गल्ला व्यापारी सब वही धान पैक्स को बेच दिया और मार्जिन आधा-आधा बांट लिया. सहदेव यादव बोले, हम तो किसी तरह अपना धान पड़ोस के पंचायत के पैक्स में बेच दिये, मगर उसका क्या लाभ. पेमेंट आज तक नहीं हुआ है.
किसानों ने बताया कि इस गांव से सिर्फ दो लोगों ने केसीसी से लोन लिया है. कहते हैं, केसीसी में अलग तरह का करप्शन है. लोन लेते वक्त ही 25-30 परसेंट कमीशन मांगते हैं. अधिकारी कहते हैं, लोन तो माफ होना ही है, इसलिए कोई टेंशन नहीं है. अब किसान इस डर से लोन नहीं लेते कि कहीं अगर किसी वजह से लोन माफ न हुआ तो चुकाना तो उन्हीं को पड़ेगा. तो कर्जा कहां से लेते हैं, इस सवाल पर लोगों ने कहा कि हमारे लिए बैंक आज भी वही व्यापारी हैं, जिनसे वे खाद-बीज खरीदते हैं, या जिन्हें अपनी उपज बेचते हैं. उनसे 5 रुपये सैकड़ा महीना की भारी दर से कर्ज लेना ही किसानों को विश्वसनीय तरीका मालूम होता है. वे कहते हैं, सरकारी कर्जे में बहुत गड़बड़ी है.
वहां बैठे एक बुजुर्ग किसान ने कहा कि राज्य के किसानों को ज्यादा कुछ नहीं चाहिये. बस हर खेत के लिए पानी का इंतजाम करा दे और फसल की सरकारी खरीद की व्यवस्था दुरुस्त करा दे, यही काफी है. अगर किसानों को उसके पैदावार की अच्छी कीमत समय से मिल जाये तो उसे कर्ज लेने की जरूरत भी नहीं पड़ेगा. और खेतों तक पानी पहुंचाने के लिए भी ज्यादा कुछ नहीं करना है, बस हर किसान को एक-एक कुआं भी मिल जाये तो काफी है. उनकी बात में टीप लगाते हुए आनंदी यादव ने कहा, मगर चचा नेताजी इतना सीधा-सपाट बात बूझते थोड़े हैं... इस बीच सड़क से गुजरते प्रचार वाहनों के लाउडस्पीकर पर नारे बुलंद हो रहे थे, हर दाने की कीमत दिलायेंगे, हर खेत तक पानी पहुंचायेंगे... बिहार का पानी जिंदाबाद, बिहार की जवानी जिंदाबाद. इन नारों को सुनकर केड़िया गांव के किसानों ने जोरदार ठहाका बुलंद किया... सहदेव यादव ने चुटकी ली, खाली बतवे के बोरिंग चलावल करे हे नेताजी...
कहानी केड़िया गांव की
जमुई के बरहट ब्लॉक के पाड़ो पंचायत के इस गांव के सभी किसान परिवारों ने पिछली साल जैविक कृषि को अपनाया है. गांव में फिलहाल 32 किसानों के पास जैविक खाद तैयार करने के बेड हैं और 40 किसान इसे बनाने वाले हैं. गांव की समृद्धि के पीछे किसानों के पास पशुधन की उपलब्धता का बड़ा हाथ है. यहां तकरीबन हर किसान के पास 15-20 पालतू पशु तो हैं ही. कई किसानों के पास यह संख्या 70-75 तक पहुंच गयी है. उन्होंने जैविक खाद के साथ-साथ बायोगैस प्लांट भी स्थापित कराये हैं, जिनसे उनके घरों का गैस चूल्हा जलता है. उनका लक्ष्य 2020 तक गांव को रासायनिक खाद से मुक्त कर देना है. किसान स्वाबलंबी हैं. अपने खेतों तक पानी पहुंचाने के लिए उन्होंने खुद 4-5 किमी लंबी पईन खोदी है. 4-5 किमी लंबा रास्ता तैयार किया है. आज आसपास के गावों के लिए यहां की उन्नत खेती अनुकरणीय साबित हो रही है. गांव के सभी किसानों ने मिल कर एक संगठन भी बनाया है, जीवित माटी किसान समिति. इस गांव के किसानों की आत्मनिर्भरता और स्वाबलंबन को देखते हुए ग्रीन पीस संस्था ने पिछले साल से वहां काम की शुरुआत की है. संस्था की ओर से इश्तेयाक अहमद किसानों को जैविक खेती के गुर सिखाते हैं और उनकी खेती को बेहतर बनाने में हर तरह से उनकी मदद करते हैं.
