Sunday, October 02, 2016

कहानी उस संत की जिसने गांधी को चंपारण बुलाने के लिये दान कर दी थी तीन बीघा जमीन


आज गांधी जयंती तो है ही इस साल चंपारण सत्याग्रह के सौ साल पूरे होने वाले हैं. चंपारण आंदोलन के सौ साल पूरे होने का मतलब है भारत में गांधी के सत्याग्रह आंदोलन का सौ साल पूरा होना. इसलिए आज चंपारण आंदोलन की बातें करूंगा. वैसे तो इस आंदोलन के नायकों की जब बात आती है तो गांधी को इस इलाके में खींच कर लाने वाले किसान राजकुमार शुल्क, निलहे किसानों की व्यथा को सामने लाने वाले पत्रकार हरबंस सहाय औऱ पीर मोहम्मद मूनीस, इन किसानों का मुकदमा लड़ने वाले वकील ब्रजकिशोर बाबू, बत्तख मियां जिनके नाम से मोतिहारी स्टेशन का एक गेट बना है और कई किरदार याद आते हैं. मगर आज एक नये किरदार से आपका परिचय कराना चाहूंगा जिन्होंने गांधी को चंपारण बुलवाने के लिए अपनी तीन बीघा जमीन को दान कर दिया था.
ये थे अमोलवा गांव के संत भगत. इनकी कहानी मुझे तब मालूम हुई जब मैं इस साल चंपारण की यात्रा पर था. मैं भितिहरवा गांव गया था, गांधी जी द्वारा शुरू किये गये दूसरे विद्यालय को देखने के लिए. आज वह विद्यालय तो किसी और रूप में अपनी जगह से कुछ दूरी पर है, मगर उस विद्यालय के खपरैल भवन को सुरक्षित रखा गया है. और उसे घेर कर बिहार सरकार ने गांधी संग्रहालय का रूप दे दिया है. उसी संग्रहालय में मुझे अमोलवा के संत भगत की तसवीर मिली. संग्रहालय में उस विद्यालय के पहले छात्र मुकुटधारी महतो की भी मूर्ति लगी थी, जो बाद में गांधीवादी स्वतंत्रता सेनानी हो गये थे. जब मैं उनके घर गया तो वहां मुझे एक हस्तलिखित पांडुलिपी दिखायी गयी, जिसमें चंपारण सत्याग्रह की कहानी दर्ज थी. उसी पांडुलिपी में बताया गया था कि गांधी को कैसे चंपारण लाया गया.
कहानी कुछ यूं थी कि इस इलाके के किसान नीलहे अंगरेजों के अत्याचार से त्रस्त थे. वे समय-समय पर विद्रोह करते रहते थे. उनके मुकदमे वकील ब्रजकिशोर प्रसाद लड़ते थे और उन पर होने वाले जुल्म के किस्से कानपुर से गणेश शंकर विद्यार्थी के संपादन में प्रकाशित होने वाले अखबार प्रताप में छपा करते थे. बिहार में इन खबरों को छापने के लिए कोई अखबार तैयार नहीं होता, एक बार एक अखबार में खबर छपी तो बवाल हो गया और खबर लिखने वाले पत्रकार को नौकरी से निकाल दिया गया. तो उस वक्त हरबंस सहाय औऱ पीर मोहम्मद मूनिस बिहार से प्रताप अखबार में लिखा करते थे. राजकुमार शुल्क चंपारण के मामलों में उनके सूत्र थे. एक दिन संभवतः कानपुर में एक भावुक क्षण में जब राजकुमार शुक्ल ने गणेश शंकर विद्यार्थी से पूछा कि हम किसानों के दुखों का अंत कैसे होगा, तब विद्यार्थी जी ने गांधी का नाम सुझाते हुए कहा कि एक वही व्यक्ति है जो आपकी समस्या का समाधान कर सकते हैं. तब से राजकुमार शुक्ल पर धुन सवार हो गयी कि वे हर हाल में गांधी को चंपारण लाकर रहेंगे.
