Sunday, September 25, 2016

विद्यापति गीतों को राग-बद्ध करने वाले मांगैन गवैया, जिनके ठुमरी-खयाल का देश दीवाना था


सहरसा जिला मुख्यालय से तकरीबन 20 किमी दूर है पंचगछिया गांव. हम उस गांव एक ऐसे शास्त्रीय गायक की विरासत को देखने गये थे जिन्हें विद्यापति गीतों को रागबद्ध करने का श्रेय जाता है. उनकी ठुमरी और खयाल गायकी के दीवाने फैयाज खां, पं. ओंकारनाथ ठाकुर, विनायक राव पटवर्धन और अख्तरीबाई फैजाबादी जैसे गायक थे. रामचतुर मल्लिक उन्हें मधुकंठ गायक कहा करते थे. रोचक बात यह है कि वे महज एक घरेलू नौकर थे और पछगछिया रियासत में बरतन मांजा करते थे. कहते हैं, पंचगछिया रियासत के मालिक रायबहादुर लक्ष्मीनारायण सिंह ने बचपन में ही उनकी प्रतिभा को पहचाना और अपना शिष्य बना लिया. फिर उन्हें शास्त्रीय गायन की शैली सिखायी, जिसके दम पर उस अलौलिक गवैया ने पूरे देश के संगीतप्रेमियों को अपनी आवाज का दीवाना बना दिया. उस गायक का नाम था मांगैन लाल.
हालांकि शास्त्रीय संगीत की कद्रदानी की पंचगछिया की परंपरा दशकों पहले दम तोड़ चुकी है, फिर भी उस बड़े गांव में मांगैन गवैया का घर ढूंढने में अधिक मुश्किल नहीं हुई. मगर घर के नाम पर जो उजड़ी झोपड़ी दिखी वह दिल तोड़ने वाली थी. याद आ गयी जाने-माने संगीत समीक्षक और संगीत पर कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखने वाले पद्मश्री गजेंद्र नारायण सिंह द्वारा सुनायी गयी वह कथा कि जब काठमांडु की संगीत महफिल में मांगैन ने राग मालकौश की बेहतर प्रस्तुति दी थी तो उन्हें नेपाल के राजा ने अशर्फियों और हीरे-जवाहरातों से नवाजा था. उस वक्त मांगैन ने यह तमाम उपहार अपने तत्कालीन संरक्षक बाबू ब्रह्मनारायण सिंह को यह कहते हुए सौंप दिया था कि, लीजिये, इसका हम क्या करेंगे. और आधे ही घंटे बाद मांगैन उनके पास पहुंच गये थे कि दो पैसा दीजिये, बीड़ी खरीदनी है.
एक टूटी मड़ई, जो उनके घर के दलान जैसी थी, वहां उनके मंझले पोते दिनेश महतो सोये हुए थे. वे उम्र और बीमारी से लाचार नजर आ रहे थे. अपने बाबा मांगैन गवैया को याद करते हुए वे भाव विभोर हो गये. कहने लगे, हम तो उनको देखे नहीं, मगर जो किस्सा अपने बाबूजी और बड़े भाई से सुना उससे लगता है कि वे अलौकिक पुरुष थे. उनके द्वारा अर्जित संपत्ति तो हमें नहीं मिली, मगर आज भी उनके मरने के 60-70 साल बाद आप जैसा कोई व्यक्ति उन्हें ढूंढने आ जाता है. गांव के लोग हमें मांगैन गवैया की संतान कह कर सम्मान देने हैं, यह सबसे बड़ी उपलब्धि है.
कला एवं संस्कृति विभाग के उप सचिव एवं जाने-माने मैथिली कवि तारानंद वियोगी कहते हैं, मांगैन जी की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उन्होंने विद्यापति के गीतों को पहली बार राग-बद्ध किया. आज विद्यापति के जीतने भी गीत एकल स्वर में गाये जाते हैं, उनका राग मांगैन जी का ही तैयार किया हुआ है. उनसे पहले विद्यापति गीत को विभिन्न अवसरों पर महिलाएं सामूहिक रूप से गाती थीं या पिछड़ी-दलित जाति के नटुए बिदापत नाच में इस्तेमाल करते थे. हालांकि गजेंद्र नारायण सिंह विद्यापति गीतों को राग-बद्ध करने का श्रेय पं. रामचतुर मल्लिक को भी देते हैं. मांगैन गवैया एक शास्त्रीय गायक के रूप में भी देश के चुनिंदा गायकों की श्रेणी में गिने जाते हैं.