घोषणा पत्रों में खेती की बात
भाजपा के दृष्टि पत्र में पृथक कृषि बजट, सिंचाई के लिए अलग फीडर, 10 घंटे न्यूनतम बिजली, पैक्सों का कंप्यूटराइजेशन, मिट्टी जांच, जीरो परसेंट कृषि ऋण आदि के वायदे किये गये हैं. रोचक यह है कि नीतीश कुमार के सात निश्चय में खेती का कहीं उल्लेख ही नहीं है. महागंठबंधन के कॉमन मिनिमन प्रोग्राम में कृषि के विकास का उल्लेख जरूर है.
(प्रभात खबर में प्रकाशित)

Thursday, October 08, 2015

कोची-कोची का इलाज करेगा डॉगडर... पूरा बिहारे बिमार है...


चुनावी जमीन पर मुद्दों की पड़ताल-2
वाया आइजीआइएमएस, पटना
इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (आइजीआइएमएस) के विशाल गलियारे के डिवाइडर पर बैठे मिले 83 वर्षीय जमील अहमद. जमील सुपौल जिले में कोसी तटबंध के भीतर के गांव पचगछिया के रहने वाले हैं. पूछने पर कहते हैं, वे यहां हार्ट का इलाज कराने आये हैं. हार्ट में क्या हुआ, पूछने पर बताते हैं, घबराहट होती है, कभी-कभी अचानक धड़कन तेज हो जाती है और कमजोरी महसूस होती है. अस्पताल की परची देखने पर पता चलता है कि हृदय रोग है या नहीं यह अभी स्पष्ट नहीं हुआ है. इन्हें इसीजी, इको-कार्डियोग्राम और दूसरे ब्लड टेस्ट लिखे गये हैं. इसीजी और ब्लड टेस्ट का नतीजा आ चुका है, जो सामान्य ही है. इको करवाना है. जमील यहां तीसरी बार आये हैं. कोसी तटबंध के भीतर बसे अपने गांव से उन्हें यहां आने में तकरीबन 24 घंटे लग जाते हैं. सुबह आठ बजे निकलते हैं, दो नदियां पार कर, तकरीबन 10 किमी पैदल चलकर वे तटबंध तक पहुंचते हैं, फिर वहां से किसी सवारी से सुपौल, अपने गृह जिले तक पहुंचने में शाम हो जाती है. फिर वहां से रात की बस पकड़ कर सुबह सवेरे पटना पहुंचते हैं. वे अपने संभावित हृदय रोग की पड़ताल और उसके इलाज की उम्मीद में तीन दफा ऐसी यात्रा कर चुके हैं. 83 साल की उम्र में और कमजोरी की शिकायत के बावजूद, मगर अभी तक जाहिर नहीं हुआ है कि उन्हें हुआ क्या है. बात सिर्फ इतनी है कि सुपौल के डॉक्टर उनका रोग पकड़ नहीं पाये, और आइजीआइएमएस अस्पताल में इको जांच करने वाली मशीन पिछले कुछ दिनों से खराब थी, जो हाल-फिलहाल ठीक हुई है.
पूर्णिया जिले के बड़हरा प्रखंड के 16 साल के रुपेश यादव यहां कैथेटर डलवाने आये हैं. उनके पिता श्याम सुंदर यादव कहते हैं कि पूर्णिया के डॉक्टरों ने कहा कि कैथेटर यानी मूत्राशय में लगने वाली पाइप यहां नहीं लग सकती. पटना ही जाना पड़ेगा. वे पिछले 12 दिनों से इलाज के लिए पूर्णिया, पटना और यहां-वहां भटक रहे हैं. कैथेटर लगा कर रूपेश अपने माता-पिता के साथ ओपीडी के बाहर खुले में प्लास्टिक बिछा कर बैठे मिले. वे वहीं पैन में शौच कर रहे थे. पता नहीं विशेषज्ञ इसे खुले में शौच मानते हैं या नहीं. दरअसल उन्हें एडमिट नहीं लिया गया था, क्योंकि इसकी जरूरत नहीं थी. मूत्र रोगों में कैथेटर लगाना छोटी-मोटी बात है. मगर यहां चलने वाले लंबे इलाज के दौरान उन्हें इस तरह खुले में जमीन पर प्लास्टिक बिछा कर रहने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है.