भैरवलाल दास जी ने जो राजकुमार शुक्ल की डायरी का प्रकाशन किया है, उसमें भी इससे संबंधित कई जानकारियां मिलती हैं, जो भितिहरवा वाली पांडुलिपी में दर्ज है, जिसे संभवतः भितिहरवा आश्रम के पहले शिष्य मुकुटधारी महतो ने लिखा है. तो इस मुद्दे पर इलाके के किसानों की बैठक हुई. तय हुआ कि गांधी को चंपारण लाया जाये. जिम्मा राजकुमार शुक्ल को दिया गया. मगर तब तक अंगरेजों से लड़ते-लड़ते राजकुमार शुक्ल की माली हालत काफी कमजोर हो चुकी थी. गांधी को लाने और आंदोलन चलाने के लिए काफी पैसा खर्च होने वाला था. तो उस बैठक में मौजूद अमोलवा के बड़े किसान संत राउत उर्फ संत भगत ने तीन बीघा जमीन राजकुमार शुक्ल के नाम से लिख दी ताकि वे इस आंदोलन को चला सकें और गांधी को चंपारण ला सकें.
यह जानकारी मिलने पर मैं अमोलवा गांव में संत भगत के घर गया. वहां उनका पुराना मकान अच्छी हालत में है. उनके पोतों का परिवार उसमें रहता है. उन लोगों ने मुझे वह कमरा भी दिखाया जिसमें कस्तूरबा छह माह तक रही थीं. उन लोगों ने जो बताया उससे समझ आया कि संत भगत कम पढ़े लिखे व्यक्ति थे, मगर पढ़े लिखे व्यक्तियों के संपर्क में रहा करते थे. राजकुमार शुक्ल से उनकी मित्रता इसी वजह से थे. जमीन को लेकर मुकदमे होते रहते थे, और इसमें राजकुमार शुक्ल उनकी मदद किया करते थे.
वे न सिर्फ चंपारण आंदोलन के एक महत्वपूर्ण फाइनेंसर थे, बल्कि उन्होंने बाद के दिनों में सक्रिय भागीदारी भी की. भितिहरवा आश्रम जो उनके गांव से कुछ ही दूरी पर था की स्थापना के बाद से बाहर से आने वाले गांधी के सहयोगी उनके घर में ठहरा करते थे. कस्तूरबा तो रहती ही थीं. हां, निलहे अंगरेजों की रियाया होने की वजह से कभी उनकी हिम्मत सीधी लड़ाई लड़ने की नहीं हुई. जबकि राजकुमार शुक्ल सीधी टक्कर लेने के लिए मशहूर थे.
कहते हैं, कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में राजकुमार शुक्ल ने चंपारण के किसानों के दुख दर्द का बड़ा मार्मिक विवरण पेश किया था. जिसे सुन कर गांधी जी ने वादा किया था कि वे चंपारण जरूर आयेंगे. मगर वे तत्काल आये नहीं. राजकुमार शुक्ल ने फिर उनका पीछा कोलकाता तक किया. जब गांधी राजकुमार शुक्ल के साथ पटना पहुंचे तो पहले डॉ. राजेंद्र प्रसाद के घर गये. राजेंद्र बाबू उस वक्त उनके घर में नहीं थे और उनके नौकरों ने गांधी को देहाती मुवक्किल समझ लिया और उनके साथ ठीक बर्ताव नहीं किया. तब वे मौलाना मजहरूल हक के घर गये.
चंपारण की लड़ाई की सबसे बड़ी सफलता मुजफ्फरपुर कोर्ट में गांधी की पेशी थी. उस वक्त अंगरेजों ने सोचा था कि गांधी को गिरफ्तारी की धमकी देकर मुजफ्फरपुर से ही लौटा देंगे. संबंधित अधिकारी ने रात भर तैयारी की थी जिससे गांधी को बताया जा सके कि उनका चंपारण जाना गैरकानूनी है. उन्हें लगा था कि एक वकील रह चुके गांधी अधिक से अधिक जिरह करेंगे. मगर जब गांधी ने तमाम आरोपों को स्वीकार कर लिया और कहा कि वे चंपारण जाकर रहेंगे, अगर ब्रिटिश सरकार उन्हें गिरफ्तार करना चाहती है तो कर सकती है. ऐसा पहली बार हुआ था जब ब्रिटिश सत्ता को किसी निहत्थे आदमी ने कहा था कि वे उन्हें गिरफ्तार करना चाहे तो कर सकती है, जो जेल जाने से नहीं डर रहा था. और मुजफ्फरपुर का प्रशासन उन्हें गिरफ्तार करने और गिरफ्तारी के बाद की स्थिति से निबटने के लिए तैयार नहीं था. उन्हें गांधी को चंपारण जाने देना पड़ा. यह बहुत बड़ी मानसिक जीत थी. इसके मानसिक शक्ति के आगे मुजफ्फरपुर में पहली बार अंग्रेज पराजित हुए थे और बाद के दिनों में होते चले गये....
