Sunday, October 02, 2016

कहानी उस संत की जिसने गांधी को चंपारण बुलाने के लिये दान कर दी थी तीन बीघा जमीन


आज गांधी जयंती तो है ही इस साल चंपारण सत्याग्रह के सौ साल पूरे होने वाले हैं. चंपारण आंदोलन के सौ साल पूरे होने का मतलब है भारत में गांधी के सत्याग्रह आंदोलन का सौ साल पूरा होना. इसलिए आज चंपारण आंदोलन की बातें करूंगा. वैसे तो इस आंदोलन के नायकों की जब बात आती है तो गांधी को इस इलाके में खींच कर लाने वाले किसान राजकुमार शुल्क, निलहे किसानों की व्यथा को सामने लाने वाले पत्रकार हरबंस सहाय औऱ पीर मोहम्मद मूनीस, इन किसानों का मुकदमा लड़ने वाले वकील ब्रजकिशोर बाबू, बत्तख मियां जिनके नाम से मोतिहारी स्टेशन का एक गेट बना है और कई किरदार याद आते हैं. मगर आज एक नये किरदार से आपका परिचय कराना चाहूंगा जिन्होंने गांधी को चंपारण बुलवाने के लिए अपनी तीन बीघा जमीन को दान कर दिया था.
ये थे अमोलवा गांव के संत भगत. इनकी कहानी मुझे तब मालूम हुई जब मैं इस साल चंपारण की यात्रा पर था. मैं भितिहरवा गांव गया था, गांधी जी द्वारा शुरू किये गये दूसरे विद्यालय को देखने के लिए. आज वह विद्यालय तो किसी और रूप में अपनी जगह से कुछ दूरी पर है, मगर उस विद्यालय के खपरैल भवन को सुरक्षित रखा गया है. और उसे घेर कर बिहार सरकार ने गांधी संग्रहालय का रूप दे दिया है. उसी संग्रहालय में मुझे अमोलवा के संत भगत की तसवीर मिली. संग्रहालय में उस विद्यालय के पहले छात्र मुकुटधारी महतो की भी मूर्ति लगी थी, जो बाद में गांधीवादी स्वतंत्रता सेनानी हो गये थे. जब मैं उनके घर गया तो वहां मुझे एक हस्तलिखित पांडुलिपी दिखायी गयी, जिसमें चंपारण सत्याग्रह की कहानी दर्ज थी. उसी पांडुलिपी में बताया गया था कि गांधी को कैसे चंपारण लाया गया.
कहानी कुछ यूं थी कि इस इलाके के किसान नीलहे अंगरेजों के अत्याचार से त्रस्त थे. वे समय-समय पर विद्रोह करते रहते थे. उनके मुकदमे वकील ब्रजकिशोर प्रसाद लड़ते थे और उन पर होने वाले जुल्म के किस्से कानपुर से गणेश शंकर विद्यार्थी के संपादन में प्रकाशित होने वाले अखबार प्रताप में छपा करते थे. बिहार में इन खबरों को छापने के लिए कोई अखबार तैयार नहीं होता, एक बार एक अखबार में खबर छपी तो बवाल हो गया और खबर लिखने वाले पत्रकार को नौकरी से निकाल दिया गया. तो उस वक्त हरबंस सहाय औऱ पीर मोहम्मद मूनिस बिहार से प्रताप अखबार में लिखा करते थे. राजकुमार शुल्क चंपारण के मामलों में उनके सूत्र थे. एक दिन संभवतः कानपुर में एक भावुक क्षण में जब राजकुमार शुक्ल ने गणेश शंकर विद्यार्थी से पूछा कि हम किसानों के दुखों का अंत कैसे होगा, तब विद्यार्थी जी ने गांधी का नाम सुझाते हुए कहा कि एक वही व्यक्ति है जो आपकी समस्या का समाधान कर सकते हैं. तब से राजकुमार शुक्ल पर धुन सवार हो गयी कि वे हर हाल में गांधी को चंपारण लाकर रहेंगे.
भैरवलाल दास जी ने जो राजकुमार शुक्ल की डायरी का प्रकाशन किया है, उसमें भी इससे संबंधित कई जानकारियां मिलती हैं, जो भितिहरवा वाली पांडुलिपी में दर्ज है, जिसे संभवतः भितिहरवा आश्रम के पहले शिष्य मुकुटधारी महतो ने लिखा है. तो इस मुद्दे पर इलाके के किसानों की बैठक हुई. तय हुआ कि गांधी को चंपारण लाया जाये. जिम्मा राजकुमार शुक्ल को दिया गया. मगर तब तक अंगरेजों से लड़ते-लड़ते राजकुमार शुक्ल की माली हालत काफी कमजोर हो चुकी थी. गांधी को लाने और आंदोलन चलाने के लिए काफी पैसा खर्च होने वाला था. तो उस बैठक में मौजूद अमोलवा के बड़े किसान संत राउत उर्फ संत भगत ने तीन बीघा जमीन राजकुमार शुक्ल के नाम से लिख दी ताकि वे इस आंदोलन को चला सकें और गांधी को चंपारण ला सकें.