अब यह चिकित्सा विभाग के विशेषज्ञ ही बता सकते हैं कि क्या ये इतनी बड़ी बीमारियां हैं कि लोगों को 20-24 घंटे की यात्रा करके पटना आना पड़े? क्या सुपौल के डॉक्टर या वहां के सदर अस्पताल में हृदय रोग की सामान्य जांच नहीं हो सकती? क्या उस पूर्णिया में डॉक्टर एक कैथेटर तक नहीं लगा सकते, जिसे पूर्वी बिहार का मेडिकल हब माना जाता है? आखिर इस व्यवस्था में कौन सी चूक है, जो मरीजों को इन छोटी-छोटी बीमारियों के लिए बिहार के इस सर्वश्रेष्ठ सरकारी अस्पताल के चक्कर लगाने पड़ते हैं? मरीजों से पूछता हूं, तो वे मुखर हो जाते हैं. कहते हैं, जिलों के सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था कुछ साल पहले ठीक तो हुई थी, मगर अब फिर वही ढाक के तीन पात हो गये हैं. डॉक्टर नहीं मिलता तो इलाज किससे करवायें. पहले तो सीधे दिल्ली एम्स तक दौड़ लगाना पड़ता था, अब यह एक आइजीआइएमएस हो गया है, जहां कुछ ढंग का इलाज होता है.
सुबह के सात बजे हैं, ओपीडी के सामने सैकड़ों मरीज जमा हैं. वे गेट खुलने का इलाज कर रहे हैं, गेट खुले तो नंबर लगायेंगे. आसपास में जहां आप नजर दौड़ायेंगे, बैठने की थोड़ी भी जगह हो तो वहां मरीज या उनके परिजन बैठे मिलते हैं. पूरे बिहार से यहां लोग आये हैं. देखने से मिनी बिहार लगता है. टीवी वाले जो दो-ढाई हजार सैंपल लेकर बिहार चुनाव का रिजल्ट बता देते हैं, वे यहां आकर ठीक-ठाक सर्वे कर सकते हैं. मगर यहां आने पर चुनावी सर्वे करने को जी नहीं चाहता.
प्रकाश कुमार, जो खुद एक स्वास्थ्य कर्मी हैं, अपने 17 साल के बच्चे को लेकर आये हैं, क्योंकि सीतामढ़ी के डॉक्टर ने उसकी किडनी में बड़े पत्थर होने की आशंका जाहिर कर दी है. हालांकि बच्चे को दर्द नहीं होता. 18 साल के तनवीर आलम, जो सहरसा, महिषी के भेलाही गांव के रहने वाले हैं, डॉक्टरों ने कहा है उनकी किडनी सिकुड़ रही है. सिंघिया, समस्तीपुर के खेतिहर मजदूर राजाराम पासवान के बेटे आठ साल के गुड्डू कुमार को वहां के डॉक्टरों ने लीवर में शिकायत बता दिया है. राजाराम 20 हजार रुपया 5 टका महीना सूद पर उठा कर आये हैं, अब इलाज में जो खर्च हो. दिहाड़ी मजदूर हैं, क्या करें.
सैकड़ों लोग जो यहां बैठे हैं और घूम रहे हैं, ओपीडी खुलने का इंतजार कर रहे हैं. ताकि इलाज की लंबी और थकाऊ प्रक्रिया की ढंग से शुरुआत कर सकें. लोग बताते हैं कि पहले 50 रुपये की परची कटेगी. फिर ढूंढ-ढांढ कर डॉक्टर के केबिन तक पहुंचना पड़ेगा. वहां दस बजे डॉक्टर बैठेंगे तो पता चलेगा कि अभी एडवांस नंबर चल रहा है. भारी-भीड़ के बीच डॉक्टर को दिखाते-दिखाते दो बज जायेंगे. डॉक्टर कुछ टेस्ट लिख देंगे जिनका अलग परचा कटता है. चुकि पहले दिन इतनी देर हो जाती है कि टेस्ट अगले दिन ही करा सकते हैं. फिर दो-तीन दिन में नतीजे आते हैं, फिर वही प्रक्रिया. खैर, इसके बावजूद आइजीआइएमएस में अच्छा इलाज होता है. गलत इलाज नहीं होता. मरीजों को ठगा और लूटा नहीं जाता. यह भरोसा उन्हें यहां खीच लाता है. पानी की बेसिन के आगे भी अच्छी खासी भीड़ है. लोग न सिर्फ दंतवन कर रहे हैं, बल्कि नहा लेने की भी कोशिश कर रहे हैं. कुछ लोग ओपीडी के सामने बने एक शौचालय में भी जा रहे हैं. मगर वहां चार्जेज काफी अधिक हैं. शौच का 7 रुपये, नहाने का दस रुपये और मूत्र करने का 2 रुपये. आप वहां मोबाइल भी चार्ज करवा सकते हैं. पांच रुपये में. ये सब जरूरी आवश्यकताएं हैं, मगर ये सुविधाएं यहां अस्पताल में आसानी से नहीं मिल सकती. जो लोग एडमिट हो गये हैं, वे तो वार्ड में शौचालय का उपयोग कर लेते हैं. बांकी लोगों का यह 20-25 रुपये का रोज का खर्च है.