इस कहानी में मैं खास तौर पर उस महंथ का नाम भी जोड़ना चाहूंगा जिन्होंने निलहे किसानों के भय की परवाह किये बगैरह भितिहरवा में गांधी जी को विद्यालय खोलने के लिए जमीन दी थी. जब गांधी उस इलाके में विद्यालय शुरू करना चाहते थे तो निलहे अंगरेज इसके खिलाफ थे. उन्होंने साफ-साफ शर्त रख दी थी कि उनके इलाके में यह स्कूल नहीं खोला जा सकता. वरना संत भगत तो अपनी जमीन देने के लिए तैयार ही थे. अब ऐसी स्थिति में तय हुआ कि अमोलवा गांव के नजदीक कोई किसी गांव में स्कूल खोला जाये जो निलहों के इलाके में नहीं पड़ता है. ऐसे में पड़ोस का भितिहरवा गांव मिला जहां संत भगत के कई परिचित रहते थे. हालांकि अंगरेजों के भय से कोई जमीन देने के लिए तैयार नहीं था. मगर तब एक महंथ ने अपने मठ की जमीन गांधी जी को दे दी. फिर आनन-फानन में फूस का आश्रम खड़ा हुआ. मगर एक-दो दिन ही बीते थे, कि अंगरेजों ने उस आश्रम में आग लगवा दिया. मगर गांधी जी के साथ इससे हारे नहीं. रातो-रात चंदा हुआ और दिन भर में ही एक खपरैल मकान खड़ा कर लिया गया, जिसे आग का खतरा नहीं था. आज भी भितिहरवा गांव में उस महंथ की कुटी फूस की ही है जबकि बगल में वह आश्रम किसी भव्य स्मारक की तरह नजर आता है.

Sunday, September 25, 2016

विद्यापति गीतों को राग-बद्ध करने वाले मांगैन गवैया, जिनके ठुमरी-खयाल का देश दीवाना था


सहरसा जिला मुख्यालय से तकरीबन 20 किमी दूर है पंचगछिया गांव. हम उस गांव एक ऐसे शास्त्रीय गायक की विरासत को देखने गये थे जिन्हें विद्यापति गीतों को रागबद्ध करने का श्रेय जाता है. उनकी ठुमरी और खयाल गायकी के दीवाने फैयाज खां, पं. ओंकारनाथ ठाकुर, विनायक राव पटवर्धन और अख्तरीबाई फैजाबादी जैसे गायक थे. रामचतुर मल्लिक उन्हें मधुकंठ गायक कहा करते थे. रोचक बात यह है कि वे महज एक घरेलू नौकर थे और पछगछिया रियासत में बरतन मांजा करते थे. कहते हैं, पंचगछिया रियासत के मालिक रायबहादुर लक्ष्मीनारायण सिंह ने बचपन में ही उनकी प्रतिभा को पहचाना और अपना शिष्य बना लिया. फिर उन्हें शास्त्रीय गायन की शैली सिखायी, जिसके दम पर उस अलौलिक गवैया ने पूरे देश के संगीतप्रेमियों को अपनी आवाज का दीवाना बना दिया. उस गायक का नाम था मांगैन लाल.
हालांकि शास्त्रीय संगीत की कद्रदानी की पंचगछिया की परंपरा दशकों पहले दम तोड़ चुकी है, फिर भी उस बड़े गांव में मांगैन गवैया का घर ढूंढने में अधिक मुश्किल नहीं हुई. मगर घर के नाम पर जो उजड़ी झोपड़ी दिखी वह दिल तोड़ने वाली थी. याद आ गयी जाने-माने संगीत समीक्षक और संगीत पर कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखने वाले पद्मश्री गजेंद्र नारायण सिंह द्वारा सुनायी गयी वह कथा कि जब काठमांडु की संगीत महफिल में मांगैन ने राग मालकौश की बेहतर प्रस्तुति दी थी तो उन्हें नेपाल के राजा ने अशर्फियों और हीरे-जवाहरातों से नवाजा था. उस वक्त मांगैन ने यह तमाम उपहार अपने तत्कालीन संरक्षक बाबू ब्रह्मनारायण सिंह को यह कहते हुए सौंप दिया था कि, लीजिये, इसका हम क्या करेंगे. और आधे ही घंटे बाद मांगैन उनके पास पहुंच गये थे कि दो पैसा दीजिये, बीड़ी खरीदनी है.