गजेंद्र नारायण सिंह बताते हैं कि कई महफिलों में पं. ओंकारनाथ ठाकुर ने उनकी प्रतिभा का लोहा मानते हुए उनके गायक के बाद गाने से इनकार कर दिया. अख्तरीबाई फैजाबादी ने एक बार जब उनका गाया दादरा, बाबू दरोगाजी, कौन जतन से धइलौ पियवा मोर... सुना तो घंटों सुबकती रहीं और यह कह कर उन्हें चुप कराया कि जान ले लइबू का... उनके गायन के मुरीद रायगढ़ रियासत के राजा चक्रधर सिंह ने तो उन्हें अपने रियासत में बस जाने का न्योता तक दे दिया था और बंगला, गाड़ी समेत पांच सौ रुपये प्रतिमाह देने का ऑफर दिया था. मगर उन्होंने यह कहते हुए उस ऑफर को ठुकरा दिया कि वे पचगछिया छोड़ कर कहीं नहीं रह सकते.
गजेंद्र नारायण सिंह मांगैन की कहानी को एक जमींदार और एक घरेलू नौकरी के बीच के अंतर्संबंध की कहानी के रूप में देखते हैं. वे कहते हैं कि यह अपने आप में अनूठी मिसाल है कि एक रायबहादुर ने अपने घरेलू नौकरी को संगीत की दुनिया का चोटी का सितारा बना दिया. रायबहादुर को उनके गले का इतना ख्याल रहता था कि वे उनके गले में गर्म हलवे की पट्टियां बंधवाकर रखते थे. रायबहादुर लक्ष्मीनारायण सिंह का मांगैन गवैया पर जो स्नेह था उसकी तस्दीक मांगैन गवैया के बड़े पोते गणेश महतो भी करते हैं. उन्हें अपने दादा को देखने और उनका स्नेह हासिल करने का मौका मिला था. जब मांगैन गवैया की मृत्यु हुई तो वे 12-13 साल के थे.
गांव में आम के बगीचे में एक मचान पर बैठे गणेश महतो कहते हैं, बाबा का ज्यादातर समय पंचगछिया ड्योढी में ही गुजरता था. वहीं रियाज होता और वहीं से देश भर में वे अलग-अलग रियासतों में गायन की प्रस्तुतियां देने जाते. मगर जब वे खाली होते और घर आते तो उन्हें हारमोनियम बजाना सिखाते. गणेश कहते हैं, बाबा ने ही उन्हें रघुपति राघव राजा राम भजन गाना सिखाया और आज भी वे रोज एक बार इस भजन को गा ही लेते हैं.
गणेश बताते हैं कि पंचगछिया के रायबहादुर और उनके घरेलू खवास(नौकर) का यह आपसी स्नेह एक छोटे से मसले पर टूट गया. रायबहादुर साहब डिस्ट्रक्ट बोर्ड के चेयरमैन पद के लिए चुनाव में खड़े हुए थे. एक दिन रायबहादुर ने बाबा से पूछा कि वे किसको वोट देंगे. तो मांगैन ने कह दिया, अपने गांव के मुख्तार साहब को. इस बात पर रायबहादुर ने उन्हें हवेली से निकाल दिया. रायबहादुर और मांगैन के बीच मतभेद की बात तारानंद वियोगी भी स्वीकार करते हैं, मगर वे इसकी वजह रायबहादुर के गोतिया ब्रह्मनारायण सिंह को मानते हैं. वे कहते हैं कि मांगैन असल में ब्रह्मनारायण सिंह के चरवाहा थे. जब मांगैन की शोहरत फैलने लगी तो उन्होंने मांगैन पर दावा कर दिया.