बात इतनी ही नहीं. यहां दिखाने में कम से कम तीन-चार दिन लगते हैं और अगर मरीज भरती हो गया तो कम से कम 15 दिन तो रहना ही पड़ता है. ऐसे में मरीज के परिजनों को रहना, खाना-पीना सबकुछ इसी कैंपस में करना पड़ता है. रात कैंपस में ही गुजरती है, खुले आकाश के नीचे मच्छरदानी लगाये सैकड़ों लोग सोये नजर आते हैं.
सीवान के दरौली प्रखंड के दोन गांव के बालेश्वर प्रसाद एक बार 20 रोज तक इलाज करा कर अपनी दोनों किडनी से पथरी निकलवा कर लौट चुके थे, अब ऑपरेशन के वक्त बंधे तार को खुलवाने आये हैं. चार रोज से यहीं हैं, नंबर के इंतजार में. बालेश्वर अस्पताल के सामने छोटे वाले गैस सिलिंडर पर खुले आसमान के नीचे खाना पका रही अपनी पत्नी के साथ बैठे मिले. उन्हें मालूम है कि आइजीआइएमएस में इलाज कराना है तो अपना गैस सिलिंडर, अपना बरतन और कच्चा समान होना चाहिये, नहीं तो बिक जायेंगे. तभी तो 30 हजार में ही काम निकल गया. उनके जैसे पचासों लोग सुबह-शाम अस्पताल परिसर में इसी तरह खाना पकाते मिलते हैं. खुले आसमान में. देख कर थोड़ा अजीब लगता है, मगर क्या करें.
हालांकि पिछवाड़े में एक बड़ा शानदार रेस्तरां खुल गया है. वहां हर तरह का लजीज व्यंजन मिल जाता है. मगर लोग चाहते हैं, इसके बदले एक छोटा सा मेस खुल जाता जहां तीस रुपये में भी भरपेट खाना मिल जाता तो ज्यादा सहूलियत होती.
परवल छील रहे एक सज्जन बताते हैं, पहले यहां एक सरकारी धर्मशाला हुआ करती थी. जहां सौ रुपये में कमरा मिल जाता था, साथ में गैस चूल्हा और खाना पकाने का बरतन भी, बेहतरीन इंतजाम था. एटेंडेंट को बड़ी सुविधा हो जाती थी. मगर दो-तीन साल से वह बंद है. पूछने पर पास ही चाय बना रहा एक चाय दुकानदार बताता है, उहां नर्सिंग कॉलेज खुग गया. यानी नर्सिंग कालेज खुलना था इसलिए धर्मशाला की बलि ले ली गयी. बड़ा अच्छा इंतजाम होगा... मेरे मुंह से निकलते ही चाय वाला भड़क गया. इंतजाम तो बढ़ियां था मगर लोग ठीक रहने दें तब तो, घिना कर पैखाना घर बना दिये थे. बंद होना ही था. ई बिहार है भैया, लोग कोई चीज ठीक रहने दें तब न. उनके जवाब पर परवल छील रहे सज्जन कहते हैं, चलिये ठीक हुआ, धर्मशाला बंद हो गया. अब आपका चाय बिक रहा है न... जवाब सुन कर चाय वाला झेंप जाता है. मुस्कुराते हुए कहता है, किडनी का इलाज कराने आये हैं मरदे... वही करा लीजिये... अब कोची-कोची का इलाज करेंगे डागडर बाबू.... कहने को तो पूरा बिहारे बीमार है.
(प्रभात खबर में प्रकाशित)

Sunday, October 04, 2015

जहर मिलता रहा, जहर पीते रहे, रोज मरते रहे, वोट करते रहे...