एक टूटी मड़ई, जो उनके घर के दलान जैसी थी, वहां उनके मंझले पोते दिनेश महतो सोये हुए थे. वे उम्र और बीमारी से लाचार नजर आ रहे थे. अपने बाबा मांगैन गवैया को याद करते हुए वे भाव विभोर हो गये. कहने लगे, हम तो उनको देखे नहीं, मगर जो किस्सा अपने बाबूजी और बड़े भाई से सुना उससे लगता है कि वे अलौकिक पुरुष थे. उनके द्वारा अर्जित संपत्ति तो हमें नहीं मिली, मगर आज भी उनके मरने के 60-70 साल बाद आप जैसा कोई व्यक्ति उन्हें ढूंढने आ जाता है. गांव के लोग हमें मांगैन गवैया की संतान कह कर सम्मान देने हैं, यह सबसे बड़ी उपलब्धि है.
कला एवं संस्कृति विभाग के उप सचिव एवं जाने-माने मैथिली कवि तारानंद वियोगी कहते हैं, मांगैन जी की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उन्होंने विद्यापति के गीतों को पहली बार राग-बद्ध किया. आज विद्यापति के जीतने भी गीत एकल स्वर में गाये जाते हैं, उनका राग मांगैन जी का ही तैयार किया हुआ है. उनसे पहले विद्यापति गीत को विभिन्न अवसरों पर महिलाएं सामूहिक रूप से गाती थीं या पिछड़ी-दलित जाति के नटुए बिदापत नाच में इस्तेमाल करते थे. हालांकि गजेंद्र नारायण सिंह विद्यापति गीतों को राग-बद्ध करने का श्रेय पं. रामचतुर मल्लिक को भी देते हैं. मांगैन गवैया एक शास्त्रीय गायक के रूप में भी देश के चुनिंदा गायकों की श्रेणी में गिने जाते हैं.
गजेंद्र नारायण सिंह बताते हैं कि कई महफिलों में पं. ओंकारनाथ ठाकुर ने उनकी प्रतिभा का लोहा मानते हुए उनके गायक के बाद गाने से इनकार कर दिया. अख्तरीबाई फैजाबादी ने एक बार जब उनका गाया दादरा, बाबू दरोगाजी, कौन जतन से धइलौ पियवा मोर... सुना तो घंटों सुबकती रहीं और यह कह कर उन्हें चुप कराया कि जान ले लइबू का... उनके गायन के मुरीद रायगढ़ रियासत के राजा चक्रधर सिंह ने तो उन्हें अपने रियासत में बस जाने का न्योता तक दे दिया था और बंगला, गाड़ी समेत पांच सौ रुपये प्रतिमाह देने का ऑफर दिया था. मगर उन्होंने यह कहते हुए उस ऑफर को ठुकरा दिया कि वे पचगछिया छोड़ कर कहीं नहीं रह सकते.
गजेंद्र नारायण सिंह मांगैन की कहानी को एक जमींदार और एक घरेलू नौकरी के बीच के अंतर्संबंध की कहानी के रूप में देखते हैं. वे कहते हैं कि यह अपने आप में अनूठी मिसाल है कि एक रायबहादुर ने अपने घरेलू नौकरी को संगीत की दुनिया का चोटी का सितारा बना दिया. रायबहादुर को उनके गले का इतना ख्याल रहता था कि वे उनके गले में गर्म हलवे की पट्टियां बंधवाकर रखते थे. रायबहादुर लक्ष्मीनारायण सिंह का मांगैन गवैया पर जो स्नेह था उसकी तस्दीक मांगैन गवैया के बड़े पोते गणेश महतो भी करते हैं. उन्हें अपने दादा को देखने और उनका स्नेह हासिल करने का मौका मिला था. जब मांगैन गवैया की मृत्यु हुई तो वे 12-13 साल के थे.
गांव में आम के बगीचे में एक मचान पर बैठे गणेश महतो कहते हैं, बाबा का ज्यादातर समय पंचगछिया ड्योढी में ही गुजरता था. वहीं रियाज होता और वहीं से देश भर में वे अलग-अलग रियासतों में गायन की प्रस्तुतियां देने जाते. मगर जब वे खाली होते और घर आते तो उन्हें हारमोनियम बजाना सिखाते. गणेश कहते हैं, बाबा ने ही उन्हें रघुपति राघव राजा राम भजन गाना सिखाया और आज भी वे रोज एक बार इस भजन को गा ही लेते हैं.