यह जानकारी मिलने पर मैं अमोलवा गांव में संत भगत के घर गया. वहां उनका पुराना मकान अच्छी हालत में है. उनके पोतों का परिवार उसमें रहता है. उन लोगों ने मुझे वह कमरा भी दिखाया जिसमें कस्तूरबा छह माह तक रही थीं. उन लोगों ने जो बताया उससे समझ आया कि संत भगत कम पढ़े लिखे व्यक्ति थे, मगर पढ़े लिखे व्यक्तियों के संपर्क में रहा करते थे. राजकुमार शुक्ल से उनकी मित्रता इसी वजह से थे. जमीन को लेकर मुकदमे होते रहते थे, और इसमें राजकुमार शुक्ल उनकी मदद किया करते थे.
वे न सिर्फ चंपारण आंदोलन के एक महत्वपूर्ण फाइनेंसर थे, बल्कि उन्होंने बाद के दिनों में सक्रिय भागीदारी भी की. भितिहरवा आश्रम जो उनके गांव से कुछ ही दूरी पर था की स्थापना के बाद से बाहर से आने वाले गांधी के सहयोगी उनके घर में ठहरा करते थे. कस्तूरबा तो रहती ही थीं. हां, निलहे अंगरेजों की रियाया होने की वजह से कभी उनकी हिम्मत सीधी लड़ाई लड़ने की नहीं हुई. जबकि राजकुमार शुक्ल सीधी टक्कर लेने के लिए मशहूर थे.
कहते हैं, कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में राजकुमार शुक्ल ने चंपारण के किसानों के दुख दर्द का बड़ा मार्मिक विवरण पेश किया था. जिसे सुन कर गांधी जी ने वादा किया था कि वे चंपारण जरूर आयेंगे. मगर वे तत्काल आये नहीं. राजकुमार शुक्ल ने फिर उनका पीछा कोलकाता तक किया. जब गांधी राजकुमार शुक्ल के साथ पटना पहुंचे तो पहले डॉ. राजेंद्र प्रसाद के घर गये. राजेंद्र बाबू उस वक्त उनके घर में नहीं थे और उनके नौकरों ने गांधी को देहाती मुवक्किल समझ लिया और उनके साथ ठीक बर्ताव नहीं किया. तब वे मौलाना मजहरूल हक के घर गये.
चंपारण की लड़ाई की सबसे बड़ी सफलता मुजफ्फरपुर कोर्ट में गांधी की पेशी थी. उस वक्त अंगरेजों ने सोचा था कि गांधी को गिरफ्तारी की धमकी देकर मुजफ्फरपुर से ही लौटा देंगे. संबंधित अधिकारी ने रात भर तैयारी की थी जिससे गांधी को बताया जा सके कि उनका चंपारण जाना गैरकानूनी है. उन्हें लगा था कि एक वकील रह चुके गांधी अधिक से अधिक जिरह करेंगे. मगर जब गांधी ने तमाम आरोपों को स्वीकार कर लिया और कहा कि वे चंपारण जाकर रहेंगे, अगर ब्रिटिश सरकार उन्हें गिरफ्तार करना चाहती है तो कर सकती है. ऐसा पहली बार हुआ था जब ब्रिटिश सत्ता को किसी निहत्थे आदमी ने कहा था कि वे उन्हें गिरफ्तार करना चाहे तो कर सकती है, जो जेल जाने से नहीं डर रहा था. और मुजफ्फरपुर का प्रशासन उन्हें गिरफ्तार करने और गिरफ्तारी के बाद की स्थिति से निबटने के लिए तैयार नहीं था. उन्हें गांधी को चंपारण जाने देना पड़ा. यह बहुत बड़ी मानसिक जीत थी. इसके मानसिक शक्ति के आगे मुजफ्फरपुर में पहली बार अंग्रेज पराजित हुए थे और बाद के दिनों में होते चले गये....
इस कहानी में मैं खास तौर पर उस महंथ का नाम भी जोड़ना चाहूंगा जिन्होंने निलहे किसानों के भय की परवाह किये बगैरह भितिहरवा में गांधी जी को विद्यालय खोलने के लिए जमीन दी थी. जब गांधी उस इलाके में विद्यालय शुरू करना चाहते थे तो निलहे अंगरेज इसके खिलाफ थे. उन्होंने साफ-साफ शर्त रख दी थी कि उनके इलाके में यह स्कूल नहीं खोला जा सकता. वरना संत भगत तो अपनी जमीन देने के लिए तैयार ही थे. अब ऐसी स्थिति में तय हुआ कि अमोलवा गांव के नजदीक कोई किसी गांव में स्कूल खोला जाये जो निलहों के इलाके में नहीं पड़ता है. ऐसे में पड़ोस का भितिहरवा गांव मिला जहां संत भगत के कई परिचित रहते थे. हालांकि अंगरेजों के भय से कोई जमीन देने के लिए तैयार नहीं था. मगर तब एक महंथ ने अपने मठ की जमीन गांधी जी को दे दी. फिर आनन-फानन में फूस का आश्रम खड़ा हुआ. मगर एक-दो दिन ही बीते थे, कि अंगरेजों ने उस आश्रम में आग लगवा दिया. मगर गांधी जी के साथ इससे हारे नहीं. रातो-रात चंदा हुआ और दिन भर में ही एक खपरैल मकान खड़ा कर लिया गया, जिसे आग का खतरा नहीं था. आज भी भितिहरवा गांव में उस महंथ की कुटी फूस की ही है जबकि बगल में वह आश्रम किसी भव्य स्मारक की तरह नजर आता है.