चुनावी जमीन पर मुद्दों की पड़ताल-1
वाया मगध-गया-बेला विधानसभा-इस्माइलपुर बहादुरपुर बिगहा
गया पहुंचते ही मेरे मार्गदर्शक मगध जल जमात के सक्रिय सदस्य प्रभात कुमार ने मुझे चेता दिया कि भूल से भी गया शहर के किसी होटल का पानी नहीं पीजियेगा, आप पचा नहीं पायेंगे. वैसे भी पानी की जो विषैली गंध है वही आपको उस पानी को पीने नहीं देगी. हमलोग तो दो घंटे के लिए भी बाहर निकलते हैं तो पानी की बोतल साथ में रख लेते हैं. हालांकि मगध के इलाके के पानी के लिए प्रभात कुमार ने जो टिप्पणी की थी वह मेरे लिए चौकाने वाली नहीं थी, मगर हैरत की बात यह थी कि होटल वाले भी अपने ग्राहकों के लिए ढंग का पानी नहीं रखते. खास तौर पर यह देखते हुए कि बोधगया और पितृ पक्ष मेला की वजह से गया एक अंतरराष्ट्रीय किस्म शहर में तब्दील हो चुका है. यहां देशी-विदेशी पर्यटकों की भीड़ बारहो महीने रहती है. हो सकता है, प्रभात जी ने बड़े होटलों के बारे में यह नहीं कहा होगा, जहां ऐसे पर्यटक ठहरते हैं.
इन दिनों गया शहर में पितृपक्ष का मेला उफान पर है, सारे होटल पिंड दान करने वालों की भारी भीड़ की वजह से पहले से ही हाउसफुल हैं. लोगों ने अपने घरों के कमरे भी किराये पर उठाने शुरू कर दिये हैं. शहर में गेरुआ कपड़े पहने लोगों की अच्छी खासी भीड़ है, पिंड दानी सिर मुड़ाये यहां वहां भटकते नजर आते हैं. साथ में कुछ विदेशी सैलानी जिनके लिए यह मौका हिंदू धर्म की इस अजीबो-गरीब रस्म को देखने समझने और कैमरे में कैद कर लेने लायक मौका है. फाल्गु नदी और वैतरणी तालाब को कम से कम इन पंद्रह दिनों के लिए साफ सुथरा बना लिया गया है. मगर मेरी मंजिल न फल्गु नदी थी, और न ही वैतरणी तालाब. हम शहर से लगभग दस किमी दूर स्थित चूरी पंचायत के कुछ गांवों की तरफ जा रहे थे, जिनके बारे में सूचना थी कि पीने के पानी के संक्रमण की वजह से यहां के पचासों बच्चे और युवा विकलांग हो गये हैं. जोड़ों के दर्द की वजह से गांव के अधिकतर लोग उठने-बैठने और मेहनत-मजूरी करने से भी लाचार हो गये हैं. लगभग पूरा पंचायत फ्लोरोसिस नामक गंभीर बीमारी की चपेट में है और वह भी महज शुद्ध पेयजल की अनुपलब्धता की वजह से.
चुकि मैं फ्लोरोसिस प्रभावित कई गांवों की यात्रा कर चुका हूं, इसलिए यह जानकारी मेरे लिए चौंकाने वाली नहीं थी. मैं बस यह समझने जा रहा था कि आखिर वह कौन सी बाधा है जो इन गांवों को शुद्ध पेयजल का उपभोग करने नहीं दे रही. साफ पानी ही तो पीना है. अगर आप साफ पानी पियेंगे तो एक तो आपको इस तरह की गंभीर किस्म की बीमारी नहीं होगी. अनजाने में जिन लोगों को यह बीमारी हो गयी है, उनको भी काफी आराम पहुंचेगा. आज पंचायत से लेकर दिल्ली की सरकार तक के पास काफी पैसा है. शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के वादे और दावे हैं. फिर भी क्यों एक पूरी पंचायत विकलांगता का शिकार हो जाती है. और खुद लोग जो एक छोटी सी वजह से इस तरह की गंभीर बीमारी के शिकार हो जा रहे हैं, जिनको वोट देते हैं, उन पर दबाव क्यों नहीं बनाते कि वे उन्हें इस खतरनाक स्थिति से मुक्ति दिलायें.