गणेश बताते हैं कि पंचगछिया के रायबहादुर और उनके घरेलू खवास(नौकर) का यह आपसी स्नेह एक छोटे से मसले पर टूट गया. रायबहादुर साहब डिस्ट्रक्ट बोर्ड के चेयरमैन पद के लिए चुनाव में खड़े हुए थे. एक दिन रायबहादुर ने बाबा से पूछा कि वे किसको वोट देंगे. तो मांगैन ने कह दिया, अपने गांव के मुख्तार साहब को. इस बात पर रायबहादुर ने उन्हें हवेली से निकाल दिया. रायबहादुर और मांगैन के बीच मतभेद की बात तारानंद वियोगी भी स्वीकार करते हैं, मगर वे इसकी वजह रायबहादुर के गोतिया ब्रह्मनारायण सिंह को मानते हैं. वे कहते हैं कि मांगैन असल में ब्रह्मनारायण सिंह के चरवाहा थे. जब मांगैन की शोहरत फैलने लगी तो उन्होंने मांगैन पर दावा कर दिया.
वजह जो भी हो, मगर सच यही है कि बीसवीं सदी के चौथे दशक में दोनों मालिक और नौकर के बीच स्नेह का धागा टूट गया और ब्रह्मनारायण सिंह मांगैन के मालिक-मुख्तार और मैनेजर हो गये. वे पहले उन्हें दरभंगा इस उम्मीद से लेकर गये कि वहां उन्हें राज दरबार में नौकरी लग जायेगी. मगर वहां बात जमी नहीं. फिर ब्रह्मानंद सिंह के साथ ही मांगैन कोलकाता की अखिल भारतीय संगीत सभा के कार्यक्रम में भी गये. जहां उन्होंने गायन की ऐसी छटा बिखेरी कि देश भर के गायक उनके दीवाने हो गये. कोलकाता के संगीत सभा की कथा गणेश महतो भी रोचक अंदाज में सुनाते हैं और गजेंद्र नारायण सिंह भी इस बात की तस्दीक करते हैं.
गजेंद्र नारायण सिंह कहते हैं कि कोलकाता में सफल गायन के बाद मेगाफोन कंपनी ने मांगैन के गीतों का रिकार्ड भी तैयार कराया था. कंपनी वाले ने मांगैन ने बतौर रॉयल्टी 25 हजार रुपये पेश किये. मगर इस ऑफर पर ब्रह्मनारायण सिंह नाराज हो गये और उन्होंने एक लाख रुपये की मांग की. कंपनी ने इस मांग पर हाथ खड़े कर दिये. इस पर नाराज होकर ब्रह्मनारायण सिंह से सारे रिकार्ड्स तोड़ डाले.
गणेश महतो कहते हैं कि ब्रह्मनारायण सिंह की वजह से ही आज उनका परिवार इस हाल में है. उनके दादा को पूरे देश की रियासतों से खूब सारे इनाम मिले थे और राजाओं ने जमीन दान किये थे. कितनी जमीन मिली उसका कोई हिसाब नहीं. मगर तमाम तोहफों पर ब्रह्मनारायण सिंह ने कब्जा जमा लिया और जमीन जहां मिली तत्काल वहीं उसका सौदा कर लिया. खुद रायबहादुर लक्ष्मीनारायण सिंह ने जो जमीन उनके दादा को दी थी उसका भी बड़ा हिस्सा ब्रह्मनारायण सिंह ने बेच खाया. मांगैन गवैया अनपढ़ तो थे ही मौजी जीव भी थे. उन्हें संपत्ति की कोई ख्वाहिश नहीं थी और वे जब तक जिंदा रहे राजसी ठाठ में ही उनका जीवन गुजरा. मगर जब 1942-43 में उनकी मौत हो गयी तो इसी वजह से उनके परिवार को खाने के लाले पड़ने लगे.
मांगैन गवैया की मौत के बाद उनके एकमात्र पुत्र लड्डू गवैया ने शास्त्रीय संगीत की उस परंपरा को थोड़ा आगे बढ़ाया. मगर उसके बाद पंचगछिया संगीत घराने का माहौल भी खत्म हो गया और पारिवारिक हालत ने भी साथ नहीं दिया. लड्डू गवैया के तीन पुत्र हुए, जिनमें अभी दो वयोवृद्ध हालत में जिंदा हैं. ये लोग अपनी जवानी में भजन-कीर्तन करते रहे हैं. इनके बच्चों से तो गीत और साज दोनों छूट गये. तीन परिवार के पास दो-तीन बीघा करके जमीन है, जिससे इनका उपार्जन चलता है. लड़के दिल्ली जाकर नौकरी करने लगे हैं.