वजह जो भी हो, मगर सच यही है कि बीसवीं सदी के चौथे दशक में दोनों मालिक और नौकर के बीच स्नेह का धागा टूट गया और ब्रह्मनारायण सिंह मांगैन के मालिक-मुख्तार और मैनेजर हो गये. वे पहले उन्हें दरभंगा इस उम्मीद से लेकर गये कि वहां उन्हें राज दरबार में नौकरी लग जायेगी. मगर वहां बात जमी नहीं. फिर ब्रह्मानंद सिंह के साथ ही मांगैन कोलकाता की अखिल भारतीय संगीत सभा के कार्यक्रम में भी गये. जहां उन्होंने गायन की ऐसी छटा बिखेरी कि देश भर के गायक उनके दीवाने हो गये. कोलकाता के संगीत सभा की कथा गणेश महतो भी रोचक अंदाज में सुनाते हैं और गजेंद्र नारायण सिंह भी इस बात की तस्दीक करते हैं.
गजेंद्र नारायण सिंह कहते हैं कि कोलकाता में सफल गायन के बाद मेगाफोन कंपनी ने मांगैन के गीतों का रिकार्ड भी तैयार कराया था. कंपनी वाले ने मांगैन ने बतौर रॉयल्टी 25 हजार रुपये पेश किये. मगर इस ऑफर पर ब्रह्मनारायण सिंह नाराज हो गये और उन्होंने एक लाख रुपये की मांग की. कंपनी ने इस मांग पर हाथ खड़े कर दिये. इस पर नाराज होकर ब्रह्मनारायण सिंह से सारे रिकार्ड्स तोड़ डाले.
गणेश महतो कहते हैं कि ब्रह्मनारायण सिंह की वजह से ही आज उनका परिवार इस हाल में है. उनके दादा को पूरे देश की रियासतों से खूब सारे इनाम मिले थे और राजाओं ने जमीन दान किये थे. कितनी जमीन मिली उसका कोई हिसाब नहीं. मगर तमाम तोहफों पर ब्रह्मनारायण सिंह ने कब्जा जमा लिया और जमीन जहां मिली तत्काल वहीं उसका सौदा कर लिया. खुद रायबहादुर लक्ष्मीनारायण सिंह ने जो जमीन उनके दादा को दी थी उसका भी बड़ा हिस्सा ब्रह्मनारायण सिंह ने बेच खाया. मांगैन गवैया अनपढ़ तो थे ही मौजी जीव भी थे. उन्हें संपत्ति की कोई ख्वाहिश नहीं थी और वे जब तक जिंदा रहे राजसी ठाठ में ही उनका जीवन गुजरा. मगर जब 1942-43 में उनकी मौत हो गयी तो इसी वजह से उनके परिवार को खाने के लाले पड़ने लगे.
मांगैन गवैया की मौत के बाद उनके एकमात्र पुत्र लड्डू गवैया ने शास्त्रीय संगीत की उस परंपरा को थोड़ा आगे बढ़ाया. मगर उसके बाद पंचगछिया संगीत घराने का माहौल भी खत्म हो गया और पारिवारिक हालत ने भी साथ नहीं दिया. लड्डू गवैया के तीन पुत्र हुए, जिनमें अभी दो वयोवृद्ध हालत में जिंदा हैं. ये लोग अपनी जवानी में भजन-कीर्तन करते रहे हैं. इनके बच्चों से तो गीत और साज दोनों छूट गये. तीन परिवार के पास दो-तीन बीघा करके जमीन है, जिससे इनका उपार्जन चलता है. लड़के दिल्ली जाकर नौकरी करने लगे हैं.
मांगैन गवैया की गायन परंपरा को उनके शिष्य उपेंद्र यादव ने निभाया. वे शास्त्रीय संगीत गाते रहे हैं. मगर इन दिनों वे काफी बीमार हैं और बताया जाता है कि स्थिति नाजुक है. मांगैन गवैया के घर में उनकी कोई निशानी बची नहीं है. हारमोनियम शिष्य उपेंद्र यादव के पास है तो तानपुरा को पसराहा स्थित एक स्कूल में रखा गया है.