पहला गांव इस्माइलपुर बहादुर बिगहा था. घुसते के साथ ईंट पर बैठे मिले 27 साल के युवक राम कृष्ण. तसवीर में जब आप उन्हें देखेंगे तो पायेंगे कि वे न राम हैं न कृष्ण. वे तो बामन देव बनकर रह गये हैं. उनकी ऊंचाई बमुश्किल साढ़े तीन या चार फीट होगी. पांव मुड़ गये हैं. उनके लिए चलना-फिरना मुहाल है. जन्म से वे ऐसे नहीं थे. 15 साल की उम्र तक उनके शरीर की बनावट किसी आम किशोर जैसी ही थी. मगर फिर अचानक उनके पांव मुड़ने लगे और पांव के मुड़ने की वजह से उनकी हाइट भी कम होने लगी. अब वे युवा तो हैं, मगर किसी काम के नहीं हैं. मेहनत-मजूरी उनके बस की नहीं है. ऐन पढ़ने-लिखने की उम्र में यह हादसा हुआ तो पढ़ाई-लिखाई भी छूट गयी.
थोड़ा आगे बढ़ने पर मिली सियामनी देवी. 45-50 साल उम्र है. मगर लगती सत्तर की हैं. पांच साल से बिस्तर पर हैं. शरीर में तेज लहर, दर्द और झुनझुनी की शिकायत है. हमेशा कराहती रहती हैं. दर्द जब तेज होता है तो तेज आवाज में चीखने-चिल्लाने लगती हैं. घर वाले चाह कर भी इनकी कोई मदद नहीं कर पाते. इन दिनों पांव में एक अजीब किस्म का घाव हो गया है. जिस पर मख्यियां भिनभिनाती रहती हैं. मगर खुद में इतनी ताकत नहीं बची है कि इन मख्यियों को उड़ा पाये. उनकी हालत तो ऐसी है कि करवट बदलने के लिए भी दूसरों की मदद लेनी पड़ती है. मगर मदद भी करे तो कौन करे. उनके पति खुद फ्लोरोसिस के शिकार हैं. किसी तरह चलते-फिरते हैं. बैठ गये तो उठना मुहाल. खेतों में बिखरे अनाज के दाने बटोर कर खाना-पीना होता है. तीन बेटे हैं. उन्हें भी कुछ न कुछ परेशानी है. एक बेटा फिर भी रोजी-रोजगार करता है. मगर वह पूरे परिवार का भार उठाने के लिए तैयार नहीं है.
ये लोग रविदास हैं. यानी महादलित. इतनी परेशानियों के बावजूद इनके मन में मांझी को जिताने का सपना है. हालांकि ये मुखर नहीं होते. क्योंकि मुखिया जी राम खेलावन यादव विधायक जी के आदमी हैं. कोई सुन लेगा तो परोबलम(प्रोब्लम) हो जायेगा. इसलिए राजनीति की बातें फुसफुसाकर करते हैं. मैंने जब पूछा कि मांझी के जीतने से क्या उनकी समस्या का समाधान हो जायेगा. दरद-लहर सब ठीक हो जायेगा? तो कहते हैं, नही बाबू... सबको भोट चाहिये. आजकल, काम कहां कोई करता है. चाहे इ हो, चाहे ऊ हो... सब एक्के रंग का है. मगर अपना जात-बिरादरी है तो कुछ तो देखना पड़ता है, बाबू.
यह क्षेत्र बेला विधानसभा के अंतगर्त आता है. यहां के विधायक सुरेंद्र यादव हैं. लगातार चार चुनाव से जीत रहे हैं. बाहुबली हैं. अजेय माने जाते हैं. पिछले चुनाव में इनके खिलाफ जदयू ने एक मुस्लिम उम्मीदवार को मैदान में उतारा था, इस उम्मीद में कि इस क्षेत्र में मुसलमानों की बड़ी आबादी है. मगर मुसलमानों ने महजब को तरजीह नहीं दी. इस बार भी हम पार्टी ने एक मुसलमान को उतारा है.
मैंने पूछा, विधायक जी इस बार वोट मांगने आयेंगे तो पूछियेगा न कि आप लोगों की समस्या का समाधान करवा दें? तो गांव के जोगिंदर मोची कहते हैं, हमरे गांव में विधायक जी उतरते भी कहां हैं, गाड़ी के खिड़की से हाथ जोड़े चले जाते हैं. हमलोग भी सोचते हैं कि धुर, जब दूसरा कोई आदमी जितबे नहीं करता है तो इनको ही भोट दे दिया जाये. काहे मुखिया जी से संबंध खराब किया जाये.