मांगैन गवैया की गायन परंपरा को उनके शिष्य उपेंद्र यादव ने निभाया. वे शास्त्रीय संगीत गाते रहे हैं. मगर इन दिनों वे काफी बीमार हैं और बताया जाता है कि स्थिति नाजुक है. मांगैन गवैया के घर में उनकी कोई निशानी बची नहीं है. हारमोनियम शिष्य उपेंद्र यादव के पास है तो तानपुरा को पसराहा स्थित एक स्कूल में रखा गया है.
बीसवीं सदी के आखिरी सालों में मांगैन गवैया एक बार फिर से तब चर्चा में आये जब तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने पंचगछिया में मांगैन लाल संगीत महाविद्यालय खोलने की घोषणा की. भाजपा नेता भैरोसिंह शेखावत की मौजदूगी में 1995-96 में गांव में संगीत महाविद्यालय की आधारशिला भी रखी गयी. मगर उसके बाद संगीत महाविद्यालय की योजना ठंडे बस्ते में चली गयी. आज भी गांव के कोसी प्रोजेक्ट भवन के सामने वह आधारशिला खड़ी है. हालांकि जिस शिलालेख में शिलान्यास का विवरण था वह नष्ट हो चुका है. मगर गांव के लोग याद करते हैं कि जिस रोज यहां शिलान्यास का कार्यक्रम हुआ था, गांव में अभूतपूर्व मजमा लगा था.
धीरे-धीरे मांगैन गवैया की स्मृतियां गांव के लोगों का साथ छोड़ने लगी हैं. बाहर के लोगों के लिए तो अब वे एक अनजान नाम बन ही गये हैं. मगर उनकी कहानी का महत्व इसलिए भी है कि सवर्ण जमींदारों और संभ्रांत मुसलमानों के एकाधिकार वाले शास्त्रीय संगीत की परंपरा में मांगैन गवैया ने धानुख जैसी छोटी जाति का इंसान होते हुए पहुंच बनायी. इसे रायबहादुर के संगीत के प्रति समर्पण के रूप में भी याद रखा जाना चाहिये, जिन्होंने अपने घरेलू सेवक को आसमान का सितारा बना दिया. उनकी मृत्यु आजादी से पहले हो गयी इसलिए उनका योगदान इतिहास के पन्नों में खो गया, अगर वे आज के दौर में होते तो एक चमकता सितारा होते.
बहरहाल उनकी मृत्यु की कथा भी कम अलौकिक नहीं है. गणेश महतो बताते हैं, उन दिनों बाबा चंपानगर(पूर्णिया) ड्योढ़ी में गायन पेश करने गये हुए थे. चंपानगर ड्योढ़ी के श्यामानंद सिंह की भी संगीत की दुनिया में काफी ख्याति थी. दशहरे के मौके पर उनके यहां जलसा होता था. गजेंद्र नारायण सिंह उस जलसे का जिक्र याद करते हुए बताते हैं कि वहां मांगैन ने रामकली की ठुमरी विकल कर गये सैंया हमार गाया था, जो काफी मुश्किल माना जाता है. उस बार जलसे में काशी से एक साधु भी आये थे. एक दिन साधू बाबा ने श्यामानंद सिंह से कहा कि सुबह मंदिर में किसी भजन गाने वाले गायक को भेज दें. श्यामानंद सिंह ने बाबा को भेज दिया.
कहते हैं, बाबा जब भजन गाने लगे तो साधू बाबा भाव विभोर होकर रोने लगे. यह देख कर बाबा के आंखों से भी आंसू बहने लगे. बाबा गा रहे थे और दोनों रो रहे थे. भजन के बाद साधू ने कहा कि तुम काशी आ जाना. नहीं आओगे तो पछताओगे. बाबा वहां से घर आये और काशी जाने की तैयारी करने लगे. तब ब्रह्मनारायण सिंह ने उन्हें रोक दिया. कहा, ढोंगी बाबाओं के चक्कर में मत पड़ो, यहीं रहो. बाबा रुक गये. मगर तीने ही दिन वे बीमार हो गये, एक डॉक्टर ने उन्हें गलत दवा दे दी और दो-तीन दिन में वे चल बसे. हमलोग यही मानते हैं कि साधू बाबा की बात टालने की वजह से ही हमारे बाबा 40-45 साल की उमर में चल बसे और हम अनाथ हो गये.
(प्रभात खबर में प्रकाशित)