बीसवीं सदी के आखिरी सालों में मांगैन गवैया एक बार फिर से तब चर्चा में आये जब तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने पंचगछिया में मांगैन लाल संगीत महाविद्यालय खोलने की घोषणा की. भाजपा नेता भैरोसिंह शेखावत की मौजदूगी में 1995-96 में गांव में संगीत महाविद्यालय की आधारशिला भी रखी गयी. मगर उसके बाद संगीत महाविद्यालय की योजना ठंडे बस्ते में चली गयी. आज भी गांव के कोसी प्रोजेक्ट भवन के सामने वह आधारशिला खड़ी है. हालांकि जिस शिलालेख में शिलान्यास का विवरण था वह नष्ट हो चुका है. मगर गांव के लोग याद करते हैं कि जिस रोज यहां शिलान्यास का कार्यक्रम हुआ था, गांव में अभूतपूर्व मजमा लगा था.
धीरे-धीरे मांगैन गवैया की स्मृतियां गांव के लोगों का साथ छोड़ने लगी हैं. बाहर के लोगों के लिए तो अब वे एक अनजान नाम बन ही गये हैं. मगर उनकी कहानी का महत्व इसलिए भी है कि सवर्ण जमींदारों और संभ्रांत मुसलमानों के एकाधिकार वाले शास्त्रीय संगीत की परंपरा में मांगैन गवैया ने धानुख जैसी छोटी जाति का इंसान होते हुए पहुंच बनायी. इसे रायबहादुर के संगीत के प्रति समर्पण के रूप में भी याद रखा जाना चाहिये, जिन्होंने अपने घरेलू सेवक को आसमान का सितारा बना दिया. उनकी मृत्यु आजादी से पहले हो गयी इसलिए उनका योगदान इतिहास के पन्नों में खो गया, अगर वे आज के दौर में होते तो एक चमकता सितारा होते.
बहरहाल उनकी मृत्यु की कथा भी कम अलौकिक नहीं है. गणेश महतो बताते हैं, उन दिनों बाबा चंपानगर(पूर्णिया) ड्योढ़ी में गायन पेश करने गये हुए थे. चंपानगर ड्योढ़ी के श्यामानंद सिंह की भी संगीत की दुनिया में काफी ख्याति थी. दशहरे के मौके पर उनके यहां जलसा होता था. गजेंद्र नारायण सिंह उस जलसे का जिक्र याद करते हुए बताते हैं कि वहां मांगैन ने रामकली की ठुमरी विकल कर गये सैंया हमार गाया था, जो काफी मुश्किल माना जाता है. उस बार जलसे में काशी से एक साधु भी आये थे. एक दिन साधू बाबा ने श्यामानंद सिंह से कहा कि सुबह मंदिर में किसी भजन गाने वाले गायक को भेज दें. श्यामानंद सिंह ने बाबा को भेज दिया.
कहते हैं, बाबा जब भजन गाने लगे तो साधू बाबा भाव विभोर होकर रोने लगे. यह देख कर बाबा के आंखों से भी आंसू बहने लगे. बाबा गा रहे थे और दोनों रो रहे थे. भजन के बाद साधू ने कहा कि तुम काशी आ जाना. नहीं आओगे तो पछताओगे. बाबा वहां से घर आये और काशी जाने की तैयारी करने लगे. तब ब्रह्मनारायण सिंह ने उन्हें रोक दिया. कहा, ढोंगी बाबाओं के चक्कर में मत पड़ो, यहीं रहो. बाबा रुक गये. मगर तीने ही दिन वे बीमार हो गये, एक डॉक्टर ने उन्हें गलत दवा दे दी और दो-तीन दिन में वे चल बसे. हमलोग यही मानते हैं कि साधू बाबा की बात टालने की वजह से ही हमारे बाबा 40-45 साल की उमर में चल बसे और हम अनाथ हो गये.
(प्रभात खबर में प्रकाशित)