गांव का बच्चा-बच्चा जान गया है कि यह भीषण रोग सिर्फ पानी के कारण हो रहा है. पेयजल विभाग के लिए सालों पहले गांव के हैंडपंपों का पानी चेक करके गये हैं और हैंडपंप पर लाल निशान लगा दिया गया है. यानी यहां का पानी खतरनाक है, इसे न पियें. पांच साल पहले वैकल्पिक उपाय भी किये गये. लाखों की लागत से इस पंचायत में दो वाटर ट्रीटमेंट प्लांट लगाये गये. पाइप बिछाकर पेयजल उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गयी. इन प्लांटों का पानी कुछ दिन तो रविदास टोले में पहुंचा फिर पहुंचना बंद हो गया.
क्यों? इसका जवाब देते हुए टोले के लोग कहते हैं कि उसी समय सड़क बन रही थी तो पाइप टूट गया और इधर पानी आना बंद हो गया. अब मुखिया जी पाइप ठीक कराते नहीं हैं, कहते हैं कि अगर पानी चाहिये तो उनके दरवाजे से लेकर आयें. दरअसल यह प्लांट मुखिया जी के दरवाजे पर बिठाया गया है. जो इस टोले से कम से कम डेढ़ दो किमी दूर है. हालांकि लोग वहां भी जाकर पानी ले आते, मगर यह भी उतना आसान नहीं है. वहां जाने पर मुखिया जी टोका-टोकी करने लगते हैं. अक्सर झगड़े की स्थिति बन जाती है. लोगों का कहना है कि दरअसल मुखिया जी चाहते ही नहीं है कि दूसरे टोले के लोग इस पानी का इस्तेमाल करें. वे इस पूरे फ्लोराइड मुक्त जल का इस्तेमाल खुद करना चाहते हैं, अपने टोले के लोगों को करने देना चाहते हैं. रविदास टोले के लोगों का आरोप है कि वहां स्थिति ऐसी है कि मुखियाजी के भैंसों को भी इस पानी से नहलाया जाता है, मगर हमें पीने का पानी भी नहीं मिलता.
यह पानी की राजनीति है, जो देश व्यापी है. पेयजल विभाग के संसाधनों पर गांव की दबंग जातियां हर बार कब्जा कर लेती हैं और दलित, गरीब-गुरबों के हाथ में कुछ नहीं आता. चापाकल लगना हो, या नल की टोटी. हमेशा मुखिया जी और उनके करीबियों के घर के पास लगता है. समाज का निचला तबका पेयजल की इस राजनीति का शिकार होकर हमेशा दूषित जल पीता रहता है. आज भी इस्माइलपुर बहादुरपुर बिगहा के लोग बेखौफ होकर लाल निशान वाले हैंडपंप का पानी पी रहे हैं. यह जाने बगैर कि इन पंपों से जो पानी निकल रहा है, उसमें 17 मिग्रा प्रति लीटर की दर से फ्लोराइड भी है. यह मात्रा देश में संभवतः सर्वाधिक है. तयशुदा मानकों के मुताबिक अगर पानी में 1.5 मिग्रा प्रति लीटर से अधिक फ्लोराइड हो तो वह पीने लायक नहीं होता.
मगर यह पेयजल की राजनीति का एक चरण है. इस राजनीति के कई और चरण हैं. फिर हम चुड़ावन नगर पहुंचते हैं. वह भी इसी पंचायत का हिस्सा है. भुइयां लोगों की इस बस्ती में भी एक वाटर प्यूरीफायर लगा है.(तसवीर देखें) इस वाटर प्यूरीफायर में पानी तो साफ होता है मगर वहां की व्यवस्था कैसी है, यह आप देखकर अंदाजा लगा सकते हैं. ऐन प्यूरीफायर से सटे मकान के बाहर जुड़ुवां बच्चियां नजर आती हैं. इनके पांव टेढ़े होने लगे हैं. मैं जब इनकी तसवीर लेने लगता हूं तो ये डर के मारे रोने लगती हैं. एक और बच्चा है, साल भर का भी नहीं होगा, मगर पांव टेढ़े हो गये हैं. गांव के लोग बताते हैं कि ये लोग इसी प्यूरीफायर का पानी पीते हैं. फिर ऐसा क्यों हुआ? इस सवाल का उनके पास कोई जवाब नहीं है. मगर इसका मतलब है, पांच साल पहले लगे इस प्यूरीफायर ने फ्लोराइड मुक्त करना बंद कर दिया है.
बाद में कुछ सरकारी सूत्रों से जानकारी मिलती है कि लखनऊ की संस्था वाटर लाइफ ने इन संयंत्रों को स्थापित किया था और निगरानी और मरम्मत का ठेका भी उनके ही पास है. फ्लोराइड ट्रीटमेंट प्लांट में नियमित निगरानी की जरूरत होती है और मशीन खराब हो जाये तो उसे ठीक करना और तयशुदा वक्त पर उसके मेंब्रेन को बदलना जरूरी होता है. मगर इंस्टॉलेशन के बाद लखनऊ की वह संस्था दुबारा लौट कर इन गांवों में आयी ही नहीं. लिहाजा इन प्लांट से जो पानी साफ हो रहा है वह गांव के लोगों की जरूरतें पूरी नहीं कर पा रहा. सरकारी रिकार्ड्स में इन गांवों को फ्लोराइड मुक्त मान लिया गया है. मगर फ्लोराइड ने एक बार फिर गांव के बच्चों पर हमला कर दिया है.
पिछले साल मैं नवादा के कचरियाडीह गांव में भी गया था (रिपोर्ट पढ़ें). वहां की हालत भी कुछ ऐसी ही थी. मेंटेनेंस के अभाव में प्लांट बंद पड़ा था और एजेंसी गायब थी. सरकारी खातों में उस गांव को भी फ्लोराइड मुक्त मान लिया गया था. दरअसल पूरे दक्षिण बिहार में लोग जाने-अनजाने फ्लोराइड युक्त पानी पी रहे हैं. बिहार सरकार के आंकड़ों के मुताबिक 11 जिलों की 4157 बस्तियों के पानी में फ्लोराइड की मात्रा तयशुदा मानक से अधिक है. ये जिले हैं, नालंदा, औरंगाबाद, भागलपुर, नवादा, रोहतास, कैमूर, गया, मुंगेर, बांका, जमुई और शेखपुरा. हालांकि वास्तविक धरातल पर अगर इमानदारी से पता किया जाये तो ये आंकड़े भी गलत साबित होंगे. इन आंकड़ों के मुताबिक गया की सिर्फ 129 बस्तियों में ही फ्लोराइड की मात्रा मानकों से अधिक है. मगर सरकारी सूत्र ही बताते हैं कि ऐसी बस्तियों की संख्या 517 है.
जानकार बताते हैं कि हड्डियों का मुड़ना फ्लोरोसिस का अंतिम चरण है. इसके अलावा भी इस रोग के कारण कई परेशानियां होती हैं. जैसे, खाने का नहीं पचना, गैस्ट्रिक्ट, दांतों का घिसना, जोड़ों का दर्द. अब इन रोगों को कोई फ्लोरोसिस के तौर पर नहीं लेता. वह नहीं मानता कि उसके पेयजल में कोई खराबी है. लिहाजा एक बड़ी आबादी जाने-अनजाने फ्लोराइड युक्त पानी पीती रहती है. वह इन छोटी-मोटी बीमारियों का शिकार होती रहती है.
बिहार के लोगों के लिए फ्लोराइड संक्रमण ही एक बड़ा खतरा नहीं है. मध्य बिहार के 13 जिले आर्सेजिक के कहर के शिकार हैं. ये जिले हैं- बक्सर, भोजपुर, सारण, पटना, वैशाली, समस्तीपुर, बेगुसराय, भागलपुर, लखीसराय, मुंगेर, खगड़िया, दरभंगा और कटिहार. उसी तरह कोसी-सीमांचल के नौ जिलों के लोग आयरनयुक्त जल पीने को विवश हैं. ये जिले हैं, खगड़िया, पूर्णिया, कटिहार, अररिया, सुपौल, किशनगंज, बेगूसराय, मधेपुरा और सहरसा.
यानी तकरीबन पूरा बिहार पीने के पानी में आर्सेनिक, आयरन या फ्लोराइड जैसे विषैले तत्वों को पीने के लिए विवश है. अब एक नया जहरीला तत्व सामने आया है, नाइट्रेट, जो गर्भस्थ और नवजात शिशुओं के लिए काल के समान है. इन तत्वों की वजह से बड़ी आबादी तरह-तरह की छोटी-बड़ी बीमारियों की चपेट में है, मगर आज चुनावी बहस में शुद्ध पेयजल का सवाल किसी की जुबान पर नहीं है. उनकी जुबान पर भी नहीं, जिनकी वजह से पीने का पानी ही उनके लिए जानलेवा हो गया है.